सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021–2026 — मंच की जवाबदेही, विवाद और बदलता नियामकीय ढांचा
भाग–2 : भारत का कानूनी ढांचा
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 ने भारत के डिजिटल शासन की बुनियादी कानूनी संरचना तैयार की, लेकिन सोशल मीडिया, ऑनलाइन समाचार, वीडियो मंच, डिजिटल मनोरंजन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तेजी से विस्तार ने केवल मूल अधिनियम के सहारे नियमन को कठिन बना दिया। इसी पृष्ठभूमि में Information Technology (मध्यस्थ Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 लागू किए गए। इन नियमों ने 2011 के पुराने मध्यस्थ guidelines को प्रतिस्थापित किया और पहली बार सोशल मीडिया intermediaries, महत्वपूर्ण सोशल मीडिया intermediaries, डिजिटल समाचार प्रकाशकों तथा ऑनलाइन क्यूरेटेड सामग्री के लिए अधिक विस्तृत जवाबदेही ढांचा बनाया। 2021 से 2026 के बीच इन नियमों में लगातार संशोधन हुए। शिकायत निवारण व्यवस्था मजबूत की गई, शिकायत अपीलीय समितिs बनाए गए, ऑनलाइन गेमिंग को जोड़ा गया, सरकारी व्यवसाय से संबंधित कथित गलत सूचना पर विवादास्पद तथ्य-जाँच इकाई व्यवस्था लाई गई, सामग्री हटाने प्रक्रिया में परिवर्तन हुआ और अंततः 2026 में कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा डीपफेक से निपटने के लिए कृत्रिम रूप से निर्मित सूचना—SGI को नियमों में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया। इस प्रकार सूचना प्रौद्योगिकी नियम भारत के डिजिटल नियमन के सबसे सक्रिय और विवादित उपकरणों में बदल गए। (MeitY)
5.1 सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 की आवश्यकता क्यों पड़ी?
2011 के मध्यस्थ guidelines उस इंटरनेट के लिए बने थे जिसमें सोशल मीडिया की शक्ति आज के स्तर तक नहीं पहुंची थी। अगले दस वर्षों में स्थिति तेजी से बदल गई। फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर, इंस्टाग्राम और WhatsApp करोड़ों भारतीय उपयोगकर्ताओं के दैनिक जीवन का हिस्सा बन गए। डिजिटल समाचार का प्रसार बढ़ा। OTT सेवाएं विकसित हुईं। ऑनलाइन वीडियो और वायरल सामग्री ने सामाजिक तथा राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करना शुरू किया। सरकार के सामने कई प्रश्न थे— मंच पर आपत्तिजनक या गैरकानूनी सामग्री की शिकायत कौन सुनेगा? किसी पीड़ित व्यक्ति को मंच के निर्णय के विरुद्ध उपचार कैसे मिलेगा? बड़े विदेशी मंच भारत में किस अधिकारी के माध्यम से जवाबदेह होंगे? सोशल मीडिया पर आपराधिक गतिविधियों की जांच में कंपनियां कितना सहयोग करेंगी? और सुरक्षित आश्रय प्राप्त करने के लिए मंच को कौन-सी न्यूनतम जिम्मेदारियां निभानी होंगी? सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 इन्हीं प्रश्नों का नियामकीय उत्तर थे।
5.2 साधारण और महत्वपूर्ण सामाजिक-माध्यम मध्यस्थ
