मंदसौर किसान आंदोलन (2017)
बंपर पैदावार के संकट से पुलिस गोलीबारी और राष्ट्रीय किसान उभार तक
मंदसौर किसान आंदोलन ने भारतीय कृषि के उस विरोधाभास को उजागर किया जिसमें बढ़ी हुई पैदावार भी किसान की आय-सुरक्षा की गारंटी नहीं बनती। प्याज और अन्य उपज के गिरते भाव, बढ़ती लागत, ऋण और लाभकारी मूल्य की मांग ने 1 जून 2017 को मालवा–निमाड़ से किसान हड़ताल का रूप लिया। 6 जून को मंदसौर जिले के पिपलियामंडी क्षेत्र में पुलिस गोलीबारी में पांच प्रदर्शनकारियों की मृत्यु हुई; व्यापक हिंसक घटनाक्रम में हुई छठी मृत्यु को गोलीबारी की संख्या में जोड़ देने से सार्वजनिक विवरणों में भ्रम पैदा हुआ। आंदोलन, सरकारी प्रतिक्रिया, जैन आयोग, भावांतर योजना और बाद में बनी राष्ट्रीय किसान एकता ने मंदसौर को 2020–21 के आंदोलन की महत्वपूर्ण पूर्वपीठिका बनाया।
कृषि सफलता के पीछे मालवा–निमाड़ का असंतोष
मध्य प्रदेश : कृषि सफलता के पीछे बढ़ता असंतोष
मंदसौर आंदोलन को समझने के लिए पहले उस विरोधाभास को समझना होगा जो 2017 के मध्य प्रदेश में मौजूद था।
शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार मध्य प्रदेश की तेज कृषि वृद्धि को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती थी। सिंचाई क्षेत्र बढ़ा था, उत्पादन बढ़ा था और कई फसलों में प्रदेश महत्वपूर्ण उत्पादक बन चुका था।
लेकिन कृषि उत्पादन की वृद्धि और किसान की आय में वृद्धि एक ही चीज नहीं हैं।
किसान के सामने तीन अलग-अलग जोखिम थे
उत्पादन का जोखिम, अर्थात फसल खराब होने का खतरा;
मूल्य का जोखिम, अर्थात अच्छी फसल होने पर बाजार भाव गिर जाना;
और ऋण का जोखिम, अर्थात फसल बेचने के बाद भी कर्ज चुकाने लायक आय न होना।
2016–17 में यही दूसरा संकट विशेष रूप से दिखाई दिया—अधिक उत्पादन के कारण कीमतों का गिरना।
मालवा–निमाड़ : आंदोलन का केंद्र क्यों बना?
मंदसौर, नीमच, रतलाम, उज्जैन, देवास, धार और इंदौर सहित पश्चिमी मध्य प्रदेश का मालवा–निमाड़ क्षेत्र अत्यंत सक्रिय कृषि अर्थव्यवस्था वाला इलाका है।
मंदसौर–नीमच क्षेत्र विशेष रूप से
गेहूं, सोयाबीन, चना, प्याज, लहसुन, धनिया तथा अन्य वाणिज्यिक फसलों के उत्पादन और मंडी व्यापार के लिए जाना जाता है।
इस कृषि संरचना की विशेषता यह थी कि किसान बाजार से अपेक्षाकृत अधिक जुड़ा हुआ था। इसलिए बाजार मूल्य में तेज गिरावट का प्रभाव भी तत्काल पड़ता था।
किसान के लिए समस्या केवल यह नहीं थी कि फसल खराब हुई। कई मामलों में समस्या उलटी थी
फसल अच्छी हुई, लेकिन उसे बेचने पर लागत तक नहीं मिली।
यही मंदसौर संकट का आर्थिक केंद्र था।
मूल्य, ऋण और लाभकारी भाव का प्रश्न
प्याज और दूसरी फसलों का मूल्य संकट
2017 के किसान असंतोष में प्याज की गिरती कीमत प्रतीक बन गई।
अच्छे उत्पादन के बाद मंडियों में आवक बढ़ी। कई स्थानों पर किसान बेहद कम दाम पर प्याज बेचने को मजबूर हुए। समकालीन रिपोर्टों में किसानों द्वारा लगभग ₹1.50–3 प्रति किलो तक प्याज बेचने की स्थितियों का उल्लेख मिलता है, जबकि उत्पादन लागत इससे अधिक बताई जा रही थी।
यह केवल प्याज की कहानी नहीं थी।
लहसुन, दालों और अन्य कृषि उत्पादों के बाजार भाव को लेकर भी असंतोष था।
इस परिस्थिति ने किसान के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया
यदि उत्पादन बढ़ने पर कीमत इतनी गिर जाएगी कि लागत भी न निकले, तो अधिक उत्पादन का किसान को लाभ क्या है?
ऋण का प्रश्न
दूसरी बड़ी समस्या कृषि ऋण थी।
खेती की बढ़ती लागत ने किसान को बीज, उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई, बिजली, डीजल और कृषि मशीनरी पर अधिक खर्च करने के लिए बाध्य किया था।
यदि उपज का मूल्य पर्याप्त न मिले तो किसान का पूरा वित्तीय चक्र टूट जाता है।
इसी समय उत्तर प्रदेश में 2017 में नई योगी आदित्यनाथ सरकार ने छोटे और सीमांत किसानों के कृषि ऋण की माफी की घोषणा की। इसका राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ोसी राज्यों के किसानों पर भी पड़ा।
मध्य प्रदेश के किसानों का सवाल स्वाभाविक था
यदि उत्तर प्रदेश सरकार कृषि ऋण माफ कर सकती है तो मध्य प्रदेश क्यों नहीं?
ऋणमाफी इसलिए आंदोलन की प्रमुख मांग बन गई।
स्वामीनाथन आयोग और लाभकारी मूल्य
आंदोलन का दूसरा केंद्रीय प्रश्न था
किसान की फसल का लाभकारी मूल्य।
राष्ट्रीय किसान आयोग, जिसकी अध्यक्षता डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने की थी, की सिफारिशों की राजनीतिक व्याख्या लंबे समय से कृषि लागत के ऊपर लगभग 50 प्रतिशत प्रतिफल सुनिश्चित करने की मांग से जुड़ी रही।
एमएसपी घोषित होना पर्याप्त नहीं है;
यदि सरकार उस मूल्य पर खरीद ही नहीं करती तो किसान मंडी में व्यापारी द्वारा निर्धारित कम कीमत पर बेचने को मजबूर होता है।
इसलिए मंदसौर आंदोलन का प्रश्न केवल
“किसान को वास्तव में अपनी फसल किस कीमत पर बेचनी पड़ रही है?”
