प्रमुख केस स्टडी
11 घटनाओं में लक्ष्य-चयन, रेकी, नेटवर्क, जांच और मनोवैज्ञानिक प्रभाव
11 घटनाओं में लक्ष्य-चयन, रेकी, नेटवर्क, जांच और मनोवैज्ञानिक प्रभाव
तारीखवार घटनाक्रम यह बताता है कि किस दिन कौन मारा गया, लेकिन केस स्टडी यह समझने में सहायता करती है कि किसी व्यक्ति अथवा समुदाय को क्यों चुना गया, हमला कैसे कराया गया, स्थानीय स्तर पर कौन-सी सूचना आवश्यक रही और एक छोटी घटना से आतंकियों ने कितना बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रभाव उत्पन्न किया।
निम्न घटनाएं टारगेट किलिंग की बदलती रणनीति के प्रमुख मॉडल प्रस्तुत करती हैं।
केस स्टडी–1
टीका लाल टपलू और नीलकंठ गंजू की हत्या
प्रभावशाली व्यक्तियों को मारकर पूरे समुदाय को संदेश
घटनाएं
14 सितंबर 1989: अधिवक्ता और जम्मू-कश्मीर भाजपा अध्यक्ष टीका लाल टपलू की श्रीनगर में घर के पास हत्या।
4 नवंबर 1989: सेवानिवृत्त न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की हरि सिंह स्ट्रीट बाजार में हत्या।
नीलकंठ गंजू ने 1968 में जेकेएलएफ के संस्थापक मकबूल बट को एक पुलिस अधिकारी की हत्या के मामले में मृत्युदंड सुनाया था। इस कारण उनका नाम और दैनिक गतिविधियां पहले से आतंकियों की जानकारी में थीं।
लक्ष्य क्यों बनाए गए?
दोनों सामान्य नागरिक होते हुए भी सार्वजनिक जीवन के प्रभावशाली चेहरे थे। टपलू राजनीतिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता थे, जबकि गंजू न्यायिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। उनकी हत्याओं से आतंकियों को तीन लाभ दिखाई देते थे:
- कश्मीरी पंडित समुदाय में भय फैलाना
- भारतीय संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े लोगों को चेतावनी देना
यह प्रदर्शित करना कि सार्वजनिक स्थान पर भी सुरक्षा संभव नहीं है।
स्थानीय सूचना की भूमिका
किसी व्यक्ति के घर, आवागमन के समय और नियमित मार्ग की जानकारी के बिना ऐसी हत्या कठिन होती है। ये घटनाएं बताती हैं कि शुरुआती आतंकवादी मॉड्यूल के पास स्थानीय स्तर पर निगरानी और लक्ष्य की पहचान करने वाले लोग मौजूद थे।
रणनीतिक प्रभाव
इन हत्याओं में मृतकों की संख्या दो थी, लेकिन मनोवैज्ञानिक प्रभाव पूरे समुदाय पर पड़ा। आतंक का संदेश यह था कि पहले प्रभावशाली लोगों को मारेंगे, फिर सामान्य नागरिकों की बारी आएगी। इसके बाद अधिवक्ताओं, शिक्षकों, सरकारी कर्मचारियों और बुद्धिजीवियों पर हमले बढ़े।
जम्मू-कश्मीर की SIA ने नीलकंठ गंजू का मामला तीन दशक से अधिक समय बाद दोबारा खोला। गृह मंत्रालय से संबंधित एक UAPA न्यायाधिकरण ने भी शुरुआती वर्षों की हिंसा को कश्मीरी पंडितों में आतंक पैदा करने और उन्हें घाटी छोड़ने पर मजबूर करने वाली कार्रवाई माना है। गृह मंत्रालय के अभिलेख
