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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–017 · अध्याय 09

एल्गोरिद्म कैसे जनमत बदलते हैं?

भाग–4 : नई डिजिटल चुनौतियाँ

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत हिंदी शोध संस्करण · 15 अगस्त 2026

सोशल मीडिया के शुरुआती दौर में उपयोगकर्ता मुख्यतः उन्हीं लोगों और संस्थाओं की सामग्री देखते थे जिन्हें उन्होंने स्वयं चुना था। समय के साथ यह व्यवस्था बदल गई। आज फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, टिकटॉक और X जैसे मंचों पर उपयोगकर्ता के सामने दिखाई देने वाली सामग्री का बड़ा हिस्सा स्वचालित अनुशंसा प्रणालियों द्वारा चुना और क्रमबद्ध किया जाता है। यही प्रणालियां सामान्यतः एल्गोरिद्म कहलाती हैं। एल्गोरिद्म का मूल काम बेहद उपयोगी है। सोशल मीडिया पर हर दिन इतनी अधिक सामग्री प्रकाशित होती है कि कोई व्यक्ति उसका बहुत छोटा हिस्सा ही देख सकता है। इसलिए मंच उसकी रुचियों और पिछले व्यवहार के आधार पर अनुमान लगाता है कि उसे कौन-सी सामग्री अधिक प्रासंगिक लगेगी। लेकिन यही सुविधा आधुनिक सूचना-व्यवस्था का बड़ा शक्ति-केंद्र भी बन गई है। क्योंकि एल्गोरिद्म केवल यह निर्धारित नहीं करता कि कोई व्यक्ति क्या देख सकता है; वह काफी हद तक यह भी निर्धारित करता है कि उपलब्ध लाखों सूचनाओं में से वह वास्तव में क्या देखेगा। यहीं से जनमत और एल्गोरिद्म का संबंध शुरू होता है।

9.1 एल्गोरिद्म वास्तव में करता क्या है?

मान लीजिए किसी उपयोगकर्ता के लिए एक समय में दस हजार संभावित पोस्ट उपलब्ध हैं। वह दस हजार पोस्ट नहीं देख सकता। मंच की प्रणाली उनमें से कुछ का चयन करती है। इस चयन में अलग-अलग मंच अनेक संकेतकों का इस्तेमाल करते हैं— उपयोगकर्ता किस सामग्री पर रुका, किस वीडियो को पूरा देखा, किसे पसंद किया, किस पर टिप्पणी की, क्या साझा किया, किन खातों को अनुसरण किया, किस विषय को खोजा, और किन सामग्री को तुरंत छोड़ दिया। टिकटॉक स्वयं बताता है कि उसकी “For You” अनुशंसा प्रणाली उपयोगकर्ता की गतिविधियों और रुचि संबंधी विभिन्न संकेतों के आधार पर वीडियो का क्रम निर्धारित करती है। (टिकटॉक Newsroom) अर्थात प्रत्येक गतिविधि अगले सूचना-चयन को प्रभावित कर सकती है। इसे एक चक्र के रूप में समझा जा सकता है—

समय के साथ यह चक्र व्यक्ति के सामने एक विशिष्ट सूचना-परिवेश बना सकता है।

9.2 पहले संपादक तय करता था, अब गणना करती है

परंपरागत समाचार व्यवस्था में संपादक तय करता था कि कौन-सा समाचार प्रथम पृष्ठ पर जाएगा। सोशल मीडिया में लाखों लोगों के लिए यह काम स्वचालित प्रणालियां करती हैं। अंतर बहुत बड़ा है। अखबार का पहला पृष्ठ सभी पाठकों के लिए लगभग समान होता है। लेकिन सोशल मीडिया पर दो व्यक्तियों के सामने बिल्कुल अलग-अलग सूचना संसार हो सकते हैं। एक व्यक्ति के सामने लगातार रोजगार और अर्थव्यवस्था की खबरें आ सकती हैं। दूसरे के सामने अपराध और हिंसा। तीसरे के सामने किसी राजनीतिक दल के समर्थन वाली सामग्री। चौथे के सामने उसी दल की आलोचना। इसलिए अब कोई एक “डिजिटल प्रथम पृष्ठ” नहीं है।

