omkarchaudhary.comJOURNALIST · AUTHOR · RESEARCHEROCN Research Desk
दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–019 · अध्याय 03

भिंडरांवाले का उदय और पंजाब में उग्रवाद — 1978 से 1984

1978 से जून 1984 तक पंजाब में जो कुछ हुआ, उसने भारतीय राजनीति, सिख समाज और केंद्र-राज्य संबंधों की दिशा बदल दी। केवल छह वर्षों में एक ग्रामीण धार्मिक प्रचारक जरनैल सिंह भिंडरांवाले पंजाब की सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद शख्सियतों में शामिल हो गया; निरंकारी-सिख धार्मिक टकराव लक्षित हत्याओं में बदल गया; अकाली दल की संवैधानिक मांगों के समानांतर सशस्त्र उग्रवाद बढ़ता गया; पुलिस और प्रशासन का प्रभाव कमजोर हुआ; स्वर्ण मंदिर परिसर में वांछित और हथियारबंद लोगों की मौजूदगी बढ़ी और अंततः जून 1984 में भारतीय सेना को ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए उतारना पड़ा।

लेकिन इस पूरी अवधि को केवल एक सूत्र—“भिंडरांवाले आया और आतंकवाद शुरू हो गया”—से समझना ऐतिहासिक रूप से भ्रामक होगा।

पंजाब में उग्रवाद के उदय में कई प्रक्रियाएं एक साथ काम कर रही थीं। 1978 का निरंकारी-सिख संघर्ष धार्मिक आक्रोश का प्रारंभिक विस्फोट था। कांग्रेस और अकाली दल की सत्ता-प्रतिस्पर्धा ने धार्मिक नेताओं को राजनीतिक महत्व दिया। आनंदपुर साहिब प्रस्ताव और केंद्र-राज्य विवाद पहले से मौजूद थे। पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारियों ने नए असंतोष पैदा किए। उग्रवादी समूहों ने हत्या, बम विस्फोट और अपहरण को राजनीतिक हथियार बनाया। वहीं अकाली दल का शांतिपूर्ण आंदोलन और उग्रवादी हिंसा धीरे-धीरे एक ही राजनीतिक भूगोल में सक्रिय होने लगे।

1984 तक पहुंचते-पहुंचते यह अंतर धुंधला होना पंजाब संकट की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बन चुका था।

1. जरनैल सिंह भिंडरांवाले कौन थे?

जरनैल सिंह भिंडरांवाले का जन्म 1947 में पंजाब के मोगा क्षेत्र के रोडे गांव में हुआ था। वे किसी स्थापित राजनीतिक परिवार से नहीं आते थे। उनका शुरुआती प्रभाव धार्मिक प्रचारक के रूप में विकसित हुआ।

वे दमदमी टकसाल से जुड़े और इसके प्रमुख संत करतार सिंह की अगस्त 1977 में मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी बने। शोध साहित्य के अनुसार 25 अगस्त 1977 को उन्हें औपचारिक रूप से दमदमी टकसाल का प्रमुख स्वीकार किया गया।

दमदमी टकसाल सिख धार्मिक शिक्षा और गुरबाणी के अध्ययन की परंपरा से जुड़ी संस्था थी। भिंडरांवाले गांव-गांव घूमकर प्रचार करते थे।

उनका शुरुआती संदेश मुख्यतः धार्मिक अनुशासन पर आधारित था—

केश न कटवाना, अमृत धारण करना, शराब और नशीले पदार्थों से दूर रहना, तंबाकू त्यागना तथा सिख धार्मिक मर्यादा का पालन करना।

उनकी भाषा शहरी राजनीतिक नेताओं की भाषा से बिल्कुल अलग थी। वे ग्रामीण पंजाबी में सीधे और तीखे अंदाज में बोलते थे। इससे विशेष रूप से ग्रामीण युवाओं में उनका प्रभाव तेजी से बढ़ा।

शुरुआती दौर में भिंडरांवाले की लोकप्रियता का आधार स्वतंत्र खालिस्तान की कोई स्पष्ट राजनीतिक योजना नहीं बल्कि सिख धार्मिक पुनरुत्थान था।

यही तथ्य उनके बाद के राजनीतिक परिवर्तन को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

2. 13 अप्रैल 1978 : वह टकराव जिसने दिशा बदल दी

13 अप्रैल 1978—बैसाखी के दिन—अमृतसर में संत निरंकारी मिशन का एक सम्मेलन आयोजित था।

सिखों के एक वर्ग को निरंकारी मत की कुछ धार्मिक मान्यताओं और उनके गुरु की स्थिति पर गंभीर आपत्ति थी। अखंड कीर्तनी जत्था और दमदमी टकसाल से जुड़े सिख प्रदर्शन के लिए निकले।

दोनों पक्षों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ।

इसमें 13 सिख प्रदर्शनकारी और निरंकारी पक्ष के भी लोग मारे गए। विभिन्न स्रोत मृतकों की कुल संख्या में कुछ अंतर बताते हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि घटना ने पंजाब की धार्मिक राजनीति में गहरा घाव पैदा कर दिया। शोध में पंजाब के उग्रवाद की शुरुआती निर्णायक घटना के रूप में अक्सर इसी संघर्ष को चिह्नित किया जाता है।

भिंडरांवाले स्वयं उस स्थान पर संघर्ष में मौजूद नहीं थे, लेकिन मारे गए सिखों का संबंध उनके धार्मिक प्रभाव क्षेत्र से था।

इसके बाद उनकी भाषा अधिक आक्रामक हुई।

मारे गए सिखों को “शहीद” कहा जाने लगा और निरंकारी विवाद धार्मिक असहमति से आगे बढ़कर प्रतिशोध की राजनीति का हिस्सा बन गया।