मुख्य निष्कर्ष
यह “प्रतीकात्मक व्यक्ति की हत्या द्वारा सामुदायिक भय” का प्रारंभिक मॉडल था।
केस स्टडी–2
सरला भट और सर्वानंद कौल प्रेमी
अपहरण, यातना और सार्वजनिक आतंक का मॉडल
15 अप्रैल 1990: SKIMS में कार्यरत नर्स सरला भट का छात्रावास से अपहरण।
19 अप्रैल 1990: उनका शव श्रीनगर में मिला।
29 अप्रैल 1990: कवि और स्वतंत्रता सेनानी सर्वानंद कौल प्रेमी तथा उनके बेटे वीरेंद्र को घर से अगवा किया गया।
1 मई 1990: दोनों के शव बरामद हुए।
सरला भट सरकारी अस्पताल में काम करने वाली युवा पंडित महिला थीं। उन पर मुखबिरी का आरोप लगाकर हत्या की गई, लेकिन पुलिस ने बाद में आरोप को निराधार बताया। प्रेमी एक ऐसे सामाजिक और साहित्यिक व्यक्तित्व थे जो कश्मीरी भाषा तथा हिंदू-मुस्लिम सद्भाव के समर्थक थे।
- दोनों मामलों में संदेश अलग-अलग स्तरों पर था
- सरकारी संस्थान में काम करने वाला पंडित सुरक्षित नहीं है
- महिला होने से सुरक्षा नहीं मिलेगी
- शांति और साझा संस्कृति की बात करने वाला प्रभावशाली व्यक्ति भी निशाने पर होगा
आतंकियों द्वारा लगाया गया “मुखबिर” का आरोप स्वयं में मौत की सजा बन सकता है।
हत्या की पद्धति
सीधे गोली मारने के बजाय अपहरण, बंधक बनाना और शव को सार्वजनिक स्थान पर छोड़ना अधिक व्यापक भय पैदा करता है। आतंकियों ने यहां हत्या के साथ “प्रचार” और “दंड का प्रदर्शन” जोड़ा।
जांच की स्थिति
सरला भट की हत्या का मामला दशकों तक निर्णायक जांच से वंचित रहा। 2025 में SIA ने इसे फिर खोला और जून 2026 में आरोपियों के संबंध में कार्रवाई आगे बढ़ाई। इससे शुरुआती वर्षों की एक गंभीर संस्थागत कमी सामने आती है—अराजकता, गवाहों का पलायन और अभिलेखों की अनुपलब्धता के कारण अनेक मामले न्यायिक निष्कर्ष तक नहीं पहुंचे।
यह “आतंक का सार्वजनिक प्रदर्शन” था, जिसमें व्यक्ति की हत्या से अधिक महत्वपूर्ण पूरे समुदाय को दिखाई गई क्रूरता थी।
केस स्टडी–3
वंधामा नरसंहार, 25 जनवरी 1998
घाटी में बचे पंडित परिवारों को समाप्त करने का प्रयास
घटना
गांदरबल के वंधामा गांव में आतंकियों ने 23 कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी। मृतकों में महिलाएं और बच्चे भी थे। हमलावर कथित रूप से सैन्य वर्दी में आए और सुरक्षा जांच अथवा बातचीत का भ्रम पैदा किया।
अमेरिकी विदेश विभाग के तत्कालीन वक्तव्य में 23 कश्मीरी पंडितों की उनके घरों में हत्या दर्ज की गई थी। समकालीन अमेरिकी वक्तव्य
यह घटना महत्वपूर्ण क्यों है?
