सुरक्षित आश्रय — धारा 79, इतिहास, उद्देश्य और वर्तमान विवाद
भाग–3 : मंच की जवाबदेही
सोशल मीडिया और इंटरनेट कानून की पूरी बहस में सुरक्षित आश्रय—सुरक्षित आश्रय सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है। इसका मूल सिद्धांत सरल है—यदि किसी ऑनलाइन मंच पर कोई उपयोगकर्ता गैरकानूनी सामग्री डालता है, तो केवल उस सामग्री को मंच पर उपलब्ध कराने के कारण कंपनी को स्वतः उसका प्रकाशक मानकर जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर मानहानिकारक टिप्पणी लिखता है, प्रतिबंधित सामग्री साझा करता है या किसी का कॉपीराइट उल्लंघन करता है, तो पहली जिम्मेदारी उस सामग्री को बनाने या प्रकाशित करने वाले व्यक्ति की होती है। जिस मंच ने केवल तकनीकी माध्यम उपलब्ध कराया है, उसे हर उपयोगकर्ता की प्रत्येक गतिविधि के लिए स्वतः अपराधी या प्रकाशक मान लेना इंटरनेट जैसी खुली व्यवस्था को चलाना लगभग असंभव बना देगा। भारत में इस सिद्धांत का कानूनी आधार सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 है। वर्तमान धारा स्पष्ट करती है कि निर्धारित शर्तों के अधीन मध्यस्थ किसी तीसरे पक्ष द्वारा उपलब्ध कराई या उसके मंच पर रखी गई सूचना, डेटा अथवा संचार-संपर्क के लिए उत्तरदायी नहीं होगा। (India Code) लेकिन यही व्यवस्था आज एक कठिन प्रश्न का सामना कर रही है—
यही सुरक्षित आश्रय की आधुनिक बहस का केंद्र है।
7.1 सुरक्षित आश्रय की आवश्यकता क्यों पड़ी?
इंटरनेट की संरचना पारंपरिक समाचार पत्र या टेलीविजन चैनल से मूलतः अलग है। समाचार पत्र में प्रकाशित प्रत्येक खबर या लेख संपादकीय प्रक्रिया से गुजरता है। इसलिए प्रकाशक से उसके प्रकाशन की जिम्मेदारी अपेक्षित होती है। सोशल मीडिया पर स्थिति अलग है। करोड़ों उपयोगकर्ता हर दिन अरबों पोस्ट, टिप्पणियां, तस्वीरें और वीडियो प्रकाशित कर सकते हैं। किसी मंच के लिए प्रत्येक सामग्री को प्रकाशित होने से पहले मनुष्य द्वारा जांचना व्यावहारिक रूप से असंभव है। यदि कानून यह कहे कि— मंच पर मौजूद प्रत्येक सामग्री के लिए मंच स्वयं जिम्मेदार है, तो कंपनियों के सामने दो विकल्प बचेंगे— हर सामग्री को प्रकाशित होने से पहले जांचें, या कानूनी जोखिम से बचने के लिए अत्यधिक सामग्री रोक दें। दोनों स्थितियां खुले इंटरनेट के विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं। इसीलिए दुनिया के अनेक देशों ने किसी न किसी रूप में मध्यस्थ को सीमित कानूनी सुरक्षा देने की व्यवस्था विकसित की। भारत में यही सुरक्षा धारा 79 में है।
7.2 धारा 79 की मूल संरचना
धारा 79 मध्यस्थ को बिना शर्त छूट नहीं देती। इस सुरक्षा के लिए कुछ बुनियादी शर्तें हैं। मध्यस्थ की भूमिका मुख्यतः ऐसी संचार प्रणाली उपलब्ध कराने तक सीमित होनी चाहिए जिसके माध्यम से तीसरे पक्ष की सूचना प्रसारित, अस्थायी रूप से संग्रहित या रखी जाती है। इसके अतिरिक्त मध्यस्थ को सामान्यतः— संचार स्वयं शुरू नहीं करना चाहिए, प्राप्तकर्ता स्वयं नहीं चुनना चाहिए, और संचार में मौजूद सूचना को स्वयं चुनना या बदलना नहीं चाहिए। साथ ही उसे कानून के तहत निर्धारित उचित सावधानी के दायित्वों का पालन करना होता है। (India Code) इसलिए सुरक्षित आश्रय को इस सूत्र में समझा जा सकता है—
7.3 तीसरे पक्ष की सामग्री क्या है?
