राष्ट्रीय सुरक्षा और साइबर प्रभाव अभियान — विदेशी हस्तक्षेप, मनोवैज्ञानिक युद्ध और डिजिटल संप्रभुता
भाग–4 : नई डिजिटल चुनौतियाँ
परंपरागत राष्ट्रीय सुरक्षा की कल्पना सीमाओं, सेना, हथियारों, खुफिया तंत्र और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के आसपास विकसित हुई थी। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इस अवधारणा का विस्तार कर दिया है। अब किसी विरोधी राष्ट्र को दूसरे देश को नुकसान पहुंचाने के लिए उसकी सीमा पार करना आवश्यक नहीं है। वह उस देश के नागरिकों के मोबाइल फोन तक पहुंच सकता है, सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित कर सकता है, सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है और सरकारी संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करने की कोशिश कर सकता है। इस प्रकार आधुनिक संघर्ष में एक नया क्षेत्र उभरा है—
NATO ने सूचना संबंधी खतरों को ऐसी जानबूझकर की गई, हानिकारक, भ्रामक और समन्वित गतिविधियों के रूप में देखा है जिन्हें राज्य तथा गैर-राज्य तत्व सूचना क्षेत्र में संचालित कर सकते हैं। इनमें विदेशी सूचना हेरफेर, हस्तक्षेप और दुष्प्रचार शामिल हैं। NATO यह भी मानता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीपफेक सार्वजनिक संचार में विश्वास कमजोर करने तथा धारणाओं को प्रभावित करने की इन क्षमताओं को और बढ़ा सकते हैं। (NATO) यहीं सोशल मीडिया का प्रश्न अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कंपनी नियमन से आगे बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय संप्रभुता का प्रश्न बन जाता है।
12.1 साइबर हमला और साइबर प्रभाव अभियान में अंतर
दोनों को अलग-अलग समझना आवश्यक है। परंपरागत साइबर हमला किसी डिजिटल प्रणाली को तकनीकी रूप से निशाना बना सकता है— सरकारी नेटवर्क में सेंध, बिजली व्यवस्था बाधित करना, बैंकिंग प्रणाली पर हमला, गोपनीय दस्तावेज चुराना, या महत्वपूर्ण आधारभूत संरचना को नुकसान पहुंचाना। साइबर प्रभाव अभियान का लक्ष्य अलग हो सकता है। यह कंप्यूटर को नहीं बल्कि कंप्यूटर इस्तेमाल करने वाले मनुष्य को निशाना बनाता है। इसका उद्देश्य हो सकता है— उसकी धारणा बदलना, उसके मन में भ्रम पैदा करना, किसी संस्था पर उसका विश्वास कमजोर करना, किसी सामाजिक समूह के प्रति आक्रोश बढ़ाना, या उसे ऐसा राजनीतिक अथवा सामाजिक व्यवहार करने के लिए प्रेरित करना जिससे विरोधी शक्ति को रणनीतिक लाभ मिले। इसलिए एक साइबर हमला सर्वर बंद कर सकता है। लेकिन एक सफल प्रभाव अभियान समाज को भीतर से विभाजित कर सकता है।
12.2 मनोवैज्ञानिक युद्ध नया नहीं है
मनोवैज्ञानिक युद्ध का इतिहास इंटरनेट से बहुत पुराना है। युद्धों के दौरान पर्चे गिराना, रेडियो प्रसारण करना, विरोधी सेना को आत्मसमर्पण के संदेश भेजना, अफवाह फैलाना और शत्रु नेतृत्व के प्रति अविश्वास पैदा करना लंबे समय से सैन्य रणनीति का हिस्सा रहे हैं। नया तत्व है—
