पंजाब संकट की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — 1947 से 1980 तक
1984 के सिख-विरोधी नरसंहार और उससे पहले पंजाब में पैदा हुए उग्र संकट को समझने के लिए इतिहास को केवल ऑपरेशन ब्लू स्टार या जरनैल सिंह भिंडरांवाले से शुरू करना पर्याप्त नहीं है। पंजाब की राजनीतिक अस्थिरता, सिख समुदाय के भीतर असुरक्षा और पहचान की राजनीति, अकाली दल और कांग्रेस के बीच प्रतिस्पर्धा तथा केंद्र और पंजाब के बीच बढ़ते अविश्वास की जड़ें स्वतंत्रता और विभाजन के समय तक जाती हैं।
1947 से 1980 के बीच पंजाब ने भारत के शायद किसी भी दूसरे बड़े राज्य की तुलना में अधिक गहरे राजनीतिक, भौगोलिक, भाषायी, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन देखे। पहले विभाजन ने ऐतिहासिक पंजाब को दो हिस्सों में बांट दिया। फिर शरणार्थियों का विशाल आवागमन हुआ। उसके बाद भाषा के आधार पर पंजाबी सूबे की मांग उठी। 1966 में पंजाब का पुनर्गठन हुआ, लेकिन चंडीगढ़, नदी जल और पंजाबी भाषी क्षेत्रों जैसे विवाद पीछे रह गए। इसी बीच हरित क्रांति ने पंजाब को समृद्ध बनाया, पर उसके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव समान नहीं रहे। अकाली राजनीति ने संघीय अधिकारों और सिख पहचान के प्रश्नों को अधिक मुखरता से उठाया और 1973 का आनंदपुर साहिब प्रस्ताव इस विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक दस्तावेज बन गया।
इसलिए 1980 के दशक के पंजाब संकट को अचानक उत्पन्न हुआ धार्मिक संघर्ष मानना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देना होगा। इसके पीछे धर्म अवश्य था, लेकिन उतने ही महत्वपूर्ण तत्व भाषा, प्रादेशिक पुनर्गठन, संघवाद, कृषि अर्थव्यवस्था, नदी जल, चंडीगढ़, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और केंद्र-राज्य सत्ता संघर्ष थे।
1. 1947 : पंजाब का विभाजन और सामूहिक आघात
ब्रिटिश भारत का पंजाब आज के भारतीय पंजाब से कहीं बड़ा था। उसमें वर्तमान भारतीय पंजाब के साथ हरियाणा, हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्से और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का विशाल भूभाग शामिल था।
1947 में भारत के विभाजन ने पंजाब को सीधे काट दिया।
लाहौर, रावलपिंडी, मुल्तान, लायलपुर—आज का फैसलाबाद—और पश्चिम पंजाब के अनेक क्षेत्र पाकिस्तान में चले गए। अमृतसर, जालंधर, लुधियाना और पूर्वी पंजाब भारत में रहे।
इस विभाजन का सबसे भयावह पक्ष जनसंख्या का सामूहिक विस्थापन और हिंसा थी। पश्चिम पंजाब से बड़ी संख्या में हिंदू और सिख भारत आए, जबकि पूर्वी पंजाब से मुसलमान पाकिस्तान गए। रास्ते में काफिलों और रेलगाड़ियों पर हमले हुए, गांव उजड़े और हजारों परिवारों ने अपनी जमीन, संपत्ति और रिश्तेदार खोए।
पंजाब के सिखों के लिए विभाजन का अनुभव विशेष रूप से गहरा था।
सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव का जन्मस्थान ननकाना साहिब पाकिस्तान में चला गया। करतारपुर सहित अनेक ऐतिहासिक गुरुद्वारे और सिख इतिहास से जुड़े स्थान सीमा के दूसरी ओर रह गए। पश्चिम पंजाब में सिखों की विशाल कृषि भूमि भी छूट गई।
विभाजन के बाद भारत में बसे सिखों के लिए भारतीय पंजाब केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं रहा; वह उनके राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक भविष्य का मुख्य केंद्र बन गया।
यहीं से स्वतंत्र भारत में सिख राजनीतिक पहचान के प्रश्न को नया संदर्भ मिला।
2. विभाजन के बाद पूर्वी पंजाब
1947 के बाद भारत के हिस्से में आए पूर्वी पंजाब की सामाजिक संरचना तेजी से बदली। पाकिस्तान से आए हिंदू और सिख शरणार्थियों को बसाना तत्कालीन सरकार की सबसे बड़ी चुनौतियों में था।
