चुनाव, लोकतंत्र और सोशल मीडिया — प्रचार, सूक्ष्म लक्ष्यीकरण और चुनावी दुष्प्रचार
भाग–4 : नई डिजिटल चुनौतियाँ
लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं है; वह नागरिक की राजनीतिक संप्रभुता की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। इसलिए यदि मतदाता तक पहुंचने वाली सूचना, राजनीतिक विज्ञापन, प्रचार और सार्वजनिक विमर्श का बड़ा हिस्सा डिजिटल मंचों पर स्थानांतरित हो जाए, तो सोशल मीडिया स्वयं चुनावी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण क्षेत्र बन जाता है। आज राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए सोशल मीडिया केवल प्रचार का अतिरिक्त साधन नहीं रहा। यह मतदाता तक सीधी पहुंच, त्वरित प्रतिक्रिया, वीडियो संदेश, धन संग्रह, स्वयंसेवक संगठन, विरोधी पक्ष की आलोचना, भाषाई और क्षेत्रीय लक्ष्यीकरण तथा चुनावी कथा निर्माण का प्रमुख माध्यम है। यहीं से अवसर और खतरा दोनों पैदा होते हैं। एक ओर सोशल मीडिया ने चुनावी संवाद को अधिक लोकतांत्रिक बनाया है। छोटे दल, स्वतंत्र उम्मीदवार और सामान्य नागरिक भी अपनी बात व्यापक जनता तक पहुंचा सकते हैं। दूसरी ओर वही तकनीक— व्यक्तिगत मतदाता-प्रोफाइलिंग, अस्पष्ट राजनीतिक विज्ञापन, बॉट नेटवर्क, फर्जी खाते, विदेशी प्रभाव अभियान, डीपफेक, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बने प्रचार— के लिए भी इस्तेमाल हो सकती है। इसलिए आधुनिक लोकतंत्र के सामने प्रश्न केवल यह नहीं है कि मतदाता किसे वोट देगा, बल्कि यह भी है कि उसके निर्णय से पहले उसकी सूचना-धारा किसने बनाई।
11.1 चुनावी प्रचार का डिजिटल परिवर्तन
चुनावी प्रचार पहले मुख्यतः— जनसभा, पोस्टर, पैम्फलेट, रेडियो, टेलीविजन, समाचार पत्र और घर-घर संपर्क— पर आधारित था। इन माध्यमों की एक विशेषता थी—वे काफी हद तक सार्वजनिक थे। यदि किसी उम्मीदवार ने अखबार में विज्ञापन दिया तो सभी पाठक लगभग वही संदेश देखते थे। टेलीविजन विज्ञापन भी व्यापक दर्शक समूह के लिए एक समान होता था। सोशल मीडिया ने इस व्यवस्था को बदल दिया। अब एक राजनीतिक दल अलग-अलग मतदाता समूहों को अलग संदेश दिखा सकता है। युवा मतदाता को रोजगार का संदेश। किसान को कृषि नीति। शहरी मध्यम वर्ग को कर व्यवस्था। महिलाओं को सुरक्षा और कल्याण योजनाएं। किसी विशेष क्षेत्र में स्थानीय मुद्दा। यह अपने आप में लोकतांत्रिक रूप से गलत नहीं है। राजनीतिक दल हमेशा अलग समूहों के लिए अलग मुद्दों पर प्रचार करते रहे हैं। अंतर यह है कि डिजिटल तकनीक ने इसे अत्यंत सूक्ष्म और बड़े पैमाने पर संभव बना दिया है।
11.2 सूक्ष्म लक्ष्यीकरण क्या है?
Microtargeting—सूक्ष्म लक्ष्यीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें मतदाताओं को उनके उपलब्ध डेटा और अनुमानित रुचियों के आधार पर छोटे समूहों में बांटकर अलग-अलग राजनीतिक संदेश दिखाए जाते हैं। इसमें प्रत्यक्ष या अनुमानित संकेत शामिल हो सकते हैं— उम्र, स्थान, भाषा, रुचियां, ऑनलाइन व्यवहार, वे किन विषयों पर प्रतिक्रिया देते हैं, कौन-से वीडियो देखते हैं, और किन प्रकार की सामग्री के साथ जुड़ते हैं। विज्ञापन मंच इन संकेतों के आधार पर विशिष्ट दर्शक समूह तक संदेश पहुंचाने की सुविधा दे सकते हैं। यहीं सामान्य राजनीतिक विज्ञापन और व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव के बीच सीमा धुंधली होने लगती है।
11.3 सूक्ष्म लक्ष्यीकरण लोकतांत्रिक रूप से समस्याजनक कब होता है?