और उसकी संरचना काफी हद तक एल्गोरिद्म तैयार करता है।

9.3 जनमत बदलने की पहली शक्ति — एजेंडा तय करना

जनमत को प्रभावित करने के लिए हमेशा किसी व्यक्ति को यह समझाना आवश्यक नहीं कि वह किस पक्ष में मतदान करे। पहले यह निर्धारित करना पर्याप्त हो सकता है कि वह किस मुद्दे को सबसे महत्वपूर्ण माने। यदि किसी उपयोगकर्ता को कई सप्ताह तक लगातार महंगाई संबंधी सामग्री दिखाई जाए तो उसके लिए महंगाई प्रमुख राजनीतिक प्रश्न बन सकती है। यदि किसी दूसरे व्यक्ति को लगातार अपराध की घटनाएं दिखाई जाएं तो उसके लिए कानून-व्यवस्था सर्वोच्च मुद्दा बन सकता है। इस प्रक्रिया को परंपरागत संचार अध्ययन में एजेंडा निर्धारण से जोड़ा जाता रहा है। एल्गोरिद्मिक युग में इसका नया रूप यह है कि एजेंडा पूरे समाज के लिए समान नहीं बल्कि व्यक्ति-विशिष्ट हो सकता है। यही राजनीतिक संचार में एक बड़ी क्रांति है।

9.4 दूसरी शक्ति — किसी विषय को बड़ा दिखाना

सोशल मीडिया पर वास्तविक महत्व और दिखाई देने वाली लोकप्रियता हमेशा एक जैसी नहीं होती। यदि किसी विषय से संबंधित पोस्टों पर तेजी से प्रतिक्रिया आने लगे तो एल्गोरिद्मिक प्रणाली उन्हें और लोगों तक पहुंचा सकती है। अधिक लोग देखते हैं। अधिक प्रतिक्रिया आती है। फिर और प्रसार होता है। इस प्रकार एक प्रकार का प्रतिक्रिया-चक्र बन सकता है। परिणाम यह हो सकता है कि अपेक्षाकृत सीमित घटना अचानक पूरे सार्वजनिक विमर्श पर छा जाए। इसे समझने के लिए “वायरल” शब्द महत्वपूर्ण है। वायरल सामग्री केवल लोकप्रिय सामग्री नहीं होती। कई बार वह ऐसी सामग्री होती है जिसे मंच की वितरण प्रणाली तेजी से नए उपयोगकर्ताओं तक पहुंचाती चली जाती है।

9.5 भावना क्यों महत्वपूर्ण है?

मनुष्य तटस्थ सूचना की तुलना में भावनात्मक सामग्री पर अधिक प्रतिक्रिया दे सकता है। क्रोध, भय, आश्चर्य, अपमान, गर्व और समूह पहचान जैसी भावनाएं सोशल मीडिया प्रसार में विशेष भूमिका निभाती हैं। राजनीतिक संदेशों पर हुए शोध में पाया गया है कि विरोधी राजनीतिक समूह के प्रति शत्रुतापूर्ण संदर्भ वाले शब्दों का प्रयोग सामग्री साझा किए जाने की संभावना से मजबूत रूप से जुड़ा था। एक अध्ययन में विपक्षी समूह का उल्लेख करने वाला प्रत्येक अतिरिक्त शब्द साझा किए जाने की संभावना में उल्लेखनीय वृद्धि से संबद्ध पाया गया। (PNAS) अन्य शोध में नैतिक और भावनात्मक भाषा को राजनीतिक सामग्री के अधिक प्रसार से जोड़ा गया है। (PNAS) यदि मंच की प्रणाली मुख्यतः “किस सामग्री पर अधिक प्रतिक्रिया होती है” को महत्व देती है, तो भावनात्मक और संघर्षपूर्ण सामग्री को संरचनात्मक लाभ मिल सकता है। यह आवश्यक नहीं कि कंपनी जानबूझकर समाज को ध्रुवीकृत करना चाहती हो। समस्या उसके प्रोत्साहन ढांचे में हो सकती है।

9.6 सहभागिता ही सबसे बड़ा लक्ष्य क्यों बनी?