विभाजन के कारण भारतीय पंजाब में मुसलमान आबादी का अनुपात तेजी से घटा और हिंदू-सिख राजनीतिक संबंध अधिक महत्वपूर्ण हो गए।
1950 में लागू भारतीय संविधान ने सिखों को पूर्ण नागरिक और धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की, लेकिन अकाली नेतृत्व के एक हिस्से में यह चिंता बनी रही कि स्वतंत्र भारत की राजनीतिक व्यवस्था में सिखों की विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को पर्याप्त संवैधानिक मान्यता मिलेगी या नहीं।
संविधान के अनुच्छेद 25 की व्याख्या में हिंदुओं के संदर्भ में सिख, जैन और बौद्ध समुदायों का उल्लेख भी आगे चलकर कुछ सिख संगठनों की शिकायत का विषय बना।
हालांकि यह कहना गलत होगा कि स्वतंत्रता के तत्काल बाद सिख समुदाय और भारतीय राज्य के बीच कोई स्थायी टकराव स्थापित हो गया था। सिख सेना, प्रशासन, कृषि, व्यापार और राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा रहे थे। समस्या मुख्यतः राजनीतिक प्रतिनिधित्व, भाषा और प्रादेशिक व्यवस्था को लेकर विकसित हुई।
3. भाषा का प्रश्न
स्वतंत्र भारत में राज्यों के भाषायी पुनर्गठन की मांग पूरे देश में उठी।
1953 में आंध्र राज्य के निर्माण और 1956 के States Reorganisation Act के बाद भाषायी राज्यों का सिद्धांत भारतीय संघीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बन गया।
पंजाब में प्रश्न था—क्या पंजाबी भाषा के आधार पर अलग पंजाबी भाषी राज्य बनाया जाए?
शिरोमणि अकाली दल ने पंजाबी सूबा की मांग उठाई।
अकाली नेतृत्व का तर्क था कि यदि तेलुगु, तमिल, कन्नड़ और मलयालम जैसी भाषाओं के आधार पर राज्य बनाए जा सकते हैं तो पंजाबी भाषियों को भी समान अधिकार मिलना चाहिए।
लेकिन पंजाब में भाषा का प्रश्न शीघ्र ही धार्मिक पहचान से जुड़ गया।
4. पंजाबी बनाम हिंदी : भाषा और धर्म का जटिल संबंध
पंजाबी की अपनी भाषा और गुरमुखी लिपि थी। सिख धार्मिक ग्रंथों और परंपरा में गुरमुखी का विशेष महत्व था। अकाली दल ने पंजाबी भाषा और गुरमुखी लिपि को पंजाबी सूबा आंदोलन का केंद्रीय आधार बनाया।
दूसरी ओर पंजाब के अनेक हिंदुओं ने जनगणना में अपनी मातृभाषा हिंदी दर्ज कराई।
यही वह बिंदु था जहां भाषा और धर्म की सीमाएं आपस में उलझ गईं।
सभी पंजाबी भाषी सिख नहीं थे और सभी हिंदू हिंदी भाषी भी नहीं थे। पंजाब के बहुत से हिंदू परिवार दैनिक जीवन में पंजाबी बोलते थे। इसके बावजूद राजनीतिक वातावरण ऐसा बना कि मातृभाषा की घोषणा भी कई बार धार्मिक और राजनीतिक पक्षधरता का संकेत समझी जाने लगी।
इससे पंजाबी सूबा आंदोलन को उसके विरोधियों ने केवल भाषायी मांग नहीं, बल्कि सिख बहुल राज्य बनाने की परियोजना के रूप में देखना शुरू किया।
अकाली नेतृत्व इस व्याख्या का विरोध करता रहा।
उसका कहना था कि पंजाबी सूबा धर्म के आधार पर नहीं बल्कि भाषा के आधार पर मांगा जा रहा है।
यह विवाद आने वाले दशकों में पंजाब की राजनीति पर गहरा प्रभाव डालने वाला था।
5. पंजाबी सूबा आंदोलन
1950 और 1960 के दशक में पंजाबी सूबा आंदोलन अकाली राजनीति का मुख्य मुद्दा बन गया।
मास्टर तारा सिंह इस आंदोलन के सबसे प्रमुख नेताओं में थे। बाद में संत फतेह सिंह ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आंदोलन में धरने, प्रदर्शन, सत्याग्रह और गिरफ्तारियां हुईं। हजारों अकाली कार्यकर्ताओं ने गिरफ्तारी दी।
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पंजाबी सूबा की मांग को लेकर आशंकित थे। केंद्र को भय था कि भाषायी मांग के पीछे धार्मिक राज्य की अवधारणा विकसित हो सकती है।