3. निरंकारियों के खिलाफ अभियान

1978 के बाद पंजाब और अन्य हिस्सों में निरंकारियों के विरुद्ध हिंसा बढ़ी।

निरंकारी प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह भिंडरांवाले और अन्य कट्टर सिख समूहों की आलोचना के केंद्र में आ गए।

24 अप्रैल 1980 को दिल्ली में बाबा गुरबचन सिंह की हत्या कर दी गई।

इस हत्या के बाद जांच में भिंडरांवाले के समर्थकों और उससे जुड़े व्यक्तियों पर संदेह गया। संसद में बाद में इस मामले और उससे जुड़े आरोपों का उल्लेख भी हुआ। जुलाई 1984 की संसदीय बहस में सांसदों ने 1980 की हत्या तथा संदिग्ध व्यक्तियों और पंजाब प्रशासन की प्रतिक्रिया पर गंभीर प्रश्न उठाए।

यहां कानूनी और ऐतिहासिक सावधानी जरूरी है।

भिंडरांवाले को इस हत्या के लिए किसी अदालत ने दोषी नहीं ठहराया था। इसलिए यह कहना कि हत्या “भिंडरांवाले ने कराई” न्यायिक रूप से सिद्ध निष्कर्ष नहीं है।

लेकिन यह निर्विवाद है कि 1978 के बाद निरंकारियों के प्रति शत्रुता उनके राजनीतिक-धार्मिक भाषण का प्रमुख हिस्सा बन गई थी और निरंकारी नेताओं तथा अनुयायियों पर लक्षित हमले बढ़ते गए।

4. धार्मिक नेता से राजनीतिक शक्ति तक

1978 के बाद भिंडरांवाले का प्रभाव केवल धार्मिक मंच तक सीमित नहीं रहा।

यहीं कांग्रेस और अकाली दल की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की भूमिका सामने आती है।

अकाली दल पंजाब में सिख मतदाताओं का परंपरागत राजनीतिक प्रतिनिधि था। कांग्रेस उसकी पकड़ कमजोर करना चाहती थी।

कई इतिहासकारों, पत्रकारों और राजनीतिक संस्मरणों में यह दावा मिलता है कि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भिंडरांवाले जैसे धार्मिक व्यक्ति को अकालियों के मुकाबले एक वैकल्पिक सिख शक्ति के रूप में प्रोत्साहित किया।

कुछ अकादमिक अध्ययनों में 1979 के SGPC चुनावों में कांग्रेस से जुड़े तत्वों द्वारा भिंडरांवाले समर्थक उम्मीदवारों को सहयोग देने का उल्लेख किया गया है।

लेकिन इस प्रश्न को सावधानी से समझना जरूरी है।

तीन अलग-अलग दावे हैं—

पहला, कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भिंडरांवाले को राजनीतिक रूप से उपयोगी माना।

दूसरा, कुछ अवसरों पर उसके समर्थकों को अकाली दल के खिलाफ राजनीतिक सहायता मिली।

तीसरा, कांग्रेस ने बाद के उग्रवाद और आतंकवादी हिंसा को योजनाबद्ध रूप से पैदा किया।

पहले दो दावों के समर्थन में पर्याप्त संस्मरणात्मक और शोध सामग्री उपलब्ध है।

तीसरा दावा कहीं अधिक व्यापक है और उसे प्रमाण के बिना ऐतिहासिक तथ्य नहीं कहा जा सकता।

भिंडरांवाले बहुत जल्दी उन शक्तियों के नियंत्रण से बाहर हो गया जो संभवतः उसे अकाली राजनीति के संतुलन के लिए उपयोगी समझ रही थीं।

5. दल खालसा और अलगाववादी शब्दावली

इसी अवधि में दल खालसा जैसे संगठनों का उदय हुआ।

दल खालसा ने सिखों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था और बाद में खालिस्तान की अवधारणा को अधिक प्रत्यक्ष रूप से प्रचारित किया।

यह फर्क महत्वपूर्ण है।

1970 के दशक के अंत तक अकाली दल की आधिकारिक राजनीति भारतीय संघ के भीतर अधिक स्वायत्तता की मांग पर केंद्रित थी। आनंदपुर साहिब प्रस्ताव स्वतंत्र खालिस्तान की स्पष्ट मांग नहीं करता था।

लेकिन समानांतर रूप से कुछ छोटे संगठन स्वतंत्र सिख राज्य के विचार को आगे बढ़ाने लगे थे।

इससे सिख क्षेत्रीय स्वायत्तता की मांग और अलगाववाद के बीच राजनीतिक सीमाएं धीरे-धीरे विवादित होने लगीं।

6. 1980 : पंजाब में सत्ता परिवर्तन

जनवरी 1980 में इंदिरा गांधी केंद्र की सत्ता में वापस आईं।

पंजाब में भी कांग्रेस ने अकाली सरकार को पराजित किया और दरबारा सिंह मुख्यमंत्री बने।

अब केंद्र और राज्य दोनों में कांग्रेस की सरकार थी।

सैद्धांतिक रूप से इससे प्रशासनिक समन्वय आसान होना चाहिए था।

लेकिन पंजाब कांग्रेस के भीतर भी गुटबाजी थी। पूर्व मुख्यमंत्री और बाद में केंद्रीय गृह मंत्री बने ज्ञानी जैल सिंह तथा मुख्यमंत्री दरबारा सिंह के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के उल्लेख कई समकालीन स्रोतों में मिलते हैं।

इससे कानून-व्यवस्था का प्रश्न भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनता गया।

दूसरी ओर भिंडरांवाले अब किसी एक राजनीतिक संरक्षक पर निर्भर नहीं था। उसने अपना स्वतंत्र धार्मिक और राजनीतिक आधार बना लिया था।

7. पत्रकार लाला जगत नारायण का विरोध

पंजाब केसरी समूह के संस्थापक-संपादक और पूर्व सांसद लाला जगत नारायण भिंडरांवाले के मुखर आलोचक थे।

