कृषि कानून विरोधी किसान आंदोलन (2020–2021)
तीन कृषि कानूनों से दिल्ली की सीमाओं, सरकार–किसान टकराव और कानून वापसी तक
5 जून 2020 के तीन अध्यादेशों से शुरू हुआ विवाद सितंबर में संसद से कानून पारित होने के बाद व्यापक किसान आंदोलन में बदल गया। पंजाब से आरंभ प्रतिरोध 26 नवंबर के ‘दिल्ली चलो’ अभियान के साथ सिंघु, टिकरी और गाजीपुर सीमाओं पर टिक गया। एक ओर सरकार इन कानूनों को बाजार-विकल्प, निजी निवेश और कृषि सुधार का रास्ता बताती रही; दूसरी ओर आंदोलनकारी किसान मंडी, सरकारी खरीद, न्यूनतम समर्थन मूल्य, संविदा खेती में असमान सौदेबाजी और कृषि पर राज्यों के अधिकार को लेकर आशंकित थे। ग्यारह दौर की वार्ता, सर्वोच्च न्यायालय की रोक, 26 जनवरी की हिंसा, गाजीपुर का पुनर्जीवन, मुजफ्फरनगर महापंचायत और लखीमपुर खीरी से गुजरते हुए आंदोलन अंततः 19 नवंबर की वापसी-घोषणा, संसद के निरसन अधिनियम और 9 दिसंबर 2021 के सरकारी पत्र के बाद स्थगित हुआ।
कृषि बाजार, हरित क्रांति और अध्यादेशों की पृष्ठभूमि
आंदोलन की गहरी पृष्ठभूमि : भारतीय कृषि में बाजार का प्रश्न
तीन कृषि कानून अचानक शून्य से पैदा नहीं हुए थे। भारत में कृषि विपणन सुधारों पर कई दशकों से चर्चा चल रही थी।
राज्यों ने कृषि उपज मंडी समितियों—एपीएमसी—के माध्यम से अधिसूचित कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री के लिए विनियमित बाजार बनाए थे। उद्देश्य किसान को स्थानीय साहूकार, व्यापारी और मनमानी खरीद व्यवस्था से कुछ संस्थागत सुरक्षा देना था।
समय के साथ इस व्यवस्था की अपनी समस्याएं सामने आईं। अनेक मंडियों में लाइसेंसधारी व्यापारियों की सीमित संख्या, कमीशन, मंडी शुल्क, राजनीतिक नियंत्रण और प्रतिस्पर्धा की कमी की शिकायतें थीं।
इसलिए बाजार सुधार का विचार केवल नरेंद्र मोदी सरकार का विचार नहीं था। केंद्र और राज्यों में विभिन्न सरकारें वर्षों से कृषि विपणन सुधारों पर विचार करती रही थीं। मॉडल एपीएमसी कानून, 2017 तथा मॉडल संविदा खेती कानून, 2018 जैसी पहलें पहले से मौजूद थीं। आवश्यक वस्तु कानून में सुधार की बहस भी पुरानी थी।
अर्थात 2020 का वास्तविक विवाद इस बात पर कम था कि कृषि बाजार में सुधार होना चाहिए या नहीं, और अधिक इस बात पर था कि सुधार किस तरीके से, किस संवैधानिक स्तर पर और किसान को किन कानूनी सुरक्षा उपायों के साथ किया जाए।
हरित क्रांति, पंजाब और हरियाणा : आंदोलन यहां इतना तीखा क्यों हुआ?
आंदोलन का प्रारंभिक केंद्र पंजाब बना और बाद में हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश उसका दूसरा बड़ा आधार बने। इसका आर्थिक कारण समझना आवश्यक है।
हरित क्रांति के बाद पंजाब और हरियाणा में गेहूं तथा धान की सरकारी खरीद का मजबूत तंत्र विकसित हुआ। एपीएमसी मंडियां, आढ़ती, भारतीय खाद्य निगम तथा एमएसपी पर सरकारी खरीद ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए।
इसलिए जब केंद्र ने मंडियों के बाहर कर-मुक्त कृषि व्यापार का समानांतर रास्ता बनाया, पंजाब के किसानों को आशंका हुई कि निजी व्यापार धीरे-धीरे मंडियों से बाहर चला जाएगा।
सरकार का तर्क ठीक उलटा था—एपीएमसी समाप्त नहीं हो रही; किसान को केवल एक अतिरिक्त विकल्प मिल रहा है।
यहीं से आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक बहस पैदा हुई
सरकार कह रही थी—विकल्प बढ़ रहा है। किसान कह रहे थे—संस्थागत सुरक्षा कमजोर हो सकती है।
एमएसपी : कानून में न खत्म हुई, फिर भी सबसे बड़ा मुद्दा क्यों बनी?
तीनों कानूनों में कहीं यह नहीं लिखा गया था कि न्यूनतम समर्थन मूल्य समाप्त कर दिया जाएगा। यह तथ्य महत्वपूर्ण है।
सरकार बार-बार कहती रही कि एमएसपी और सरकारी खरीद जारी रहेंगी। 5 दिसंबर की वार्ता में भी सरकार ने किसानों को आश्वस्त किया कि एपीएमसी व्यवस्था कमजोर नहीं की जाएगी और एमएसपी जारी रहेगी।
लेकिन किसान संगठनों की चिंता दूसरी थी।
यदि मंडी के बाहर व्यापार बढ़ता गया, एपीएमसी का कारोबार कम हुआ, राज्यों की मंडी आय घटी और निजी खरीद मुख्य माध्यम बन गई तो भविष्य में सरकारी खरीद व्यवस्था की व्यावहारिक ताकत क्या रहेगी?
यही कारण था कि आंदोलन धीरे-धीरे केवल तीन कानूनों की वापसी से आगे बढ़कर एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाने की मांग से जुड़ गया।
कोविड-19, आत्मनिर्भर भारत और 5 जून 2020 के अध्यादेश
2020 में कोविड महामारी और देशव्यापी लॉकडाउन के बीच केंद्र सरकार ने कृषि क्षेत्र में व्यापक बाजार सुधारों को आगे बढ़ाया।
सरकार के अनुसार महामारी के दौरान मंडियों और आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान ने खेत के निकट प्रत्यक्ष बिक्री और वैकल्पिक बाजारों की आवश्यकता को स्पष्ट किया था।
5 जून 2020 को तीन अध्यादेश जारी हुए। सरकार ने बाद में संसद में बताया कि 21 मई 2020 को राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के अधिकारियों से वीडियो सम्मेलन द्वारा चर्चा हुई थी तथा मंत्रालयों, नीति आयोग आदि से भी टिप्पणियां मांगी गई थीं।
आलोचकों का तर्क था कि इतने व्यापक कृषि सुधारों पर किसान संगठनों, राज्य विधानसभाओं और सार्वजनिक स्तर पर पर्याप्त पूर्व-विमर्श नहीं हुआ।
इस प्रकार परामर्श हुआ था या नहीं और परामर्श पर्याप्त तथा प्रतिनिधिक था या नहीं—ये दो अलग प्रश्न थे।
तीन कृषि कानून : प्रावधान, सरकारी तर्क और किसान आशंकाएं
पहला कानून : कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य कानून
कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020 का घोषित उद्देश्य किसानों और व्यापारियों को कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री में अधिक विकल्प देना तथा राज्य एपीएमसी मंडियों के भौतिक परिसरों से बाहर अंतरराज्यीय और राज्य के भीतर व्यापार को सुगम बनाना था।
इसके अंतर्गत खेत के द्वार, गोदाम, शीतगृह, साइलो आदि स्थानों पर व्यापार संभव बनाया गया।
राज्य सरकारें ऐसे बाहरी व्यापार क्षेत्र में मंडी शुल्क या उपकर नहीं लगा सकती थीं।
सरकार का पक्ष
किसान अपनी उपज किसी भी खरीदार को बेच सकता था; मंडी की भौगोलिक बाध्यता कम होती; राज्यों के बीच व्यापार बढ़ता; प्रतिस्पर्धा बढ़ती; बिचौलियों पर निर्भरता घट सकती थी; और किसान बेहतर कीमत तलाश सकता था।
आंदोलनकारी किसानों की आपत्ति
किसानों का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न था कि यदि एपीएमसी मंडी के अंदर व्यापार पर शुल्क लगे और बाहर व्यापार कर-मुक्त हो तो निजी खरीदार स्वाभाविक रूप से बाहर जाएंगे।
यदि इससे मंडी कारोबार लगातार घटा तो एपीएमसी संस्थागत रूप से कमजोर हो सकती है।
अर्थात कानून ने मंडी समाप्त नहीं की थी, लेकिन किसानों का भय मंडी के क्रमिक क्षरण का था।
यह अंतर पूरे विवाद को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
दूसरा कानून : संविदा खेती और मूल्य आश्वासन
दूसरा कानून था कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम, 2020।
इसने किसान और खरीदार या प्रायोजक के बीच फसल उत्पादन से पहले कृषि समझौते की कानूनी रूपरेखा बनाई।
समझौते में मूल्य निर्धारित किया जा सकता था। परिवर्तनीय मूल्य होने पर न्यूनतम गारंटी मूल्य तथा अतिरिक्त भुगतान निर्धारित करने का स्पष्ट तरीका देना था। विवादों के लिए सुलह बोर्ड, उपखंड मजिस्ट्रेट और अपीलीय प्राधिकारी की व्यवस्था थी। किसान की कृषि भूमि को बकाया वसूली के लिए निशाना बनाने पर सुरक्षा भी दी गई थी।
सरकार का तर्क
इससे किसान को फसल बोने से पहले मूल्य की जानकारी मिल सकती थी, कृषि-व्यवसाय से सीधा संपर्क बन सकता था, आधुनिक तकनीक और निवेश आ सकता था तथा बाजार जोखिम कम किया जा सकता था।
विरोध का तर्क
किसान संगठनों का कहना था कि कागज पर किसान और कंपनी समान संविदात्मक पक्ष हो सकते हैं, लेकिन आर्थिक शक्ति में दोनों समान नहीं हैं।
एक छोटे किसान के सामने बड़ी कृषि कंपनी के पास कानूनी विशेषज्ञता, पूंजी, बाजार सूचना और सौदेबाजी क्षमता कहीं अधिक होगी।
नागरिक अदालत के बजाय प्रशासनिक विवाद-निपटारा व्यवस्था पर भी आपत्ति हुई।
तीसरा कानून : आवश्यक वस्तु अधिनियम संशोधन
तीसरा कानून आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में संशोधन था।
इसका उद्देश्य अनाज, दलहन, आलू, प्याज, खाद्य तेल आदि कृषि खाद्य वस्तुओं पर भंडारण नियंत्रण को असाधारण परिस्थितियों—जैसे युद्ध, अकाल, असाधारण मूल्यवृद्धि—तक सीमित करना था।
सरकार का तर्क
कठोर भंडारण प्रतिबंध निजी कंपनियों को शीतगृह, गोदाम, खाद्य प्रसंस्करण और आपूर्ति शृंखला में बड़े निवेश से रोकते हैं।
निवेश बढ़ेगा तो फसल-पश्चात नुकसान घटेगा और किसान को बेहतर बाजार मिलेगा।
आलोचना
आंदोलनकारी पक्ष को आशंका थी कि बड़े कारोबारी विशाल मात्रा में कृषि उपज जमा कर सकेंगे और बाजार शक्ति का केंद्रीकरण होगा।
इसलिए यहां भी मूल विवाद था—निवेश को प्रोत्साहन बनाम बाजार शक्ति के केंद्रीकरण का जोखिम।
संसद, राजनीतिक दरार और पंजाब से दिल्ली चलो
अध्यादेश से संसद तक