1956 के राज्यों के पुनर्गठन में पंजाब को अपेक्षित रूप से विभाजित नहीं किया गया। इसके बजाय पंजाब और पटियाला एंड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन—PEPSU—को मिलाकर बड़ा पंजाब बनाया गया।
अकाली दल इससे संतुष्ट नहीं हुआ।
पंजाबी सूबा आंदोलन चलता रहा।
6. मास्टर तारा सिंह से संत फतेह सिंह तक
अकाली राजनीति में इस अवधि में नेतृत्व का परिवर्तन भी महत्वपूर्ण था।
मास्टर तारा सिंह लंबे समय तक सिख राजनीति के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में रहे। लेकिन पंजाबी सूबा आंदोलन अपेक्षित परिणाम न दे पाने के कारण उनकी राजनीतिक स्थिति कमजोर होने लगी।
संत फतेह सिंह धीरे-धीरे अधिक प्रभावशाली बने।
उन्होंने पंजाबी सूबे की मांग को स्पष्ट रूप से भाषायी आधार पर प्रस्तुत करने की कोशिश की और यह रेखांकित किया कि मांग किसी स्वतंत्र सिख राष्ट्र की नहीं बल्कि भारतीय संघ के भीतर पंजाबी भाषी राज्य की है।
1960 के दशक के मध्य तक राष्ट्रीय परिस्थितियां भी बदल चुकी थीं।
1964 में नेहरू का निधन हुआ। 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ। युद्ध में पंजाब सीमावर्ती क्षेत्र था और सिख सैनिकों तथा पंजाब के नागरिकों की भूमिका ने उन आशंकाओं को कमजोर किया जिनमें पंजाबी सूबा आंदोलन को राष्ट्रीय निष्ठा के प्रश्न से जोड़ा जाता था।
अंततः केंद्र सरकार पंजाब के पुनर्गठन के लिए तैयार हुई।
7. 1966 : पंजाब का पुनर्गठन
Punjab Reorganisation Act, 1966 पंजाब के आधुनिक इतिहास का निर्णायक मोड़ था।
1 नवंबर 1966 से पुराने पंजाब का पुनर्गठन हुआ।
पंजाबी भाषी क्षेत्र नए पंजाब में रहे। हिंदी भाषी क्षेत्रों से हरियाणा बना। पर्वतीय क्षेत्रों का एक हिस्सा हिमाचल प्रदेश में शामिल किया गया।
इस पुनर्गठन के बाद पंजाब सिख बहुल राज्य बन गया।
पंजाबी सूबा आंदोलन की मुख्य मांग पूरी हुई, लेकिन समाधान के साथ नए विवाद पैदा हुए।
इनमें तीन विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे—
चंडीगढ़ का प्रश्न, सीमावर्ती पंजाबी भाषी क्षेत्रों का प्रश्न और नदी जल का बंटवारा।
यही तीन मुद्दे आने वाले वर्षों में अकाली राजनीति और केंद्र-पंजाब संबंधों में बार-बार लौटे।
8. चंडीगढ़ विवाद
विभाजन के बाद पंजाब की ऐतिहासिक राजधानी लाहौर पाकिस्तान में चली गई थी। इसलिए स्वतंत्र भारत में पंजाब के लिए चंडीगढ़ का निर्माण किया गया।
1966 में पंजाब से हरियाणा अलग हुआ तो दोनों राज्यों ने चंडीगढ़ पर दावा किया।
अंततः चंडीगढ़ को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया और पंजाब तथा हरियाणा दोनों की राजधानी रखा गया।
लेकिन अकाली दल की मांग थी कि चंडीगढ़ पंजाब को दिया जाए।
केंद्र की ओर से समय-समय पर चंडीगढ़ पंजाब को हस्तांतरित करने की बात सामने आई, लेकिन इसके साथ हरियाणा को क्षेत्रीय समायोजन देने का प्रश्न जुड़ता गया और विवाद स्थायी रूप से हल नहीं हो पाया।
इससे पंजाब में यह धारणा मजबूत होती गई कि पुनर्गठन के बावजूद राज्य को उसका पूरा अधिकार नहीं मिला।
9. सीमावर्ती क्षेत्रों का विवाद
पुनर्गठन के समय भाषा के आधार पर गांवों और क्षेत्रों का निर्धारण सरल नहीं था।
अकाली दल का दावा था कि कुछ पंजाबी भाषी क्षेत्र हरियाणा में चले गए हैं और उन्हें पंजाब में शामिल किया जाना चाहिए।
हरियाणा इस दावे का विरोध करता था।
चंडीगढ़ और क्षेत्रीय दावों को अक्सर एक-दूसरे से जोड़कर देखा गया। परिणामस्वरूप दोनों राज्यों के बीच सीमा और राजधानी का प्रश्न राजनीतिक सौदेबाजी का विषय बना रहा।
10. नदी जल विवाद
पंजाब संकट की राजनीतिक पृष्ठभूमि में नदी जल विवाद अत्यंत महत्वपूर्ण था।