सोशल मीडिया कंपनियों का व्यवसाय काफी हद तक उपयोगकर्ता का ध्यान बनाए रखने पर निर्भर करता है। उपयोगकर्ता जितनी देर मंच पर रहेगा— उतनी अधिक सामग्री देखेगा, अधिक विज्ञापन देख सकता है, अधिक डेटा संकेत उत्पन्न करेगा, और मंच के लिए उसका आर्थिक मूल्य बढ़ सकता है। इसलिए अनुशंसा प्रणाली का एक प्रमुख लक्ष्य उपयोगकर्ता को ऐसी सामग्री दिखाना होता है जिसके साथ उसके जुड़ने की संभावना अधिक हो। यहीं एक कठिन प्रश्न पैदा होता है—

दोनों आवश्यक रूप से समान नहीं हैं।

9.7 फिल्टर बबल — क्या हम केवल अपने जैसे विचार देखने लगते हैं?

सोशल मीडिया बहस में Filter Bubble—सूचना बुलबुला सबसे चर्चित अवधारणाओं में से एक है। इसका अर्थ है ऐसी परिस्थिति जिसमें उपयोगकर्ता को धीरे-धीरे उसी प्रकार की सामग्री अधिक दिखाई देने लगे जो उसकी पहले से मौजूद रुचियों और विचारों से मेल खाती है। यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक विचार वाली सामग्री पर लगातार प्रतिक्रिया करता है तो प्रणाली उसके सामने उसी प्रकार की और सामग्री ला सकती है। इससे व्यक्ति को यह भ्रम हो सकता है कि— “लगभग सभी लोग मेरे जैसा ही सोचते हैं।” इसी से जुड़ी दूसरी अवधारणा है—

इसमें व्यक्ति समान विचार वाले लोगों और स्रोतों के बीच रहता है और वही विचार बार-बार मजबूत होता जाता है। लेकिन यहां शोध का एक महत्वपूर्ण सावधान निष्कर्ष आवश्यक है—

9.8 शोध क्या कहता है? परिणाम एक जैसे नहीं हैं

एल्गोरिद्म और राजनीतिक विचारों के संबंध पर शोध के परिणाम मिश्रित हैं। 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान फेसबुक और इंस्टाग्राम उपयोगकर्ताओं पर किए गए बड़े प्रयोग में कुछ प्रतिभागियों को एल्गोरिद्मिक फ़ीड के बजाय कालक्रम के अनुसार सामग्री दिखाई गई। इससे उन्होंने किस प्रकार की सामग्री देखी, उसमें बड़ा परिवर्तन आया और मंच पर उनकी सहभागिता भी बदली। लेकिन अध्ययन अवधि में राजनीतिक ध्रुवीकरण या प्रमुख राजनीतिक विचारों पर स्पष्ट परिवर्तन नहीं मिला। (Science) यह निष्कर्ष महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह धारणा कमजोर पड़ती है कि एल्गोरिद्म बदलते ही लोगों के राजनीतिक विचार तुरंत बदल जाते हैं। लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। 2026 में प्रकाशित X के एक नियंत्रित क्षेत्रीय प्रयोग में अलग परिणाम सामने आए। 2023 में सात सप्ताह तक कुछ अमेरिकी उपयोगकर्ताओं को X की एल्गोरिद्मिक फ़ीड और कुछ को कालक्रमानुसार फ़ीड दिखाने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि एल्गोरिद्मिक व्यवस्था ने सामग्री के प्रकार को बदला और अध्ययन में कुछ राजनीतिक मुद्दों पर प्रतिभागियों के विचार अपेक्षाकृत रूढ़िवादी दिशा में खिसके। हालांकि दलगत पहचान और भावनात्मक ध्रुवीकरण पर वैसा स्पष्ट प्रभाव नहीं पाया गया। (Nature) इन दोनों अध्ययनों को साथ पढ़ने पर अधिक संतुलित निष्कर्ष निकलता है—

