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OCN Research Dossier–017 · स्वतंत्र भारत के किसान आंदोलन · अध्याय 17

एमएसपी की कानूनी गारंटी और शंभू–खनौरी किसान आंदोलन (2024–2026)

घोषित समर्थन मूल्य से वैधानिक अधिकार तक भारतीय किसान राजनीति का नया संघर्ष

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंपादित समेकित शोध संस्करण · 30 अगस्त 2026

2020–2021 में किसानों ने तीन बने हुए कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग की थी; 2024–2026 का शंभू–खनौरी संघर्ष सरकार से नया वैधानिक अधिकार मांगता है। 13 फरवरी 2024 के ‘दिल्ली चलो’ अभियान से शुरू इस चरण में संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी, व्यापक लागत पर 50 प्रतिशत लाभ, कर्ज, पेंशन और पिछले आंदोलन की लंबित मांगों को केंद्र में रखा। शंभू और खनौरी के सीमा-मोर्चे, 21 फरवरी का टकराव और शुभकरण सिंह की मृत्यु, जगजीत सिंह डल्लेवाल का लंबा अनशन, 101 किसानों के जत्थे, सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता तथा मार्च 2025 में मोर्चे हटाए जाने के बाद भी प्रश्न समाप्त नहीं हुआ। अगस्त 2026 की नई लामबंदी वार्ता के आश्वासन पर स्थगित हुई; 4 सितंबर की प्रस्तावित बैठक भविष्य की घटना है, इसलिए उसके परिणाम का पूर्वानुमान इस अध्याय में नहीं किया गया है।

खंड 1

न्यूनतम समर्थन मूल्य, लागत और स्वामीनाथन सूत्र

एमएसपी क्या है और विवाद वास्तव में किस बात का है?

न्यूनतम समर्थन मूल्य भारत सरकार द्वारा कुछ प्रमुख कृषि फसलों के लिए घोषित वह मूल्य है जिसे कृषि मूल्य नीति में किसान को अत्यधिक मूल्य गिरावट से बचाने के एक साधन के रूप में देखा जाता है। केंद्र सरकार कृषि लागत एवं मूल्य आयोग—सीएसीपी—की सिफारिशों, राज्यों और संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों की राय तथा उत्पादन लागत, मांग–आपूर्ति, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मूल्य जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर एमएसपी निर्धारित करती है।

2026 में भी सरकार 22 अधिदेशित फसलों के लिए एमएसपी निर्धारित कर रही है। सरकारी व्यवस्था में धान, गेहूं, ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, अरहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल जैसी फसलों के साथ कई रबी और वाणिज्यिक फसलें शामिल हैं। गन्ने के लिए अलग उचित एवं लाभकारी मूल्य व्यवस्था है।

लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।

एमएसपी घोषित होना और किसान को एमएसपी मिलने की कानूनी गारंटी होना एक बात नहीं है।

सरकार किसी फसल का एमएसपी घोषित कर सकती है, लेकिन प्रत्येक किसान की प्रत्येक मात्रा की उपज उसी मूल्य पर सरकार द्वारा खरीदना मौजूदा व्यवस्था की अनिवार्यता नहीं है। सरकारी खरीद कुछ फसलों और कुछ राज्यों में बहुत प्रभावी हो सकती है, जबकि दूसरी फसलों और क्षेत्रों में किसान खुले बाजार के मूल्य पर अधिक निर्भर रहता है।

इसी अंतर ने 2024 के आंदोलन को जन्म देने वाले प्रमुख आर्थिक तर्क को शक्ति दी।

ए-2 लागत, ए-2 लागत तथा पारिवारिक श्रम और सी-2 लागत : उत्पादन लागत का असली विवाद

एमएसपी विवाद को समझने के लिए तीन लागत अवधारणाएं महत्वपूर्ण हैं।

ए-2 लागत में किसान द्वारा खेती के दौरान वास्तव में नकद या वस्तु रूप में किए गए खर्च—बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी, सिंचाई, ईंधन, मशीनरी आदि—आते हैं।

ए-2 लागत तथा पारिवारिक श्रम में ए-2 लागत के साथ किसान परिवार द्वारा दिए गए अवैतनिक श्रम का अनुमानित मूल्य भी जोड़ा जाता है।

सी-2 लागत अधिक व्यापक लागत अवधारणा है। इसमें ए-2 लागत तथा पारिवारिक श्रम के अलावा अपनी भूमि के अनुमानित किराये और अपनी स्थायी पूंजी पर ब्याज जैसी लागतों को भी शामिल किया जाता है।

यहीं सरकार और आंदोलनकारी किसान संगठनों की व्याख्याओं में बड़ा अंतर पैदा होता है।

केंद्र सरकार का आधिकारिक पक्ष है कि 2018–19 से सभी अधिदेशित फसलों का एमएसपी अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत से कम-से-कम 50 प्रतिशत अधिक निर्धारित किया जा रहा है। अगस्त 2026 में भी सरकार ने संसद/आधिकारिक उत्तर में यही नीति दोहराई।

आंदोलनकारी किसान संगठन इसके विपरीत स्वामीनाथन आयोग से संबद्ध सी-2 लागत से 50 प्रतिशत अधिक को वैधानिक मूल्य-आधार बनाने की मांग करते हैं। जनवरी 2026 में भी जगजीत सिंह डल्लेवाल के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति के सामने इसी मांग को दोहराया।

इसलिए विवाद केवल “50 प्रतिशत लाभ मिला या नहीं” का नहीं है। असली प्रश्न यह भी है कि 50 प्रतिशत किस लागत पर जोड़ा जाए।

स्वामीनाथन आयोग और सी-2 लागत से 50 प्रतिशत अधिक की राजनीतिक यात्रा

राष्ट्रीय किसान आयोग, जिसकी अध्यक्षता डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने की, भारतीय कृषि संकट पर सबसे प्रभावशाली नीति दस्तावेजों में गिना जाता है। समय के साथ “स्वामीनाथन फार्मूला” किसान राजनीति में लाभकारी मूल्य के लिए एक शक्तिशाली राजनीतिक प्रतीक बन गया।

किसान संगठनों ने इसकी व्याख्या व्यापक उत्पादन लागत पर कम-से-कम 50 प्रतिशत लाभ के रूप में की और बाद के किसान आंदोलनों में सी-2 लागत से 50 प्रतिशत अधिक मांग का केंद्रीय सूत्र बन गया।

2014 के बाद यह प्रश्न और राजनीतिक हुआ। केंद्र सरकार ने 2018–19 के बजट के बाद एमएसपी को उत्पादन लागत के डेढ़ गुने स्तर पर रखने की नीति को अपनी महत्वपूर्ण किसान उपलब्धि बताया। दूसरी ओर किसान संगठनों का तर्क रहा कि सरकार द्वारा प्रयुक्त लागत और उनके द्वारा मांगी जा रही सी-2 लागत समान नहीं हैं।

