डिजिटल इंडिया अधिनियम — प्रस्ताव, विमर्श और भारत के भावी डिजिटल कानून की दिशा
भाग–2 : भारत का कानूनी ढांचा
भारत का सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 उस समय बनाया गया था जब इंटरनेट का स्वरूप आज से बिल्कुल अलग था। तब सोशल मीडिया नहीं था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सामग्री निर्माण नहीं था, विशाल ऑनलाइन बाजार नहीं थे और न ही एल्गोरिद्म करोड़ों लोगों की सूचना-धारा नियंत्रित करते थे। दो दशक बाद यही अंतर नए डिजिटल कानून की आवश्यकता का मुख्य आधार बना। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने डिजिटल इंडिया अधिनियम की अवधारणा प्रस्तुत की। इसका उद्देश्य सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के स्थान पर ऐसा आधुनिक कानूनी ढांचा विकसित करना था जो सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऑनलाइन सुरक्षा, उभरती प्रौद्योगिकियों और उपयोगकर्ता अधिकारों जैसी नई चुनौतियों से निपट सके। अक्टूबर 2023 में केंद्र सरकार ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि डिजिटल इंडिया अधिनियम का प्रारूप तैयार किया गया है और इसे उभरती प्रौद्योगिकियों, विशेषकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता से पैदा होने वाले जोखिमों को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है। (Press Information Bureau) लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट रहना चाहिए— अगस्त 2026 तक डिजिटल इंडिया अधिनियम संसद द्वारा पारित लागू कानून नहीं बना है। भारत में साइबर क्षेत्र का मूल कानून अभी भी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 है। जनवरी 2026 के सरकारी विवरण में भी इसी अधिनियम को भारत का मुख्य साइबर कानून बताया गया है। इसके साथ सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 तथा उसके नियम भारत के वर्तमान डिजिटल नियामकीय ढांचे का हिस्सा हैं। (Press Information Bureau)
6.1 नया कानून क्यों सोचा गया?
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम का मूल उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज, डिजिटल हस्ताक्षर और ऑनलाइन लेन-देन को कानूनी मान्यता देना था। सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता बाद में विकसित हुए। इसलिए कई आधुनिक प्रश्न उस कानून की मूल संरचना से बाहर थे— क्या किसी विशाल सोशल मीडिया मंच और छोटे मध्यस्थ पर समान दायित्व होने चाहिए? यदि एल्गोरिद्म किसी सामग्री को जानबूझकर प्राथमिकता देता है, तो मंच की जिम्मेदारी क्या होगी? डीपफेक के लिए किसे उत्तरदायी माना जाएगा? कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनी भ्रामक सामग्री से नागरिक की रक्षा कैसे होगी? बच्चों को ऑनलाइन हानिकारक सामग्री से कैसे बचाया जाएगा? किसी विदेशी डिजिटल कंपनी को भारतीय कानून के प्रति प्रभावी रूप से जवाबदेह कैसे बनाया जाएगा? इन प्रश्नों ने स्पष्ट किया कि भारत को केवल पुराने कानून में छोटे संशोधन करते रहने के बजाय व्यापक पुनर्विचार की आवश्यकता है।
6.2 डिजिटल इंडिया अधिनियम का मूल विचार
इस प्रस्तावित कानून के पीछे सरकार ने एक ऐसी डिजिटल व्यवस्था की कल्पना रखी जिसमें इंटरनेट—
इस दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण तत्व यह था कि कानून केवल अपराध होने के बाद दंड देने वाला न हो, बल्कि डिजिटल मंचों को पहले से कुछ जिम्मेदारियां निभाने के लिए बाध्य करे। इसका अर्थ है कि भविष्य का डिजिटल कानून केवल यह नहीं पूछेगा—
वह यह भी पूछ सकता है—
यहीं से डिजिटल मंचों की सक्रिय जवाबदेही का विचार विकसित होता है।
6.3 सभी डिजिटल मंच एक जैसे नहीं