9.9 एल्गोरिद्म मत नहीं, सूचना-परिवेश बदल सकता है

इसलिए “एल्गोरिद्म लोगों का दिमाग नियंत्रित कर देता है” कहना वैज्ञानिक रूप से अतिशयोक्ति होगी। अधिक सटीक बात यह है— एल्गोरिद्म यह प्रभावित कर सकता है कि व्यक्ति किन सूचनाओं से कितनी बार संपर्क में आए। और लगातार सूचना-संपर्क आगे चलकर— मुद्दों की प्राथमिकता, राजनीतिक व्यक्तियों की छवि, समाचार स्रोतों के चयन, समूहों के प्रति धारणा, और कुछ परिस्थितियों में राजनीतिक विचार— को प्रभावित कर सकता है। यह प्रक्रिया प्रत्यक्ष आदेश की तरह नहीं होती। व्यक्ति को कोई स्क्रीन यह नहीं कहती— “अब आपको यह विचार मानना है।” इसके बजाय उसका सूचना-परिवेश धीरे-धीरे बदल सकता है। यही एल्गोरिद्मिक प्रभाव की वास्तविक शक्ति है।

9.10 छोटे संकेतों से बड़ा व्यक्तिगत चित्र

अनुशंसा प्रणालियों की दूसरी विशेषता है कि वे बड़ी संख्या में छोटे व्यवहारिक संकेतों को एक साथ पढ़ सकती हैं। मान लीजिए किसी उपयोगकर्ता ने— किसी राजनीतिक भाषण का वीडियो पूरा देखा, दूसरे नेता का वीडियो तुरंत बंद किया, एक पोस्ट साझा की, किसी खास विषय को खोजा, और एक विशिष्ट खाते को अनुसरण करना शुरू किया। इनमें से प्रत्येक गतिविधि अकेले बहुत अर्थपूर्ण न हो। लेकिन लाखों व्यवहारिक संकेतों का संयोजन उपयोगकर्ता की संभावित रुचियों का विस्तृत अनुमान तैयार कर सकता है। यहीं सामान्य प्रचार से सूक्ष्म लक्ष्यीकरण की दिशा खुलती है। अब सभी मतदाताओं को एक ही संदेश देना आवश्यक नहीं। अलग-अलग समूहों को उनके संभावित भय, रुचि, क्षेत्र, भाषा या राजनीतिक प्राथमिकता के अनुसार अलग संदेश दिखाए जा सकते हैं। यह विषय आगे चुनाव और सोशल मीडिया के अध्याय में विस्तार से आएगा।

9.11 बॉट नेटवर्क और एल्गोरिद्म का मेल

जनमत प्रभावित करने का एक और तरीका है—कृत्रिम लोकप्रियता पैदा करना। संगठित नेटवर्क या स्वचालित खाते किसी पोस्ट को बड़ी संख्या में साझा, पसंद या टिप्पणी कर सकते हैं। यदि मंच की प्रणाली शुरुआती तेजी को वास्तविक लोकप्रियता समझ ले, तो वह सामग्री को और उपयोगकर्ताओं तक पहुंचा सकती है। इस प्रकार प्रारंभिक कृत्रिम गतिविधि आगे वास्तविक दृश्यता पैदा कर सकती है। यहीं बॉट नेटवर्क, ट्रोल नेटवर्क और एल्गोरिद्मिक प्रसार का संयोजन सूचना युद्ध के लिए खतरनाक हो जाता है।

9.12 ट्रेंड वास्तव में जनमत है या केवल गतिविधि?