1990 के पलायन के बाद भी कुछ पंडित परिवार अपनी जमीन, खेती, घर और स्थानीय संबंधों के कारण घाटी में रुके रहे। वंधामा में लक्ष्य ऐसे ही परिवार थे। इससे दो संदेश दिए गए:
- पलायन नहीं करने वाले पंडित सुरक्षित नहीं रहेंगे
विस्थापित परिवारों की संभावित वापसी भी जोखिमपूर्ण होगी।
हमले का स्वरूप
व्यक्तियों को अचानक रास्ते में मारने के बजाय पूरे परिवारों को चुना गया। इससे टारगेट किलिंग “व्यक्तिगत हत्या” से “चयनित सामुदायिक नरसंहार” में बदल गई।
सुरक्षा संबंधी प्रश्न
यदि हमलावर सैन्य वर्दी में आए थे, तो वर्दी का उद्देश्य पीड़ितों को घरों से बाहर निकालना और प्रतिरोध रोकना था। यह पद्धति बाद में छत्तीसिंहपोरा और नादिमार्ग जैसे हमलों में भी दिखाई दी।
मनोवैज्ञानिक परिणाम
वंधामा ने घाटी में रह रहे छोटे अल्पसंख्यक समूहों में यह धारणा मजबूत की कि किसी गांव में संख्या कम होना स्वयं एक सुरक्षा जोखिम है। सामुदायिक जीवन बिखरने से निगरानी, सूचना और सामूहिक आत्मरक्षा की क्षमता भी कम हो गई।
वंधामा “अवशिष्ट अल्पसंख्यक आबादी को भयभीत करके हटाने” का स्पष्ट उदाहरण था।
केस स्टडी–4
छत्तीसिंहपोरा, 20 मार्च 2000
अंतरराष्ट्रीय यात्रा से पहले सिख समुदाय का चयन
अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा से ठीक पहले अनंतनाग के छत्तीसिंहपोरा में 35 अथवा 36 सिखों को गुरुद्वारों के पास पंक्तिबद्ध कर गोली मार दी गई।
लक्ष्य और समय का महत्व
सिख समुदाय उस समय तक कश्मीर की आतंकी हिंसा में अपेक्षाकृत कम निशाना बना था। हमले का समय अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की यात्रा से ठीक पहले हुआ बड़ा नरसंहार विश्व मीडिया का ध्यान आकर्षित करता है और यह संदेश देता है कि स्थिति सामान्य नियंत्रण में नहीं है।
जिम्मेदारी का विवाद
भारत सरकार ने पाकिस्तान-आधारित लश्कर-ए-तैयबा अथवा अन्य आतंकियों को जिम्मेदार बताया। बाद में डेविड हेडली ने भी लश्कर की भूमिका का दावा किया। परंतु हमलावरों की न्यायिक पहचान और बाद की पथरीबल घटना के कारण मामले पर विवाद कायम रहा।
- इसलिए शोध में तीन बातें अलग लिखी जानी चाहिए
- नरसंहार और पीड़ितों की पहचान—स्थापित तथ्य
- भारत सरकार का आतंकी संगठनों पर आरोप—आधिकारिक दावा
अंतिम न्यायिक उत्तरदायित्व—अब भी विवादित अथवा अधूरा।
हमले की पद्धति
हमलावरों ने कथित सैन्य वर्दी का प्रयोग किया, पुरुषों को घरों से बुलाया और सामूहिक रूप से गोली मारी। यह पद्धति नकली अधिकार और धोखे पर आधारित थी।
- सिख समुदाय में पहली बार व्यापक पलायन का भय पैदा हुआ
- कश्मीर की बहुधार्मिक पहचान पर प्रहार हुआ
- घटना अंतरराष्ट्रीय समाचार बनी
सुरक्षा एजेंसियों पर तत्काल परिणाम दिखाने का दबाव बढ़ा।
छत्तीसिंहपोरा बताता है कि टारगेट किलिंग का समय कभी-कभी पीड़ित की पहचान जितना ही महत्वपूर्ण होता है। यह “अंतरराष्ट्रीय प्रचार हेतु समयबद्ध सामुदायिक हमला” था।
केस स्टडी–5
नादिमार्ग नरसंहार, 23 मार्च 2003
सुरक्षा घेरे के बावजूद अल्पसंख्यक गांव पर हमला
पुलवामा के नादिमार्ग गांव में सैन्य वर्दी पहने आतंकियों ने पंडित परिवारों को घरों से बाहर निकाला और पंक्ति में खड़ा कर गोली मार दी। 24 लोग मारे गए, जिनमें 11 महिलाएं और दो बच्चे शामिल थे।
विशेष महत्व
नादिमार्ग के परिवार 1990 के पलायन के बाद भी घाटी में रह रहे थे। गांव में सुरक्षा व्यवस्था होने के बावजूद हमला हुआ। इस कारण घटना केवल आतंकी क्रूरता नहीं, बल्कि सुरक्षा और खुफिया तंत्र की विफलता की केस स्टडी भी बनी।
हमलावरों को किन सूचनाओं की आवश्यकता रही होगी?