पहले एक रेडियो संदेश लाखों लोगों को एक जैसा सुनाई देता था। आज अलग-अलग नागरिकों को उनकी रुचि, भाषा, क्षेत्र और सामाजिक पहचान के आधार पर अलग-अलग कथानक दिखाए जा सकते हैं। इससे मनोवैज्ञानिक युद्ध व्यक्तिगत सूचना युद्ध का रूप ले सकता है।
12.3 संज्ञानात्मक युद्ध — जब मस्तिष्क ही युद्धक्षेत्र बन जाए
आधुनिक सामरिक विमर्श में Cognitive Warfare—संज्ञानात्मक युद्ध की अवधारणा तेजी से महत्वपूर्ण हुई है। NATO के Allied Command Transformation के अनुसार इसमें विभिन्न राष्ट्रीय शक्ति-साधनों के साथ समन्वित गतिविधियों द्वारा व्यक्ति, समूह अथवा आबादी की सोच और व्यवहार को प्रभावित करने, सुरक्षित रखने या बाधित करने का प्रयास किया जा सकता है। इसका लक्ष्य विरोधी पर संज्ञानात्मक लाभ प्राप्त करना है। (NATO ACT) सरल शब्दों में—
यदि किसी समाज में लगातार यह भावना पैदा कर दी जाए कि— सरकार की हर सूचना झूठी है, मीडिया पर विश्वास नहीं किया जा सकता, चुनाव निष्पक्ष नहीं हैं, न्याय व्यवस्था पक्षपाती है, सेना कमजोर है, और अलग-अलग सामाजिक समूह एक-दूसरे के शत्रु हैं— तो विरोधी शक्ति को बिना सैन्य विजय के भी रणनीतिक लाभ मिल सकता है।
12.4 आधुनिक प्रभाव अभियान कैसे चलता है?
एक प्रभाव अभियान अक्सर किसी एक झूठी पोस्ट से नहीं बनता। उसकी संरचना कई चरणों में हो सकती है। पहले किसी वास्तविक सामाजिक या राजनीतिक विवाद की पहचान की जाती है। फिर उस मुद्दे से जुड़ी भावनात्मक सामग्री तैयार होती है। नकली खाते और छद्म समाचार वेबसाइटें उसे आगे बढ़ाती हैं। बॉट नेटवर्क प्रारंभिक प्रसार पैदा करते हैं। प्रभावशाली खाते सामग्री उठाते हैं। एल्गोरिद्मिक प्रणाली लोकप्रियता देखकर उसे और उपयोगकर्ताओं तक पहुंचा सकती है। इसके बाद वास्तविक नागरिक उस सामग्री पर प्रतिक्रिया देने लगते हैं। अंततः विदेशी या संगठित अभियान और वास्तविक घरेलू बहस के बीच अंतर पहचानना कठिन हो सकता है। यही आधुनिक सूचना युद्ध की विशेषता है—
12.5 यूरोपीय संघ ने इस खतरे को अलग नाम क्यों दिया?
यूरोपीय संघ ने इस समस्या के लिए Foreign Information Manipulation and Interference—FIMI, अर्थात विदेशी सूचना हेरफेर और हस्तक्षेप, की अवधारणा विकसित की है। इसका महत्व इसलिए है क्योंकि हर गलत सूचना विदेशी हस्तक्षेप नहीं होती। कोई नागरिक अनजाने में गलत सूचना साझा कर सकता है। लेकिन यदि किसी विदेशी शक्ति से जुड़ा नेटवर्क— सुनियोजित रूप से, पहचान छिपाकर, अनेक मंचों पर, राजनीतिक या सामरिक उद्देश्य से— सूचना-परिवेश को प्रभावित करता है, तो वह अलग प्रकार का सुरक्षा खतरा है। यूरोपीय बाह्य कार्रवाई सेवा की 2025 की रिपोर्ट में 2024 के दौरान 500 से अधिक ऐसी घटनाओं का विश्लेषण किया गया। इन अभियानों में कम से कम 25 मंचों पर लगभग 38,000 खातों की गतिविधि दर्ज की गई और 90 देशों में 322 संगठनों को लक्ष्य बनाए जाने की पहचान की गई। रिपोर्ट ने विशेष रूप से रूस और चीन से जुड़े नेटवर्कों का अध्ययन किया। (EEAS) ये आंकड़े बताते हैं कि सूचना प्रभाव अभियान अब छिटपुट गतिविधि नहीं, बल्कि संगठित डिजिटल ढांचे का रूप ले सकते हैं।
12.6 एक अभियान कई मंचों पर क्यों चलता है?