उनके समाचार पत्र सिख उग्रवाद, निरंकारी विरोध और भिंडरांवाले की राजनीति पर लगातार आलोचनात्मक सामग्री प्रकाशित करते थे।

9 सितंबर 1981 को लाला जगत नारायण की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

यह हत्या पंजाब संकट का एक और निर्णायक मोड़ थी।

मामला इतना गंभीर था कि 11 सितंबर 1981 को लोकसभा में इस हत्या पर विशेष चर्चा हुई। तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह सहित विभिन्न दलों के नेताओं ने मामले पर चर्चा की।

जांच में भिंडरांवाले का नाम सामने आया और उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ।

8. चंदो कलां से मेहता चौक तक

पुलिस ने भिंडरांवाले को गिरफ्तार करने का प्रयास किया।

हरियाणा के चंदो कलां में पुलिस कार्रवाई हुई, लेकिन वे वहां से निकल गए।

इस दौरान उनके प्रचार साहित्य और धार्मिक पुस्तकों के जलने के आरोप लगे। इस घटना को भिंडरांवाले ने सिख धर्म के अपमान के रूप में प्रचारित किया।

इसके बाद उन्होंने घोषणा की कि वे स्वयं मेहता चौक स्थित गुरुद्वारा गुरदर्शन प्रकाश में गिरफ्तारी देंगे।

20 सितंबर 1981 को हजारों समर्थकों की मौजूदगी में उन्होंने आत्मसमर्पण किया।

गिरफ्तारी से पहले उन्हें लंबा भाषण देने दिया गया।

इसके बाद हिंसा हुई और कई लोगों की मृत्यु हुई।

यह गिरफ्तारी प्रशासनिक कार्रवाई से अधिक एक राजनीतिक नाटकीय घटना बन गई।

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के एक बाद के मामले में भी यह दर्ज हुआ कि लाला जगत नारायण हत्या प्रकरण में भिंडरांवाले की गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी हुआ था और सितंबर 1981 में उन्हें गिरफ्तार किया गया था।

9. गिरफ्तारी और हिंसा का विस्तार

भिंडरांवाले की गिरफ्तारी के बाद पंजाब में कई हिंसक घटनाएं हुईं।

बम विस्फोट, गोलीबारी और विरोध प्रदर्शन हुए। शोध में अमृतसर, तरनतारन, मोगा, होशियारपुर और चंडीगढ़ में हुए विस्फोटों और हिंसा का उल्लेख मिलता है।

29 सितंबर 1981 को एक इंडियन एयरलाइंस विमान को दल खालसा से जुड़े व्यक्तियों ने अपहृत कर लाहौर ले जाने की घटना भी इसी राजनीतिक माहौल से जुड़ी थी।

इन घटनाओं ने भिंडरांवाले को केवल धार्मिक प्रचारक नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक समस्या बना दिया।

10. बिना मुकदमे के रिहाई और बढ़ता प्रभाव

अक्टूबर 1981 में भिंडरांवाले को रिहा कर दिया गया क्योंकि लाला जगत नारायण हत्या मामले में उनके खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं पाए गए।

उनकी रिहाई उनके राजनीतिक प्रभाव के लिए निर्णायक साबित हुई।

समर्थकों के बीच यह संदेश गया कि सरकार उन्हें दोषी सिद्ध नहीं कर सकी।

उनका कद बढ़ गया।

जो व्यक्ति कुछ सप्ताह पहले हत्या के मामले में गिरफ्तारी का सामना कर रहा था, अब अपने समर्थकों के सामने सरकार को चुनौती देकर मुक्त हुआ धार्मिक नेता दिखाई दे रहा था।

अकादमिक अध्ययनों ने भी इस गिरफ्तारी और रिहाई को उनके तेज राजनीतिक उदय का महत्वपूर्ण चरण माना है।

11. हिंसा अब केवल निरंकारियों तक सीमित नहीं रही

1981 के बाद हिंसा का दायरा बदल गया।

अब निशाने पर केवल निरंकारी नहीं थे।

पत्रकार, पुलिसकर्मी, सरकारी अधिकारी, राजनीतिक विरोधी, हिंदू नागरिक तथा भिंडरांवाले के आलोचक सिख भी हमलों का लक्ष्य बनने लगे।

उग्रवादी हिंसा का उद्देश्य केवल धार्मिक प्रतिशोध नहीं रह गया था।

इसका उपयोग भय पैदा करने, राजनीतिक विरोध समाप्त करने और प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर करने के लिए भी होने लगा।

यही वह बिंदु है जहां धार्मिक कट्टरता सशस्त्र राजनीतिक उग्रवाद में बदलती दिखाई देती है।

12. अकाली दल का संकट

अकाली नेतृत्व के सामने अब दोहरी चुनौती थी।

एक ओर केंद्र सरकार से पंजाब की राजनीतिक और आर्थिक मांगें मनवानी थीं।

दूसरी ओर भिंडरांवाले जैसे कट्टर धार्मिक नेता अकाली नेतृत्व को “कमजोर” बताकर उसके सिख आधार में सेंध लगा रहे थे।

यदि अकाली दल भिंडरांवाले का खुला विरोध करता, तो उसे सिख हितों से समझौता करने वाला कहा जा सकता था।

यदि वह उसके साथ खड़ा रहता, तो हिंसक उग्रवाद और संवैधानिक आंदोलन के बीच अंतर धुंधला होता।

इस दुविधा ने आगे चलकर पंजाब संकट को और जटिल बनाया।

13. धर्म युद्ध मोर्चा — 1982

4 अगस्त 1982 को अकाली दल ने धर्म युद्ध मोर्चा शुरू किया।

इसका घोषित उद्देश्य आनंदपुर साहिब प्रस्ताव और पंजाब से संबंधित विभिन्न मांगों को लागू करवाने के लिए शांतिपूर्ण जनआंदोलन चलाना था।