पंजाब की कृषि अर्थव्यवस्था सतलुज, ब्यास और रावी जैसी नदियों पर निर्भर थी। 1966 के पुनर्गठन के बाद इन नदियों के पानी के वितरण का प्रश्न पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच विवाद का विषय बना।
पंजाब में यह धारणा विकसित हुई कि राज्य के जल संसाधनों का बड़ा हिस्सा अन्य राज्यों को दिया जा रहा है जबकि पंजाब को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर पर्याप्त अधिकार नहीं है।
अकाली दल ने इसे केवल कृषि नीति नहीं बल्कि संघीय अधिकारों के प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया।
आगे चलकर सतलुज-यमुना लिंक नहर—SYL—इसी विवाद का सबसे विस्फोटक प्रतीक बनी।
यह विवाद 1980 के दशक में पंजाब आंदोलन की प्रमुख मांगों में शामिल होने वाला था।
11. हरित क्रांति : समृद्धि का नया पंजाब
1960 के दशक के उत्तरार्ध में पंजाब भारत की हरित क्रांति का केंद्र बना।
उच्च उत्पादकता वाले बीज, सिंचाई, रासायनिक उर्वरक, कृषि मशीनरी और सरकारी खरीद व्यवस्था के कारण गेहूं और चावल के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।
पंजाब भारत की खाद्य सुरक्षा का आधार बन गया।
किसानों की आय बढ़ी। ट्रैक्टर, ट्यूबवेल और आधुनिक कृषि उपकरण गांवों तक पहुंचे। ग्रामीण जीवन में परिवर्तन आया।
लेकिन हरित क्रांति के लाभ समान रूप से वितरित नहीं हुए।
बड़े और मध्यम किसान अपेक्षाकृत अधिक लाभान्वित हुए। भूमिहीन मजदूरों और छोटे किसानों की स्थिति उतनी तेजी से नहीं बदली। कृषि मशीनरी के विस्तार ने ग्रामीण रोजगार की प्रकृति बदली।
इसके अतिरिक्त खेती की बढ़ती लागत, भूमि का सीमित आकार और युवाओं के लिए गैर-कृषि रोजगार की कमी धीरे-धीरे नई असंतुष्टियां पैदा करने लगी।
1970 के दशक के अंत तक पंजाब आर्थिक रूप से भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में था, लेकिन समृद्धि के नीचे सामाजिक तनाव भी मौजूद थे।
12. अकाली दल की राजनीतिक दुविधा
1966 में पंजाबी सूबा बनने के बाद यह अपेक्षा थी कि अकाली दल पंजाब की स्वाभाविक सत्ताधारी पार्टी बन जाएगा।
ऐसा लगातार नहीं हुआ।
सिख समुदाय स्वयं जाति, वर्ग, क्षेत्र और राजनीतिक विचारधारा के आधार पर विविध था। पंजाब में हिंदू मतदाताओं की भी बड़ी संख्या थी। कांग्रेस का व्यापक सामाजिक आधार था।
इस कारण अकाली दल को विधानसभा में स्थायी बहुमत हासिल करने में कठिनाई होती रही।
1967 और 1969 में अकाली नेतृत्व वाली गठबंधन सरकारें बनीं, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता बनी रही।
1972 के पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भारी सफलता हासिल की और ज्ञानी जैल सिंह मुख्यमंत्री बने।
यह चुनाव अकाली दल के लिए गंभीर राजनीतिक झटका था।
इसके बाद अकाली नेतृत्व ने अपनी राजनीतिक दिशा और मांगों पर पुनर्विचार शुरू किया।
इसी प्रक्रिया से आनंदपुर साहिब प्रस्ताव निकला।
13. आनंदपुर साहिब प्रस्ताव की पृष्ठभूमि
1972 की चुनावी हार के बाद अकाली दल ने अपनी राजनीतिक और वैचारिक रणनीति को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास किया।
एक समिति गठित की गई जिसने पंजाब और सिख समुदाय से संबंधित राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक मांगों का प्रारूप तैयार किया।
1973 में आनंदपुर साहिब में अकाली दल की बैठक में इसे स्वीकार किया गया। बाद में 1978 में लुधियाना में हुए अकाली सम्मेलन में इसके विस्तृत स्वरूप को अनुमोदन मिला।
यह दस्तावेज इतिहास में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
आने वाले वर्षों में शायद ही कोई दूसरा राजनीतिक दस्तावेज पंजाब विवाद में इतना विवादास्पद बना।
14. आनंदपुर साहिब प्रस्ताव वास्तव में क्या चाहता था?
