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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–010 · भाग 05

जंतर-मंतर आंदोलन : कारण, समयरेखा, हिंसा और राजनीतिक प्रतिक्रिया

एंटी पेपर लीक कानून : क्या अब खत्म होगा परीक्षा माफिया?

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंस्करण 1.0 · 31 जुलाई 2026

पेपर लीक के विरुद्ध दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ आंदोलन वर्ष 2026 के सबसे चर्चित युवा आंदोलनों में शामिल हो गया। इसकी शुरुआत परीक्षा प्रणाली में बार-बार सामने आ रही अनियमितताओं और विशेष रूप से राष्ट्रीय चिकित्सा प्रवेश परीक्षा से जुड़े कथित प्रश्नपत्र लीक के विरोध में हुई थी। लेकिन कुछ ही सप्ताह में यह आंदोलन परीक्षा सुधार की माँग से आगे बढ़कर राजनीतिक जवाबदेही, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे, पुलिस कार्रवाई और आंदोलन के चरित्र को लेकर व्यापक राष्ट्रीय बहस में बदल गया।

आंदोलन का सबसे बड़ा प्रभाव यह रहा कि सार्वजनिक परीक्षाओं में भ्रष्टाचार और युवाओं के असंतोष का मुद्दा जंतर-मंतर से निकलकर संसद के दोनों सदनों तक पहुँच गया। इसके साथ ही आंदोलन के दौरान हुई हिंसा, आपत्तिजनक भाषा, पुलिस बल के प्रयोग और प्रदर्शनकारियों की पृष्ठभूमि से जुड़े दावों ने इसकी मूल माँगों को कई बार पीछे भी धकेल दिया।

आंदोलन के प्रमुख कारण

इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय और राज्य स्तर की परीक्षाओं में लगातार सामने आ रही अनियमितताएँ थीं। विशेष रूप से 2026 की चिकित्सा प्रवेश परीक्षा में कथित प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा रद्द किए जाने से लाखों अभ्यर्थियों में असंतोष फैल गया। उनका तर्क था कि परीक्षा की तैयारी में वर्षों का समय और परिवारों की बड़ी आर्थिक पूँजी लगती है, लेकिन संस्थागत विफलता का भार अंततः निर्दोष विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है।

आंदोलनकारियों की माँगें समय के साथ विस्तृत होती गईं। इनमें प्रमुख रूप से—

तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा;

पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं की निष्पक्ष तथा समयबद्ध जाँच;

सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधार;

दोषी परीक्षा एजेंसियों और सेवा प्रदाताओं पर कठोर कार्रवाई;

पुलिस मामलों को वापस लेने;

परीक्षा संकट से प्रभावित अभ्यर्थियों को राहत;

तथा कथित रूप से आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों के परिवारों को मुआवजा

शामिल थे। आंदोलन के नेताओं ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को राजनीतिक और नैतिक जवाबदेही का प्रश्न बनाया, जबकि सरकार ने प्रारंभ में संस्थागत सुधार और दोषियों पर कार्रवाई को अधिक महत्त्व दिया।

आंदोलन का नेतृत्व और सामाजिक आधार

आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से अभिजीत दीपके के नेतृत्व वाले युवा संगठन कॉकरेच जनता पार्टी—CJP ने किया। यह संगठन प्रारंभ में सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक युवा मंच के रूप में उभरा था, लेकिन पेपर लीक और बेरोजगारी जैसे मुद्दों के कारण उसे बड़ी संख्या में युवाओं का समर्थन मिलने लगा। कई वामपंथी छात्र संगठनों, नागरिक समूहों और विपक्षी दलों ने भी अलग-अलग चरणों में आंदोलन का समर्थन किया।

पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अनशन से आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर अतिरिक्त दृश्यता मिली। उनके स्वास्थ्य में गिरावट और बाद में अस्पताल ले जाए जाने के बाद बड़ी संख्या में लोग जंतर-मंतर पहुँचे। यहीं से आंदोलन का स्वर अधिक तीखा और राजनीतिक रूप से अधिक प्रभावशाली होता दिखाई दिया।

