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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–004 · समेकित विशेष अध्ययन 03 · अंतिम अध्याय

2017–2026 का समकालीन राष्ट्रीय किसान उभार

मंदसौर से शंभू–खनौरी तक : मूल्य, कर्ज, बाजार, कृषि कानून और न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी का नया किसान संघर्ष

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंपादित समेकित शोध संस्करण · 1 सितंबर 2026

2017 से 2026 के किसान उभार को अलग-अलग प्रदर्शनों की सूची मानना उसके ऐतिहासिक अर्थ को सीमित कर देता है। मंदसौर की गोलीबारी, नासिक–मुंबई पदयात्रा, दिल्ली की ओर मार्च, तीन कृषि कानून, सिंघु–टिकरी–गाजीपुर के मोर्चे, कानून वापसी और शंभू–खनौरी का संघर्ष एक साझा परिवर्तन दर्ज करते हैं—किसान की मांग कर्ज-राहत और फसल मूल्य से आगे बढ़कर बाजार की संरचना, कानूनी सुरक्षा और कृषि नीति बनाने में भागीदारी तक पहुँची। यह समेकित अध्याय उसी दस वर्षीय यात्रा को सरकार, किसान संगठनों, संसद, न्यायपालिका, समाज और कृषि अर्थशास्त्र के परस्पर जुड़े संदर्भ में प्रस्तुत करता है।

खंड 1 · मूल इकाइयाँ 1–4

कृषि संकट, मंदसौर और राष्ट्रीय उभार की शुरुआत

प्रस्तावना : 2017 क्यों एक नया मोड़ है?

स्वतंत्र भारत के किसान आंदोलनों के इतिहास में 2017 को एक महत्वपूर्ण विभाजक रेखा की तरह देखा जा सकता है। इससे पहले भी किसान मूल्य, बिजली, सिंचाई, ऋण और भूमि के प्रश्नों पर संघर्ष करते रहे थे। शरद जोशी का शेतकरी संगठन, महेंद्र सिंह टिकैत की भारतीय किसान यूनियन, कर्नाटक राज्य रैयत संघ और विभिन्न वाम किसान संगठनों ने कृषि मूल्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय राजनीति का प्रश्न बनाया था। लेकिन 2017 के बाद जिस तरह अलग-अलग राज्यों का कृषि असंतोष एक साझा राष्ट्रीय विमर्श में बदलने लगा, उसने किसान राजनीति की प्रकृति बदल दी।

इस नए चरण के केंद्र में पांच परस्पर जुड़े प्रश्न थे—कृषि उपज का लाभकारी मूल्य, बढ़ती उत्पादन लागत, किसान ऋण, बाजार में किसान की सौदेबाजी की शक्ति और कृषि नीति बनाने में किसान की भागीदारी।

मंदसौर की गोलीबारी, महाराष्ट्र का किसान लॉन्ग मार्च, दिल्ली के किसान मार्च, अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति जैसे मंचों का उभार, 2020 के तीन कृषि कानून, संयुक्त किसान मोर्चे का निर्माण, दिल्ली की सीमाओं पर वर्ष भर चला आंदोलन, कानूनों की वापसी और उसके बाद एमएसपी की कानूनी गारंटी के लिए शंभू–खनौरी संघर्ष—ये अलग-अलग घटनाएं नहीं थीं। वे भारतीय कृषि में लंबे समय से जमा हो रहे आर्थिक और राजनीतिक तनाव की क्रमिक अभिव्यक्तियां थीं।

पृष्ठभूमि : कृषि संकट का बदलता चरित्र

हरित क्रांति के बाद भारतीय कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, लेकिन उत्पादन वृद्धि का अर्थ हमेशा किसान आय में समान वृद्धि नहीं था। छोटे और सीमांत किसानों के सामने भूमि का लगातार छोटा होता आकार, उर्वरक, डीजल, बिजली, बीज, कीटनाशक और मशीनरी की लागत, सिंचाई की असमान उपलब्धता, प्राकृतिक आपदाएं और बाजार मूल्य की अनिश्चितता जैसी समस्याएं बनी रहीं।

किसान की समस्या धीरे-धीरे केवल “उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए?” की नहीं रही। नया प्रश्न था

“उत्पादन का उचित मूल्य कौन सुनिश्चित करेगा?”

यहीं से एमएसपी की बहस केंद्रीय होती गई।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य और किसान संगठनों द्वारा मांगे जा रहे स्वामीनाथन आयोग से जुड़े सी2+50 प्रतिशत मूल्य-सूत्र के बीच विवाद ने किसान आंदोलन को एक साझा आर्थिक भाषा दी।

लेकिन सभी किसान संगठनों की दृष्टि समान नहीं थी। कुछ बाजार को अधिक स्वतंत्र बनाने के समर्थक रहे, कुछ मजबूत सरकारी खरीद चाहते थे, कुछ सार्वभौमिक एमएसपी गारंटी की मांग करते रहे और कुछ कृषि संकट का समाधान भूमि सुधार, सार्वजनिक निवेश तथा ग्रामीण रोजगार में देखते थे।

इसीलिए 2017–2026 का किसान उभार वैचारिक रूप से एकरूप आंदोलन नहीं था।

मंदसौर 2017 : कृषि असंतोष का विस्फोट

मध्य प्रदेश का मंदसौर आंदोलन इस नए दौर का निर्णायक आरंभ-बिंदु बना।

जून 2017 में किसान बेहतर कृषि मूल्य और अन्य मांगों को लेकर आंदोलनरत थे। 6 जून को पुलिस गोलीबारी में किसानों की मृत्यु ने आंदोलन को स्थानीय आर्थिक विवाद से राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दे में बदल दिया।

पहला, अपेक्षाकृत अधिक कृषि उत्पादन वाले क्षेत्रों में भी किसान असंतोष गंभीर हो सकता है।

दूसरा, कृषि संकट अब केवल सूखा या अकाल का प्रश्न नहीं था; अच्छी फसल के बाद गिरता बाजार मूल्य भी संकट पैदा कर सकता था।

तीसरा, किसान प्रश्न में राजनीतिक विस्फोट की क्षमता अभी समाप्त नहीं हुई थी।

मंदसौर के बाद किसान मूल्य, ऋणमाफी और कृषि संकट राष्ट्रीय विपक्ष की राजनीति में भी अधिक प्रमुखता से आने लगे।

ऋणमाफी और लाभकारी मूल्य : 2017–18 का विस्तार

मंदसौर के समानांतर महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और दूसरे राज्यों में किसान प्रदर्शन हुए।

महाराष्ट्र में किसान संगठनों ने ऋणमाफी को बड़ा प्रश्न बनाया। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में कृषि ऋणमाफी चुनावी राजनीति का हिस्सा बनी।

क्या ऋणमाफी कृषि संकट का समाधान है, या केवल संकट के बाद दी जाने वाली अस्थायी राहत?

किसान संगठनों का एक बड़ा हिस्सा कहने लगा कि यदि किसान को उसकी फसल का लाभकारी मूल्य मिलता रहे तो बार-बार ऋणमाफी की आवश्यकता ही कम हो जाएगी।

इस प्रकार आंदोलन की भाषा धीरे-धीरे “कर्ज माफ करो” से “आय और मूल्य सुनिश्चित करो” की ओर बढ़ने लगी।

खंड 2 · मूल इकाइयाँ 5–8

लॉन्ग मार्च से कृषि अध्यादेशों तक

महाराष्ट्र किसान लॉन्ग मार्च, 2018

मार्च 2018 में अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में नासिक से मुंबई तक किसानों का विशाल पैदल मार्च समकालीन किसान राजनीति की सबसे प्रभावशाली घटनाओं में से एक बना।

वनाधिकार, ऋणमाफी, फसल मूल्य, आदिवासी किसानों के भूमि अधिकार और कृषि संकट इसके प्रमुख मुद्दे थे।

मार्च की एक विशेषता उसका अनुशासन था। मुंबई पहुंचते समय प्रदर्शनकारियों द्वारा विद्यार्थियों की परीक्षाओं को ध्यान में रखते हुए आवाजाही की रणनीति बदलना आंदोलन की सार्वजनिक छवि के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।

यह आंदोलन इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि उसने दिखाया कि किसान राजनीति केवल पंजाब, हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है।

दिल्ली की ओर किसान : राष्ट्रीय मंच बनने की प्रक्रिया

2017–19 के बीच किसान संगठनों के बीच समन्वय बढ़ने लगा। अलग-अलग विचारधाराओं वाले संगठन न्यूनतम साझा मांगों पर साथ आने लगे।

दिल्ली किसान आंदोलनों का प्रतीकात्मक केंद्र बनने लगी।

किसान संसद, संसद मार्च और रामलीला मैदान जैसे आयोजनों के माध्यम से कृषि संकट को सीधे राष्ट्रीय राजनीतिक संस्थाओं के सामने रखा गया।

इस चरण में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ

पुराने किसान आंदोलनों में अक्सर एक संगठन, एक नेता या एक क्षेत्र प्रमुख होता था। नए आंदोलन में “गठबंधन आधारित किसान राजनीति” विकसित होने लगी।

यही संगठनात्मक प्रयोग बाद में संयुक्त किसान मोर्चे की आधारभूमि बना।

2019 का आम चुनाव और किसान प्रश्न

2019 के आम चुनाव से पहले किसान आय राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख विषय बन चुकी थी।

केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी प्रत्यक्ष आय-सहायता योजना शुरू की। विपक्ष ने ऋणमाफी, न्यूनतम आय और कृषि मूल्य के प्रश्न उठाए।

इससे किसान नीति में एक नया वैचारिक विभाजन सामने आया

एक मॉडल किसान को प्रत्यक्ष आय सहायता देने का था।

दूसरा मॉडल लाभकारी मूल्य और सरकारी खरीद पर आधारित था।

तीसरा कृषि बाजार को अधिक प्रतिस्पर्धी और निजी निवेश के लिए खुला बनाने पर जोर देता था।

2020 के कृषि कानून इसी तीसरे सुधारवादी दृष्टिकोण की बड़ी अभिव्यक्ति बने।

कोविड महामारी और कृषि अध्यादेश, 2020

2020 में कोविड-19 महामारी और राष्ट्रीय लॉकडाउन के बीच केंद्र सरकार ने कृषि विपणन से संबंधित तीन अध्यादेश प्रस्तुत किए। बाद में सितंबर 2020 में संसद ने इन्हें कानून का रूप दिया।

कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020;

कृषक (सशक्तीकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन एवं कृषि सेवा पर करार अधिनियम, 2020;

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020।

सरकार का तर्क था कि इससे किसान को मंडी से बाहर बेचने की स्वतंत्रता मिलेगी, निजी निवेश आएगा, आपूर्ति शृंखला सुधरेगी और किसान के लिए अधिक खरीदार उपलब्ध होंगे।

विरोधी किसान संगठनों की आशंका थी कि इससे धीरे-धीरे कृषि उपज मंडी समितियां और सरकारी खरीद कमजोर हो सकती हैं तथा बड़े निजी खरीदारों के सामने छोटे किसानों की सौदेबाजी की शक्ति घट सकती है। सरकार का कहना था कि कानून एमएसपी को समाप्त नहीं करते।

यही विवाद स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े किसान आंदोलनों में से एक का कारण बना।

खंड 3 · मूल इकाइयाँ 9–12

पंजाब से दिल्ली की सीमाओं तक राष्ट्रीय मोर्चा

पंजाब से राष्ट्रीय प्रतिरोध तक

कृषि कानूनों का सबसे तीखा प्रारंभिक विरोध पंजाब में हुआ।

रेल रोको, धरने, टोल प्लाजा विरोध और राजनीतिक प्रदर्शन शुरू हुए। पंजाब से आंदोलन हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित दूसरे क्षेत्रों में फैलने लगा।

नवंबर 2020 में किसानों ने “दिल्ली चलो” का आह्वान किया।

हरियाणा में किसानों को रोकने के प्रयास हुए। बैरिकेड, पानी की बौछार और आंसू गैस के बावजूद बड़ी संख्या में किसान दिल्ली की ओर बढ़े।

अंततः किसानों ने दिल्ली के प्रवेश मार्गों—विशेषकर सिंघु, टिकरी और गाजीपुर—पर स्थायी धरने स्थापित किए।

भारत ने किसान आंदोलन का ऐसा रूप पहले बहुत कम देखा था।

संयुक्त किसान मोर्चा : नेतृत्व का नया मॉडल

आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक उपलब्धियों में से एक संयुक्त किसान मोर्चा—एसकेएम का उभार था।

इसमें विभिन्न किसान यूनियनें और वैचारिक धाराएं शामिल थीं। पंजाब के संगठनों से लेकर भारतीय किसान यूनियन के विभिन्न धड़े और वामपंथी किसान संगठन तक साझा मंच पर आए।

इसके कारण आंदोलन में एक प्रकार का सामूहिक नेतृत्व विकसित हुआ।

शक्ति इसलिए कि किसी एक नेता को हटाकर आंदोलन समाप्त नहीं किया जा सकता था।

सीमा इसलिए कि इतने विविध संगठनों के बीच रणनीतिक सहमति बनाए रखना कठिन था।

दिल्ली की सीमाएं : धरना नहीं, अस्थायी किसान नगर

सिंघु, टिकरी और गाजीपुर केवल प्रदर्शन स्थल नहीं रहे।

वहां सामुदायिक रसोई, चिकित्सा केंद्र, पुस्तकालय, मंच, संचार व्यवस्था और रहने की अस्थायी संरचनाएं विकसित हुईं।

किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में महीनों रहे।

पंजाब और हरियाणा के गांवों से भोजन, दूध, सब्जियां और अन्य सामग्री आती रही।

इस व्यवस्था ने आंदोलन को लंबे समय तक चलने की क्षमता दी।

यह आधुनिक किसान आंदोलन में ग्रामीण समाज की रसद-संगठन क्षमता का असाधारण उदाहरण था।

सरकार–किसान वार्ता

केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत हुई।

सरकार कानूनों में संशोधन के लिए तैयार दिखाई दी; किसान संगठन कानूनों की पूर्ण वापसी चाहते थे।

“कानूनों में समस्या है तो संशोधन बताइए।”

आंदोलनकारी किसान संगठनों का उत्तर था

“समस्या कानूनों की कुछ धाराओं में नहीं, उनके मूल ढांचे में है।”

खंड 4 · मूल इकाइयाँ 13–16

न्यायालय, 26 जनवरी और किसान महापंचायतें

सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप

जनवरी 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने तीन कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाई और एक समिति गठित की।

लेकिन आंदोलनकारी किसान संगठनों ने समिति की संरचना पर आपत्ति जताई और उसके सामने उपस्थित होने से इनकार किया।

इस घटनाक्रम ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न पैदा किया

जब संसद द्वारा बनाया गया कानून व्यापक सामाजिक प्रतिरोध का कारण बने तो समाधान का प्रमुख मंच कौन हो—संसद, कार्यपालिका, न्यायपालिका या प्रत्यक्ष राजनीतिक वार्ता?

26 जनवरी 2021 : आंदोलन का सबसे बड़ा संकट

गणतंत्र दिवस पर किसानों की ट्रैक्टर परेड आंदोलन का अत्यंत विवादास्पद चरण बनी।

दिल्ली में निर्धारित मार्गों से विचलन, पुलिस के साथ टकराव और लाल किले की घटनाओं ने आंदोलन की सार्वजनिक छवि को गंभीर चुनौती दी।

सरकार और आंदोलन के आलोचकों ने इसे कानून-व्यवस्था तथा राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान का प्रश्न बनाया।

किसान नेतृत्व ने हिंसा और निर्धारित कार्यक्रम से विचलन से स्वयं को अलग किया।

कुछ समय के लिए ऐसा लगा कि आंदोलन कमजोर पड़ सकता है।

गाजीपुर और राकेश टिकैत का क्षण

26 जनवरी के बाद गाजीपुर सीमा खाली कराने की संभावना बनी।

इसी दौरान भारतीय किसान यूनियन नेता राकेश टिकैत की भावुक सार्वजनिक अपील ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आंदोलन को पुनर्जीवित कर दिया।

मुजफ्फरनगर और आसपास किसान पंचायतें हुईं।

इससे आंदोलन का सामाजिक भूगोल भी बदला।

पंजाब-केंद्रित समझे जा रहे आंदोलन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भागीदारी अधिक दिखाई देने लगी।

किसान महापंचायतों का दौर

2021 में किसान आंदोलन दिल्ली की सीमाओं से निकलकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और अन्य क्षेत्रों में महापंचायतों के रूप में फैलने लगा।

महापंचायत आंदोलन की पुरानी भारतीय ग्रामीण राजनीतिक संस्था थी, लेकिन इस दौर में उसका आधुनिक राजनीतिक उपयोग हुआ।

इन सभाओं में कृषि कानूनों के साथ एमएसपी, बिजली, गन्ना मूल्य, ऋण और स्थानीय कृषि समस्याएं भी जुड़ती गईं।

खंड 5 · मूल इकाइयाँ 17–20

लखीमपुर खीरी, कानून वापसी और अधूरे वादे

लखीमपुर खीरी, 2021

अक्टूबर 2021 की लखीमपुर खीरी घटना ने आंदोलन को नया राजनीतिक और भावनात्मक आयाम दिया।

किसानों की मौत और उसके बाद गिरफ्तारी तथा जांच से जुड़े विवाद राष्ट्रीय मुद्दा बने।

किसान संगठनों ने इसे आंदोलनकारियों के प्रति सत्ता के व्यवहार से जोड़ा।

इस घटना ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले किसान प्रश्न की राजनीतिक संवेदनशीलता और बढ़ा दी।

19 नवंबर 2021 : प्रधानमंत्री की घोषणा

गुरु पर्व के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीन कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की।

संसद ने बाद में कृषि कानून निरसन अधिनियम, 2021 पारित किया।

एक वर्ष से अधिक समय से चल रहे आंदोलन के सामने केंद्र सरकार का यह बड़ा नीतिगत प्रत्यावर्तन था। 2026 में भी अंतरराष्ट्रीय आकलनों में 2020–21 के किसान आंदोलन को मोदी सरकार को कानून वापस लेने के लिए बाध्य करने वाले प्रमुख भारतीय जन-आंदोलनों में गिना जाता है।

कानून वापसी के बाद भी प्रश्न क्यों बचा रहा?