- ऐसे हमले के लिए निम्न स्थानीय जानकारी आवश्यक थी
- पंडित परिवार किन घरों में रहते हैं
- सुरक्षा चौकी और संतरी की स्थिति
- रात में प्रवेश और निकास का मार्ग
- परिवारों को एक स्थान पर कैसे बुलाया जा सकता है
सुरक्षाबल कितनी देर में पहुंच सकते हैं।
यह स्थानीय रेकी, सूचना देने वाले सहयोगियों अथवा पहले से क्षेत्र की जानकारी रखने वाले आतंकियों की संभावना को मजबूत करता है। किसी व्यक्ति पर कानूनी दोष सिद्ध हुए बिना पूरे गांव पर आरोप नहीं लगाया जा सकता; परंतु स्थानीय स्तर की सूचना के बिना ऐसा सटीक हमला कठिन था।
प्रभाव
घटना के बाद नादिमार्ग में बचे पंडित परिवारों का पलायन तेज हुआ। इससे कश्मीरी पंडितों की वापसी और पुनर्वास संबंधी सरकारी दावों को गहरा झटका लगा।
न्यायिक पक्ष
मामला वर्षों तक अभियोजन और गवाहों की उपलब्धता से जूझता रहा। कई संदिग्ध मुठभेड़ों में मारे गए अथवा पकड़ से बाहर रहे। इससे टारगेट किलिंग के पुराने मामलों की सामान्य कठिनाई सामने आती है—पलायन कर चुके गवाह, भयभीत स्थानीय लोग और लंबे समय बाद कमजोर हो चुके साक्ष्य।
नादिमार्ग “पहचान-आधारित हत्या, स्थानीय रेकी और सुरक्षा विफलता”—इन तीनों का संयुक्त उदाहरण था।
केस स्टडी–6
लेफ्टिनेंट उमर फैयाज, मई 2017
स्थानीय मुस्लिम युवाओं को भारतीय संस्थाओं से दूर रखने की रणनीति
छुट्टी पर आए 22 वर्षीय लेफ्टिनेंट उमर फैयाज शोपियां में एक पारिवारिक विवाह समारोह में गए थे। 9 मई की रात उन्हें अगवा किया गया और 10 मई को उनका गोलियों से छलनी शव मिला।
उमर फैयाज को क्यों चुना गया?