2021 के नियमों ने सभी intermediaries पर कुछ सामान्य समुचित सावधानी obligations लगाए, लेकिन बहुत बड़े सोशल मीडिया मंचों के लिए अतिरिक्त जिम्मेदारियां निर्धारित कीं। इसके लिए महत्वपूर्ण सामाजिक-माध्यम मध्यस्थ—SSMI की श्रेणी बनाई गई। इसका उद्देश्य यह मान्यता देना था कि कुछ हजार उपयोगकर्ताओं वाला मंच और करोड़ों नागरिकों तक पहुंच रखने वाला मंच समान सामाजिक प्रभाव नहीं रखते। बड़े मंचों के पास अधिक संसाधन और अधिक प्रभाव दोनों होते हैं, इसलिए उनसे अधिक अनुपालन की अपेक्षा की गई। SSMI को भारत में प्रमुख अनुपालन अधिकारियों की नियुक्ति, शिकायत निवारण और अन्य अतिरिक्त दायित्वों का पालन करना पड़ता है। यह एक महत्वपूर्ण नीति परिवर्तन था—
5.3 समुचित सावधानी — सुरक्षित आश्रय की कीमत
सूचना प्रौद्योगिकी नियम का सबसे महत्वपूर्ण संबंध सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 से है। धारा 79 intermediaries को उपयोगकर्ताओं द्वारा डाली गई तृतीय पक्ष सामग्री के लिए कुछ परिस्थितियों में कानूनी सुरक्षा—सुरक्षित आश्रय—प्रदान करती है। लेकिन यह सुरक्षा स्वतः और बिना शर्त नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी नियम के तहत मध्यस्थ को निर्धारित समुचित सावधानी का पालन करना होता है। नियमों की वर्तमान संरचना यह स्पष्ट करती है कि इन दायित्वों का अनुपालन सुरक्षित आश्रय से सीधे जुड़ा हुआ है। यही व्यवस्था मंच नियमन का सबसे प्रभावी साधन बनती है। सरकार को हर सामग्री के लिए सीधे मंच को प्रकाशक घोषित करने की आवश्यकता नहीं होती। वह कह सकती है—
यही बिंदु आगे सुरक्षित आश्रय बनाम संपादकीय दायित्व की बहस का केंद्र बनेगा।
5.4 उपयोगकर्ता को नियम बताना और प्रतिबंधित सामग्री
नियम intermediaries से अपेक्षा करते हैं कि वे अपनी वेबसाइट या ऐप पर rules and regulations, privacy policy और user agreement स्पष्ट रूप से प्रकाशित करें और उपयोगकर्ताओं को ऐसी सामग्री से संबंधित सीमाओं की जानकारी दें जो कानून या मंच की शर्तों का उल्लंघन कर सकती है। 2022 के संशोधन ने इस व्यवस्था को और विस्तृत किया। मध्यस्थ को उपयोगकर्ता की पसंद की संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा में भी ऐसी जानकारी उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया। नियमों में अश्लील, बच्चों के लिए हानिकारक, गोपनीयता का उल्लंघन करने वाली, बौद्धिक संपदा अधिकारों का उल्लंघन करने वाली और अन्य कानून-विरोधी सामग्री की श्रेणियां शामिल की गईं। 2022 संशोधन में एक उल्लेखनीय प्रावधान यह भी जोड़ा गया कि मध्यस्थ नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 में प्राप्त अधिकारों का सम्मान करे। यह प्रावधान महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे मंच नियमन को केवल कंपनी और सरकार के संबंध तक सीमित न रखकर उपयोगकर्ता अधिकारों से जोड़ा गया।
5.5 शिकायत निवारण व्यवस्था