किसानों की मांग केवल तीन कानूनों की वापसी नहीं थी।

एमएसपी की कानूनी गारंटी, आंदोलनकारियों पर दर्ज मुकदमों की वापसी, आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों के परिवारों से संबंधित प्रश्न, बिजली कानून, पराली और अन्य मुद्दे भी एजेंडे में थे।

इसलिए दिसंबर 2021 में दिल्ली की सीमाओं से धरना हटना आंदोलन का अंत नहीं बल्कि स्थगन माना गया।

एमएसपी समिति : वादे और विवाद

केंद्र ने जुलाई 2022 में एक समिति गठित की।

सरकारी अभिलेख के अनुसार इसका कार्य एमएसपी व्यवस्था को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और बदलती आवश्यकताओं के अनुसार फसल पद्धति पर विचार करना था। सरकार ने बाद में संसद में स्पष्ट किया कि समिति जुलाई 2022 की अधिसूचना से गठित हुई और उसकी बैठकें जारी थीं।

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्यगत भेद आवश्यक है।

किसान संगठनों के राजनीतिक विमर्श में इसे अक्सर “एमएसपी की कानूनी गारंटी” के अधूरे वादे से जोड़ा गया, लेकिन केंद्र सरकार ने संसद में कहा कि दिसंबर 2021 में दिया गया आश्वासन एमएसपी को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए समिति गठित करने का था, न कि कानूनी गारंटी देने का स्पष्ट आश्वासन।

यही व्याख्यात्मक अंतर आगे के संघर्ष का महत्वपूर्ण कारण बना।

खंड 6 · मूल इकाइयाँ 21–24

विकेंद्रीकृत संघर्ष से शंभू–खनौरी तक

2022–23 : आंदोलन का विकेंद्रीकृत चरण

कृषि कानून वापस होने के बाद 2020–21 जैसी निरंतर राष्ट्रीय घेराबंदी समाप्त हो गई, लेकिन किसान राजनीति खत्म नहीं हुई।

राज्यों में गन्ना मूल्य, बिजली, भूमि अधिग्रहण, फसल खरीद, प्राकृतिक आपदा मुआवजा और ऋण के प्रश्नों पर आंदोलन जारी रहे।

संयुक्त किसान मोर्चे ने भी राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए।

लेकिन संगठनात्मक एकता में दरारें स्पष्ट होने लगीं।

कुछ किसान समूह चुनावी राजनीति में गए, जबकि अन्य ने गैर-दलीय किसान आंदोलन की दिशा बनाए रखने पर जोर दिया।

2024 : किसान आंदोलन 2.0

13 फरवरी 2024 को किसान संगठनों ने फिर दिल्ली चलो अभियान शुरू किया।

इस बार नेतृत्व संरचना 2020–21 से अलग थी। आंदोलन में संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा प्रमुख रहे।

मुख्य मांगों में एमएसपी की कानूनी गारंटी, कृषि ऋण राहत और पूर्व आंदोलन से जुड़ी अन्य मांगें शामिल थीं।

शंभू और खनौरी : दिल्ली पहुंचने से पहले रोका गया आंदोलन

2020 में किसान दिल्ली की सीमाओं तक पहुंच गए थे।

2024 में सुरक्षा रणनीति बदल चुकी थी।

पंजाब–हरियाणा सीमा पर शंभू और खनौरी में किसानों को रोकने के लिए व्यापक अवरोध बनाए गए। आंसू गैस का प्रयोग हुआ और ड्रोन के माध्यम से भी आंसू गैस गिराए जाने की खबरें आईं।

इस प्रकार किसान आंदोलन का नया प्रतीक सिंघु–टिकरी–गाजीपुर से बदलकर शंभू–खनौरी हो गया।

शुभकरण सिंह की मृत्यु

फरवरी 2024 में खनौरी सीमा पर युवा किसान शुभकरण सिंह की मृत्यु आंदोलन की अत्यंत संवेदनशील घटना बनी।

उनकी मृत्यु ने पुलिस कार्रवाई, राज्य की सीमाओं, विरोध के अधिकार और बल प्रयोग को लेकर गंभीर विवाद पैदा किया।

2026 में किसान संगठनों ने उनकी स्मृति को एमएसपी आंदोलन की नई लामबंदी से भी जोड़ा।

खंड 7 · मूल इकाइयाँ 25–28

वार्ता, डल्लेवाल और न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रश्न

सरकार से वार्ता और दाल–मक्का–कपास प्रस्ताव

2024 में केंद्र सरकार के मंत्रियों और किसान प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की वार्ता हुई।

सरकार की ओर से कुछ फसलों—विशेषकर दलहन, मक्का और कपास—की खरीद व्यवस्था से संबंधित प्रस्ताव सामने आया।

किसान संगठनों ने इसे अपनी व्यापक एमएसपी कानूनी गारंटी की मांग के अनुरूप पर्याप्त नहीं माना।

यहीं दोनों पक्षों की अवधारणात्मक दूरी फिर स्पष्ट हुई।

सरकार उत्पादन विविधीकरण और लक्षित खरीद व्यवस्था की दिशा में समाधान खोज रही थी।

आंदोलनकारी संगठन व्यापक वैधानिक मूल्य-सुरक्षा चाहते थे।

जगजीत सिंह डल्लेवाल और खनौरी का लंबा संघर्ष

2024 के उत्तरार्ध में जगजीत सिंह डल्लेवाल का अनशन खनौरी आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन गया।

इससे आंदोलन केवल सड़क अवरोध या दिल्ली मार्च का प्रश्न नहीं रहा; एमएसपी की कानूनी गारंटी फिर राष्ट्रीय बहस में आई।

सर्वोच्च न्यायालय भी शंभू–खनौरी विवाद से जुड़े मामलों में सक्रिय हुआ और सितंबर 2024 में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति नवाब सिंह की अध्यक्षता में उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की गई। 2026 में न्यायालय ने समिति से अपनी अंतिम सिफारिशें सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करने को कहा।

एमएसपी : इस पूरे दशक का केंद्रीय प्रश्न

2017 में आंदोलन का प्रमुख शब्द कर्ज और फसल मूल्य था।

2020 में केंद्रीय शब्द बना कृषि बाजार और तीन कृषि कानून।

2024–26 तक संघर्ष फिर केंद्रित होकर पहुंचा

“क्या एमएसपी केवल सरकारी घोषणा रहे या किसान का कानूनी अधिकार बने?”

यही 2017–2026 के पूरे किसान उभार को जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक रेखाओं में से एक है।

लेकिन इसके आर्थिक पक्ष पर गंभीर मतभेद हैं।

एक पक्ष मानता है कि कानूनी एमएसपी किसानों को बाजार में न्यूनतम मूल्य सुरक्षा देगा और इसका अर्थ यह आवश्यक नहीं कि सरकार हर फसल का पूरा उत्पादन खरीदे।

आलोचक इसके विपरीत मूल्य विकृति, निजी व्यापार पर प्रभाव, भंडारण, निर्यात प्रतिस्पर्धा, राजकोषीय बोझ और फसल विविधीकरण पर संभावित दुष्प्रभावों की ओर ध्यान दिलाते हैं।

इसलिए प्रश्न केवल “एमएसपी देना है या नहीं” नहीं है।

किस फसल को, किस लागत-सूत्र पर, किस क्षेत्र में, किस खरीद अथवा मूल्य-अंतर भुगतान प्रणाली द्वारा और किस संस्था की जिम्मेदारी के अंतर्गत मूल्य सुरक्षा दी जाए?

2026 : आंदोलन का नया राष्ट्रीय विस्तार

2026 तक किसान आंदोलन समाप्त नहीं हुआ था। एमएसपी की कानूनी गारंटी और ऋण राहत की मांगों को लेकर किसान समूहों ने गांव-स्तरीय मांगपत्र अभियान और कन्याकुमारी से कश्मीर तक “एमएसपी भारत जोड़ो यात्रा” जैसी लामबंदी की घोषणा की।

इसके साथ कृषि व्यापार नीति भी किसान राजनीति का नया मोर्चा बन रही थी। 2026 में संयुक्त किसान मोर्चा ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से संबंधित कृषि आशंकाओं को लेकर भी विरोध अभियान चलाया। इससे संकेत मिलता है कि किसान राजनीति अब केवल मंडी और एमएसपी तक सीमित नहीं है; आयात शुल्क, वैश्विक कृषि व्यापार, डेयरी, खाद्य संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते भी उसके एजेंडे का हिस्सा बन रहे हैं।

खंड 8 · मूल इकाइयाँ 29–32

मांग, नेतृत्व, राजनीति और उपलब्धियां

2017 से 2026 : आंदोलन की बदलती मांग

इस दस वर्षीय यात्रा को एक सूत्र में देखें तो किसान आंदोलन की मांग लगातार विकसित हुई

2020–21 — तीन कृषि कानूनों की वापसी

2024 — एमएसपी की कानूनी गारंटी और दिल्ली चलो 2.0

2025–26 — एमएसपी, ऋण, कृषि नीति और राष्ट्रीय लामबंदी

2026 — कृषि व्यापार और वैश्विक बाजार से किसान संरक्षण का प्रश्न भी अधिक स्पष्ट।

इसलिए आंदोलन केवल सरकार की किसी एक नीति के विरुद्ध प्रतिक्रिया नहीं रहा। उसने धीरे-धीरे भारतीय कृषि व्यवस्था के नए सामाजिक अनुबंध का प्रश्न खड़ा कर दिया।

नेतृत्व की प्रकृति : ‘एक नेता’ से नेटवर्क आंदोलन तक

2017–2026 की सबसे दिलचस्प विशेषताओं में से एक नेतृत्व संरचना है।

महेंद्र सिंह टिकैत या शरद जोशी के दौर की तरह कोई एक निर्विवाद राष्ट्रीय किसान नेता नहीं उभरा।

