2026 का संशोधन : संसद ने क्या-क्या बदला?
एंटी पेपर लीक कानून : क्या अब खत्म होगा परीक्षा माफिया?
वर्ष 2024 में बने सार्वजनिक परीक्षा कानून ने पहली बार प्रश्नपत्र लीक और संगठित परीक्षा अपराधों के विरुद्ध एक केंद्रीय कानूनी ढाँचा उपलब्ध कराया था। लेकिन उसके क्रियान्वयन के दौरान सामने आई घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि केवल अपराध घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। दंड का निवारक प्रभाव बढ़ाने, जांच को समयबद्ध बनाने और मुकदमों के शीघ्र निस्तारण के लिए कानून को अधिक कठोर तथा प्रक्रियात्मक रूप से प्रभावी बनाने की आवश्यकता थी।
इसी उद्देश्य से पब्लिक एग्ज़ामिनेशन्स (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) अमेंडमेंट बिल, 2026 को 27 जुलाई 2026 को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। लोकसभा ने इसे 29 जुलाई और राज्यसभा ने 30 जुलाई 2026 को पारित कर दिया। संशोधन का घोषित उद्देश्य सार्वजनिक परीक्षाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता मजबूत करना तथा जांच और मुकदमे की प्रक्रिया को समयबद्ध बनाना है। (PRS Legislative Research)
- सामान्य परीक्षा अपराधों की सजा बढ़ाई गई
2024 के कानून के अंतर्गत अनुचित साधनों का प्रयोग करने वाले किसी व्यक्ति के लिए तीन से पाँच वर्ष तक के कारावास और अधिकतम दस लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान था।
2026 के संशोधन में इसे बढ़ाकर—
न्यूनतम पाँच वर्ष और अधिकतम दस वर्ष का कारावास
अधिकतम पचास लाख रुपये का जुर्माना
कर दिया गया है। इसका अर्थ है कि प्रश्नपत्र लीक, उत्तर कुंजी का अवैध प्रसार, कंप्यूटर प्रणाली से छेड़छाड़ या अन्य परिभाषित परीक्षा अपराधों में शामिल व्यक्ति को पहले की तुलना में कहीं अधिक कठोर दंड का सामना करना पड़ सकता है। (PRS Legislative Research)
- सेवा प्रदाता संस्थाओं पर जुर्माना पाँच गुना
सार्वजनिक परीक्षाओं के आयोजन में अनेक निजी और तकनीकी एजेंसियाँ शामिल होती हैं। इनमें प्रश्नपत्र छापने वाली कंपनियाँ, डिजिटल परीक्षा मंच, कंप्यूटर केंद्र, लॉजिस्टिक कंपनियाँ और परीक्षा केंद्र संचालक सम्मिलित हो सकते हैं।
2024 के कानून में किसी सेवा प्रदाता संस्था के अनुचित साधनों में शामिल पाए जाने पर अधिकतम एक करोड़ रुपये के जुर्माने का प्रावधान था। संशोधन ने इसे बढ़ाकर अधिकतम पाँच करोड़ रुपये कर दिया है। इसका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत कर्मचारियों को नहीं, बल्कि परीक्षा प्रक्रिया संभालने वाली संस्थाओं को भी सुरक्षा चूक और मिलीभगत के लिए उत्तरदायी बनाना है। (PRS Legislative Research)
- संस्था के जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई
यदि किसी सेवा प्रदाता संस्था का प्रभारी, निदेशक, वरिष्ठ प्रबंधक या जिम्मेदार अधिकारी परीक्षा अपराध में शामिल पाया जाता है, तो संशोधित प्रावधान के अनुसार उसके लिए—
कम से कम पाँच वर्ष का कारावास
पाँच करोड़ रुपये का जुर्माना
निर्धारित किया गया है।
2024 के मूल कानून में ऐसे जिम्मेदार व्यक्तियों के लिए तीन से दस वर्ष के कारावास और एक करोड़ रुपये के जुर्माने का प्रावधान था। नए संशोधन ने न्यूनतम कारावास और आर्थिक दंड—दोनों को बढ़ा दिया है। (PRS Legislative Research)
- संगठित अपराध पर न्यूनतम सात वर्ष की सजा
संशोधन का सबसे कठोर प्रावधान संगठित परीक्षा अपराधों से संबंधित है। ऐसे अपराधों में व्यक्तियों, संस्थाओं या समूहों द्वारा योजनाबद्ध तरीके से प्रश्नपत्र लीक करना, अभ्यर्थियों से धन लेना, फर्जी परीक्षा केंद्र चलाना या परीक्षा प्रणाली में व्यवस्थित सेंध लगाना शामिल हो सकता है।
2024 के कानून में संगठित अपराध के लिए पाँच से दस वर्ष तक का कारावास और कम से कम एक करोड़ रुपये के जुर्माने का प्रावधान था।