सोशल मीडिया पर “ट्रेंड” को अक्सर जनमत का संकेत समझ लिया जाता है। लेकिन दोनों एक नहीं हैं। किसी हैशटैग का ट्रेंड होना यह साबित नहीं करता कि देश की बहुसंख्यक जनता उसी मुद्दे को लेकर सक्रिय है। ट्रेंड प्रभावित हो सकता है— कम समय में बड़ी संख्या में पोस्टों से, संगठित अभियान से, प्रभावशाली खातों से, भौगोलिक गतिविधि से, या मंच के अपने निर्धारण नियमों से। इसलिए सोशल मीडिया की लोकप्रियता को सीधे सार्वजनिक मत का वैज्ञानिक सर्वेक्षण समझना खतरनाक हो सकता है।

9.13 एल्गोरिद्मिक पक्षपात हमेशा राजनीतिक षड्यंत्र नहीं

एक और सावधानी आवश्यक है। यदि किसी मंच पर एक प्रकार की सामग्री दूसरी सामग्री से अधिक दिखाई देती है, तो हर बार यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कंपनी ने जानबूझकर वैचारिक पक्षपात किया। अंतर कई कारणों से पैदा हो सकता है— उपयोगकर्ताओं की पसंद, किस समूह द्वारा कितनी सामग्री बनाई गई, किस सामग्री पर अधिक प्रतिक्रिया आई, अनुसरण किए गए खातों की संरचना, और स्वयं अनुशंसा प्रणाली की बनावट। लेकिन यदि परिणाम लगातार किसी विशेष दिशा में झुकता है तो सार्वजनिक हित में उसका अध्ययन और पारदर्शिता आवश्यक हो जाती है। 2026 में प्रकाशित X संबंधी अध्ययन में एल्गोरिद्मिक फ़ीड में रूढ़िवादी राजनीतिक सामग्री और राजनीतिक कार्यकर्ता खातों की अधिक उपस्थिति तथा पारंपरिक समाचार माध्यमों की अपेक्षाकृत कम उपस्थिति पाई गई। शोध ने इसे वास्तविक उपयोगकर्ताओं के राजनीतिक दृष्टिकोण में कुछ मापनीय परिवर्तनों से भी जोड़ा। (Nature) इसलिए एल्गोरिद्मिक पक्षपात की जांच आरोप के आधार पर नहीं बल्कि आंकड़ों और स्वतंत्र परीक्षण के आधार पर होनी चाहिए।

9.14 एल्गोरिद्म की सबसे बड़ी समस्या — अस्पष्टता

आम उपयोगकर्ता नहीं जानता कि कोई वीडियो उसके सामने क्यों आया। निर्माता नहीं जानता कि एक वीडियो दस लाख लोगों तक क्यों पहुंचा और दूसरा दस हजार तक भी क्यों नहीं पहुंचा। शोधकर्ता अक्सर पूरी प्रणाली के भीतर नहीं देख सकते। और सरकार भी मंच के तकनीकी रहस्यों तक असीमित पहुंच नहीं रखती। यह अस्पष्टता जवाबदेही की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। यूरोपीय संघ ने इसी कारण डिजिटल सेवा अधिनियम में अनुशंसा प्रणालियों के मुख्य मानकों की जानकारी देने, बड़े मंचों के प्रणालीगत जोखिमों का आकलन करने और जोखिम कम करने के उपाय करने जैसी जिम्मेदारियां निर्धारित की हैं। (Eur-Lex) यहां उद्देश्य सरकार को एल्गोरिद्म लिखने की शक्ति देना नहीं है। उद्देश्य है—

9.15 उपयोगकर्ता को विकल्प मिलना चाहिए?