सुरक्षित आश्रय का आधार Third Party Information, यानी तीसरे पक्ष की सूचना है। यदि उपयोगकर्ता किसी मंच पर वीडियो अपलोड करता है, टिप्पणी लिखता है या तस्वीर साझा करता है, तो सामान्यतः वह उपयोगकर्ता द्वारा निर्मित सामग्री है। लेकिन यदि कंपनी स्वयं सामग्री बनाती है, उसे बदलती है या किसी गैरकानूनी गतिविधि में सक्रिय भागीदार बन जाती है, तो मामला अलग हो सकता है। यही अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। सुरक्षित आश्रय का उद्देश्य कंपनी को उसके अपने गैरकानूनी आचरण से बचाना नहीं है। उसका उद्देश्य उसे किसी अन्य व्यक्ति की सामग्री के कारण स्वतः जिम्मेदार होने से बचाना है।
7.4 2008 संशोधन और आधुनिक धारा 79
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में 2008 के व्यापक संशोधन के बाद धारा 79 को वर्तमान सुरक्षित आश्रय व्यवस्था के अनुरूप नया स्वरूप मिला। यह बदलाव उस समय आवश्यक हो चुका था क्योंकि इंटरनेट पर उपयोगकर्ता-निर्मित सामग्री तेजी से बढ़ रही थी। लेकिन कानून ने सुरक्षा के साथ एक महत्वपूर्ण शर्त जोड़ी—
अर्थात मध्यस्थ यह कहकर पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता कि सामग्री उपयोगकर्ता ने डाली थी। उसे कानून द्वारा निर्धारित जिम्मेदारियां भी निभानी होंगी। यहीं से सुरक्षित आश्रय को “अधिकार” के बजाय सशर्त सुरक्षा के रूप में समझना चाहिए।
7.5 कब समाप्त हो सकती है सुरक्षित आश्रय सुरक्षा?
धारा 79(3) इस सुरक्षा की सीमा निर्धारित करती है। यदि मध्यस्थ स्वयं किसी गैरकानूनी कार्य में षड्यंत्र करता है, सहायता देता है, उकसाता है या अन्य प्रकार से सक्रिय भागीदारी करता है, तो उसे सुरक्षा नहीं मिलेगी। इसी तरह कानून के अनुसार गैरकानूनी सामग्री की जानकारी मिलने के बाद निर्धारित कार्रवाई न करना भी उसकी सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। लेकिन यहां एक गंभीर प्रश्न पैदा हुआ—
क्या किसी नागरिक का ई-मेल पर्याप्त है? क्या किसी राजनीतिक संगठन की शिकायत पर्याप्त है? क्या पुलिस का नोटिस पर्याप्त है? या न्यायालय अथवा विधिवत अधिकृत सरकारी आदेश आवश्यक है? इसी प्रश्न पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक व्याख्या दी।
7.6 Shreya Singhal मामला — सुरक्षित आश्रय का संवैधानिक मोड़
2015 के Shreya Singhal v. Union of India निर्णय को आम तौर पर धारा 66A समाप्त करने के लिए याद किया जाता है, लेकिन धारा 79 के लिए भी यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण था। न्यायालय के सामने चिंता थी कि यदि किसी भी निजी शिकायत को “actual knowledge” मान लिया जाए, तो मध्यस्थ को यह तय करना पड़ेगा कि लाखों शिकायतों में कौन-सी सामग्री वास्तव में गैरकानूनी है। इसके परिणामस्वरूप मंच कानूनी जोखिम से बचने के लिए जरूरत से अधिक सामग्री हटा सकते थे। सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 79(3)(b) और तत्कालीन नियमों को सीमित अर्थ में पढ़ते हुए “actual knowledge” को न्यायालय के आदेश या उपयुक्त सरकारी अधिसूचना से जोड़ा। इस निर्णय ने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया—
