महाराष्ट्र किसान लॉन्ग मार्च (2018–2026)
नासिक से मुंबई तक किसान–आदिवासी प्रतिरोध की नई राजनीति
6 मार्च 2018 को नासिक से चला किसान–आदिवासी काफिला लगभग दो सौ किलोमीटर की पदयात्रा के बाद 12 मार्च को मुंबई के आजाद मैदान पहुँचा। बोर्ड परीक्षार्थियों को असुविधा से बचाने के लिए रात में शहर में प्रवेश करने, बड़ी संख्या में महिलाओं और वनभूमि पर खेती करने वाले आदिवासियों की भागीदारी तथा सरकार से लिखित प्रतिबद्धता हासिल करने ने इसे स्वतंत्र भारत के सबसे स्मरणीय शांतिपूर्ण किसान प्रदर्शनों में स्थान दिया। यह अध्याय 2018 को अकेली घटना नहीं मानता; अधूरे क्रियान्वयन से उपजे 2019 के दूसरे प्रयास, 2023 के नासिक–मुंबई और अकोले–लोणी संघर्षों तथा 2026 की नई लामबंदियों को उसी दीर्घ धारा में पढ़ता है।
कृषि संकट, वनाधिकार और आंदोलन की पृष्ठभूमि
प्रस्तावना : लाल झंडों से भर गई मुंबई की सड़कें
मार्च 2018 में महाराष्ट्र ने स्वतंत्र भारत के किसान आंदोलनों की सबसे प्रभावशाली दृश्य-छवियों में से एक देखी। हजारों किसान और आदिवासी—जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं, छोटे किसानों, खेत मजदूरों और वनभूमि पर खेती करने वाले आदिवासियों की थी—नासिक से पैदल मुंबई की ओर बढ़े।
उनके हाथों में लाल झंडे थे। पैरों में चप्पलें थीं या कई लोगों के पैर नंगे थे। छह दिनों की कठिन पदयात्रा के बाद जब वे मुंबई पहुंचे, तब आंदोलन केवल महाराष्ट्र का कृषि आंदोलन नहीं रह गया था; वह देशव्यापी किसान संकट का प्रतीक बन चुका था।
इस मार्च का एक विशेष प्रसंग भारतीय किसान आंदोलनों की स्मृति में दर्ज हो गया। प्रदर्शनकारियों को पता चला कि मुंबई में विद्यार्थियों की बोर्ड परीक्षाएं हैं। उन्होंने दिन में शहर में प्रवेश करके यातायात बाधित करने के बजाय रात में चलने का निर्णय लिया। इस अनुशासन ने आंदोलन के प्रति शहरी मध्यवर्ग में भी सहानुभूति पैदा की।
लेकिन लॉन्ग मार्च को केवल इस भावनात्मक दृश्य तक सीमित करके देखना गलत होगा।
उसके पीछे महाराष्ट्र में कई वर्षों से जमा हो रहा कृषि मूल्य संकट, कर्ज, वनाधिकार, आदिवासी भूमि, सूखा, फसल नुकसान, बिजली, सिंचाई, भूमि अधिग्रहण और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों का बड़ा प्रश्न था।
महाराष्ट्र का कृषि संकट : लॉन्ग मार्च अचानक क्यों नहीं हुआ
महाराष्ट्र भारतीय कृषि के सबसे विरोधाभासी राज्यों में रहा है। एक ओर गन्ना सहकारिता, अंगूर, प्याज, कपास, सोयाबीन और बागवानी की व्यावसायिक कृषि है; दूसरी ओर विदर्भ, मराठवाड़ा, उत्तर महाराष्ट्र और आदिवासी क्षेत्रों में कृषि संकट अत्यंत गहरा रहा।
1990 के दशक के बाद कृषि लागत बढ़ी। बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, बिजली और सिंचाई की लागत बढ़ने के साथ किसानों की बाजार पर निर्भरता बढ़ती गई।
कपास और प्याज जैसी फसलों में मूल्य का असाधारण उतार-चढ़ाव किसान की आय को अनिश्चित बनाता रहा।
महाराष्ट्र में किसान आत्महत्याओं का प्रश्न भी इसी व्यापक कृषि संकट का हिस्सा बना।
लेकिन नासिक और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों की समस्या कुछ अलग थी।
यहां हजारों परिवार पीढ़ियों से वनभूमि पर खेती करते थे, लेकिन उनके पास उस भूमि का कानूनी स्वामित्व नहीं था।
इसलिए महाराष्ट्र किसान आंदोलन में दो प्रश्न एक साथ जुड़ गए
किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिले और आदिवासी किसान को उस जमीन का अधिकार मिले जिस पर वह पीढ़ियों से खेती कर रहा है।
यही गठजोड़ 2018 के लॉन्ग मार्च की सामाजिक शक्ति बना।
वनाधिकार कानून और आदिवासी प्रश्न
अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 ने वनभूमि पर ऐतिहासिक रूप से निर्भर समुदायों के अधिकारों को कानूनी मान्यता देने की व्यवस्था की।
लेकिन महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में दावे अस्वीकार किए गए या वर्षों तक लंबित रहे।
इसलिए 2018 का आंदोलन केवल कृषि मूल्य या कर्जमाफी का आंदोलन नहीं था।
वनभूमि का अधिकार इसकी केंद्रीय मांगों में था।
विशेष रूप से नासिक, पालघर, ठाणे और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग इसी कारण मार्च में शामिल हुए।
किसान सभा का संगठन और मांगों का साझा मंच
संगठनात्मक पृष्ठभूमि : अखिल भारतीय किसान सभा
2018 के लॉन्ग मार्च का नेतृत्व मुख्य रूप से अखिल भारतीय किसान सभा की महाराष्ट्र इकाई ने किया।
आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेताओं में अशोक ढवले, जे. पी. गावित, अजित नवले और किसान सभा के अन्य राज्यस्तरीय नेता शामिल थे।
किसान सभा की महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में पुरानी संगठनात्मक उपस्थिति थी।
इसी संगठनात्मक नेटवर्क ने गांव-गांव से किसानों को लामबंद किया।
16 फरवरी 2018 को सांगली में महाराष्ट्र राज्य किसान सभा की विस्तारित बैठक में नासिक से मुंबई तक लगभग 200 किलोमीटर की पदयात्रा करने का फैसला किया गया। किसान सभा ने उस समय घोषणा की थी कि मार्च 6 मार्च को शुरू होकर 12 मार्च को मुंबई पहुंचेगा।
लॉन्ग मार्च की मुख्य मांगें
मांगों का दायरा केवल एक मुद्दे तक सीमित नहीं था।
किसानों ने मुख्यतः मांग की
• कृषि कर्ज की व्यापक माफी;
• स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप लाभकारी मूल्य;
• वनाधिकार कानून का प्रभावी क्रियान्वयन;
• वनभूमि पर खेती करने वाले आदिवासियों को भूमि अधिकार;
• मंदिर, चरागाह और अन्य भूमि पर वास्तविक काश्तकारों के अधिकार;
• कपास में गुलाबी सुंडी से हुए नुकसान का मुआवजा;
• ओलावृष्टि और प्राकृतिक आपदाओं की क्षतिपूर्ति;
• वृद्धावस्था तथा सामाजिक सुरक्षा पेंशन में वृद्धि;
• सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार;
• किसान की सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण नहीं;
• मुंबई–अहमदाबाद बुलेट ट्रेन और समृद्धि महामार्ग जैसी परियोजनाओं के लिए जबरन भूमि अधिग्रहण का विरोध;
• नदी-जोड़ परियोजनाओं में आदिवासी क्षेत्रों के हितों की रक्षा।
इस प्रकार आंदोलन में भूमि + कर्ज + मूल्य + वनाधिकार + सामाजिक सुरक्षा + विकास परियोजनाओं के प्रश्न एक साथ जुड़ गए थे।
नासिक से पदयात्रा : किसान, आदिवासी और महिलाएं
6 मार्च 2018 : नासिक से शुरुआत
6 मार्च 2018 को किसानों ने नासिक से मुंबई की ओर पैदल यात्रा शुरू की।
मार्च का लक्ष्य लगभग 200 किलोमीटर दूर मुंबई पहुंचना था।
शुरुआत में आंदोलन को मुख्यतः महाराष्ट्र की क्षेत्रीय खबर के रूप में देखा गया। लेकिन जैसे-जैसे हजारों किसानों का लाल झंडों वाला काफिला मुंबई की ओर बढ़ा, राष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक दलों का ध्यान उस पर गया।
रास्ते में गांवों और कस्बों से समर्थन मिलता गया।
किसान कौन थे?