वे कश्मीरी मुस्लिम परिवार से आने वाले युवा सैन्य अधिकारी थे। ऐसे व्यक्ति की सार्वजनिक छवि आतंकी संगठनों के उस प्रचार को चुनौती देती थी कि स्थानीय समाज भारतीय सुरक्षा संस्थाओं से पूर्णतः अलग है।
- उनकी हत्या के संभावित रणनीतिक उद्देश्य थे
- स्थानीय युवाओं को सेना और पुलिस में भर्ती होने से डराना
- सैन्यकर्मियों को बताना कि छुट्टी के दौरान भी वे सुरक्षित नहीं हैं
- परिवारों पर दबाव डालना कि वे बच्चों को सरकारी सुरक्षा सेवाओं में न भेजें
आतंकियों के समानांतर सामाजिक नियंत्रण को बनाए रखना।
स्थानीय सहायता का प्रश्न
हमलावरों को विवाह समारोह, अधिकारी की मौजूदगी और उनके निहत्थे होने की जानकारी थी। यह सूचना अचानक उपलब्ध होने के बजाय किसी स्थानीय निगरानी अथवा मानवीय स्रोत से मिलने की संभावना दर्शाती है।
व्यापक प्रभाव
उमर फैयाज की हत्या ने स्थानीय मुसलमानों और सुरक्षा संस्थाओं के बीच संबंध को टारगेट किलिंग के अध्ययन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया। यह धारणा गलत सिद्ध होती है कि केवल धार्मिक अल्पसंख्यक ही निशाना बने। आतंकियों ने उन कश्मीरी मुसलमानों को भी मारा जो पुलिस, सेना, मुख्यधारा की राजनीति या प्रशासन से जुड़े थे।
यह “रोल मॉडल को समाप्त करके स्थानीय भर्ती रोकने” की रणनीति थी।
केस स्टडी–7
अक्टूबर 2021 की हत्याएं
हाइब्रिड आतंकी, छोटी पिस्तौल और कई प्रकार के लक्ष्य
घटनाक्रम
2 अक्टूबर: माजिद अहमद गोजरी और मोहम्मद शफी डार की हत्या।
5 अक्टूबर: माखन लाल बिंदरू, वीरेंद्र पासवान और मोहम्मद शफी लोन की अलग-अलग हत्या।
7 अक्टूबर: प्रधानाचार्या सुपिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद की विद्यालय में हत्या।
16 अक्टूबर: अरविंद कुमार शाह और सगीर अहमद की हत्या।
17 अक्टूबर: बिहार निवासी राजा ऋषिदेव और जोगिंदर ऋषिदेव की कुलगाम में हत्या।
लगभग दो सप्ताह में 11 नागरिक मारे गए। पीड़ितों में कश्मीरी पंडित, सिख, स्थानीय मुस्लिम और दूसरे राज्यों से आए हिंदू-मुस्लिम श्रमिक शामिल थे। अक्टूबर 2021 की घटनाओं का विवरण
नया ऑपरेशनल मॉडल
इन हमलों में कई हमलावर पारंपरिक रूप से जंगलों में रहने वाले पूर्णकालिक आतंकी नहीं थे। सुरक्षा एजेंसियों ने ऐसे व्यक्तियों के लिए “हाइब्रिड आतंकी” शब्द प्रयोग किया—ऐसा व्यक्ति जो सामान्य नागरिक की तरह रहता है, सीमित अवधि के लिए हथियार प्राप्त करता है, हमला करता है और फिर सामान्य जीवन में लौट जाता है।
पिस्तौल क्यों?
- आसानी से छिपाई जा सकती है
- एक व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल संभव
- भीड़भाड़ वाले शहर में राइफल की तुलना में कम संदेह
- हमला कर मोटरसाइकिल या पैदल भागना आसान
हथियार दूसरे व्यक्ति को वापस देकर पहचान छिपाई जा सकती है।
लक्ष्य अलग-अलग क्यों थे?
- एक ही अवधि में अलग श्रेणियों के लोगों को मारने का उद्देश्य व्यापक भय था
जांच का निष्कर्ष
राज्यसभा में गृह मंत्रालय ने बाद में बताया कि TRF सुरक्षा बलों और नागरिकों की हत्याओं की योजना बनाने तथा हथियारों के परिवहन में शामिल था। PAFF द्वारा राजनीतिक नेताओं और दूसरे राज्यों से आए नागरिकों को धमकियां देने का भी उल्लेख किया गया। गृह मंत्रालय का संसदीय उत्तर
अक्टूबर 2021 “कम लागत, कम प्रशिक्षण और अधिकतम मनोवैज्ञानिक प्रभाव” वाले हाइब्रिड आतंकी मॉडल की सबसे स्पष्ट केस स्टडी है।
केस स्टडी–8
राहुल भट की हत्या, 12 मई 2022
पुनर्वास नीति और सरकारी कार्यस्थल को निशाना
प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के अंतर्गत नियुक्त कश्मीरी पंडित कर्मचारी राहुल भट बडगाम के चाडूरा तहसील कार्यालय में कार्यरत थे। हमलावर कार्यालय के अंदर पहुंचे, पहचान सुनिश्चित की और उन्हें गोली मार दी।
यह सामान्य नागरिक हत्या से अलग क्यों थी?