इसके स्थान पर अनेक चेहरे सामने आए—राकेश टिकैत, बलबीर सिंह राजेवाल, दर्शन पाल, गुरनाम सिंह चढूनी, जगजीत सिंह डल्लेवाल, सरवन सिंह पंधेर, हन्नान मोल्ला और अनेक क्षेत्रीय नेता।

इससे आधुनिक किसान आंदोलन एक नेटवर्क आंदोलन बना।

लेकिन यही उसकी कमजोरी भी बनी—सभी किसान संगठन एमएसपी, चुनाव, राजनीतिक दलों से संबंध, आंदोलन की रणनीति और सरकार से समझौते पर हमेशा सहमत नहीं रहे।

आंदोलन और राजनीति

किसान आंदोलन को किसी एक राजनीतिक दल की परियोजना मानना ऐतिहासिक रूप से अपर्याप्त होगा।

विपक्षी दलों ने इसका राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की और आंदोलन ने केंद्र सरकार पर दबाव बनाया, लेकिन किसान संगठनों ने अनेक अवसरों पर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने का प्रयास किया।

दूसरी ओर यह कहना भी गलत होगा कि आंदोलन का चुनावी राजनीति से कोई संबंध नहीं था।

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन ने राजनीतिक विमर्श, सामाजिक गठबंधनों और चुनावी मुद्दों को प्रभावित किया।

इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि किसान आंदोलन दलीय राजनीति से बाहर पैदा हुआ, लेकिन उसके राजनीतिक परिणाम अनिवार्य रूप से दलीय क्षेत्र में पहुंचे।

आंदोलन की प्रमुख उपलब्धियां

सबसे प्रत्यक्ष उपलब्धि तीन कृषि कानूनों की वापसी थी।

लेकिन उससे आगे भी प्रभाव दिखाई देता है।

किसान ने कृषि नीति निर्माण में अपनी राजनीतिक स्वीकृति की आवश्यकता पुनः स्थापित की।

एमएसपी राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बना।

कृषि सुधारों में हितधारक परामर्श का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हुआ।

ग्रामीण संगठन क्षमता का नया प्रदर्शन हुआ।

अलग-अलग किसान संगठनों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन बनाने की संभावना सिद्ध हुई।

किसान फिर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का केंद्रीय सामाजिक पात्र बना।

खंड 9 · मूल इकाइयाँ 33–36

सीमाएं, ऐतिहासिक अर्थ और राष्ट्रीय एकता

आंदोलन की सीमाएं

इसके बावजूद आंदोलन की गंभीर सीमाएं रहीं।

पहली सीमा उसका असमान भौगोलिक विस्तार था। 2020–21 आंदोलन राष्ट्रीय प्रभाव वाला था, लेकिन उसकी सबसे मजबूत सामाजिक-संगठनात्मक शक्ति पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में केंद्रित रही।

दूसरी सीमा छोटे, सीमांत, किरायेदार, महिला किसान, खेतिहर मजदूर और भूमिहीन ग्रामीण आबादी के प्रश्नों को समान तीव्रता से राष्ट्रीय एजेंडे में स्थापित करने की रही।

तीसरी सीमा फसल विविधीकरण और पर्यावरण की थी।

चौथी सीमा किसान संगठनों की आंतरिक वैचारिक विविधता थी।

और पांचवीं—तीन कानून वापस कराना संभव हुआ, लेकिन उनके स्थान पर व्यापक सहमति वाला वैकल्पिक कृषि बाजार मॉडल अभी विकसित नहीं हो पाया।

ऐतिहासिक मूल्यांकन : मंदसौर से शंभू तक क्या बदला?

2017–2026 के किसान उभार को केवल आंदोलनों की श्रृंखला के रूप में नहीं समझना चाहिए।

यह भारतीय कृषि राजनीति में तीन बड़े संक्रमणों का इतिहास है।

पहला संक्रमण — उत्पादन से आय की ओर।

किसान अब केवल अधिक उत्पादन नहीं चाहता; वह उत्पादन से सम्मानजनक आय चाहता है।

दूसरा संक्रमण — सब्सिडी से मूल्य-अधिकार की ओर।

बिजली, उर्वरक और ऋण राहत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आंदोलन का केंद्रीय तर्क बनता गया कि किसान को उसकी उपज का न्यायसंगत मूल्य मिलना चाहिए।

तीसरा संक्रमण — नीति के लाभार्थी से नीति के भागीदार की ओर।

2020–21 आंदोलन का गहरा राजनीतिक संदेश यही था कि करोड़ों लोगों की आजीविका से संबंधित कृषि सुधार केवल तकनीकी आर्थिक निर्णय नहीं हो सकते; उन्हें सामाजिक सहमति भी चाहिए।

निष्कर्ष : 2017–2026 के किसान उभार को कैसे समझें?

मंदसौर की गोलियों से शुरू हुई इस दशक की कहानी शंभू और खनौरी के बैरिकेडों तक पहुंचती है।

बीच में नासिक से मुंबई पैदल चलते किसान हैं।

19 नवंबर 2021 की कानून वापसी की घोषणा है।

और फिर वही प्रश्न नए रूप में लौटता है

किसान की उपज का न्यायसंगत मूल्य कौन सुनिश्चित करेगा?

यही कारण है कि नवंबर 2021 में कृषि कानूनों की वापसी को इस इतिहास का अंतिम अध्याय नहीं माना जा सकता। वह एक आंदोलन की बड़ी विजय थी, लेकिन भारतीय कृषि संकट का समाधान नहीं।

2024–26 का शंभू–खनौरी संघर्ष उसी अधूरे प्रश्न की वापसी है। जुलाई 2022 में गठित केंद्र की एमएसपी समिति का औपचारिक कार्य एमएसपी व्यवस्था को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाना रहा; जुलाई 2025 तक सरकार संसद में कह रही थी कि समिति विचार-विमर्श कर रही है। 2026 में भी किसान संगठनों की एमएसपी की वैधानिक गारंटी की मांग कायम रही।

इसलिए 2017–2026 का समकालीन राष्ट्रीय किसान उभार भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास में “नीति-विरोध” से आगे “कृषि शासन में भागीदारी” की मांग का चरण है।

रंगपुर और पाबना में किसान ने पूछा था—लगान कितना होगा?

दक्कन में पूछा—कर्ज से मुक्ति कैसे मिलेगी?

चंपारण में—क्या बोना है, यह कौन तय करेगा?

बारदोली में—राज्य कितना राजस्व ले सकता है?

टिकैत और शरद जोशी के दौर में—फसल का मूल्य कौन तय करेगा?

और 2017–2026 के किसान ने इन पुराने प्रश्नों को जोड़कर एक नया प्रश्न खड़ा किया

“भारत की कृषि नीति कौन बनाएगा—केवल सरकार और बाजार, या किसान भी उसका वास्तविक भागीदार होगा?”

यही इस समकालीन किसान उभार की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरासत है।

2017–2019 : राष्ट्रीय किसान एकता की प्रयोगशाला

2020–21 का विशाल किसान आंदोलन अचानक पैदा नहीं हुआ था। उसकी संगठनात्मक जमीन 2017 के बाद लगातार तैयार हो रही थी। मंदसौर गोलीकांड के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय किसान संगठनों को यह अनुभव हुआ कि स्थानीय आंदोलनों की अपनी शक्ति है, लेकिन कृषि नीति को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित करने के लिए साझा मंच आवश्यक है।

इसी दौर में अलग-अलग वैचारिक परंपराओं के किसान संगठनों के बीच समन्वय बढ़ा। वामपंथी किसान संगठन, समाजवादी पृष्ठभूमि वाले संगठन, गैर-दलीय किसान यूनियनें, पंजाब के किसान संगठन और कृषि मूल्य को प्रमुख प्रश्न मानने वाले संगठन कई मुद्दों पर एक साथ आने लगे।

यह एकता पूर्ण वैचारिक एकता नहीं थी। कृषि बाजार, मुक्त व्यापार, सरकारी खरीद, ऋणमाफी, भूमि सुधार और राजनीतिक दलों से संबंध जैसे मुद्दों पर मतभेद बने रहे। लेकिन दो मांगें तेजी से साझा आधार बनीं

किसान को उसकी फसल का लाभकारी मूल्य मिले और कृषि ऋण के संकट से राहत मिले।

यही वह संगठनात्मक प्रयोग था जिसने 2020 में अलग-अलग संगठनों को बहुत कम समय में राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा करने की क्षमता दी।

खंड 10 · मूल इकाइयाँ 37–40

दिल्ली मार्च, अध्यादेश और विधायी विवाद

किसान आंदोलन का एक भूला हुआ चरण : 2018 का दिल्ली किसान मार्च

2018 में किसानों की दिल्ली की ओर लामबंदी ने संकेत दे दिया था कि राजधानी भविष्य के किसान आंदोलन का मुख्य राजनीतिक मंच बनने वाली है।

सितंबर-अक्टूबर 2018 में भारतीय किसान यूनियन से जुड़े किसानों की हरिद्वार से दिल्ली की ओर यात्रा और दिल्ली सीमा पर टकराव ने ग्रामीण असंतोष को राष्ट्रीय समाचारों के केंद्र में पहुंचाया।