इससे सुरक्षित आश्रय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दोनों को महत्वपूर्ण सुरक्षा मिली।
7.7 सूचना प्रौद्योगिकी नियम ने सुरक्षित आश्रय को जिम्मेदारियों से जोड़ा
2021 के सूचना प्रौद्योगिकी नियमों ने मध्यस्थों के लिए विस्तृत उचित-सावधानी व्यवस्था बनाई। मंचों को अपनी उपयोग-शर्तें प्रकाशित करने, शिकायत निवारण व्यवस्था रखने, निर्धारित मामलों में सरकारी एजेंसियों को सहयोग देने और गैरकानूनी सामग्री पर विधि के अनुसार कार्रवाई करने जैसे दायित्व दिए गए। वर्तमान नियम स्पष्ट करते हैं कि उचित सावधानी सुरक्षित आश्रय से जुड़ी हुई है। 2026 में भी इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने दोहराया कि धारा 79 के तहत तीसरे पक्ष की सामग्री के लिए छूट पाने की शर्त के रूप में मध्यस्थों को नियम 3 और 4 के दायित्वों का पालन करना होता है। (MeitY) इससे भारतीय व्यवस्था का मूल सिद्धांत और स्पष्ट हुआ—
7.8 सबसे बड़ा आधुनिक प्रश्न — एल्गोरिद्म क्या बदल देता है?
धारा 79 जिस इंटरनेट की कल्पना पर आधारित थी, उसमें मध्यस्थ की भूमिका अपेक्षाकृत निष्क्रिय समझी जा सकती थी। आज का सोशल मीडिया इससे अलग है। मंच केवल सामग्री संग्रहित नहीं करता। उसका एल्गोरिद्म— किस सामग्री को ऊपर दिखाना है, किसे सुझाव देना है, किस वीडियो को नए दर्शकों तक पहुंचाना है, किसे कम दृश्यता देनी है, और उपयोगकर्ता को अगली सामग्री कौन-सी दिखानी है— इन सबमें भूमिका निभाता है। यहीं कठिन प्रश्न सामने आता है— यदि उपयोगकर्ता ने सामग्री बनाई लेकिन मंच के एल्गोरिद्म ने उसकी पहुंच हजार गुना बढ़ा दी, तो उस प्रसार की जिम्मेदारी किसकी है? यह प्रश्न धारा 79 के भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
7.9 क्या सामग्री-सिफारिश संपादकीय निर्णय है?
परंपरागत समाचार पत्र में किसी खबर को पहले पृष्ठ पर रखना स्पष्ट संपादकीय निर्णय है। यदि सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म किसी वीडियो को करोड़ों लोगों के सामने अनुशंसित करता है तो क्या वह तकनीकी निर्णय है या संपादकीय निर्णय? मंच का तर्क हो सकता है कि एल्गोरिद्म अरबों सामग्री के बीच उपयोगकर्ता की पसंद के अनुसार स्वचालित चयन करता है; वह मानव संपादक की तरह विचारधारात्मक निर्णय नहीं लेता। आलोचकों का प्रतितर्क है कि— एल्गोरिद्म मनुष्य ने बनाया है, उसके उद्देश्य कंपनी तय करती है, उसकी प्राथमिकताएं कंपनी तय करती है, और उसके परिणाम से कंपनी आर्थिक लाभ प्राप्त करती है। इसलिए मंच को पूर्णतः निष्क्रिय संदेशवाहक मानना आधुनिक तकनीकी वास्तविकता को नजरअंदाज कर सकता है। यही अगले अध्याय—संपादकीय दायित्व—का केंद्रीय प्रश्न होगा।
7.10 सामग्री हटाना क्या सुरक्षित आश्रय को समाप्त करता है?