लॉन्ग मार्च की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक उसका सामाजिक आधार था।
इसमें केवल अपेक्षाकृत संपन्न व्यावसायिक किसान नहीं थे।
बड़ी संख्या में शामिल थे
आदिवासी किसान, छोटे और सीमांत किसान, भूमिहीन या अस्पष्ट भूमि-अधिकार वाले काश्तकार, कृषि मजदूर और महिलाएं।
यही कारण है कि 2018 के महाराष्ट्र आंदोलन को 1980 के दशक के कई ‘नए किसान आंदोलनों’ से अलग करके भी देखा जाता है।
यह केवल कृषि बाजार में बेहतर कीमत की मांग नहीं थी।
इसमें भूमि और वनाधिकार का प्रश्न भी उतना ही शक्तिशाली था।
महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी
मार्च में बड़ी संख्या में किसान और आदिवासी महिलाएं शामिल हुईं।
यह केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं थी।
महिलाएं पूरी पदयात्रा में चलीं और वनभूमि, परिवार की आजीविका, कृषि कर्ज तथा सामाजिक सुरक्षा से संबंधित मांगों की प्रत्यक्ष हितधारक थीं।
इससे महाराष्ट्र के किसान आंदोलन में महिला भागीदारी की वह परंपरा आगे बढ़ी जिसकी जड़ें राज्य के पुराने किसान, मजदूर और आदिवासी आंदोलनों तक जाती हैं।
छालों से भरे पांव और मुंबई का रात्रि-प्रवेश
पैरों के छाले और आंदोलन की राष्ट्रीय छवि
लगभग 200 किलोमीटर पैदल चलने वाले वृद्ध किसानों और महिलाओं के घायल तथा छालों से भरे पैरों की तस्वीरें व्यापक रूप से प्रसारित हुईं।
इन तस्वीरों ने कृषि संकट को आंकड़ों से निकालकर मानवीय चेहरे में बदल दिया।
यही लॉन्ग मार्च की संचार-शक्ति थी।
किसानों को बहुत अधिक प्रचार अभियान चलाने की आवश्यकता नहीं पड़ी—पदयात्रा स्वयं राजनीतिक संदेश बन गई।
मुंबई में प्रवेश और बोर्ड परीक्षा
मुंबई पहुंचते समय किसान नेतृत्व के सामने एक व्यावहारिक समस्या आई।
यदि हजारों प्रदर्शनकारी सुबह शहर की सड़कों से गुजरते, तो यातायात प्रभावित होता और बोर्ड परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों को कठिनाई हो सकती थी।
किसानों ने रात में आगे बढ़ने का निर्णय किया।
इस घटना ने आंदोलन की सार्वजनिक छवि बदल दी।
किसान अब केवल सरकार पर दबाव डालने वाला समूह नहीं दिख रहा था; आंदोलन ने यह संदेश दिया कि वह आम नागरिकों को असुविधा पहुंचाए बिना संघर्ष करना चाहता है।
12 मार्च : आजाद मैदान
12 मार्च 2018 को विशाल किसान समूह मुंबई के आजाद मैदान पहुंच गया।
समकालीन रिपोर्टों में संख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान मिलते हैं—लगभग 35,000 से 50,000 तक।
लेकिन संख्या से अधिक महत्वपूर्ण यह था कि आंदोलन अब महाराष्ट्र सरकार के दरवाजे तक पहुंच चुका था।
सरकार के लिए इसे अनदेखा करना संभव नहीं था।
आजाद मैदान, सरकारी वार्ता और लिखित समझौता
फडणवीस सरकार की प्रतिक्रिया
तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की सरकार ने किसान प्रतिनिधियों से बातचीत शुरू की।
किसान प्रतिनिधिमंडल और मंत्रिस्तरीय समिति के बीच वार्ता हुई।
12 मार्च 2018 को दोनों पक्षों के बीच मांगों पर लिखित निर्णय तैयार हुआ और अगले दिन मुख्यमंत्री ने उसे विधानसभा में रखा।
आंदोलन केवल मौखिक आश्वासन लेकर समाप्त नहीं हुआ था; किसान नेतृत्व ने लिखित सरकारी प्रतिबद्धता हासिल की।
12 मार्च 2018 का समझौता
समझौते में सरकार ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया।
वनाधिकार संबंधी दावों की समीक्षा और भूमि संबंधी प्रश्नों पर कार्रवाई महत्वपूर्ण थी।
कर्जमाफी योजना से वंचित किसानों को शामिल करने के उपाय स्वीकार किए गए।
2008 की कर्जमाफी से कुछ परिस्थितियों में वंचित किसानों को छत्रपति शिवाजी महाराज शेतकरी सम्मान योजना का लाभ देने की बात कही गई।