- राहुल भट की हत्या में चार स्तरों का प्रतीकात्मक महत्व था
- वे कश्मीरी पंडित थे
- पुनर्वास पैकेज के कर्मचारी थे
- सरकारी कार्यालय में काम करते थे
हमलावरों ने कार्यस्थल के अंदर उनकी पहचान की।
इसका संदेश केवल राहुल भट के परिवार तक सीमित नहीं था। घाटी में कार्यरत हजारों पंडित कर्मचारियों ने इसे अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा पर हमला माना।
स्थानीय रेकी
- हमलावरों को यह जानकारी थी कि राहुल भट
- किस कार्यालय में बैठते हैं
- कार्यालय में प्रवेश कैसे किया जा सकता है
- उनकी पहचान क्या है
- सुरक्षा व्यवस्था कहां कमजोर है
हमला कर किस मार्ग से निकला जा सकता है।
यह जानकारी किसी पूर्व रेकी, कर्मचारी सूची, स्थानीय संपर्क या डिजिटल स्रोत से मिल सकती थी। अंतिम उत्तर जांच और साक्ष्यों पर निर्भर है, लेकिन हमला आकस्मिक चयन नहीं था।
परिणाम
हत्या के बाद पंडित कर्मचारियों ने बड़े प्रदर्शन किए और घाटी से बाहर स्थानांतरण की मांग की। इसके बाद रजनी बाला, विजय कुमार और अन्य कर्मचारियों की हत्याओं ने भय को और मजबूत किया।
नीति पर प्रभाव
सरकार को कर्मचारियों को सुरक्षित स्थानों पर तैनात करने, आवासीय कॉलोनियों की सुरक्षा बढ़ाने और संवेदनशील क्षेत्रों में पोस्टिंग की समीक्षा करनी पड़ी। इस प्रकार एक हत्या ने पूरी पुनर्वास नीति की व्यावहारिकता पर प्रश्न खड़ा कर दिया।
राहुल भट मामला “एक कर्मचारी की हत्या द्वारा सरकारी पुनर्वास कार्यक्रम को बाधित करने” का उदाहरण था।
केस स्टडी–9
संजय शर्मा की हत्या, 26 फरवरी 2023
घाटी न छोड़ने वाले पंडित और सीमा पार से निर्देशित साजिश
पुलवामा के अचन गांव में रहने वाले कश्मीरी पंडित संजय शर्मा को घर से लगभग सौ मीटर दूर गोली मार दी गई। वे पत्नी के साथ स्थानीय बाजार जा रहे थे। गांव में अल्पसंख्यक समुदाय के लिए सशस्त्र सुरक्षा व्यवस्था भी मौजूद थी।
लक्ष्य का चयन
संजय शर्मा उन पंडितों में थे जिन्होंने 1990 के दशक में भी गांव नहीं छोड़ा था। वे हाई-प्रोफाइल राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे। उनकी हत्या से यह संदेश देने का प्रयास हुआ कि:
- सुरक्षा चौकी होने के बावजूद अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं
- सामान्य जीवन जीने वाला व्यक्ति भी चुना जा सकता है
- घाटी में रुके परिवार गांव छोड़ दें
सांप्रदायिक सद्भाव और स्थानीय सह-अस्तित्व को तोड़ा जा सकता है।
जांच में क्या सामने आया?