यदि कोई झूठ केवल एक सोशल मीडिया मंच पर मौजूद हो तो उसे रोकना अपेक्षाकृत आसान है। आधुनिक अभियान इसके विपरीत काम कर सकते हैं। पहले एक संदिग्ध वेबसाइट कहानी प्रकाशित करती है। फिर उसका लिंक सोशल मीडिया पर आता है। वीडियो मंच पर उसी दावे का दृश्य रूप बनता है। संदेश समूहों में उसका छोटा संस्करण फैलता है। दूसरे मंच पर हैशटैग शुरू होता है। कुछ खाते उसे “विदेशी मीडिया की रिपोर्ट” बताकर पुनः प्रस्तुत करते हैं। इससे झूठ के कई स्वतंत्र स्रोत होने का भ्रम पैदा हो सकता है। वास्तव में वे सभी एक ही मूल अभियान से जुड़े हो सकते हैं। यूरोपीय संघ की जांचों ने ऐसे नेटवर्कों की परतों को समझने के लिए डिजिटल ढांचे और छिपे हुए संबंधों का मानचित्रण किया है। (EEAS)
12.7 सबसे प्रभावी दुष्प्रचार पूर्ण झूठ नहीं होता
प्रभाव अभियान की सफलता के लिए हमेशा पूरी तरह काल्पनिक कहानी बनाना आवश्यक नहीं है। अक्सर अधिक प्रभावी तरीका होता है— वास्तविक घटना चुनना, उसका कुछ हिस्सा बढ़ाना, महत्वपूर्ण संदर्भ हटाना, भावनात्मक शीर्षक जोड़ना, और उसे पहले से मौजूद सामाजिक विभाजन से जोड़ देना। इसीलिए तथ्य-जांच कठिन हो जाती है। यदि सामग्री 100 प्रतिशत झूठी हो तो उसे खारिज करना आसान है। लेकिन यदि उसमें— 70 प्रतिशत तथ्य, 20 प्रतिशत संदर्भ-विकृति और 10 प्रतिशत झूठ— हो, तो वह कहीं अधिक विश्वसनीय दिखाई दे सकती है। इसलिए आधुनिक सूचना युद्ध को केवल “फेक न्यूज पकड़ने” तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता।
12.8 समाज की वास्तविक कमजोरियां ही हथियार बनती हैं
विदेशी प्रभाव अभियान आमतौर पर शून्य से सामाजिक विवाद पैदा नहीं करता। वह पहले से मौजूद विभाजनों को खोजता है। जातीय तनाव, धार्मिक विवाद, भाषाई अस्मिता, क्षेत्रीय असंतोष, आर्थिक कठिनाई, प्रवासन, चुनावी विवाद, और सरकार-विरोधी असंतोष— इनमें से कोई भी मुद्दा लक्ष्य बन सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि उस विषय पर होने वाली आलोचना विदेशी षड्यंत्र है। यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना वैध है। समस्या तब है जब कोई बाहरी शक्ति वास्तविक शिकायत को गुप्त और संगठित तरीके से रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करे।
12.9 विदेशी हस्तक्षेप सिद्ध करने की कठिनाई
किसी प्रभाव अभियान को किसी देश से जोड़ना साइबर सुरक्षा की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक है। नकली खाते दूसरे देशों से चलाए जा सकते हैं। आभासी निजी नेटवर्क से स्थान छिपाया जा सकता है। स्थानीय भाषा का प्रयोग किया जा सकता है। स्थानीय नागरिकों के खातों का इस्तेमाल हो सकता है। अभियान किसी निजी कंपनी या तीसरे देश के समूह के माध्यम से चलाया जा सकता है। इसलिए केवल यह देखकर कि कोई पोस्ट सरकार-विरोधी या राष्ट्र-विरोधी है, उसे विदेशी अभियान घोषित करना उचित नहीं होगा। विश्वसनीय आरोप के लिए— तकनीकी संकेत, नेटवर्क संबंध, वित्तीय कड़ियां, समान व्यवहार, सर्वर ढांचा, खाता संचालन और खुफिया जानकारी— जैसे अनेक प्रमाणों की आवश्यकता पड़ सकती है।
12.10 रूस–यूक्रेन युद्ध — सूचना और युद्ध का एकीकरण
रूस–यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि आधुनिक सैन्य संघर्ष और सूचना संघर्ष साथ-साथ चल सकते हैं। युद्धक्षेत्र की घटनाओं के साथ— वीडियो, उपग्रह चित्र, सरकारी संदेश, टेलीग्राम चैनल, सोशल मीडिया पोस्ट, दुष्प्रचार, तथ्य-जांच और मनोवैज्ञानिक संदेश— लगातार चलते रहे। NATO ने रूस की सूचना गतिविधियों का उल्लेख करते हुए कहा है कि सामाजिक माध्यमों और सार्वजनिक सूचना अभियानों के जरिए यूक्रेन संबंधी धारणाओं को प्रभावित करने की कोशिशें व्यापक सूचना खतरे का उदाहरण हैं। (NATO ACT) यहां एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है—
12.11 युद्ध में “कथा” क्यों महत्वपूर्ण है?