आंदोलन की तैयारी, हड़ताल और सरकारी प्रतिक्रिया
किसान आंदोलन की तैयारी
2017 के शुरुआती महीनों में पश्चिमी मध्य प्रदेश में किसान संगठनों और स्थानीय किसान समूहों के बीच असंतोष बढ़ने लगा।
भारतीय किसान संघ, भारतीय किसान यूनियन और विभिन्न स्थानीय किसान संगठनों तथा समूहों की गतिविधियां चल रही थीं। लेकिन आंदोलन को किसी एक संगठन का आंदोलन मानना ऐतिहासिक रूप से सरलीकरण होगा।
मंदसौर आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यही थी
इसका बड़ा हिस्सा विकेंद्रित और स्थानीय था।
एक केंद्रीकृत नेतृत्व नहीं था जो पूरे आंदोलन को आदेश दे रहा हो।
यह विशेषता बाद में आंदोलन की शक्ति भी बनी और कमजोरी भी।
1 जून 2017 : किसान हड़ताल
किसानों ने 1 जून से आंदोलन शुरू किया।
शहरों में दूध और सब्जियों की आपूर्ति रोकना।
यदि किसान अपनी उपज शहरों तक पहुंचाना बंद कर दे तो शहरी समाज तत्काल समझेगा कि कृषि और किसान उसके दैनिक जीवन के लिए कितने आवश्यक हैं।
दूध सड़कों पर बहाए जाने और सब्जियां फेंके जाने की तस्वीरें आंदोलन की पहचान बन गईं।
इसका उद्देश्य केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाना नहीं था; यह एक राजनीतिक संदेश भी था
“जिस उत्पादन का उचित मूल्य नहीं मिलता, उसे बाजार में क्यों पहुंचाया जाए?”
आंदोलन का तेजी से विस्तार
1 जून के बाद आंदोलन पश्चिमी मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में फैलने लगा।
मंदसौर, नीमच, रतलाम, धार, देवास, उज्जैन और आसपास के क्षेत्रों में असंतोष दिखाई दिया।
मंडियों और परिवहन पर असर पड़ा।
धीरे-धीरे शांत आर्थिक असहयोग और हिंसक घटनाओं के बीच की सीमा टूटने लगी।
यहीं से प्रशासन के सामने गंभीर चुनौती उत्पन्न हुई।
सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया
शिवराज सिंह चौहान सरकार ने आंदोलन को शांत करने के लिए किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से बातचीत की।
सरकार ने कृषि उपज की खरीद और किसानों को राहत देने संबंधी कई कदम घोषित किए।
लेकिन यहां एक गंभीर समस्या सामने आई
किससे समझौता किया जाए?
कुछ संगठनों और सरकार के बीच सहमति होने का अर्थ यह नहीं था कि जमीन पर आंदोलन कर रहे सभी किसान उससे सहमत थे।
इस कारण सरकार द्वारा आंदोलन समाप्त होने की अपेक्षा पूरी नहीं हुई।
5–6 जून : टकराव, गोलीबारी और पांच मौतें
4–5 जून : तनाव बढ़ता गया
मालवा क्षेत्र में आंदोलन का स्वरूप लगातार उग्र होता गया।
वाहनों को रोकने, तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं सामने आने लगीं।
सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद का तंत्र प्रभावी नहीं रहा।
बाद में न्यायिक जांच में भी प्रशासन और किसानों के बीच संचार की कमी तथा प्रशासन द्वारा स्थिति का सही आकलन न कर पाने की समस्या सामने आई।
6 जून 2017।
6 जून : मंदसौर का निर्णायक दिन
6 जून को मंदसौर जिले में आंदोलन अत्यंत तनावपूर्ण हो गया।
प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव हुआ।
सरकारी विवरण के अनुसार आंदोलन के दौरान हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। राज्य सरकार द्वारा केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी रिपोर्ट में कहा गया कि प्रदर्शन के दौरान 25 ट्रक और दो पुलिस वाहन जलाए गए और पुलिस ने पहले लाठीचार्ज तथा आंसू गैस का इस्तेमाल किया।
स्थिति अंततः गोलीबारी तक पहुंची।
गोलीबारी दो स्थानों पर
बाद की जैन आयोग जांच के विवरण के अनुसार गोलीबारी से संबंधित घटनाएं मुख्यतः दो स्थानों से जुड़ी थीं
बही पार्श्वनाथ क्षेत्र
पिपलियामंडी पुलिस थाने के आसपास।
आयोग के अनुसार बही पार्श्वनाथ में भीड़ और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों के बीच गंभीर टकराव हुआ और हथियार छीनने की कोशिश की स्थिति बनी। वहां सुरक्षा बल द्वारा गोली चलाई गई।
दूसरी घटना पिपलियामंडी क्षेत्र में हुई, जहां भीड़ पुलिस थाने की ओर बढ़ी और स्थिति गंभीर हुई। आयोग के विवरण के अनुसार आंसू गैस और लाठीचार्ज से भीड़ नियंत्रित न होने के बाद गोली चलाई गई।
पांच प्रदर्शनकारियों की मौत
मध्य प्रदेश विधानसभा में सरकार ने बाद में आधिकारिक रूप से बताया कि 6 जून की घटनाओं में पांच आंदोलनकारियों की मृत्यु और छह घायल हुए।
मृतकों की पहचान संबंधी विभिन्न समकालीन रिपोर्टों में वर्तनी और आयु संबंधी मामूली अंतर मिलते हैं, इसलिए शोध में आधिकारिक अभिलेख को प्राथमिकता देना उचित है।
गोलीबारी के तत्काल बाद स्थिति और विस्फोटक हो गई।
छठी मृत्यु, सरकारी विरोधाभास और प्रशासनिक नियंत्रण
छठी मृत्यु और संख्या को लेकर भ्रम
मंदसौर आंदोलन में सामान्यतः छह किसानों/आंदोलनकारियों की मृत्यु का उल्लेख किया जाता है।
इसका कारण यह है कि पांच व्यक्तियों की मृत्यु 6 जून की गोलीबारी में हुई, जबकि एक अन्य व्यक्ति की बाद में कथित पुलिस कार्रवाई से जुड़ी चोटों के बाद मृत्यु हुई।
जैन आयोग भी व्यापक रूप से छह मौतों से संबंधित परिस्थितियों की जांच से जुड़ा।
इसलिए दो अलग-अलग संख्याएं दिखाई देती हैं
गोलीबारी में तत्काल/प्रत्यक्ष मौतें — पांच।
व्यापक मंदसौर आंदोलन से जुड़ी मृतक संख्या — छह।
यह अंतर बनाए रखना ऐतिहासिक शुद्धता के लिए आवश्यक है।
सरकार का प्रारंभिक विरोधाभास
गोलीबारी के तुरंत बाद सबसे बड़ा विवाद यह हुआ कि
गोली किसने चलाई?