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को लेकर दो बिल्कुल विपरीत व्याख्याएं विकसित हुईं।
अकाली दल का कहना था कि उसका उद्देश्य भारतीय संघ के भीतर वास्तविक संघवाद स्थापित करना और राज्यों को अधिक अधिकार देना था।
इसके आलोचकों ने इसे सिख स्वायत्तता और अंततः अलगाववाद की दिशा में बढ़ता दस्तावेज बताया।
वास्तविक दस्तावेज को देखने पर तस्वीर अधिक जटिल दिखाई देती है।
प्रस्ताव में केंद्र के अधिकार मुख्यतः रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा जैसे विषयों तक सीमित करने तथा शेष अधिकार राज्यों को देने की व्यापक संघीय अवधारणा सामने रखी गई।
यह अत्यधिक विकेंद्रीकृत भारतीय संघ की मांग थी।
आज के भारतीय संविधान की संघीय संरचना की तुलना में यह निश्चित रूप से राज्यों को कहीं अधिक शक्तियां देने वाला मॉडल था।
लेकिन इसे सीधे “खालिस्तान की मांग” कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव ने स्वतंत्र खालिस्तान की स्पष्ट मांग नहीं की थी।
यही भेद पूरे घटनाक्रम में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
15. सिख पहचान का प्रश्न
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव केवल केंद्र-राज्य संबंधों का दस्तावेज नहीं था।
इसमें सिखों की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को भी प्रमुखता दी गई।
अकाली दल स्वयं केवल सामान्य क्षेत्रीय पार्टी नहीं था। उसका ऐतिहासिक संबंध गुरुद्वारा सुधार आंदोलन और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी—SGPC—से था।
इसलिए उसकी राजनीति में धर्म और राजनीति की सीमाएं अन्य सामान्य प्रादेशिक दलों की तुलना में अधिक जटिल थीं।
सिख धार्मिक संस्थाओं की रक्षा, गुरुद्वारों का प्रबंधन, पंजाबी भाषा, सिख पहचान और पंजाब के राजनीतिक अधिकार एक-दूसरे से जुड़े हुए मुद्दे बनते गए।
यही संरचना बाद में उग्र धार्मिक नेतृत्व के उदय के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हुई।
16. क्या आनंदपुर साहिब प्रस्ताव अलगाववादी था?
इस प्रश्न पर अत्यधिक सावधानी आवश्यक है।
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को उसके आलोचक भारत की एकता के लिए खतरा बताते रहे। दूसरी ओर अकाली दल इसे संघीय पुनर्गठन का दस्तावेज बताता रहा।
दस्तावेज में राज्यों के लिए जिस स्तर की स्वायत्तता की मांग की गई थी, वह भारतीय संघ की मौजूदा संरचना से बहुत आगे जाती थी।
लेकिन राज्यों के लिए व्यापक स्वायत्तता की मांग और भारत से अलग स्वतंत्र राष्ट्र की मांग एक ही बात नहीं हैं।
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव में स्वतंत्र खालिस्तान की स्पष्ट मांग नहीं थी।
बाद में पंजाब में उग्रवाद बढ़ने पर इस प्रस्ताव के कुछ अंशों को अलगाववादी राजनीति के साथ जोड़कर देखा जाने लगा। इससे मूल प्रस्ताव और बाद के खालिस्तानी आंदोलन के बीच अंतर कई बार धुंधला हो गया।
ऐतिहासिक अध्ययन में दोनों को अलग रखना आवश्यक है।
17. 1975 का आपातकाल और अकाली प्रतिरोध
25 जून 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आंतरिक आपातकाल लागू किया।
अधिकांश विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए।
अकाली दल उन राजनीतिक शक्तियों में था जिसने आपातकाल का संगठित विरोध किया।
अकाली नेतृत्व ने अमृतसर से लोकतंत्र बचाओ मोर्चा शुरू किया। बड़ी संख्या में अकाली कार्यकर्ताओं ने सत्याग्रह किया और गिरफ्तारियां दीं।
इस आंदोलन ने अकाली राजनीति में एक नया आत्मविश्वास पैदा किया।
अब उसकी लड़ाई केवल पंजाब या सिख मांगों तक सीमित नहीं दिखाई देती थी; वह केंद्र की सत्ता के विरुद्ध लोकतांत्रिक प्रतिरोध का हिस्सा भी थी।