संत हरचंद सिंह लोंगोवाल अकाली नेतृत्व के प्रमुख चेहरे थे।

भिंडरांवाले ने भी इस मोर्चे का समर्थन किया।

यहीं से अकाली दल का संवैधानिक आंदोलन और भिंडरांवाले की कट्टर राजनीति एक ही राजनीतिक मंच के आसपास दिखाई देने लगी।

यह कहना गलत होगा कि धर्म युद्ध मोर्चे के सभी सहभागी हिंसक उग्रवादी थे।

बड़ी संख्या में अकाली कार्यकर्ता शांतिपूर्ण सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दे रहे थे।

लेकिन साथ-साथ पंजाब में लक्षित हत्याएं और हथियारबंद गतिविधियां भी बढ़ रही थीं।

इस दोहरी वास्तविकता ने केंद्र सरकार के सामने यह कठिन प्रश्न खड़ा किया कि राजनीतिक आंदोलन और आतंकवादी हिंसा को प्रशासनिक रूप से कैसे अलग किया जाए।

14. स्वर्ण मंदिर परिसर में प्रवेश

1982 में भिंडरांवाले अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर स्थित गुरु नानक निवास में रहने लगे।

गुरु नानक निवास तकनीकी रूप से हरमंदिर साहिब के मुख्य धार्मिक भवन का हिस्सा नहीं था, लेकिन वह SGPC द्वारा संचालित परिसर में था।

भिंडरांवाले की वहां मौजूदगी ने प्रशासन की चुनौती बढ़ा दी।

उनके आसपास हथियारबंद समर्थक रहने लगे।

वांछित व्यक्तियों द्वारा धार्मिक परिसर में शरण लेने के आरोप बढ़े।

सरकार सीधे पुलिस कार्रवाई करने से हिचकती रही क्योंकि किसी भी पुलिस प्रवेश से सिख धार्मिक भावनाएं भड़क सकती थीं।

इस हिचकिचाहट का उग्रवादियों ने लाभ उठाया।

15. एशियाई खेल और सिख यात्रियों की तलाशी

नवंबर-दिसंबर 1982 में दिल्ली में एशियाई खेल आयोजित हुए।

सरकार को आशंका थी कि अकाली आंदोलनकारी दिल्ली पहुंचकर प्रदर्शन कर सकते हैं।

हरियाणा-पंजाब सीमा और दिल्ली जाने वाले मार्गों पर सिख यात्रियों की कठोर जांच की गई। कई प्रतिष्ठित सिख नागरिकों और पूर्व सैन्य अधिकारियों को भी रोके जाने की शिकायतें सामने आईं।

इन कार्रवाइयों ने पंजाब में व्यापक अपमान और नाराजगी पैदा की।

अकाली राजनीति ने इसे उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया कि सिखों के साथ उनकी धार्मिक पहचान के कारण संदेहपूर्ण व्यवहार किया जा रहा है।

ऐसी कार्रवाइयों ने भिंडरांवाले की उस प्रचार-रेखा को अप्रत्यक्ष बल दिया जिसमें वह सिख समुदाय को राज्य के निशाने पर दिखाता था।

यह उग्रवाद की वृद्धि में राज्य की नीतियों से उत्पन्न प्रतिपुष्टि चक्र का महत्वपूर्ण उदाहरण था।

16. हिंसा का व्यवस्थित पैटर्न

1982 और 1983 तक उग्रवादी घटनाओं की प्रकृति अधिक संगठित होने लगी।

बम विस्फोट, पुलिस अधिकारियों की हत्या, राजनीतिक विरोधियों पर गोलीबारी और सार्वजनिक स्थानों पर हमले बढ़े।

एक शोध अध्ययन के अनुसार 1982 में उग्रवादियों द्वारा हत्या की कम-से-कम 24 घटनाएं दर्ज की गईं और इसके बाद हिंसा तेजी से बढ़ी।

लक्ष्य अक्सर प्रतीकात्मक रूप से चुने जाते थे।

किसी पुलिस अधिकारी की हत्या प्रशासन को चुनौती देती थी।

पत्रकार की हत्या आलोचनात्मक आवाजों के लिए संदेश थी।

निरंकारियों की हत्या धार्मिक प्रतिशोध का प्रतीक थी।

हिंदुओं को निशाना बनाना सांप्रदायिक भय पैदा करता था।

भिंडरांवाले के विरोधी सिखों की हत्या यह स्पष्ट करती थी कि संघर्ष केवल सिख बनाम हिंदू नहीं था; यह सिख समाज के भीतर राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई भी था।

17. 25 अप्रैल 1983 : डीआईजी ए.एस. अटवाल की हत्या

25 अप्रैल 1983 की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया।

पंजाब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी डीआईजी अवतार सिंह अटवाल स्वर्ण मंदिर में प्रार्थना करने गए थे।

मुख्य प्रवेश द्वार के निकट उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।

हमलावर धार्मिक परिसर की ओर लौट गया।

अगले दिन संसद में तत्कालीन गृह मंत्री पी.सी. सेठी ने घटना पर बयान दिया। संसदीय अभिलेख में दर्ज है कि सरकार ने कहा कि हमलावर दरबार साहिब परिसर की ओर वापस गया और इस घटना ने इस चिंता को मजबूत किया कि वांछित अपराधी धार्मिक परिसर में शरण ले रहे हैं। मामले की जांच सीबीआई को देने की घोषणा की गई।

अटवाल की हत्या का प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा था।

यदि पंजाब पुलिस का एक वरिष्ठ अधिकारी दिनदहाड़े स्वर्ण मंदिर के प्रवेश द्वार पर मारा जा सकता था और प्रशासन तत्काल कार्रवाई नहीं कर सकता था, तो यह राज्य की शक्ति को सीधी चुनौती थी।

