भूमिका — 31 अक्टूबर 1984 के बाद भारत के इतिहास के सबसे काले दिनों में से एक
31 अक्टूबर 1984 की सुबह भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके दो सिख सुरक्षाकर्मियों—बेअंत सिंह और सतवंत सिंह—द्वारा हत्या कर दी गई। यह हत्या ऑपरेशन ब्लू स्टार के लगभग पांच महीने बाद हुई थी और उसने पहले से तनावग्रस्त देश को गहरे सदमे में डाल दिया। लेकिन प्रधानमंत्री की हत्या से पैदा हुआ राष्ट्रीय शोक कुछ ही घंटों में एक ऐसे सामूहिक हिंसक दौर में बदल गया, जिसका निशाना हत्यारे नहीं, बल्कि उनकी धार्मिक पहचान के कारण हजारों सामान्य सिख नागरिक बने।
दिल्ली में 31 अक्टूबर की दोपहर से सिखों पर हमलों की शुरुआती घटनाएं सामने आने लगीं। 1 और 2 नवंबर को हिंसा ने भयावह रूप धारण कर लिया। घरों और दुकानों की पहचान की गई, संपत्तियां लूटी और जलाई गईं, गुरुद्वारों पर हमले हुए, सिख पुरुषों को भीड़ ने घरों और वाहनों से बाहर निकाला और बड़ी संख्या में उनकी हत्या की गई। अनेक स्थानों पर लोगों को पीटने के बाद जिंदा जलाया गया। महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग अपने परिवार के सदस्यों की हत्या देखते रहे और हजारों लोगों को घर छोड़कर राहत शिविरों अथवा सुरक्षित स्थानों में शरण लेनी पड़ी।
न्यायमूर्ति जी.टी. नानावती आयोग ने बाद में इन घटनाओं को सिख समुदाय और सभ्य समाज के लिए एक दुःस्वप्न के रूप में वर्णित किया। आयोग के अनुसार अहूजा समिति ने 31 अक्टूबर से 7 नवंबर 1984 के बीच अकेले दिल्ली में 2,733 सिखों की मृत्यु निर्धारित की थी। सिख संगठनों ने यह संख्या तीन हजार से अधिक बताई, लेकिन नानावती आयोग ने उपलब्ध निश्चित साक्ष्य के अभाव में 2,733 के आधिकारिक आंकड़े को मोटे तौर पर सही माना। आयोग ने यह भी दर्ज किया कि सबसे अधिक मौतें 1 और 2 नवंबर को हुईं।
यह संख्या केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं है। इसके पीछे 2,733 अलग-अलग जीवन, परिवार और त्रासदियां थीं। दिल्ली के त्रिलोकपुरी, कल्याणपुरी, मंगोलपुरी, सुल्तानपुरी, पालम, नांगलोई और अनेक अन्य इलाकों में हिंसा ने पूरे परिवारों को उजाड़ दिया। त्रिलोकपुरी के ब्लॉक 32 और 36 की घटनाएं इस हिंसा की भयावहता का प्रतीक बन गईं। नानावती आयोग ने दर्ज किया कि वहां बड़े पैमाने पर हत्याएं हुईं और ऐसा प्रतीत होता है कि इन ब्लॉकों के लगभग सभी सिख पुरुषों को मार दिया गया था। पुलिस रिकॉर्ड में संबंधित क्षेत्र में 154 मौतें थीं, जबकि अहूजा समिति ने लगभग 610 मौतों का अनुमान लगाया। आयोग ने पुलिस रिकॉर्ड को अविश्वसनीय माना और कहा कि सभी मौतों को दर्ज करने का प्रयास ही नहीं किया गया था।
यही अंतर 1984 की त्रासदी को समझने की पहली बड़ी चुनौती सामने रखता है—जो हुआ, उसका पूरा सरकारी रिकॉर्ड भी तत्काल और विश्वसनीय तरीके से तैयार नहीं हुआ।
हत्या और सामूहिक दंड के बीच की रेखा
इंदिरा गांधी की हत्या एक आपराधिक और राजनीतिक हत्या थी। उसके आरोपी विशिष्ट व्यक्ति थे। लेकिन इसके बाद जो हुआ उसमें हजारों ऐसे सिखों को निशाना बनाया गया जिनका प्रधानमंत्री की हत्या से कोई संबंध नहीं था।
यही तथ्य 1984 की घटनाओं की ऐतिहासिक और नैतिक प्रकृति को निर्धारित करता है।