आंदोलन की प्रमुख समयरेखा

20 जून 2026 : जंतर-मंतर पर धरने की शुरुआत

CJP और उससे जुड़े छात्र समूहों ने 20 जून को जंतर-मंतर पर धरना प्रारंभ किया। शुरुआती चरण में आंदोलन मुख्यतः शांतिपूर्ण बैठकों, भाषणों, सोशल मीडिया अभियानों और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग तक सीमित रहा।

प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि परीक्षा रद्द होना मात्र प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा व्यवस्था की सुरक्षा और जवाबदेही में गंभीर विफलता का प्रमाण है। उनका कहना था कि केवल पुनर्परीक्षा घोषित कर देने से विद्यार्थियों को हुए मानसिक, आर्थिक और शैक्षणिक नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती।

28 जून : सोनम वांगचुक का अनशन

28 जून को सोनम वांगचुक ने आंदोलन के समर्थन में अनशन प्रारंभ किया। उनके जुड़ने से आंदोलन को नागरिक समाज के एक हिस्से का समर्थन और व्यापक मीडिया कवरेज मिला।

वांगचुक ने पेपर लीक को केवल एक परीक्षा की समस्या न मानकर युवाओं के विश्वास और लोकतांत्रिक जवाबदेही का विषय बताया। जैसे-जैसे उनका अनशन लंबा होता गया, उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ी और सरकार पर संवाद का दबाव भी बढ़ता गया।

18 जुलाई : वांगचुक को अस्पताल ले जाया गया

अनशन के 21वें दिन, 18 जुलाई को स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद अधिकारियों ने वांगचुक को अस्पताल पहुँचाया। पुलिस और प्रशासन ने इसे चिकित्सकीय आवश्यकता तथा दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देश से जुड़ा कदम बताया। चिकित्सकों ने शरीर में पोटैशियम की गंभीर कमी सहित स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों की आशंका व्यक्त की थी।

वांगचुक और उनके समर्थकों ने अस्पताल ले जाने के तरीके पर आपत्ति जताई। उनके समर्थकों ने इसे अनशन समाप्त कराने का दबाव बताया, जबकि प्रशासन का तर्क था कि जीवन की रक्षा करना उसकी जिम्मेदारी थी।

इस घटना के बाद आंदोलन में भीड़ बढ़ने लगी। अभिजीत दीपके ने स्वयं अनशन शुरू किया और 20 जुलाई को संसद तक मार्च करने की घोषणा की।

19 जुलाई : संसद मार्च पर रोक और टकराव की आशंका

संसद का मानसून सत्र आरंभ होने वाला था। दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा, निषेधाज्ञा और मध्य दिल्ली में बड़ी भीड़ के संभावित प्रभाव का हवाला देते हुए प्रस्तावित संसद मार्च की अनुमति नहीं दी।

इसके बावजूद आंदोलनकारियों ने मार्च पर आगे बढ़ने की घोषणा की। प्रशासन ने जंतर-मंतर और संसद मार्ग के आसपास बैरिकेडिंग बढ़ा दी तथा अतिरिक्त पुलिस और अर्धसैनिक बल तैनात किए। इस बिंदु पर शांतिपूर्ण धरने और निषिद्ध क्षेत्र की ओर मार्च के बीच टकराव की आशंका स्पष्ट हो चुकी थी।

20 जुलाई : संसद मार्च और हिंसक टकराव

20 जुलाई आंदोलन का सबसे विवादास्पद दिन बना। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर और आसपास के क्षेत्रों में एकत्र हुए तथा संसद की ओर बढ़ने का प्रयास किया। पुलिस ने उन्हें बैरिकेड पार करने से रोका। इसके बाद कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच धक्का-मुक्की और झड़पें हुईं।

प्रत्यक्षदर्शी रिपोर्टों और समाचार एजेंसियों के अनुसार पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आँसू गैस और लाठीचार्ज का प्रयोग किया। दूसरी ओर, पुलिस का आरोप था कि भीड़ के एक हिस्से ने बैरिकेड तोड़ने, पथराव करने तथा पुलिसकर्मियों पर लाठी, बोतल और अन्य वस्तुओं से हमला करने का प्रयास किया।

इस टकराव में प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों—दोनों के घायल होने की सूचनाएँ सामने आईं। आंदोलनकारियों ने पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग करने का आरोप लगाया, जबकि सरकार और पुलिस ने कहा कि संसद की ओर निषिद्ध मार्च को रोकने के दौरान पर्याप्त संयम बरता गया और बल का प्रयोग स्थिति नियंत्रित करने के लिए किया गया।