2026 के संशोधन में—
न्यूनतम कारावास पाँच से बढ़ाकर सात वर्ष
न्यूनतम जुर्माना एक करोड़ से बढ़ाकर दस करोड़ रुपये
कर दिया गया है। अधिकतम कारावास दस वर्ष ही रखा गया है। इस प्रावधान का लक्ष्य छोटे स्तर के अपराधियों से आगे बढ़कर पूरे परीक्षा माफिया और उसके आर्थिक नेटवर्क पर चोट करना है। (PRS Legislative Research)
- दोषी सेवा प्रदाताओं पर आठ वर्ष का प्रतिबंध
2024 के कानून के अनुसार परीक्षा संबंधी अनुचित साधनों में शामिल सेवा प्रदाता को चार वर्ष तक किसी सार्वजनिक परीक्षा के आयोजन की जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती थी।
संशोधन में यह अवधि बढ़ाकर आठ वर्ष कर दी गई है। अर्थात किसी परीक्षा एजेंसी, तकनीकी कंपनी या अन्य सेवा प्रदाता की मिलीभगत प्रमाणित होने पर वह आठ वर्षों तक सार्वजनिक परीक्षा संबंधी कार्य प्राप्त नहीं कर सकेगा। यह प्रावधान आर्थिक दंड के साथ-साथ उसकी व्यावसायिक पात्रता पर भी गंभीर प्रभाव डालेगा। (PRS Legislative Research)
- विशेष कार्यबल गठित करने की शक्ति
मूल कानून में केंद्र सरकार को किसी मामले की जांच केंद्रीय जांच एजेंसी को सौंपने की शक्ति थी। संशोधन ने केंद्र सरकार को परीक्षा अपराधों की जांच के लिए विशेष कार्यबल—स्पेशल टास्क फोर्स गठित करने का स्पष्ट अधिकार दिया है।
इसका उद्देश्य विभिन्न राज्यों, परीक्षा एजेंसियों और तकनीकी मंचों में फैले संगठित नेटवर्क की समन्वित जांच करना है। विशेष कार्यबल वित्तीय लेन-देन, डिजिटल साक्ष्य, अंतरराज्यीय गिरोहों और संस्थागत मिलीभगत की जांच एकीकृत रूप से कर सकेगा। (PRS Legislative Research)
- जांच पूरी करने के लिए दो महीने की समय-सीमा
संशोधन के अनुसार अपराध की जांच दो महीने के भीतर पूरी की जानी चाहिए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परीक्षा लीक के मामले वर्षों तक जांच के स्तर पर लंबित न रहें।
हालाँकि, विधेयक में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि दो महीने की समय-सीमा का पालन न होने पर क्या परिणाम होगा या जांच की अवधि किन परिस्थितियों में बढ़ाई जा सकेगी। इसलिए यह प्रावधान महत्त्वपूर्ण होने के साथ-साथ उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन पर निर्भर रहेगा। (PRS Legislative Research)
- प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में विशेष फास्ट ट्रैक अदालत
संशोधन प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश को निर्देश देता है कि वह सत्र न्यायालय को स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के रूप में नामित करे।
ये अदालतें केवल सार्वजनिक परीक्षा कानून के अपराधों की ही नहीं, बल्कि उसी घटना से जुड़े भारतीय न्याय संहिता या अन्य कानूनों के अपराधों की भी एक साथ सुनवाई कर सकेंगी। इससे अलग-अलग अदालतों में समान मामले चलने और निर्णय में विलंब होने की संभावना कम करने का प्रयास किया गया है। (PRS Legislative Research)
- विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति
हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश को प्रत्येक विशेष फास्ट ट्रैक अदालत के लिए एक या अधिक विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करने होंगे।
इन अभियोजकों का कार्य परीक्षा अपराधों से संबंधित मामलों की पैरवी करना, डिजिटल और तकनीकी साक्ष्यों को न्यायालय के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना तथा मुकदमे की निरंतरता बनाए रखना होगा। (PRS Legislative Research)
- लंबित मुकदमे भी विशेष अदालतों में स्थानांतरित होंगे
2024 के कानून के अंतर्गत पहले से लंबित सभी मुकदमे संबंधित विशेष फास्ट ट्रैक अदालतों में स्थानांतरित किए जाने का प्रावधान है।