सितंबर 2020 के मानसून सत्र में सरकार तीनों अध्यादेशों को विधेयकों के रूप में संसद में लाई।
14 सितंबर को विधेयक प्रस्तुत हुए। प्रमुख कृषि विधेयक 17 सितंबर को लोकसभा से और 20 सितंबर को राज्यसभा से पारित हुए। संविदा खेती विधेयक के विधायी क्रम की पुष्टि संसदीय रिकॉर्ड भी करता है।
राज्यसभा में पारित करने की प्रक्रिया स्वयं बड़ा राजनीतिक विवाद बन गई।
विपक्ष ने मत-विभाजन की मांग और ध्वनि मत से विधेयक पारित किए जाने की प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति की। सदन में अभूतपूर्व हंगामा हुआ।
इस विवाद ने कानूनों की वैधानिकता से अलग उनकी राजनीतिक वैधता और संसदीय प्रक्रिया का प्रश्न खड़ा कर दिया।
हरसिमरत कौर बादल का इस्तीफा और एनडीए में दरार
17 सितंबर 2020 को शिरोमणि अकाली दल की नेता और केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने कृषि विधेयकों के विरोध में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।
यह प्रतीकात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि अकाली दल भाजपा का सबसे पुराना सहयोगी था और पंजाब की किसान राजनीति से उसका ऐतिहासिक संबंध था।
26 सितंबर को शिरोमणि अकाली दल ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन—एनडीए—छोड़ दिया।
इस बिंदु तक कृषि कानून केवल नीति विवाद नहीं रहे; उन्होंने सत्तारूढ़ गठबंधन की संरचना को भी प्रभावित कर दिया था।
पंजाब से आंदोलन का विस्फोट
पंजाब के अनेक किसान संगठनों ने जून 2020 से ही अध्यादेशों का विरोध शुरू कर दिया था।
सितंबर के बाद विरोध तेज हुआ। रेल रोको, धरने, टोल प्लाजा आंदोलन, कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों के बाहर प्रदर्शन और राजनीतिक नेताओं के घेराव जैसे कार्यक्रम हुए।
पंजाब के किसान संगठनों की विशेषता यह थी कि उनमें अनेक वैचारिक धाराएं थीं—वामपंथी, गैर-दलीय, क्षेत्रीय और विभिन्न किसान यूनियन परंपराएं।
बाद में यही विविधता राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त किसान मोर्चा के रूप में दिखाई दी।
संयुक्त किसान मोर्चा : आंदोलन का संगठनात्मक चमत्कार
2020 के आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में एक थी अनेक किसान संगठनों का साझा मंच—संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम)।
इसमें पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा देश के अन्य हिस्सों के अनेक संगठन जुड़े।
इसके प्रमुख सार्वजनिक चेहरों में बलबीर सिंह राजेवाल, दर्शन पाल, जगजीत सिंह डल्लेवाल, जोगिंदर सिंह उगराहां, गुरनाम सिंह चढूनी, राकेश टिकैत, युद्धवीर सिंह, हन्नान मोल्ला, शिवकुमार कक्का आदि अलग-अलग चरणों में दिखाई दिए।
लेकिन आंदोलन को किसी एक “सर्वोच्च नेता” ने नियंत्रित नहीं किया।
यही उसकी शक्ति और सीमा दोनों थी।
26 नवंबर 2020 : दिल्ली चलो
किसान संगठनों ने 26 नवंबर को “दिल्ली चलो” का आह्वान किया।
पंजाब और हरियाणा से हजारों किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में दिल्ली की ओर बढ़े।
हरियाणा में पुलिस ने अनेक स्थानों पर बैरिकेड, अवरोध और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। किसानों ने कई अवरोध पार किए।
दिल्ली में प्रवेश के बजाय बड़ी संख्या में किसान राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं पर रुक गए।
यहीं से अस्थायी धरना एक लंबे आंदोलन में बदल गया।
दिल्ली की सीमाएं, मांगें और कानून-समर्थक पक्ष
सिंघु, टिकरी और गाजीपुर : सीमाएं बनीं किसान नगर
सिंघु सीमा मुख्य आंदोलन स्थल बनी। टिकरी पर पंजाब-हरियाणा के किसान बड़ी संख्या में डटे। गाजीपुर सीमा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति का केंद्र बनी।
ट्रैक्टर-ट्रॉलियां अस्थायी घर बन गईं।
लंगर चले। चिकित्सा शिविर बने। पुस्तकालय स्थापित हुए। कपड़े धोने, स्नान, भोजन, मोबाइल चार्जिंग और अन्य दैनिक आवश्यकताओं के सामुदायिक इंतजाम विकसित हुए।
इस दृष्टि से किसान आंदोलन केवल धरना नहीं था; उसने लगभग एक वर्ष तक वैकल्पिक सामुदायिक जीवन का सार्वजनिक क्षेत्र निर्मित किया।
आंदोलन की मुख्य मांगें
तीनों कृषि कानूनों की पूर्ण वापसी।
इसके साथ एमएसपी को कानूनी गारंटी देने की मांग प्रमुख होती गई।
बिजली संशोधन विधेयक के प्रावधानों पर चिंता और पराली जलाने से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों से किसानों को बाहर रखने की मांग भी वार्ता का हिस्सा बनी।
30 दिसंबर की छठी वार्ता में कुछ गौण मुद्दों पर प्रगति हुई, जबकि तीन कानून और एमएसपी मुख्य गतिरोध बने रहे। सरकार ने एमएसपी तथा मंडी व्यवस्था जारी रहने का आश्वासन दिया और एमएसपी कानून संबंधी मांग को समिति के समक्ष रखने की बात कही।
सरकार का पक्ष : कृषि में 1991 जैसा सुधार?
मोदी सरकार कानूनों को कृषि क्षेत्र के बड़े संरचनात्मक सुधार के रूप में प्रस्तुत कर रही थी।
सरकार का कहना था कि भारत का किसान लंबे समय से नियंत्रित बाजार संरचना में बंधा है। जब उद्योग और सेवाओं को राष्ट्रीय बाजार उपलब्ध है तो किसान को अपनी उपज कहीं भी बेचने की स्वतंत्रता क्यों न हो?
सरकार ने यह भी कहा कि एपीएमसी समाप्त नहीं हो रही, एमएसपी जारी रहेगी और किसान की जमीन पर किसी कंपनी का अधिकार नहीं होगा।
कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और पीयूष गोयल ने दिसंबर 2020 में सार्वजनिक रूप से कहा कि एमएसपी और एपीएमसी बने रहेंगे।
सरकार समर्थक अर्थशास्त्रियों का तर्क था कि कृषि में निजी निवेश, आपूर्ति शृंखला और बाजार प्रतिस्पर्धा के बिना किसानों की आय में दीर्घकालीन वृद्धि कठिन है।
कानून समर्थक किसान संगठन भी थे
यह तथ्य आंदोलन के संतुलित इतिहास में अवश्य शामिल होना चाहिए कि सभी किसान संगठन तीनों कानूनों के विरोध में नहीं थे।
15 दिसंबर 2020 को भारतीय किसान यूनियन (किसान) के प्रतिनिधियों ने कृषि मंत्री से मुलाकात करके कानूनों का समर्थन किया, हालांकि उन्होंने सुधारों और एमएसपी सहित कुछ सुझाव भी दिए।
बाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति ने जिन 73 किसान संगठनों से सीधे बातचीत की, उनमें से उसकी रिपोर्ट के अनुसार 61 संगठनों—जिन्होंने लगभग 3.3 करोड़ किसानों का प्रतिनिधित्व करने का दावा किया—ने कानूनों का पूर्ण समर्थन किया; चार संगठनों ने विरोध और सात ने संशोधनों सहित समर्थन किया।
लेकिन इस आंकड़े की सीमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आंदोलनकारी संगठनों ने समिति की प्रक्रिया में भाग नहीं लिया और समिति ने आमंत्रित 266 संगठनों में केवल 73 से प्रत्यक्ष संवाद किया। इसलिए 85.7 प्रतिशत को समस्त भारतीय किसानों का जनमत मानना सांख्यिकीय रूप से उचित नहीं है।
यही तथ्य इस विवाद की वास्तविक जटिलता दिखाता है।
सरकार–किसान वार्ता, सर्वोच्च न्यायालय और स्थगन प्रस्ताव
सरकार–किसान वार्ता : समाधान की लंबी कोशिश
सरकार और आंदोलनकारी किसान संगठनों के बीच अनेक दौर की बातचीत हुई।
1 दिसंबर को केंद्र ने पंजाब के किसान प्रतिनिधियों से बातचीत की। सरकार ने विशेषज्ञ समिति का प्रस्ताव रखा।
3 दिसंबर की बैठक में लगभग 40 किसान संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
5 दिसंबर की पांचवीं बैठक में गतिरोध बना रहा।
इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने किसान नेताओं से मुलाकात की।
9 दिसंबर को सरकार ने लिखित संशोधन प्रस्ताव भेजा।
किसान संगठनों ने इसे अस्वीकार कर दिया क्योंकि उनका आग्रह संशोधन नहीं, निरसन था।
30 दिसंबर : पहली वास्तविक प्रगति
छठे दौर की वार्ता 30 दिसंबर को हुई।
कुछ मुद्दों पर सहमति की दिशा बनी—विशेषकर पराली तथा प्रस्तावित बिजली कानून से संबंधित चिंताओं पर।
लेकिन दो केंद्रीय प्रश्न वहीं रहे
तीनों कानूनों की वापसी। एमएसपी की कानूनी गारंटी।
इसके बाद 4 जनवरी की सातवीं बैठक भी निर्णायक नहीं हुई।
8 जनवरी की आठवीं बैठक में सरकार ने फिर संशोधन पर बिंदुवार चर्चा का आग्रह किया, जबकि किसान संगठन निरसन की मांग पर कायम रहे।
सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप
12 जनवरी 2021 को सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों कानूनों के क्रियान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगा दी और विशेषज्ञ समिति गठित की।
समिति में प्रारंभतः भूपिंदर सिंह मान, अशोक गुलाटी, प्रमोद कुमार जोशी और अनिल घनवट थे। बाद में भूपिंदर सिंह मान अलग हो गए।
आंदोलनकारी किसान संगठनों ने समिति के सामने जाने से इनकार किया। उनका तर्क था कि समिति के सदस्यों के कानूनों पर पहले व्यक्त विचारों के कारण उन्हें निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं माना जा सकता।
समिति ने मार्च 2021 में अपनी रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी। रिपोर्ट बाद में सार्वजनिक हुई और उसने कानूनों को पूर्णतः निरस्त करने का समर्थन नहीं किया।
यह प्रकरण एक और प्रश्न छोड़ गया—नीति विवाद में न्यायपालिका की मध्यस्थ भूमिका कितनी दूर तक होनी चाहिए?