इसके बाद नवंबर 2018 में विभिन्न किसान संगठनों की बड़ी लामबंदी दिल्ली पहुंची।

यहां एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक परिवर्तन दिखाई देता है।

किसान केवल अपने जिले के कलेक्टर या राज्य सरकार के सामने प्रदर्शन नहीं कर रहा था। वह संसद और केंद्र सरकार को सीधे संबोधित कर रहा था।

राज्य-केंद्रित किसान संघर्ष राष्ट्रीय कृषि-नीति आंदोलन में बदल रहा था।

जून 2020 के अध्यादेश : आंदोलन की वास्तविक कानूनी शुरुआत

2020 के कृषि कानूनों की समयरेखा को सितंबर से शुरू करना अधूरा होगा।

केंद्र सरकार ने 5 जून 2020 को तीन कृषि अध्यादेश जारी किए। बाद में इन्हीं को संसद ने कानून का रूप दिया। सरकारी विवरण के अनुसार राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के अधिकारियों के साथ 21 मई को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से प्रस्तावित नए व्यापार ढांचे पर विचार-विमर्श भी किया गया था।

सरकार का तर्क था कि कोविड लॉकडाउन के कारण कृषि आपूर्ति शृंखला में पैदा हुई बाधाओं के बीच किसानों को मंडियों से बाहर सीधे व्यापार की सुविधा देना आवश्यक था।

विरोधियों की आपत्ति केवल कानून की धाराओं पर नहीं थी। उनका एक बड़ा प्रश्न यह भी था कि इतनी व्यापक कृषि व्यवस्था में परिवर्तन अध्यादेश के माध्यम से क्यों प्रारंभ किया गया?

यहीं से कृषि सुधार का प्रश्न प्रक्रियागत लोकतंत्र के प्रश्न से भी जुड़ गया।

सितंबर 2020 : संसद और विवादित विधायी प्रक्रिया

सितंबर 2020 के मानसून सत्र में अध्यादेशों को विधेयकों के रूप में संसद के सामने लाया गया।

लोकसभा में विधेयक पारित हुए। राज्यसभा में 20 सितंबर को दो प्रमुख कृषि विधेयकों पर तीखा विवाद हुआ।

विपक्ष के अनेक सदस्यों ने विधेयकों को प्रवर समिति के पास भेजने की मांग की। सदन में भारी व्यवधान के बीच विधेयक पारित हुए। पीआरएस के संसदीय विवरण में भी दर्ज है कि विरोध करने वाले सदस्यों ने बड़ी कंपनियों को लाभ तथा एमएसपी व्यवस्था कमजोर होने की आशंका जताई, जबकि समर्थकों ने तर्क दिया कि नई व्यवस्था किसानों को मंडी के बिचौलियों और स्थानीय व्यापारिक कार्टेल से अधिक विकल्प देगी।

27 सितंबर 2020 को राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद तीनों विधेयक कानून बन गए।

इस संसदीय विवाद का दीर्घकालीन महत्व था।

किसान आंदोलन का तर्क अब दो स्तरों पर था

इतने बड़े कृषि सुधार को बनाने की प्रक्रिया कैसी होनी चाहिए थी?

सरकार का पक्ष भी पूरी तरह समझना आवश्यक

इस आंदोलन का निष्पक्ष इतिहास लिखते समय सरकार की मूल आर्थिक दलील को छोड़ना उचित नहीं होगा।

सरकार का तर्क था कि मौजूदा कृषि विपणन व्यवस्था में किसान स्थानीय मंडी और लाइसेंस प्राप्त व्यापारियों पर अत्यधिक निर्भर है। नए कानून उसे मंडी के बाहर भी उपज बेचने का विकल्प देंगे।

एपीएमसी मंडियां समाप्त नहीं की जा रही थीं;

अनुबंध खेती से मूल्य पहले निर्धारित हो सकेगा;

निजी निवेश से भंडारण, शीतगृह और कृषि आपूर्ति शृंखला बेहतर हो सकती है।

सरकार ने संसद और किसान संगठनों के साथ बातचीत में बार-बार कहा कि एमएसपी और मंडी व्यवस्था जारी रहेगी। दिसंबर 2020 की छठे दौर की वार्ता में भी सरकार ने यही आश्वासन दिया।

अतः ऐतिहासिक विवाद को केवल “किसान बनाम सरकार” कहना पर्याप्त नहीं है।

यह वास्तव में दो कृषि-सुधार अवधारणाओं का संघर्ष भी था

प्रतिस्पर्धी बाजार द्वारा किसान की आय बढ़ाने का मॉडल

सार्वजनिक मूल्य-सुरक्षा और संस्थागत खरीद द्वारा किसान की सौदेबाजी शक्ति सुरक्षित रखने का मॉडल।

खंड 11 · मूल इकाइयाँ 41–44

किसान आशंकाएं, वार्ता, न्यायालय और महिलाएं

किसानों की आशंका : कानून में जो नहीं लिखा था, उसका डर क्यों था?

तीनों कृषि कानूनों में कहीं यह नहीं लिखा था कि एमएसपी समाप्त कर दिया जाएगा।

फिर एमएसपी आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा क्यों बना?

किसान संगठनों का तर्क था कि उनका भय तत्काल कानूनी समाप्ति का नहीं बल्कि संस्थागत क्षरण का था।

उनकी आशंका थी कि यदि मंडियों से बाहर कर-मुक्त अथवा अलग नियामकीय व्यवस्था वाला व्यापार तेजी से बढ़ा तो एपीएमसी मंडियों का व्यापार घट सकता है। मंडियां कमजोर होने पर सरकारी खरीद की मौजूदा संरचना भी प्रभावित हो सकती है।

विशेषकर पंजाब और हरियाणा में धान और गेहूं की सरकारी खरीद का आर्थिक महत्व बहुत अधिक था।

इसलिए दोनों पक्ष अलग-अलग प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे।

“कानून में एमएसपी समाप्त करने का कोई प्रावधान नहीं है।”

“यदि नई बाजार व्यवस्था के कारण भविष्य में खरीद संरचना कमजोर हुई तो किसान की मूल्य सुरक्षा क्या होगी?”

इस अंतर को समझे बिना 2020–21 के विवाद को ठीक से नहीं समझा जा सकता।

ग्यारह दौर की वार्ता : गतिरोध कैसे बना?

केंद्र सरकार और आंदोलनकारी किसान संगठनों के बीच कुल 11 दौर की औपचारिक वार्ता हुई। सरकार ने बाद में संसद में भी इस संख्या की पुष्टि की।

वार्ताओं में कई बार ऐसा लगा कि आंशिक सहमति संभव है।

पराली से जुड़े दंडात्मक प्रावधान और प्रस्तावित बिजली कानून जैसे विषयों पर समाधान की संभावना दिखाई दी।

सरकार कृषि कानूनों में संशोधन के लिए तैयार थी।

किसान संगठन कानूनों की पूर्ण वापसी पर अड़े रहे।

सरकार ने कानूनों के क्रियान्वयन को एक निश्चित अवधि के लिए स्थगित करने का प्रस्ताव भी दिया।

लेकिन आंदोलनकारी संगठनों का तर्क था कि यदि कानून मूलतः दोषपूर्ण हैं तो उनका अस्थायी स्थगन समाधान नहीं है।

इसलिए वार्ता का केंद्रीय विरोधाभास बना रहा

सरकार सुधार चाहती थी; किसान संगठन निरसन।

सर्वोच्च न्यायालय : कानूनों पर रोक का असाधारण क्षण

12 जनवरी 2021 को सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगा दी और विवाद पर विचार करने के लिए समिति बनाई। न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत के बावजूद समाधान नहीं निकला था।

यह संवैधानिक दृष्टि से असाधारण स्थिति थी।

संसद से पारित और राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कानून अस्तित्व में थे, लेकिन उनका क्रियान्वयन न्यायिक आदेश के कारण रुका हुआ था।

आंदोलनकारी संगठनों ने समिति के सामने जाने से इनकार किया।

इस प्रकरण ने तीन संस्थाओं—संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच सामाजिक संघर्ष के समाधान की सीमाओं पर महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया।

महिला किसान : आंदोलन की सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण पक्ष

2020–21 के आंदोलन को केवल पुरुष भूमिधर किसानों का आंदोलन समझना गलत होगा।

पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और अन्य क्षेत्रों से बड़ी संख्या में महिलाएं आंदोलन स्थलों पर पहुंचीं। टिकरी विशेष रूप से महिला भागीदारी का महत्वपूर्ण स्थल बना। समकालीन रिपोर्टिंग ने खेती में सक्रिय महिलाओं की धरना स्थलों पर प्रत्यक्ष भागीदारी को दर्ज किया।

महिलाओं ने केवल भोजन बनाने या सहायक भूमिकाएं नहीं निभाईं। वे मंचों पर बोलीं, जुलूसों में शामिल हुईं, ट्रैक्टर चलाए और किसान के रूप में अपनी पहचान का दावा किया।

इस भागीदारी ने भारतीय कृषि की पुरानी विसंगति को उजागर किया

खेती में महिलाओं का श्रम अत्यधिक है, लेकिन भूमि स्वामित्व और औपचारिक “किसान” पहचान में उनकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है।

इसलिए किसान आंदोलन के भीतर एक प्रश्न और जुड़ा

खंड 12 · मूल इकाइयाँ 45–48

खेतिहर मजदूर, मृत्यु, मुकदमे और संचार

भूमिहीन और खेतिहर मजदूर : आंदोलन की सबसे कठिन अंतर्विरोधी रेखा

किसान आंदोलन के सामाजिक मूल्यांकन में खेतिहर मजदूरों को अलग से देखना आवश्यक है।

पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में भूमिधर किसान और खेतिहर मजदूर एक ही कृषि अर्थव्यवस्था के अंग हैं, लेकिन उनके आर्थिक हित हमेशा समान नहीं होते।

भूमि का किराया, मजदूरी, धान रोपाई की दर, पंचायत भूमि और ग्रामीण सामाजिक संरचना में दोनों समूहों के बीच संघर्ष भी रहे हैं।

फिर भी कृषि कानून विरोधी आंदोलन ने कई स्थानों पर किसान और मजदूर संगठनों के बीच सहयोग पैदा किया।

यही इस आंदोलन की संभावना और सीमा दोनों थी।

किसान एकता तभी व्यापक ग्रामीण एकता बन सकती थी जब भूमिहीन मजदूर, किरायेदार किसान और छोटे किसान भी उसके नीति-एजेंडे में बराबर स्थान पाते।

आंदोलन में मृत्यु : आंकड़ों को कैसे लिखा जाए?