सूचना प्रौद्योगिकी नियम ने मध्यस्थ को Grievance Officer नियुक्त करने और उपयोगकर्ता शिकायतों के निपटारे की व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी दी। इसका उद्देश्य यह था कि यदि किसी व्यक्ति की सामग्री हटा दी जाए, उसका खाता प्रतिबंधित हो, उसकी शिकायत पर कार्रवाई न हो या उसके खिलाफ हानिकारक सामग्री प्रसारित हो रही हो तो उसे सीधे न्यायालय जाने से पहले मंच के भीतर उपचार मिल सके। 2022 संशोधन ने शिकायत स्वीकार करने और समाधान की समय-सीमा को अधिक स्पष्ट किया। उस समय सामान्य शिकायतों को 15 दिनों में निपटाने और कुछ प्रकार की removal complaints पर 72 घंटे के भीतर कार्रवाई का प्रावधान किया गया। 2026 में इन समय-सीमाओं को और कठोर बनाया गया। कुछ शिकायतों के समाधान के लिए सामान्य अवधि घटाई गई और विशिष्ट संवेदनशील मामलों के लिए अधिक तेज कार्रवाई निर्धारित की गई। उदाहरण के लिए संशोधित ढांचे में कुछ removal grievances के लिए 36 घंटे और गैर-सहमति वाले परिवर्तित अंतरंग चित्र जैसे विशेष मामलों में दो घंटे तक की त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था की गई।
5.6 शिकायत अपीलीय समिति — मंच के निर्णय पर अपील
2021 की मूल व्यवस्था की एक प्रमुख आलोचना थी कि शिकायत पर अंतिम निर्णय बड़ी हद तक स्वयं मंच के पास रहता था। 2022 में सरकार ने शिकायत अपीलीय समिति—GAC का प्रावधान जोड़ा। यदि उपयोगकर्ता Grievance Officer के निर्णय से असंतुष्ट हो तो वह निर्धारित अवधि में GAC के समक्ष अपील कर सकता है। नियमों ने पूरी अपील प्रक्रिया को ऑनलाइन dispute resolution mechanism के माध्यम से चलाने और लगभग 30 दिनों में निपटाने का लक्ष्य रखा। इस व्यवस्था का समर्थक तर्क था कि सामान्य उपयोगकर्ता के लिए हर सोशल मीडिया विवाद में High Court जाना व्यावहारिक नहीं है; इसलिए एक सुलभ अपीलीय मंच आवश्यक है। दूसरी ओर आलोचकों ने प्रश्न उठाया कि—
यहीं से उपयोगकर्ता अधिकार, मंच स्वायत्तता और सरकारी नियमन के बीच नया तनाव पैदा हुआ।
5.7 बड़े सोशल मीडिया मंचों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी
Significant Social Media Intermediaries पर सामान्य intermediaries की तुलना में अतिरिक्त दायित्व लगाए गए। इनमें भारत स्थित प्रमुख अनुपालन अधिकारी, nodal contact person और resident grievance officer जैसी नियुक्तियां शामिल थीं। इसके साथ periodic compliance reports और शिकायतों तथा कार्रवाई की जानकारी प्रकाशित करने की जिम्मेदारी भी दी गई। इसका मूल उद्देश्य स्पष्ट था—
यही व्यवस्था 2021 के दौरान सरकार और तत्कालीन ट्विटर के बीच हुए टकरावों में विशेष रूप से चर्चा में आई। उन विवादों को आगे भारत के Case Studies अध्याय में विस्तार से लिया जाएगा।
5.8 डिजिटल समाचार और OTT को भी दायरे में लाना
सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहे। इनमें digital news and current affairs publishers तथा online curated सामग्री—अर्थात OTT सेवाओं—के लिए भी Code of Ethics और grievance redressal mechanism बनाया गया। ऑनलाइन क्यूरेटेड सामग्री के लिए आयु वर्गीकरण, parental controls और सामग्री संबंधी अन्य जिम्मेदारियां निर्धारित की गईं। डिजिटल समाचार प्रकाशकों को भी शिकायत निवारण और नियामकीय ढांचे में शामिल किया गया। वर्तमान नियमों में Ministry of Information and Broadcasting की भूमिका तथा Inter-Departmental Committee की संरचना भी मौजूद है। (MeitY) इस हिस्से ने एक संवैधानिक प्रश्न खड़ा किया—