सरकार का सबसे बड़ा समझौता प्रस्ताव
20 जनवरी 2021 की दसवीं बैठक में केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण प्रस्ताव दिया
कानूनों का क्रियान्वयन एक से डेढ़ वर्ष तक स्थगित रखा जाए और इस दौरान सरकार तथा किसान संगठनों की संयुक्त समिति समाधान खोजे।
यह सरकार की प्रारंभिक स्थिति से काफी पीछे हटना था।
लेकिन किसान संगठनों ने प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।
उनका तर्क था कि अस्थायी स्थगन के बाद कानून पुनः लागू हो सकते हैं; इसलिए समाधान केवल निरसन है।
22 जनवरी को ग्यारहवीं वार्ता हुई और गतिरोध कायम रहा।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार कुल 11 दौर की बातचीत हुई।
26 जनवरी, लाल किला और गाजीपुर का पुनर्जीवन
26 जनवरी 2021 : ट्रैक्टर परेड
गणतंत्र दिवस पर किसान संगठनों को निर्धारित मार्गों पर ट्रैक्टर परेड की अनुमति मिली।
लेकिन 26 जनवरी को कुछ समूह निर्धारित मार्ग और समय व्यवस्था से अलग होकर मध्य दिल्ली की ओर बढ़ गए।
अनेक स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों में टकराव हुआ।
कुछ प्रदर्शनकारी लाल किले तक पहुंच गए। वहां धार्मिक/किसान ध्वज लगाए जाने की घटना राष्ट्रीय विवाद बन गई।
आंदोलन के मुख्य नेतृत्व ने हिंसा और निर्धारित मार्ग से विचलन से स्वयं को अलग किया।
लेकिन राजनीतिक और जनमत स्तर पर यह आंदोलन के लिए सबसे गंभीर संकट था।
लाल किला : आंदोलन का निर्णायक नैरेटिव युद्ध
26 जनवरी से पहले आंदोलन की प्रमुख सार्वजनिक छवि शांतिपूर्ण धरने की थी।
लाल किले की घटना ने सरकार समर्थक राजनीतिक विमर्श को यह कहने का अवसर दिया कि आंदोलन उग्र और कानून-विरोधी तत्वों के नियंत्रण में जा रहा है।
दूसरी ओर किसान नेतृत्व ने कहा कि कुछ समूहों की गतिविधियों के आधार पर लाखों शांतिपूर्ण किसानों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इस घटना को लेकर साजिश, घुसपैठ और राजनीतिक मिलीभगत के अनेक आरोप लगाए गए, लेकिन इतिहास लेखन में प्रमाणित तथ्य और राजनीतिक आरोप अलग रखने चाहिए।
गाजीपुर : राकेश टिकैत और आंदोलन का पुनर्जीवन
26 जनवरी के बाद ऐसा लगा कि आंदोलन कमजोर हो सकता है।
28 जनवरी को गाजीपुर सीमा पर पुलिस की बढ़ती मौजूदगी और धरना हटाए जाने की आशंका के बीच भारतीय किसान यूनियन नेता राकेश टिकैत का भावुक संबोधन सामने आया।
उनकी आंखों में आंसू वाली तस्वीरें और वीडियो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तेजी से फैले।
रातोंरात बड़ी संख्या में किसान गाजीपुर की ओर बढ़े।
मुजफ्फरनगर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विशाल किसान महापंचायतें शुरू हुईं।
इस प्रकार जिस 26 जनवरी ने आंदोलन को लगभग संकट में डाल दिया था, उसके केवल दो दिन बाद गाजीपुर ने उसे नई ऊर्जा दे दी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सामाजिक समीकरण
इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिखाई दिया।
2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाट और मुस्लिम समुदायों के बीच गहरी राजनीतिक दूरी पैदा हुई थी।
किसान आंदोलन और महापंचायतों ने कम से कम कृषि राजनीति के स्तर पर दोनों समुदायों को फिर एक साझा मंच पर आने का अवसर दिया।
“अल्लाहु अकबर” और “हर हर महादेव” जैसे पुराने किसान यूनियन नारों की संयुक्त वापसी को भी इसी सामाजिक मेल-मिलाप के प्रतीक के रूप में देखा गया।
हालांकि इसे स्थायी सामाजिक पुनर्गठन मानना अतिशयोक्ति होगा।
महिलाएं, खेत मजदूर, क्षेत्रीय विस्तार और संचार-युद्ध
महिलाएं : आंदोलन का अनिवार्य लेकिन लंबे समय से अदृश्य पक्ष
कृषि में महिलाओं की भारी श्रम भागीदारी के बावजूद भूमि स्वामित्व और औपचारिक “किसान” पहचान प्रायः पुरुषों से जुड़ी रही है।
दिल्ली सीमा आंदोलन ने महिला किसान की पहचान को राष्ट्रीय दृश्यता दी।
पंजाब और हरियाणा से बड़ी संख्या में महिलाएं सीमाओं पर पहुंचीं। टिकरी विशेष रूप से महिला भागीदारी का महत्वपूर्ण केंद्र बना।
महिलाओं ने मंच संचालन, लंगर, सभाओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और राजनीतिक भाषणों में भाग लिया।
यह केवल पुरुष किसानों के आंदोलन में महिलाओं की “सहायक भूमिका” नहीं थी; यह ग्रामीण महिला की किसान के रूप में राजनीतिक दृश्यता का महत्वपूर्ण क्षण था।
खेत मजदूर, दलित और छोटे किसान
आंदोलन पर एक आलोचना यह रही कि उसकी सार्वजनिक छवि मुख्यतः पंजाब-हरियाणा के अपेक्षाकृत संपन्न जाट/जट्ट किसानों की रही।
इसमें कुछ वास्तविकता थी—आंदोलन का मुख्य भौगोलिक आधार उन्हीं क्षेत्रों में था जहां एमएसपी पर सरकारी खरीद अधिक मजबूत थी।
लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना भी गलत होगा कि आंदोलन केवल बड़े किसानों का था।
पंजाब के अनेक खेत मजदूर संगठनों, छोटे किसानों और ग्रामीण श्रमिकों ने इसमें भाग लिया।
फिर भी भूमिहीन कृषि मजदूर की मजदूरी, भूमि पुनर्वितरण और दलित कृषि श्रमिकों के विशिष्ट प्रश्न आंदोलन के केंद्रीय एजेंडे में एमएसपी जितनी जगह नहीं बना सके।
यह आंदोलन की महत्वपूर्ण सीमा थी।
आंदोलन पूरे भारत में समान क्यों नहीं फैला?
महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, राजस्थान, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में समर्थन कार्यक्रम हुए, लेकिन दिल्ली सीमाओं का आंदोलन मुख्यतः पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश केंद्रित रहा।
कारणों में कृषि संरचना का अंतर महत्वपूर्ण था।
जिन क्षेत्रों में सरकारी खरीद और एपीएमसी नेटवर्क का आर्थिक महत्व अधिक था, वहां कानूनों को लेकर आशंका भी अधिक तीखी थी।
इससे सरकार को यह तर्क देने का अवसर मिला कि आंदोलन पूरे भारत के किसानों का सर्वसम्मत आंदोलन नहीं है।
आंदोलनकारियों का उत्तर था कि किसी आंदोलन की वैधता इस पर निर्भर नहीं कि देश का प्रत्येक किसान धरने पर बैठे।
दोनों पक्षों की इस बहस को दर्ज करना आवश्यक है।
मीडिया युद्ध और “खालिस्तानी” आरोप
आंदोलन के दौरान सूचना का एक समानांतर युद्ध चला।
कुछ राजनीतिक समर्थकों और मीडिया मंचों पर प्रदर्शनकारियों को “खालिस्तानी”, “देशविरोधी”, “बिचौलिया समर्थक” या विपक्ष से प्रेरित बताने की कोशिश हुई।
किसान संगठनों ने इन आरोपों को आंदोलन को बदनाम करने का प्रयास बताया।
सिख धार्मिक प्रतीकों की मजबूत उपस्थिति को अलगाववाद से जोड़ना विशेष रूप से विवादास्पद रहा।
यहां सावधानी आवश्यक है: किसी व्यक्तिगत व्यक्ति या छोटे समूह की विचारधारा के आधार पर संपूर्ण आंदोलन की वैचारिक पहचान निर्धारित नहीं की जा सकती।
सोशल मीडिया, अंतरराष्ट्रीय हस्तियां और भारत सरकार
फरवरी 2021 में अंतरराष्ट्रीय हस्तियों द्वारा किसान आंदोलन पर टिप्पणियों के बाद विवाद वैश्विक स्तर पर पहुंचा।
इससे भारतीय विदेश नीति और घरेलू राजनीतिक संप्रभुता का प्रश्न भी जुड़ गया।
सरकार ने बाहरी टिप्पणियों को भारत की जटिल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पर्याप्त संदर्भ के बिना देखने वाला बताया।
आंदोलन समर्थकों ने इसे अंतरराष्ट्रीय नागरिक समाज की एकजुटता कहा।
इस प्रकार किसान आंदोलन डिजिटल वैश्वीकरण के दौर में भारत का पहला ऐसा विशाल किसान संघर्ष भी बना जिसकी सूचना-राजनीति वास्तविक धरना स्थलों जितनी ही महत्वपूर्ण थी।
“टूलकिट” विवाद
पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग द्वारा साझा किए गए एक दस्तावेज—जिसे “टूलकिट” कहा गया—को लेकर बड़ा विवाद हुआ।
दिल्ली पुलिस ने जांच की और दिशा रवि सहित कुछ कार्यकर्ताओं के विरुद्ध कार्रवाई हुई।
समर्थकों ने इसे अंतरराष्ट्रीय प्रचार समन्वय का प्रमाण बताया; आलोचकों ने कहा कि सामाजिक आंदोलनों में डिजिटल अभियान की योजना सामान्य बात है और इसे षड्यंत्र का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
यह प्रकरण आंदोलन, डिजिटल सक्रियता, राजद्रोह संबंधी आरोपों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बहस से जुड़ गया।
महामारी, महापंचायत, लखीमपुर खीरी और आंतरिक मतभेद
कोविड की दूसरी लहर और आंदोलन
अप्रैल–मई 2021 में भारत कोविड-19 की विनाशकारी दूसरी लहर से गुजरा।
दिल्ली सीमाओं पर आंदोलन जारी रहा।
सरकार और आलोचकों ने भीड़ से संक्रमण फैलने की चिंता उठाई।
किसान संगठनों ने स्वास्थ्य सावधानियां, चिकित्सा शिविर और टीकाकरण आदि व्यवस्थाएं करने की कोशिश की।
फिर भी महामारी के बीच बड़े सार्वजनिक जमावड़े का जोखिम वास्तविक था और इसे आंदोलन के इतिहास में अनदेखा नहीं किया जा सकता।
आंदोलन का लंबा मध्य चरण
फरवरी से सितंबर 2021 के बीच आंदोलन समाचारों में कभी-कभी अपेक्षाकृत पीछे चला गया, लेकिन समाप्त नहीं हुआ।
देश के विभिन्न हिस्सों में महापंचायतें, रेल रोको, बंद, टोल मुक्त अभियान और राजनीतिक कार्यक्रम चलते रहे।
आंदोलन की असली संगठनात्मक शक्ति यही थी—क्षणिक विशाल भीड़ नहीं, बल्कि महीनों तक स्थायी उपस्थिति बनाए रखना।
5 सितंबर 2021 : मुजफ्फरनगर महापंचायत
मुजफ्फरनगर की विशाल किसान महापंचायत ने स्पष्ट किया कि आंदोलन अभी कमजोर नहीं पड़ा है।
यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान लामबंदी का महत्वपूर्ण प्रदर्शन था।