यह एक दिलचस्प विरोधाभास है। यदि मंच हानिकारक सामग्री रोकने के लिए सक्रिय रूप से निगरानी करता है, तो क्या उसकी यही सक्रियता उसे “निष्क्रिय मध्यस्थ” की स्थिति से बाहर कर देगी? यदि ऐसा हो तो कंपनियों को जिम्मेदार सामग्री नियंत्रण करने से हतोत्साहित किया जा सकता है। 2026 के संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी नियम ने इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण स्पष्टता दी। नियमों के अनुपालन में किसी सूचना—जिसमें कृत्रिम रूप से निर्मित सूचना भी शामिल है—को हटाने या उसकी पहुंच रोकने के लिए उचित तकनीकी उपाय अथवा स्वचालित उपकरण इस्तेमाल करना अपने आप धारा 79(2)(a) या 79(2)(b) की शर्तों का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। (MeitY) इसका अर्थ महत्वपूर्ण है—
7.11 कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने सुरक्षित आश्रय की बहस क्यों कठिन कर दी?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आने तक सामान्य मॉडल था— उपयोगकर्ता सामग्री बनाता है, मंच उसे रखता और वितरित करता है। अब तीसरी स्थिति पैदा हो गई—
यदि किसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता सेवा द्वारा मानहानिकारक, हिंसक, धोखाधड़ीपूर्ण या अन्य गैरकानूनी सामग्री तैयार होती है, तो क्या उसे “तीसरे पक्ष की सामग्री” माना जाएगा? यदि उपयोगकर्ता केवल निर्देश देता है लेकिन वास्तविक शब्द, तस्वीर या वीडियो कृत्रिम बुद्धिमत्ता तैयार करती है, तो कानूनी जिम्मेदारी कैसे बांटी जाएगी? 2026 के संशोधनों ने कृत्रिम रूप से निर्मित सूचना के लिए विशेष उचित-सावधानी और पहचान संबंधी दायित्व जोड़कर समस्या से निपटने की शुरुआत की है। (MeitY) लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सुरक्षित आश्रय का व्यापक संबंध आने वाले वर्षों में भारतीय न्यायालयों और विधायिका के लिए बड़ा प्रश्न बना रह सकता है।
7.12 सुरक्षित आश्रय समाप्त कर देना समाधान क्यों नहीं?
मंचों की शक्ति से असंतोष के कारण कभी-कभी यह तर्क दिया जाता है कि सुरक्षित आश्रय पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए। लेकिन इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यदि प्रत्येक उपयोगकर्ता की पोस्ट के लिए मंच को स्वतः प्रकाशक मान लिया जाए तो कंपनियां अत्यधिक सतर्कता अपनाएंगी। संदिग्ध सामग्री हटेगी। विवादास्पद सामग्री हटेगी। राजनीतिक आलोचना हट सकती है। व्यंग्य हट सकता है। खोजी पत्रकारिता प्रभावित हो सकती है। अर्थात सुरक्षित आश्रय हटाने का परिणाम अधिक स्वतंत्र इंटरनेट नहीं बल्कि अत्यधिक निजी सेंसरशिप भी हो सकता है। इसलिए वास्तविक नीति प्रश्न यह नहीं है—
बेहतर प्रश्न है—
7.13 दूसरी समस्या — बहुत अधिक सुरक्षा