₹1.50 लाख तक ऋणमाफी से संबंधित विभिन्न श्रेणियों पर निर्णय किए गए।
सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों और लाभकारी मूल्य के प्रश्न को केंद्र सरकार के समक्ष उठाने का आश्वासन दिया।
किसानों की सहमति के बिना विकास परियोजनाओं के लिए भूमि नहीं लेने की बात भी समझौते में दर्ज हुई।
गुलाबी सुंडी तथा ओलावृष्टि से प्रभावित किसानों के मुआवजे पर कार्रवाई का आश्वासन दिया गया।
आंदोलन की पहली बड़ी उपलब्धि
2018 के लॉन्ग मार्च की तत्काल उपलब्धि यह थी कि उसने सरकार को बातचीत और लिखित समझौते के लिए बाध्य किया।
लेकिन उसकी बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि दूसरी थी।
उसने दिखाया कि अनुशासित, लंबी पदयात्रा और व्यापक सामाजिक गठबंधन के माध्यम से किसान आंदोलन राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लौट सकता है।
यह 2020–21 के राष्ट्रीय कृषि कानून विरोधी आंदोलन से लगभग ढाई वर्ष पहले की घटना थी।
इस अर्थ में महाराष्ट्र लॉन्ग मार्च को उस नए किसान उभार की महत्वपूर्ण पूर्वपीठिका माना जा सकता है।
लेकिन समझौते के बाद प्रश्न समाप्त नहीं हुए
लॉन्ग मार्च की सबसे बड़ी सीमा जल्द सामने आई।
समझौता और क्रियान्वयन दो अलग चीजें थीं।
किसान सभा का आरोप रहा कि अनेक आश्वासनों को अपेक्षित गति से लागू नहीं किया गया।
वनाधिकार दावों, कर्जमाफी और कृषि संकट के कई मुद्दे बने रहे।
इसी असंतोष से दूसरे लॉन्ग मार्च की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
2019 का दूसरा मार्च और अधूरे क्रियान्वयन का प्रश्न
फरवरी 2019 : दूसरा किसान लॉन्ग मार्च
लगभग एक वर्ष बाद किसान सभा ने फिर नासिक से मुंबई की ओर मार्च करने का निर्णय किया।
20 फरवरी 2019 को नासिक में बड़ी सभा हुई और 21 फरवरी को किसान मुंबई की ओर बढ़े।
अखिल भारतीय किसान सभा के अनुसार शुरुआत में लगभग 30,000 किसान जुटे थे। संगठन ने आरोप लगाया कि 2018 में दिए गए अनेक आश्वासन लागू नहीं किए गए।
इस बार प्रशासनिक दबाव और पुलिस अनुमति का प्रश्न भी सामने आया।
लेकिन किसानों ने मार्च शुरू कर दिया।
दूसरा मार्च लंबा क्यों नहीं चला?
2018 के अनुभव से सरकार जान चुकी थी कि यदि हजारों किसान फिर मुंबई पहुंच गए तो राजनीतिक दबाव बहुत बढ़ जाएगा।
इसलिए सरकार ने शुरुआती चरण में ही बातचीत तेज की।
दो दिनों के भीतर किसान नेतृत्व और सरकार के बीच वार्ता के बाद आंदोलन समाप्त किया गया।
मार्च की घोषणा → विशाल लामबंदी → सरकार पर दबाव → वार्ता → समयबद्ध आश्वासन।
आगे के महाराष्ट्र किसान आंदोलनों में भी यही रणनीति बार-बार दिखाई देती है।
2020–21 के राष्ट्रीय किसान आंदोलन से संबंध
तीन कृषि कानूनों के खिलाफ 2020–21 में हुए राष्ट्रीय किसान आंदोलन में महाराष्ट्र के किसान संगठनों ने सक्रिय भूमिका निभाई।
महाराष्ट्र से किसान दिल्ली की सीमाओं तक पहुंचे और राज्य के भीतर भी समर्थन कार्यक्रम हुए।
2018 के लॉन्ग मार्च ने जिस पदयात्रा, संगठनात्मक अनुशासन और किसान–आदिवासी गठबंधन को लोकप्रिय बनाया था, उसकी राजनीतिक स्मृति राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान भी जीवित रही।
हालांकि दोनों आंदोलनों की मांगें समान नहीं थीं।
2020–21 का केंद्र तीन केंद्रीय कृषि कानून थे; महाराष्ट्र की लॉन्ग मार्च परंपरा में वनाधिकार और स्थानीय भूमि प्रश्न कहीं अधिक केंद्रीय थे।
प्याज संकट और 2023 की नासिक–मुंबई लामबंदी
प्याज संकट और महाराष्ट्र
महाराष्ट्र देश का प्रमुख प्याज उत्पादक राज्य है और नासिक उसका प्रमुख केंद्र।
प्याज की कीमतों में तीव्र उतार-चढ़ाव ने बार-बार किसानों को संकट में डाला।