यहीं आंदोलन के संबंध में दो परस्पर विरोधी आख्यान उभरे। आंदोलन के समर्थकों ने इसे शांतिपूर्ण छात्रों पर पुलिस कार्रवाई बताया। पुलिस और सरकार के समर्थकों ने इसे पूर्व अनुमति के बिना संसद की ओर बढ़ने वाली और बाद में हिंसक हुई भीड़ के विरुद्ध आवश्यक कार्रवाई कहा।

निष्पक्ष मूल्यांकन में दोनों पक्षों के दावों की अलग-अलग जाँच आवश्यक है। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर अनावश्यक बल का प्रयोग स्वीकार्य नहीं हो सकता। उसी प्रकार पुलिसकर्मियों पर हमला, सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँचाना अथवा बैरिकेड तोड़कर संवेदनशील क्षेत्र में प्रवेश करना लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

21 जुलाई : राजनीतिक टकराव तेज

20 जुलाई की घटनाओं के बाद आंदोलन सीधे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्तारूढ़ गठबंधन के सांसदों से परीक्षा लीक के दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई और परीक्षा व्यवस्था को अधिक सुरक्षित बनाने के प्रयासों पर एकजुट रहने की अपील की।

दूसरी ओर, राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास के निकट धरना दिया और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग दोहराई। संसद में भी पुलिस कार्रवाई, पेपर लीक और सरकार की जवाबदेही को लेकर हंगामा हुआ।

23 जुलाई : आपत्तिजनक भाषा पर नया विवाद

आंदोलन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य नेताओं के लिए अपमानजनक तथा कथित रूप से अभद्र भाषा प्रयोग किए जाने के वीडियो सामने आए। 23 जुलाई की एक ऐसी घटना के संबंध में बाद में एक महिला के विरुद्ध जीरो एफआईआर दर्ज की गई।

इस प्रकरण ने आंदोलन की नैतिक स्थिति को नुकसान पहुँचाया। लोकतंत्र में सरकार और प्रधानमंत्री की कठोरतम आलोचना की जा सकती है, लेकिन व्यक्तिगत गाली-गलौज और अमर्यादित भाषा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या राजनीतिक प्रतिरोध का पर्याय नहीं माना जा सकता।

आंदोलन के आयोजकों की जिम्मेदारी थी कि वे मंच, नारों और भाषणों पर अनुशासन बनाए रखते। आंदोलन की वैध माँगों के बीच ऐसी भाषा ने सरकार को विरोध के मूल मुद्दों से ध्यान हटाकर आंदोलनकारियों के आचरण पर बहस केंद्रित करने का अवसर दिया।

24 जुलाई : सरकार और आंदोलनकारियों के बीच वार्ता

20 जुलाई की हिंसा और बढ़ते राजनीतिक दबाव के बाद सरकार तथा आंदोलन के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई। सरकार ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग पर विचार के लिए समय माँगा।

आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि केवल जांच या सुधार समिति का आश्वासन पर्याप्त नहीं होगा। उन्होंने मंत्री के इस्तीफे, पुलिस मामले वापस लेने और पीड़ित परिवारों को सहायता देने की माँग जारी रखी।

25 जुलाई : शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और धरना स्थगित

25 जुलाई को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलनकारियों ने इसे अपनी बड़ी राजनीतिक विजय बताया। सरकार ने परीक्षा सुधार, पुलिस मामलों की समीक्षा और प्रभावित परिवारों के लिए सहायता जैसे कदमों पर भी सहमति व्यक्त की।

इसके बाद CJP ने 36 दिन से चल रहे धरने को स्थगित करने की घोषणा की। जंतर-मंतर पर उपस्थित समर्थकों ने मिठाई बाँटकर और नारे लगाकर इसे युवा आंदोलन की सफलता के रूप में मनाया।

27 जुलाई के बाद : आंदोलन से विधायी सुधार तक

आंदोलन समाप्त होने के दो दिन बाद सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा कानून में संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत किया। इसमें सजा और जुर्माने बढ़ाने, विशेष कार्यबल बनाने, फास्ट ट्रैक अदालतें गठित करने तथा समयबद्ध जांच और मुकदमे का प्रावधान किया गया।