पुराने नियामकीय ढांचे की एक समस्या यह है कि “मध्यस्थ” की एक व्यापक श्रेणी के भीतर अनेक प्रकार की सेवाएं आ सकती हैं। लेकिन वास्तविकता में— संदेश सेवा, सामाजिक नेटवर्क, वीडियो मंच, खोज सेवा, ऑनलाइन बाजार, ऑनलाइन खेल सेवा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सेवा— सभी की प्रकृति और जोखिम अलग हैं। इसीलिए नए कानून की प्रारंभिक सोच में अलग-अलग प्रकार के डिजिटल मध्यस्थों के लिए अलग जिम्मेदारियां निर्धारित करने की दिशा दिखाई गई थी। यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है क्योंकि एक छोटे तकनीकी मंच और करोड़ों उपयोगकर्ताओं वाले वैश्विक सामाजिक मंच को समान कानूनी जोखिम की श्रेणी में रखना व्यावहारिक नहीं है।
6.4 सुरक्षित आश्रय की नई परीक्षा
डिजिटल इंडिया अधिनियम से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बहसों में से एक सुरक्षित आश्रय, यानी मध्यस्थ को तृतीय पक्ष सामग्री के लिए मिलने वाली सीमित कानूनी सुरक्षा से संबंधित रही है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के अंतर्गत यह सुरक्षा वर्तमान व्यवस्था का आधार है। लेकिन आधुनिक सोशल मीडिया ने एक नई परिस्थिति पैदा की है। यदि मंच केवल उपयोगकर्ता की पोस्ट संग्रहित करता है, तो उसे पूर्ण प्रकाशक मानना कठिन है। लेकिन यदि वही मंच— सामग्री की प्राथमिकता तय करता है, उसे सुझाता है, उसकी पहुंच बढ़ाता है, विज्ञापन जोड़ता है, और उपयोगकर्ता के व्यवहार के आधार पर तय करता है कि आगे क्या दिखाया जाए— तो प्रश्न उठता है कि वह किस सीमा तक केवल “मध्यस्थ” रह जाता है। इसीलिए भविष्य के कानून में सुरक्षित आश्रय को पूर्ण सुरक्षा के बजाय जवाबदेही से जुड़ी सशर्त सुरक्षा के रूप में देखने की प्रवृत्ति मजबूत हो सकती है। वर्तमान सूचना प्रौद्योगिकी नियम भी मध्यस्थ की कानूनी सुरक्षा को उसके निर्धारित सावधानी दायित्वों के अनुपालन से जोड़ते हैं। (MeitY)
6.5 उपयोगकर्ता को केंद्र में रखने की आवश्यकता
डिजिटल कानून की पुरानी बहस मुख्यतः सरकार और तकनीकी कंपनी के बीच थी। नई व्यवस्था में तीसरा पक्ष अधिक महत्वपूर्ण हो गया है—
यदि किसी नागरिक का खाता अचानक बंद कर दिया जाता है, उसकी वैध सामग्री हटा दी जाती है या उसकी पहचान का इस्तेमाल करके नकली वीडियो बनाया जाता है, तो उसके पास प्रभावी उपचार होना चाहिए। इसीलिए भारत के विकसित होते डिजिटल नियमन में शिकायत निवारण, अपील और उपयोगकर्ता सुरक्षा को अधिक महत्व दिया जा रहा है। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और 2025 के नियम भी नागरिक को डेटा संबंधी अधिकार देकर इसी व्यापक दिशा को मजबूत करते हैं। जनवरी 2026 में सरकार ने इस ढांचे को नागरिक-केंद्रित डिजिटल शासन की दिशा में महत्वपूर्ण आधार बताया। (Press Information Bureau)
6.6 बच्चों और संवेदनशील उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा
भविष्य के डिजिटल कानून में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा एक प्रमुख विषय होना स्वाभाविक है। बच्चे सोशल मीडिया, खेल मंच, वीडियो सेवाओं और संदेश सेवाओं का बड़े पैमाने पर उपयोग करते हैं। उनके सामने— यौन शोषण सामग्री, ऑनलाइन उत्पीड़न, पहचान चोरी, हानिकारक सामग्री, अत्यधिक मंच-निर्भरता, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित भ्रामक सामग्री— जैसे जोखिम मौजूद हैं। भारत के मौजूदा सूचना प्रौद्योगिकी नियम और डेटा संरक्षण ढांचा बच्चों की सुरक्षा के लिए कई दायित्व तय करता है। 2026 में सरकार ने भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता और संबंधित तकनीकों से बच्चों को होने वाले संभावित नुकसान के संदर्भ में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम तथा संबंधित नियमों को प्रमुख कानूनी सुरक्षा उपायों में गिनाया। (Press Information Bureau)