कभी खुदरा बाजार में प्याज महंगा होने पर सरकार निर्यात या बाजार संबंधी हस्तक्षेप करती है; दूसरी ओर उत्पादन अधिक होने पर किसान को लागत से भी कम मूल्य मिलने की स्थिति पैदा हो सकती है।
2023 के लॉन्ग मार्च में यही प्रश्न फिर विस्फोटक रूप में सामने आया।
मार्च 2023 : फिर नासिक से मुंबई
13 मार्च 2023 को अखिल भारतीय किसान सभा ने फिर नासिक से मुंबई की ओर किसान लॉन्ग मार्च शुरू किया।
आयोजकों के अनुसार लगभग 10,000 किसानों ने शुरुआत की और इस बार 17 सूत्रीय मांगपत्र सामने रखा गया।
इसने सिद्ध किया कि 2018 का लॉन्ग मार्च किसी एक सरकार या चुनावी परिस्थिति की घटना नहीं था।
पांच वर्ष बाद भी वही संघर्ष-पद्धति प्रभावी थी।
2023 की मांगें
इस बार सबसे चर्चित प्रश्न प्याज का था।
किसान ₹2,000 प्रति क्विंटल मूल्य और तत्काल ₹600 प्रति क्विंटल राहत की मांग कर रहे थे।
लेकिन मांगपत्र इससे कहीं व्यापक था।
कपास, सोयाबीन, अरहर, मूंग, दूध और हिरडा के लाभकारी मूल्य; पूर्ण कर्जमाफी; बिजली बिल माफी; प्रतिदिन 12 घंटे बिजली; प्राकृतिक आपदाओं से नुकसान का मुआवजा; वनभूमि और अन्य भूमि पर काश्तकारों का अधिकार; भूमि अधिग्रहण में बेहतर मुआवजा तथा सामाजिक सुरक्षा की मांगें भी शामिल थीं।
अर्थात पांच वर्ष बाद भी मूल संरचना वही थी
भूमि + मूल्य + कर्ज + बिजली + वनाधिकार + सामाजिक सुरक्षा।
शिंदे–फडणवीस सरकार से वार्ता
मार्च ठाणे जिले के वासिंद तक पहुंच गया।
मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने विधानसभा में घोषणा की कि सरकार किसानों की मांगों पर सकारात्मक निर्णय ले रही है।
प्याज उत्पादकों के लिए सहायता बढ़ाकर ₹350 प्रति क्विंटल करने की घोषणा हुई।
सरकार ने उन आदिवासी किसानों को भी कर्जमाफी योजनाओं का लाभ देने की बात कही जो पहले वंचित रह गए थे।
लेकिन किसान नेतृत्व ने तत्काल आंदोलन समाप्त नहीं किया।
2018 के अनुभव के कारण इस बार नेतृत्व का जोर था
सिर्फ घोषणा नहीं, लिखित आदेश और क्रियान्वयन चाहिए।
यह 2018 से 2023 के बीच आंदोलन की रणनीतिक परिपक्वता का महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
पुंडलिक जाधव की मृत्यु
2023 के मार्च के दौरान एक दुखद घटना हुई।
58 वर्षीय किसान पुंडलिक अंबो जाधव, जो मार्च में शामिल थे, अस्वस्थ हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।
इस घटना ने आंदोलन की मानवीय कीमत को फिर सामने ला दिया।
अंततः सरकारी आश्वासनों के बाद किसानों ने मार्च वापस लेने का निर्णय किया।
अकोले–लोणी संघर्ष से 2026 की वापसी तक
अप्रैल 2023 : अकोले से लोणी
2023 में आंदोलन यहीं समाप्त नहीं हुआ।
अखिल भारतीय किसान सभा और वाम समर्थित संगठनों ने अकोले से तत्कालीन राजस्व मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल के गृहक्षेत्र लोणी की ओर मार्च शुरू किया।
मुख्य प्रश्न फिर वनाधिकार कानून का क्रियान्वयन, फसल क्षतिपूर्ति और विभिन्न श्रमिक वर्गों की मांगें थीं।
लगभग 53 किलोमीटर के प्रस्तावित मार्च के दौरान सरकार से बातचीत हुई और अधिकांश मांगों पर समयबद्ध कार्रवाई के आश्वासन के बाद आंदोलन समाप्त कर दिया गया।
इससे साफ था कि लॉन्ग मार्च महाराष्ट्र में एक घटना से बढ़कर आंदोलन की स्थापित रणनीति बन चुका था।
वनाधिकार प्रश्न फिर भी क्यों बना रहा?
यही महाराष्ट्र आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालिक प्रश्न है।
2006 का कानून मौजूद होने के बावजूद वनभूमि के व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों के दावों की जांच, दस्तावेज, अस्वीकृति और अपील की प्रक्रियाएं जटिल बनी रहीं।
आदिवासी किसान का तर्क था
जिस भूमि पर हमारे परिवार पीढ़ियों से खेती करते हैं, उस पर हमें कानूनी अधिकार क्यों नहीं?