शुरुआती सरकारी प्रतिक्रियाओं में पुलिस द्वारा गोली चलाने से इनकार किया गया। तत्कालीन गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह ने भी प्रारंभ में पुलिस गोलीबारी से इनकार किया।
लेकिन यह स्थिति टिक नहीं सकी।
कुछ दिनों के भीतर मध्य प्रदेश सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी रिपोर्ट में स्वीकार किया कि
पांच प्रदर्शनकारी पुलिस गोलीबारी में मारे गए थे।
इस प्रारंभिक विरोधाभास ने सरकार की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया।
हिंसा और आगजनी
गोलीबारी के बाद आंदोलन और उग्र हो गया।
वाहनों, सरकारी संपत्ति और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं हुईं।
आंदोलन मंदसौर से बाहर भी फैलने लगा।
राज्य सरकार की केंद्र को दी गई जानकारी के अनुसार हिंसा का असर मंदसौर के अतिरिक्त धार, झाबुआ, नीमच, रतलाम, देवास, शाजापुर और सीहोर सहित कई जिलों तक पहुंचा।
इस बिंदु पर किसान आंदोलन राज्यव्यापी कानून-व्यवस्था संकट में बदलता दिखाई देने लगा।
इंटरनेट बंद और प्रशासनिक नियंत्रण
तनावपूर्ण क्षेत्रों में संचार और आवाजाही पर नियंत्रण लगाया गया।
इंटरनेट सेवाएं प्रभावित/निलंबित की गईं और पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों की तैनाती बढ़ाई गई।
प्रशासन की प्राथमिकता अब दोहरी थी
और आंदोलन को दूसरे क्षेत्रों में फैलने से रोकना।
लेकिन गोलीबारी की खबर देशभर में फैल चुकी थी।
मंदसौर अब स्थानीय आंदोलन नहीं रहा।
मुआवजा, मुख्यमंत्री, उपवास और विपक्ष
मुआवजा : एक करोड़ रुपये
राज्य सरकार ने मृतकों के परिवारों के लिए अत्यंत बड़ा मुआवजा घोषित किया।
अंततः प्रत्येक मृतक के आश्रित परिवार को ₹1 करोड़ दिए जाने का सरकारी पक्ष न्यायालय में भी दर्ज हुआ।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में 2019 की कार्यवाही के दौरान सरकार ने बताया कि मृतकों के आश्रितों को एक-एक करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है।
लेकिन मुआवजे ने जवाबदेही के प्रश्न को समाप्त नहीं किया।
गोली चलाने की नौबत क्यों आई?
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की राजनीतिक चुनौती
मंदसौर ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उनके राजनीतिक जीवन की गंभीर चुनौतियों में से एक के सामने खड़ा कर दिया।
चौहान ने स्वयं को लंबे समय से किसान हितैषी नेता के रूप में प्रस्तुत किया था।
मध्य प्रदेश की कृषि वृद्धि उनकी सरकार की उपलब्धियों में गिनी जाती थी।
लाभकारी मूल्य मांग रहे किसानों की पुलिस गोलीबारी में मृत्यु हो गई थी।
राजनीतिक विरोधाभास बहुत बड़ा था।
मुख्यमंत्री का उपवास
स्थिति शांत करने के लिए शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल में 10 जून 2017 से उपवास शुरू किया।
उन्होंने किसानों से शांति बनाए रखने की अपील की और किसान प्रतिनिधियों से मुलाकात की।
सरकार ने संकेत दिया कि किसानों की समस्याओं पर कदम उठाए जाएंगे।
शांति लौटने का दावा करते हुए मुख्यमंत्री ने अगले दिन उपवास समाप्त किया। बाद में उन्होंने आश्वासन दिया कि मंदसौर मौतों के लिए दोषी पाए जाने वालों को दंडित किया जाएगा।
यह उपवास राजनीतिक संकट प्रबंधन का असाधारण प्रयोग था।
लेकिन विपक्ष ने इसे प्रतीकात्मक राजनीति बताया।
राहुल गांधी और विपक्ष की सक्रियता
मंदसौर राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति का केंद्र बन गया।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी मृतक किसानों के परिवारों से मिलने के लिए मध्य प्रदेश पहुंचे।
प्रशासन ने उन्हें मंदसौर जाने से रोका और हिरासत में लिया गया।
कांग्रेस ने घटना को भाजपा सरकार की किसान नीति के विरुद्ध बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठाया।
अन्य किसान नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने भी मंदसौर पहुंचने या आंदोलन के समर्थन का प्रयास किया।
इससे आंदोलन राष्ट्रीय समाचार और संसद की बहस का विषय बन गया।
किसान मांगें, न्यायिक जाँच और मानवाधिकार
किसान संगठनों की व्यापक मांगें
मंदसौर के बाद देश के विभिन्न किसान संगठनों ने मुद्दे को व्यापक राष्ट्रीय कृषि संकट से जोड़ा।
अखिल भारतीय किसान सभा ने जून 2017 में जिन मांगों को उठाया उनमें
स्वामीनाथन आयोग के आधार पर लागत से 50 प्रतिशत ऊपर एमएसपी,
और किसान विरोधी समझी जा रही नीतियों में परिवर्तन शामिल थे।
मंदसौर की स्थानीय गोलीबारी राष्ट्रीय किसान एजेंडे से जुड़ गई।