इस प्रकार आंदोलन का परिणाम केवल एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं रहा; उसने परीक्षा सुधार को तत्काल विधायी प्राथमिकता बनाने में भी भूमिका निभाई।

हिंसा को लेकर पुलिस के दावे

आंदोलन समाप्त होने के बाद दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर और संसद मार्च से संबंधित घटनाओं में कई मामले दर्ज किए। पुलिस ने वीडियो फुटेज, चेहरे की पहचान तकनीक और अन्य अभिलेखों के आधार पर बड़ी संख्या में ऐसे लोगों की पहचान का दावा किया, जिनके विरुद्ध पहले से आपराधिक मामले दर्ज थे। कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह संख्या लगभग 2,900 बताई गई।

लेकिन इस दावे की व्याख्या सावधानी से की जानी चाहिए। किसी व्यक्ति का पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड होना यह स्वतः सिद्ध नहीं करता कि उसने आंदोलन के दौरान भी अपराध किया। कानून के अनुसार हर व्यक्ति की भूमिका उपलब्ध वीडियो, प्रत्यक्ष साक्ष्य और अन्य प्रमाणों के आधार पर अलग-अलग निर्धारित होनी चाहिए।

दिल्ली सरकार ने बाद में पुलिस से गिरफ्तारियों और हिरासत की समीक्षा करने तथा उन सामान्य प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध प्रतिकूल कार्रवाई न करने को कहा, जो हिंसा में शामिल नहीं थे। आपराधिक पृष्ठभूमि रखने वाले या हिंसा में संलिप्त पाए गए व्यक्तियों को इस राहत से अलग रखने की बात कही गई।

यही लोकतांत्रिक और कानूनी दृष्टि से उचित अंतर है—शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भाग लेना अपराध नहीं है; हिंसा करना अपराध है। कार्रवाई संगठन या भीड़ की सामूहिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की प्रमाणित भूमिका के आधार पर होनी चाहिए।

पुलिस बल के प्रयोग पर न्यायिक प्रश्न

आंदोलन के दौरान आँसू गैस, लाठीचार्ज और कथित रूप से पैलेट गन के प्रयोग को लेकर भी प्रश्न उठे। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा। न्यायालय ने कानून-व्यवस्था की असाधारण परिस्थितियों में ऐसे साधनों के प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार किया, लेकिन केंद्र सरकार को रैपिड एक्शन फोर्स के गोला-बारूद संबंधी अभिलेख सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि प्रयोग किए गए बल की प्रकृति और अनुपात की बाद में जाँच की जा सके।

इस विवाद का मूल प्रश्न यह नहीं है कि पुलिस को बल प्रयोग का अधिकार है या नहीं। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को आवश्यक और आनुपातिक बल के प्रयोग का अधिकार होता है। वास्तविक प्रश्न यह है कि उस दिन प्रयोग किया गया बल परिस्थिति के अनुरूप, न्यूनतम और जवाबदेह था या नहीं। इसका निर्धारण स्वतंत्र जाँच और न्यायिक समीक्षा से होना चाहिए।

राजनीतिक प्रतिक्रिया

सरकार का पक्ष

सरकार ने शुरुआत में कहा कि पेपर लीक के दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई चल रही है और परीक्षा प्रणाली में सुधार किए जा रहे हैं। सरकार का तर्क था कि एक मंत्री का इस्तीफा परीक्षा व्यवस्था की संरचनात्मक समस्या का समाधान नहीं है।

20 जुलाई की हिंसा के बाद सत्तापक्ष ने आंदोलन में कथित असामाजिक और आपराधिक तत्वों की मौजूदगी का मुद्दा उठाया। उसने पुलिस कार्रवाई को संसद और संवेदनशील सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया।

इसके बाद सरकार ने संवाद, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे, परीक्षा सुधार कार्यबल और कानून संशोधन के माध्यम से राजनीतिक संकट को नियंत्रित करने का प्रयास किया। संशोधित कानून को सरकार ने युवाओं के हित में निर्णायक कार्रवाई और परीक्षा माफिया के विरुद्ध कठोर संदेश के रूप में प्रस्तुत किया।