इसलिए महाराष्ट्र के किसान लॉन्ग मार्च को केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य या ऋणमाफी आंदोलन मानना उसकी प्रकृति को गलत समझना होगा।
यह उतना ही आदिवासी भूमि-अधिकार आंदोलन है।
जनवरी 2026 : लॉन्ग मार्च की वापसी
2018 के आठ वर्ष बाद यह आंदोलन फिर उसी प्रश्न के साथ लौटा।
जनवरी 2026 में हजारों किसान और आदिवासी नासिक से मुंबई की ओर बढ़े।
अखिल भारतीय किसान सभा नेतृत्व का आरोप था कि 2018 और बाद के आंदोलनों में किए गए कई वादे अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हुए।
कई ऐसे लोग भी मार्च में शामिल हुए जिन्होंने 2018 के ऐतिहासिक मार्च में हिस्सा लिया था।
विशेष रूप से वनाधिकार दावों का प्रश्न फिर केंद्र में था।
सरकारी बातचीत और आंदोलन का नया विस्तार
फडणवीस सरकार से 2026 की बातचीत
इस बार मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस थे।
मार्च मुंबई की बाहरी सीमा के निकट भातसा नाका तक पहुंचा।
किसान प्रतिनिधिमंडल और मुख्यमंत्री के बीच बातचीत हुई।
सरकार ने प्रमुख मांगों पर समयबद्ध चर्चा और कार्रवाई का आश्वासन दिया, जिसके बाद मार्च स्थगित किया गया।
इस घटनाक्रम का ऐतिहासिक व्यंग्य उल्लेखनीय है
2018 में जिस फडणवीस सरकार के सामने पहला लॉन्ग मार्च पहुंचा था, 2026 में उसी राजनीतिक नेतृत्व के सामने किसान फिर उसी आंदोलन की विरासत लेकर खड़े थे।
फरवरी 2026 : आंदोलन का और विस्तार
2026 में आंदोलन की दूसरी धारा भी सामने आई।
24 फरवरी को अकोले तालुका के राजूर से किसानों, स्वास्थ्य सहायकों, निर्माण मजदूरों और मध्याह्न भोजन कर्मियों का मार्च शुरू हुआ।
यह लगभग 148 किलोमीटर चलकर अहिल्यानगर जिला मुख्यालय पहुंचने वाला था।
करीब 58 किलोमीटर बाद सरकार से समझौता हो गया।
सरकार ने अंशकालिक स्वास्थ्य सहायकों के मानदेय में ₹2,000 तथा विद्यालय पोषण कर्मियों के मानदेय में ₹1,000 वृद्धि सहित कई मांगें स्वीकार कीं। भंडारदरा बांध का पानी आदिवासी किसानों तक पेयजल और सिंचाई के लिए पहुंचाने हेतु सर्वेक्षण का निर्णय भी हुआ।
यह घटना दिखाती है कि लॉन्ग मार्च अब केवल ‘किसान’ की संकीर्ण श्रेणी तक सीमित नहीं रहा; ग्रामीण श्रम और कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े कर्मचारी भी इसके सामाजिक गठबंधन में जुड़ते गए।
मांगों, संघर्ष-पद्धति और किसान राजनीति का रूपांतरण
2018 से 2026 : आंदोलन की मांगों का रूपांतरण
इस आठ वर्षीय यात्रा को तीन चरणों में समझा जा सकता है।
पहला चरण—2018: वनाधिकार + कर्जमाफी + स्वामीनाथन + भूमि + मुआवजा।
दूसरा चरण—2019–23: सरकारी आश्वासनों के क्रियान्वयन + वनाधिकार + प्याज और अन्य फसलों का मूल्य + बिजली + कर्ज।
तीसरा चरण—2023–26: भूमि अधिकार + बाजार मूल्य + सामाजिक सुरक्षा + ग्रामीण मजदूर + आदिवासी जल-संसाधन + पहले समझौतों का क्रियान्वयन।
अर्थात आंदोलन की मांगें समाप्त नहीं हुईं; उनका सामाजिक दायरा बढ़ता गया।
आंदोलन की संघर्ष-पद्धति
महाराष्ट्र लॉन्ग मार्च ने भारतीय किसान आंदोलनों में एक विशिष्ट मॉडल विकसित किया