2024 में यह पुरानी बहस पहली बार इतने बड़े प्रत्यक्ष आंदोलन में “कानूनी गारंटी” से जुड़ गई।

खंड 2

2020–21 की विरासत, नया नेतृत्व और विस्तृत मांगपत्र

2020–21 किसान आंदोलन की अधूरी विरासत

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन के दौरान एमएसपी पहले से किसानों की प्रमुख चिंताओं में था। किसानों को आशंका थी कि कृषि बाजार के पुनर्गठन की प्रक्रिया अंततः सरकारी मंडी और समर्थन मूल्य व्यवस्था को कमजोर कर सकती है। केंद्र सरकार बार-बार कहती रही कि एमएसपी समाप्त नहीं किया जा रहा।

कानून वापस होने के बाद भी किसान संगठनों ने एमएसपी की वैधानिक गारंटी का प्रश्न उठाया।

यहीं 2021 और 2024 के बीच ऐतिहासिक सेतु बनता है।

2020–21 का आंदोलन इस अर्थ में सफल हुआ कि जिन तीन कानूनों के विरुद्ध वह शुरू हुआ था वे निरस्त हुए। लेकिन एमएसपी की कानूनी गारंटी, किसान कर्ज, मुकदमों की वापसी और कृषि आय से संबंधित अनेक प्रश्न बने रहे।

2024 का आंदोलन इन्हीं अधूरे प्रश्नों में से सबसे बड़े—एमएसपी—को केंद्र में लेकर लौटा।

2024 का आंदोलन किसने शुरू किया?

यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है कि 2024 का ‘दिल्ली चलो 2.0’ ठीक उसी संगठनात्मक संरचना के तहत नहीं था जिसने 2020–21 के आंदोलन का नेतृत्व किया था।

इस बार प्रमुख भूमिका संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा की थी। जगजीत सिंह डल्लेवाल और सरवन सिंह पंधेर इसके प्रमुख चेहरों के रूप में सामने आए।

इस संगठनात्मक अंतर को नजरअंदाज करने से 2024 आंदोलन को समझने में भ्रम पैदा होता है।

2020–21 के व्यापक संयुक्त किसान मोर्चे के अनेक घटक और 2024 के दिल्ली मार्च का नेतृत्व करने वाले संगठन समान रणनीति और नेतृत्व संरचना में नहीं थे। फिर भी एमएसपी, कृषि संकट और किसान आय जैसे मुद्दों पर उनके बीच महत्वपूर्ण मांगगत समानताएं थीं।

किसानों की मांग केवल एमएसपी नहीं थी

शंभू–खनौरी आंदोलन को केवल एमएसपी आंदोलन कहना सुविधाजनक है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से अधूरा।

किसानों के मांगपत्र में प्रमुख रूप से शामिल थे

• सभी फसलों के लिए एमएसपी की कानूनी गारंटी;

• स्वामीनाथन आयोग से संबद्ध सी-2 लागत से 50 प्रतिशत अधिक मूल्य सूत्र;

• किसान और कृषि मजदूरों के कर्ज का समाधान/माफी;

• किसानों और कृषि मजदूरों के लिए पेंशन;

• पुराने किसान आंदोलनों से जुड़े मुकदमों की वापसी;

• लखीमपुर खीरी मामले में न्याय संबंधी मांगें;

• 2020–21 आंदोलन में जान गंवाने वाले किसानों के परिवारों से संबंधित राहत;

• बिजली क्षेत्र और कृषि पर प्रभाव डालने वाली नीतियों को लेकर आपत्तियां;

• भूमि अधिग्रहण और कृषि क्षेत्र से जुड़े दूसरे प्रश्न।

एक वर्ष बाद भी कानूनी एमएसपी, कर्जमाफी, पेंशन और आंदोलनकारियों पर दर्ज मामलों की वापसी प्रमुख मांगों में बनी हुई थीं।

इस प्रकार एमएसपी आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा था, लेकिन पूरा आंदोलन इससे व्यापक कृषि-सामाजिक मांगपत्र पर आधारित था।

खंड 3

दिल्ली चलो, सीमा-मोर्चे और पांच फसलों का प्रस्ताव

फरवरी 2024 : बातचीत और ‘दिल्ली चलो’

फरवरी 2024 में दिल्ली मार्च की घोषणा के साथ केंद्र सरकार ने किसान नेताओं के साथ बातचीत शुरू की। पंजाब और हरियाणा के बीच तनाव तेजी से बढ़ा क्योंकि किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ दिल्ली की ओर बढ़ने की तैयारी कर रहे थे।

13 फरवरी 2024 को ‘दिल्ली चलो’ अभियान निर्णायक चरण में पहुंचा।

हरियाणा प्रशासन ने किसानों को राज्य में आगे बढ़ने से रोकने के लिए शंभू और खनौरी की दिशा में व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की। राष्ट्रीय राजमार्गों पर अवरोध, बैरिकेडिंग और पुलिस तैनाती ने पंजाब–हरियाणा सीमा को वास्तविक आंदोलन सीमा में बदल दिया।

इस प्रकार किसान दिल्ली नहीं पहुंच सके।

और यहीं एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिवर्तन हुआ

दिल्ली के लिए निकला आंदोलन शंभू और खनौरी में स्थायी मोर्चे में बदल गया।

शंभू और खनौरी : दो सीमाएं, एक संघर्ष

शंभू सीमा पंजाब के पटियाला–अंबाला मार्ग पर आंदोलन का बड़ा प्रतीक बनी। ट्रैक्टर-ट्रॉलियां अस्थायी आवास में बदल गईं। लंगर, चिकित्सा सहायता, मंच और किसान सभाओं के साथ वहां दीर्घकालीन मोर्चे की संरचना विकसित हुई।

दूसरी ओर खनौरी–दातासिंहवाला सीमा ने आगे चलकर एक अलग राजनीतिक महत्त्व ग्रहण किया।

2024 के शुरुआती चरण में दोनों मोर्चे दिल्ली जाने के अवरुद्ध रास्ते थे। लेकिन नवंबर 2024 के बाद जगजीत सिंह डल्लेवाल के आमरण अनशन के कारण खनौरी आंदोलन का नैतिक और राजनीतिक केंद्र बन गया।

केंद्र का पांच फसलों वाला प्रस्ताव

फरवरी 2024 की वार्ताओं में केंद्र की ओर से एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव सामने आया।

कुछ दालों, मक्का और कपास को लेकर सरकारी/सहकारी एजेंसियों के माध्यम से पांच वर्षों की खरीद व्यवस्था का प्रस्ताव दिया गया। इसके पीछे एक तर्क यह था कि किसानों को धान–गेहूं के चक्र से बाहर निकलने के लिए मूल्य आश्वासन दिया जा सके और फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित किया जाए।