18. पुलिस की मनोवैज्ञानिक कमजोरी

अटवाल हत्या के बाद पंजाब पुलिस की स्थिति और कठिन हो गई।

एक ओर उग्रवादी पुलिसकर्मियों को निशाना बना रहे थे।

दूसरी ओर धार्मिक परिसर में प्रवेश करने का कोई भी प्रयास बड़े धार्मिक संघर्ष में बदल सकता था।

इस स्थिति ने पुलिस में भय और अनिश्चितता पैदा की।

कई मामलों में अभियुक्तों को पकड़ना कठिन होता गया।

गवाह सामने आने से डरते थे।

जांच अधिकारी निशाना बन सकते थे।

पुलिस की कमजोर प्रतिक्रिया से उग्रवादियों का मनोबल बढ़ा।

इस प्रकार हिंसा केवल लोगों की हत्या नहीं कर रही थी; वह धीरे-धीरे राज्य की जांच और न्याय-प्रक्रिया की क्षमता को भी क्षीण कर रही थी।

19. हिंदू-सिख संबंधों पर हमला

1983 में हिंसा का सांप्रदायिक आयाम अधिक स्पष्ट होने लगा।

बसों और सार्वजनिक स्थानों पर लोगों की धार्मिक पहचान देखकर हत्या की घटनाएं सामने आईं।

अक्टूबर 1983 में कपूरथला जिले के ढिलवां के निकट एक बस रोककर हिंदू यात्रियों को अलग कर गोली मारने की घटना विशेष रूप से भयावह थी।

ऐसी हत्याओं का उद्देश्य केवल कुछ व्यक्तियों की हत्या नहीं था।

उनका व्यापक प्रभाव था—

पंजाब के हिंदुओं में भय पैदा करना,

हिंदू-सिख संबंधों को तोड़ना,

पंजाब से हिंदुओं का पलायन प्रेरित करना,

और प्रतिक्रिया में अन्य राज्यों में सिखों के विरुद्ध आक्रोश पैदा करना।

यह वही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण था जिसकी परिणति अगले वर्ष कहीं अधिक भयावह रूप में दिखाई देने वाली थी।

20. राष्ट्रपति शासन

हिंसा और कानून-व्यवस्था संकट के बीच अक्टूबर 1983 में पंजाब की दरबारा सिंह सरकार बर्खास्त कर दी गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

यह केंद्र सरकार की इस स्वीकारोक्ति के समान था कि सामान्य राज्य सरकार व्यवस्था से स्थिति नियंत्रित नहीं हो पा रही।

लेकिन राष्ट्रपति शासन लगने से भी हिंसा समाप्त नहीं हुई।

अब पंजाब सीधे केंद्र के प्रशासनिक नियंत्रण में था।

इसके बावजूद हत्याएं, बम विस्फोट और उग्रवादी गतिविधियां जारी रहीं।

इससे केंद्र सरकार पर कार्रवाई का दबाव और बढ़ गया।

21. भिंडरांवाले की भाषा और बढ़ती कट्टरता

1983 के अंत तक भिंडरांवाले के भाषणों पर संसद में भी गंभीर चिंता व्यक्त होने लगी।

दिसंबर 1983 में उनकी एक कथित धमकी को लेकर लोकसभा में गृह मंत्री ने वक्तव्य दिया और विपक्ष ने गिरफ्तारी की मांग की। संसदीय रिकॉर्ड दिखाता है कि उनकी भाषा और पंजाब में हिंदुओं की सुरक्षा का प्रश्न राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का विषय बन चुका था।

भिंडरांवाले के भाषणों की एक विशेषता थी—

वे अक्सर प्रत्यक्ष राजनीतिक जिम्मेदारी से बचने वाली भाषा इस्तेमाल करते हुए हिंसा करने वालों को नैतिक समर्थन देने जैसी बातें कहते थे।

उनके समर्थक उन्हें सिख अधिकारों की रक्षा करने वाला संत बताते थे।

आलोचक उन्हें हिंसक उग्रवाद को वैचारिक वैधता देने वाला नेता मानते थे।

दोनों छवियां पंजाब में साथ-साथ मौजूद थीं।

22. क्या भिंडरांवाले खुलकर खालिस्तान मांग रहे थे?

इस प्रश्न का उत्तर भी सरल हां या नहीं में देना उचित नहीं।

भिंडरांवाले अक्सर कहते थे कि वे खालिस्तान की मांग नहीं कर रहे, लेकिन यदि सरकार दे दे तो उसे स्वीकार करने से इनकार नहीं करेंगे।

उन्होंने कई बार सिख पहचान, स्वतंत्र राजनीतिक अधिकार और राज्य के कथित अत्याचार की भाषा अपनाई।

लेकिन 1983–84 तक उनके आसपास सक्रिय सभी समूहों की राजनीतिक मांग एक जैसी नहीं थी।

कुछ खुलकर खालिस्तान चाहते थे।

कुछ आनंदपुर साहिब प्रस्ताव की अधिकतम स्वायत्तता चाहते थे।

कुछ धार्मिक कट्टरता और प्रतिशोध की राजनीति कर रहे थे।

कुछ अपराधी और हथियारबंद तत्व भी उग्रवादी वातावरण का हिस्सा बन चुके थे।

इसलिए उस पूरे गठजोड़ को एक स्पष्ट और एकरूप राजनीतिक संगठन मानना गलत होगा।

23. अकाल तख्त की ओर स्थानांतरण

दिसंबर 1983 में भिंडरांवाले गुरु नानक निवास से अकाल तख्त भवन में चले गए।

यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण था।

अकाल तख्त सिख धर्म की सर्वोच्च सांसारिक-धार्मिक संस्थाओं में से एक है।

अब एक विवादास्पद हथियारबंद राजनीतिक-धार्मिक नेता का मुख्यालय ऐसे भवन में था जिसका सिख इतिहास में असाधारण पवित्र महत्व था।