एक प्रधानमंत्री की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या को धीरे-धीरे पूरे सिख समुदाय के विरुद्ध प्रतिशोध का आधार बना दिया गया। लोगों की पहचान उनके अपराध से नहीं, उनकी पगड़ी, केश, नाम, घर, दुकान और धार्मिक पहचान से होने लगी। सार्वजनिक और निजी वाहनों में सिख यात्रियों की तलाश, सिख घरों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को चुनकर निशाना बनाने तथा गुरुद्वारों पर हमले के विवरण अनेक जांचों और अदालती अभिलेखों में सामने आए।
नानावती आयोग के अनुसार 31 अक्टूबर को प्रधानमंत्री पर हमला लगभग 9:20 बजे हुआ। उन्हें एम्स ले जाया गया। उनकी स्थिति जानने के लिए बड़ी संख्या में लोग वहां जमा होने लगे। दोपहर में उनकी मृत्यु की खबर फैलने के बाद भीड़ में आक्रोश बढ़ा और लगभग दो बजे के बाद बसों से सिख यात्रियों को उतारकर उनके साथ मारपीट की घटनाएं शुरू हुईं। शाम तक हिंसा की प्रकृति अधिक गंभीर होती चली गई।
इसलिए 1984 को समझने के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि इंदिरा गांधी की हत्या हुई और उसके बाद दंगे भड़क गए। शोध का वास्तविक प्रश्न यह है कि राष्ट्रीय शोक सामुदायिक प्रतिशोध में कैसे बदला, हिंसा इतनी तेजी से कैसे फैली और राज्य की संस्थाएं उसे रोकने में क्यों विफल रहीं?
क्या यह स्वतःस्फूर्त दंगा था?
1984 पर चार दशकों से चली आ रही बहस का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है।
क्या हजारों लोगों की भीड़ प्रधानमंत्री की हत्या से उत्पन्न आक्रोश में स्वतः सड़कों पर उतर आई थी? या शुरुआती स्वतःस्फूर्त घटनाओं के बाद हिंसा को संगठित दिशा दी गई? क्या राजनीतिक व्यक्तियों ने भीड़ को उकसाया? क्या सिखों के घरों और प्रतिष्ठानों की पहचान योजनाबद्ध तरीके से की गई? क्या हमलावरों को साधन उपलब्ध कराए गए? पुलिस निष्क्रिय क्यों रही? और सेना उपलब्ध होने के बावजूद प्रभावी सैन्य हस्तक्षेप में विलंब क्यों हुआ?
इन प्रश्नों के उत्तर एक वाक्य में नहीं दिए जा सकते।
आरोप, आयोग की टिप्पणी, प्रत्यक्षदर्शी बयान, पुलिस रिकॉर्ड और न्यायालय द्वारा सिद्ध अपराध को अलग-अलग श्रेणियों में पढ़ना आवश्यक है।
न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र आयोग और न्यायमूर्ति नानावती आयोग के निष्कर्ष भी हर बिंदु पर समान नहीं थे। नानावती आयोग ने अपनी रिपोर्ट में मिश्र आयोग के निष्कर्षों का सार देते हुए लिखा कि मिश्र आयोग ने 31 अक्टूबर की शुरुआती घटनाओं को प्रधानमंत्री की हत्या से उत्पन्न शोक, पीड़ा और हत्यारों के प्रति आक्रोश की अनैच्छिक प्रतिक्रिया माना था, जो बाद में असामाजिक तत्वों की भागीदारी और पुलिस की निष्क्रियता के कारण हिंसक गतिविधि में बदल गई। मिश्र आयोग ने कांग्रेस(I) को एक पार्टी के रूप में हिंसा में शामिल मानने से इनकार किया, लेकिन माना कि कांग्रेस से जुड़े कुछ व्यक्तियों ने अपनी ओर से हिंसा में भाग लिया था। उसने पुलिस की उदासीनता, लापरवाही और कुछ मामलों में मिलीभगत अथवा भागीदारी की बात भी दर्ज की।
बाद की जांचों, मुकदमों और न्यायिक फैसलों ने इस तस्वीर में और परतें जोड़ीं।