लेकिन इससे इंदिरा गांधी और अकाली नेतृत्व के बीच राजनीतिक अविश्वास और गहरा हुआ।
18. 1977 : अकाली दल की सत्ता में वापसी
1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद हुए आम चुनाव में कांग्रेस को भारी पराजय मिली।
पंजाब में भी राजनीतिक परिवर्तन हुआ।
अकाली दल ने जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई और प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री बने।
केंद्र में मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार थी।
यह समय केंद्र-पंजाब संबंधों में तनाव कम करने का अवसर हो सकता था।
लेकिन आनंदपुर साहिब प्रस्ताव की मांगें, चंडीगढ़, नदी जल और राज्य अधिकार जैसे प्रश्न बने रहे।
अकाली दल के भीतर भी नेतृत्व और रणनीति को लेकर मतभेद मौजूद थे।
इसी दौर में पंजाब के धार्मिक क्षेत्र में एक नया नाम तेजी से उभरने लगा—
संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले।
19. दमदमी टकसाल और भिंडरांवाले का उदय
दमदमी टकसाल सिख धार्मिक शिक्षा से जुड़ी पुरानी संस्था थी।
1977 में संत करतार सिंह की मृत्यु के बाद जरनैल सिंह भिंडरांवाले इसके प्रमुख बने।
शुरुआती दौर में उनका मुख्य संदेश धार्मिक पुनरुत्थान से जुड़ा था।
वे सिख युवाओं से अमृत धारण करने, केश रखने, शराब और नशीले पदार्थों से दूर रहने तथा धार्मिक अनुशासन अपनाने की अपील करते थे।
उनकी भाषा सीधी, ग्रामीण और प्रभावशाली थी।
विशेष रूप से ग्रामीण सिख युवाओं में उनका प्रभाव बढ़ने लगा।
लेकिन कुछ ही वर्षों में उनका धार्मिक प्रचार राजनीतिक विवादों से जुड़ गया।
20. 13 अप्रैल 1978 : निरंकारी-सिख संघर्ष
13 अप्रैल 1978 की अमृतसर घटना पंजाब संकट के इतिहास का निर्णायक मोड़ थी।
उस दिन संत निरंकारी मिशन का सम्मेलन अमृतसर में हो रहा था। कुछ कट्टरपंथी सिख समूहों ने इसका विरोध किया।
टकराव हुआ और हिंसा में 13 सिख मारे गए। निरंकारी पक्ष से भी लोगों की मृत्यु हुई।
यह घटना सिख धार्मिक राजनीति में गहरी प्रतिक्रिया का कारण बनी।
मारे गए सिखों को अनेक धार्मिक समूहों ने शहीद के रूप में प्रस्तुत किया। भिंडरांवाले और उनके समर्थकों ने निरंकारियों के खिलाफ अत्यंत आक्रामक रुख अपनाया।
यहां से पंजाब में धार्मिक मतभेद धीरे-धीरे हिंसक राजनीति से जुड़ने लगे।
1980 में निरंकारी प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह की दिल्ली में हत्या ने इस तनाव को और गंभीर बना दिया।
21. कांग्रेस और अकाली राजनीति की प्रतिस्पर्धा
पंजाब संकट के सबसे विवादास्पद प्रश्नों में से एक यह है कि भिंडरांवाले के शुरुआती राजनीतिक उत्थान में कांग्रेस की क्या भूमिका थी।
कई पत्रकारों, राजनीतिक नेताओं और बाद के लेखकों ने आरोप लगाया कि पंजाब कांग्रेस के कुछ नेताओं ने अकाली दल के धार्मिक-राजनीतिक आधार को विभाजित करने के लिए भिंडरांवाले जैसे धार्मिक प्रचारकों को अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन दिया।
इस संदर्भ में ज्ञानी जैल सिंह और संजय गांधी के नाम बार-बार लिए गए हैं।
लेकिन यहां स्रोत-सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
यह कहना कि “कांग्रेस ने भिंडरांवाले को बनाया” एक व्यापक राजनीतिक दावा है। इसके विभिन्न पहलुओं के लिए प्रमाणों की शक्ति समान नहीं है। राजनीतिक संपर्क, चुनावी रणनीति, अप्रत्यक्ष समर्थन और बाद के उग्रवाद की जिम्मेदारी—ये चार अलग-अलग प्रश्न हैं।
इन अलग घटनाक्रमों को एक-दूसरे में नहीं मिलाया जा सकता।
22. 1980 : इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी
जनता पार्टी सरकार के पतन के बाद जनवरी 1980 में इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनीं।