यदि कोई उम्मीदवार दिल्ली के मतदाताओं को दिल्ली से संबंधित संदेश और महाराष्ट्र के मतदाताओं को महाराष्ट्र से संबंधित संदेश देता है, तो इसमें कोई असामान्य बात नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब मतदाता का अत्यधिक निजी या संवेदनशील डेटा इस्तेमाल कर उसकी मनोवैज्ञानिक कमजोरियों के अनुरूप संदेश तैयार किए जाएं। उदाहरण के लिए— किसी व्यक्ति के भय, धार्मिक पहचान, जातीय संवेदनशीलता, आर्थिक असुरक्षा, व्यक्तिगत चिंता, या राजनीतिक क्रोध— का अनुमान लगाकर उसी आधार पर उसे अलग संदेश दिखाया जाए। ऐसी स्थिति में राजनीतिक संवाद सार्वजनिक विमर्श से हटकर व्यक्तिगत प्रभाव संचालन में बदल सकता है।
11.4 Cambridge Analytica — चुनावी डेटा का सबसे चर्चित मामला
2018 में सामने आया Cambridge Analytica प्रकरण इस बहस का प्रतीक बन गया। अमेरिकी Federal Trade Commission की कार्यवाही में आरोप लगाया गया कि Cambridge Analytica ने फेसबुक उपयोगकर्ताओं से संबंधित जानकारी एक ऐप के माध्यम से ऐसे तरीके से प्राप्त की जिसमें उपभोक्ताओं को डेटा संग्रह और उपयोग के बारे में भ्रामक दावे किए गए। FTC ने दिसंबर 2019 में कंपनी के विरुद्ध अंतिम आदेश जारी किया। (Federal Trade Commission) उसी व्यापक गोपनीयता विवाद के बाद फेसबुक ने 2019 में FTC के साथ रिकॉर्ड 5 अरब डॉलर के समझौते पर सहमति दी, जिसमें कंपनी पर नई गोपनीयता संबंधी जिम्मेदारियां भी लगाई गईं। (Federal Trade Commission) Cambridge Analytica विवाद से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आया—
11.5 क्या Cambridge Analytica ने चुनाव परिणाम बदल दिया था?
यहां सावधानी जरूरी है। यह साबित करना कठिन है कि Cambridge Analytica की गतिविधियों ने किसी विशिष्ट चुनाव का परिणाम निर्णायक रूप से बदल दिया। राजनीतिक चुनाव अनेक कारणों से तय होते हैं— उम्मीदवार, अर्थव्यवस्था, सामाजिक गठबंधन, स्थानीय मुद्दे, मीडिया, नेतृत्व, मतदान प्रतिशत और चुनावी रणनीति। इसलिए किसी एक डिजिटल कंपनी को सीधे चुनाव परिणाम का निर्णायक कारण मान लेना अतिशयोक्ति होगी। लेकिन Cambridge Analytica का वास्तविक महत्व अलग है। उसने दुनिया को दिखाया कि—
11.6 राजनीतिक विज्ञापन और सामान्य पोस्ट में अंतर
डिजिटल चुनावी प्रचार में एक बुनियादी अंतर है— सामान्य राजनीतिक अभिव्यक्ति और भुगतान किया गया राजनीतिक विज्ञापन। यदि कोई नागरिक किसी उम्मीदवार का समर्थन करते हुए पोस्ट लिखता है तो वह राजनीतिक अभिव्यक्ति है। लेकिन यदि किसी दल या उम्मीदवार ने पैसे देकर वही संदेश लाखों विशिष्ट मतदाताओं तक पहुंचाया है, तो वह राजनीतिक विज्ञापन है। लोकतांत्रिक पारदर्शिता के लिए मतदाता को कम से कम यह जानने का अधिकार होना चाहिए— यह विज्ञापन किसने दिया? कितना भुगतान हुआ? किसे लक्ष्य बनाया गया? और इसे कितने लोगों ने देखा? यहीं डिजिटल विज्ञापन-पारदर्शिता का महत्व है।
11.7 पारंपरिक चुनाव प्रचार से बड़ा अंतर — अदृश्य विज्ञापन