गांवों में संगठन → मांगपत्र → विशाल पैदल मार्च → राजधानी की ओर बढ़ना → शांतिपूर्ण अनुशासन → जनसहानुभूति → सरकार पर राजनीतिक दबाव → उच्चस्तरीय वार्ता → लिखित या समयबद्ध आश्वासन।
इस रणनीति की सबसे बड़ी शक्ति यह थी कि हिंसक टकराव से बचते हुए भी सरकार पर अत्यधिक राजनीतिक दबाव बनाया जा सकता था।
1980 के किसान आंदोलनों से अंतर
महाराष्ट्र स्वयं शरद जोशी के शेतकरी संगठन के शक्तिशाली किसान आंदोलनों की भूमि रहा है।
लेकिन शेतकरी संगठन और अखिल भारतीय किसान सभा के लॉन्ग मार्च में वैचारिक अंतर महत्वपूर्ण है।
शरद जोशी का जोर मुख्यतः कृषि उत्पादों को बाजार में उचित मूल्य, सरकारी नियंत्रण से मुक्ति और किसान के आर्थिक हित पर था।
लॉन्ग मार्च की सामाजिक संरचना अधिक बहुस्तरीय थी।
कृषि मूल्य, कर्जमाफी, वनाधिकार, आदिवासी भूमि, सामाजिक सुरक्षा, सार्वजनिक वितरण और ग्रामीण मजदूर
इसीलिए इसे किसान–आदिवासी–ग्रामीण श्रम गठबंधन के रूप में देखना अधिक उचित है।
2020–21 आंदोलन से तुलना
दिल्ली सीमा का किसान आंदोलन मुख्यतः पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की प्रारंभिक शक्ति पर खड़ा हुआ और बाद में राष्ट्रीय हुआ।
महाराष्ट्र लॉन्ग मार्च का सामाजिक आधार अलग था।
यहां आदिवासी और छोटे किसान कहीं अधिक प्रमुख थे।
दिल्ली आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा कृषि कानून था।
वनाधिकार, कर्ज, फसल मूल्य, प्याज, भूमि और सामाजिक सुरक्षा
लेकिन दोनों आंदोलनों की एक साझा विशेषता थी
लंबे शांतिपूर्ण जनदबाव द्वारा सरकार को वार्ता की मेज तक लाना।
आंदोलन की उपलब्धियां और अंतर्विरोध
प्रमुख उपलब्धियां
महाराष्ट्र लॉन्ग मार्च की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल सरकारी रियायतों की सूची नहीं है।
उसने किसान राजनीति को नया दृश्य और नैतिक प्रतीक दिया।
उसने आदिवासी वनाधिकार को राज्यस्तरीय और राष्ट्रीय किसान विमर्श में प्रमुख स्थान दिलाया।
उसने सरकारों को बार-बार बातचीत के लिए मजबूर किया।
उसने छोटे किसान, आदिवासी, महिला और ग्रामीण मजदूर को एक साझा आंदोलनात्मक मंच पर खड़ा किया।
उसने पदयात्रा को इक्कीसवीं सदी के किसान आंदोलन का प्रभावी राजनीतिक हथियार पुनः बना दिया।
सीमाएं और अंतर्विरोध
फिर भी आंदोलन की सीमाएं स्पष्ट हैं।
समझौते और क्रियान्वयन के बीच दूरी।
2018 में सरकार ने कई मांगें स्वीकार कीं।
2019 में किसानों को फिर निकलना पड़ा।
2023 में वही शिकायत दोहराई गई।
2026 में भी आंदोलनकारी पुराने वादों के अधूरे क्रियान्वयन का प्रश्न उठा रहे थे।
इसलिए लॉन्ग मार्च सरकार से घोषणा तो हासिल कर सकता है, लेकिन प्रशासनिक मशीनरी से स्थायी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना कहीं कठिन साबित हुआ।
दूसरी सीमा क्षेत्रीय है।
आंदोलन का सबसे मजबूत आधार उत्तर महाराष्ट्र और आदिवासी पट्टी में रहा है।
तीसरी समस्या कृषि संकट की संरचनात्मक प्रकृति है।
प्याज या कपास की कीमत का संकट केवल राज्य सरकार के निर्णय से समाप्त नहीं हो सकता। उसमें राष्ट्रीय कृषि बाजार, निर्यात–आयात नीति, उत्पादन चक्र और वैश्विक कीमतें भी शामिल हैं।
समेकित निष्कर्ष : जमीन, उपज, आय और जीवन का अधिकार
निष्कर्ष : महाराष्ट्र लॉन्ग मार्च को कैसे समझें?