2018 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने सज्जन कुमार से संबंधित मामले में 1984 की हिंसा की चर्चा करते हुए कहा कि बड़ी संख्या में अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिला और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की उदासीनता ने उन्हें लंबे समय तक अभियोजन और दंड से बचने में सहायता की। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अनेक आयोगों और समितियों के बाद कुछ मामलों की जांच 2005 में सीबीआई तक पहुंची—घटनाओं के लगभग 21 वर्ष बाद।
इस प्रकार 1984 का इतिहास केवल चार दिनों की हिंसा का इतिहास नहीं है। यह हिंसा और उसके बाद संस्थागत प्रतिक्रिया—दोनों का इतिहास है।
पुलिस की भूमिका : विफलता, निष्क्रियता और गंभीर आरोप
किसी भी सामूहिक हिंसा में राज्य की सबसे पहली जिम्मेदारी नागरिकों की रक्षा करना होती है। इसलिए 1984 का मूल्यांकन करते समय दिल्ली पुलिस की भूमिका केंद्रीय प्रश्न बन जाती है।
नानावती आयोग में आए प्रमाणों से अलग-अलग इलाकों में पुलिस की भूमिका एक जैसी नहीं दिखाई देती। कुछ स्थानों पर पुलिस द्वारा प्रभावी कार्रवाई के उदाहरण भी दर्ज हैं। उदाहरण के लिए आयोग ने सिविल लाइंस क्षेत्र में पुलिस की कार्रवाई को तत्पर और प्रभावी माना।
लेकिन अनेक सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में तस्वीर बिल्कुल अलग थी।
मिश्र आयोग के बारे में नानावती रिपोर्ट का सार बताता है कि पुलिस के उदासीन अथवा लापरवाह रहने, कुछ मामलों में हिंसा से मिलीभगत करने या उसमें भाग लेने तथा वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा शहर में बन रही स्थिति का सही आकलन न कर पाने के निष्कर्ष सामने आए थे। दिल्ली प्रशासन द्वारा सेना बुलाने में देरी का प्रश्न भी उठाया गया, जबकि 31 अक्टूबर की मध्यरात्रि तक लगभग पांच हजार सैनिक उपलब्ध होने की बात रिपोर्ट में दर्ज है।
कुछ प्रत्यक्षदर्शी बयानों में आरोप इससे भी गंभीर थे—पुलिस द्वारा सहायता न देने, पीड़ितों को वापस घरों में जाने को कहने और हमलावरों को रोकने के बजाय निष्क्रिय रहने के।
यहां एक महत्वपूर्ण शोध-सावधानी आवश्यक है। प्रत्येक पुलिसकर्मी को एक ही श्रेणी में रखना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। जहां आयोग ने पुलिस अधिकारियों की निष्क्रियता अथवा कथित मिलीभगत दर्ज की है, वहां उसे उसी रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए; जहां पुलिस ने लोगों को बचाया या भीड़ पर कार्रवाई की, उसे भी रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
उपलब्ध साक्ष्यों को उनकी पूरी जटिलता के साथ सामने रखना आवश्यक है।
दिल्ली से बाहर भी फैली हिंसा
1984 की सिख-विरोधी हिंसा केवल दिल्ली तक सीमित नहीं थी।
कानपुर, बोकारो और देश के कई अन्य हिस्सों में सिख समुदाय पर हमले हुए। सरकारी जांच का दायरा भी बाद में दिल्ली के बाहर की घटनाओं तक पहुंचा। मिश्र आयोग के कार्यक्षेत्र में दिल्ली के साथ बोकारो, चास और कानपुर की घटनाएं शामिल थीं। बाद के न्यायिक अभिलेख भी स्पष्ट करते हैं कि हिंसा राष्ट्रीय राजधानी के बाहर हुई थी।
फिर भी दिल्ली इस त्रासदी का केंद्र बनी, क्योंकि सर्वाधिक व्यापक हत्याएं यहीं हुईं और देश की केंद्रीय सत्ता, गृह प्रशासन, पुलिस तथा सेना की उपलब्धता के बावजूद राजधानी में लगातार कई दिनों तक नागरिकों की हत्या होती रही।
यही तथ्य एक असहज प्रश्न खड़ा करता है—
भारत की राजधानी में हजारों नागरिकों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर मार दिया जाना कैसे संभव हुआ?