अखबार का विज्ञापन सार्वजनिक होता है। प्रतिद्वंद्वी दल भी उसे देख सकता है। पत्रकार उसकी जांच कर सकते हैं। नागरिक उसका रिकॉर्ड रख सकते हैं। लेकिन अत्यधिक लक्षित डिजिटल विज्ञापन केवल एक छोटे समूह को दिखाई दे सकता है। इसे कभी-कभी Dark Advertising की समस्या से जोड़ा जाता है। एक उम्मीदवार अलग-अलग समूहों को परस्पर विरोधी संदेश भी दे सकता है और व्यापक जनता को इसका पता न चले। इससे राजनीतिक जवाबदेही कमजोर पड़ सकती है। इसीलिए राजनीतिक विज्ञापनों के सार्वजनिक संग्रह की मांग दुनिया में बढ़ी।
11.8 यूरोपीय संघ का नया मॉडल
यूरोपीय संघ ने राजनीतिक विज्ञापन की पारदर्शिता और लक्ष्यीकरण के लिए Regulation (EU) 2024/900 बनाया। यह व्यवस्था 10 अक्टूबर 2025 से पूर्ण रूप से लागू हुई। इसका उद्देश्य राजनीतिक विज्ञापनों की पहचान आसान बनाना और उन्नत लक्ष्यीकरण तकनीकों के उपयोग को अधिक पारदर्शी बनाना है। (European Commission) इस व्यवस्था के पीछे मूल चिंता यही है कि मतदाता जान सके— वह राजनीतिक विज्ञापन देख रहा है, विज्ञापन किसके लिए चलाया गया, और उसे लक्षित करने में किन सामान्य आधारों का उपयोग हुआ। यूरोपीय संघ के 2022 के दुष्प्रचार आचार ढांचे में भी राजनीतिक विज्ञापनों पर स्पष्ट चिह्न, प्रायोजक की पहचान, खर्च और विज्ञापन अवधि जैसी जानकारी तथा खोज योग्य विज्ञापन संग्रह पर जोर दिया गया। (Digital Strategy) यह वैश्विक नीति में महत्वपूर्ण बदलाव है—
11.9 भारत में सोशल मीडिया चुनाव प्रचार का नियमन
भारत में निर्वाचन आयोग ने सोशल मीडिया पर चुनाव प्रचार के लिए अलग-अलग निर्देश विकसित किए हैं। 2013 से ही आयोग ने उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों द्वारा सोशल मीडिया पर किए गए चुनावी विज्ञापन खर्च को चुनाव व्यय में शामिल करने की व्यवस्था की थी। उम्मीदवार द्वारा सोशल मीडिया खाते चलाने और सामग्री तैयार करने पर होने वाला संबंधित खर्च भी चुनावी व्यय का हिस्सा हो सकता है। (Election Commission of India (Hindi)) आयोग के निर्देशों में सोशल मीडिया विज्ञापनों के लिए Media Certification and Monitoring Committee—MCMC से पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था भी लागू है। मार्च 2026 में पांच राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के विधानसभा चुनावों और उपचुनावों के दौरान निर्वाचन आयोग ने फिर स्पष्ट किया कि राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा इंटरनेट आधारित माध्यमों, जिसमें सोशल मीडिया शामिल है, पर जारी किए जाने वाले राजनीतिक विज्ञापनों को संबंधित MCMC से पूर्व प्रमाणित कराना होगा। (Election Commission of India)
11.10 उम्मीदवार के आधिकारिक सोशल मीडिया खाते भी घोषित करने होते हैं
निर्वाचन आयोग ने उम्मीदवारों को नामांकन के समय अपने प्रामाणिक सोशल मीडिया खातों की जानकारी देने की व्यवस्था भी की है। 2026 के आयोग के निर्देशों में यह requirement दोहराई गई। इसके साथ राजनीतिक प्रचार पर इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से किए गए खर्च की रिपोर्टिंग भी चुनावी लेखे का हिस्सा है। (Election Commission of India) यह महत्वपूर्ण है क्योंकि सोशल मीडिया प्रचार अब चुनावी खर्च से बाहर की कोई अनौपचारिक गतिविधि नहीं माना जा सकता। वह औपचारिक चुनावी अभियान का हिस्सा है।