एल्गोरिद्मिक शक्ति पर नियंत्रण का एक तरीका यह हो सकता है कि उपयोगकर्ता को अधिक विकल्प दिए जाएं। उदाहरण के लिए— कालक्रम के अनुसार फ़ीड, व्यक्तिगत अनुशंसा बंद करने का विकल्प, विशिष्ट विषय कम या अधिक देखने की सुविधा, और यह जानने की व्यवस्था कि सामग्री क्यों सुझाई गई। टिकटॉक ने उपयोगकर्ताओं को अपनी “For You” अनुशंसाओं को नया आरंभ देने तथा कुछ विषयों की अनुशंसा आवृत्ति नियंत्रित करने जैसी सुविधाएं दी हैं। (टिकटॉक Newsroom) यह महत्वपूर्ण सिद्धांत की ओर संकेत करता है—

9.16 भारत के सामने विशेष चुनौती

भारत में यह प्रश्न और जटिल है। यहां विशाल जनसंख्या, अनेक भाषाएं, धार्मिक-सामाजिक विविधता, तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और तेजी से बढ़ता डिजिटल उपभोग—सभी एक साथ मौजूद हैं। किसी गलत सूचना या उत्तेजक वीडियो का प्रभाव केवल ऑनलाइन बहस तक सीमित नहीं रह सकता। उसका असर वास्तविक दुनिया में— सामाजिक तनाव, साम्प्रदायिक अफवाह, चुनावी धारणा, किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, और कभी-कभी कानून-व्यवस्था— तक पहुंच सकता है। इसीलिए भारत में एल्गोरिद्मिक जवाबदेही केवल तकनीकी कंपनियों और उपभोक्ताओं के बीच का प्रश्न नहीं है। यह लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न है।

9.17 समाधान क्या हो?

एल्गोरिद्म पर पूर्ण सरकारी नियंत्रण समाधान नहीं हो सकता। इससे इंटरनेट की स्वतंत्रता और राजनीतिक अभिव्यक्ति पर गंभीर खतरा पैदा होगा। दूसरी ओर पूर्ण कॉरपोरेट गोपनीयता भी स्वीकार्य नहीं हो सकती। संतुलित व्यवस्था में— अनुशंसा प्रणाली के मूल सिद्धांतों की पारदर्शिता, स्वतंत्र शोधकर्ताओं के लिए सुरक्षित आंकड़ा-अभिगम, राजनीतिक और चुनावी सामग्री पर अतिरिक्त पारदर्शिता, बॉट और संगठित कृत्रिम गतिविधि की पहचान, उपयोगकर्ता को अनुशंसा नियंत्रित करने के विकल्प, और बच्चों तथा संवेदनशील समूहों के लिए विशेष सुरक्षा— महत्वपूर्ण उपाय हो सकते हैं। सबसे आवश्यक बात यह है कि कानून विचारों को नियंत्रित करने के बजाय वितरण प्रणाली की जवाबदेही पर केंद्रित रहे।

9.18 निष्कर्ष

एल्गोरिद्म आधुनिक सोशल मीडिया का अदृश्य संपादक है—लेकिन उसे मनुष्य के विचारों का सर्वशक्तिमान नियंत्रक मानना गलत होगा। उसकी वास्तविक शक्ति अधिक सूक्ष्म और इसी कारण अधिक महत्वपूर्ण है। वह तय कर सकता है— कौन-सी सूचना दिखाई दे, कितनी बार दिखाई दे, किसके साथ दिखाई दे, किसे अत्यधिक प्रसार मिले, और कौन-सी सामग्री सूचना के विशाल समुद्र में लगभग अदृश्य रह जाए। शोध यह भी बताता है कि इसके राजनीतिक परिणाम सरल या एकसमान नहीं हैं। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर बड़े प्रयोगों में सूचना-संपर्क बदलने के बावजूद राजनीतिक दृष्टिकोण में तत्काल परिवर्तन नहीं मिला, जबकि X पर 2026 में प्रकाशित प्रयोग ने कुछ राजनीतिक विचारों पर मापनीय प्रभाव पाया। (Science) इसलिए सबसे सटीक निष्कर्ष यह है—

और जब यही व्यवस्था कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा बनाए गए नकली चित्र, आवाज और वीडियो के साथ जुड़ जाती है, तो चुनौती कई गुना बढ़ जाती है।