यही कारण है कि सूचना प्रौद्योगिकी नियम के विभिन्न हिस्सों को समय-समय पर न्यायालयों में चुनौती दी गई।
5.9 2023 संशोधन — ऑनलाइन गेमिंग और तथ्य-जाँच इकाई
अप्रैल 2023 में सूचना प्रौद्योगिकी नियम में एक और बड़ा संशोधन किया गया। इसमें ऑनलाइन गेमिंग से संबंधित नई परिभाषाएं और regulatory mechanism जोड़ा गया। लेकिन सबसे अधिक विवाद एक अलग प्रावधान को लेकर हुआ। संशोधन में केंद्र सरकार के व्यवसाय से संबंधित ऐसी सूचना पर व्यवस्था बनाई गई जिसे सरकार द्वारा अधिसूचित तथ्य-जाँच इकाई fake, false or misleading घोषित करे। आलोचकों का तर्क था कि सरकार स्वयं अपने बारे में प्रकाशित सूचना की सत्यता का निर्णायक बन जाएगी और intermediaries सुरक्षित आश्रय खोने के भय से ऐसी सामग्री हटाने लगेंगे। सरकार का तर्क था कि सरकारी योजनाओं और नीतियों से संबंधित संगठित गलत सूचना से निपटने के लिए व्यवस्था आवश्यक है। यह मामला Kunal Kamra v. Union of India सहित कई याचिकाओं के माध्यम से Bombay High Court पहुंचा। जनवरी 2024 में Division Bench ने विभाजित फैसला दिया। तीसरे न्यायाधीश की राय के बाद सितंबर 2024 में बहुमत से विवादित प्रावधान को असंवैधानिक माना गया। इससे पहले Supreme Court ने मार्च 2024 में तथ्य-जाँच इकाई की अधिसूचना के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी। केंद्र ने बाद में Bombay High Court के निर्णय को Supreme Court में चुनौती दी; मार्च 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने नोटिस जारी किया लेकिन High Court के निर्णय पर अंतरिम रोक नहीं लगाई। (Supreme Court Observer) यह विवाद भारतीय डिजिटल शासन के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों में से एक बन गया—
5.10 2025 — सामग्री हटाने प्रक्रिया पर नया जोर
2025 में Rule 3(1)(d) से संबंधित व्यवस्था में संशोधन किया गया। इसका उद्देश्य मध्यस्थ को गैरकानूनी सामग्री हटाने या उसकी पहुंच रोकने के लिए भेजे जाने वाले सरकारी निर्देशों की प्रक्रिया को अधिक औपचारिक बनाना था। इस क्षेत्र में मूल संवैधानिक प्रश्न Shreya Singhal निर्णय से जुड़ा है—किस परिस्थिति में मध्यस्थ को किसी सामग्री के गैरकानूनी होने की वास्तविक जानकारी मानी जाएगी और कौन-सी सरकारी अथवा न्यायिक प्रक्रिया उसके सुरक्षित आश्रय दायित्व को सक्रिय करेगी। 2025–26 में यह मुद्दा Sahyog Portal और सरकारी सामग्री हटाने requests के संदर्भ में फिर न्यायिक विवाद का विषय बना। इससे एक बात स्पष्ट है— भारत की डिजिटल व्यवस्था केवल यह नहीं तय कर रही कि क्या हटाया जाए, बल्कि अब यह भी महत्वपूर्ण है कि कौन आदेश देगा, किस कानूनी आधार पर देगा और उस आदेश की समीक्षा कैसे होगी।
5.11 2026 — Deepfake और कृत्रिम रूप से निर्मित सूचना