लेकिन आंदोलनकारी संगठनों ने इसे स्वीकार नहीं किया।

उनका तर्क था कि उनकी मांग कुछ फसलों के लिए सीमित अवधि की खरीद व्यवस्था नहीं, बल्कि व्यापक कानूनी एमएसपी अधिकार की है।

यहां सरकार और किसान संगठनों के दृष्टिकोण का बुनियादी अंतर स्पष्ट हो गया।

सरकार समस्या का समाधान लक्षित खरीद और फसल विविधीकरण के माध्यम से खोज रही थी।

किसान संगठन समस्या को कृषि मूल्य के वैधानिक अधिकार के रूप में देख रहे थे।

यह अंतर फरवरी 2024 की वार्ता विफल होने के सबसे महत्वपूर्ण कारणों में था।

खंड 4

खनौरी टकराव, आंसू गैस और प्रदर्शन-अधिकार

21 फरवरी 2024 : खनौरी का निर्णायक टकराव

21 फरवरी को किसानों ने दिल्ली की दिशा में आगे बढ़ने का नया प्रयास किया। खनौरी सीमा पर स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण हो गई।

इसी दिन बठिंडा जिले के युवा किसान शुभकरण सिंह की मृत्यु हुई।

उनकी मृत्यु ने आंदोलन का चरित्र बदल दिया। आंदोलनकारी संगठनों ने इसे पुलिस कार्रवाई से जोड़ा और जिम्मेदारी तय करने की मांग की। घटना को लेकर प्राथमिकी, जांच, पुलिस अधिकार-क्षेत्र और कार्रवाई पर लंबा विवाद चला।

फरवरी 2026 में उनकी दूसरी पुण्यतिथि पर भी किसान संगठनों ने कहा कि उन्हें मामले में पर्याप्त जवाबदेही दिखाई नहीं देती। यह विवाद तब तक न्यायिक प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ था।

शुभकरण की मृत्यु शंभू–खनौरी आंदोलन की सबसे गंभीर मानवीय घटना बन गई।

आंसू गैस, ड्रोन और राज्य सीमा का प्रश्न

2024 के आंदोलन की एक असाधारण विशेषता प्रदर्शन नियंत्रण में तकनीक का प्रयोग था। किसानों ने ड्रोन के माध्यम से आंसू गैस के गोले छोड़े जाने पर गंभीर आपत्ति की।

इससे केवल पुलिस बल प्रयोग का प्रश्न नहीं उठा। एक संवैधानिक-संघीय विवाद भी पैदा हुआ

यदि पंजाब में एकत्र किसान हरियाणा से होकर दिल्ली जाना चाहते हैं, तो उन्हें किस सीमा तक रोका जा सकता है?

राज्य अपनी कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी किस बिंदु पर लागू कर सकता है?

क्या सड़क अवरुद्ध करने वाला पक्ष प्रदर्शनकारी है अथवा वह प्रशासन जिसने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए मार्ग बंद किया?

यह विवाद आगे सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार बनाम सार्वजनिक आवागमन

भारतीय संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति के अधिकार देता है, लेकिन ये अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं। राज्य सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए उचित प्रतिबंध लगा सकता है।

शंभू विवाद में दोनों सिद्धांत आमने-सामने थे।

किसान कहते थे कि वे दिल्ली जाकर अपनी बात रखना चाहते हैं और उन्हें सीमा पर रोका गया।

सरकार की चिंता बड़े पैमाने पर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के दिल्ली की ओर जाने, सार्वजनिक व्यवस्था और यातायात की थी।

लंबे समय तक राजमार्ग अवरुद्ध रहने के कारण स्थानीय व्यापारियों, यात्रियों और आसपास के क्षेत्रों पर भी आर्थिक तथा सामाजिक प्रभाव पड़ा।

इसलिए शंभू केवल किसान बनाम सरकार का विवाद नहीं रहा; यह प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार और सार्वजनिक मार्ग के अधिकार का भी प्रश्न बन गया।

खंड 5

लोकसभा चुनाव, सर्वोच्च न्यायालय और नवाब सिंह समिति

आंदोलन और 2024 का लोकसभा चुनाव

फरवरी में शुरू हुआ आंदोलन कुछ ही महीनों बाद हुए 2024 लोकसभा चुनाव की राजनीतिक पृष्ठभूमि का हिस्सा बन गया।

पंजाब और हरियाणा में किसान प्रश्न पहले से राजनीतिक रूप से संवेदनशील था। भाजपा नेताओं के विरोध और ग्रामीण क्षेत्रों में किसान असंतोष की खबरें सामने आईं।

लेकिन चुनाव परिणामों को केवल शंभू–खनौरी आंदोलन से जोड़ देना विश्लेषणात्मक त्रुटि होगी। स्थानीय उम्मीदवार, दलगत समीकरण, राष्ट्रीय राजनीति, जातीय-सामाजिक संरचना और दूसरे मुद्दे भी परिणामों को प्रभावित कर रहे थे।

फिर भी आंदोलन ने इतना अवश्य किया कि एमएसपी और किसान असंतोष को चुनावी विमर्श से बाहर नहीं जाने दिया।

शंभू विवाद सर्वोच्च न्यायालय तक

हरियाणा द्वारा लगाए गए अवरोधों और शंभू राजमार्ग खोलने के प्रश्न पर न्यायिक प्रक्रिया शुरू हुई। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा।

सर्वोच्च न्यायालय ने केवल सड़क खुलवाने के प्रशासनिक प्रश्न तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। उसने किसान और सरकार के बीच संवाद स्थापित करने का रास्ता खोजने का प्रयास किया।

2 सितंबर 2024 को न्यायालय ने सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति नवाब सिंह की अध्यक्षता में उच्चाधिकार समिति गठित की। समिति का उद्देश्य किसानों की शिकायतों और कृषि संबंधी प्रश्नों पर बातचीत का रास्ता तैयार करना था।

इससे आंदोलन में एक तीसरा संस्थागत पक्ष प्रवेश कर गया

किसान — सरकार — न्यायिक मध्यस्थता।

नवाब सिंह समिति का महत्व

समिति को केवल सीमा खोलने वाली समिति समझना गलत होगा। उसके सामने एमएसपी सहित कृषि के व्यापक प्रश्न पहुंचे।

जनवरी 2026 तक भी डल्लेवाल के नेतृत्व वाले संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) के प्रतिनिधिमंडल ने समिति के सामने कानूनी एमएसपी और सी-2 लागत से 50 प्रतिशत अधिक संबंधी अपना विस्तृत पक्ष प्रस्तुत किया।

फरवरी 2026 के अंत में सर्वोच्च न्यायालय ने समिति से अपनी अंतिम सिफारिशें सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करने को कहा और संकेत दिया कि सीमा-अवरोध से जुड़ा मूल मामला समाधान की स्थिति में पहुंच चुका है।