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक थे। संयुक्त किसान मोर्चा ने भाजपा विरोधी अभियान चलाया, हालांकि उसने स्वयं चुनाव लड़ने का निर्णय नहीं लिया।
इससे आंदोलन और चुनावी राजनीति के बीच एक जटिल संबंध बना—आंदोलन स्वयं को गैर-दलीय कहता रहा, लेकिन उसके राजनीतिक परिणाम स्पष्ट थे।
लखीमपुर खीरी : 3 अक्टूबर 2021
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में 3 अक्टूबर 2021 को आंदोलन का सबसे गंभीर हिंसक अध्याय सामने आया।
किसानों के प्रदर्शन के दौरान वाहनों ने प्रदर्शनकारियों को कुचला। इसके बाद हिंसा हुई। किसानों सहित कुल आठ लोगों की मृत्यु हुई।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के पुत्र आशीष मिश्र का नाम मामले में आया और उनकी गिरफ्तारी हुई।
इस घटना ने आंदोलन को फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया।
किसान संगठनों ने इसे सत्ता के अहंकार और आंदोलनकारियों के प्रति शत्रुतापूर्ण वातावरण का प्रमाण बताया।
मामला न्यायिक प्रक्रिया में गया; इसलिए किसी आरोपी की अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी को न्यायालय के अंतिम निर्णय से अलग करके इतिहास में घोषित करना उचित नहीं है।
आंदोलन में मौतें : सबसे संवेदनशील और विवादित आंकड़ा
लगभग एक वर्ष के आंदोलन में किसानों की मौतों का प्रश्न अत्यंत संवेदनशील रहा।
संयुक्त किसान मोर्चा ने नवंबर–दिसंबर 2021 तक 670 से अधिक, बाद में लगभग 700 आंदोलनकारियों की मृत्यु का दावा किया।
दूसरी ओर केंद्र सरकार ने संसद में कहा कि कृषि मंत्रालय के पास आंदोलन में मारे गए किसानों का ऐसा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, इसलिए केंद्रीय मुआवजे का प्रश्न उस रिकॉर्ड के आधार पर नहीं उठता।
पंजाब सरकार के पास सत्यापित मामलों का अपना डेटा था; जुलाई 2021 तक 220 किसान/खेत मजदूर मौतों के मामलों के सत्यापन की रिपोर्ट सामने आई थी।
इसलिए इतिहास में “700 किसान मारे गए” को निर्विवाद सरकारी तथ्य की तरह लिखना भी उचित नहीं और “कोई मृत्यु नहीं हुई” कहना भी तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
सही प्रस्तुति यही है कि विभिन्न स्रोतों के आंकड़े अलग-अलग थे और उनकी गणना-पद्धति समान नहीं थी।
किसान आंदोलन और विपक्ष
कांग्रेस, वामपंथी दल, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल तथा कई विपक्षी दलों ने आंदोलन की मांगों का समर्थन किया।
पंजाब में कांग्रेस सरकार भी कानूनों के विरुद्ध थी।
लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा ने औपचारिक रूप से आंदोलन का नियंत्रण राजनीतिक दलों को नहीं दिया।
राजनीतिक नेताओं को कई धरना मंचों पर प्रमुख स्थान देने से भी परहेज किया गया।
यह रणनीति महत्वपूर्ण थी। इससे आंदोलन स्वयं को किसान बनाम सरकार के रूप में प्रस्तुत कर सका, न कि केवल विपक्ष बनाम भाजपा के रूप में।
फिर भी विपक्ष ने आंदोलन से राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की—यह भी उतना ही स्पष्ट है।
किसान संगठनों के भीतर मतभेद
इतना बड़ा गठबंधन पूरी तरह एकमत नहीं था।
रणनीति, वार्ता, 26 जनवरी की परेड, चुनावी राजनीति और आंदोलन की भविष्य दिशा को लेकर मतभेद रहे।
कुछ संगठन अधिक आक्रामक रणनीति चाहते थे; कुछ बातचीत पर जोर देते थे।
लेकिन तीन केंद्रीय मांगों—कानून वापसी, एमएसपी और किसान हितों की सुरक्षा—ने उन्हें लंबे समय तक साथ रखा।
यही विकेंद्रीकृत नेतृत्व आंदोलन की उल्लेखनीय संगठनात्मक उपलब्धि थी।
कानून वापसी से 9 दिसंबर के समझौते तक
19 नवंबर 2021 : वह सुबह जिसने संघर्ष की दिशा बदल दी
गुरु नानक जयंती के दिन 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया।
उन्होंने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की।
प्रधानमंत्री ने कहा कि कानून छोटे किसानों के हित में, कृषि क्षेत्र के भविष्य और गांव-गरीब की भलाई की भावना से लाए गए थे, लेकिन सरकार किसानों के एक वर्ग को उनके लाभ समझाने में सफल नहीं हुई। उन्होंने आगामी संसद सत्र में निरसन की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करने की घोषणा की।
यह मोदी सरकार के लिए असाधारण राजनीतिक निर्णय था।
2014 के बाद केंद्र सरकार द्वारा संसद से पारित इतने महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार को जन आंदोलन के बाद पूर्णतः वापस लेना अभूतपूर्व था।
सरकार पीछे क्यों हटी?
इसका कोई एक कारण प्रमाणित नहीं किया जा सकता।
कई कारक एक साथ काम कर रहे थे।
एक वर्ष बाद भी आंदोलन समाप्त नहीं हुआ था।
पंजाब में भाजपा राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ रही थी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान असंतोष राजनीतिक जोखिम बन रहा था।
उत्तर प्रदेश और पंजाब में 2022 विधानसभा चुनाव निकट थे।
लखीमपुर खीरी ने तनाव बढ़ाया।
कानून सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के कारण व्यवहारतः लागू भी नहीं हो रहे थे।
सरकार ने स्वयं इसे किसानों के एक वर्ग को समझाने में असफलता और राष्ट्रीय हित में नई शुरुआत के रूप में प्रस्तुत किया।
इसलिए “सरकार केवल चुनाव के कारण झुकी” या “केवल संवाद के कारण निर्णय हुआ”—दोनों एकांगी व्याख्याएं होंगी।
29–30 नवंबर : संसद ने कानून समाप्त किए
29 नवंबर 2021 को कृषि विधि निरसन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत हुआ और उसी दिन लोकसभा तथा राज्यसभा से पारित हो गया।
30 नवंबर को राष्ट्रपति की स्वीकृति के साथ कृषि विधि निरसन अधिनियम, 2021 अस्तित्व में आया।
इसने 2020 के तीनों कानूनों को औपचारिक रूप से निरस्त कर दिया।
विपक्ष ने निरसन विधेयक पर विस्तृत चर्चा की मांग की थी। सरकार ने शीघ्र पारित कराया।
विडंबना यह थी कि जिस तेजी और विवाद के साथ कानून बने थे, लगभग उसी तेजी से वे निरस्त भी हुए।
कानून वापस, लेकिन आंदोलन तुरंत समाप्त नहीं
प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद भी किसान सीमाओं से तुरंत नहीं लौटे।
संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा कि केवल कानून वापसी पर्याप्त नहीं है।
एमएसपी की कानूनी गारंटी; आंदोलन के दौरान दर्ज मुकदमों की वापसी; मृत किसानों के परिवारों को मुआवजा; बिजली कानून संबंधी आशंकाएं; पराली संबंधी प्रावधान; और लखीमपुर खीरी मामले में न्याय।
इससे आंदोलन ने दिखाया कि नवंबर 2021 तक उसका एजेंडा तीन कानूनों से आगे बढ़ चुका था।
9 दिसंबर का समझौता और आंदोलन स्थगित
केंद्र सरकार और संयुक्त किसान मोर्चा के बीच लंबी बातचीत के बाद दिसंबर 2021 में लंबित मांगों पर आश्वासन का ढांचा तैयार हुआ।
एमएसपी पर समिति बनाने, आंदोलन से जुड़े मामलों की वापसी की प्रक्रिया और अन्य मुद्दों पर सरकार की ओर से आश्वासन मिलने के बाद 9 दिसंबर को संयुक्त किसान मोर्चा ने आंदोलन स्थगित करने की घोषणा की।
11 दिसंबर से किसानों की दिल्ली सीमाओं से वापसी शुरू हुई।
“समाप्त” के बजाय “स्थगित” शब्द जानबूझकर चुना गया था।
किसान नेतृत्व संकेत दे रहा था कि आश्वासन पूरे न हुए तो आंदोलन वापस आ सकता है।
सफलता, सुधार-विवाद, संघवाद और आंदोलन की सीमाएं
क्या आंदोलन पूरी तरह सफल था?
यदि आंदोलन का प्राथमिक लक्ष्य पूछा जाए तो उत्तर स्पष्ट है
हां—तीनों कानून वापस कराना उसकी ऐतिहासिक विजय थी।
भारत की संसद द्वारा पारित तीन कानूनों को एक वर्ष के जन आंदोलन के बाद वापस कराया गया।
लेकिन यदि व्यापक किसान एजेंडा देखा जाए तो सफलता अधूरी थी।
एमएसपी कानूनी अधिकार नहीं बनी।
कृषि आय का संकट समाप्त नहीं हुआ।
छोटे किसान की बाजार शक्ति नहीं बदली।
कृषि ऋण का प्रश्न बना रहा।
फसल विविधीकरण का संकट बना रहा।
पंजाब-हरियाणा की धान-गेहूं आधारित कृषि के पर्यावरणीय संकट का समाधान नहीं निकला।
इसलिए इसे पूर्ण कृषि क्रांति नहीं, एक विशिष्ट राजनीतिक-विधायी विजय कहना अधिक सटीक है।
क्या सरकार के कृषि सुधार गलत थे?
इतिहास का उत्तर केवल “हां” या “नहीं” नहीं हो सकता।
कृषि बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, आपूर्ति शृंखला में निवेश, किसान को अतिरिक्त खरीदार देने, संविदा खेती को कानूनी ढांचा देने और भंडारण निवेश बढ़ाने की आर्थिक आवश्यकता वास्तविक थी।
यह भी सच है कि भारतीय कृषि विपणन व्यवस्था में गंभीर सुधारों की आवश्यकता है।
लेकिन बाजार सुधार की सफलता केवल बाजार खोल देने से सुनिश्चित नहीं होती।
भारत के अधिकांश किसानों की जोत छोटी है। ऐसे किसान की किसी बड़ी कंपनी से सौदेबाजी की क्षमता सीमित होती है।
इसलिए बाजार स्वतंत्रता + संस्थागत संरक्षण + मूल्य सुरक्षा + प्रभावी विवाद निवारण—चारों की आवश्यकता है।
2020 के कानूनों का सबसे बड़ा राजनीतिक संकट शायद यही था कि सरकार “स्वतंत्रता” समझा रही थी और किसान “सुरक्षा” मांग रहा था।
संघवाद का प्रश्न
कृषि संविधान की राज्य सूची से गहराई से जुड़ा विषय है। कृषि बाजार और मंडियों पर राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
केंद्र ने व्यापार और वाणिज्य संबंधी संवैधानिक शक्तियों के आधार पर कानून बनाए।
आलोचक राज्यों ने इसे संघीय ढांचे में अतिक्रमण माना।
इसलिए आंदोलन केवल किसान नीति का संघर्ष नहीं था; इसने प्रश्न उठाया
भारत जैसे संघीय देश में व्यापक कृषि बाजार सुधार केंद्र अकेले करे या राज्यों की संस्थागत सहमति से?
