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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–017 · अध्याय 08

संपादकीय दायित्व — क्या सोशल मीडिया अब संपादक बन चुका है?

भाग–3 : मंच की जवाबदेही

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत हिंदी शोध संस्करण · 15 अगस्त 2026

सोशल मीडिया के शुरुआती दौर में यह मानना अपेक्षाकृत आसान था कि कोई मंच केवल तकनीकी मध्यस्थ है। उपयोगकर्ता सामग्री बनाता था, मंच उसे रखने और दूसरे उपयोगकर्ताओं तक पहुंचाने की सुविधा देता था। इसी तर्क पर मध्यस्थों को सुरक्षित आश्रय की कानूनी सुरक्षा मिली। लेकिन आधुनिक सोशल मीडिया इससे बहुत आगे निकल चुका है। आज मंच केवल यह नहीं कहता कि “आप जो चाहें प्रकाशित करें।” उसकी तकनीकी प्रणालियां लगातार तय करती हैं कि— किस पोस्ट को पहले दिखाया जाए, किस वीडियो को नए दर्शकों तक पहुंचाया जाए, किस सामग्री की पहुंच घटाई जाए, किसे खोज परिणामों में ऊपर रखा जाए, किस सामग्री पर विज्ञापन चलाया जाए, और किस उपयोगकर्ता को अगली सामग्री क्या दिखाई जाए। यहीं से एक बुनियादी कानूनी प्रश्न पैदा होता है—

यही संपादकीय दायित्व की बहस है।

8.1 पारंपरिक संपादक कौन होता है?

समाचार पत्र या टेलीविजन चैनल में संपादकीय जिम्मेदारी अपेक्षाकृत स्पष्ट होती है। समाचार संस्था स्वयं तय करती है— कौन-सी खबर प्रकाशित होगी, किस खबर को प्रमुखता मिलेगी, किस शीर्षक का प्रयोग होगा, किस सामग्री को अस्वीकार किया जाएगा, और किस समाचार को कितनी जगह या प्रसारण अवधि मिलेगी। इस चयन के कारण प्रकाशक और संपादक को प्रकाशित सामग्री के लिए कानूनी दायित्व भी उठाना पड़ सकता है। सोशल मीडिया का प्रारंभिक तर्क इससे अलग था। वह कहता था—

यह तर्क उस समय काफी मजबूत था जब मंच मुख्यतः सामग्री संग्रहित और प्रसारित करते थे। एल्गोरिद्मिक सोशल मीडिया ने इस अंतर को धुंधला कर दिया है।

8.2 संपादक और एल्गोरिद्म में समानता कहां है?

मान लीजिए किसी मंच पर एक मिनट में दस लाख वीडियो उपलब्ध हैं। उपयोगकर्ता उन सभी को नहीं देख सकता। इसलिए मंच की तकनीकी प्रणाली उनमें से कुछ चुनती है और उपयोगकर्ता के सामने प्रस्तुत करती है। यही चयन महत्वपूर्ण है। मानव संपादक किसी समाचार को पहले पृष्ठ पर रखता है। एल्गोरिद्म किसी वीडियो को “आपके लिए” अनुशंसित करता है। दोनों में तकनीकी अंतर बहुत बड़ा है, लेकिन एक कार्यात्मक समानता दिखाई देती है—

यहीं से यह विचार जन्म लेता है कि आधुनिक सोशल मीडिया मंच केवल “डिजिटल डाकघर” नहीं रहे; वे किसी सीमा तक सूचना-द्वारपाल बन चुके हैं।

8.3 फिर दोनों को समान क्यों नहीं माना जा सकता?

