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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–022 · अध्याय 05

राज्यपाल, बहुमत परीक्षण और विधानसभा भंग

राज्यपाल, बहुमत परीक्षण और विधानसभा भंग करने के विवाद — सरकार बनाने और गिराने में संवैधानिक भूमिका

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत शोध संस्करण · 11 सितंबर 2026

1967 के बाद राज्यों में जिस तेजी से सरकारें बनीं और गिरीं, उसने एक संवैधानिक पद को अचानक भारतीय राजनीति के केंद्र में ला दिया—राज्यपाल

जब तक अधिकांश राज्यों में एक ही दल को स्पष्ट बहुमत मिलता रहा, राज्यपाल की भूमिका अपेक्षाकृत औपचारिक दिखाई देती थी। लेकिन 1967 के चुनाव के बाद अनेक राज्यों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, गठबंधन टूटने लगे और विधायक बार-बार पाला बदलने लगे। ऐसे में यह तय करना कि किसे सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए, किस मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने के लिए कहा जाए, विधानसभा कब बुलाई जाए और कब भंग की जाए—इन सभी प्रश्नों में राज्यपाल की भूमिका निर्णायक हो गई।

नवंबर 1970 में संसद की बहस में भी स्वीकार किया गया कि 1967 तक एक-दलीय बहुमत के कारण राज्यपाल के सामने ऐसी संवैधानिक कठिनाइयां बहुत कम थीं, लेकिन 1967 के बाद पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों की परिस्थितियों ने राज्यपाल को अधिक सक्रिय और विवादास्पद भूमिका में ला दिया।

बहुमत का असली परीक्षण कहां होना चाहिए?

1967 के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न था—यदि मुख्यमंत्री के बहुमत पर संदेह हो जाए तो फैसला कौन करे?

राजभवन?

राजनीतिक दलों के दावे?

विधायकों के हस्ताक्षर?

या विधानसभा?

इस दौर के अनुभवों से धीरे-धीरे यह सिद्धांत मजबूत हुआ कि बहुमत का सबसे विश्वसनीय परीक्षण विधानसभा के भीतर होना चाहिए।

लेकिन 1967–74 के दौरान यह सिद्धांत आज जितना स्पष्ट और संस्थागत नहीं था। राज्यपाल कई बार विधायकों के लिखित समर्थन, राजनीतिक प्रतिनिधिमंडलों, दलों के दावों और अपने आकलन के आधार पर निर्णय लेते थे। इसी कारण विवाद पैदा हुए।

पश्चिम बंगाल इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण बना।

पश्चिम बंगाल 1967 — बहुमत परीक्षण की मांग और मुख्यमंत्री की बर्खास्तगी

1967 में अजय मुखर्जी के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा सरकार बनी थी। बाद में प्रफुल्ल चंद्र घोष और कुछ अन्य विधायक मोर्चे से अलग हुए और दावा किया कि मुखर्जी सरकार विधानसभा का बहुमत खो चुकी है।

6 नवंबर 1967 को राज्यपाल ने मुख्यमंत्री से कहा कि विधानसभा जल्दी बुलाई जाए ताकि सदन में बहुमत का परीक्षण हो सके। राज्यपाल ने दोबारा 14 नवंबर और फिर 16 नवंबर को आग्रह किया कि विधानसभा नवंबर के अंत तक बुला ली जाए।

लेकिन मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद दिसंबर तक सत्र बुलाना चाहते थे।

स्थिति टकराव में बदल गई।

21 नवंबर 1967 को राज्यपाल धर्मवीर ने अजय मुखर्जी मंत्रिमंडल को पद से हटा दिया और प्रफुल्ल चंद्र घोष को सरकार बनाने का अवसर दिया। इस निर्णय को न्यायालय में चुनौती दी गई। कलकत्ता उच्च न्यायालय के समक्ष दर्ज घटनाक्रम से स्पष्ट है कि राज्यपाल ने बार-बार विधानसभा में बहुमत परीक्षण की मांग की थी और मुख्यमंत्री ने निर्धारित समय में सत्र बुलाने से इनकार किया था।

यह मामला भारतीय संवैधानिक राजनीति में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां दो प्रश्न एक साथ खड़े हुए।

पहला—क्या मुख्यमंत्री को बहुमत परीक्षण से बचने के लिए विधानसभा सत्र टालने का अधिकार था?

दूसरा—क्या राज्यपाल मुख्यमंत्री को हटाकर स्वयं यह निष्कर्ष निकाल सकता था कि सरकार बहुमत खो चुकी है?