पंजाब में भी कांग्रेस सत्ता में लौटी और दरबारा सिंह मुख्यमंत्री बने।
अब केंद्र और पंजाब दोनों में कांग्रेस की सरकार थी।
सतह पर इससे प्रशासनिक समन्वय आसान होना चाहिए था।
लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत विकसित हुई।
अकाली दल सत्ता से बाहर था और अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, चंडीगढ़, नदी जल तथा अन्य मांगों को अधिक जोर से उठाने लगा।
दूसरी ओर भिंडरांवाले का प्रभाव बढ़ रहा था।
धार्मिक मुद्दे और राजनीतिक मांगें धीरे-धीरे एक-दूसरे के निकट आने लगीं।
23. अकाली दल और उग्र धार्मिक नेतृत्व के बीच प्रतिस्पर्धा
यहां पंजाब की राजनीति में एक नया अंतर्विरोध पैदा हुआ।
अकाली दल सिख राजनीति का परंपरागत प्रतिनिधि था। SGPC और गुरुद्वारा राजनीति पर उसका मजबूत प्रभाव था।
लेकिन भिंडरांवाले जैसे धार्मिक नेता अकाली नेतृत्व को पर्याप्त रूप से दृढ़ न होने के लिए चुनौती देने लगे।
अकाली नेताओं के सामने कठिन परिस्थिति थी।
यदि वे अधिक उदार रुख अपनाते तो धार्मिक रूप से कट्टर समूह उन्हें कमजोर बता सकते थे।
यदि वे अधिक कठोर मांगें उठाते तो केंद्र उन्हें सांप्रदायिक अथवा अलगाववादी राजनीति का आरोप लगा सकता था।
यह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा 1980 के दशक में अत्यंत गंभीर परिणाम देने वाली थी।
24. धर्म, क्षेत्र और संघवाद का त्रिकोण
1947 से 1980 के पंजाब को समझने का सबसे उपयोगी तरीका तीन परस्पर जुड़ी धाराओं को देखना है—
पहली — सिख धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान।
दूसरी — पंजाब के क्षेत्रीय और आर्थिक हित।
तीसरी — भारतीय संघ में राज्यों के अधिकारों का प्रश्न।
समस्या यह हुई कि राजनीतिक संघर्ष में ये तीनों मुद्दे धीरे-धीरे एक-दूसरे में मिलते गए।
चंडीगढ़ मूलतः क्षेत्रीय विवाद था।
नदी जल मूलतः संसाधन और संघवाद का प्रश्न था।
पंजाबी भाषा सांस्कृतिक और भाषायी प्रश्न थी।
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव मुख्यतः राज्य स्वायत्तता और सिख राजनीतिक-सांस्कृतिक आकांक्षाओं का मिश्रित दस्तावेज था।
लेकिन राजनीतिक विमर्श में इन सभी को कई बार एक व्यापक “सिख प्रश्न” के रूप में प्रस्तुत किया गया।
इससे समाधान और कठिन होता गया।
25. क्या 1947 से ही 1984 की दिशा तय थी?
बिल्कुल नहीं।
इतिहास को पीछे से देखकर यह मान लेना आसान है कि विभाजन से शुरू हुई घटनाएं अनिवार्य रूप से 1984 तक पहुंचने वाली थीं।
ऐसा कोई ऐतिहासिक अनिवार्य क्रम नहीं था।
1966 का पुनर्गठन कई विवादों को हल कर सकता था।
चंडीगढ़ का स्थायी समाधान संभव था।
नदी जल विवाद राजनीतिक समझौते से संभाला जा सकता था।
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पर संवैधानिक और संघीय संवाद संभव था।
अकाली दल और केंद्र के बीच राजनीतिक समझौते के अनेक अवसर आए।
धार्मिक कट्टरता को हिंसक उग्रवाद में बदलने से पहले रोकने के अवसर भी मौजूद थे।
इसलिए 1984 को 1947 की अनिवार्य परिणति कहना गलत होगा।
अधिक सही निष्कर्ष यह है कि दशकों से जमा समस्याओं के साथ 1970 के दशक के उत्तरार्ध और 1980 के दशक की राजनीतिक रणनीतियां, नेतृत्व की गलतियां, हिंसक घटनाएं और प्रशासनिक विफलताएं जुड़ती चली गईं।
26. 1947–1980 : संक्षिप्त समयरेखा
1947 — भारत विभाजन; ऐतिहासिक पंजाब भारत और पाकिस्तान में विभाजित; व्यापक सांप्रदायिक हिंसा और विस्थापन।
1950 का दशक — पंजाबी भाषा और पंजाबी सूबे की मांग राजनीतिक मुद्दा बनी।
1956 — राज्यों के पुनर्गठन के बावजूद पंजाबी सूबा नहीं बना; PEPSU का पंजाब में विलय।
1960–61 — पंजाबी सूबा आंदोलन तेज; अकाली सत्याग्रह और गिरफ्तारियां।
1965 — भारत-पाक युद्ध; पंजाब सीमावर्ती युद्धक्षेत्र।