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। समाचार पत्र का संपादक सीमित संख्या में खबरों को जानबूझकर चुनता है। सोशल मीडिया मंच पर प्रतिदिन अरबों सामग्री उपलब्ध हो सकती हैं और चयन बड़े पैमाने पर स्वचालित प्रणालियों द्वारा होता है। इसलिए यह कहना भी सरल नहीं कि—

मंच के पक्ष में एक मजबूत तर्क यह है कि स्वचालित सिफारिश व्यवस्था उपयोगकर्ता की पसंद के आधार पर सामग्री व्यवस्थित करती है; वह प्रत्येक पोस्ट की सत्यता या विचार से पूर्व संपादकीय सहमति नहीं देती। इसीलिए आधुनिक कानून को “मध्यस्थ या संपादक” की केवल दो श्रेणियों से आगे बढ़ना पड़ सकता है। वास्तविकता में मंच की भूमिका कई स्तरों की हो सकती है—

प्रत्येक स्तर पर दायित्व समान होना आवश्यक नहीं है।

8.4 भारत में धारा 79 की कसौटी

भारत की धारा 79 के तहत मध्यस्थ की सुरक्षा इस विचार से जुड़ी है कि उसकी भूमिका तीसरे पक्ष की सूचना के तकनीकी संचालन तक सीमित हो। कानून यह भी देखता है कि मध्यस्थ संचार स्वयं शुरू करता है या नहीं, प्राप्तकर्ता चुनता है या नहीं और संचार में मौजूद सूचना चुनता अथवा बदलता है या नहीं। (SCI API) यहीं आधुनिक सिफारिश प्रणाली एक दिलचस्प सवाल पैदा करती है। यदि मंच स्वयं मूल वीडियो नहीं बनाता, लेकिन तय करता है कि वह वीडियो किसे दिखाया जाएगा, तो क्या वह “प्राप्तकर्ता चुन रहा” है? यह प्रश्न अभी सरल हां या नहीं में हल नहीं होता। धारा 79 को भारतीय न्यायालयों ने सुरक्षित आश्रय के रूप में माना है, लेकिन यह सुरक्षा सीमित और शर्तों के अधीन है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी हाल के निर्णयों में MySpace बनाम Super Cassettes के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए धारा 79 को मापी हुई कानूनी सुरक्षा के रूप में देखा है। (Delhi High Court)

8.5 MySpace मामला — सक्रिय भूमिका की सीमा

MySpace Inc. v. Super Cassettes Industries Ltd. भारत में मध्यस्थ दायित्व और कॉपीराइट के संबंध का महत्वपूर्ण मामला रहा है। दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायिक व्याख्याओं में यह सिद्धांत उभरा कि किसी मंच पर तीसरे पक्ष की सामग्री मौजूद होने मात्र से उसे स्वतः पूर्ण प्रकाशक नहीं माना जा सकता। सुरक्षित आश्रय का उद्देश्य ही यह है कि मध्यस्थ को हर उपयोगकर्ता की गतिविधि के लिए पूर्व दायित्व में न बांधा जाए। बाद के दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय भी इस मामले को धारा 79 की व्याख्या के संदर्भ में उद्धृत करते रहे हैं। (Delhi High Court) लेकिन आधुनिक सोशल मीडिया उस पुराने विवाद से एक कदम आगे है। अब प्रश्न केवल यह नहीं कि मंच को सामग्री की जानकारी थी या नहीं। अब प्रश्न है—

8.6 निष्क्रिय वितरण और सक्रिय प्रवर्धन

भविष्य के डिजिटल कानून में संभवतः सबसे उपयोगी अंतर यही होगा— निष्क्रिय वितरण और सक्रिय प्रवर्धन। उदाहरण के लिए— किसी उपयोगकर्ता ने वीडियो अपलोड किया और उसके अनुयायियों ने उसे देखा—यह सामान्य वितरण है। लेकिन उसी वीडियो को मंच की प्रणाली स्वयं लाखों ऐसे लोगों को सुझाती है जो उस खाते को जानते तक नहीं—यह सक्रिय प्रवर्धन के अधिक निकट है। इस स्थिति में प्रश्न उठता है— क्या दोनों परिस्थितियों में मंच का दायित्व समान रहना चाहिए? यह विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब सामग्री— आतंकवादी प्रचार, घृणा फैलाने वाली सामग्री, घातक गलत सूचना, डीपफेक, बाल यौन शोषण सामग्री, या चुनाव प्रभावित करने वाला सुनियोजित दुष्प्रचार— हो। यहीं संपादकीय दायित्व की बहस वास्तविक सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ती है।