इससे प्रशासनिक कार्रवाई और कठिन हो गई।

संसद और सरकारी रिपोर्टों में उस समय इस बात पर चिंता दर्ज हुई कि हथियारबंद और वांछित व्यक्ति मंदिर परिसर को आश्रय के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। अप्रैल 1983 की संसदीय चर्चा में सरकार पहले ही ऐसी स्थिति पर चिंता जता चुकी थी।

24. मेजर जनरल शाबेग सिंह की भूमिका

भिंडरांवाले के आसपास धीरे-धीरे केवल धार्मिक प्रचारक या ग्रामीण समर्थक नहीं थे।

सेना के पूर्व अधिकारी मेजर जनरल शाबेग सिंह भी उनसे जुड़े।

शाबेग सिंह को सैन्य प्रशिक्षण और युद्धक रणनीति का गहरा अनुभव था।

उनकी भूमिका स्वर्ण मंदिर परिसर में रक्षा तैयारियों को संगठित करने में महत्वपूर्ण मानी जाती है।

परिसर में मोर्चेबंदी, फायरिंग पोजीशन, हथियारों का इस्तेमाल और संभावित सैन्य कार्रवाई का मुकाबला करने की तैयारियां अधिक व्यवस्थित होती गईं।

यही कारण है कि जून 1984 में सेना के सामने साधारण पुलिस कार्रवाई जैसी परिस्थिति नहीं थी।

वह प्रशिक्षित और किलेबंद सशस्त्र प्रतिरोध का सामना करने वाली थी।

25. स्वर्ण मंदिर परिसर का सैन्यीकरण

1984 की शुरुआत तक सरकार लगातार आरोप लगा रही थी कि स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियार, गोला-बारूद और अपराधी जमा हैं।

भिंडरांवाले के समर्थकों का तर्क था कि वे आत्मरक्षा के लिए हथियार रखते थे और सिख परंपरा में हथियार धारण करना असामान्य नहीं था।

लेकिन उपलब्ध सरकारी और बाद के न्यायिक अभिलेख बताते हैं कि परिसर में बड़ी संख्या में हथियारबंद उग्रवादी मौजूद थे।

सर्वोच्च न्यायालय ने 1999 के एक फैसले में उस ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों में भिंडरांवाले के नेतृत्व में अनेक उग्रवादी अकाल तख्त के भीतर मौजूद थे, जिसके बाद सरकार ने उन्हें निकालने के लिए सैन्य कार्रवाई की।

यह तथ्य ऑपरेशन ब्लू स्टार की आवश्यकता या उसके तरीके को स्वतः उचित नहीं ठहराता।

लेकिन यह स्पष्ट करता है कि जून 1984 से पहले परिसर के सैन्यीकरण का प्रश्न वास्तविक था, केवल सरकारी प्रचार नहीं।

26. कानून लागू करने में केंद्र की दुविधा

केंद्र सरकार के सामने तीन विकल्प थे।

पहला, बातचीत जारी रखना।

दूसरा, सीमित पुलिस या अर्धसैनिक कार्रवाई करना।

तीसरा, सेना का उपयोग करना।

बातचीत अनेक दौर चली।

अकाली नेताओं से समझौते के प्रयास हुए।

चंडीगढ़, नदी जल, धार्मिक मांगों और आनंदपुर साहिब प्रस्ताव से संबंधित प्रश्नों पर चर्चा हुई।

लेकिन कोई स्थायी समझौता नहीं हो सका।

इस बीच हिंसा बढ़ती गई।

हर नई हत्या के बाद सरकार पर कार्रवाई का दबाव बढ़ता और प्रत्येक कठोर पुलिस कार्रवाई के बाद पंजाब में नया असंतोष पैदा होता।

यह दुष्चक्र 1984 की शुरुआत तक लगभग नियंत्रण से बाहर हो चुका था।

27. फरवरी 1984 : सांप्रदायिक तनाव का नया चरण

फरवरी 1984 तक पंजाब और पड़ोसी हरियाणा में हिंदू-सिख तनाव गंभीर स्तर पर पहुंच गया।

24 फरवरी 1984 को लोकसभा में पंजाब की स्थिति, सांप्रदायिक हिंसा और CRPF तथा नागरिक समूहों के बीच टकराव पर स्थगन प्रस्ताव के तहत विस्तृत चर्चा हुई।

यह दिखाता है कि संकट अब केवल पंजाब के प्रशासन का मामला नहीं था।

राष्ट्रीय संसद इसे भारत की आंतरिक सुरक्षा और सांप्रदायिक एकता की चुनौती के रूप में देख रही थी।

28. हिंसा के भीतर अनेक शक्ति-केंद्र

1984 तक “उग्रवादी” कोई एक संगठन नहीं था।

भिंडरांवाले के समर्थक,

बब्बर खालसा,

दल खालसा,

ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन के कट्टर तत्व,

अन्य छोटे हथियारबंद समूह,

और स्वतंत्र रूप से सक्रिय अपराधी—

सभी विभिन्न स्तरों पर हिंसक वातावरण का हिस्सा थे।

इनमें आपसी प्रतिस्पर्धा भी थी।

बब्बर खालसा जैसे कुछ समूह भिंडरांवाले से भी वैचारिक या संगठनात्मक मतभेद रखते थे।

इसलिए हर हत्या को स्वतः “भिंडरांवाले के आदेश” से जोड़ना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि 1983–84 तक वह उस व्यापक उग्रवादी वातावरण का सबसे प्रभावशाली प्रतीक बन चुका था।

29. राजनीतिक हत्या की रणनीति

उग्रवाद की एक केंद्रीय रणनीति थी—चुनिंदा व्यक्तियों की हत्या।

ऐसे लोगों को निशाना बनाया गया जो—

उग्रवाद की आलोचना करते थे,

सरकार का प्रतिनिधित्व करते थे,

पुलिस में महत्वपूर्ण पद पर थे,

निरंकारी समुदाय से जुड़े थे,

हिंदू सार्वजनिक जीवन के प्रमुख चेहरे थे,

या सिख समाज के भीतर भिंडरांवाले का विरोध करते थे।

इससे दो प्रभाव पैदा हुए।

पहला, समाज में भय।

दूसरा, सार्वजनिक विमर्श का संकुचन।

जब संपादक, पुलिस अधिकारी या धार्मिक विरोधी की हत्या होने लगे तो असहमति व्यक्त करना स्वयं जीवन के लिए जोखिम बन जाता है।