1966 — Punjab Reorganisation Act; पंजाब, हरियाणा और संबंधित पर्वतीय क्षेत्रों का पुनर्गठन; चंडीगढ़ केंद्रशासित प्रदेश और दोनों राज्यों की राजधानी बना।
1967–69 — पंजाब में गठबंधन राजनीति और अकाली नेतृत्व वाली सरकारें।
1960 के दशक का उत्तरार्ध — हरित क्रांति का विस्तार।
1972 — पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बड़ी जीत; अकाली दल को गंभीर पराजय।
1973 — आनंदपुर साहिब प्रस्ताव स्वीकार।
1975–77 — आपातकाल; अकाली दल का संगठित विरोध और गिरफ्तारियां।
1977 — अकाली-जनता गठबंधन सरकार; प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री।
1977 — जरनैल सिंह भिंडरांवाले दमदमी टकसाल के प्रमुख बने।
13 अप्रैल 1978 — अमृतसर में निरंकारी-सिख संघर्ष; 13 सिखों सहित कई लोगों की मृत्यु।
1978 — लुधियाना अकाली सम्मेलन में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के विस्तृत राजनीतिक कार्यक्रम की पुष्टि।
1980 — इंदिरा गांधी केंद्र में सत्ता में वापस।
1980 — पंजाब में कांग्रेस सरकार; दरबारा सिंह मुख्यमंत्री।
24 अप्रैल 1980 — निरंकारी प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह की दिल्ली में हत्या।
यहीं तक आते-आते पंजाब का संकट अपनी अगली और अधिक खतरनाक अवस्था में प्रवेश करने लगा था।
निष्कर्ष : संकट की जमीन तैयार हो चुकी थी, विस्फोट अभी बाकी था
1947 से 1980 के बीच पंजाब की कहानी केवल सिख असंतोष की कहानी नहीं है।
यह विभाजन के आघात, भाषायी पुनर्गठन, भारतीय संघवाद के विकास, क्षेत्रीय आकांक्षाओं, धार्मिक पहचान, कृषि परिवर्तन और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की संयुक्त कहानी है।
पंजाबी सूबा अंततः बना, लेकिन चंडीगढ़ का प्रश्न नहीं सुलझा।
हरित क्रांति आई, लेकिन नई आर्थिक और सामाजिक असमानताएं भी पैदा हुईं।
अकाली दल को राजनीतिक आधार मिला, लेकिन स्थायी सत्ता नहीं मिली।
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव आया, लेकिन उस पर गंभीर संघीय संवाद के बजाय उसकी अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं अधिक प्रभावशाली होती गईं।
आपातकाल ने केंद्र और अकाली नेतृत्व के बीच अविश्वास बढ़ाया।
1978 की निरंकारी-सिख हिंसा ने धार्मिक तनाव को रक्तपात से जोड़ दिया।
और इसी वातावरण में जरनैल सिंह भिंडरांवाले का उदय हुआ।
1980 तक पंजाब अभी पूर्ण आतंकवाद की गिरफ्त में नहीं था। खालिस्तानी हिंसा भी उस स्तर तक नहीं पहुंची थी जो कुछ वर्षों बाद दिखाई दी। लेकिन राजनीतिक समझौते की जगह लगातार सिकुड़ रही थी और हिंसक धार्मिक राजनीति के लिए जगह बढ़ रही थी।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस चरण तक पंजाब की अनेक मांगें भारतीय संघीय व्यवस्था के भीतर समाधान खोज रही थीं। आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को स्वतंत्र खालिस्तान की मांग के बराबर रख देना उस ऐतिहासिक अंतर को मिटा देता है जो आगे की घटनाओं को समझने के लिए आवश्यक है।
1981 के बाद परिस्थितियां तेजी से बदलने वाली थीं।
हत्याओं की श्रृंखला शुरू हुई। लाला जगत नारायण की हत्या हुई। भिंडरांवाले की गिरफ्तारी और रिहाई ने उनके प्रभाव को और बढ़ाया। अकाली दल ने धर्म युद्ध मोर्चा शुरू किया। पुलिस अधिकारियों, पत्रकारों, हिंदू नागरिकों, निरंकारियों और भिंडरांवाले के सिख विरोधियों को निशाना बनाया जाने लगा। स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारबंद उग्रवादियों की उपस्थिति बढ़ी और अंततः केंद्र सरकार तथा उग्रवादी नेतृत्व के बीच संघर्ष उस बिंदु पर पहुंच गया जहां जून 1984 में भारतीय सेना को ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए भेजा गया।