सैन्य सफलता केवल क्षेत्र जीतने से नहीं मापी जाती। अंतरराष्ट्रीय समर्थन, आर्थिक प्रतिबंध, हथियार सहायता, घरेलू जनसमर्थन और सैनिकों का मनोबल भी युद्ध की दिशा प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए दोनों पक्ष यह स्थापित करना चाहते हैं कि— युद्ध किसने शुरू किया, कौन आक्रामक है, कौन पीड़ित है, किसकी सेना सफल है, किसकी हानि अधिक है, और किस पक्ष को अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलना चाहिए। इस प्रकार सोशल मीडिया पर कथा-निर्माण स्वयं सामरिक गतिविधि बन सकता है।
12.12 कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने खतरा कैसे बढ़ाया?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने प्रभाव अभियानों की तीन बड़ी सीमाएं कम कर दी हैं—
पहले किसी विदेशी देश में प्रभाव अभियान चलाने के लिए उस देश की भाषा और संस्कृति समझने वाले बड़ी संख्या में लोगों की आवश्यकता होती थी। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता— भाषाओं में अनुवाद, स्थानीय शैली में लेखन, कृत्रिम चित्र, आवाज, वीडियो, और बड़ी संख्या में अलग-अलग संदेश— तैयार कर सकती है। Microsoft की 2024 की डिजिटल रक्षा रिपोर्ट में रूस, ईरान, चीन और अन्य राष्ट्र-समर्थित तत्वों द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनी या संवर्धित सामग्री को प्रभाव अभियानों में शामिल करने की बढ़ती प्रवृत्ति दर्ज की गई थी। उसकी 2025 रिपोर्ट ने भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा हमलों की गति और पैमाना बढ़ाने की व्यापक सुरक्षा चुनौती पर जोर दिया। (Microsoft)
12.13 डीपफेक का सामरिक उपयोग
पिछले अध्याय में डीपफेक की चुनावी और सामाजिक चुनौती देखी गई। राष्ट्रीय सुरक्षा में इसका खतरा और बड़ा है। कल्पना कीजिए— प्रधानमंत्री का नकली युद्ध संदेश, सेना प्रमुख का झूठा आत्मसमर्पण आदेश, किसी सैन्य हमले का कृत्रिम वीडियो, किसी धार्मिक स्थल पर हमले का नकली दृश्य, या दो देशों के नेताओं की काल्पनिक बातचीत। यदि ऐसी सामग्री सामान्य समय में सामने आए तो जांच की जा सकती है। लेकिन युद्ध, दंगे या सीमा तनाव के दौरान प्रतिक्रिया के लिए कुछ मिनट ही उपलब्ध हो सकते हैं। इसलिए आधुनिक राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था को केवल साइबर हमले की चेतावनी प्रणाली नहीं बल्कि सूचना प्रामाणिकता की त्वरित सत्यापन प्रणाली भी चाहिए।
12.14 प्रभाव अभियान और हैकिंग का मेल