बाद के न्यायिक और संवैधानिक विमर्श में पश्चिम बंगाल का यह प्रकरण बार-बार उद्धृत हुआ। 1973 के एक निर्णय में भी यह दर्ज किया गया कि राज्यपाल का उद्देश्य बहुमत को विधानसभा में परखना था।

उत्तर प्रदेश — राज्यपाल किसे बुलाए?

उत्तर प्रदेश में 1967 के बाद समस्या कुछ अलग थी।

यहां कोई एक स्थायी बहुमत लंबे समय तक नहीं टिक पा रहा था। कांग्रेस, संयुक्त विधायक दल और बाद में अलग-अलग राजनीतिक संयोजन सत्ता के दावेदार बने।

ऐसी परिस्थितियों में राज्यपाल के सामने सबसे कठिन प्रश्न था—यदि मुख्यमंत्री बहुमत खो दे तो क्या उसकी सलाह पर विधानसभा भंग कर दी जाए, या दूसरे गठबंधन को सरकार बनाने का अवसर दिया जाए?

1968 में उत्तर प्रदेश की विधानसभा तुरंत भंग नहीं की गई। पहले वैकल्पिक सरकार की संभावना देखी गई। बाद के संवैधानिक अध्ययनों में उत्तर प्रदेश 1968 को उन उदाहरणों में रखा गया जहां राज्यपाल ने तत्काल विघटन के बजाय वैकल्पिक सरकार की संभावना तलाशने का रास्ता अपनाया।

यहीं एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत सामने आया—विधानसभा का बहुमत किसी मुख्यमंत्री की निजी संपत्ति नहीं है।

यदि मुख्यमंत्री बहुमत खो देता है तो उसके विधानसभा भंग करने के सुझाव को स्वतः स्वीकार करना आवश्यक नहीं माना गया। यदि कोई दूसरा नेता बहुमत जुटा सकता हो तो उसे अवसर दिया जा सकता था।

लेकिन यही विवेक बाद में विवाद का कारण बना, क्योंकि अलग-अलग राज्यों में राज्यपालों ने समान परिस्थितियों में अलग निर्णय दिए।

एक जैसी परिस्थिति, अलग-अलग निर्णय

1967 के बाद सबसे बड़ी समस्या यही थी कि कोई स्पष्ट और सर्वमान्य प्रक्रिया विकसित नहीं हुई थी।

कुछ राज्यों में बहुमत खो चुके मुख्यमंत्री की विधानसभा भंग करने की सलाह स्वीकार कर ली गई।

कुछ में नहीं।

बाद में सरकारिया आयोग ने पाया कि समान परिस्थितियों में राज्यपालों ने अलग-अलग रास्ते अपनाए थे। उदाहरण के लिए केरल 1970 और पंजाब 1971 में विधानसभा भंग कर दी गई, जबकि पंजाब 1967, उत्तर प्रदेश 1968, मध्य प्रदेश 1969 और ओडिशा 1971 में पहले वैकल्पिक सरकार बनाने की कोशिश की गई।

यही असंगति विवाद की जड़ थी।

राज्यपाल के पास संवैधानिक विवेक था, लेकिन उस विवेक के प्रयोग के लिए उस समय आज जैसी विस्तृत न्यायिक कसौटियां उपलब्ध नहीं थीं।

इससे विपक्षी दल बार-बार आरोप लगाते थे कि राजभवन निष्पक्ष संवैधानिक संस्था के बजाय केंद्र की राजनीतिक प्राथमिकताओं से प्रभावित होकर निर्णय ले रहा है।

हरियाणा — दल-बदल और राज्यपाल की रिपोर्ट

हरियाणा में 1967 के बाद लगातार दल-बदल हो रहा था। कांग्रेस सरकार गिर चुकी थी और राव बीरेंद्र सिंह की संयुक्त दल सरकार सत्ता में थी।

लेकिन सरकार का बहुमत लगातार अस्थिर था।

हरियाणा के राज्यपाल ने 17 नवंबर 1967 की अपनी रिपोर्ट में लिखा कि दल-बदल अत्यंत तेजी से हो रहा है और सरकार भी सत्ता में बने रहने के लिए अत्यधिक संख्या में मंत्री तथा संसदीय सचिव नियुक्त कर रही है। उस समय सत्तारूढ़ समूह के लगभग आधे सदस्यों को मंत्री या संसदीय सचिव पद मिलने जैसी स्थिति पैदा हो गई थी।

आखिरकार विधानसभा भंग हुई और राष्ट्रपति शासन लगा।

यहां विवाद केवल यह नहीं था कि सरकार के पास किसी क्षण बहुमत था या नहीं। प्रश्न यह भी था कि लगातार बदलते बहुमत को कितने समय तक वैध और स्थिर सरकार माना जाए?