8.7 अमेरिका का Gonzalez v. Google मामला

इस प्रश्न पर दुनिया की निगाहें अमेरिका के Gonzalez v. Google मामले पर भी लगी थीं। मामला यूट्यूब की सिफारिश प्रणाली और आतंकवादी सामग्री से जुड़े आरोपों के संदर्भ में अमेरिकी सुरक्षित आश्रय कानून—धारा 230—तक पहुंचा। अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में इस व्यापक प्रश्न पर निर्णायक नई सीमा निर्धारित करने से परहेज किया और निचली अदालत के निर्णय को तकनीकी आधार पर आगे की कार्यवाही के लिए वापस भेजा। (Supreme Court) इसका महत्व इस बात में है कि दुनिया की सर्वोच्च अदालतों के सामने भी प्रश्न आसान नहीं है—

8.8 अमेरिका में दूसरा पहलू — मंच को संपादकीय स्वतंत्रता भी है

इस बहस का उल्टा पक्ष अमेरिका के Moody v. NetChoice मामले में सामने आया। यह विवाद टेक्सास और फ्लोरिडा के उन कानूनों से जुड़ा था जो बड़े सोशल मीडिया मंचों की सामग्री हटाने और प्राथमिकता देने की शक्ति को सीमित करना चाहते थे। 2024 में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया मंचों की सामग्री चयन और व्यवस्था संबंधी गतिविधियां कुछ परिस्थितियों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी संपादकीय निर्णय प्रक्रिया हो सकती हैं। हालांकि संबंधित कानूनों की व्यापक संवैधानिक चुनौती पर निचली अदालतों ने सही परीक्षण नहीं किया था, इसलिए मामलों को पुनर्विचार के लिए भेजा गया। (Supreme Court) यह एक रोचक विरोधाभास पैदा करता है— कंपनियां सुरक्षित आश्रय के लिए कहती हैं कि वे केवल मध्यस्थ हैं। लेकिन सरकारी हस्तक्षेप के विरुद्ध वे यह भी कह सकती हैं कि सामग्री का चयन उनकी संपादकीय स्वतंत्रता है। यही विरोधाभास आधुनिक मंच कानून की सबसे कठिन समस्याओं में से एक है।

8.9 क्या मंच दोनों भूमिकाएं एक साथ निभा सकता है?

वास्तव में उत्तर शायद हां है। सोशल मीडिया मंच अलग-अलग परिस्थितियों में अलग भूमिका निभा सकता है। जब वह उपयोगकर्ता की निजी पोस्ट केवल संग्रहित करता है—वह मध्यस्थ के निकट है। जब वह सामग्री की सिफारिश और क्रम तय करता है—वह सूचना-द्वारपाल की भूमिका में है। जब वह स्वयं समाचार सामग्री तैयार करता है—वह प्रकाशक की भूमिका में आ सकता है। जब उसकी कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वयं उत्तर, चित्र या वीडियो बनाती है—वह केवल तीसरे पक्ष की सामग्री का वाहक नहीं रह जाता। इसलिए भविष्य में एक ही कंपनी को एक स्थायी कानूनी पहचान देने के बजाय गतिविधि-आधारित दायित्व अधिक व्यावहारिक हो सकता है।

8.10 यूरोपीय संघ ने अलग रास्ता क्यों अपनाया?