साइबर और सूचना अभियान अलग-अलग भी चल सकते हैं, लेकिन उनका संयोजन अधिक प्रभावी हो सकता है। उदाहरण के लिए— पहले किसी संस्था के ई-मेल हैक किए जाएं। फिर वास्तविक दस्तावेज चुराए जाएं। उनमें से चुनिंदा दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं। कुछ असली दस्तावेजों के बीच नकली दस्तावेज मिला दिए जाएं। फिर सोशल मीडिया नेटवर्क उन्हें व्यापक रूप से फैलाए। इस प्रकार तकनीकी सेंध और मनोवैज्ञानिक अभियान एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं। यही हैक-और-प्रचार मॉडल राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए विशेष रूप से खतरनाक है।
12.15 महत्वपूर्ण संस्थाओं पर विश्वास भी राष्ट्रीय संपत्ति है
सामान्यतः राष्ट्रीय संपत्ति से तात्पर्य— भूमि, सेना, आर्थिक संसाधन, ऊर्जा ढांचा और संचार प्रणाली— से लगाया जाता है। लेकिन डिजिटल युग में संस्थागत विश्वास भी रणनीतिक संपत्ति है। यदि नागरिकों का चुनाव आयोग, न्यायपालिका, सेना, पुलिस, केंद्रीय बैंक, वैज्ञानिक संस्थाओं और मीडिया पर न्यूनतम विश्वास समाप्त हो जाए तो संकट के समय राज्य की प्रतिक्रिया कमजोर हो सकती है। इसीलिए प्रभाव अभियान का लक्ष्य कभी-कभी किसी नीति को बदलना नहीं बल्कि लंबे समय में विश्वास का क्षरण करना होता है। NATO और यूरोपीय संघ दोनों ने सूचना हेरफेर को लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक एकता को कमजोर करने वाली सुरक्षा चुनौती के रूप में रेखांकित किया है। (NATO)
12.16 डिजिटल संप्रभुता से इसका क्या संबंध है?
यहीं इस पूरे शोध का केंद्रीय प्रश्न सामने आता है। यदि किसी देश की सार्वजनिक सूचना का बड़ा हिस्सा विदेशी स्वामित्व वाले डिजिटल मंचों पर चलता है और उन्हीं मंचों की तकनीकी प्रणालियां यह निर्धारित करती हैं कि— कौन-सी सूचना व्यापक होगी, कौन-सा खाता हटेगा, कौन-सा वीडियो अनुशंसित होगा, कौन-सा राजनीतिक विज्ञापन किसे दिखेगा— तो उस देश की सूचना व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा निजी विदेशी कंपनियों के तकनीकी ढांचे पर निर्भर हो जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि विदेशी कंपनी स्वयं शत्रु है। लेकिन राष्ट्रीय संप्रभुता के दृष्टिकोण से यह प्रश्न वैध है—
यही डिजिटल संप्रभुता की मूल चुनौती है।
12.17 टिकटॉक विवाद ने यही प्रश्न उठाया
टिकटॉक को लेकर अमेरिका, भारत और अन्य देशों में हुई बहस केवल वीडियो सामग्री की गुणवत्ता पर नहीं थी। मुख्य चिंता डेटा, विदेशी प्रभाव और उस मंच के स्वामित्व तथा नियंत्रण से जुड़ी थी। भारत ने जून 2020 में टिकटॉक सहित 59 मोबाइल अनुप्रयोगों को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत प्रतिबंधित करते हुए संप्रभुता, अखंडता, रक्षा, राज्य सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित कारण बताए थे। यह घटना वैश्विक डिजिटल नीति में महत्वपूर्ण थी। इसने प्रश्न उठाया—
इस विषय को आगे वैश्विक तुलनात्मक अध्ययन और भारत की केस फाइलों में विस्तार से लिया जाएगा।
12.18 मंच राष्ट्रीय सुरक्षा के भागीदार हैं या निजी कंपनियां?