जनवरी 2024 में SIA ने 12 आरोपियों के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया। एजेंसी के अनुसार जांच में “सीमा पार से उत्पन्न साजिश” का पता चला और उद्देश्य अल्पसंख्यक नागरिक की हत्या के माध्यम से सांप्रदायिक सद्भाव तथा शांति को बाधित करना था। SIA आरोपपत्र संबंधी विवरण
स्थानीय समाज की प्रतिक्रिया
संजय शर्मा के मुस्लिम पड़ोसियों ने अंतिम संस्कार में सहायता की। यह तथ्य आतंकी उद्देश्य और स्थानीय प्रतिक्रिया के बीच अंतर दिखाता है—हत्या का उद्देश्य सांप्रदायिक विभाजन था, लेकिन स्थानीय नागरिकों ने सार्वजनिक रूप से परिवार का साथ दिया।
यह केस “सीमा पार निर्देश, स्थानीय मॉड्यूल और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण” के संयुक्त अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।
केस स्टडी–10
गगनगीर हमला, 20 अक्टूबर 2024
विकास परियोजना और श्रमिकों को निशाना बनाना
गांदरबल के गगनगीर में श्रीनगर-लेह मार्ग से जुड़ी सुरंग परियोजना के कर्मचारियों पर आतंकियों ने हमला किया। स्थानीय डॉक्टर शाहनवाज अहमद डार और छह कर्मचारियों सहित सात लोग मारे गए। कम से कम पांच लोग घायल हुए।
लक्ष्य क्यों चुना गया?
- यहां हमलावर किसी एक धर्म के व्यक्ति की खोज में नहीं आए थे। लक्ष्य पूरी परियोजना और उससे जुड़ा कार्यबल था। इसके संभावित उद्देश्य थे
- सामरिक महत्व की सुरंग परियोजना में विलंब
- गैर-स्थानीय इंजीनियरों और श्रमिकों को डराना
- निर्माण कंपनियों की लागत और सुरक्षा जोखिम बढ़ाना
- विकास और सामान्य स्थिति के सरकारी दावे को चुनौती देना
पर्यटन एवं लद्दाख संपर्क पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालना।
हमलावरों ने उस समय हमला किया जब कर्मचारी काम समाप्त करके शिविर लौटे थे। इससे संकेत मिलता है कि उनकी दिनचर्या, भोजन का समय, निवास और सुरक्षा व्यवस्था की रेकी की गई थी।
स्थानीय और बाहरी पीड़ित
मृतकों में स्थानीय कश्मीरी डॉक्टर भी थे और दूसरे राज्यों से आए श्रमिक भी। इससे स्पष्ट है कि लक्ष्य धार्मिक पहचान से अधिक परियोजना में भागीदारी थी।
संगठनात्मक संबंध
TRF ने कथित रूप से जिम्मेदारी ली। जुलाई 2025 में गृह मंत्री ने संसद में कहा कि गगनगीर और पहलगाम हमलों में शामिल लश्कर से जुड़े आतंकियों को ऑपरेशन महादेव में मारा गया। यह सरकार का आधिकारिक निष्कर्ष है। गगनगीर घटना पर रॉयटर्स रिपोर्ट
गगनगीर “आर्थिक और रणनीतिक बुनियादी ढांचे पर मानव लक्ष्य के माध्यम से हमला” था।
केस स्टडी–11
पहलगाम-बैसरन नरसंहार, 22 अप्रैल 2025
धार्मिक पहचान, स्थानीय आश्रय और सीमा पार कमान
बैसरन घाटी में घूम रहे पर्यटकों पर आतंकियों ने नजदीक से गोलीबारी की। 25 पर्यटकों और एक स्थानीय नागरिक सहित 26 लोग मारे गए। भारत सरकार ने कहा कि पीड़ितों की धार्मिक पहचान जांचने के बाद उन्हें निशाना बनाया गया।
लक्ष्य का चुनाव
- पहलगाम को चुनने के पीछे कई संभावित कारण थे
- बड़ी संख्या में देशभर से आए पर्यटक
- दुर्गम और सड़क से सीधे न जुड़ा मैदान
- सीमित स्थायी सुरक्षा
- आसपास घना जंगल और भागने के मार्ग