इस विषय पर अत्यधिक सावधानी आवश्यक है क्योंकि अलग-अलग पक्षों के आंकड़े समान नहीं हैं।

संयुक्त किसान मोर्चे ने नवंबर 2021 तक आंदोलन के दौरान 670 से अधिक प्रदर्शनकारियों की मृत्यु का दावा किया था। दूसरी ओर केंद्र सरकार ने 1 दिसंबर 2021 को संसद में कहा कि कृषि मंत्रालय के पास आंदोलन के दौरान किसानों की मृत्यु का कोई रिकॉर्ड नहीं है।

अतः शोध अध्याय में यह नहीं लिखा जाना चाहिए कि कोई एक संख्या निर्विवाद सरकारी तथ्य है।

किसान संगठनों ने सैकड़ों मौतों का दावा किया; केंद्र ने कहा कि उसके कृषि मंत्रालय के पास ऐसा समेकित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।

इसी स्रोत-अंतर को इतिहास का हिस्सा माना जाना चाहिए।

मुकदमे, गिरफ्तारी और नागरिक स्वतंत्रता का प्रश्न

आंदोलन के दौरान विभिन्न राज्यों और दिल्ली में प्रदर्शन, सड़क अवरोध, 26 जनवरी की घटनाओं तथा अन्य प्रकरणों को लेकर प्राथमिकी और गिरफ्तारियां हुईं।

इसके कारण किसान आंदोलन केवल कृषि नीति की बहस नहीं रहा।

इसके साथ तीन संवैधानिक प्रश्न जुड़ गए

शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार कितना व्यापक है?

सार्वजनिक मार्गों को लंबे समय तक अवरुद्ध करने की सीमा क्या है?

राज्य कानून-व्यवस्था तथा नागरिक विरोध के बीच संतुलन कैसे बनाए?

किसान आंदोलन के आलोचकों ने महीनों तक सड़कों और सीमाओं के अवरोध से आम नागरिकों को हुई कठिनाइयों का प्रश्न उठाया।

आंदोलनकारियों का उत्तर था कि राष्ट्रीय नीति पर गंभीर असहमति की स्थिति में प्रभावी विरोध के लिए सार्वजनिक दबाव आवश्यक है।

दोनों पक्ष इस आंदोलन के लोकतांत्रिक मूल्यांकन का हिस्सा हैं।

सोशल मीडिया और किसान आंदोलन

यह भारत का पहला विशाल किसान आंदोलन था जो लगभग पूरी तरह स्मार्टफोन और सामाजिक माध्यमों के युग में घटित हुआ।

फेसबुक, यूट्यूब, व्हाट्सऐप, ट्विटर और स्वतंत्र डिजिटल माध्यमों ने आंदोलन को अपना संचार तंत्र दिया।

किसान संगठनों को केवल मुख्यधारा समाचार माध्यमों पर निर्भर नहीं रहना पड़ा।

गलत सूचना, संपादित वीडियो, अपुष्ट दावे और अत्यधिक ध्रुवीकृत सामग्री भी तेजी से प्रसारित हुई।

इसलिए 2020–21 आंदोलन भारतीय जन आंदोलनों के इतिहास में डिजिटल सूचना युद्ध का भी महत्वपूर्ण अध्ययन है।

खंड 13 · मूल इकाइयाँ 49–52

अंतरराष्ट्रीय आयाम, वापसी और न्यूनतम समर्थन मूल्य समिति

प्रवासी भारतीय और अंतरराष्ट्रीय आयाम

कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और अन्य देशों में बसे पंजाबी तथा भारतीय मूल के समुदायों ने आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन किए।

अंतरराष्ट्रीय हस्तियों की टिप्पणियों ने भी विवाद पैदा किया।

सरकार ने विदेशी हस्तक्षेप अथवा भारत के आंतरिक मामलों को अधूरी जानकारी के आधार पर देखने की आलोचना की।

आंदोलन समर्थकों ने इसे वैश्विक नागरिक समाज की एकजुटता माना।

इस प्रकार स्थानीय कृषि नीति का विवाद अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक विमर्श का विषय बन गया।

कानून वापसी : संसदीय प्रक्रिया का अंतिम चरण

19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कानून वापस लेने की घोषणा की।

लेकिन प्रधानमंत्री की घोषणा से कानून स्वतः समाप्त नहीं हुए।

इसके लिए संसद को निरसन कानून पारित करना आवश्यक था।

29 नवंबर 2021 को कृषि विधि निरसन विधेयक संसद में लाया गया और तीनों कानून निरस्त किए गए। कृषि विधि निरसन अधिनियम, 2021 को 30 नवंबर 2021 को अधिनियम संख्या 40 के रूप में दर्ज किया गया।

वैधानिक प्रक्रिया 30 नवंबर को पूर्ण हुई।

दिसंबर 2021 : आंदोलन खत्म नहीं, स्थगित हुआ

कानूनों की वापसी के बाद भी संयुक्त किसान मोर्चा तुरंत धरना समाप्त करने को तैयार नहीं था।

एमएसपी, मुकदमों, मृत किसानों के परिवारों, बिजली और अन्य मुद्दों पर सरकार से आश्वासन मांगा गया।

दिसंबर 2021 में केंद्र और किसान संगठनों के बीच संवाद के बाद मोर्चे ने दिल्ली सीमाओं से आंदोलन स्थगित करने का निर्णय किया।

शब्द “स्थगित” राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था।

किसान नेतृत्व यह संदेश देना चाहता था कि कानून वापसी से एक लक्ष्य पूरा हुआ है, लेकिन बाकी मांगें समाप्त नहीं हुईं।

इसीलिए 2024 का आंदोलन पूरी तरह नया आंदोलन नहीं था; वह 2021 के अधूरे एजेंडे से भी जुड़ा था।

एमएसपी समिति : वादा वास्तव में क्या था?

यहां तथ्यगत सावधानी विशेष रूप से जरूरी है।

किसान संगठनों की राजनीतिक भाषा में दिसंबर 2021 को एमएसपी की कानूनी गारंटी के अधूरे वादे से जोड़ा जाता रहा।

लेकिन सरकारी पक्ष की व्याख्या अलग रही।

जुलाई 2022 में केंद्र ने जिस समिति का गठन किया, उसके घोषित कार्यों में एमएसपी व्यवस्था को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाना, प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करना और बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप फसल पद्धति पर विचार करना शामिल था।

अर्थात इतिहासकार को दो दावों में अंतर रखना होगा

किसान संगठनों की अपेक्षा : एमएसपी की कानूनी गारंटी।

सरकारी समिति का औपचारिक कार्यादेश : एमएसपी व्यवस्था को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाना।

दोनों को एक मान लेना तथ्यगत त्रुटि होगी।

खंड 14 · मूल इकाइयाँ 53–56

मोर्चे का विभाजन, आंदोलन 2.0 और वैधानिक मूल्य-अधिकार

संयुक्त किसान मोर्चे में विभाजन

2021 की सफलता के बाद किसान एकता की सबसे कठिन परीक्षा शुरू हुई।

क्या किसान आंदोलन चुनावी राजनीति में प्रवेश करे?

पंजाब के कुछ किसान संगठनों ने 2022 विधानसभा चुनाव में भाग लेने की दिशा चुनी और संयुक्त समाज मोर्चा बनाया।

अन्य संगठनों ने इसका विरोध किया और आंदोलन को गैर-दलीय बनाए रखने की वकालत की।

इसके बाद एसकेएम के भीतर दरारें बढ़ीं। जुलाई 2022 तक पुराने संगठनों को वापस लेने और संगठनात्मक पुनर्गठन को लेकर भी विवाद सामने आया।

यह किसान आंदोलनों की पुरानी समस्या थी

आंदोलन की सामाजिक शक्ति को राजनीतिक सत्ता में बदला जाए या सत्ता से दूरी रखकर दबाव समूह बने रहा जाए?