11.11 चुनाव आयोग की नई चिंता — गलत सूचना और फर्जी खबर
मार्च 2026 में निर्वाचन आयोग ने चुनावी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों, पुलिस और सूचना-प्रौद्योगिकी अधिकारियों तथा सोशल मीडिया मंचों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की और चुनाव के दौरान गलत सूचना, जानबूझकर फैलाई गई भ्रामक सूचना और फर्जी खबरों पर समयबद्ध कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। (Election Commission of India) इससे पता चलता है कि चुनावी नियमन का दायरा बदल चुका है। पहले मुख्य चिंता थी— पैसा, शराब, पोस्टर और प्रचार वाहन। अब उसके साथ— सोशल मीडिया विज्ञापन, फर्जी खाते, डीपफेक, गलत सूचना और डिजिटल प्रचार व्यय— भी जुड़ चुके हैं।
11.12 जैविक लोकप्रियता बनाम खरीदी गई पहुंच
सोशल मीडिया चुनावों में एक और महत्वपूर्ण अंतर पैदा करता है। यदि किसी नेता का भाषण स्वयं लाखों लोग साझा करते हैं तो वह जैविक लोकप्रियता है। लेकिन यदि वही सामग्री विज्ञापन भुगतान द्वारा लाखों लोगों तक पहुंचाई जाती है, तो वह खरीदी गई पहुंच है। दोनों स्क्रीन पर लगभग समान दिखाई दे सकते हैं। मतदाता हमेशा यह समझ नहीं पाता कि— वह लोकप्रिय सामग्री देख रहा है या उसे लक्षित विज्ञापन दिखाया जा रहा है। इसीलिए राजनीतिक विज्ञापन की स्पष्ट पहचान आवश्यक है।
11.13 प्रभावशाली व्यक्तियों और छिपे हुए राजनीतिक प्रचार का प्रश्न
आधुनिक चुनाव प्रचार केवल आधिकारिक राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है। लोकप्रिय सोशल मीडिया निर्माता, अभिनेता, हास्य कलाकार, विचारक और प्रभावशाली खाते भी राजनीतिक सामग्री बना सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति स्वयं किसी उम्मीदवार का समर्थन करता है तो वह स्वतंत्र अभिव्यक्ति है। लेकिन यदि उसे राजनीतिक दल द्वारा भुगतान किया गया हो और वह भुगतान छिपाया जाए, तो मामला अलग हो जाता है। यह अघोषित राजनीतिक विज्ञापन बन सकता है। भविष्य के चुनाव कानूनों के सामने यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न होगा—
11.14 बॉट और नकली लोकप्रियता
डिजिटल चुनावों का दूसरा खतरा है—
बॉट खाते हजारों पोस्ट कर सकते हैं। एक संगठित समूह किसी हैशटैग को कुछ घंटों में ऊपर ला सकता है। नकली खाते किसी उम्मीदवार के पक्ष या विपक्ष में बड़ी संख्या में टिप्पणियां कर सकते हैं। इससे आम उपयोगकर्ता को यह भ्रम हो सकता है कि किसी विचार को वास्तविकता से कहीं अधिक जनसमर्थन प्राप्त है। यह सीधे मतदाता को विचार बदलने का आदेश नहीं देता। लेकिन यह सामाजिक सहमति का भ्रम पैदा कर सकता है।
11.15 2016 अमेरिकी चुनाव और रूसी प्रभाव अभियान