इससे पुरानी और नई—दोनों प्रकार की कार्यवाहियों को समान त्वरित प्रक्रिया के अंतर्गत लाने का प्रयास किया गया है। स्थानांतरित मामलों की सुनवाई भी स्थानांतरण की तारीख से तीन महीने में पूरी करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। (PRS Legislative Research)
- मुकदमे की रोजाना सुनवाई
विशेष अदालत में मुकदमा यथासंभव दिन-प्रतिदिन के आधार पर चलाया जाएगा। उपस्थित गवाहों की जांच पूरी होने तक सुनवाई लगातार जारी रखने का प्रावधान है।
अदालत किसी आवश्यक कारण से सुनवाई अगले दिन से आगे स्थगित कर सकती है, लेकिन इसके कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे। इसका उद्देश्य अनावश्यक स्थगन और मुकदमों में होने वाली देरी को रोकना है। (PRS Legislative Research)
- आरोपपत्र के तीन महीने के भीतर मुकदमा पूरा करने का लक्ष्य
संशोधन के अनुसार आरोपपत्र दाखिल होने की तारीख से तीन महीने के भीतर मुकदमा पूरा किया जाना चाहिए।
यह प्रावधान इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पेपर लीक की परीक्षा, भर्ती और अभ्यर्थियों के भविष्य पर तत्काल प्रभाव पड़ता है। वर्षों बाद होने वाला निर्णय परीक्षा व्यवस्था में समय पर विश्वास बहाल नहीं कर सकता। फिर भी न्यायालयों पर पहले से मौजूद बोझ, गवाहों की उपलब्धता और डिजिटल साक्ष्यों की जटिलता इस लक्ष्य की व्यावहारिक परीक्षा लेंगी। (PRS Legislative Research)
- हाईकोर्ट की दो-सदस्यीय पीठ में अपील
विशेष फास्ट ट्रैक अदालत के निर्णय, सजा या आदेश के खिलाफ अपील संबंधित उच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों वाली पीठ के समक्ष की जाएगी।
जमानत स्वीकार या अस्वीकार करने वाले आदेश के विरुद्ध भी उच्च न्यायालय में अपील का प्रावधान है। इससे गंभीर मामलों की अपील पर संस्थागत और न्यायिक स्तर पर व्यापक विचार सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है। (PRS Legislative Research)
- अपील के लिए तीस दिन की सीमा
अपील विशेष अदालत के आदेश की तारीख से तीस दिनों के भीतर दाखिल करनी होगी। पर्याप्त कारण होने पर उच्च न्यायालय देरी को स्वीकार कर सकता है, लेकिन संशोधन के अनुसार किसी अपील को नब्बे दिन के बाद स्वीकार नहीं किया जाना है।
अपील का निस्तारण भी, जहाँ तक संभव हो, दाखिला स्वीकार होने के तीन महीने के भीतर करने का लक्ष्य रखा गया है। (PRS Legislative Research)
संशोधन का समग्र अर्थ
2026 का संशोधन केवल दंड बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसमें चार स्तरों पर व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास दिखाई देता है—
पहला, व्यक्तिगत अपराधियों और संगठित गिरोहों के लिए अधिक कठोर कारावास और जुर्माना।
दूसरा, परीक्षा का संचालन करने वाली निजी और तकनीकी संस्थाओं की सीधी जवाबदेही।
तीसरा, विशेष कार्यबल और दो महीने की जांच समय-सीमा के माध्यम से तेज विवेचना।
चौथा, विशेष अदालतों, रोजाना सुनवाई और समयबद्ध अपील के माध्यम से शीघ्र न्याय।
इस संशोधन का संदेश स्पष्ट है कि पेपर लीक को अब सामान्य नकल या प्रशासनिक चूक की तरह नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य, सार्वजनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और शासन व्यवस्था पर हमला करने वाले गंभीर संगठित अपराध के रूप में देखा जाएगा।
फिर भी इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि विशेष कार्यबल कितनी शीघ्रता से गठित होते हैं, राज्यों में फास्ट ट्रैक अदालतों को पर्याप्त न्यायाधीश और कर्मचारी मिलते हैं या नहीं, डिजिटल साक्ष्य समय पर जुटाए जाते हैं या नहीं, और दो तथा तीन महीने की निर्धारित समय-सीमाएँ व्यवहार में कितनी प्रभावी सिद्ध होती हैं। कठोर कानून ने आवश्यक आधार तैयार कर दिया है; अब निर्णायक प्रश्न उसका क्रियान्वयन है।