इसका अर्थ यह नहीं था कि एमएसपी विवाद समाप्त हो गया।

न्यायालय के सामने मूल सड़क-अवरोध विवाद और किसानों की व्यापक आर्थिक मांगें दो अलग स्तरों पर विकसित हो चुकी थीं।

खंड 6

डल्लेवाल का अनशन, किसान जत्थे और वार्ता की वापसी

26 नवंबर 2024 : डल्लेवाल का आमरण अनशन

शंभू–खनौरी आंदोलन का दूसरा निर्णायक चरण 26 नवंबर 2024 को शुरू हुआ जब जगजीत सिंह डल्लेवाल ने खनौरी में आमरण अनशन शुरू किया।

फरवरी में आंदोलन की शक्ति ट्रैक्टर, संख्या, सीमा तक मार्च और सामूहिक प्रतिरोध थी।

नवंबर के बाद उसका केंद्र एक व्यक्ति का लंबा उपवास बन गया।

डल्लेवाल की मांगों में कानूनी एमएसपी सबसे ऊपर रही। जैसे-जैसे अनशन लंबा चला, उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ती गई और मामला सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी तक पहुंचा।

इसने सरकार पर अलग प्रकार का नैतिक दबाव बनाया।

आंदोलन की रणनीति : ट्रैक्टर से 101 किसानों के जत्थों तक

2020–21 की तरह विशाल ट्रैक्टर काफिले को दिल्ली पहुंचाने में कठिनाई स्पष्ट हो जाने के बाद आंदोलन ने रणनीति बदली।

दिसंबर 2024 में छोटे जत्थों—विशेष रूप से 101 किसानों के समूहों—द्वारा पैदल दिल्ली जाने की कोशिश की गई।

यह रणनीति राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण थी।

यदि सरकार का तर्क विशाल ट्रैक्टर काफिले से कानून-व्यवस्था का खतरा था, तो पैदल जाने वाले सीमित समूह को रोकने का औचित्य अलग ढंग से प्रस्तुत करना पड़ता।

लेकिन इन प्रयासों को भी सीमा पर रोका गया और कई अवसरों पर पुलिस तथा किसानों के बीच तनाव पैदा हुआ।

डल्लेवाल के अनशन ने केंद्र को वार्ता की ओर लौटाया

लंबे अनशन, सर्वोच्च न्यायालय की चिंता और आंदोलन के जारी रहने के बीच जनवरी 2025 में केंद्र और आंदोलनकारी किसान संगठनों के बीच वार्ता फिर शुरू करने की दिशा बनी।

यह शंभू–खनौरी आंदोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जा सकता है।

फरवरी 2024 की वार्ता विफल होने के बाद महीनों तक समाधान नहीं निकला था। डल्लेवाल के उपवास ने एमएसपी प्रश्न को पुनः राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडे में ऊपर ला दिया।

2025 की वार्ताओं में आंदोलनकारियों ने केवल नारा नहीं दिया बल्कि कानूनी एमएसपी लागू करने के संभावित ढांचे पर अपना अध्ययन/रिपोर्ट भी सरकार को सौंपी। मार्च 2025 में अगली वार्ता 19 मार्च के लिए तय हुई।

यह आंदोलन के बौद्धिक विकास का भी महत्वपूर्ण चरण था।

प्रश्न अब केवल “एमएसपी कानून बनाओ” नहीं था।

खंड 7

कानूनी गारंटी के मॉडल, खरीद और किसान का पक्ष

कानूनी एमएसपी के तीन संभावित मॉडल

यह पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक हिस्सा है।

कानूनी एमएसपी का अर्थ आवश्यक रूप से यह नहीं है कि भारत सरकार देश में पैदा होने वाला हर क्विंटल अनाज खरीद ले।

कम-से-कम तीन व्यापक मॉडल संभव हैं।

पहला, सरकारी खरीद मॉडल—बाजार मूल्य गिरने पर सरकार निर्धारित फसलों की खरीद करे।

दूसरा, कानूनी मूल्य-तल मॉडल—किसी व्यापारी को निर्धारित एमएसपी से कम पर फसल खरीदने की अनुमति न हो।

तीसरा, मूल्य-अंतर भुगतान मॉडल—किसान खुले बाजार में फसल बेचे और बाजार मूल्य एमएसपी से कम होने पर निर्धारित अंतर की प्रतिपूर्ति की जाए।

इन मॉडलों की राजकोषीय लागत, प्रशासनिक व्यवहार्यता और बाजार प्रभाव अलग-अलग हैं।

इसलिए “कानूनी एमएसपी पर सरकार को सारी फसल खरीदनी पड़ेगी” कहना उतना ही सरलीकरण है जितना यह कहना कि कानूनी गारंटी देने का कोई राजकोषीय या बाजारगत प्रभाव ही नहीं होगा।

सार्वभौमिक सरकारी खरीद क्यों कठिन है?

भारत में कृषि उत्पादन का आकार अत्यंत विशाल है। उत्पादन का एक हिस्सा किसान स्वयं उपयोग करता है, एक हिस्सा स्थानीय विनिमय में जाता है और शेष बाजार योग्य अधिशेष होता है।

सरकार ने अगस्त 2026 में भी स्पष्ट किया कि कुल उत्पादन में से बाजार योग्य अधिशेष ही सरकारी खरीद के संदर्भ में प्रासंगिक होता है, विशेषकर तब जब बाजार मूल्य एमएसपी से नीचे जाता है।

यदि राज्य हर फसल का पूरा बाजार योग्य अधिशेष स्वयं खरीदने लगे तो भंडारण, परिवहन, वित्त, वितरण और निस्तारण की विशाल व्यवस्था चाहिए।

इसलिए कानूनी एमएसपी के किसी व्यवहार्य मॉडल को सरकारी खरीद, निजी व्यापार और मूल्य-अंतर समर्थन के बीच संतुलन बनाना होगा।

किसान कानूनी गारंटी क्यों चाहते हैं?

किसानों का मूल तर्क कृषि बाजार की असमान शक्ति संरचना पर आधारित है।

कृषि उत्पाद शीघ्र खराब हो सकता है। किसान को अगली फसल, कर्ज भुगतान और घरेलू आवश्यकताओं के लिए तत्काल नकदी चाहिए। उसकी भंडारण क्षमता सीमित हो सकती है।

इसके विपरीत खरीदार के पास प्रतीक्षा और सौदेबाजी की अधिक क्षमता हो सकती है।

ऐसी स्थिति में घोषित एमएसपी किसान के लिए तभी प्रभावी सुरक्षा बनता है जब उसके पास या तो सुनिश्चित खरीदार हो अथवा एमएसपी से नीचे खरीद के विरुद्ध कोई वैधानिक उपचार।

इसीलिए आंदोलनकारी इसे मूल्य नीति से आगे बढ़ाकर किसान अधिकार का प्रश्न बनाते हैं।

खंड 8

सरकारी चुनौतियां, पंजाब का फसल-संकट और मार्च 2025

सरकार के सामने कठिन प्रश्न

सरकार के दृष्टिकोण से भी समस्या सरल नहीं है।

यदि किसी फसल का वैधानिक न्यूनतम मूल्य बाजार संतुलन मूल्य से काफी ऊपर निर्धारित हो और निजी खरीदार उस मूल्य पर खरीदने को तैयार न हों, तो अतिरिक्त आपूर्ति कौन खरीदेगा?