इस प्रश्न का उत्तर केवल भीड़ के व्यवहार में नहीं खोजा जा सकता। इसके लिए उस समय की प्रशासनिक कमान, पुलिस नियंत्रण व्यवस्था, राजनीतिक वातावरण, सेना बुलाने और तैनात करने की प्रक्रिया, प्राथमिकी दर्ज करने की स्थिति, अपराधियों की गिरफ्तारी और बाद में हुई जांच—सभी को देखना होगा।
‘दंगा’, ‘संगठित हिंसा’ या ‘नरसंहार’?
1984 की घटनाओं के लिए प्रयुक्त शब्दावली स्वयं एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और राजनीतिक विवाद है।
सरकारी अभिलेखों और अनेक न्यायिक दस्तावेजों में लंबे समय तक “1984 riots” अथवा “anti-Sikh riots” शब्द प्रयुक्त हुए। गृह मंत्रालय की वर्तमान आधिकारिक सामग्री में भी “1984 Anti-Sikh Riots” शब्दावली दिखाई देती है और उसी शीर्षक के अंतर्गत विशेष जांच दल, राहत-पुनर्वास तथा आयोगों की रिपोर्टें उपलब्ध कराई गई हैं।
लेकिन आधिकारिक जांच की शब्दावली में केवल “दंगा” ही नहीं मिलता। भारत सरकार द्वारा गठित मिश्र आयोग के कार्यादेश में दिल्ली में हुई घटनाओं के लिए “organized violence”, अर्थात “संगठित हिंसा”, की अभिव्यक्ति प्रयुक्त हुई थी। बाद के न्यायिक निर्णयों में भी इस शब्दावली का उल्लेख हुआ।
पीड़ित संगठनों, मानवाधिकार समूहों, इतिहासकारों और राजनीतिक विमर्श में “massacre”, “pogrom” और “genocide” जैसे शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं।
इन शब्दों का अर्थ समान नहीं है।
“दंगा” सामान्यतः दो या अधिक समूहों के बीच हिंसक टकराव का बोध कराता है। “नरसंहार” एक समुदाय के लोगों की बड़े पैमाने पर हत्या को रेखांकित करता है। “पोग्रोम” प्रायः किसी विशेष जातीय या धार्मिक समुदाय के विरुद्ध लक्षित सामूहिक हिंसा के लिए इस्तेमाल होता है। जबकि “genocide” यानी जनसंहार अंतरराष्ट्रीय कानून में एक विशिष्ट कानूनी अवधारणा है, जिसके लिए किसी राष्ट्रीय, जातीय, नस्ली या धार्मिक समूह को पूर्णतः अथवा आंशिक रूप से नष्ट करने की विशिष्ट मंशा सहित निर्धारित कृत्यों का प्रमाण आवश्यक होता है।
इन शब्दों को परस्पर पर्याय नहीं माना जा सकता।
जहां सरकारी दस्तावेज “दंगा” कहते हैं, वहां उस शब्दावली को बताया जाएगा। जहां आयोग “संगठित हिंसा” कहता है, वहां वही दर्ज होगा। जहां न्यायालय “crimes against humanity” जैसी अभिव्यक्ति इस्तेमाल करता है, उसे उसके न्यायिक संदर्भ में रखा जाएगा। और जहां किसी लेखक, संगठन अथवा पीड़ित पक्ष ने “genocide” कहा है, उसे उस स्रोत के मत के रूप में स्पष्ट किया जाएगा।
इससे शोध भावनात्मक शब्दावली के बजाय दस्तावेजी आधार पर खड़ा रहेगा।
चार दिन की हिंसा, चार दशक का न्याय-संघर्ष
1984 की सबसे असाधारण विशेषताओं में से एक हिंसा और न्याय के बीच का विशाल समय-अंतराल है।
हत्याएं कुछ दिनों में हुईं, लेकिन उनकी जांच और अभियोजन दशकों तक चलते रहे।
एफआईआर दर्ज न होने, कमजोर जांच, मामलों को बंद कर दिए जाने, गवाहों के बयान ठीक तरह से न लेने, आरोपियों की पहचान और अभियोजन में विफलता जैसे प्रश्न लगातार उठते रहे। परिणामस्वरूप एक के बाद दूसरी समिति और आयोग गठित हुए।