यह प्रश्न कानूनों के निरसन के बाद भी बना हुआ है।
आंदोलन की लोकतांत्रिक उपलब्धि
आंदोलन ने यह स्थापित किया कि संसदीय बहुमत कानून बनाने के लिए पर्याप्त हो सकता है, लेकिन बड़े सामाजिक-आर्थिक सुधारों के टिकाऊ होने के लिए हितधारकों की राजनीतिक स्वीकृति भी महत्वपूर्ण होती है।
दूसरी ओर इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक संगठित समूह को संसद द्वारा पारित कानून वीटो करने का अधिकार है।
यहीं लोकतंत्र की कठिन दुविधा है
निर्वाचित सरकार का नीति बनाने का अधिकार बनाम प्रभावित नागरिकों का संगठित प्रतिरोध का अधिकार।
2020–21 का आंदोलन इसी तनाव का आधुनिक भारतीय उदाहरण है।
आंदोलन की सीमाएं
आंदोलन की उपलब्धियों के साथ उसकी सीमाओं को दर्ज करना भी आवश्यक है।
उसका भौगोलिक केंद्र मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत रहा।
एमएसपी पर चर्चा अक्सर उन फसलों और क्षेत्रों के अनुभव से संचालित हुई जहां सरकारी खरीद पहले से मजबूत थी।
भूमिहीन खेत मजदूर का प्रश्न अपेक्षाकृत पीछे रहा।
26 जनवरी की हिंसा ने आंदोलन की नैतिक स्थिति को नुकसान पहुंचाया।
कुछ धरना स्थलों पर असहमति, हिंसा या आपराधिक घटनाओं ने भी आंदोलन की छवि प्रभावित की।
लंबे समय तक सड़क अवरोधों से स्थानीय नागरिकों और व्यापारियों को कठिनाइयां हुईं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी विरोध के अधिकार और सार्वजनिक रास्तों के उपयोग के बीच संतुलन का प्रश्न उठाया।
इन पहलुओं को छोड़कर लिखा गया इतिहास आंदोलन का दस्तावेज तो हो सकता है, निष्पक्ष शोध नहीं।
सरकार की त्रुटियां, नेतृत्व की रणनीति और किसान राजनीति
सरकार की प्रमुख राजनीतिक और नीतिगत त्रुटियां
सरकार की सबसे बड़ी समस्या संभवतः कानूनों के उद्देश्य से अधिक उनकी राजनीतिक प्रस्तुति और नीति-निर्माण प्रक्रिया में थी।
इतना व्यापक परिवर्तन महामारी के बीच अध्यादेशों से शुरू किया गया।
राज्यों और किसान संगठनों के साथ व्यापक सार्वजनिक सहमति पहले निर्मित नहीं हुई।
एमएसपी के भविष्य को लेकर किसानों का भरोसा शुरुआती चरण में नहीं बन पाया।
जब आंदोलन बढ़ा तब सरकार ने संशोधन, लिखित आश्वासन और अंततः डेढ़ वर्ष तक कानून स्थगित करने तक का प्रस्ताव दिया।
यह स्वयं संकेत था कि जिन सुरक्षा उपायों पर पहले पर्याप्त राजनीतिक सहमति नहीं बनी थी, उन्हें बाद में वार्ता के माध्यम से जोड़ने की कोशिश करनी पड़ी।
आंदोलनकारी नेतृत्व की रणनीतिक सफलता
किसान नेतृत्व ने तीन महत्वपूर्ण रणनीतिक निर्णय लिए।
पहला—दिल्ली की सीमाओं पर स्थायी उपस्थिति।
दूसरा—राजनीतिक दलों को औपचारिक नेतृत्व से बाहर रखना।
तीसरा—संशोधन के बजाय पूर्ण निरसन को मुख्य मांग बनाए रखना।
यदि आंदोलन विभिन्न छोटे संशोधनों में बंट जाता तो उसका केंद्रीय लक्ष्य कमजोर पड़ सकता था।
इसके विपरीत “तीनों कानून वापस लो” ऐसा सरल नारा था जिसे लाखों किसान आसानी से समझ और दोहरा सकते थे।
यही आंदोलन की संचार रणनीति की शक्ति थी।
सर्वोच्च न्यायालय समिति से मिलने वाला दूसरा पक्ष
समिति की रिपोर्ट इस पूरे इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह आंदोलन के प्रचलित आख्यान के समानांतर एक अलग किसान दृष्टिकोण दर्ज करती है।
समिति ने दावा किया कि उससे सीधे संवाद करने वाले संगठनों में भारी बहुमत कानूनों का समर्थक था।
लेकिन प्रदर्शनकारी किसान संगठनों ने समिति का बहिष्कार किया था।
इसलिए रिपोर्ट हमें यह नहीं बताती कि “भारत के 85.7 प्रतिशत किसान कानून समर्थक थे”।
वह इतना बताती है कि कानूनों के समर्थन में भी एक संगठित किसान मत मौजूद था और कृषि समाज को केवल दो रंगों—सरकार और विरोधी किसान—में नहीं देखा जा सकता।
यह शोध अध्याय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण संतुलन है।
2020–21 आंदोलन ने किसान राजनीति को कैसे बदल दिया?
1990 के दशक के बाद किसान राजनीति काफी हद तक क्षेत्रीय हो गई थी।
2020–21 ने लंबे समय बाद कृषि प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में स्थापित किया।
पंजाब का किसान, हरियाणा का किसान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान और अखिल भारतीय वाम किसान संगठन एक साझा मंच पर दिखाई दिए।
सोशल मीडिया ने ग्रामीण राजनीतिक लामबंदी की नई शक्ति दिखाई।
महिलाओं और युवाओं की भागीदारी ने किसान आंदोलन की पुरानी छवि बदली।
सबसे बढ़कर एमएसपी पहली बार इतने व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का विषय बनी।
2020–2021 की समेकित समयरेखा
विस्तृत समयरेखा
5 जून 2020 — तीन कृषि अध्यादेश जारी।
जून–अगस्त 2020 — पंजाब में किसान संगठनों का विरोध बढ़ना शुरू।
14 सितंबर — संसद में संबंधित विधेयक प्रस्तुत।
17 सितंबर — लोकसभा से प्रमुख विधेयक पारित; हरसिमरत कौर बादल का केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा।
20 सितंबर — राज्यसभा में कृषि विधेयक पारित; प्रक्रिया पर तीखा विवाद।
24 सितंबर — प्रमुख कृषि कानूनों का अधिनियमन। कृषक उपज व्यापार कानून स्वयं 5 जून से प्रभावी माना गया।
26 सितंबर — शिरोमणि अकाली दल का एनडीए से बाहर जाने का निर्णय।
अक्टूबर–नवंबर — पंजाब में रेल रोको और अन्य आंदोलन।
26 नवंबर — दिल्ली चलो अभियान।
27 नवंबर के बाद — सिंघु, टिकरी और गाजीपुर सीमाओं पर स्थायी धरने।
1 दिसंबर — सरकार–किसान वार्ता।
3 दिसंबर — अगला वार्ता दौर; लगभग 40 संगठन शामिल।
5 दिसंबर — पांचवां दौर; गतिरोध।
8 दिसंबर — गृह मंत्री अमित शाह और किसान नेताओं की बातचीत।
9 दिसंबर — सरकार का लिखित संशोधन प्रस्ताव; किसान संगठनों ने अस्वीकार किया।
30 दिसंबर — छठा दौर; कुछ गौण मुद्दों पर प्रगति।
4 जनवरी 2021 — सातवां दौर।
12 जनवरी — सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक और समिति गठन।
20 जनवरी — सरकार का एक से डेढ़ वर्ष तक कानून स्थगित करने का प्रस्ताव।
22 जनवरी — ग्यारहवां वार्ता दौर; समाधान नहीं।
26 जनवरी — ट्रैक्टर परेड, दिल्ली में टकराव और लाल किला घटना।
28 जनवरी — गाजीपुर सीमा संकट और राकेश टिकैत के आह्वान के बाद आंदोलन का पुनर्जीवन।
फरवरी–मार्च — महापंचायतें और आंदोलन का विस्तार।
मार्च — सर्वोच्च न्यायालय समिति की रिपोर्ट।
अप्रैल–मई — कोविड की दूसरी लहर के बीच धरना जारी।
5 सितंबर — मुजफ्फरनगर किसान महापंचायत।
3 अक्टूबर — लखीमपुर खीरी हिंसा।
19 नवंबर — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की।
29 नवंबर — कृषि विधि निरसन विधेयक लोकसभा और राज्यसभा से पारित।
30 नवंबर — राष्ट्रपति की स्वीकृति; कृषि विधि निरसन अधिनियम प्रभावी।
9 दिसंबर — संयुक्त किसान मोर्चा ने आंदोलन स्थगित करने का निर्णय लिया।
11 दिसंबर — दिल्ली की सीमाओं से किसानों की संगठित घर वापसी।
समग्र मूल्यांकन और आंदोलन का ऐतिहासिक निष्कर्ष
समेकित मूल्यांकन : आखिर 2020–21 के आंदोलन को कैसे समझें?
कृषि कानून विरोधी आंदोलन को केवल मोदी सरकार के विरुद्ध राजनीतिक आंदोलन कहना उसके सामाजिक आधार को कम करके देखना होगा।
इसे केवल “सभी भारतीय किसानों का सर्वसम्मत विद्रोह” कहना भी उतना ही अतिरंजित होगा।
इसे कॉरपोरेट विरोधी आंदोलन कहना अधूरा है क्योंकि इसके केंद्र में एमएसपी और मंडी सुरक्षा भी थी।
इसे कृषि सुधार विरोधी आंदोलन कहना भी गलत है क्योंकि किसान संगठनों का बड़ा हिस्सा सुधार का विरोध नहीं बल्कि सुधार की प्रकृति, कानूनी सुरक्षा और निर्णय प्रक्रिया का विरोध कर रहा था।
और इसे केवल पंजाब का आंदोलन कहना भी उसके हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अखिल भारतीय प्रभाव को नकारना होगा।
इसकी सबसे संतुलित व्याख्या यह है कि यह भारतीय कृषि के बाजार-आधारित पुनर्गठन की केंद्र सरकार की परियोजना और संस्थागत मूल्य-सुरक्षा खोने से आशंकित किसान समाज के एक शक्तिशाली हिस्से के बीच संघर्ष था।
अंतिम निष्कर्ष : कानून वापस हुए, कृषि का प्रश्न नहीं
2020–21 का किसान आंदोलन स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में इसलिए याद रखा जाएगा कि उसने एक बुनियादी प्रश्न उठाया
किसान को बाजार की स्वतंत्रता चाहिए या बाजार से सुरक्षा?