6.7 कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने कानून की दिशा बदल दी
जब डिजिटल इंडिया अधिनियम की चर्चा शुरू हुई थी, तब कृत्रिम बुद्धिमत्ता उसके महत्वपूर्ण विषयों में थी। लेकिन 2023 से 2026 के बीच जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता इतनी तेजी से विकसित हुई कि सरकार ने प्रस्तावित व्यापक कानून की प्रतीक्षा किए बिना मौजूदा सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में संशोधन करना शुरू कर दिया। फरवरी 2026 में कृत्रिम रूप से निर्मित सूचना और डीपफेक संबंधी नई जिम्मेदारियां नियमों में जोड़ी गईं। भारत की कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन संबंधी दिशा भी अलग मार्गदर्शक सिद्धांतों के माध्यम से विकसित की गई। (MeitY) यह घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण संकेत देता है—
6.8 डेटा संरक्षण अलग कानून में क्यों गया?
एक समय संभावना थी कि व्यापक डिजिटल कानून ही डेटा सहित अनेक क्षेत्रों को एक साथ समेटेगा। लेकिन भारत ने व्यक्तिगत डेटा संरक्षण को अलग कानूनी स्तंभ बनाया। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और Digital Personal Data Protection Rules, 2025 अब व्यक्तिगत डेटा के लिए अलग व्यवस्था प्रदान करते हैं। सरकार ने जनवरी 2026 में इन्हें भारत के विकसित डिजिटल नियामकीय ढांचे का प्रमुख भाग बताया। (Press Information Bureau) इससे भविष्य का डिजिटल ढांचा अधिक स्पष्ट रूप से बहु-कानूनी बनता दिखाई देता है— एक कानून व्यक्तिगत डेटा के लिए, दूसरा ऑनलाइन खेल जैसे विशिष्ट क्षेत्र के लिए, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और उसके नियम मध्यस्थों तथा साइबर क्षेत्र के लिए, और अलग व्यवस्थाएं कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा अन्य उभरते क्षेत्रों के लिए।
6.9 ऑनलाइन खेल का अलग कानून — महत्वपूर्ण संकेत
2025 में ऑनलाइन खेल के लिए अलग कानून बनाया गया और मई 2026 से उसका क्रियान्वयन शुरू हुआ। सरकार के जून 2026 के विवरण के अनुसार Promotion and Regulation of Online Gaming Act को अगस्त 2025 में राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और यह 1 मई 2026 से प्रभावी हुआ। (Press Information Bureau) यह घटनाक्रम डिजिटल इंडिया अधिनियम की बहस के लिए महत्वपूर्ण संकेत देता है। भारत संभवतः पूरी डिजिटल दुनिया को एक ही कानून के भीतर समेटने के बजाय क्षेत्र-विशिष्ट कानून + केंद्रीय डिजिटल ढांचा जैसे मिश्रित मॉडल की ओर बढ़ रहा है।
6.10 क्या डिजिटल इंडिया अधिनियम की अवधारणा समाप्त हो गई?
ऐसा कहना उचित नहीं होगा। सरकार ने 2023 में स्पष्ट रूप से कहा था कि इसका प्रारूप उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए व्यापक ढांचे के रूप में तैयार किया गया है। (Press Information Bureau) लेकिन अगस्त 2026 की स्थिति यह बताती है कि इस नाम से कोई व्यापक नया अधिनियम अभी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम का स्थान नहीं ले पाया है। इसके विपरीत सरकार ने इसी बीच— डेटा संरक्षण कानून लागू किया, सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में कई संशोधन किए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संबंधित मार्गदर्शक ढांचा विकसित किया, और ऑनलाइन खेल के लिए अलग कानून बनाया। (Press Information Bureau) इससे यह अनुमान उचित है कि अंतिम डिजिटल विधायी व्यवस्था पहले की कल्पना से अधिक विभाजित और क्षेत्र-विशिष्ट हो सकती है।
6.11 नया कानून किन प्रश्नों का उत्तर दे?