दोनों। वे निजी व्यावसायिक संस्थाएं हैं, लेकिन उनका ढांचा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल हो सकता है। यहीं राज्य और मंच के बीच कठिन संबंध बनता है। सरकार चाहती है कि मंच— आतंकवादी प्रचार हटाए, विदेशी प्रभाव नेटवर्क पहचाने, बॉट गतिविधि रोके, डीपफेक पर तेजी से कार्रवाई करे, और जांच एजेंसियों को विधिसम्मत सहयोग दे। लेकिन मंच के पास दूसरा दायित्व भी है— नागरिक की वैध अभिव्यक्ति की रक्षा। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा सहयोग का अर्थ यह नहीं हो सकता कि सरकार किसी भी आलोचनात्मक सामग्री को “सूचना युद्ध” बताकर हटवा दे।
12.19 सबसे खतरनाक भूल — असहमति को विदेशी हस्तक्षेप समझ लेना
राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करते समय लोकतंत्र को इस गलती से विशेष रूप से बचना होगा। सरकार-विरोधी विचार = दुष्प्रचार नहीं। विवादास्पद विचार = विदेशी प्रभाव नहीं। गलत तथ्य = हमेशा शत्रु अभियान नहीं। किसी नागरिक का कठोर राजनीतिक मत भी संवैधानिक अभिव्यक्ति हो सकता है। यदि राज्य हर असुविधाजनक विचार को विदेशी हस्तक्षेप घोषित करने लगे तो सूचना सुरक्षा का ढांचा सेंसरशिप में बदल सकता है। इसलिए कार्रवाई का आधार विचार नहीं, व्यवहार और प्रमाण होना चाहिए। क्या समन्वित नकली नेटवर्क है? क्या स्रोत छिपाया गया? क्या विदेशी संचालन के प्रमाण हैं? क्या नकली पहचान इस्तेमाल हुई? क्या तकनीकी और वित्तीय संबंध मौजूद हैं? यही कसौटियां लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुरक्षित रख सकती हैं।
12.20 केवल सामग्री हटाना पर्याप्त क्यों नहीं?
किसी प्रभाव अभियान की दस हजार पोस्ट हटाने के बाद अगले दिन बीस हजार नई पोस्ट बनाई जा सकती हैं। इसलिए केवल सामग्री-आधारित कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। अधिक प्रभावी दृष्टिकोण है—
कौन-से खाते आपस में जुड़े हैं? वे एक साथ किस समय सक्रिय होते हैं? क्या एक ही सामग्री अलग-अलग भाषाओं में समन्वित रूप से फैलाई जा रही है? क्या अनेक वेबसाइटों का तकनीकी ढांचा एक ही स्रोत से जुड़ा है? क्या खाते नकली व्यक्तित्व इस्तेमाल कर रहे हैं? यूरोपीय संघ का FIMI ढांचा इसी कारण केवल व्यक्तिगत झूठ की जांच के बजाय अभियानों के व्यवहार, नेटवर्क और आधारभूत संरचना को समझने पर जोर देता है। (EEAS)
12.21 जवाबी दुष्प्रचार समाधान नहीं
यदि कोई विदेशी शक्ति झूठ फैलाती है तो लोकतांत्रिक राज्य को उसके उत्तर में झूठ फैलाना चाहिए—यह खतरनाक विचार होगा। लोकतांत्रिक राज्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विश्वसनीयता है। यदि सरकार भी अप्रमाणित प्रचार का सहारा लेने लगे तो दीर्घकाल में नागरिक दोनों पक्षों पर अविश्वास करने लगेंगे। इसलिए प्रभावी प्रतिरक्षा के आधार होने चाहिए— तेज तथ्यात्मक सूचना, विश्वसनीय आधिकारिक स्रोत, स्वतंत्र मीडिया, खुली तथ्य-जांच, और प्रमाण-आधारित खंडन। सूचना युद्ध में हर बार सबसे ऊंची आवाज जीतती नहीं। कई बार सबसे विश्वसनीय आवाज अधिक महत्वपूर्ण होती है।