किसान को अधिक खरीदार चाहिए, लेकिन सौदेबाजी की शक्ति भी।
निजी निवेश चाहिए, लेकिन एकाधिकार नहीं।
संविदा खेती का अवसर चाहिए, लेकिन प्रभावी कानूनी संरक्षण भी।
एपीएमसी में सुधार चाहिए, लेकिन विश्वसनीय वैकल्पिक संस्थान के बिना उसका क्षरण नहीं।
एमएसपी चाहिए, लेकिन साथ ही फसल विविधीकरण और टिकाऊ कृषि अर्थव्यवस्था भी।
और सबसे महत्वपूर्ण—कृषि सुधार चाहिए तो उस किसान को नीति-निर्माण में वास्तविक भागीदार बनाना होगा जिसके जीवन और आय को वह सुधार बदलने जा रहा है।
तीन कानूनों की कहानी 5 जून 2020 को अध्यादेशों से शुरू हुई और 30 नवंबर 2021 को कानूनी निरसन के साथ समाप्त हो गई।
लेकिन जिस संकट ने आंदोलन को जन्म दिया था—किसान की आय, लागत, एमएसपी, बाजार शक्ति, ऋण, सरकारी खरीद, निजी पूंजी और कृषि में राज्य की भूमिका—वह समाप्त नहीं हुआ।
इसीलिए इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल तीन कानूनों की वापसी नहीं थी। उसने भारतीय लोकतंत्र के सामने स्थायी प्रश्न रख दिया
कृषि नीति किसान के लिए बनाई जाएगी, या किसान के साथ मिलकर बनाई जाएगी?
प्रमुख प्राथमिक एवं शोध स्रोत
इस अध्याय के विधायी आधार के लिए , और सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत हैं। विधायी विश्लेषण के लिए तथा संविदा खेती कानून का विश्लेषण उपयोगी है।
सरकार–किसान वार्ताओं के आधिकारिक रिकॉर्ड में 3 दिसंबर की चौथी बैठक से लेकर 22 जनवरी 2021 की ग्यारहवीं बैठक तक पीआईबी अभिलेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के लिए 12 जनवरी 2021 का मूल आदेश प्राथमिक न्यायिक स्रोत है।
और इस पूरे विवाद का दूसरा पक्ष समझने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति की रिपोर्ट को अवश्य पढ़ना चाहिए—लेकिन उसकी नमूना-सीमा और आंदोलनकारी संगठनों के बहिष्कार को ध्यान में रखते हुए।
इस रूप में अध्याय में कानूनों के समर्थक और विरोधी दोनों पक्ष, संसद, केंद्र सरकार, किसान संगठन, विपक्ष, न्यायपालिका, महिलाओं–मजदूरों का पक्ष, 26 जनवरी, गाजीपुर, लखीमपुर, मौतों के विवादित आंकड़े, 11 दौर की वार्ता, कानून वापसी तथा आंदोलन की उपलब्धियां और सीमाएं—सभी को शामिल किया गया है।
संसदीय प्रक्रिया, पंजाब और संवैधानिक संघवाद
संसद में कानून पारित होने का विवाद : केवल कानून नहीं, प्रक्रिया भी बनी मुद्दा
तीन कृषि कानूनों के विरोध को समझने के लिए सितंबर 2020 की संसदीय प्रक्रिया को अलग से देखना आवश्यक है। लोकसभा में सरकार के पास स्पष्ट बहुमत था, लेकिन राज्यसभा में 20 सितंबर को दो कृषि विधेयकों को पारित कराने के दौरान असाधारण हंगामा हुआ। विपक्ष ने विधेयकों को प्रवर समिति में भेजने और मत-विभाजन की मांग की। सरकार और पीठ का पक्ष था कि सदन की प्रक्रिया के अनुसार विधेयक पारित हुए, जबकि विपक्ष ने आरोप लगाया कि पर्याप्त मत-विभाजन नहीं कराया गया।
इसके बाद सदन में अव्यवस्था, नियम पुस्तिका से जुड़ा विवाद और उपसभापति हरिवंश के आसन के आसपास विरोध हुआ। आठ विपक्षी सांसदों को शेष सत्र के लिए निलंबित किया गया।
यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसान आंदोलन में बाद में बार-बार यह तर्क आया कि इतनी व्यापक कृषि नीति को अधिक संसदीय और सार्वजनिक विमर्श के बाद लागू किया जाना चाहिए था।
यहां दो चीजों में अंतर रखना आवश्यक है—संसद द्वारा कानून का विधिवत अधिनियमन और उसकी राजनीतिक-सामाजिक स्वीकार्यता। दोनों एक ही बात नहीं हैं।
पंजाब विधानसभा की प्रतिक्रिया : आंदोलन से संघवाद तक
पंजाब इस विरोध को विधानसभा तक ले जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण राज्य बना। अक्टूबर 2020 में पंजाब विधानसभा ने केंद्रीय कृषि कानूनों के प्रभाव का मुकाबला करने के उद्देश्य से अपने विधेयक पारित किए।
इनमें विशेष रूप से गेहूं और धान की बिक्री को एमएसपी से नीचे किए जाने के विरुद्ध सुरक्षा देने की कोशिश महत्वपूर्ण थी।
लेकिन इससे संवैधानिक प्रश्न पैदा हुआ। समवर्ती अथवा केंद्रीय कानून से टकराव की स्थिति में राज्य कानून को राष्ट्रपति की स्वीकृति की आवश्यकता पड़ सकती है।
यहीं किसान आंदोलन का एक नया आयाम सामने आया
क्या कृषि बाजार सुधार मुख्यतः केंद्र तय करेगा, या राज्यों की निर्णायक भूमिका होगी?
कृषि और संविधान : केंद्र बनाम राज्य का वास्तविक विवाद
संविधान की सातवीं अनुसूची में कृषि तथा बाजारों से संबंधित महत्वपूर्ण विषय राज्य सूची से जुड़े हैं। दूसरी ओर अंतरराज्यीय व्यापार, खाद्य पदार्थों का व्यापार और वाणिज्य तथा कुछ संबंधित विषयों पर संसद की विधायी शक्तियां भी हैं।
केंद्र ने इसी व्यापक संवैधानिक ढांचे में कानून बनाए।
विरोधी पक्ष का तर्क था कि केंद्र ने कृषि मंडियों और कृषि व्यापार के क्षेत्र में राज्यों की परंपरागत विधायी भूमिका को सीमित किया।
समर्थक पक्ष का उत्तर था कि कानून कृषि उत्पादन अथवा भूमि संबंधों को नियंत्रित नहीं कर रहे थे, बल्कि कृषि उपज के व्यापार को अधिक खुला बना रहे थे।
इसलिए संघवाद का विवाद केवल राजनीतिक आरोप नहीं था; यह कानूनों की संवैधानिक संरचना से जुड़ा वास्तविक प्रश्न था।
एमएसपी वास्तव में क्या है?
आंदोलन को समझने के लिए एमएसपी की प्रकृति स्पष्ट होना आवश्यक है।
भारत सरकार विभिन्न अधिसूचित फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग—सीएसीपी—की सिफारिशें इसमें महत्वपूर्ण आधार होती हैं।
लेकिन एमएसपी घोषित होना और प्रत्येक किसान की प्रत्येक फसल एमएसपी पर खरीदी जाना एक बात नहीं है।
सरकारी खरीद विशेष रूप से गेहूं और धान तथा कुछ राज्यों में अधिक केंद्रित रही है।
इसी कारण पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिए एमएसपी केवल सरकारी घोषणा नहीं, वास्तविक कृषि अर्थव्यवस्था का हिस्सा थी।
स्वामीनाथन आयोग और सी-2 लागत से 50 प्रतिशत अधिक प्रतिशत की बहस
एमएसपी विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि राष्ट्रीय किसान आयोग और एम. एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाली सिफारिशों से जुड़ती है।
किसान संगठनों की लंबे समय से मांग रही कि उत्पादन की व्यापक लागत के ऊपर कम-से-कम 50 प्रतिशत लाभ जोड़कर मूल्य निर्धारित किया जाए।
लेकिन कृषि लागत की गणना स्वयं विवादित रही—ए-2 लागत, ए-2 लागत तथा पारिवारिक श्रम और सी-2 लागत जैसी अलग लागत अवधारणाओं के कारण “लागत पर 50 प्रतिशत” का अर्थ अलग-अलग निकल सकता है।
इसीलिए 2020–21 का आंदोलन केवल कानूनों की वापसी तक सीमित नहीं रहा। उसके पीछे पहले से मौजूद लाभकारी मूल्य आंदोलन भी सक्रिय था।
न्यूनतम समर्थन मूल्य, मंडी, आढ़ती और खाद्य सुरक्षा
क्या कानून ने एमएसपी खत्म कर दी थी?
तीनों कृषि कानूनों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था जो एमएसपी को समाप्त करता।
कानूनों ने एमएसपी को वैधानिक अधिकार भी नहीं बनाया था।
यही अंतर विवाद का केंद्र था।
सरकार कहती थी कि एमएसपी जारी रहेगी।
आंदोलनकारी पूछते थे—यदि जारी ही रहनी है तो इसकी कानूनी गारंटी क्यों नहीं?
इसलिए “कानून ने एमएसपी समाप्त कर दी थी” कहना गलत होगा, लेकिन “एमएसपी का कोई प्रश्न ही नहीं था” कहना भी आंदोलन की वास्तविक चिंता को गलत ढंग से प्रस्तुत करेगा।
एपीएमसी मंडियां : समाप्ति नहीं, समानांतर बाजार का प्रश्न
कानून ने एपीएमसी मंडियों को समाप्त नहीं किया था।
उसने मंडियों के बाहर व्यापार के लिए समानांतर क्षेत्र बनाया।
सरकार का तर्क था कि किसान को एक और विकल्प मिल गया।
आंदोलनकारियों की चिंता थी कि यदि मंडी के भीतर शुल्क हो और बाहर खरीद पर वैसा शुल्क न हो तो निजी कारोबार धीरे-धीरे मंडी से बाहर चला जाएगा।
कानूनी समाप्ति बनाम आर्थिक क्षरण।
दोनों में महत्वपूर्ण अंतर है।
आढ़ती : शोषक बिचौलिया या ग्रामीण ऋण-संबंध का हिस्सा?