2016 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव सोशल मीडिया और विदेशी चुनावी हस्तक्षेप की बहस में ऐतिहासिक मोड़ था। अमेरिकी Senate Intelligence Committee की द्विदलीय जांच ने रूस समर्थित Internet Research Agency द्वारा सोशल मीडिया के जरिए अमेरिकी राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने और सामाजिक विभाजन बढ़ाने के प्रयासों का विस्तृत अध्ययन किया। समिति ने पाया कि यह गतिविधि केवल एक मंच तक सीमित नहीं थी और इसका उद्देश्य अमेरिकी समाज में मतभेदों को गहरा करना तथा चुनावी वातावरण को प्रभावित करना था। (Senate Intelligence Committee) बाद की व्यापक सीनेट रिपोर्ट ने रूसी हस्तक्षेप पर अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मूल निष्कर्षों को पुष्ट किया। (Senate Intelligence Committee) यह घटना राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण बनी। क्योंकि यहां किसी विदेशी शक्ति को चुनाव प्रभावित करने के लिए सीमा पार सेना भेजने की आवश्यकता नहीं थी।
11.16 विदेशी प्रभाव और घरेलू प्रचार में अंतर
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का प्रचार स्वाभाविक है। विदेशी राज्य द्वारा गुप्त प्रभाव अभियान अलग मामला है। अंतर मुख्यतः है—
यदि कोई राजनीतिक दल खुले तौर पर अपने पक्ष में विज्ञापन देता है तो मतदाता जानता है कि संदेश कहां से आया। लेकिन यदि किसी विदेशी सरकार से जुड़ा संगठन नकली स्थानीय खातों के माध्यम से ऐसा प्रचार करे जैसे वह देश के सामान्य नागरिकों की स्वतःस्फूर्त राय हो, तो स्रोत छिप जाता है। इसीलिए विदेशी प्रभाव अभियान राष्ट्रीय संप्रभुता के प्रश्न से सीधे जुड़े हैं।
11.17 चुनावी दुष्प्रचार हमेशा किसी उम्मीदवार के समर्थन में नहीं होता
यह महत्वपूर्ण है। विदेशी या संगठित सूचना अभियान का उद्देश्य हमेशा किसी एक उम्मीदवार को जिताना नहीं हो सकता। कई बार लक्ष्य होता है— मतदाता को चुनाव प्रक्रिया पर अविश्वास दिलाना, चुनाव आयोग को पक्षपाती बताना, मतदान मशीनों को लेकर अप्रमाणित भय पैदा करना, समुदायों में संघर्ष बढ़ाना, या लोगों को यह विश्वास दिलाना कि लोकतंत्र स्वयं विफल है। इस प्रकार दुष्प्रचार का लक्ष्य उम्मीदवार नहीं बल्कि संस्था भी हो सकती है। लोकतंत्र के लिए यह अधिक गंभीर खतरा है।
11.18 डीपफेक चुनावों में नई समस्या क्यों है?
पिछले अध्याय में देखा गया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता किसी उम्मीदवार का नकली वीडियो या आवाज बना सकती है। चुनाव में समय इसका सबसे महत्वपूर्ण आयाम है। यदि मतदान से छह महीने पहले नकली वीडियो सामने आए, तो उसका खंडन संभव है। लेकिन यदि वही वीडियो मतदान से कुछ घंटे पहले वायरल हो जाए तो समस्या अलग है। इसे कभी-कभी चुनावी संदर्भ में अंतिम क्षण के दुष्प्रचार की समस्या कहा जा सकता है। सच्चाई सामने आने तक मतदान हो चुका हो सकता है। इसीलिए डीपफेक के लिए सामान्य सामग्री शिकायत प्रणाली पर्याप्त न हो; चुनाव के दौरान त्वरित सत्यापन और प्रतिक्रिया व्यवस्था आवश्यक हो सकती है।
11.19 कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने प्रचार की लागत कैसे घटा दी?