यदि निजी व्यापार पीछे हटे तो क्या सरकार अंतिम खरीदार बनेगी?

यदि कीमत उपभोक्ता तक स्थानांतरित हुई तो खाद्य मुद्रास्फीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

यदि प्रत्येक फसल को लाभकारी वैधानिक मूल्य मिले तो क्या उत्पादन उन फसलों की ओर अत्यधिक स्थानांतरित होगा जिनका बाजार सीमित है?

ये आपत्तियां कानूनी एमएसपी की मांग को स्वतः गलत सिद्ध नहीं करतीं, लेकिन किसी भी कानून के निर्माण में इनके उत्तर आवश्यक होंगे।

पंजाब का धान–गेहूं संकट और एमएसपी

पंजाब में एमएसपी बहस का एक विरोधाभास है।

गेहूं और धान की प्रभावी सरकारी खरीद ने किसान को अपेक्षाकृत निश्चित बाजार दिया। लेकिन इसी निश्चितता ने धान–गेहूं चक्र को मजबूत करने में भी भूमिका निभाई।

धान की खेती और भूजल दोहन के बीच संबंध पंजाब की कृषि नीति का गंभीर पर्यावरणीय प्रश्न बन चुका है।

यदि किसान से कहा जाए कि वह धान छोड़कर मक्का, दाल या तिलहन उगाए, तो किसान का स्वाभाविक प्रश्न होगा

उस फसल का निश्चित खरीदार कौन है?

यही कारण था कि फरवरी 2024 में केंद्र का पांच वर्षीय दलहन–मक्का–कपास खरीद प्रस्ताव फसल विविधीकरण से जुड़ा था।

किसान संगठनों ने प्रस्ताव को अपर्याप्त माना, लेकिन इसके पीछे मौजूद नीति समस्या वास्तविक थी।

19 मार्च 2025 : वार्ता और अचानक आया राजनीतिक मोड़

मार्च 2025 में एमएसपी की कानूनी गारंटी पर किसान और सरकार के बीच वार्ता जारी थी। किसान संगठनों ने अपना प्रस्ताव सरकार को सौंपा था और 19 मार्च की बैठक महत्वपूर्ण मानी जा रही थी।

लेकिन इसके तुरंत बाद घटनाक्रम ने नाटकीय मोड़ लिया।

पंजाब सरकार ने शंभू और खनौरी के लंबे समय से चले आ रहे मोर्चों को हटाने के लिए पुलिस कार्रवाई की। किसान नेताओं को हिरासत में लिया गया और सीमा स्थलों पर बनी अस्थायी आंदोलन संरचनाएं हटाई गईं।

इससे 2024–25 आंदोलन का लगभग चार सौ दिन लंबा स्थायी सीमा-चरण समाप्त हुआ।

लेकिन मांग समाप्त नहीं हुई।

यही अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है

मोर्चा हट गया था; एमएसपी आंदोलन नहीं।

खंड 9

पंजाब की कार्रवाई, आंदोलन का विकेंद्रीकरण और न्यायिक चरण

पंजाब सरकार : मध्यस्थ से कार्रवाई तक

शंभू–खनौरी आंदोलन में पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार की भूमिका जटिल रही।

फरवरी 2024 में पंजाब सरकार और हरियाणा सरकार की स्थितियां समान नहीं थीं। किसान मुख्यतः पंजाब की ओर से हरियाणा पार कर दिल्ली जाना चाहते थे।

लेकिन लंबा सीमा आंदोलन पंजाब की अर्थव्यवस्था, परिवहन और राजनीति के लिए भी चुनौती बनने लगा।

मार्च 2025 में पंजाब पुलिस द्वारा मोर्चे हटाने की कार्रवाई ने राजनीतिक समीकरण बदल दिया।

अब आंदोलनकारी किसान केवल भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र और हरियाणा सरकार की आलोचना नहीं कर रहे थे; पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार भी उनके निशाने पर आ गई।

इससे आंदोलन का राजनीतिक भूगोल बदल गया।

2025 में आंदोलन का विकेंद्रीकरण

शंभू और खनौरी के स्थायी शिविर हटने के बाद किसान संगठनों ने पंचायतों, महापंचायतों और दूसरे कार्यक्रमों के माध्यम से एमएसपी मुद्दा जीवित रखा।

अगस्त 2025 तक संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) कानूनी एमएसपी, सी-2 लागत से 50 प्रतिशत अधिक, किसान मामलों की वापसी तथा कृषि को अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों से सुरक्षित रखने जैसे प्रश्न उठा रहा था। दिल्ली सहित पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में किसान पंचायतें आयोजित की गईं।

इस चरण में आंदोलन सीमा-केंद्रित कम और राष्ट्रीय अभियान बनने की कोशिश अधिक करता दिखाई दिया।

2026 : न्यायिक प्रक्रिया का नया चरण

जनवरी 2026 में डल्लेवाल के नेतृत्व वाले किसान प्रतिनिधिमंडल ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्चाधिकार समिति के सामने कानूनी एमएसपी और सी-2 लागत से 50 प्रतिशत अधिक के समर्थन में विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया।

फरवरी 2026 के अंत में सर्वोच्च न्यायालय ने नवाब सिंह समिति से अंतिम रिपोर्ट और सिफारिशें सीलबंद लिफाफे में मांगीं। न्यायालय ने संकेत दिया कि सीमा-अवरोध संबंधी विवाद काफी हद तक समाधान की अवस्था में पहुंच चुका है।

यह शंभू–खनौरी संघर्ष की संस्थागत विरासत है।

एक सड़क अवरोध से शुरू हुई न्यायिक कार्यवाही अंततः भारतीय कृषि नीति के बड़े प्रश्नों तक पहुंच गई।

खंड 10

2026 की मूल्य-व्यवस्था और खनौरी का नया मोर्चा

2026 में एमएसपी समाप्त नहीं—कानूनी गारंटी अनसुलझी

इस विषय में एक तथ्यात्मक भेद बनाए रखना बहुत जरूरी है।

एमएसपी व्यवस्था समाप्त नहीं हुई है।

2026–27 के लिए भी केंद्र सरकार ने खरीफ और रबी फसलों के एमएसपी घोषित किए हैं। उदाहरणतः 2026–27 के लिए गेहूं का एमएसपी ₹2,585 प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया। सरकार का आधिकारिक दावा है कि निर्धारित उत्पादन लागत पर इसमें 109 प्रतिशत मार्जिन है।

मई 2026 में खरीफ फसलों के लिए भी नई एमएसपी दरें स्वीकृत की गईं।

अर्थात विवाद यह नहीं कि “एमएसपी है या नहीं।”

क्या घोषित एमएसपी प्रत्येक पात्र किसान के लिए प्रभावी और कानूनी रूप से संरक्षित न्यूनतम मूल्य बने?