10 फरवरी 2026 को सूचना प्रौद्योगिकी नियम में अत्यंत महत्वपूर्ण संशोधन अधिसूचित किया गया, जो 20 फरवरी 2026 से प्रभावी हुआ। इसने कृत्रिम रूप से निर्मित सूचना—SGI को नियमों में स्पष्ट नियामकीय श्रेणी के रूप में शामिल किया। MeitY ने इसका कारण कृत्रिम बुद्धिमत्ता और machine learning की तीव्र प्रगति तथा अत्यंत वास्तविक दिखाई देने वाले deepfake audio, images और videos से पैदा होने वाले जोखिमों को बताया। यह भारत के डिजिटल नियमन में निर्णायक बदलाव था। पहले नियम मुख्यतः मनुष्यों द्वारा अपलोड की गई सामग्री और मध्यस्थ की प्रतिक्रिया पर केंद्रित थे। अब नियमन उस युग में प्रवेश कर गया जिसमें सामग्री स्वयं कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित हो सकती है।
5.12 SGI के लिए नई समुचित सावधानी
2026 संशोधन ने उन intermediaries के लिए विशेष दायित्व बनाए जो synthetic सामग्री बनाने, बदलने, प्रकाशित करने या प्रसारित करने की सुविधा देते हैं। इनमें— अवैध synthetic सामग्री रोकने के लिए reasonable technical measures, कुछ उच्च-जोखिम वाले SGI की रोकथाम, अनुमत synthetic सामग्री पर labeling, metadata अथवा identifier जैसी provenance व्यवस्था, और ऐसे संकेतों को हटाने या बदलने से रोकने के safeguards— जैसे उपाय शामिल किए गए। Significant Social Media Intermediaries के लिए दायित्व और अधिक कठोर किए गए। नियमों ने SGI के संबंध में declaration तथा technical verification जैसी जिम्मेदारियों को भी जोड़ा। इस प्रकार भारत ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता-generated सामग्री की समस्या को केवल voluntary मंच policy पर छोड़ने के बजाय उसे मध्यस्थ समुचित सावधानी के भीतर शामिल करना शुरू किया।
5.13 सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन — कृत्रिम बुद्धिमत्ता moderation सुरक्षित आश्रय के विरुद्ध नहीं
2026 संशोधन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह है कि नियमों के अनुपालन के लिए मध्यस्थ द्वारा automated tools या अन्य तकनीकी उपायों से सामग्री हटाने अथवा उसकी पहुंच सीमित करने को अपने आप धारा 79 की उस शर्त का उल्लंघन नहीं माना जाएगा जो मध्यस्थ की निष्पक्ष तकनीकी भूमिका से जुड़ी है। इसका महत्व बहुत बड़ा है। पुराना प्रश्न था—
2026 का ढांचा संकेत देता है कि कानून का पालन करने के लिए technical moderation स्वयं सुरक्षित आश्रय खत्म करने का कारण नहीं होना चाहिए। यही विषय आगे संपादकीय दायित्व अध्याय में विशेष महत्व रखेगा।
5.14 सरकार का दृष्टिकोण
सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी नियम के विकास को मुख्यतः खुला, सुरक्षित, विश्वसनीय और जवाबदेह इंटरनेट की नीति से जोड़ा है। उसका तर्क है कि इंटरनेट की स्वतंत्रता तभी टिकाऊ हो सकती है जब उपयोगकर्ता— धोखाधड़ी, बच्चों के शोषण, गैर-सहमति वाली अंतरंग सामग्री, impersonation, deepfake, संगठित दुष्प्रचार और अन्य गैरकानूनी सामग्री— से प्रभावी सुरक्षा प्राप्त कर सकें। 2026 संशोधन के आधिकारिक स्पष्टीकरण में deepfake, identity fraud, misinformation, गैर-सहमति वाली अंतरंग सामग्री और राष्ट्रीय अखंडता से संबंधित जोखिमों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया।
5.15 आलोचना — क्या राज्य की शक्ति बहुत अधिक बढ़ रही है?