पहले अलग-अलग भाषाओं में राजनीतिक अभियान चलाने के लिए अलग टीम की आवश्यकता होती थी। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता— भाषण का अनुवाद, आवाज की नकल, वीडियो रूपांतरण, पोस्ट लेखन, चित्र निर्माण और अलग-अलग समूहों के लिए संदेश— बहुत तेजी से तैयार कर सकती है। यह वैध प्रचार के लिए उपयोगी तकनीक है। लेकिन यही तकनीक दुर्भावनापूर्ण प्रचार की लागत भी घटाती है। एक छोटा समूह भी हजारों अलग संदेश तैयार कर सकता है। इसलिए भविष्य में चुनावी दुष्प्रचार की चुनौती केवल कुछ “वायरल पोस्ट” नहीं होगी। वह स्वचालित राजनीतिक संदेश उत्पादन तक जा सकती है।
11.20 WhatsApp और बंद संदेश नेटवर्क की अलग समस्या
खुले सोशल मीडिया मंचों पर सामग्री का कुछ सार्वजनिक रिकॉर्ड होता है। लेकिन WhatsApp जैसे निजी या सीमित समूह आधारित संदेश माध्यमों में निगरानी का प्रश्न अधिक कठिन है। व्यक्तिगत संवाद की गोपनीयता लोकतंत्र में आवश्यक है। लेकिन उसी व्यवस्था में गलत सूचना बहुत तेजी से समूहों में फैल सकती है। सरकार यदि निजी संदेश पढ़ने लगे तो गोपनीयता और नागरिक अधिकारों पर गंभीर खतरा होगा। इसलिए बंद संदेश नेटवर्क में समाधान बड़े पैमाने की सरकारी निगरानी नहीं हो सकता। अधिक व्यावहारिक रास्ते हैं— साझा करने संबंधी तकनीकी सीमाएं, संदिग्ध सामग्री की आसान शिकायत, सार्वजनिक जागरूकता, और तेज आधिकारिक तथ्य-सत्यापन।
11.21 चुनाव और मंच की निष्पक्षता
एक और प्रश्न है— क्या सोशल मीडिया मंचों को चुनाव के दौरान “निष्पक्ष” रहना चाहिए? उत्तर सरल नहीं है। मंच को किसी दल का पक्ष नहीं लेना चाहिए—यह अपेक्षा स्वाभाविक है। लेकिन मंच को गैरकानूनी सामग्री, हिंसा की धमकी, नकली खाते और चुनावी धोखाधड़ी पर कार्रवाई भी करनी होती है। इसलिए हर सामग्री हटाने को राजनीतिक पक्षपात नहीं माना जा सकता। सही कसौटी यह होनी चाहिए— नियम पहले से स्पष्ट हों, सभी पर समान रूप से लागू हों, निर्णय का कारण बताया जाए, और अपील की व्यवस्था हो।
11.22 एल्गोरिद्म चुनाव में अप्रत्यक्ष भूमिका निभाता है
किसी मंच को किसी उम्मीदवार का खुला समर्थन करने की आवश्यकता नहीं। उसकी अनुशंसा प्रणाली ही राजनीतिक दृश्यता को प्रभावित कर सकती है। यदि किसी प्रकार की राजनीतिक सामग्री अधिक प्रतिक्रिया पैदा करती है तो उसे अधिक प्रसार मिल सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि मंच ने जानबूझकर किसी उम्मीदवार की मदद की। लेकिन परिणाम फिर भी राजनीतिक हो सकता है। इसीलिए चुनावी पारदर्शिता की भविष्य की बहस केवल विज्ञापन तक सीमित नहीं रह सकती। उसे यह भी देखना होगा—
11.23 क्या सोशल मीडिया चुनाव बदल सकता है?
इस प्रश्न का उत्तर संतुलित होना चाहिए। सोशल मीडिया चुनावी अभियान को प्रभावित कर सकता है। वह— मुद्दे निर्धारित कर सकता है, राजनीतिक संदेश तेजी से फैला सकता है, मतदाता समूहों को सक्रिय कर सकता है, दुष्प्रचार बढ़ा सकता है, और उम्मीदवार की छवि प्रभावित कर सकता है। लेकिन चुनाव परिणाम को केवल सोशल मीडिया से समझना गलत होगा। जाति, वर्ग, धर्म, अर्थव्यवस्था, उम्मीदवार की लोकप्रियता, संगठन, स्थानीय मुद्दे और मतदान व्यवहार जैसे अनेक कारक समानांतर काम करते हैं। इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष है—
11.24 लोकतांत्रिक नियमन की सही दिशा