यही 2024–26 संघर्ष का सार है।

अगस्त 2026 : खनौरी फिर आंदोलन का केंद्र

मार्च 2025 में पुराना मोर्चा हटाए जाने के लगभग डेढ़ वर्ष बाद अगस्त 2026 में खनौरी फिर किसान गतिविधि का केंद्र बना।

संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) से जुड़े किसानों ने ‘किसान बचाओ पदयात्रा’ शुरू की। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह लगभग 228 किलोमीटर की प्रस्तावित यात्रा थी और इसे 16 अगस्त से आगे बढ़ाया जा रहा था।

खनौरी–दातासिंहवाला पर किसानों और प्रशासन के बीच फिर गतिरोध उत्पन्न हुआ।

आंदोलन ने एक बार फिर वही प्रतीकात्मक भूगोल जीवित कर दिया जिसने फरवरी 2024 में राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया था।

19 अगस्त 2026 : वार्ता के आश्वासन पर नया मोर्चा स्थगित

19 अगस्त को घटनाक्रम में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ।

केंद्र/प्रशासन की ओर से बातचीत का आश्वासन मिलने के बाद डल्लेवाल और किसान नेताओं ने नया धरना तथा प्रस्तावित मार्च स्थगित कर दिया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 4 सितंबर 2026 को केंद्रीय स्तर पर बैठक का आश्वासन दिया गया।

यहां “स्थगित” और “समाप्त” के बीच अंतर रखना आवश्यक है।

डल्लेवाल ने स्पष्ट किया कि संघर्ष समाप्त नहीं माना जा रहा। किसान अगली वार्ता के परिणाम के आधार पर रणनीति निर्धारित करेंगे।

अतः 28 अगस्त 2026 तक शंभू–खनौरी से विकसित एमएसपी संघर्ष को समाप्त ऐतिहासिक घटना नहीं माना जा सकता।

यह अभी वार्ता और आंदोलन के बीच चल रही प्रक्रिया है।

खंड 11

उपलब्धियां, सीमाएं और 2020–21 से तुलना

आंदोलन की प्रमुख उपलब्धियां

शंभू–खनौरी आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि अभी कानून बनवा लेना नहीं है—क्योंकि अगस्त 2026 तक कानूनी एमएसपी की मूल मांग पूरी नहीं हुई।

इसकी उपलब्धि दूसरे स्तर पर है।

पहली, इसने तीन कृषि कानूनों की वापसी के बाद किसान राजनीति को समाप्त मान लेने की धारणा तोड़ी।

दूसरी, इसने एमएसपी बहस को “सरकार कितना एमएसपी घोषित करती है?” से उठाकर “क्या किसान को घोषित एमएसपी पाने का अधिकार है?” तक पहुंचाया।

तीसरी, सी-2 लागत से 50 प्रतिशत अधिक, मूल्य-अंतर भुगतान, सार्वभौमिक खरीद और कानूनी मूल्य-तल जैसे तकनीकी प्रश्न सार्वजनिक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने।

चौथी, लंबे गतिरोध के बावजूद आंदोलन केंद्र सरकार को कई दौर की वार्ता में वापस लाने में सफल रहा।

पांचवीं, एमएसपी प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्चाधिकार समिति तक पहुंचा।

छठी, स्थायी मोर्चे हट जाने के बाद भी 2025–26 में किसान संगठन मुद्दे को पुनर्जीवित करने में सफल रहे।

आंदोलन की सीमाएं

इस आंदोलन की सीमाएं भी उतनी ही स्पष्ट हैं।

सबसे बड़ी सीमा यह रही कि 2020–21 जैसी व्यापक राष्ट्रीय किसान एकता दोहराई नहीं जा सकी।

दूसरी, आंदोलन का मुख्य भौगोलिक आधार पंजाब और हरियाणा में अधिक केंद्रित दिखाई दिया।

तीसरी, लंबे सीमा गतिरोध ने आम नागरिकों, व्यापार और यातायात पर प्रभाव डाला, जिससे आंदोलन के तरीकों पर प्रश्न उठे।

चौथी, कानूनी एमएसपी की मांग लोकप्रिय नारे के रूप में जितनी सरल है, उसके वास्तविक विधायी मॉडल पर उतनी व्यापक सार्वजनिक सहमति नहीं बनी।

पांचवीं, सरकार और किसान संगठनों के बीच सी-2 लागत से 50 प्रतिशत अधिक की परिभाषा और उसके क्रियान्वयन पर गहरा अंतर कायम रहा।

छठी और सबसे निर्णायक सीमा—अगस्त 2026 तक कानूनी एमएसपी कानून अस्तित्व में नहीं आया।

2020–21 और 2024–26 : समानता और अंतर

दोनों आंदोलनों में पंजाब और हरियाणा की बड़ी भूमिका थी।

दोनों में दिल्ली राजनीतिक लक्ष्य बनी।

दोनों में किसान संगठनों ने केंद्र सरकार के साथ कई दौर की वार्ता की।

दोनों में राजमार्ग, सीमा, पुलिस और सार्वजनिक आवागमन बड़े विवाद बने।

लेकिन दोनों का मूल लक्ष्य अलग था।

2020–21 : बने हुए कानून वापस लो।

2024–26 : नया कानूनी अधिकार दो।

पहले संघर्ष में सफलता का पैमाना अपेक्षाकृत स्पष्ट था—तीन कानून रहें या वापस हों।

दूसरे में समाधान अधिक जटिल है। एमएसपी कानून बनने के बाद भी तय करना होगा कि उसकी गणना कैसे होगी, किन फसलों पर होगी, किसे खरीदना होगा, निजी व्यापारी की क्या जिम्मेदारी होगी, सरकार कब हस्तक्षेप करेगी और मूल्य-अंतर कौन वहन करेगा।

इसी कारण दूसरा प्रश्न आर्थिक दृष्टि से पहले से अधिक जटिल है।

खंड 12

किसान और सरकार के तर्कों का संतुलित मूल्यांकन

किसान बनाम सरकार : दोनों पक्षों के तर्कों का संतुलित मूल्यांकन

किसान पक्ष का सबसे मजबूत तर्क यह है कि जब कृषि उत्पादन की लागत किसान वहन करता है, मौसम का जोखिम किसान उठाता है और बाजार मूल्य गिरने का नुकसान भी किसान उठाता है, तब घोषित न्यूनतम मूल्य को वास्तविक सुरक्षा में बदलना आवश्यक है।