12.22 मीडिया की भूमिका
मीडिया साइबर प्रभाव अभियान के विरुद्ध रक्षा भी बन सकता है और अनजाने में उसका वाहक भी। यदि किसी संदिग्ध विदेशी खाते द्वारा पोस्ट किया गया सनसनीखेज वीडियो बिना सत्यापन के मुख्यधारा मीडिया उठा ले, तो सीमित अभियान को राष्ट्रीय स्तर की दृश्यता मिल सकती है। इसलिए पत्रकारों को केवल सामग्री की सत्यता नहीं बल्कि उसकी उत्पत्ति भी जांचनी होगी। वीडियो कहां से आया? पहला खाता कौन था? क्या वही सामग्री अनेक नए खातों से एक साथ फैली? क्या मूल वेबसाइट विश्वसनीय है? क्या वीडियो पुराना है? क्या उसमें कृत्रिम बदलाव हैं? डिजिटल युग में पत्रकारिता की नई जिम्मेदारी है—
12.23 समाज को प्रतिरोधक क्षमता चाहिए
हर दुष्प्रचार अभियान को सरकारी आदेश से रोकना संभव नहीं है। दीर्घकालीन सुरक्षा के लिए समाज में सूचना प्रतिरोधक क्षमता आवश्यक है। नागरिक यदि— स्रोत जांचता है, सनसनीखेज सामग्री तुरंत साझा नहीं करता, आधिकारिक और स्वतंत्र स्रोतों की तुलना करता है, डीपफेक की संभावना समझता है, और राजनीतिक रूप से अनुकूल जानकारी पर भी प्रश्न उठाता है— तो प्रभाव अभियान की सफलता कठिन हो जाती है। यह ठीक वैसा है जैसे महामारी में केवल अस्पताल पर्याप्त नहीं; सामाजिक प्रतिरक्षा भी आवश्यक होती है।
12.24 भारत के लिए विशेष चुनौती
भारत के सामने यह समस्या कई कारणों से जटिल है। विशाल जनसंख्या, अनेक भाषाएं, धार्मिक और सामाजिक विविधता, सीमा विवाद, आतंकवाद का इतिहास, पड़ोसी देशों के साथ तनाव, बड़ी प्रवासी आबादी, और अत्यंत सक्रिय सोशल मीडिया वातावरण— सभी इसे सूचना अभियानों के लिए संवेदनशील बनाते हैं। भारत में किसी प्रभाव अभियान को सफल होने के लिए पूरे देश को निशाना बनाने की आवश्यकता भी नहीं है। वह किसी एक— राज्य, भाषाई समुदाय, धार्मिक समूह, सीमावर्ती क्षेत्र, या विशिष्ट राजनीतिक विवाद— को लक्ष्य बना सकता है। इसलिए भारत की सूचना सुरक्षा रणनीति बहुभाषी और विकेंद्रीकृत होनी चाहिए।
12.25 राष्ट्रीय सूचना सुरक्षा का संभावित ढांचा
भारत के लिए प्रभावी व्यवस्था के कुछ मूल तत्व हो सकते हैं।
बड़े समन्वित डिजिटल अभियानों की प्रारंभिक पहचान।
केवल हिंदी और अंग्रेजी नहीं, भारतीय भाषाओं में भी संदिग्ध नेटवर्क समझने की क्षमता।
राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में तेज कार्रवाई हो, लेकिन आदेश लिखित और समीक्षा योग्य हों।
विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और विश्वसनीय नागरिक संस्थाओं को सार्वजनिक डेटा का अध्ययन करने की पर्याप्त सुविधा।
युद्ध, चुनाव और साम्प्रदायिक तनाव के दौरान कृत्रिम तथा संदिग्ध सामग्री सत्यापित करने की क्षमता।
संकट के समय सरकार जल्दी और तथ्यात्मक जानकारी दे।
राष्ट्रीय सुरक्षा का उपयोग वैध राजनीतिक असहमति दबाने के लिए न हो।
12.26 वैश्विक सहयोग क्यों आवश्यक है?