सूचना प्रौद्योगिकी नियम के आलोचकों की चिंता अलग है। उनका कहना है कि मध्यस्थ यदि सुरक्षित आश्रय खोने के भय से काम करेगा तो वह विवादास्पद सामग्री को कानूनी परीक्षण से पहले ही हटाने की प्रवृत्ति अपना सकता है। इसे Over-compliance या Collateral Censorship की समस्या कहा जा सकता है। मंच के सामने व्यावसायिक गणना सरल हो सकती है— संदिग्ध सामग्री को बनाए रखकर कानूनी जोखिम लेने के बजाय उसे हटा देना अधिक सुरक्षित है। लेकिन यही व्यवहार वैध राजनीतिक आलोचना, व्यंग्य, पत्रकारिता या असहमति की सामग्री को भी प्रभावित कर सकता है। तथ्य-जाँच इकाई विवाद ने इसी चिंता को सबसे स्पष्ट रूप से सामने रखा।
5.16 उपयोगकर्ता, मंच और राज्य — तीनों के अधिकार
सूचना प्रौद्योगिकी नियम की बहस को केवल सरकार बनाम सोशल मीडिया कंपनी के रूप में देखना अधूरा होगा। इसके तीन पक्ष हैं— राज्य — जिसे कानून लागू करना और नागरिकों की सुरक्षा करनी है। मंच — जिसे अरबों पोस्ट के बीच कानून, अपनी नीतियों और तकनीकी व्यवहार्यता का संतुलन बनाना है। उपयोगकर्ता — जिसके पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, गोपनीयता, प्रतिष्ठा और उपचार पाने के अधिकार हैं। सही डिजिटल शासन वही होगा जिसमें इन तीनों में से किसी एक को पूर्ण और असीमित शक्ति न मिले।
5.17 2021 से 2026 — नियमों की विकास यात्रा
इन पांच वर्षों की यात्रा को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है— 2021: सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के लिए विस्तृत समुचित सावधानी तथा grievance framework। 2022: उपयोगकर्ता अधिकारों और शिकायत निवारण को मजबूत करना तथा शिकायत अपीलीय समितिs का निर्माण। 2023: ऑनलाइन गेमिंग और सरकारी व्यवसाय से संबंधित तथ्य-जाँच इकाई का विवादास्पद प्रावधान। 2024: तथ्य-जाँच इकाई मामले में संवैधानिक न्यायिक हस्तक्षेप और Bombay High Court का महत्वपूर्ण निर्णय। (Supreme Court Observer) 2025: सरकारी सामग्री हटाने communications और Rule 3(1)(d) की प्रक्रिया में परिवर्तन। 2026: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, deepfake और कृत्रिम रूप से निर्मित सूचना के लिए नया समुचित सावधानी framework। यह विकास दिखाता है कि डिजिटल कानून अब स्थिर कानून नहीं रह सकता। तकनीक बदलने के साथ नियमन भी लगातार बदल रहा है।
5.18 निष्कर्ष
सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021–2026 भारत के डिजिटल शासन में एक बुनियादी परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 का मूल मॉडल अपेक्षाकृत सरल था—मध्यस्थ को निर्धारित परिस्थितियों में सुरक्षित आश्रय दिया जाए। सूचना प्रौद्योगिकी नियम ने उसमें दूसरा तत्व जोड़ा—
मंच को शिकायत सुननी होगी। सरकारी और न्यायिक आदेशों पर कार्रवाई करनी होगी। बड़े मंचों को भारत में जवाबदेह अधिकारी रखने होंगे। उपयोगकर्ताओं को अपील की व्यवस्था देनी होगी। और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनी सामग्री की पहचान तथा नियंत्रण के लिए तकनीकी उपाय भी अपनाने होंगे। लेकिन इसी के साथ एक संवैधानिक चेतावनी भी उभरी है। यदि जवाबदेही का ढांचा अस्पष्ट हो, सरकारी आदेशों पर पर्याप्त safeguards न हों या मंच को सुरक्षित आश्रय खोने का अत्यधिक भय हो, तो नियमन अभिव्यक्ति पर अप्रत्यक्ष दबाव पैदा कर सकता है। इसलिए सूचना प्रौद्योगिकी नियम की वास्तविक परीक्षा केवल यह नहीं है कि वे कितनी सामग्री हटवा सकते हैं। उनकी वास्तविक कसौटी है—
यही प्रश्न भारत के अगले प्रस्तावित बड़े डिजिटल कानून की आवश्यकता को जन्म देता है।