सरकार का मजबूत तर्क यह है कि भारतीय कृषि उत्पादन और बाजार इतने विशाल और विविध हैं कि सभी फसलों के लिए एक कठोर वैधानिक खरीद ढांचा बाजार, बजट, भंडारण और व्यापार पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

किसान का उत्तर है कि कानूनी एमएसपी का अर्थ संपूर्ण सरकारी खरीद होना आवश्यक नहीं।

यहीं संभावित समझौते का क्षेत्र मौजूद है।

एक मिश्रित व्यवस्था में कुछ रणनीतिक फसलों की सरकारी खरीद, दूसरी फसलों में मूल्य-अंतर भुगतान, निजी व्यापार के लिए मूल्य सुरक्षा संबंधी नियम और छोटे किसानों के लिए लक्षित आय सुरक्षा जैसे साधन जोड़े जा सकते हैं।

अर्थात बहस को “कानूनी एमएसपी बनाम कोई एमएसपी नहीं” की द्विआधारी स्थिति में सीमित करना समाधान को कठिन बनाता है।

खंड 13

2024–2026 की विस्तृत समयरेखा

विस्तृत समयरेखा : 2024–2026

फरवरी 2024 — संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा की अगुवाई में दिल्ली मार्च की तैयारी; केंद्र से प्रारंभिक वार्ताएं।

13 फरवरी 2024 — ‘दिल्ली चलो 2.0’; किसानों को शंभू और खनौरी की दिशा में हरियाणा सीमा पर रोका गया।

फरवरी 2024 — केंद्र और किसानों के बीच कई दौर की वार्ता।

18 फरवरी के आसपास — दालों, मक्का और कपास की पांच वर्षीय खरीद संबंधी केंद्रीय प्रस्ताव सामने आया; किसान संगठनों ने व्यापक कानूनी एमएसपी की मांग के कारण इसे स्वीकार नहीं किया।

21 फरवरी 2024 — खनौरी में गंभीर टकराव; शुभकरण सिंह की मृत्यु।

फरवरी–अगस्त 2024 — शंभू और खनौरी स्थायी आंदोलन स्थल बने।

2024 के मध्य — शंभू राजमार्ग और सीमा खोलने का मामला न्यायालयों में पहुंचा।

2 सितंबर 2024 — सर्वोच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति नवाब सिंह की अध्यक्षता में उच्चाधिकार समिति गठित की।

26 नवंबर 2024 — जगजीत सिंह डल्लेवाल ने खनौरी में आमरण अनशन शुरू किया।

दिसंबर 2024 — 101 किसानों के जत्थों द्वारा दिल्ली की ओर पैदल जाने के प्रयास।

दिसंबर 2024–जनवरी 2025 — डल्लेवाल के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंता; सर्वोच्च न्यायालय की सक्रियता।

जनवरी 2025 — केंद्र और आंदोलनकारी किसान संगठनों के बीच वार्ता पुनः शुरू करने की दिशा बनी।

फरवरी–मार्च 2025 — एमएसपी के कानूनी स्वरूप पर नए दौर की बातचीत।

मार्च 2025 — किसान पक्ष ने कानूनी एमएसपी लागू करने के संभावित ढांचे पर रिपोर्ट सरकार को सौंपी।

19 मार्च 2025 — केंद्र–किसान वार्ता का महत्वपूर्ण दौर।

मार्च 2025 — पंजाब पुलिस की कार्रवाई के बाद शंभू और खनौरी के स्थायी धरना स्थल हटाए गए; आंदोलन सीमा शिविर से विकेंद्रित अभियान में परिवर्तित हुआ।

अगस्त 2025 — विभिन्न राज्यों और दिल्ली में किसान पंचायतें; कानूनी एमएसपी और सी-2 लागत से 50 प्रतिशत अधिक की मांग दोहराई गई।

जनवरी 2026 — डल्लेवाल के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति के सामने कानूनी एमएसपी पर विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया।

फरवरी 2026 — शुभकरण सिंह की मृत्यु की दूसरी वर्षगांठ पर जवाबदेही का प्रश्न फिर उठा।

फरवरी 2026 के अंत — सर्वोच्च न्यायालय ने उच्चाधिकार समिति से अंतिम सिफारिशें सीलबंद लिफाफे में मांगीं।

मई–अगस्त 2026 — केंद्र की एमएसपी व्यवस्था जारी; 2026–27 की नई दरें घोषित।

16 अगस्त 2026 — खनौरी क्षेत्र से किसान बचाओ पदयात्रा का नया चरण।

19 अगस्त 2026 — बातचीत के आश्वासन के बाद नया धरना/मार्च स्थगित।

4 सितंबर 2026 — केंद्र/केंद्रीय प्रतिनिधियों के साथ अगली घोषित बैठक की तारीख। यह तारीख अभी भविष्य की है; इसलिए उसके परिणाम को इस अध्याय में पूर्वनिर्धारित नहीं किया जा सकता।

खंड 14

भारतीय किसान इतिहास में शंभू–खनौरी का स्थान

इतिहास में शंभू–खनौरी का स्थान

भारतीय किसान आंदोलनों की लंबी यात्रा में मांगों का स्वरूप लगातार बदला है।

औपनिवेशिक युग में प्रश्न भूमि, लगान, बेगार और जमींदार का था।

स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार, काश्तकारी और सिंचाई महत्वपूर्ण हुए।

हरित क्रांति के बाद किसान राजनीति मूल्य, बिजली, उर्वरक और कृषि लागत की ओर बढ़ी।

1980 के दशक में महेंद्र सिंह टिकैत, शरद जोशी और दूसरे नए किसान नेताओं ने लाभकारी मूल्य को किसान राजनीति के केंद्र में रखा।

2020–21 में बाजार सुधार और कृषि कानून केंद्रीय प्रश्न बने।

और 2024–26 में संघर्ष एक कदम और आगे गया

मूल्य से मूल्य-अधिकार तक।

यही शंभू–खनौरी आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विशेषता है।

निष्कर्ष : एमएसपी की घोषणा से किसान के कानूनी अधिकार तक

शंभू–खनौरी आंदोलन की अंतिम कहानी अभी नहीं लिखी जा सकती।

28 अगस्त 2026 तक केंद्र सरकार एमएसपी व्यवस्था चला रही है। 22 अधिदेशित फसलों के लिए समर्थन मूल्य निर्धारित किए जा रहे हैं और सरकार का आधिकारिक दावा है कि वह उत्पादन लागत पर कम-से-कम 50 प्रतिशत मार्जिन के सिद्धांत का पालन करती है।

दूसरी तरफ किसान संगठनों का कहना है कि मूल्य घोषित करना पर्याप्त नहीं है; किसान को उस मूल्य का वैधानिक अधिकार मिलना चाहिए, और उसकी गणना सी-2 लागत से 50 प्रतिशत अधिक के आधार पर होनी चाहिए। यह मांग जनवरी 2026 में भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति के सामने औपचारिक रूप से रखी गई।

इस संघर्ष ने इसलिए भारतीय कृषि नीति के सामने तीन मूल प्रश्न रख दिए हैं।

पहला—फसल का उचित मूल्य कौन निर्धारित करे?