न्यायिक जांच की घोषणा
जनदबाव के बीच मध्य प्रदेश सरकार ने न्यायिक जांच का निर्णय लिया।
सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे. के. जैन की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग गठित किया गया।
गोलीबारी किन परिस्थितियों में हुई;
बल प्रयोग परिस्थितियों के अनुरूप और उचित था या नहीं;
यदि अनुचित था तो कौन जिम्मेदार था;
जिला प्रशासन और पुलिस ने समय पर पर्याप्त कदम उठाए थे या नहीं।
आयोग से प्रारंभ में तीन महीने में रिपोर्ट देने की अपेक्षा थी।
लेकिन जांच इससे काफी लंबी चली।
प्रशासनिक फेरबदल
मंदसौर संकट के बाद राज्य सरकार ने प्रशासनिक स्तर पर भी परिवर्तन किए।
अधिकारियों के तबादले हुए और राज्य के गृह सचिव तक बदले गए। जून 2017 में गृह सचिव मधु खरे के स्थान पर केदार शर्मा की नियुक्ति की गई।
यह इस बात का संकेत था कि सरकार स्वयं मान रही थी कि संकट केवल सड़क पर प्रदर्शनकारियों की समस्या नहीं था; प्रशासनिक प्रबंधन भी प्रश्नों के घेरे में था।
मानवाधिकार का प्रश्न
मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने भी घटना का संज्ञान लिया।
आयोग ने मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, मंदसौर कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक से जवाब मांगा।
किसान संगठनों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने मांग की कि
गोली चलाने वालों और आदेश देने वालों की जवाबदेही तय हो,
किसानों पर आंदोलन संबंधी मुकदमे वापस लिए जाएं।
इस प्रकार मंदसौर अब कृषि अर्थशास्त्र के साथ-साथ राज्य द्वारा बल प्रयोग और नागरिक अधिकारों का प्रश्न भी बन गया।
जैन आयोग के निष्कर्ष और विवाद
जैन आयोग : जांच में देरी
आयोग को तीन महीने का समय दिया गया था, लेकिन जांच लगभग एक वर्ष चली।
आखिरकार न्यायमूर्ति जैन ने जून 2018 में रिपोर्ट सरकार को सौंप दी।
रिपोर्ट के निष्कर्ष आंदोलन के राजनीतिक विमर्श से काफी अलग थे।
जैन आयोग का सबसे विवादास्पद निष्कर्ष
आयोग ने पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की गोलीबारी को परिस्थितियों में
“नितांत आवश्यक” और “न्यायसंगत”
आयोग का निष्कर्ष था कि सुरक्षा बलों को गंभीर हिंसक परिस्थिति का सामना करना पड़ा था और आत्मरक्षा तथा स्थिति नियंत्रित करने के लिए गोली चलाना आवश्यक हो गया था।
इस प्रकार आयोग ने गोलीबारी के लिए पुलिस तथा सुरक्षा बलों को व्यापक रूप से दोषमुक्त किया।
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।
आयोग ने प्रशासन की कमियां भी बताईं
जैन आयोग की रिपोर्ट को केवल “पुलिस को क्लीन चिट” कह देना अधूरा होगा।
आयोग ने प्रशासनिक तैयारियों और प्रक्रिया में कमियां भी इंगित कीं।
प्रशासन आंदोलन की गंभीरता का सही अनुमान नहीं लगा पाया;
खुफिया तंत्र पर्याप्त प्रभावी नहीं था;
किसानों और प्रशासन के बीच संवाद की कमी थी;
प्रशासन को किसानों की मांगों की पर्याप्त जानकारी नहीं थी;
और गोलीबारी की प्रक्रिया में भी निर्धारित नियमों के पालन को लेकर प्रश्न थे।
एक महत्वपूर्ण आलोचना यह भी सामने आई कि गोली चलाते समय पहले निचले हिस्से को निशाना बनाने जैसी प्रक्रियाओं का पर्याप्त पालन नहीं हुआ।
अर्थात आयोग का निष्कर्ष दोहरा था
गोली चलाने की आवश्यकता को सही माना गया, लेकिन उस स्थिति तक पहुंचने से पहले प्रशासनिक विफलताएं मौजूद थीं।
“असामाजिक तत्व” वाला निष्कर्ष
आयोग ने यह भी माना कि आंदोलन के कुछ हिस्सों में असामाजिक तत्वों ने स्थिति को अपने नियंत्रण में ले लिया था।
विशेषकर उस समय जब कोई स्पष्ट नेतृत्व भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उपस्थित नहीं था।
यही मंदसौर आंदोलन की संगठनात्मक कमजोरी का एक महत्वपूर्ण पहलू था।
जब आंदोलन का केंद्रीय नेतृत्व कमजोर या अस्पष्ट हो और हजारों लोग सड़क पर हों, तब
एक ही भीड़ में मिल सकते हैं।
इसके बाद यह निर्धारित करना कठिन हो जाता है कि कौन किसान था, कौन प्रदर्शनकारी था और हिंसा किसने शुरू की।
रिपोर्ट, भावांतर योजना और नीति की नई दिशा
जांच रिपोर्ट पर विवाद
किसान संगठनों और विपक्ष के लिए आयोग की पुलिस को दी गई राहत स्वीकार्य नहीं थी।
यदि प्रशासनिक और खुफिया विफलता थी,
यदि भीड़ नियंत्रण की तैयारी अपर्याप्त थी,
तो ऐसी परिस्थिति पैदा होने की जिम्मेदारी किसकी थी जिसमें किसानों पर गोली चलानी पड़ी?
क्या हिंसक भीड़ में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति घातक बल प्रयोग का वैध लक्ष्य माना जा सकता था?