राज्यपाल की रिपोर्ट में राजनीतिक अस्थिरता, बार-बार दल-बदल और मंत्रिपद बांटकर बहुमत बनाए रखने की प्रवृत्ति को संवैधानिक शासन की समस्या के रूप में देखा गया।

पंजाब — पहले वैकल्पिक सरकार, फिर संकट

पंजाब में 1967 के चुनाव में कांग्रेस 104 सदस्यीय विधानसभा में 43 सीटें जीतकर सबसे बड़ा दल बनी, लेकिन बहुमत से दूर रही। अन्य दलों ने मिलकर संयुक्त मोर्चा बनाया और गुरनाम सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी। यह तथ्य सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन अभिलेख में भी दर्ज है।

बाद में गठबंधन टूटा और लक्ष्मण सिंह गिल के नेतृत्व में नया समीकरण बना।

यहां भी राज्यपाल को यह तय करना पड़ा कि पुरानी सरकार के बाद सीधे चुनाव हों या विधानसभा के भीतर किसी दूसरे समूह को अवसर दिया जाए।

दूसरा विकल्प अपनाया गया।

इसका अर्थ था कि राज्यपाल ने यह सिद्धांत स्वीकार किया कि जब तक वर्तमान विधानसभा में वैकल्पिक बहुमत संभव हो, तुरंत चुनाव आवश्यक नहीं हैं।

लेकिन यही तरीका विवादास्पद भी था, क्योंकि नई सरकार पुराने विरोधियों के समर्थन पर निर्भर थी।

मध्य प्रदेश — बहुमत टूटने के बाद नई सरकार

मध्य प्रदेश में द्वारका प्रसाद मिश्र के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के विधायक टूटे और गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में नया समूह बना।

राज्यपाल ने बदली हुई विधानसभा संख्या को स्वीकार करते हुए नई सरकार के गठन का रास्ता खोला।

यह घटना एक और महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न लेकर आई—यदि चुनाव में एक दल बहुमत लेकर आया हो लेकिन उसके विधायक बाद में बड़ी संख्या में टूट जाएं, तो क्या मूल चुनावी जनादेश को प्राथमिकता दी जाए या विधानसभा में वर्तमान बहुमत को?

उस समय की संवैधानिक व्यवस्था ने व्यावहारिक रूप से दूसरे सिद्धांत को मान्यता दी—सरकार वही चलाएगा जिसके पास उस समय विधानसभा का बहुमत है।

इसी कारण दल-बदल सीधे सरकार परिवर्तन का साधन बन गया।

विधानसभा भंग करना अंतिम विकल्प था या राजनीतिक हथियार?

अनुच्छेद 174 के तहत राज्यपाल को विधानसभा भंग करने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त है। सामान्य स्थिति में यह शक्ति मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर प्रयोग की जाती है। संविधान के अनुच्छेद 174 में राज्यपाल को विधानसभा बुलाने, स्थगित करने और भंग करने का अधिकार दिया गया है।

लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब मुख्यमंत्री स्वयं बहुमत खो चुका हो।

क्या ऐसा मुख्यमंत्री विधानसभा भंग करवाकर किसी वैकल्पिक सरकार को बनने से रोक सकता है?

1967 के बाद विभिन्न राज्यों में इस प्रश्न का अलग-अलग उत्तर मिला।

कुछ राज्यपालों ने कहा—पहले देखें कि कोई दूसरा नेता बहुमत जुटा सकता है या नहीं।

कुछ ने विघटन स्वीकार कर लिया।

इसी कारण बाद में सरकारिया आयोग को राज्यपाल की भूमिका के लिए अधिक स्पष्ट दिशा-निर्देश देने पड़े।

राष्ट्रपति शासन की सिफारिश — राज्यपाल की सबसे बड़ी शक्ति

जब राज्यपाल यह निष्कर्ष निकालता था कि कोई भी दल या गठबंधन स्थिर सरकार नहीं बना सकता, तब वह केंद्र को यह रिपोर्ट भेज सकता था कि राज्य में संविधान के अनुसार शासन चलाना संभव नहीं रह गया है।

इसके बाद अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता था।

यहीं सबसे अधिक राजनीतिक विवाद पैदा हुआ।

क्या राज्यपाल ने वास्तव में सभी विकल्प आजमा लिए थे?

क्या विधानसभा में बहुमत परीक्षण कराया गया था?

क्या किसी दूसरे गठबंधन को अवसर दिया गया?

या केंद्र की इच्छा के अनुसार जल्दी से राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी गई?