रंगनाथ मिश्र आयोग, कपूर-मित्तल समिति, जैन-बनर्जी समिति, आहूजा समिति, जैन-अग्रवाल समिति, नरूला समिति, नानावती आयोग, जी.पी. माथुर समिति और बाद में विशेष जांच दल—1984 की घटनाओं की जांच का इतिहास स्वयं इतना विस्तृत है कि वह इस अध्ययन का एक बड़ा हिस्सा बनेगा।
गृह मंत्रालय आज भी नानावती आयोग के दोनों खंड, रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट और जी.पी. माथुर समिति की रिपोर्ट आधिकारिक रूप से उपलब्ध कराता है। मंत्रालय की सूची में 1984 से संबंधित राहत और पुनर्वास योजनाएं तथा विशेष जांच दल के गठन से जुड़े आदेश भी मौजूद हैं।
2015 में गठित विशेष जांच दल को दिल्ली में 1984 से जुड़े उन गंभीर आपराधिक मामलों की दोबारा जांच करने का अधिकार दिया गया था जिन्हें बंद कर दिया गया था। उसे पुलिस थानों के रिकॉर्ड और पूर्व समितियों की फाइलें दोबारा देखने तथा पर्याप्त साक्ष्य मिलने पर आरोपपत्र दाखिल करने का दायित्व दिया गया।
अर्थात भारतीय राज्य स्वयं दशकों बाद पुराने मामलों को दोबारा खोलने की आवश्यकता स्वीकार कर रहा था।
यह तथ्य न्याय-व्यवस्था के सामने एक गहरा प्रश्न छोड़ता है—यदि किसी अपराध में न्याय पाने के लिए पीड़ितों को तीस या चालीस वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़े, तो न्याय मिलने का अर्थ कितना बदल जाता है?
पीड़ित इस इतिहास के केंद्र में हैं
1984 पर राजनीतिक बहस अक्सर बड़े नामों के आसपास सिमट जाती है—किस नेता पर क्या आरोप लगा, किस आयोग ने किसका नाम लिया, किस सरकार ने क्या किया और किस अदालत ने किसे दोषी ठहराया।
लेकिन इस अध्ययन का केंद्र केवल सत्ता और राजनीति नहीं होगी।
केंद्र में वे परिवार भी होंगे जिनके पुरुष सदस्य मार दिए गए; वे महिलाएं जिन्हें रातोंरात अपने परिवार और आजीविका दोनों का भार उठाना पड़ा; वे बच्चे जिन्होंने पिता, भाई अथवा अन्य परिजनों को खो दिया; वे लोग जिन्होंने घर और व्यवसाय गंवाए; और वे हजारों विस्थापित नागरिक जिन्हें राहत शिविरों में जाना पड़ा।
न्यायिक रिकॉर्ड स्वयं स्वीकार करता है कि हिंसा के कारण बड़ी संख्या में सिखों को अपने घर छोड़कर राहत शिविरों अथवा सुरक्षित स्थानों में जाना पड़ा और अनेक परिवारों ने अपने पुरुष सदस्यों को खोने के कारण गहरी भावनात्मक तथा आर्थिक क्षति झेली।
इसलिए 1984 को केवल राजनीतिक षड्यंत्र, पुलिस विफलता या अदालती मुकदमों के रूप में पढ़ना अधूरा इतिहास होगा। यह विस्थापन, विधवापन, अनाथ हुए बच्चों, टूटी आजीविकाओं और पीढ़ियों तक चले मनोवैज्ञानिक आघात का इतिहास भी है।
इस अध्ययन की पद्धति
1984 पर चार दशकों में इतना राजनीतिक विमर्श हो चुका है कि तथ्य और आरोप कई बार एक-दूसरे में घुल जाते हैं। इसलिए इस अध्ययन में स्रोतों की एक स्पष्ट प्राथमिकता रहेगी।
सबसे ऊपर प्राथमिक और आधिकारिक स्रोत होंगे—रंगनाथ मिश्र आयोग, नानावती आयोग, जी.पी. माथुर समिति और अन्य सरकारी समितियों की रिपोर्टें; गृह मंत्रालय तथा दिल्ली प्रशासन के उपलब्ध अभिलेख; एफआईआर और पुलिस रिकॉर्ड; एसआईटी और सीबीआई की जांच से जुड़े दस्तावेज; निचली अदालतों, दिल्ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय; संसद में दिए गए सरकारी वक्तव्य और समकालीन आधिकारिक दस्तावेज।