इसी कारण आयोग की रिपोर्ट ने विवाद समाप्त करने के बजाय जवाबदेही की नई बहस पैदा की।
रिपोर्ट विधानसभा में रखने का विवाद
जैन आयोग की रिपोर्ट से जुड़ा एक विवाद लंबे समय तक चलता रहा—इसे मध्य प्रदेश विधानसभा में रखने का प्रश्न।
2021 में विधानसभा में भी सरकार से पूछा गया कि रिपोर्ट कब प्राप्त हुई और सदन में क्यों नहीं रखी गई।
मामला बाद में उच्च न्यायालय तक पहुंचा।
2024 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने आयोग की रिपोर्ट विधानसभा में रखवाने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने छह-सात वर्ष बीत जाने सहित कानूनी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसा निर्देश देने योग्य प्रवर्तनीय अधिकार नहीं माना।
इससे मंदसौर गोलीकांड की संस्थागत जवाबदेही पर बहस कई वर्षों तक जीवित रही।
भावांतर भुगतान योजना : मंदसौर के बाद नीति की नई दिशा
मंदसौर आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण नीतिगत प्रभाव मूल्य संरक्षण के प्रश्न पर दिखाई दिया।
मध्य प्रदेश सरकार ने 2017 में मुख्यमंत्री भावांतर भुगतान योजना शुरू की।
यदि मंडी में किसान को मिलने वाला बाजार मूल्य निर्धारित संदर्भ मूल्य से कम है, तो अंतर का कुछ हिस्सा सरकार किसान को दे।
यह परंपरागत सरकारी खरीद से अलग मॉडल था।
सरकार को पूरी फसल खरीदकर भंडारण करने की आवश्यकता नहीं थी; किसान बाजार में उपज बेचता और मूल्य अंतर की भरपाई सरकार करती।
मंदसौर के बाद यह प्रयोग इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उसने एक नए प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास किया
यदि सरकार हर फसल खरीद नहीं सकती तो किसान को गिरती बाजार कीमत से कैसे बचाया जाए?
भावांतर की सीमाएं, चुनाव और राष्ट्रीय किसान एकता
भावांतर योजना की सीमाएं
योजना अभिनव थी, लेकिन विवादमुक्त नहीं।
आलोचकों ने आशंका जताई कि यदि व्यापारियों को पता है कि कीमत का अंतर सरकार देगी तो वे बाजार भाव और नीचे रख सकते हैं।
संदर्भ मूल्य कैसे तय किया जाए?
किस किसान की कितनी उपज पात्र मानी जाए?
मंडी में वास्तविक बिक्री और दस्तावेजी बिक्री का सत्यापन कैसे हो?
इसलिए भावांतर ने मूल्य संकट का स्थायी समाधान नहीं दिया, लेकिन उसने भारतीय कृषि नीति में मूल्य-अंतर भुगतान को गंभीर विकल्प के रूप में स्थापित किया।
मंदसौर और 2018 का मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव
2018 में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव हुए।
कांग्रेस ने कृषि ऋण माफी को अपने प्रमुख चुनावी वादों में शामिल किया।
राहुल गांधी ने मंदसौर को किसान राजनीति के प्रतीक के रूप में लगातार इस्तेमाल किया। जून 2018 में गोलीकांड की पहली बरसी पर मंदसौर में सभा कर उन्होंने किसानों के मुद्दे को चुनावी राजनीति से जोड़ा।
दिसंबर 2018 में भाजपा बहुमत से पीछे रह गई और कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी।
यह कहना अत्यधिक सरलीकरण होगा कि भाजपा केवल मंदसौर के कारण हारी।
लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि मंदसौर का कोई प्रभाव नहीं था।
मंदसौर ने कृषि असंतोष को एक अत्यंत शक्तिशाली राजनीतिक प्रतीक प्रदान किया।
मंदसौर से राष्ट्रीय किसान आंदोलन की नई धारा
मंदसौर के बाद देश के किसान संगठनों में व्यापक समन्वय की आवश्यकता महसूस हुई।
और कृषि संकट के आंदोलनों को एक साझा राष्ट्रीय मंच पर लाने की कोशिश तेज हुई।
इसी दौर में अनेक किसान संगठनों का व्यापक समन्वय विकसित हुआ और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति जैसे मंच राष्ट्रीय किसान राजनीति में प्रमुख हुए।
2017–18 में देश के विभिन्न हिस्सों में किसान लामबंदी तेज हुई।
महाराष्ट्र किसान लॉन्ग मार्च,
और अन्य संघर्ष इसी व्यापक वातावरण का हिस्सा थे।
मंदसौर और महाराष्ट्र लॉन्ग मार्च
मार्च 2018 में महाराष्ट्र के हजारों किसान नासिक से मुंबई तक पैदल पहुंचे।
दोनों आंदोलनों की शैली अलग थी।
मंदसौर अचानक उग्र हुआ और पुलिस गोलीबारी इसका केंद्रीय प्रतीक बनी।
महाराष्ट्र लॉन्ग मार्च अत्यंत अनुशासित पैदल मार्च के रूप में सामने आया।
लेकिन दोनों के पीछे समान प्रश्न थे
और राज्य की नीतियों से असंतोष।
इस अर्थ में मंदसौर 2017 और मुंबई लॉन्ग मार्च 2018 एक ही व्यापक किसान पुनरुत्थान के अलग रूप थे।
2020–21 तक विरासत, उपलब्धियां और आर्थिक सबक
मंदसौर से 2020–21 तक
मंदसौर को सीधे 2020–21 के कृषि कानून आंदोलन का कारण कहना गलत होगा।
लेकिन दोनों के बीच ऐतिहासिक निरंतरता अवश्य दिखाई देती है।
किसान प्रश्न फिर राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकता है;
विभिन्न राज्यों के किसान संगठन साझा मंच बना सकते हैं;
एमएसपी केवल मूल्य घोषणा का नहीं बल्कि गारंटीकृत प्राप्ति का प्रश्न बन रहा है;