इस प्रकार उग्रवाद ने केवल राज्य को नहीं, नागरिक समाज को भी मौन करना शुरू कर दिया था।

30. केंद्र सरकार की विफलताएं

पंजाब संकट का इतिहास केवल उग्रवादियों के अपराधों की सूची नहीं है।

राज्य की गलतियों का अध्ययन भी उतना ही जरूरी है।

सरकार ने कभी बहुत नरम और कभी बहुत कठोर प्रतिक्रिया दी।

भिंडरांवाले के शुरुआती राजनीतिक उपयोग की कथित रणनीति ने उसे वैधता दी।

1981 की गिरफ्तारी का तरीका उसे नायक बनाने में सहायक हुआ।

रिहाई ने उसकी प्रतिष्ठा बढ़ाई।

एशियाई खेलों के दौरान सिख यात्रियों की अपमानजनक तलाशी ने व्यापक समुदाय में नाराजगी पैदा की।

राजनीतिक वार्ताएं लंबी चलीं लेकिन निर्णायक समाधान नहीं निकला।

स्वर्ण मंदिर परिसर के सैन्यीकरण को प्रारंभिक अवस्था में रोकने में प्रशासन विफल रहा।

और जब निर्णायक कार्रवाई की गई, तब तक स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि सेना का प्रयोग करना पड़ा।

यह क्रम प्रशासनिक विफलता का महत्वपूर्ण अध्ययन है।

31. अकाली नेतृत्व की विफलताएं

जिम्मेदारी का दूसरा पक्ष अकाली नेतृत्व था।

अकाली दल उग्रवादी हिंसा का संगठन नहीं था और उसके हजारों कार्यकर्ता शांतिपूर्ण राजनीतिक आंदोलन कर रहे थे।

लेकिन पार्टी भिंडरांवाले और हिंसक तत्वों से पर्याप्त राजनीतिक दूरी बनाने में विफल रही।

अकाल तख्त और स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारबंद लोगों की मौजूदगी के विरुद्ध SGPC और अकाली नेतृत्व निर्णायक कदम नहीं उठा सके।

कई अकाली नेता निजी तौर पर भिंडरांवाले से चिंतित थे, लेकिन सार्वजनिक रूप से उसका मुकाबला करने से डरते थे।

यह डर केवल राजनीतिक नहीं था।

उनके जीवन को भी वास्तविक खतरा था।

इसलिए धीरे-धीरे पारंपरिक अकाली नेतृत्व अपने ही धार्मिक-राजनीतिक क्षेत्र में कमजोर पड़ता गया।

32. भिंडरांवाले की शक्ति का वास्तविक स्रोत

भिंडरांवाले की शक्ति केवल बंदूक से नहीं आई थी।

उसके कम-से-कम पांच स्रोत थे—

धार्मिक वैधता — वह स्वयं को सिख मर्यादा का रक्षक प्रस्तुत करता था।

ग्रामीण आधार — पंजाब के गांवों में उसका प्रत्यक्ष संपर्क था।

राज्य से टकराव — हर गिरफ्तारी या पुलिस कार्रवाई उसे “सिख उत्पीड़न” की कथा मजबूत करने का अवसर देती थी।

भय — आलोचकों और विरोधियों की हत्याओं ने उसका प्रभाव बढ़ाया।

राजनीतिक रिक्तता — अकाली दल और केंद्र की विफल वार्ताओं ने उसे यह कहने का अवसर दिया कि पारंपरिक राजनीति सिखों को कुछ दिलाने में असफल है।

यही पांच तत्व मिलकर एक धार्मिक प्रचारक को असाधारण राजनीतिक शक्ति में बदल रहे थे।

33. 1984 की शुरुआत : वापसी का रास्ता सिकुड़ गया

1984 आते-आते पंजाब दो समानांतर वास्तविकताओं में जी रहा था।

एक पंजाब अभी भी सामान्य था—

खेतों में खेती हो रही थी,

कारखाने चल रहे थे,

स्कूल-कॉलेज खुले थे,

हिंदू और सिख पड़ोसी साथ रह रहे थे।

दूसरा पंजाब भय से भर रहा था—

हत्याएं,

चेकपोस्ट,

हथियार,

धमकियां,

पुलिस छापे,

राजनीतिक हत्याएं,

धार्मिक ध्रुवीकरण।

यही विरोधाभास पंजाब त्रासदी को समझने में महत्वपूर्ण है।

पूरा सिख समाज उग्रवादी नहीं था।

पूरा पंजाब हिंसा में शामिल नहीं था।

लेकिन अपेक्षाकृत छोटे हथियारबंद समूह ने राज्य, राजनीति और सार्वजनिक मनोविज्ञान पर असाधारण प्रभाव स्थापित कर लिया था।

34. क्या ऑपरेशन ब्लू स्टार अनिवार्य हो चुका था?

यह इतिहास का विवादित प्रश्न है।

सरकारी दृष्टिकोण यह था कि जून 1984 तक स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारबंद उग्रवादियों की इतनी मजबूत स्थिति बन चुकी थी कि सैन्य कार्रवाई आवश्यक थी।

आलोचकों का तर्क है कि सरकार ने इससे पहले उपलब्ध राजनीतिक और पुलिस विकल्पों का पर्याप्त उपयोग नहीं किया और कार्रवाई के समय तथा तरीके ने संकट को और गहरा किया।

दोनों प्रश्न अलग हैं—

क्या परिसर में गंभीर सशस्त्र चुनौती मौजूद थी?