इसके विपरीत अत्यधिक व्यापक सुरक्षित आश्रय भी समस्या पैदा कर सकता है। यदि मंच को हर परिस्थिति में केवल यह कहने की सुविधा मिले कि— “सामग्री उपयोगकर्ता की है, हमारी नहीं”— तो वह अपनी एल्गोरिद्मिक भूमिका और व्यावसायिक लाभ के बावजूद जिम्मेदारी से बच सकता है। कल्पना कीजिए कि किसी खतरनाक झूठे वीडियो को कुछ लोगों ने अपलोड किया, लेकिन मंच की अनुशंसा प्रणाली ने उसे करोड़ों लोगों तक पहुंचाया। उस स्थिति में केवल मूल अपलोडकर्ता को जिम्मेदार मानना पर्याप्त है या नहीं—यह आधुनिक कानून का कठिन प्रश्न है। इसलिए भविष्य की व्यवस्था को निष्क्रिय होस्टिंग और सक्रिय प्रवर्धन के बीच अंतर पर अधिक गंभीरता से विचार करना होगा।
7.14 X Corp और Sahyog Portal विवाद
2025 में सुरक्षित आश्रय से जुड़ा एक महत्वपूर्ण नया विवाद X Corp बनाम भारत सरकार के रूप में सामने आया। विवाद का एक केंद्रीय प्रश्न यह था कि धारा 79(3)(b) और सूचना प्रौद्योगिकी नियम के Rule 3(1)(d) के तहत सरकारी एजेंसियों द्वारा गैरकानूनी सामग्री से संबंधित सूचनाएं देने की व्यवस्था तथा Sahyog Portal की कानूनी स्थिति क्या है। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सितंबर 2025 में X Corp की चुनौती खारिज करते हुए Sahyog Portal को सेंसरशिप का स्वतंत्र उपकरण मानने से इनकार किया और इसे अधिकृत एजेंसियों तथा intermediaries के बीच संचार को व्यवस्थित करने वाला माध्यम माना। न्यायालय के निर्णय में यह भी दर्ज है कि बाध्यकारी blocking directions की शक्ति धारा 69A और संबंधित Blocking Rules के अंतर्गत बनी रहती है। (Indian Kanoon) यह मामला सुरक्षित आश्रय की आधुनिक बहस के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें मूल प्रश्न फिर वही है—
7.15 2025 में सरकारी आदेशों पर अतिरिक्त सुरक्षा
अक्टूबर 2025 में सरकार ने Rule 3(1)(d) में संशोधन कर सामग्री हटाने संबंधी सरकारी सूचनाओं के लिए अतिरिक्त प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा जोड़ी। सरकार के अनुसार इसमें वरिष्ठ स्तर की अनुमति, कारणयुक्त सूचना और समय-समय पर समीक्षा जैसी व्यवस्थाएं शामिल की गईं ताकि कार्रवाई पारदर्शी, आनुपातिक और जवाबदेह हो। (Press Information Bureau) यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल शासन में केवल यह पर्याप्त नहीं है कि सामग्री गैरकानूनी बताई जाए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए— किस अधिकारी ने आदेश दिया, किस कानूनी आधार पर दिया, किस सामग्री पर लागू होगा, और उसके विरुद्ध क्या उपचार उपलब्ध है। यही प्रक्रिया राज्य की वैध नियामकीय शक्ति और मनमानी सेंसरशिप के बीच अंतर बनाती है।
7.16 2026 में बहस अभी समाप्त नहीं हुई
यह मान लेना गलत होगा कि 2026 तक धारा 79 का ढांचा अंतिम रूप ले चुका है। MeitY ने मार्च और अप्रैल 2026 में सूचना प्रौद्योगिकी नियम में और प्रस्तावित संशोधनों पर हितधारकों से सुझाव मांगे। इन प्रस्तावों में मंत्रालय द्वारा जारी स्पष्टीकरणों, परामर्शों और निर्देशों के अनुपालन तथा डिजिटल मीडिया निगरानी जैसे प्रश्न शामिल थे। ये प्रस्ताव उस समय मसौदा स्तर पर थे, इसलिए उन्हें लागू कानून से अलग समझना आवश्यक है। (MeitY) यह तथ्य दिखाता है कि सुरक्षित आश्रय की भारतीय व्यवस्था अभी भी विकसित हो रही है।
7.17 सरकार का पक्ष