बाद के विधि आयोग के अध्ययन ने भी यह निष्कर्ष दर्ज किया कि अनेक अवसरों पर अनुच्छेद 356 का प्रयोग गलत ढंग से किया गया और बाद में सर्वोच्च न्यायालय को इसकी न्यायिक समीक्षा की सीमाएं स्पष्ट करनी पड़ीं।

हालांकि यह न्यायिक स्पष्टता बहुत बाद में आई, लेकिन उसका मूल संकट 1967 के बाद के इन्हीं वर्षों में पैदा हुआ था।

राज्यपाल पर “केंद्र के प्रतिनिधि” होने का आरोप क्यों बढ़ा?

राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और व्यवहार में यह केंद्र सरकार की सलाह पर होती है। इसलिए जब केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकारें बनने लगीं तो राज्यपाल की निष्पक्षता पर राजनीतिक संदेह बढ़ा।

1967 से पहले यह टकराव कम दिखाई देता था क्योंकि केंद्र और अधिकांश राज्यों में कांग्रेस ही शासन कर रही थी।

लेकिन जैसे ही पश्चिम बंगाल, पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं, राज्यपाल के हर निर्णय का राजनीतिक अर्थ निकाला जाने लगा।

यदि गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री को हटाया गया तो विपक्ष ने केंद्र के हस्तक्षेप का आरोप लगाया।

यदि कांग्रेस से टूटे किसी समूह को सरकार बनाने का अवसर मिला तो प्रश्न उठा कि राजभवन किस आधार पर उसकी संख्या पर विश्वास कर रहा है।

यदि विधानसभा भंग कर दी गई तो आरोप लगा कि वैकल्पिक सरकार बनने से रोकी गई।

यदि विधानसभा भंग नहीं की गई तो आरोप लगा कि जोड़-तोड़ के लिए समय दिया जा रहा है।

इस तरह राज्यपाल का पद राजनीतिक संघर्ष के बीच फंस गया।

सबसे बड़ी कमी — स्पष्ट नियमों का अभाव

आज बहुमत परीक्षण के संबंध में एक स्थापित संवैधानिक धारणा है कि संदेह होने पर फैसला सदन के पटल पर होना चाहिए। लेकिन 1967–74 में यह प्रक्रिया इतनी स्पष्ट नहीं थी।

राज्यपाल अक्सर अपने विवेक से समय सीमा तय करते थे।

मुख्यमंत्री सत्र बुलाने में देरी कर सकता था।

समर्थन पत्रों और विधायक दलों के दावों को महत्वपूर्ण माना जाता था।

इसी कारण हर संकट का समाधान अलग ढंग से हुआ।

यही वह ऐतिहासिक दौर था जिसने बाद में एक स्पष्ट सिद्धांत की आवश्यकता सिद्ध की—राजभवन बहुमत का स्थायी निर्णायक नहीं हो सकता; अंतिम संख्या विधानसभा में ही सामने आनी चाहिए।

बहुत बाद में सर्वोच्च न्यायालय के एस.आर. बोम्मई निर्णय ने अनुच्छेद 356 और बहुमत परीक्षण के संबंध में कठोर न्यायिक कसौटियां विकसित कीं। उस निर्णय ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति शासन लागू होना अपने-आप विधानसभा भंग करने का अनिवार्य परिणाम नहीं है।

लेकिन उस संवैधानिक विकास की जड़ें 1967 के बाद के इसी अस्थिर दौर में थीं।

1967–74 के अनुभव का निष्कर्ष

इस पूरे दौर ने तीन महत्वपूर्ण बातें स्थापित कीं।

पहली—यदि किसी मुख्यमंत्री के बहुमत पर गंभीर संदेह हो तो उसका सर्वोत्तम परीक्षण विधानसभा में होना चाहिए।

दूसरी—बहुमत खो चुके मुख्यमंत्री की विधानसभा भंग करने की सलाह को यंत्रवत स्वीकार करना उचित नहीं; पहले वैकल्पिक सरकार की संभावना देखी जा सकती है।

तीसरी—राज्यपाल के विवेक की सीमा स्पष्ट न हो तो वही संवैधानिक विवेक राजनीतिक विवाद का स्रोत बन सकता है।

1967 के बाद पहली बार भारतीय लोकतंत्र को इतने बड़े पैमाने पर यह तय करना पड़ा कि चुनाव और अगला चुनाव होने के बीच विधानसभा के भीतर बदलते बहुमत को कैसे संभाला जाए।

दल-बदल ने सरकारों को अस्थिर किया था।

लेकिन उन्हीं अस्थिर सरकारों ने राज्यपाल को ऐसी शक्ति और विवेक दे दिया जिसे लेकर केंद्र और राज्यों के बीच अविश्वास बढ़ने लगा।

और जब कोई भी सरकार टिकने की स्थिति में नहीं रहती थी, तब अगला कदम अक्सर सबसे कठोर संवैधानिक उपाय होता था—राष्ट्रपति शासन।