यदि भविष्य में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के स्थान पर व्यापक नया डिजिटल कानून आता है, तो उसे कम से कम सात मूल प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर देना होगा।
साधारण तकनीकी सेवा और सक्रिय सामग्री-वितरण मंच के बीच कानूनी अंतर क्या होगा?
क्या एल्गोरिद्मिक बढ़ावा देने के बावजूद मंच को समान सुरक्षा प्राप्त होगी?
निर्माता, सेवा प्रदाता, उपयोगकर्ता और प्रसारण मंच—इनमें दायित्व कैसे बांटा जाएगा?
यदि इन प्रश्नों पर स्पष्टता नहीं होगी तो नया कानून केवल पुराने कानून का विस्तारित संस्करण बनकर रह जाएगा।
6.12 राष्ट्रीय संप्रभुता का प्रश्न
डिजिटल इंडिया अधिनियम की बहस इस शोध के केंद्रीय विषय से सीधे जुड़ती है। भारत के करोड़ों नागरिक ऐसे मंचों का उपयोग करते हैं जिनका मुख्यालय देश के बाहर है। इन मंचों के एल्गोरिद्म भारत के समाचार, राजनीतिक चर्चा और सामाजिक विमर्श पर प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए भारतीय राज्य यह दावा स्वाभाविक रूप से करता है कि—
लेकिन दूसरा संवैधानिक सिद्धांत भी उतना ही आवश्यक है—
इसीलिए भावी कानून को दो सीमाएं एक साथ निर्धारित करनी होंगी— मंच की शक्ति की सीमा, और राज्य की शक्ति की सीमा।
6.13 2026 तक भारत का वास्तविक डिजिटल कानूनी ढांचा
अगस्त 2026 तक भारत की डिजिटल व्यवस्था को किसी एक कानून से नहीं समझा जा सकता। इसमें मुख्य रूप से— सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, उसके अंतर्गत बने और संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी नियम, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और उसके नियम, ऑनलाइन खेल संबंधी नया कानून, साइबर सुरक्षा व्यवस्थाएं, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता संबंधी शासन दिशा— मिलकर काम कर रहे हैं। सरकारी विवरण में 2026 तक सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम को अब भी भारत के साइबर क्षेत्र का मूल कानून बताया गया है। (Press Information Bureau) इसलिए डिजिटल इंडिया अधिनियम को वर्तमान में लागू कानून की जगह भारत के भावी व्यापक डिजिटल कानून की अवधारणा और नीति-विमर्श के रूप में देखना अधिक सटीक है।
6.14 निष्कर्ष
डिजिटल इंडिया अधिनियम की अवधारणा स्वयं इस बात का प्रमाण है कि भारत का वर्ष 2000 का कानूनी ढांचा आधुनिक डिजिटल समाज की सभी समस्याओं के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा। लेकिन 2023 में जिस व्यापक नए कानून की कल्पना सामने आई थी, उसका रास्ता सीधा नहीं रहा। भारत ने इसके बाद कई क्षेत्रों में अलग-अलग कानूनी और नियामकीय कदम उठाए हैं। डेटा संरक्षण का अलग कानून बना। सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीपफेक तक के लिए संशोधन हुए। ऑनलाइन खेल के लिए अलग कानून लागू हो गया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए अलग शासन दिशा विकसित हुई। (Press Information Bureau) इसलिए भावी भारतीय डिजिटल व्यवस्था संभवतः किसी एक विशाल कानून पर आधारित होने के बजाय कई परस्पर जुड़े कानूनों और नियमों का ढांचा बने। लेकिन चाहे उसका नाम डिजिटल इंडिया अधिनियम हो या कोई अन्य विधायी व्यवस्था, उसकी सफलता की कसौटी तीन बातों से तय होगी—
यहीं से इस अध्ययन का अगला और अत्यंत महत्वपूर्ण भाग प्रारंभ होता है।