2024 का आंदोलन 2020 की हूबहू पुनरावृत्ति नहीं था

यह अंतर वेबसाइट अध्याय में बहुत स्पष्ट होना चाहिए।

2020–21 के आंदोलन का प्रमुख राष्ट्रीय मंच संयुक्त किसान मोर्चा था।

2024 के दिल्ली चलो अभियान में संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा प्रमुख थे।

इसलिए 2024 के आंदोलन को सीधे “एसकेएम का दूसरा चरण” कहना संगठनात्मक रूप से सटीक नहीं होगा।

शंभू–खनौरी में पंजाब के किसानों की प्रमुख भूमिका फिर दिखाई दी।

लेकिन नेतृत्व और संगठनात्मक संरचना बदल चुकी थी।

फरवरी 2024 : चार दौर की वार्ता और सरकार का पांच वर्षीय प्रस्ताव

फरवरी 2024 में केंद्र के मंत्रियों और किसान प्रतिनिधियों के बीच चार दौर की बातचीत हुई।

चौथे दौर में सरकार ने एक विशिष्ट प्रस्ताव रखा।

सरकार समर्थित सहकारी एजेंसियां अरहर, उड़द, मसूर और मक्का को एमएसपी पर पांच वर्षों तक अनुबंध के आधार पर खरीदें और भारतीय कपास निगम कपास खरीदे—ऐसी रूपरेखा सामने आई।

इस प्रस्ताव का नीति-तर्क महत्वपूर्ण था।

सरकार एक साथ दो समस्याओं का समाधान चाहती थी

पंजाब-हरियाणा में धान-गेहूं चक्र से फसल विविधीकरण।

लेकिन आंदोलनकारी नेतृत्व ने इसे सभी फसलों के लिए व्यापक कानूनी एमएसपी गारंटी का विकल्प नहीं माना।

एमएसपी की कानूनी गारंटी वास्तव में क्या मांगती है?

यह पूरे अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक स्पष्टीकरण होना चाहिए।

एमएसपी की कानूनी गारंटी का अर्थ अनिवार्य रूप से यह नहीं है कि सरकार देश में पैदा होने वाली हर फसल का प्रत्येक दाना स्वयं खरीदे।

निजी खरीद में एमएसपी से नीचे मूल्य पर रोक;

इसीलिए राजनीतिक नारे और वास्तविक कानून के बीच बहुत बड़ा नीति-क्षेत्र मौजूद है।

किसान आंदोलन की मांग को वास्तविक कानून में बदलने के लिए यह तय करना पड़ेगा कि एमएसपी से नीचे खरीद होने पर जिम्मेदार कौन होगा, नुकसान की भरपाई कौन करेगा और व्यवस्था किन फसलों पर लागू होगी।

खंड 15 · मूल इकाइयाँ 57–60

कृषि लागत, कानूनी गारंटी और आर्थिक बहस

सी2+50 प्रतिशत : सबसे अधिक भ्रम वाला प्रश्न

किसान आंदोलनों में स्वामीनाथन आयोग का नाम बार-बार आता है।

यहां लागत की विभिन्न अवधारणाओं को समझना जरूरी है।

ए2 में किसान द्वारा वास्तव में चुकाई गई प्रत्यक्ष लागतें आती हैं।

ए2+एफएल में प्रत्यक्ष लागत के साथ पारिवारिक श्रम का अनुमानित मूल्य जोड़ा जाता है।

सी2 अधिक व्यापक लागत अवधारणा है, जिसमें भूमि और स्थिर पूंजी से संबंधित आरोपित लागत भी शामिल होती है।

सरकार घोषित एमएसपी में लागत पर निश्चित प्रतिफल देने की बात करती रही है, जबकि अनेक किसान संगठन मांग करते हैं कि आधार व्यापक सी2 लागत हो और उसके ऊपर 50 प्रतिशत जोड़ा जाए।

इसलिए केवल “लागत का डेढ़ गुना एमएसपी” लिखना पर्याप्त नहीं है।

कौन-सी लागत?

एमएसपी की सार्वभौमिक कानूनी गारंटी के पक्ष में तर्क

छोटे किसान की बाजार में सौदेबाजी शक्ति कमजोर है;

फसल कटने के तुरंत बाद किसान को नकदी की आवश्यकता होती है;

वह उपज रोककर बेहतर मूल्य की प्रतीक्षा नहीं कर सकता;

व्यापारी स्थानीय स्तर पर मूल्य दबा सकते हैं;

कृषि उत्पादन में मौसम और कीमत दोनों का जोखिम किसान उठाता है;

इसलिए न्यूनतम मूल्य सुरक्षा को कानूनी अधिकार बनाना न्यायसंगत है।

इस दृष्टिकोण में एमएसपी केवल आर्थिक मूल्य नहीं बल्कि कृषि जोखिम के विरुद्ध सामाजिक सुरक्षा है।

कानूनी एमएसपी पर आर्थिक आपत्तियां

दूसरी ओर अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों का एक वर्ग व्यापक वैधानिक एमएसपी व्यवस्था की व्यावहारिक कठिनाइयों की ओर संकेत करता है।

यदि बाजार मूल्य कानूनी एमएसपी से नीचे चला जाए तो निजी खरीदार खरीद से पीछे हट सकते हैं।

निर्यात प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है।

कुछ फसलों में कृत्रिम उत्पादन प्रोत्साहन पैदा हो सकता है।

जल संकट वाले क्षेत्रों में पहले से असंतुलित फसल चक्र और मजबूत हो सकता है।

इसीलिए वास्तविक नीति चुनौती किसान को मूल्य सुरक्षा देने और कृषि बाजार को कार्यशील बनाए रखने—दोनों को साथ लेकर चलने की है।

2026 : आंदोलन अभी समाप्त नहीं

यह अध्याय 2021 पर बंद नहीं किया जा सकता और न ही 2024 पर।

अगस्त 2026 तक किसान लामबंदी जारी है।

17 अगस्त 2026 को संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) से जुड़े किसानों की प्रस्तावित 228 किलोमीटर “किसान बचाओ पदयात्रा” को खनौरी–दाता सिंहवाला सीमा पर हरियाणा में प्रवेश करने से रोक दिया गया। आंदोलनकारी एमएसपी की कानूनी गारंटी सहित अपनी मांगें उठा रहे थे।

इसके बाद किसान संगठनों ने जिला-स्तरीय प्रदर्शन की घोषणा की।

दूसरी धारा में संयुक्त किसान मोर्चा और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने अगस्त 2026 में केंद्र की कृषि, श्रम और आर्थिक नीतियों के विरोध में देशव्यापी कार्यक्रमों की घोषणा की।

अर्थात 2026 तक किसान राजनीति कम-से-कम दो प्रमुख संगठनात्मक धाराओं में सक्रिय दिखाई देती है।

खंड 16 · मूल इकाइयाँ 61–65

व्यापार, लोकतंत्र, समयरेखा और अंतिम निष्कर्ष

नया प्रश्न : कृषि और अंतरराष्ट्रीय व्यापार

2026 तक किसान राजनीति में एक और विषय तेजी से महत्वपूर्ण हुआ

अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों में भारतीय कृषि की स्थिति।

आयात शुल्क घटने, विदेशी कृषि उत्पादों की प्रतिस्पर्धा, डेयरी क्षेत्र, तिलहन, मक्का और अन्य कृषि वस्तुओं के बाजार खुलने की आशंकाएं किसान संगठनों के विमर्श का हिस्सा बनीं।

इससे आंदोलन की प्रकृति फिर बदलती दिखाई देती है।

वैश्विक व्यापार व्यवस्था में भारतीय किसान को किस स्तर की सुरक्षा मिलेगी?

किसान आंदोलन और लोकतंत्र : एक संतुलित मूल्यांकन

2020–21 के आंदोलन ने भारतीय लोकतंत्र की दो परस्पर तनावपूर्ण वास्तविकताएं सामने रखीं।

निर्वाचित संसद को कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार है।

नागरिकों को उन कानूनों का शांतिपूर्ण विरोध करने और सरकार से उन्हें बदलने की मांग करने का लोकतांत्रिक अधिकार है।

समस्या तब कठिन होती है जब दोनों वैधताएं आमने-सामने आ जाएं।

“कानून संवैधानिक प्रक्रिया से बना है।”

2021 में अंततः राजनीतिक समाधान कानून वापसी के रूप में निकला।

इसे न तो संसद की निरर्थकता माना जा सकता है और न सड़क की पूर्ण सर्वोच्चता।

बल्कि यह लोकतंत्र की उस प्रक्रिया का उदाहरण है जिसमें कानून बनाना भी राजनीति है और कानून पर पुनर्विचार करना भी।

भारतीय किसान आंदोलनों की दीर्घकालीन परंपरा में 2017–2026

अब इसे भारतीय किसान आंदोलन की पूरी ऐतिहासिक यात्रा में रखकर देखें।

दक्कन ने साहूकारी और कर्ज को चुनौती दी।

चंपारण ने जबरन खेती का प्रश्न उठाया।

खेड़ा और बारदोली ने राज्य के कराधिकार की सीमा निर्धारित करने की कोशिश की।

तेभागा ने फसल में हिस्सेदारी मांगी।

तेलंगाना ने भूमि संबंधों को चुनौती दी।

शेतकरी संगठन ने कृषि के प्रतिकूल मूल्य-संबंधों का प्रश्न उठाया।

टिकैत आंदोलन ने किसान की सौदेबाजी शक्ति दिखाई।

और 2017–2026 के राष्ट्रीय किसान उभार ने इन प्रश्नों को जोड़कर पूछा

कृषि की आर्थिक नीति बनाने में किसान की सहमति और भागीदारी कितनी होनी चाहिए?