और कृषि नीति पर सरकार के निर्णय व्यापक राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा कर सकते हैं।
2020–21 में यही तत्व कहीं अधिक संगठित और विशाल रूप में दिखाई दिए।
मंदसौर आंदोलन की उपलब्धियां
मंदसौर की पहली बड़ी उपलब्धि थी
कृषि मूल्य संकट को राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्न बनाना।
किसान संकट की परिभाषा बदलना।
किसान संकट केवल सूखा या फसल नष्ट होना नहीं है।
बंपर फसल भी संकट पैदा कर सकती है।
कर्जमाफी को राष्ट्रीय चुनावी मुद्दा बनाना।
एमएसपी और वास्तविक बाजार मूल्य के अंतर को उजागर करना।
मूल्य-अंतर भुगतान जैसे नीतिगत प्रयोग को गति देना।
देशव्यापी किसान संगठनों के समन्वय को प्रोत्साहन।
किसान प्रश्न को 2018–19 की राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में वापस लाना।
आंदोलन की सीमाएं
मंदसौर की सबसे बड़ी कमजोरी थी
स्पष्ट केंद्रीय नेतृत्व का अभाव।
हिंसा।
आगजनी और संपत्ति की तोड़फोड़ ने सरकार को कानून-व्यवस्था का तर्क दिया और किसान आंदोलन की नैतिक स्थिति को नुकसान पहुंचाया।
एकीकृत मांग-पत्र का अभाव।
अलग समूहों की प्राथमिकताएं अलग थीं।
संगठित वार्ता संरचना कमजोर थी।
गोलीकांड आंदोलन के मूल आर्थिक प्रश्न पर हावी हो गया।
जिस आंदोलन की शुरुआत कृषि मूल्य और कर्ज के प्रश्न से हुई थी, उसकी सार्वजनिक स्मृति अंततः “मंदसौर गोलीकांड” के रूप में अधिक स्थापित हुई।
सबसे बड़ा आर्थिक सबक : उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं
मंदसौर भारतीय कृषि नीति को एक महत्वपूर्ण चेतावनी देता है।
मान लें कि किसान पहले 100 क्विंटल उत्पादन करता था और अब 150 क्विंटल करता है।
यदि उत्पादन बढ़ने के कारण कीमत 2,000 रुपये प्रति क्विंटल से गिरकर 1,000 रुपये हो जाए तो
अर्थात उत्पादन 50 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन सकल आय 25 प्रतिशत घट गई।
यही कृषि का मूल्य विरोधाभास है।
किसान समृद्धि का प्रमाण नहीं है।
किसान की शुद्ध आय।
दूसरा सबक : एमएसपी और खरीद अलग-अलग प्रश्न हैं
मंदसौर ने यह अंतर भी उजागर किया
सरकार किसी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर सकती है।
लेकिन यदि उस मूल्य पर प्रभावी खरीद व्यवस्था उपलब्ध नहीं है तो किसान स्थानीय मंडी में कम मूल्य पर बेच सकता है।
इसलिए किसान आंदोलन धीरे-धीरे
“एमएसपी सुनिश्चित करो”
यही बहस आगे चलकर 2020–21 और 2024 के बाद एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग में और स्पष्ट दिखाई देती है।
कर्ज, बाजार जोखिम और राज्य पर विश्वास
तीसरा सबक : ऋणमाफी उपचार है, स्थायी समाधान नहीं
मंदसौर में कृषि ऋण माफी महत्वपूर्ण मांग थी।
लेकिन यदि किसान की लागत लगातार बढ़ती रहे और उपज का मूल्य लागत से नीचे रहे तो ऋणमाफी केवल पुराने कर्ज को मिटाती है।
कुछ वर्षों बाद नया कर्ज पैदा हो सकता है।
इसलिए स्थायी समाधान का समीकरण है
उचित मूल्य + बाजार सुरक्षा + सस्ता संस्थागत ऋण + जोखिम बीमा + उत्पादकता + भंडारण + प्रसंस्करण + बाजार तक पहुंच।
मंदसौर ने भारतीय राजनीति को ऋणमाफी की ओर धकेला, लेकिन भारतीय कृषि का प्रश्न ऋणमाफी से कहीं बड़ा था।
चौथा सबक : बाजार जोखिम भी कृषि जोखिम है
भारतीय कृषि नीति लंबे समय तक मुख्यतः
कीमत गिरना भी उतना ही बड़ा जोखिम है।
किसान को फसल बीमा मिल सकता है यदि फसल नष्ट हो जाए।
लेकिन यदि शानदार फसल हो और कीमत आधी रह जाए तो पारंपरिक फसल बीमा उसकी समस्या हल नहीं करता।
यहीं से मूल्य बीमा अथवा आय सुरक्षा जैसी अवधारणाओं की आवश्यकता सामने आती है।
राज्य और किसान के बीच विश्वास का संकट
मंदसौर का राजनीतिक प्रभाव केवल छह मौतों में नहीं था।
विश्वास की।
जब सरकार ने शुरुआत में पुलिस गोलीबारी से इनकार किया और बाद में स्वयं स्वीकार किया कि पांच लोग पुलिस की गोली से मरे, तो प्रशासनिक विश्वसनीयता पर प्रश्न उठा।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसान और राज्य के बीच संघर्ष हो सकता है।
लेकिन यदि संवाद टूट जाए और पुलिस गोली तक स्थिति पहुंच जाए तो वह शासन व्यवस्था की गंभीर विफलता का संकेत है—भले ही बाद की न्यायिक जांच तत्काल बल प्रयोग को परिस्थितियों में वैध माने।
गोलीबारी के दो सत्य और समेकित समयरेखा
गोलीबारी : दो सत्य एक साथ
मंदसौर का संतुलित इतिहास लिखते समय दो असुविधाजनक तथ्यों को एक साथ स्वीकार करना आवश्यक है।
पहला सत्य: 6 जून को आंदोलन के कुछ हिस्सों में गंभीर हिंसा, आगजनी और सुरक्षा बलों से टकराव हुआ था। इसे छिपाकर घटना को पूर्णतः शांत प्रदर्शन पर अकारण गोलीबारी बताना उपलब्ध अभिलेखों से मेल नहीं खाता।
दूसरा सत्य: प्रशासन आंदोलन की तीव्रता का पूर्वानुमान लगाने, किसान नेतृत्व से प्रभावी संवाद स्थापित करने और स्थिति को गोलीबारी तक पहुंचने से पहले नियंत्रित करने में पर्याप्त सफल नहीं रहा। जैन आयोग ने भी प्रशासनिक और संचार संबंधी कमियों की ओर संकेत किया।