- पर्यटन को सामान्य स्थिति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाना
हत्या के बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रचार की संभावना।
जून 2025 में NIA ने परवेज अहमद और बशीर अहमद जोथर नामक दो व्यक्तियों को आतंकियों को आश्रय देने के आरोप में गिरफ्तार किया। NIA के अनुसार पूछताछ में तीन सशस्त्र हमलावरों की पहचान संबंधी जानकारी मिली। एजेंसी ने उस समय मीडिया की अटकलों से सावधान करते हुए कहा था कि पहचान पर अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही दिया जाएगा। NIA का 23 जून 2025 का स्पष्टीकरण
दिसंबर 2025 में NIA ने लश्कर-ए-तैयबा/TRF और अन्य आरोपियों के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया। 6 जुलाई 2026 को दाखिल पूरक आरोपपत्र में NIA ने पाकिस्तान स्थित लश्कर प्रमुख हाफिज सईद को भी नामजद किया। ये जांच एजेंसी के आरोप हैं; अंतिम दोषसिद्धि न्यायालय में साक्ष्यों के परीक्षण के बाद होगी। NIA का जुलाई 2026 पूरक आरोपपत्र
रणनीतिक उद्देश्य
- पहलगाम हमला अनेक लक्ष्यों को एक साथ साधता था
- धार्मिक ध्रुवीकरण
- कश्मीर के पर्यटन उद्योग को नुकसान
- देशभर में भय और आक्रोश
- भारत-पाकिस्तान तनाव बढ़ाना
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर को पुनः हिंसक संकट के रूप में प्रस्तुत करना
सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी प्रदर्शित करना।
स्थानीय प्रतिक्रिया
आतंकियों का उद्देश्य स्थानीय मुसलमानों और पर्यटकों के बीच अविश्वास पैदा करना था। इसके विपरीत, स्थानीय नागरिकों, पोनी संचालकों और होटल कारोबारियों ने बचाव में भाग लिया। मृतकों में स्थानीय पोनी संचालक सैयद आदिल हुसैन शाह भी शामिल थे।
इस प्रतिक्रिया को दर्ज करना आवश्यक है, क्योंकि यह किसी आतंकी मॉड्यूल अथवा आश्रय देने के आरोपी व्यक्तियों और पूरे स्थानीय समाज के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करती है।
पहलगाम घटना “धार्मिक पहचान पर आधारित लक्षित नरसंहार, पर्यटन पर आर्थिक हमला और सीमा पार संचालित नेटवर्क”—तीनों का संयुक्त उदाहरण है।
केस स्टडी से उभरते समान पैटर्न
समग्र निष्कर्ष
इन केस स्टडी से स्पष्ट होता है कि जम्मू-कश्मीर में टारगेट किलिंग आकस्मिक हिंसा नहीं रही। लक्ष्य का धर्म, पेशा, राजनीतिक संबंध, सरकारी भूमिका, सामाजिक प्रभाव, निवास और दैनिक दिनचर्या—सभी का अध्ययन करके हमला किया गया।
अलग-अलग समय में रणनीति बदलती रही:
- 1989–90 में प्रभावशाली पंडितों और सरकारी कर्मचारियों की हत्या
- 1997–2006 में गांव और परिवार चुनकर सामूहिक नरसंहार
- 2017 के बाद स्थानीय पुलिसकर्मियों, सैनिकों और निर्वाचित प्रतिनिधियों पर जोर
- 2021 के बाद हाइब्रिड आतंकियों द्वारा पिस्तौल से आसान नागरिक लक्ष्यों की हत्या
- 2024–25 में निर्माण परियोजनाओं और पर्यटन को निशाना बनाना
मूल उद्देश्य फिर भी एक ही रहा—कम संख्या में लोगों की हत्या करके लाखों लोगों के व्यवहार, आवागमन, रोजगार, मतदान, पुनर्वास और सामुदायिक संबंधों को प्रभावित करना। यही टारगेट किलिंग को सामान्य आतंकवादी हिंसा से अलग बनाता है।