यही इस दौर की सबसे विशिष्ट ऐतिहासिक देन है।

समेकित समयरेखा : 2017–2026

6 जून 2017 — मंदसौर किसान आंदोलन में पुलिस गोलीबारी; राष्ट्रीय कृषि असंतोष का महत्वपूर्ण मोड़।

2017–18 — ऋणमाफी और लाभकारी मूल्य की मांग पर विभिन्न राज्यों में किसान लामबंदी।

6–12 मार्च 2018 — नासिक से मुंबई किसान लॉन्ग मार्च।

2018 — दिल्ली की ओर किसान मार्चों और राष्ट्रीय किसान समन्वय का विस्तार।

2019 — किसान आय, पीएम-किसान और एमएसपी आम चुनावी विमर्श के केंद्र में।

5 जून 2020 — तीन कृषि अध्यादेश जारी।

सितंबर 2020 — संसद में कृषि विधेयक पारित।

27 सितंबर 2020 — राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद कानून बने।

नवंबर 2020 — दिल्ली चलो; सिंघु, टिकरी और गाजीपुर धरनों की स्थापना।

दिसंबर 2020–जनवरी 2021 — सरकार और किसान संगठनों की वार्ताओं का लंबा दौर।

12 जनवरी 2021 — सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाई।

26 जनवरी 2021 — ट्रैक्टर परेड और दिल्ली में हिंसक घटनाएं; आंदोलन का बड़ा संकट।

जनवरी 2021 के अंत — गाजीपुर आंदोलन का पुनरुत्थान।

2021 — देश के अनेक क्षेत्रों में किसान महापंचायतें।

3 अक्टूबर 2021 — लखीमपुर खीरी घटना।

19 नवंबर 2021 — प्रधानमंत्री ने कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की।

29–30 नवंबर 2021 — संसदीय और वैधानिक निरसन प्रक्रिया पूर्ण।

दिसंबर 2021 — दिल्ली सीमाओं से आंदोलन स्थगित।

2022 — किसान संगठनों में चुनावी राजनीति को लेकर विभाजन।

जुलाई 2022 — एमएसपी व्यवस्था सहित कृषि प्रश्नों पर केंद्र की समिति गठित।

13 फरवरी 2024 — नया दिल्ली चलो अभियान।

फरवरी 2024 — शंभू और खनौरी प्रमुख आंदोलन स्थल बने।

फरवरी 2024 — केंद्र–किसान वार्ता के चार दौर; पांच वर्षीय खरीद प्रस्ताव।

21 फरवरी 2024 — खनौरी संघर्ष के दौरान शुभकरण सिंह की मृत्यु।

2024–25 — खनौरी आंदोलन और एमएसपी की कानूनी गारंटी का प्रश्न जारी।

2026 — एमएसपी, कृषि व्यापार और किसान अधिकारों पर अलग-अलग किसान मंचों की राष्ट्रीय लामबंदी।

17 अगस्त 2026 — किसान बचाओ पदयात्रा खनौरी सीमा पर रोकी गई।

20 अगस्त 2026 — किसान संगठनों द्वारा जिला-स्तरीय लामबंदी का कार्यक्रम।

अंतिम निष्कर्ष : अब अध्याय कहां समाप्त होता है?

2017 से 2026 तक की यात्रा को केवल घटनाओं की सूची के रूप में पढ़ेंगे तो मंदसौर, मुंबई लॉन्ग मार्च, दिल्ली आंदोलन और शंभू–खनौरी अलग-अलग संघर्ष दिखाई देंगे।

लेकिन इन्हें एक साथ रखने पर भारतीय कृषि राजनीति का एक स्पष्ट परिवर्तन सामने आता है

कर्ज से आय तक।

आय से मूल्य तक।

मूल्य से बाजार तक।

बाजार से कानून तक।

कानून से नीति-निर्माण में भागीदारी तक।

2020 में केंद्र सरकार कृषि बाजार को संरचनात्मक रूप से बदलना चाहती थी। आंदोलनकारी किसानों के एक बड़े हिस्से ने उस मॉडल को स्वीकार नहीं किया। सरकार ने संशोधन और वार्ता का रास्ता प्रस्तावित किया; किसान संगठनों ने कानून वापसी की मांग कायम रखी। ग्यारह दौर की बातचीत के बावजूद समझौता नहीं हुआ। अंततः कानून वापस हुए।

इस अर्थ में किसान आंदोलन ने असाधारण राजनीतिक सफलता प्राप्त की।

लेकिन जिस प्रश्न ने आंदोलन को जन्म दिया था—भारतीय किसान की टिकाऊ और सम्मानजनक आय कैसे सुनिश्चित हो—वह कानून वापसी से हल नहीं हुआ।

इसीलिए 2026 में भी एमएसपी की कानूनी गारंटी पर संघर्ष दिखाई देता है।

और इसीलिए इस दशक का सबसे सटीक ऐतिहासिक निष्कर्ष शायद यह है

2017–2026 का किसान उभार किसी एक कानून के विरुद्ध दस वर्ष का आंदोलन नहीं था; यह भारतीय कृषि में किसान, राज्य और बाजार के बीच नए सामाजिक अनुबंध की खोज का दशक था।

तीन कृषि कानून चले गए, लेकिन मूल प्रश्न बाकी रहा

किसान को बाजार की स्वतंत्रता चाहिए, राज्य की सुरक्षा चाहिए, या दोनों का ऐसा संतुलन जिसमें उत्पादन का जोखिम अकेले किसान पर न रहे?

इस प्रश्न का सर्वमान्य उत्तर भारत अभी खोज रहा है।

अब मूल खंड 1–35 और ये अतिरिक्त खंड 36–65 मिलाकर “2017–2026 का समकालीन राष्ट्रीय किसान उभार” शोध-अध्याय को विषय-वस्तु, प्रमुख घटनाओं, सरकारी पक्ष, किसान पक्ष, विधायी प्रक्रिया, न्यायिक हस्तक्षेप, संगठनात्मक विभाजन, एमएसपी अर्थशास्त्र, सामाजिक आयाम और अगस्त 2026 तक की समयरेखा के लिहाज से पूर्ण माना जा सकता है।

OCN ऐतिहासिक आकलन

2017–2026 का किसान उभार किसी एक कानून के विरुद्ध लगातार चला दस वर्षीय आंदोलन नहीं था। यह अलग-अलग क्षेत्रों, संगठनों और वैचारिक धाराओं के संघर्षों की ऐसी श्रृंखला थी जिसने भारतीय कृषि में किसान, राज्य और बाजार के संबंधों पर नया सामाजिक अनुबंध खोजने का प्रश्न खड़ा किया। तीन कृषि कानूनों की वापसी आंदोलन की असाधारण राजनीतिक उपलब्धि थी, किंतु किसान की टिकाऊ आय, न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी स्थिति, सरकारी खरीद का दायरा, बाजार प्रतिस्पर्धा, फसल विविधीकरण और उत्पादन-जोखिम के न्यायपूर्ण बंटवारे पर सर्वमान्य उत्तर अब भी शेष है। इस दौर की सबसे स्थायी ऐतिहासिक देन यही है कि कृषि सुधार केवल तकनीकी आर्थिक निर्णय नहीं रह सकते; उनकी लोकतांत्रिक वैधता किसान की सुनवाई, सहमति और भागीदारी से भी बनेगी।

शोधार्थियों के लिए

पूरक विस्तृत अध्याय और प्रमुख संस्थागत स्रोत

मंदसौर किसान आंदोलन—OCN शोधजून 2017 की किसान हड़ताल, पुलिस गोलीबारी, जैन आयोग, भावांतर और राष्ट्रीय किसान एकता का विस्तृत अध्याय।अध्ययन/स्रोत तक जाएँ ↗
महाराष्ट्र किसान लॉन्ग मार्च—OCN शोध2018 की नासिक–मुंबई पदयात्रा, वनाधिकार, कर्जमाफी, लिखित समझौते और बाद की लामबंदियों का स्वतंत्र अध्ययन।अध्ययन/स्रोत तक जाएँ ↗
कृषि कानून विरोधी किसान आंदोलन—OCN शोधतीन कृषि कानूनों, संयुक्त किसान मोर्चे, सरकार–किसान वार्ता, 26 जनवरी, लखीमपुर खीरी और कानून वापसी का विस्तृत अध्ययन।अध्ययन/स्रोत तक जाएँ ↗
एमएसपी और शंभू–खनौरी—OCN शोधदिल्ली चलो 2.0, शुभकरण सिंह, डल्लेवाल अनशन, वार्ता और वैधानिक मूल्य-अधिकार के प्रश्न का स्वतंत्र अध्याय।अध्ययन/स्रोत तक जाएँ ↗
सर्वोच्च न्यायालय का 12 जनवरी 2021 का आदेशतीन कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक और विशेषज्ञ समिति के गठन से संबंधित आधिकारिक न्यायालयी आदेश।अध्ययन/स्रोत तक जाएँ ↗

स्रोत-सावधानी: आंदोलन के दौरान मृत्यु, मुकदमों, संगठन-सदस्यता और आर्थिक प्रभाव से संबंधित संख्याएँ स्रोत, परिभाषा और समय-सीमा के अनुसार बदलती हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी के संभावित मॉडल भी एक जैसे नहीं हैं; सरकारी खरीद, निजी व्यापार के लिए मूल्य-तल, अंतर-भुगतान और चुनिंदा फसलों की गारंटी को अलग-अलग नीति-विकल्पों के रूप में पढ़ना चाहिए।