कांग्रेस और विपक्ष का पक्ष

कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दलों ने आंदोलनकारियों की प्रमुख माँगों का समर्थन किया। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे सहित विपक्षी नेताओं ने सरकार पर परीक्षा प्रणाली की रक्षा करने में विफल रहने तथा आंदोलन के दबाव के बाद ही कदम उठाने का आरोप लगाया।

राज्यसभा में खरगे ने संशोधन को पर्याप्त न बताते हुए कहा कि केवल दंड बढ़ाने से समस्या की जड़ समाप्त नहीं होगी। विपक्ष ने परीक्षा एजेंसियों, संबंधित मंत्रालय और सरकार की राजनीतिक जवाबदेही तय करने की माँग की।

हालाँकि विपक्ष के सामने भी चुनौती थी कि वह आंदोलन की वैध माँगों का समर्थन करते हुए हिंसा, गाली-गलौज और गैरकानूनी आचरण से स्पष्ट दूरी बनाए। किसी भी हिंसक घटना को केवल सरकार-विरोधी आंदोलन होने के कारण उचित ठहराना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं हो सकता।

स्वतंत्र विश्लेषण

जंतर-मंतर आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने पेपर लीक को सामान्य प्रशासनिक गड़बड़ी के बजाय युवाओं के भविष्य और संस्थागत विश्वास के राष्ट्रीय प्रश्न के रूप में स्थापित कर दिया। सरकार को मंत्री-स्तरीय जवाबदेही स्वीकार करनी पड़ी, परीक्षा सुधारों की घोषणा करनी पड़ी और कानून संशोधन को तत्काल संसद में लाना पड़ा।

लेकिन आंदोलन की कुछ गंभीर कमजोरियाँ भी सामने आईं।

पहली कमजोरी संगठनात्मक अनुशासन की थी। इतनी बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने के बाद नेतृत्व भीड़ के प्रत्येक हिस्से पर नियंत्रण बनाए रखने में सफल नहीं रहा। संसद की ओर बिना अनुमति मार्च, बैरिकेड तोड़ने के प्रयास, पुलिस से टकराव और कथित हिंसा ने आंदोलन के शांतिपूर्ण स्वरूप को प्रभावित किया।

दूसरी कमजोरी भाषा की मर्यादा से जुड़ी थी। प्रधानमंत्री या किसी अन्य संवैधानिक पदाधिकारी के विरुद्ध आपत्तिजनक गालियों ने परीक्षा सुधार के गंभीर मुद्दे को व्यक्तिगत और अपमानजनक राजनीतिक विवाद में बदलने का जोखिम पैदा किया।

तीसरी कमजोरी राजनीतिक दलों के बढ़ते हस्तक्षेप की थी। विपक्ष का समर्थन आंदोलन को शक्ति देता है, लेकिन इसके साथ यह आशंका भी उत्पन्न होती है कि मूल छात्र मुद्दा दलगत राजनीति के बड़े संघर्ष में विलीन हो जाए।

दूसरी ओर, प्रशासन की भी स्पष्ट जिम्मेदारी थी। पुलिस को शांतिपूर्ण और हिंसक प्रदर्शनकारियों के बीच अंतर करना चाहिए था। भीड़ में कुछ लोगों की हिंसा पूरे आंदोलन के विरुद्ध अंधाधुंध कार्रवाई का औचित्य नहीं बन सकती। बल का प्रयोग अंतिम विकल्प, न्यूनतम और स्थिति के अनुपात में होना चाहिए।

इस आंदोलन का संतुलित निष्कर्ष यही है कि इसकी मूल माँगें वैध और व्यापक सार्वजनिक हित से जुड़ी थीं, लेकिन हिंसा और अमर्यादित आचरण ने कई अवसरों पर उसके नैतिक प्रभाव को कमजोर किया। उसी प्रकार कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार का दायित्व था, लेकिन इसके नाम पर हर प्रदर्शनकारी को अपराधी मान लेना भी स्वीकार्य नहीं हो सकता।

लोकतंत्र में आंदोलन का अधिकार और कानून-व्यवस्था—दोनों परस्पर विरोधी अवधारणाएँ नहीं हैं। शांतिपूर्ण विरोध की रक्षा करना और हिंसा में शामिल लोगों को साक्ष्य के आधार पर दंडित करना—यही वह संतुलन है जो जंतर-मंतर की घटनाओं से सबसे महत्त्वपूर्ण लोकतांत्रिक सबक के रूप में सामने आता है।