इसके बाद प्रत्यक्षदर्शी हलफनामे, पीड़ितों के बयान, मानवाधिकार संगठनों की समकालीन रिपोर्टें, समाचार पत्र-पत्रिकाओं का अभिलेख और विश्वसनीय शोध साहित्य इस्तेमाल किया जाएगा।
जहां दो स्रोतों में विरोध होगा, उसे छिपाया नहीं जाएगा।
जहां मृत्यु संख्या अलग होगी, दोनों आंकड़े उनके स्रोत सहित दिए जाएंगे।
जहां किसी नेता या पुलिस अधिकारी पर केवल आरोप है, उसे आरोप ही लिखा जाएगा।
जहां जांच आयोग ने प्रतिकूल निष्कर्ष दिया है, उसे आयोग का निष्कर्ष कहा जाएगा।
और जहां अदालत ने अपराध सिद्ध किया है, वहीं व्यक्ति को न्यायिक रूप से दोषी कहा जाएगा।
यही अंतर इस अध्ययन की विश्वसनीयता की आधारशिला होगा।
इतिहास का कठिन प्रश्न
1984 की सिख-विरोधी हिंसा स्वतंत्र भारत के इतिहास के उन प्रसंगों में है जहां लोकतांत्रिक राज्य की क्षमता और निष्पक्षता दोनों की कठोर परीक्षा हुई।
एक ओर देश अपनी प्रधानमंत्री की हत्या के असाधारण राष्ट्रीय संकट से गुजर रहा था। दूसरी ओर उसी देश के हजारों नागरिक केवल इसलिए भय में थे क्योंकि उनकी धार्मिक पहचान वही थी जो प्रधानमंत्री के हत्यारों की थी।
यहीं राज्य की जिम्मेदारी सर्वोच्च हो जाती थी।
लोकतांत्रिक शासन की वास्तविक परीक्षा सामान्य दिनों में नहीं, संकट के क्षणों में होती है। जब बहुसंख्यक भावनाएं उग्र हों, जब बदले की मांग उठ रही हो और जब भीड़ कानून अपने हाथ में लेना चाहती हो—तभी संविधान, पुलिस और प्रशासन को सबसे दृढ़ता से अल्पसंख्यक नागरिक के जीवन और अधिकारों की रक्षा करनी होती है।
1984 में कई स्थानों पर यह सुरक्षा विफल हुई।
और इसी विफलता ने प्रधानमंत्री की हत्या के बाद पैदा हुए राष्ट्रीय संकट को स्वतंत्र भारत की सबसे भयावह सामुदायिक त्रासदियों में बदल दिया।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने दशकों बाद 1984 के अपराधों पर विचार करते हुए इन्हें ऐसी भयावह सामूहिक हिंसा के संदर्भ में देखा जिसमें अपराधियों को लंबे समय तक दंड से बचने का अवसर मिला। अदालत की टिप्पणी इस अध्ययन के मूल प्रश्न को सामने लाती है—जब राज्य किसी नागरिक को हिंसा के समय बचाने में विफल हो जाए और बाद में उसे न्याय दिलाने में भी दशकों लगा दे, तो उस विफलता की जवाबदेही कैसे निर्धारित की जाए?
इस प्रश्न का उत्तर किसी एक आयोग, किसी एक राजनीतिक दल, किसी एक पुलिस अधिकारी या किसी एक मुकदमे में नहीं मिलेगा।
इसके लिए 31 अक्टूबर की दोपहर से शुरू करके दिल्ली की गलियों, पुलिस नियंत्रण कक्षों, राजनीतिक गतिविधियों, सेना की तैनाती, राहत शिविरों, एफआईआर, जांच समितियों, आयोगों और अदालतों से गुजरते हुए चार दशकों की पूरी यात्रा करनी होगी।
क्योंकि 1984 की पूरी कहानी केवल यह नहीं है कि हजारों सिख मारे गए। उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उन्हें कौन बचा सकता था, किसने नहीं बचाया, हिंसा में किसकी भूमिका के क्या प्रमाण मिले, अपराधियों की पहचान और अभियोजन में इतनी देर क्यों हुई और पीड़ित परिवारों को न्याय पाने के लिए दशकों तक क्यों लड़ना पड़ा।
यही इस घटनाक्रम का केंद्रीय प्रश्न है।