चुनावी सोशल मीडिया का नियमन विचारों को नियंत्रित करने के बजाय पारदर्शिता और प्रामाणिकता पर केंद्रित होना चाहिए। मतदाता को पता हो— राजनीतिक विज्ञापन किसने खरीदा, कितना खर्च हुआ, उसे क्यों दिखाया गया, संदेश वास्तविक उम्मीदवार का है या कृत्रिम, और सामग्री किसी विदेशी अथवा छिपे हुए संगठन द्वारा तो नहीं चलाई जा रही। इसके साथ— बॉट नेटवर्क की पहचान, नकली खातों पर कार्रवाई, राजनीतिक विज्ञापनों का सार्वजनिक संग्रह, चुनाव के अंतिम दिनों में त्वरित डीपफेक प्रतिक्रिया, और मंचों तथा निर्वाचन संस्थाओं के बीच स्पष्ट संपर्क व्यवस्था— महत्वपूर्ण हो सकती है।
11.25 भारत के लिए प्रमुख सुधार क्षेत्र
भारत की मौजूदा व्यवस्था सोशल मीडिया विज्ञापन के पूर्व प्रमाणन, चुनाव खर्च और उम्मीदवार के आधिकारिक खातों की घोषणा जैसे महत्वपूर्ण आधार पहले ही प्रदान करती है। (Election Commission of India) लेकिन भविष्य में तीन क्षेत्रों पर अतिरिक्त ध्यान आवश्यक होगा।
मतदाता आसानी से देख सके कि किस दल ने कितना डिजिटल विज्ञापन चलाया और किन क्षेत्रों या समूहों को लक्ष्य बनाया।
उम्मीदवार की आवाज या वीडियो कृत्रिम रूप से बदला गया है तो स्पष्ट चिह्न हो।
ऐसे नेटवर्क की पहचान केवल सामान्य सामग्री नियंत्रण का मामला न रहकर चुनावी सुरक्षा के अंतर्गत भी देखी जाए।
11.26 स्वतंत्र अभिव्यक्ति की सीमा
चुनाव के दौरान दुष्प्रचार के नाम पर अत्यधिक नियंत्रण भी खतरनाक है। सरकार या निर्वाचन संस्था यह तय नहीं कर सकती कि हर राजनीतिक दावा “सच” है या “झूठ”, क्योंकि राजनीति में अनेक दावे— मत, व्याख्या, भविष्यवाणी, वादे और आलोचना— होते हैं। इसलिए चुनावी दुष्प्रचार नियंत्रण का मुख्य केंद्र होना चाहिए— जानबूझकर बनाई गई नकली पहचान, फर्जी मतदान सूचना, कृत्रिम वीडियो, छिपा हुआ भुगतान आधारित प्रचार, विदेशी गुप्त प्रभाव और स्पष्ट रूप से गैरकानूनी सामग्री। लोकतांत्रिक राजनीतिक बहस को सरकारी “सत्य मंत्रालय” में बदल देना स्वयं लोकतंत्र के लिए खतरा होगा।
11.27 निष्कर्ष
सोशल मीडिया ने चुनावी राजनीति को अधिक खुला, तेज और सहभागी बनाया है। लेकिन उसी तकनीक ने चुनावों को अधिक असुरक्षित भी बनाया है। अब किसी राजनीतिक दल को केवल जनसभा आयोजित नहीं करनी होती। वह मतदाता के फोन तक पहुंच सकता है। उसकी रुचि पहचान सकता है। विशिष्ट संदेश दिखा सकता है। उसके सामने किसी मुद्दे को बार-बार ला सकता है। और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से उसी संदेश के हजारों रूप तैयार कर सकता है। इसी कारण चुनावी स्वतंत्रता की आधुनिक परिभाषा केवल यह नहीं हो सकती कि—
उसे यह भी देखना होगा कि मतदान से पहले उसका डिजिटल सूचना-परिवेश कितना पारदर्शी और प्रामाणिक था। 2016 के अमेरिकी चुनाव में रूसी सोशल मीडिया प्रभाव अभियान ने दिखाया कि विदेशी हस्तक्षेप डिजिटल रूप ले सकता है। (Senate Intelligence Committee) यूरोपीय संघ ने राजनीतिक विज्ञापन की पारदर्शिता और लक्ष्यीकरण के लिए अलग कानून लागू कर इस खतरे को संस्थागत रूप से संबोधित किया है। (European Commission) भारत में निर्वाचन आयोग ने सोशल मीडिया विज्ञापनों के पूर्व प्रमाणन, चुनाव खर्च और प्रामाणिक खातों की घोषणा की व्यवस्था को लगातार मजबूत किया है। (Election Commission of India) लेकिन अगली चुनौती और बड़ी है। यदि चुनावों को प्रभावित करने वाला डिजिटल अभियान किसी विदेशी राज्य, खुफिया संस्था या संगठित नेटवर्क द्वारा चलाया जाए, तो वह केवल चुनावी दुष्प्रचार नहीं रहता। वह राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन जाता है।