सरकार समर्थक विमर्श में पंजाब के आढ़तियों को कई बार आंदोलन के पीछे सक्रिय हितसमूह बताया गया।
तर्क था कि नई व्यवस्था किसान और खरीदार के सीधे संबंध को बढ़ाएगी, जिससे कमीशन एजेंटों की भूमिका घट सकती है।
लेकिन पंजाब की कृषि अर्थव्यवस्था में आढ़ती केवल मंडी कमीशन एजेंट नहीं रहा। कई किसानों के लिए वह ऋण, नकदी और विपणन संबंध का भी हिस्सा था।
इस व्यवस्था में शोषण की संभावनाएं थीं, लेकिन सामाजिक-आर्थिक निर्भरता भी थी।
इसलिए “आढ़ती बनाम किसान” का सरल विभाजन वास्तविक ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पूरी तरह नहीं समझाता।
एफसीआई और सार्वजनिक वितरण प्रणाली का प्रश्न
किसान संगठनों की एक चिंता यह भी थी कि यदि भविष्य में सरकारी खरीद घटती गई तो इसका प्रभाव भारतीय खाद्य निगम—एफसीआई—और सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर पड़ सकता है।
कानूनों में एफसीआई अथवा पीडीएस समाप्त करने का कोई प्रावधान नहीं था।
इसलिए यह तत्काल कानूनी परिणाम नहीं बल्कि भविष्य की नीति दिशा संबंधी आशंका थी।
शोध में इस अंतर को साफ रखना चाहिए।
अडानी–अंबानी विमर्श : तथ्य और राजनीतिक प्रतीक
आंदोलन में “कॉरपोरेट खेती” का विरोध धीरे-धीरे कुछ बड़े कारोबारी समूहों के नामों से जुड़ गया।
अडानी और रिलायंस आंदोलनकारी नारों में कॉरपोरेट कृषि के प्रतीक बन गए।
लेकिन किसी राजनीतिक नारे को कानून का वास्तविक प्रावधान मानना उचित नहीं।
तीनों कानूनों में किसी विशिष्ट कंपनी को कोई विशेष अधिकार नहीं दिया गया था।
इसलिए शोध का निष्कर्ष होना चाहिए कि कॉरपोरेट केंद्रीकरण की चिंता वास्तविक नीतिगत बहस थी; किसी विशेष कंपनी को कानून का प्रत्यक्ष लाभार्थी घोषित करना अलग प्रमाण की मांग करता है।
कॉरपोरेट विमर्श, दूरसंचार टावर, इंटरनेट और नागरिक अधिकार
पंजाब में दूरसंचार टावरों को नुकसान : आंदोलन की सीमा
दिसंबर 2020 के दौरान पंजाब में बड़ी संख्या में दूरसंचार प्रतिष्ठानों की बिजली काटे जाने अथवा उपकरणों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आईं।
पंजाब सरकार ने ऐसी कार्रवाई रोकने के निर्देश दिए।
यह प्रसंग इसलिए दर्ज होना चाहिए क्योंकि व्यापक आंदोलन शांतिपूर्ण रहा, फिर भी उसके नाम पर हुई प्रत्येक गैर-कानूनी कार्रवाई को नजरअंदाज करना इतिहासलेखन की निष्पक्षता के विरुद्ध होगा।
साथ ही ऐसी घटनाओं को पूरे किसान आंदोलन की घोषित नीति मानना भी उचित नहीं है।
दिल्ली की किलेबंदी, इंटरनेट और नागरिक स्वतंत्रता
26 जनवरी के बाद दिल्ली की सीमाओं पर सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत कठोर हुई।
बहुस्तरीय बैरिकेडिंग, कंक्रीट अवरोध, सड़क पर कीलों जैसी व्यवस्थाओं की तस्वीरें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में व्यापक रूप से दिखाई दीं।
कुछ क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से निलंबित की गईं।
सरकार और पुलिस का तर्क सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और 26 जनवरी जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना था।
आलोचकों ने इसे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध अत्यधिक सुरक्षा प्रतिक्रिया बताया।
इससे आंदोलन कृषि नीति से नागरिक स्वतंत्रता की बहस तक फैल गया।
विरोध का अधिकार बनाम सड़क इस्तेमाल करने का अधिकार
दिल्ली की सीमाओं पर महीनों तक सड़कें प्रभावित रहने से स्थानीय निवासियों, व्यापारियों, यात्रियों और उद्योगों को भी कठिनाइयां हुईं।
यह आंदोलन का ऐसा पक्ष है जिसे किसान समर्थक इतिहास में अक्सर पर्याप्त स्थान नहीं मिलता।
लोकतंत्र नागरिक को विरोध का अधिकार देता है, लेकिन दूसरे नागरिकों को आवागमन और सामान्य जीवन का अधिकार भी है।
सर्वोच्च न्यायालय में भी यह प्रश्न उठा कि विरोध का अधिकार अनिश्चितकालीन सार्वजनिक मार्ग अवरोध का स्वतः अधिकार है या नहीं।
यही आधुनिक जन आंदोलनों की कठिन संवैधानिक दुविधा है।
26 जनवरी : घटनाक्रम को एक ही रंग में नहीं देखा जा सकता
ट्रैक्टर परेड के लिए दिल्ली पुलिस और किसान संगठनों के बीच तय मार्ग बनाए गए थे।
लेकिन कुछ समूह निर्धारित समय से पहले आगे बढ़े और कुछ ने तय मार्ग छोड़ा।
आईटीओ सहित कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक टकराव हुआ।
प्रदर्शनकारी नवरीत सिंह की मृत्यु हुई।
बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी घायल हुए और अनेक प्रदर्शनकारी भी चोटिल हुए।
एक समूह लाल किले तक पहुंचा।
इसलिए 26 जनवरी को न तो केवल “शांतिपूर्ण ट्रैक्टर रैली” कहना पर्याप्त है और न पूरे आंदोलन को “लाल किला हिंसा” में समेटना।
दीप सिद्धू और लाल किला
अभिनेता-कार्यकर्ता दीप सिद्धू लाल किला प्रकरण के बाद प्रमुख विवादित चेहरा बने।
उन पर प्रदर्शनकारियों को लाल किले तक पहुंचाने और वहां की घटनाओं में भूमिका के आरोप लगे। दिल्ली पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया।
लेकिन यहां भी आरोप, पुलिस का मामला और न्यायिक निष्कर्ष अलग-अलग श्रेणियां हैं।
संयुक्त किसान मोर्चा ने उनसे और लाल किला घटनाक्रम से दूरी बनाई।
इस प्रसंग का ऐतिहासिक महत्व यह है कि विकेंद्रीकृत जन आंदोलन में केंद्रीय नेतृत्व के बाहर सक्रिय समूह पूरे आंदोलन की सार्वजनिक छवि बदल सकते हैं।
ग्रामीण रसद, प्रवासी समर्थन, खाप और किसान संसद
आंदोलन चला कैसे? ग्रामीण रसद का असाधारण प्रयोग
एक वर्ष तक धरना केवल भाषणों से नहीं चल सकता था।
पंजाब और हरियाणा के गांवों से राशन, दूध, सब्जियां और अन्य सामग्री नियमित रूप से पहुंचती रही।
गुरुद्वारों और सामाजिक संस्थाओं ने लंगर व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
ट्रैक्टर-ट्रॉलियां आवास बनीं।
स्वयंसेवकों ने चिकित्सा, सफाई, सुरक्षा, पुस्तकालय, शिक्षा और संचार तक की व्यवस्थाएं विकसित कीं।
इसे भारतीय ग्रामीण समाज की सामूहिक संसाधन जुटाने की क्षमता के अध्ययन के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
प्रवासी भारतीय और अंतरराष्ट्रीय समर्थन
पंजाब के बड़े प्रवासी समुदाय के कारण आंदोलन की प्रतिध्वनि कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और अन्य देशों तक पहुंची।
प्रवासी समुदायों ने प्रदर्शन और समर्थन अभियान आयोजित किए।
कुछ विदेशी राजनीतिक नेताओं ने भी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि कृषि कानून भारत की लोकतांत्रिक और आंतरिक नीति प्रक्रिया का विषय हैं।
इस विवाद में दो अवधारणाएं आमने-सामने थीं
वैश्विक नागरिक एकजुटता और राष्ट्रीय नीति में बाहरी हस्तक्षेप की सीमा।
खाप पंचायतें और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का पुनर्गठन
गाजीपुर के बाद खाप पंचायतें आंदोलन की महत्वपूर्ण सामाजिक शक्ति बनीं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में किसान संगठन अकेले नहीं थे; पारंपरिक ग्रामीण सामाजिक संस्थाओं ने भी लामबंदी में भूमिका निभाई।
इससे आंदोलन का आधार पंजाब से बाहर मजबूत हुआ।
यही कारण है कि जनवरी 2021 के बाद आंदोलन का केंद्र केवल सिंघु नहीं रहा—गाजीपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश उसकी दूसरी महत्वपूर्ण राजनीतिक धुरी बन गए।
किसान संसद : जुलाई 2021 का महत्वपूर्ण चरण
22 जुलाई 2021 से संसद के मानसून सत्र के दौरान सीमित संख्या में किसानों को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति दी गई।
लगभग 200 किसान प्रतिदिन पुलिस सुरक्षा में वहां पहुंचे और प्रतीकात्मक “किसान संसद” आयोजित की। किसान संगठनों ने इसे वास्तविक संसद के समानांतर सत्ता स्थापित करने के अर्थ में नहीं, बल्कि कृषि कानूनों पर सार्वजनिक बहस के राजनीतिक माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया।
यह 26 जनवरी के बाद पहली बार था जब आंदोलनकारियों के एक नियंत्रित समूह को फिर केंद्रीय दिल्ली में विरोध की अनुमति मिली।
इसका संदेश स्पष्ट था—सीमाओं पर महीनों से बैठा आंदोलन संसद के मानसून सत्र में अपने प्रश्न को सीधे राष्ट्रीय विधायिका के सामने प्रतीकात्मक रूप से रखना चाहता था।
करनाल : अगस्त–सितंबर 2021 का बड़ा टकराव
28 अगस्त 2021 को हरियाणा के करनाल में प्रदर्शनकारी किसानों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। तत्कालीन एसडीएम आयुष सिन्हा का एक वीडियो सामने आया जिसमें वह पुलिसकर्मियों को अवरोध पार करने वालों के खिलाफ कठोर बल प्रयोग संबंधी विवादास्पद निर्देश देते सुनाई दिए।
इसके विरोध में किसान लामबंद हुए और सितंबर में करनाल मिनी सचिवालय के बाहर धरना शुरू हुआ।
पांच दिन के गतिरोध के बाद हरियाणा सरकार और किसान संगठनों के बीच समझौता हुआ। सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश से जांच कराने और जांच के दौरान आयुष सिन्हा को अवकाश पर रखने पर सहमति दी। बाद में न्यायमूर्ति एस. एन. अग्रवाल की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग बनाया गया।
करनाल घटना दिखाती है कि 2021 के मध्य तक आंदोलन केवल दिल्ली सीमाओं तक सीमित नहीं था।
सिंघु की हिंसा और कानूनों के लाभ–जोखिम का संतुलन
सिंघु सीमा पर लखबीर सिंह की हत्या
15 अक्टूबर 2021 को सिंघु सीमा के निकट लखबीर सिंह की अत्यंत क्रूर हत्या ने देश को स्तब्ध किया।
इस मामले में निहंग समुदाय से जुड़े व्यक्तियों की गिरफ्तारी हुई।
मुख्य किसान संगठनों ने हत्या की निंदा की और स्वयं को घटना से अलग किया।
यह भेद अत्यंत महत्वपूर्ण है—घटना आंदोलन स्थल से जुड़ी थी, लेकिन इससे स्वतः यह सिद्ध नहीं होता कि हत्या संयुक्त किसान मोर्चा अथवा आंदोलन की संगठित कार्रवाई थी।
फिर भी इतने लंबे और विशाल धरना क्षेत्र में कानून-व्यवस्था तथा आंतरिक नियंत्रण की समस्या को यह घटना उजागर करती है।
धार्मिक संस्थाएं और निहंग उपस्थिति
सिख धार्मिक-सामुदायिक परंपरा ने आंदोलन की रसद और सांस्कृतिक संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लंगर इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण था।
निहंग समूह भी कुछ धरना स्थलों पर मौजूद रहे।
लेकिन किसान आंदोलन, सिख धार्मिक संस्थाओं और निहंग संगठनों को एक ही संगठनात्मक इकाई मानना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।
आंदोलन का औपचारिक राजनीतिक नेतृत्व किसान यूनियनों और संयुक्त किसान मोर्चा के हाथ में था।
तीन कानून लागू रहते तो संभावित लाभ क्या थे?