इसका उत्तर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हां है।

क्या उस चुनौती का समाधान सेना द्वारा और ठीक उसी तरीके से किया जाना आवश्यक था जैसा ऑपरेशन ब्लू स्टार में हुआ?

इन दोनों को मिला देना इतिहास को राजनीतिक पक्षधरता में बदल देता है।

35. 1978–1984 : विस्तृत समयरेखा

25 अगस्त 1977 — जरनैल सिंह भिंडरांवाले दमदमी टकसाल के प्रमुख बने।

13 अप्रैल 1978 — अमृतसर में निरंकारी-सिख संघर्ष; 13 सिखों सहित कई लोगों की मृत्यु।

1978 — दल खालसा की गतिविधियां प्रारंभ; अलगाववादी शब्दावली अधिक स्पष्ट होने लगी।

1979 — SGPC चुनाव; भिंडरांवाले धार्मिक-राजनीतिक क्षेत्र में अधिक सक्रिय।

24 अप्रैल 1980 — निरंकारी प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह की दिल्ली में हत्या।

1980 — पंजाब में कांग्रेस सरकार; दरबारा सिंह मुख्यमंत्री।

9 सितंबर 1981 — पंजाब केसरी के संस्थापक-संपादक लाला जगत नारायण की हत्या।

सितंबर 1981 — भिंडरांवाले के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट।

20 सितंबर 1981 — मेहता चौक में भिंडरांवाले की गिरफ्तारी।

सितंबर-अक्टूबर 1981 — गिरफ्तारी के विरोध में हिंसक घटनाएं और विमान अपहरण।

अक्टूबर 1981 — पर्याप्त साक्ष्य न होने पर भिंडरांवाले रिहा।

1982 — भिंडरांवाले गुरु नानक निवास, स्वर्ण मंदिर परिसर में रहने लगे।

4 अगस्त 1982 — अकाली दल का धर्म युद्ध मोर्चा शुरू; भिंडरांवाले भी जुड़े।

नवंबर-दिसंबर 1982 — एशियाई खेलों के समय दिल्ली आने वाले सिखों की व्यापक तलाशी और हिरासत से असंतोष।

1982–83 — लक्षित हत्याओं और बम विस्फोटों में वृद्धि।

25 अप्रैल 1983 — डीआईजी ए.एस. अटवाल की स्वर्ण मंदिर के प्रवेश द्वार के निकट हत्या।

अक्टूबर 1983 — बस यात्रियों की धार्मिक पहचान के आधार पर हत्या की गंभीर घटनाएं; सांप्रदायिक भय बढ़ा।

अक्टूबर 1983 — दरबारा सिंह सरकार बर्खास्त; पंजाब में राष्ट्रपति शासन।

दिसंबर 1983 — भिंडरांवाले के कथित धमकीपूर्ण भाषणों पर संसद में बहस।

दिसंबर 1983 — भिंडरांवाले अकाल तख्त में स्थानांतरित।

जनवरी–मई 1984 — हिंसा, राजनीतिक हत्याएं और सुरक्षा संकट लगातार बढ़ा।

फरवरी 1984 — पंजाब और हरियाणा में सांप्रदायिक तनाव पर संसद में गंभीर चर्चा।

मई 1984 — केंद्र और अकाली नेतृत्व के बीच समझौते की संभावनाएं लगभग समाप्त।

जून 1984 — केंद्र सरकार ने सैन्य कार्रवाई का निर्णय लिया।

निष्कर्ष — राजनीतिक प्रयोग से सशस्त्र चुनौती तक

1978 में भिंडरांवाले एक प्रभावशाली लेकिन सीमित धार्मिक प्रचारक थे।

1981 तक वे पंजाब की राजनीति के प्रमुख विवादास्पद चेहरे बन चुके थे।

1982 में वे अकाली आंदोलन के समानांतर एक स्वतंत्र शक्ति-केंद्र बन गए।

1983 तक उनके आसपास हथियारबंद समर्थक और वांछित उग्रवादी जमा थे।

और 1984 में उनकी मौजूदगी स्वर्ण मंदिर परिसर के भीतर भारतीय राज्य के सामने प्रत्यक्ष सशस्त्र चुनौती के रूप में खड़ी थी।

इस परिवर्तन में भिंडरांवाले की अपनी रणनीति और हिंसक राजनीति केंद्रीय थी, लेकिन वह अकेला कारण नहीं था।

निरंकारी-सिख संघर्ष ने धार्मिक प्रतिशोध की जमीन दी।

कांग्रेस-अकाली प्रतिस्पर्धा ने धार्मिक नेतृत्व को राजनीतिक महत्व दिया।

केंद्र की असंगत नीतियों और पुलिस की गलतियों ने असंतोष बढ़ाया।

अकाली नेतृत्व उग्रवाद से निर्णायक दूरी नहीं बना पाया।

राजनीतिक समझौते असफल होते गए।

हत्याओं ने भय का वातावरण बनाया।

और धार्मिक परिसर का सैन्यीकरण रोकने की प्रशासनिक क्षमता लगातार कम होती गई।

अंततः पंजाब ऐसी स्थिति में पहुंच गया जहां संवैधानिक आंदोलन, धार्मिक आक्रोश, सशस्त्र उग्रवाद और राज्य की प्रतिक्रिया एक-दूसरे में उलझ चुके थे।

जून 1984 में इस संकट का अगला अध्याय भारतीय सेना के स्वर्ण मंदिर परिसर में प्रवेश से खुला।

वह कार्रवाई केवल एक सैन्य ऑपरेशन नहीं थी।

उसने सिख मनोविज्ञान, पंजाब की राजनीति और भारत के इतिहास को गहराई से बदल दिया।

और उसी के प्रत्यक्ष परिणामों की श्रृंखला में पहले प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और फिर 31 अक्टूबर से नवंबर 1984 की सिख-विरोधी सामूहिक हिंसा आने वाली थी।