प्रभाव अभियान राष्ट्रीय सीमा नहीं मानते। एक देश में सर्वर हो सकता है। दूसरे देश में कंपनी पंजीकृत हो सकती है। तीसरे देश के नागरिक लक्ष्य हो सकते हैं। चौथे देश के सोशल मीडिया मंच का उपयोग हो सकता है। इसीलिए अकेला राष्ट्रीय कानून पर्याप्त नहीं होगा। यूरोपीय संघ ने 2025 में अपनी FIMI प्रतिरोध क्षमता को अधिक परिचालन-उन्मुख बनाने, पूर्व चेतावनी और साझेदार देशों के साथ समन्वय बढ़ाने की दिशा में काम किया। जून 2026 की गतिविधि रिपोर्ट के अनुसार इस दिशा में Situational Awareness Hub, साझेदार सहयोग और चुनावी हस्तक्षेप के विरुद्ध संयुक्त प्रयासों का विस्तार किया गया। (EEAS) भविष्य में लोकतांत्रिक देशों के बीच— खतरे की सूचना साझा करना, संदिग्ध नेटवर्क की पहचान, कृत्रिम सामग्री की जांच, और विदेशी प्रभाव अभियानों के स्रोत निर्धारित करना— अधिक महत्वपूर्ण होगा।
12.27 क्या डिजिटल संप्रभुता का अर्थ डिजिटल अलगाव है?
नहीं। डिजिटल संप्रभुता का अर्थ यह नहीं कि भारत अपना इंटरनेट दुनिया से काट दे या केवल भारतीय मंचों की अनुमति दे। ऐसा दृष्टिकोण आर्थिक और तकनीकी दोनों रूप से हानिकारक हो सकता है। डिजिटल संप्रभुता का अधिक संतुलित अर्थ है—
विदेशी निवेश हो सकता है। विदेशी मंच काम कर सकते हैं। वैश्विक डेटा प्रवाह हो सकता है। लेकिन भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों से संबंधित अंतिम कानूनी व्यवस्था भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं द्वारा निर्धारित होनी चाहिए।
12.28 संप्रभुता और स्वतंत्रता का संतुलन
राष्ट्रीय सूचना सुरक्षा में सबसे कठिन संतुलन यही है। बहुत कमजोर राज्य— विदेशी प्रभाव और निजी तकनीकी शक्ति के सामने असुरक्षित हो सकता है। बहुत शक्तिशाली और अनियंत्रित राज्य— अपने ही नागरिकों की अभिव्यक्ति और गोपनीयता के लिए खतरा बन सकता है। इसलिए सही मॉडल है—
इन तीनों के संतुलन में ही डिजिटल संप्रभुता का लोकतांत्रिक स्वरूप संभव है।
12.29 निष्कर्ष
इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रीय सुरक्षा की सीमा देश की भौगोलिक सीमा पर समाप्त नहीं होती। एक विदेशी शक्ति किसी समाज को प्रभावित करने के लिए— उसके सर्वर पर हमला कर सकती है, उसका डेटा चुरा सकती है, उसके नागरिकों को झूठी सूचना भेज सकती है, उसके सामाजिक विभाजनों को बढ़ा सकती है, उसके चुनावों पर अविश्वास पैदा कर सकती है, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से ऐसे दृश्य बना सकती है जो कभी घटित ही नहीं हुए। इसलिए सूचना-परिवेश अब राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा है। लेकिन इस निष्कर्ष के साथ एक समान रूप से महत्वपूर्ण चेतावनी जुड़ी है—
लोकतंत्र और अधिनायकवादी व्यवस्था के बीच अंतर इसी बिंदु पर स्पष्ट होता है। लोकतांत्रिक राज्य को विदेशी प्रभाव अभियान से दृढ़ता से लड़ना चाहिए, लेकिन अपने नागरिकों की स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति को उसी श्रेणी में नहीं रखना चाहिए। आधुनिक सूचना युद्ध में सबसे मजबूत राष्ट्र वह नहीं होगा जो सबसे अधिक सामग्री हटाए। सबसे मजबूत राष्ट्र वह होगा— जिसकी संस्थाओं पर नागरिक भरोसा करते हों, जिसका मीडिया सत्यापन करने में सक्षम हो, जिसका समाज दुष्प्रचार के प्रति सजग हो, जिसकी तकनीकी व्यवस्था हमले पहचान सके, और जिसका कानून राष्ट्रीय सुरक्षा तथा नागरिक स्वतंत्रता—दोनों की रक्षा कर सके। यही डिजिटल संप्रभुता की वास्तविक कसौटी है। और अब इस अध्ययन का अगला चरण यह देखने का है कि दुनिया की प्रमुख लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी व्यवस्थाओं ने इस चुनौती का उत्तर किस प्रकार दिया है।