इसी द्वंद्व में मंदसौर का वास्तविक इतिहास स्थित है।
प्रमुख घटनाओं की समेकित समयरेखा
2016–17 — मध्य प्रदेश में अनेक फसलों का अच्छा उत्पादन; प्याज सहित कुछ कृषि उत्पादों की कीमतों में भारी गिरावट से किसान असंतोष।
अप्रैल–मई 2017 — कर्जमाफी और लाभकारी मूल्य की मांग तेज; विभिन्न किसान समूहों की लामबंदी।
1 जून 2017 — मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन/हड़ताल शुरू; दूध और सब्जियों की शहरी आपूर्ति रोकने की रणनीति।
2–4 जून — पश्चिमी मध्य प्रदेश में आंदोलन का विस्तार; दूध, सब्जी और मंडी आपूर्ति प्रभावित।
4–5 जून — सरकार और कुछ किसान संगठनों के बीच बातचीत के बावजूद आंदोलन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ; कई क्षेत्रों में तनाव।
6 जून — मंदसौर जिले में आंदोलन हिंसक; बही पार्श्वनाथ और पिपलियामंडी क्षेत्र में सुरक्षा बलों की गोलीबारी; पांच प्रदर्शनकारियों की मौत और कई घायल।
6 जून की प्रारंभिक प्रतिक्रिया — राज्य के गृह मंत्री द्वारा पुलिस गोलीबारी से इनकार।
7 जून और उसके बाद — एक अन्य व्यक्ति की मृत्यु; आंदोलन से जुड़ी मृतक संख्या सामान्यतः छह मानी गई; हिंसा अन्य जिलों में फैली।
8–9 जून — राज्य सरकार की केंद्र को रिपोर्ट में पांच लोगों के पुलिस गोलीबारी में मारे जाने की पुष्टि।
10 जून — मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का भोपाल में शांति के लिए उपवास।
11 जून — मुख्यमंत्री ने उपवास समाप्त किया।
जून 2017 — न्यायमूर्ति जे. के. जैन की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग गठित।
2017 — कृषि मूल्य संकट के समाधान के प्रयोग के रूप में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा भावांतर भुगतान योजना की दिशा में कदम।
2017–18 — मंदसौर राष्ट्रीय किसान संगठनों और विपक्षी राजनीति का प्रमुख प्रतीक।
जून 2018 — गोलीकांड की पहली बरसी के आसपास मंदसौर फिर राष्ट्रीय राजनीतिक केंद्र; राहुल गांधी की सभा।
11 जून 2018 के आसपास — जैन आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी।
जून 2018 — रिपोर्ट के निष्कर्ष सार्वजनिक विमर्श में आए; गोलीबारी को परिस्थितियों में आवश्यक और न्यायसंगत माना गया, साथ ही प्रशासनिक कमियों की ओर संकेत।
दिसंबर 2018 — मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा बहुमत से पीछे; कांग्रेस सरकार बनी; कृषि ऋणमाफी बड़ा चुनावी मुद्दा।
2019 — मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की कार्यवाही में राज्य ने बताया कि मृतकों के आश्रित परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा दिया गया।
2021 — मध्य प्रदेश विधानसभा में जैन आयोग रिपोर्ट सदन में रखने को लेकर प्रश्न।
2024 — मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने आयोग की रिपोर्ट विधानसभा में पेश कराने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज की।
इतिहासलेखन, किसान प्रश्न और मंदसौर की विरासत
इतिहासलेखन : मंदसौर को किस रूप में देखा जाए?
मंदसौर के कम से कम चार ऐतिहासिक पाठ संभव हैं।
पहला इसे पुलिस गोलीकांड के रूप में देखता है।
दूसरा इसे कृषि मूल्य संकट का विस्फोट मानता है।
तीसरा इसे किसान राजनीति के पुनरुत्थान की शुरुआत के रूप में पढ़ता है।
चौथा इसे बाजारोन्मुख कृषि की संरचनात्मक समस्या के उदाहरण के रूप में देखता है।
वास्तव में चारों दृष्टियां एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं।
पाबना से मंदसौर तक : किसान प्रश्न का परिवर्तन
औपनिवेशिक किसान आंदोलनों में प्रश्न अक्सर था
बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं सदी में प्रश्न बदलने लगा
बाजार गिरने का जोखिम कौन उठाएगा?
किसान की आय की गारंटी कैसे होगी?
इस अर्थ में मंदसौर भारतीय किसान आंदोलन के ऐतिहासिक संक्रमण को व्यक्त करता है
भूमि के अधिकार से उत्पादन के मूल्य तक।
मंदसौर की सबसे महत्वपूर्ण विरासत
मंदसौर की स्थायी विरासत किसी एक सरकारी योजना, मुआवजे या जांच आयोग में नहीं है।
उसकी सबसे महत्वपूर्ण विरासत वह प्रश्न है जो 2017 में सड़कों पर उठा और आज की कृषि नीति में भी मौजूद है
यदि किसान देश की आवश्यकता से अधिक उत्पादन कर देता है और उसी अधिक उत्पादन के कारण बाजार मूल्य गिरकर उसकी लागत से नीचे चला जाता है, तो उस सफलता का लाभ किसे मिला?
उपभोक्ता को सस्ता खाद्य पदार्थ मिला।
व्यापार व्यवस्था को माल मिला।
अर्थव्यवस्था को कृषि उत्पादन मिला।
लेकिन यदि उत्पादक स्वयं घाटे में चला गया तो कृषि नीति का लक्ष्य अधूरा रह गया।
समेकित निष्कर्ष : मंदसौर को कैसे समझें?
समेकित निष्कर्ष : मंदसौर को कैसे समझें?