दूसरा—यदि सरकार मूल्य निर्धारित करती है तो किसान को वह मूल्य दिलाने की जिम्मेदारी किसकी है?

तीसरा—क्या कृषि मूल्य सुरक्षा सरकारी नीति रहे या किसान का कानूनी अधिकार बने?

2020–21 में भारतीय किसानों ने संसद से पारित तीन कानूनों को वापस करवाकर राज्य की कृषि नीति को बदलने की अपनी राजनीतिक क्षमता प्रदर्शित की थी।

2024–26 का संघर्ष उससे कठिन लक्ष्य लेकर आया है। इस बार मांग किसी कानून को हटाने की नहीं, बल्कि कृषि बाजार में किसान के लिए एक नया वैधानिक मूल्य-अधिकार स्थापित करने की है।

शंभू की बैरिकेडिंग, खनौरी का टकराव, शुभकरण सिंह की मृत्यु, डल्लेवाल का लंबा उपवास, 101 किसानों के पैदल जत्थे, सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता, नवाब सिंह समिति, 2025 में मोर्चों का हटना और 2026 में खनौरी पर फिर लौटता आंदोलन—इन सभी को एक सूत्र में बांधने वाला प्रश्न यही है।

क्या भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य केवल सरकार द्वारा घोषित कृषि मूल्य रहेगा, या भविष्य में वह किसान का कानून द्वारा संरक्षित आर्थिक अधिकार बनेगा?

इसीलिए शंभू–खनौरी को असफल या सफल घोषित करके इतिहास बंद कर देना जल्दबाजी होगी। अधिक सटीक ऐतिहासिक निष्कर्ष यह है कि 2024–26 के आंदोलन ने एमएसपी को भारतीय किसान राजनीति के एक प्रशासनिक मूल्य-उपकरण से उठाकर वैधानिक अधिकार के राष्ट्रीय प्रश्न में परिवर्तित कर दिया है।

OCN ऐतिहासिक आकलन

शंभू–खनौरी आंदोलन की ऐतिहासिक विशिष्टता मूल्य से मूल्य-अधिकार की ओर बढ़ने में है। किसान पक्ष का सबसे मजबूत तर्क यह है कि घोषित समर्थन मूल्य तब तक अधूरा है जब बाजार में उससे कम कीमत मिलने पर प्रभावी संरक्षण न हो। सरकार के सामने वास्तविक कठिनाइयां भी हैं—किस लागत सूत्र को आधार बनाया जाए, किन फसलों और कितनी मात्रा को सुरक्षा मिले, संपूर्ण सरकारी खरीद के बजाय मूल्य-अंतर भुगतान या बाजार हस्तक्षेप कैसे लागू हो, और बजट, भंडारण, उपभोक्ता मूल्य तथा फसल विविधीकरण पर उसका क्या प्रभाव पड़े। आंदोलन ने इस जटिल प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श में स्थायी स्थान दिया, लेकिन अगस्त 2026 तक वैधानिक गारंटी नहीं बनी और संगठनात्मक–भौगोलिक विस्तार 2020–2021 से सीमित रहा। इसलिए इसे अभी अंतिम जीत या विफलता नहीं, कृषि मूल्य नीति को कानूनी अधिकार में बदलने की जारी लोकतांत्रिक बहस के रूप में पढ़ना अधिक उचित है।

शोधार्थियों के लिए

प्राथमिक और प्रमुख संस्थागत स्रोत

कृषि लागत एवं मूल्य आयोगन्यूनतम समर्थन मूल्य, उत्पादन लागत, मूल्य नीति और फसलवार सिफारिशों से संबंधित आधिकारिक रिपोर्टें।स्रोत तक जाएँ ↗
लोकसभा—10 फरवरी 2026 का सरकारी उत्तर22 अधिदेशित फसलों, लागत पर 50 प्रतिशत लाभ, खरीद और कानूनी गारंटी संबंधी प्रश्न का नवीन आधिकारिक उत्तर।स्रोत तक जाएँ ↗
राज्यसभा—13 मार्च 2026 का सरकारी उत्तरकानूनी समर्थन मूल्य के राजकोषीय, व्यापारिक और किसान-आय प्रभाव तथा किसान संगठनों से संवाद पर आधिकारिक प्रश्नोत्तर।स्रोत तक जाएँ ↗
सर्वोच्च न्यायालय—शंभू सीमा प्रकरणशंभू–खनौरी सीमा, उच्चाधिकार समिति, प्रदर्शन और राजमार्ग संबंधी न्यायिक कार्यवाही के आधिकारिक अभिलेख।स्रोत तक जाएँ ↗
समर्थन मूल्य की लागत-गणना पर सरकारी स्पष्टीकरणए-2 लागत, पारिवारिक श्रम और सी-2 लागत की भूमिका पर कृषि मंत्रालय का आधिकारिक स्पष्टीकरण।स्रोत तक जाएँ ↗
2025–26 की समर्थन मूल्य और खरीद सूचना22 अधिदेशित फसलों, निर्धारित मूल्य, कुल खरीद और किसानों को भुगतान पर दिसंबर 2025 का सरकारी विवरण।स्रोत तक जाएँ ↗
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालयशंभू सीमा, आवागमन, पुलिस कार्रवाई और संबंधित याचिकाओं के न्यायिक अभिलेख।स्रोत तक जाएँ ↗
पूर्ववर्ती कृषि कानून विरोधी आंदोलन2020–2021 के आंदोलन, कानून वापसी और शेष मांगों की पृष्ठभूमि का OCN शोध-अध्याय।स्रोत तक जाएँ ↗

स्रोत-सावधानी: आंदोलनकारियों और सुरक्षाबलों की चोटों, मृतकों की संख्या, पुलिस बल-प्रयोग, ड्रोन से आंसू गैस, वार्ता प्रस्तावों, अनशन की चिकित्सकीय स्थिति और मोर्चे हटाने की परिस्थितियों पर संगठनात्मक, सरकारी और समाचार स्रोतों में भिन्न विवरण मिलते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य की ‘लागत पर 50 प्रतिशत’ नीति को सी-2 लागत से 50 प्रतिशत अधिक की मांग के समान न समझें। 4 सितंबर 2026 की प्रस्तावित वार्ता अभी भविष्य की घटना है; उसके बाद इस अध्याय के अंतिम घटनाक्रम को अद्यतन करना आवश्यक होगा।