सरकार के दृष्टिकोण से सुरक्षित आश्रय का उद्देश्य कंपनियों को भारतीय कानून से मुक्त करना नहीं है। मध्यस्थ को कानूनी सुरक्षा इसलिए मिलती है क्योंकि वह तीसरे पक्ष की सामग्री का तकनीकी वाहक है। लेकिन यदि वह उचित सावधानी नहीं बरतता, गैरकानूनी गतिविधि में सहयोग करता है या कानून के तहत निर्धारित जिम्मेदारियों का पालन नहीं करता, तो सुरक्षा का आधार कमजोर पड़ता है। राष्ट्रीय सुरक्षा, बच्चों की सुरक्षा, अश्लील सामग्री, साइबर अपराध, डीपफेक और अन्य ऑनलाइन नुकसान के संदर्भ में सरकार लगातार इसी दायित्व पर जोर देती रही है। (MeitY)
7.18 मंच और नागरिक स्वतंत्रता का पक्ष
दूसरी ओर डिजिटल अधिकारों से जुड़े पक्ष की चिंता है कि सुरक्षित आश्रय को सरकारी निर्देशों के पालन से अत्यधिक कठोरता से जोड़ने पर मंच अधिक सामग्री हटाने की नीति अपना सकते हैं। कंपनी के सामने चुनाव होगा— सामग्री बनाए रखकर मुकदमे और सुरक्षित आश्रय खोने का जोखिम उठाए, या शिकायत मिलते ही सामग्री हटा दे। व्यावसायिक दृष्टि से दूसरा विकल्प आसान हो सकता है। लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टि से इससे वैध अभिव्यक्ति प्रभावित हो सकती है। इसीलिए सुरक्षित आश्रय केवल तकनीकी कंपनियों को मिलने वाली कॉरपोरेट छूट नहीं है। अप्रत्यक्ष रूप से यह उपयोगकर्ताओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी जुड़ा हुआ है।
7.19 भारत के लिए संतुलित मॉडल क्या हो सकता है?
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए दो अतियों से बचना आवश्यक है। पहली अति—
दूसरी—
व्यावहारिक व्यवस्था इन दोनों के बीच होनी चाहिए। साधारण तकनीकी होस्टिंग के लिए मजबूत सुरक्षित आश्रय हो। कानून द्वारा निर्धारित उचित सावधानी अनिवार्य हो। स्पष्ट गैरकानूनी सामग्री के लिए समयबद्ध कार्रवाई हो। सरकारी आदेश लिखित, कारणयुक्त और समीक्षा योग्य हों। उपयोगकर्ता को अपील का अधिकार मिले। और जहां मंच का अपना एल्गोरिद्म किसी सामग्री के प्रसार को असाधारण रूप से बढ़ाता है, वहां उसकी भूमिका पर सामान्य होस्टिंग की तुलना में अधिक जवाबदेही की संभावना पर विचार किया जाए। यही भविष्य के कानून की वास्तविक चुनौती है।
7.20 निष्कर्ष
सुरक्षित आश्रय इंटरनेट की कमजोरी नहीं बल्कि उसके विकास की आधारभूत कानूनी व्यवस्थाओं में से एक है। इसके बिना उपयोगकर्ता-निर्मित सामग्री पर आधारित विशाल खुले मंचों का संचालन अत्यंत कठिन हो सकता है। लेकिन 2000 और 2008 के इंटरनेट की तुलना में आज के सोशल मीडिया की प्रकृति बदल चुकी है। आज मंच— सिर्फ सामग्री रखते नहीं, उसे वर्गीकृत करते हैं, सुझाते हैं, उसकी पहुंच बढ़ाते हैं, उससे विज्ञापन आय अर्जित करते हैं, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उसका विश्लेषण तथा नियंत्रण भी करते हैं। इसलिए प्रश्न सुरक्षित आश्रय समाप्त करने का नहीं है। प्रश्न है—
यदि मंच केवल संदेश पहुंचा रहा है तो वह मध्यस्थ है। लेकिन यदि वह यह तय करने लगे कि कौन-सा संदेश किसे, कितनी बार और कितनी शक्ति से दिखाया जाए, तो कानून के सामने एक बिल्कुल नया प्रश्न पैदा होता है। और यही अगले अध्याय का विषय है।