मंदसौर किसान आंदोलन 2017 भारतीय किसान इतिहास का वह क्षण था जब “उत्पादन बढ़ाओ” वाली कृषि नीति के सामने किसान ने “आय कौन सुनिश्चित करेगा?” का प्रश्न रख दिया।
इसका जन्म किसी एक राजनीतिक दल या संगठन के आह्वान से नहीं हुआ था। इसके पीछे वर्षों से बनता कृषि अर्थशास्त्र था—बढ़ती लागत, बाजार पर बढ़ती निर्भरता, उपज की गिरती कीमत, अपर्याप्त खरीद, ऋण और किसान की आय की अनिश्चितता।
1 जून की किसान हड़ताल ने इस असंतोष को संगठित रूप दिया।
6 जून की गोलीबारी ने उसे राष्ट्रीय त्रासदी बना दिया।
पांच लोगों की गोलीबारी में मृत्यु और आंदोलन से जुड़ी छठी मृत्यु ने किसान–राज्य संबंधों को झकझोर दिया। सरकार का प्रारंभिक पुलिस गोलीबारी से इनकार और बाद में उसे स्वीकार करना विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। न्यायमूर्ति जे. के. जैन आयोग ने अंततः तत्काल परिस्थितियों में गोलीबारी को आवश्यक और न्यायसंगत माना, लेकिन प्रशासनिक तैयारी, खुफिया सूचना और संवाद की कमियों को भी पूरी तरह नकारा नहीं।
इसलिए मंदसौर को केवल दो अतियों में नहीं बांटना चाहिए
न तो यह कहना पर्याप्त है कि यह केवल शांत किसानों पर राज्य की अकारण गोलीबारी थी;
न यह कि यह केवल हिंसक भीड़ पर आवश्यक पुलिस कार्रवाई थी।
भारतीय कृषि में उत्पादन और आय का टूटता संबंध।
मंदसौर ने सरकारों को यह समझने के लिए बाध्य किया कि रिकॉर्ड कृषि उत्पादन स्वयं किसान समृद्धि की गारंटी नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में मूल्य संरक्षण, भावांतर, कर्जमाफी और एमएसपी की प्रभावशीलता पर नई बहस खड़ी हुई।
राजनीतिक स्तर पर इसका प्रभाव और व्यापक था।
मंदसौर के बाद किसान आंदोलन पुनः राष्ट्रीय राजनीति की संगठित शक्ति बनने लगा। 2017–18 की लामबंदियों से महाराष्ट्र लॉन्ग मार्च और दिल्ली के किसान प्रदर्शनों तक और फिर 2020–21 के विशाल कृषि कानून विरोधी आंदोलन तथा बाद की एमएसपी की कानूनी गारंटी की बहस तक एक ऐतिहासिक धारा दिखाई देती है।
इसलिए भारतीय किसान आंदोलनों के लंबे इतिहास में मंदसौर की जगह चंपारण, बारदोली या तेभागा जैसी नहीं, क्योंकि उसकी संरचना और उपलब्धियां उनसे भिन्न थीं। फिर भी इक्कीसवीं सदी के किसान संघर्ष को समझने के लिए इसका महत्व असाधारण है।
बारदोली ने पूछा था—राज्य किसान से कितना राजस्व ले सकता है?
मंदसौर ने पूछा—बाजार किसान की फसल कितनी सस्ती खरीद सकता है?
और इसके बाद भारतीय किसान राजनीति ने तीसरा प्रश्न अधिक दृढ़ता से उठाया
“किसान को उसकी उपज का न्यूनतम लाभकारी मूल्य पाने का अधिकार केवल सरकारी घोषणा है, या उसकी कोई वास्तविक गारंटी भी होगी?”
यही मंदसौर की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विरासत है।
प्रमुख सत्यापित स्रोत एवं शोध-संदर्भ
इस अध्याय के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक/अर्ध-प्राथमिक स्रोतों में मध्य प्रदेश विधानसभा की प्रश्नोत्तर कार्यवाही, जिसमें सरकार ने 6 जून 2017 की घटना में पांच आंदोलनकारियों की मृत्यु और छह के घायल होने की पुष्टि की; राज्यसभा की 21 जुलाई 2017 की कार्यवाही, जिसमें केंद्र सरकार ने किसानों की मुख्य मांगों में ऋणमाफी और स्वामीनाथन आयोग के अनुरूप एमएसपी दर्ज की; मध्य प्रदेश सरकार की केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी रिपोर्ट; न्यायमूर्ति जे. के. जैन जांच आयोग के निष्कर्ष; तथा बाद की मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की कार्यवाहियां शामिल हैं।
समकालीन घटनाक्रम के पुनर्निर्माण के लिए इंडियन एक्सप्रेस, एनडीटीवी तथा अन्य राष्ट्रीय समाचार अभिलेख उपयोगी हैं, विशेषकर सरकार के शुरुआती इनकार, बाद की स्वीकारोक्ति, गोलीबारी की परिस्थितियों और जैन आयोग के निष्कर्षों की तुलना के लिए।
अध्याय की स्थिति: संपूर्ण। इसमें आंदोलन की आर्थिक पृष्ठभूमि से लेकर 1 जून की हड़ताल, 6 जून गोलीकांड, छह मौतों की संख्या का स्पष्टीकरण, सरकारी प्रतिक्रिया, मुख्यमंत्री का उपवास, विपक्ष, किसान संगठन, जैन आयोग, आयोग की आलोचना, भावांतर योजना, 2018 की राजनीति, राष्ट्रीय किसान लामबंदी, उपलब्धियां–सीमाएं और 2024 तक आयोग रिपोर्ट से जुड़े न्यायिक घटनाक्रम को समेकित कर लिया गया है।
मंदसौर को केवल पुलिस गोलीबारी, केवल प्याज के दाम या केवल चुनावी घटना मानना अधूरा होगा। इसने दिखाया कि कृषि उत्पादन में वृद्धि और किसान आय में वृद्धि एक ही बात नहीं हैं; न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा तभी प्रभावी है जब खरीद अथवा विश्वसनीय मूल्य-सुरक्षा तंत्र उपलब्ध हो; और कर्जमाफी तत्काल राहत देते हुए भी लागत, मूल्य, बाजार और जोखिम की संरचनात्मक समस्या का स्थायी समाधान नहीं बनती। आंदोलन की सीमाओं में स्थानीय नेतृत्व का बिखराव, हिंसा–आगजनी से मूल मांगों का आंशिक धुंधलापन और जवाबदेही तय करने की लंबी प्रक्रिया शामिल हैं। फिर भी मंदसौर ने ऋणमुक्ति तथा लाभकारी मूल्य को राष्ट्रीय साझा मांग बनाया, किसान संगठनों के व्यापक समन्वय को गति दी और राज्य–किसान संबंध में विश्वास की केंद्रीयता उजागर की। इसकी दीर्घ विरासत 2017 के किसान मुक्ति अभियानों, महाराष्ट्र के लंबे किसान मार्च और 2020–21 की संयुक्त किसान लामबंदी में दिखाई देती है।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: मृतकों की संख्या, गोली चलने के स्थान, हिंसा में शामिल समूहों, पुलिस की परिस्थिति, जैन आयोग के निष्कर्ष और आंदोलन के चुनावी प्रभाव पर सरकारी, आयोगीय, दलीय, किसान-संगठन तथा समाचार स्रोतों में मतभेद हैं। पांच पुलिस-गोलीबारी मृतकों और बाद की संबंधित हिंसा में हुई छठी मृत्यु को अलग रखते हुए अभिलेखों का परस्पर मिलान आवश्यक है। तथ्य, आरोप और राजनीतिक व्याख्या को पृथक पढ़ा जाना चाहिए।