यूरोपीय संघ के डिजिटल सेवा अधिनियम ने सीधे सभी मंचों को प्रकाशक घोषित करने के बजाय उनकी प्रणालीगत जिम्मेदारियों पर जोर दिया है। विशाल ऑनलाइन मंचों पर उनकी सिफारिश प्रणालियों के बारे में पारदर्शिता, जोखिम आकलन, स्वतंत्र जांच और कुछ मामलों में उपयोगकर्ता को वैकल्पिक सिफारिश व्यवस्था उपलब्ध कराने जैसे दायित्व लगाए गए हैं। अधिनियम का अनुच्छेद 27 विशेष रूप से सिफारिश प्रणालियों की पारदर्शिता से संबंधित है। (Eur-Lex) यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। यूरोप का प्रश्न केवल यह नहीं है—

बल्कि—

भारत के लिए भी यह दृष्टिकोण उपयोगी हो सकता है।

8.11 एल्गोरिद्म के उद्देश्य कौन तय करता है?

एल्गोरिद्म स्वयं अस्तित्व में नहीं आता। कंपनी तय करती है कि प्रणाली किस लक्ष्य के लिए बनाई जाए। उदाहरण के लिए— उपयोगकर्ता मंच पर अधिक समय बिताए, अधिक वीडियो देखे, अधिक प्रतिक्रिया दे, विज्ञापन पर क्लिक करे, या किसी विशेष प्रकार की सामग्री से जुड़ा रहे। यदि कंपनी की व्यावसायिक प्राथमिकता “संलग्नता” अधिकतम करना है तो तकनीकी प्रणाली ऐसी सामग्री को प्राथमिकता दे सकती है जो लोगों को अधिक प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित करे। यहीं व्यावसायिक उद्देश्य और सार्वजनिक हित के बीच संघर्ष पैदा हो सकता है। यदि उत्तेजक, सनसनीखेज या ध्रुवीकरण वाली सामग्री अधिक प्रतिक्रिया पैदा करती है, तो प्रश्न है—

8.12 संपादकीय दायित्व का अर्थ हर पोस्ट की जिम्मेदारी नहीं

यह अंतर स्पष्ट रहना चाहिए। मंच की बढ़ी हुई संपादकीय जिम्मेदारी की चर्चा का अर्थ यह नहीं कि फेसबुक, यूट्यूब या X को हर पोस्ट के लिए अखबार की तरह जिम्मेदार बना दिया जाए। ऐसा करना व्यावहारिक भी नहीं होगा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरनाक भी हो सकता है। संपादकीय दायित्व का अधिक संतुलित अर्थ हो सकता है—

अर्थात— सामग्री किसने बनाई—एक प्रश्न। उसे लाखों लोगों तक किसने पहुंचाया—दूसरा प्रश्न। दोनों के उत्तर अलग हो सकते हैं।

8.13 कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने अंतर और धुंधला कर दिया

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में मामला और जटिल हो गया है। अब मंच की प्रणाली केवल उपयोगकर्ता की सामग्री चुनती ही नहीं; स्वयं सामग्री भी बना सकती है। यदि मंच का कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहायक किसी व्यक्ति के बारे में झूठा आरोप बनाता है, तो वहां पारंपरिक सुरक्षित आश्रय का तर्क कमजोर पड़ सकता है, क्योंकि वास्तविक शब्द किसी तीसरे पक्ष ने सीधे प्रकाशित नहीं किए। इसी प्रकार यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता किसी उपयोगकर्ता की तस्वीर लेकर उसका नकली वीडियो बनाती है, तो प्रश्न होगा— निर्देश देने वाले की जिम्मेदारी कितनी? मॉडल बनाने वाली कंपनी की कितनी? और प्रसारित करने वाले मंच की कितनी? 2026 में भारत द्वारा कृत्रिम रूप से निर्मित सूचना के लिए विशेष सावधानी दायित्व जोड़ना इसी बदलती परिस्थिति की प्रतिक्रिया है।