2018 का नासिक–मुंबई लॉन्ग मार्च भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
लेकिन उसका महत्व समझने के लिए उसे केवल 6–12 मार्च 2018 की छह दिन की पदयात्रा के रूप में नहीं देखना चाहिए।
उसकी वास्तविक ऐतिहासिक यात्रा है
2018 का नासिक–मुंबई मार्च → 2019 का दूसरा लॉन्ग मार्च → 2020–21 का राष्ट्रीय किसान उभार → 2023 का नासिक–मुंबई मार्च → अकोले–लोणी संघर्ष → जनवरी 2026 का नासिक–मुंबई अभियान → फरवरी 2026 का राजूर–अहिल्यानगर मार्च।
इस पूरी यात्रा के केंद्र में एक स्थायी प्रश्न रहा है
किसान को जमीन, उपज, आय और जीवन पर कितना अधिकार है?
महाराष्ट्र के आदिवासी किसान के लिए इसका अर्थ है—जिस वनभूमि पर वह पीढ़ियों से खेती कर रहा है, उसका कानूनी अधिकार।
प्याज उत्पादक के लिए इसका अर्थ है—उपज का ऐसा मूल्य जो उसे घाटे में न धकेले।
कर्जग्रस्त किसान के लिए इसका अर्थ है—ऋण के दुष्चक्र से मुक्ति।
खेत मजदूर और ग्रामीण गरीब के लिए इसका अर्थ है—पेंशन, राशन, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा।
यही कारण है कि महाराष्ट्र किसान लॉन्ग मार्च को केवल “किसान प्रदर्शन” कहना पर्याप्त नहीं है।
यह स्वतंत्र भारत में भूमि-अधिकार से आय-अधिकार और वनाधिकार से सामाजिक सुरक्षा तक फैले ग्रामीण अधिकार आंदोलन की एक महत्वपूर्ण धारा है।
2018 की सबसे प्रसिद्ध तस्वीर लाल झंडे लेकर रात में मुंबई की ओर चलते किसानों की थी। लेकिन उसकी सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरासत तस्वीर नहीं, एक राजनीतिक पद्धति है
संगठन बनाओ, गांवों को जोड़ो, पैदल राजधानी की ओर चलो, जनता को अपने पक्ष में रखो, सरकार को वार्ता के लिए बाध्य करो और आश्वासन को लिखित निर्णय में बदलो।
और 2019, 2023 तथा 2026 की पुनरावृत्तियां इसका दूसरा पक्ष भी बताती हैं
किसान आंदोलन की जीत समझौता प्राप्त करने पर पूरी नहीं होती; असली परीक्षा उस समझौते को खेत और गांव तक लागू कराने में है।
इसी उपलब्धि और इसी अधूरेपन के बीच महाराष्ट्र किसान लॉन्ग मार्च, 2018–2026 का ऐतिहासिक महत्व स्थित है।
यह अध्याय 2018 की मूल पदयात्रा तक सीमित न रखकर 2026 तक अद्यतन किया गया है, ताकि वेबसाइट पर इसे अलग-अलग घटनाओं के बजाय महाराष्ट्र की एक सतत किसान–आदिवासी आंदोलन-धारा के रूप में प्रकाशित किया जा सके।
महाराष्ट्र का लंबा किसान मार्च केवल कर्जमाफी या फसल-मूल्य का आंदोलन नहीं था। इसकी विशिष्टता खेतिहर और आदिवासी प्रश्नों के मेल में थी—उपज का लाभकारी मूल्य, ऋण राहत और आपदा मुआवजे के साथ वनभूमि पर वास्तविक खेती करने वालों का अधिकार, सामाजिक सुरक्षा, पानी, बिजली और विकास परियोजनाओं में सहमति। इसकी उपलब्धि व्यापक सामाजिक गठबंधन, अनुशासित पदयात्रा, शहरी सहानुभूति और लिखित सरकारी प्रतिबद्धता थी। इसकी सीमा भी उतनी ही स्पष्ट रही: समझौते और जमीन पर क्रियान्वयन के बीच दूरी ने 2019, 2023 और 2026 में बार-बार लामबंदी को आवश्यक बनाया। इसीलिए इसकी विरासत किसी एक दिन की जीत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक दबाव, प्रत्यक्ष भागीदारी और सरकारी जवाबदेही की निरंतर परीक्षा है।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: 2018 और बाद के मार्चों में प्रतिभागियों की संख्या, चली गई दूरी, मांगपत्र के बिंदुओं, सरकारी समझौतों और उनके वास्तविक क्रियान्वयन पर सरकारी, संगठनात्मक तथा समाचार स्रोतों में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। आंदोलनकारी संगठन के दावे को सरकारी उपलब्धि का प्रमाण न मानें और सरकारी घोषणा को स्वतः पूर्ण क्रियान्वयन न समझें। तिथि, लिखित आदेश, लाभार्थी और मैदानी परिणाम का परस्पर मिलान आवश्यक है।