यह प्रश्न भी इतिहास में पूछा जाना चाहिए।
किसानों के लिए अधिक खरीदार; राज्यों की सीमाओं से परे कृषि व्यापार; डिजिटल व्यापार; खेत के निकट बिक्री; निजी गोदाम और शीतगृह निवेश; खाद्य प्रसंस्करण; संविदा खेती; और कृषि आपूर्ति शृंखला का आधुनिकीकरण।
इनमें से अनेक सुधार भारतीय कृषि के लिए आज भी प्रासंगिक हैं।
इसलिए कानूनों की वापसी का अर्थ यह नहीं कि उनके पीछे पहचानी गई हर आर्थिक समस्या काल्पनिक थी।
संभावित जोखिम क्या थे?
दूसरी ओर जोखिम भी वास्तविक थे।
छोटे किसान और बड़ी कंपनी की असमान सौदेबाजी शक्ति।
एपीएमसी मंडियों के क्रमिक कमजोर होने की संभावना।
निजी बाजार में मूल्य पारदर्शिता की समस्या।
संविदात्मक विवादों में छोटे किसान की कानूनी क्षमता।
बड़े खरीदारों के बाजार केंद्रीकरण का जोखिम।
और एमएसपी व्यवस्था के भविष्य पर भरोसे की कमी।
अर्थात विवाद सुधार बनाम यथास्थिति भर नहीं था; वह किस तरह का सुधार और किस सुरक्षा के साथ का प्रश्न था।
क्या कोई तीसरा रास्ता संभव था?
संभवतः यही आंदोलन से मिलने वाला सबसे महत्वपूर्ण नीति-पाठ है।
केंद्र पहले कुछ इच्छुक राज्यों में नए बाजार मॉडल का प्रयोग कर सकता था।
एपीएमसी सुधार समानांतर रूप से किए जा सकते थे।
एमएसपी और सरकारी खरीद पर स्पष्ट वैधानिक अथवा दीर्घकालीन नीति सुरक्षा पहले दी जा सकती थी।
राज्यों, किसान संगठनों, कृषि अर्थशास्त्रियों, व्यापारियों और उपभोक्ता संगठनों की विस्तृत समिति बनाई जा सकती थी।
संविदा खेती के विवादों के लिए किसान-अनुकूल स्वतंत्र न्यायिक व्यवस्था बनाई जा सकती थी।
ऐसा मॉडल राजनीतिक प्रतिरोध को पूरी तरह समाप्त करता, यह निश्चित नहीं; लेकिन सुधारों की सामाजिक स्वीकार्यता अधिक हो सकती थी।
दावे बनाम तथ्य, उपलब्धियां, सीमाएं और अंतिम निष्कर्ष
दावे बनाम सत्यापित तथ्य
प्रचलित दावा — अधिक सटीक स्थिति
कानूनों ने एमएसपी समाप्त कर दी — नहीं। ऐसा कोई प्रावधान नहीं था
कानूनों ने एमएसपी की कानूनी गारंटी दी — नहीं
एपीएमसी मंडियां कानून से बंद कर दी गईं — नहीं
मंडियों के कमजोर होने की आशंका थी — हां, आंदोलन का प्रमुख तर्क यही था
कंपनियां किसान की जमीन सीधे छीन सकती थीं — कानून में कृषि भूमि के विरुद्ध वसूली पर सुरक्षा थी
सभी किसान कानूनों के विरोध में थे — नहीं
सभी किसान कानून समर्थक थे — नहीं
आंदोलन केवल पंजाब का था — नहीं
आंदोलन का पूरे भारत में समान विस्तार था — नहीं
सरकार बातचीत को तैयार नहीं हुई — गलत—11 दौर की औपचारिक वार्ता हुई
सरकार ने कानून स्थगित करने की पेशकश की — हां, लगभग 18 महीने तक
सर्वोच्च न्यायालय ने कानून रद्द कर दिए — नहीं; क्रियान्वयन पर रोक लगाई थी
संसद ने अंततः कानून वापस लिए — हां
किसान आंदोलन की सभी मांगें मान ली गईं — नहीं
एमएसपी कानूनी अधिकार बन गई — नहीं
यही तालिका इस अध्याय में फैल चुके अनेक राजनीतिक आख्यानों को तथ्यात्मक आधार पर अलग करने में विशेष उपयोगी है।
आंदोलन की उपलब्धियां : एक समेकित सूची
इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि तीन कानूनों का निरसन थी।
लेकिन इसके अतिरिक्त उसने एमएसपी को राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बनाया; किसान संगठनों की राष्ट्रीय एकता दिखाई; महिलाओं की किसान पहचान को दृश्यता दी; ग्रामीण सामुदायिक संगठन की क्षमता प्रदर्शित की; कृषि नीति में परामर्श की आवश्यकता स्थापित की; संघवाद पर बहस पैदा की; और लगभग एक वर्ष तक आंदोलन को बनाए रखकर भारतीय लोकतांत्रिक आंदोलनों के इतिहास में असाधारण उदाहरण प्रस्तुत किया।
आंदोलन की सीमाएं : अंतिम संतुलित मूल्यांकन
आंदोलन पूरे भारतीय किसान समाज का समान प्रतिनिधित्व नहीं करता था।
उसका मुख्य आधार उत्तर-पश्चिम भारत था।
भूमिहीन खेत मजदूर और कृषि के जातिगत भूमि-असमानता संबंधी प्रश्न उसके केंद्रीय एजेंडे में अपेक्षाकृत पीछे रहे।
एमएसपी विमर्श में उन किसानों की समस्याएं कम दिखाई दीं जिनकी फसलें सरकारी खरीद व्यवस्था में प्रभावी रूप से शामिल नहीं होतीं।
लंबे सड़क अवरोधों से नागरिकों को परेशानी हुई।
26 जनवरी जैसी हिंसा ने आंदोलन की नैतिक शक्ति को नुकसान पहुंचाया।
कुछ आंदोलन स्थलों से जुड़ी गंभीर आपराधिक घटनाएं भी हुईं।
इसलिए इसकी ऐतिहासिक उपलब्धि बड़ी होने के बावजूद इसकी सामाजिक प्रतिनिधिकता और संघर्ष-पद्धति की आलोचनात्मक समीक्षा आवश्यक है।
अंतिम ऐतिहासिक निष्कर्ष : यह आंदोलन वास्तव में किस बारे में था?
2020–21 के किसान आंदोलन को केवल तीन कानूनों के विरोध के रूप में पढ़ना अब पर्याप्त नहीं है।
इसके भीतर कम-से-कम पांच बड़े संघर्ष एक साथ चल रहे थे
केंद्र बनाम राज्य। बाजार बनाम संस्थागत सुरक्षा। निजी निवेश बनाम बाजार शक्ति का केंद्रीकरण। संसदीय बहुमत बनाम सामाजिक सहमति। और कृषि सुधार बनाम किसान की नीति-निर्माण में भागीदारी।
सरकार का यह तर्क पूरी तरह निराधार नहीं था कि भारतीय कृषि बाजार में सुधार, निजी निवेश और किसानों के लिए अधिक विकल्प आवश्यक हैं।
किसानों की यह आशंका भी काल्पनिक नहीं थी कि छोटे और सीमांत किसान को बिना पर्याप्त संस्थागत सुरक्षा के बड़े बाजार में छोड़ देना स्वतः उसे अधिक शक्तिशाली नहीं बना देता।
यही कारण है कि इस संघर्ष में कोई एक पक्ष संपूर्ण आर्थिक सत्य का स्वामी नहीं था।
सरकार ने कृषि बाजार की अक्षमता को पहचाना।
किसान आंदोलन ने बाजार में किसान की असमान शक्ति को रेखांकित किया।
दोनों प्रश्न आज भी मौजूद हैं।
तीन कृषि कानून समाप्त हो गए, लेकिन जिस भारतीय कृषि संकट ने उन्हें जन्म दिया था वह समाप्त नहीं हुआ।
इसलिए 2020–21 की सबसे स्थायी ऐतिहासिक शिक्षा संभवतः कानून वापसी नहीं बल्कि नीति बनाने की प्रक्रिया है
किसान को केवल कृषि सुधार का लाभार्थी मानकर नीति बनाना पर्याप्त नहीं; जिस सुधार से उसकी जमीन, उपज, मूल्य और बाजार का संबंध बदलता हो, उसमें उसे विश्वसनीय भागीदार बनाना भी आवश्यक है।
इसी अर्थ में कृषि कानून विरोधी किसान आंदोलन स्वतंत्र भारत के किसान इतिहास में भूमि से मूल्य, मूल्य से बाजार और बाजार से नीति-निर्माण में भागीदारी तक पहुंचने वाला निर्णायक आंदोलन था।
2020–2021 का आंदोलन न तो केवल तीन कानूनों के कानूनी पाठ का विवाद था, न केवल पंजाब–हरियाणा की सरकारी खरीद व्यवस्था बचाने का प्रयास। इसमें बाजार सुधार और संस्थागत सुरक्षा, केंद्र और राज्य, संसदीय बहुमत और सामाजिक सहमति तथा निजी निवेश और छोटे किसान की असमान सौदेबाजी के प्रश्न एक साथ जुड़े। सरकार ने कृषि बाजार की वास्तविक कमियों की पहचान की, लेकिन अध्यादेश, सीमित पूर्व-परामर्श और भरोसा बनाने में विफलता ने सुधारों की सामाजिक वैधता कमजोर की। आंदोलन ने कानून निरस्त कराकर असाधारण लोकतांत्रिक सफलता हासिल की, किंतु उसका क्षेत्रीय असंतुलन, लंबे मार्ग-अवरोध, 26 जनवरी की हिंसा और कुछ गंभीर आपराधिक घटनाएं आलोचनात्मक समीक्षा की मांग करती हैं। इसकी स्थायी शिक्षा यह है कि किसान को केवल नीति का लाभार्थी नहीं, कृषि सुधार का विश्वसनीय भागीदार बनाना आवश्यक है।
प्राथमिक और प्रमुख संस्थागत स्रोत
स्रोत-सावधानी: आंदोलन में हुई मौतों की कुल संख्या, 26 जनवरी की घटनाओं में संगठनों और व्यक्तियों की भूमिका, ‘खालिस्तानी’ या कॉरपोरेट-हित संबंधी आरोप, कानूनों के संभावित आर्थिक प्रभाव तथा 9 दिसंबर के समझौते के बाद वास्तविक क्रियान्वयन पर सरकारी, किसान-संगठन, दलीय और समाचार स्रोतों में गंभीर मतभेद हैं। कानून का मूल पाठ, न्यायालय का आदेश, संसद की कार्यवाही, सरकारी प्रस्ताव और संगठनात्मक दावा अलग-अलग श्रेणियों में पढ़े जाएँ।