8.14 स्वचालित सामग्री नियंत्रण भी संपादकीय शक्ति है

एक और क्षेत्र है—

आधुनिक मंच लाखों सामग्री को स्वचालित प्रणालियों से जांचते हैं। किसी वीडियो को— हटाया जा सकता है, आयु-प्रतिबंधित किया जा सकता है, विज्ञापन से वंचित किया जा सकता है, खोज से कम किया जा सकता है, या उसकी पहुंच सीमित की जा सकती है। इनमें से प्रत्येक निर्णय निर्माता के लिए वास्तविक प्रभाव रखता है। इसलिए संपादकीय शक्ति केवल सामग्री को “बढ़ाने” में नहीं है।

यही कारण है कि मंच की पारदर्शिता महत्वपूर्ण हो जाती है।

8.15 उपयोगकर्ता को कारण जानने का अधिकार

यदि किसी अखबार का संपादक लेखक का लेख प्रकाशित नहीं करता, तो सामान्यतः यह निजी संपादकीय निर्णय है। लेकिन यदि कोई डिजिटल मंच करोड़ों लोगों के लिए सार्वजनिक संवाद की आधारभूत व्यवस्था बन जाए और अचानक किसी उपयोगकर्ता की सामग्री की पहुंच लगभग समाप्त कर दे, तो प्रश्न अधिक जटिल हो जाता है। क्या उपयोगकर्ता को बताया जाना चाहिए कि— उसकी सामग्री क्यों हटाई गई? कौन-सा नियम टूटा? निर्णय मनुष्य ने लिया या मशीन ने? क्या अपील उपलब्ध है? आधुनिक डिजिटल नियमन धीरे-धीरे इसी प्रकार की प्रक्रियात्मक जवाबदेही की ओर बढ़ रहा है।

8.16 क्या सरकार मंच की संपादक बन सकती है?

इस बहस का दूसरा खतरा भी गंभीर है। यदि यह स्वीकार कर लिया जाए कि मंच संपादकीय शक्ति का प्रयोग करते हैं, तो सरकारें यह मांग कर सकती हैं कि मंच कौन-सी सामग्री दिखाए या हटाए। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में नई समस्या पैदा कर सकता है। सरकार यदि सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से— राजनीतिक आलोचना हटवाए, विरोधी विचारों की पहुंच सीमित करवाए, या मंच की सामग्री प्राथमिकता निर्धारित करे— तो निजी संपादकीय शक्ति के स्थान पर राज्य नियंत्रित संपादकीय शक्ति आ सकती है। इसलिए मंच की जवाबदेही बढ़ाने का अर्थ सरकार को उसकी जगह संपादक बना देना नहीं होना चाहिए।

8.17 भारत के लिए संभावित सिद्धांत

भारत में भविष्य की संतुलित व्यवस्था कुछ मूल सिद्धांतों पर आधारित हो सकती है।

इससे सुरक्षित आश्रय और संपादकीय जिम्मेदारी को शून्य-योग संघर्ष बनाने की आवश्यकता नहीं रहेगी।

8.18 निष्कर्ष

सोशल मीडिया अब परंपरागत अर्थ में न तो केवल डाकघर है और न पूरी तरह समाचार पत्र। वह एक तीसरी प्रकार की संस्था बन चुका है—

वह अधिकांश सामग्री स्वयं नहीं बनाता, इसलिए उसे हर पोस्ट का प्रकाशक मानना उचित नहीं होगा। लेकिन वह यह भी केवल निष्क्रिय रूप से नहीं देखता कि उपयोगकर्ता क्या प्रकाशित कर रहे हैं। वह सामग्री— चुनता है, वर्गीकृत करता है, सुझाता है, बढ़ाता है, घटाता है, हटाता है, और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से स्वयं बना भी सकता है। इसलिए इक्कीसवीं सदी के डिजिटल कानून का प्रश्न केवल यह नहीं रह सकता—

उसे यह भी पूछना होगा—

यही संपादकीय दायित्व की नई सीमा है। और इसी सीमा को समझे बिना यह नहीं समझा जा सकता कि एल्गोरिद्म जनमत को कैसे प्रभावित करते हैं।