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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–019 · अध्याय 04

ऑपरेशन ब्लू स्टार — कारण, निर्णय और परिणाम

जून 1984 का ऑपरेशन ब्लू स्टार स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे विवादास्पद सैन्य कार्रवाइयों में से एक है। भारतीय सेना को अमृतसर स्थित श्री हरमंदिर साहिब—स्वर्ण मंदिर—परिसर और विशेष रूप से अकाल तख्त के आसपास मौजूद हथियारबंद उग्रवादियों को हटाने के लिए लगाया गया। सैन्य कार्रवाई 5–7 जून के निर्णायक चरण में हुई, लेकिन उसकी तैयारी, घेराबंदी और पंजाब के विभिन्न गुरुद्वारों में समानांतर अभियानों की प्रक्रिया इससे पहले शुरू हो चुकी थी। ब्रिटिश सरकार की बाद की आधिकारिक समीक्षा ने भी ऑपरेशन को 5 से 7 जून 1984 के बीच हुई सैन्य कार्रवाई के रूप में वर्णित किया।

ऑपरेशन का घोषित उद्देश्य एक गंभीर आंतरिक सुरक्षा संकट को समाप्त करना था। लेकिन जिस स्थान पर सेना भेजी गई वह कोई सामान्य भवन या आतंकवादी ठिकाना नहीं था। वह सिख धर्म का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक परिसर था और अकाल तख्त सिखों की सर्वोच्च धार्मिक-सांसारिक संस्थाओं में से एक है। इसीलिए एक सैन्य समस्या तत्काल एक विशाल धार्मिक और राजनीतिक संकट में बदल गई।

ऑपरेशन में भिंडरांवाले और उसके अनेक प्रमुख हथियारबंद सहयोगी मारे गए। परिसर पर राज्य का नियंत्रण स्थापित हो गया। लेकिन अकाल तख्त को भारी क्षति पहुंची, बड़ी संख्या में सैनिक, उग्रवादी और नागरिक मारे गए तथा पूरी दुनिया में सिख समुदाय के एक बड़े हिस्से को गहरा आघात लगा। सर्वोच्च न्यायालय ने वर्षों बाद भी यह माना कि ऑपरेशन और अकाल तख्त की क्षति ने सिख समुदाय की धार्मिक भावनाओं को गंभीर रूप से प्रभावित किया था।

यहीं से 1984 की अगली त्रासदी की प्रत्यक्ष भूमिका तैयार हुई।

1. सेना बुलाने तक स्थिति कैसे पहुंची?

ऐतिहासिक क्रम से स्पष्ट है कि 1983–84 तक पंजाब का संकट साधारण राजनीतिक आंदोलन से काफी आगे निकल चुका था।

डीआईजी ए.एस. अटवाल की स्वर्ण मंदिर परिसर के निकट हत्या, पुलिसकर्मियों और पत्रकारों की लक्षित हत्याएं, हिंदू यात्रियों को चुनकर मारने की घटनाएं, हथियारबंद गिरोहों का विस्तार और धार्मिक परिसरों में वांछित लोगों की शरण—इन सबने राज्य के अधिकार को चुनौती दी थी।

भिंडरांवाले दिसंबर 1983 से अकाल तख्त में रह रहा था।

उसके आसपास हथियारबंद समर्थक थे।

पूर्व मेजर जनरल शाबेग सिंह सैन्य तैयारियों से जुड़े थे।

अकाल तख्त और आसपास की इमारतों में रक्षात्मक मोर्चे बनाए गए थे।

सरकारी विवरण के अनुसार परिसर में स्वचालित हथियार, गोला-बारूद और सशस्त्र लोग मौजूद थे। बाद के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में भी यह ऐतिहासिक संदर्भ दर्ज हुआ कि भिंडरांवाले के नेतृत्व में उग्रवादियों का समूह अकाल तख्त क्षेत्र में मौजूद था और सेना को उन्हें बाहर निकालने के लिए लगाया गया।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि जून 1984 में स्वर्ण मंदिर परिसर पूरी तरह सामान्य धार्मिक परिसर था और राज्य ने बिना किसी सुरक्षा कारण के सेना भेज दी।

लेकिन दूसरी ओर यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वहां तीर्थयात्री, SGPC कर्मचारी, अकाली कार्यकर्ता और सामान्य श्रद्धालु भी मौजूद थे।

यही परिस्थिति ऑपरेशन की नैतिक और सैन्य कठिनाई का मूल थी।

2. भिंडरांवाले की रक्षा व्यवस्था

स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद हथियारबंद लोगों की स्थिति साधारण पुलिस घेराबंदी जैसी नहीं थी।

शाबेग सिंह के सैन्य अनुभव ने परिसर की रक्षा को अधिक व्यवस्थित बनाने में भूमिका निभाई। इमारतों में फायरिंग पोजीशन बनाई गईं। ऊंचे स्थानों का उपयोग किया गया। प्रवेश मार्गों पर निगरानी रखी गई।

अकाल तख्त इस रक्षा व्यवस्था का केंद्रीय बिंदु बन गया।

भारतीय सेना को बाद में जिस प्रतिरोध का सामना करना पड़ा उससे स्पष्ट हुआ कि विरोधी केवल असंगठित धार्मिक समर्थक नहीं थे।

उनके पास हथियार और तैयार फायरिंग पोजीशन दोनों थे।

यही कारण था कि शुरुआती सैन्य अनुमान अपेक्षा से अधिक आशावादी सिद्ध हुए।

सेना ने संभवतः सोचा था कि नियंत्रित कमांडो कार्रवाई या सीमित बल प्रयोग से परिसर को खाली कराया जा सकेगा।

वास्तविक मुकाबला कहीं अधिक कठिन निकला।

3. राजनीतिक समाधान के प्रयास

सैन्य कार्रवाई अंतिम चरण था। उससे पहले केंद्र सरकार और अकाली नेतृत्व के बीच अनेक दौर की बातचीत हुई थी।

मुख्य विवाद थे—

चंडीगढ़ का पंजाब को हस्तांतरण,

पंजाब-हरियाणा क्षेत्रीय दावे,

रावी-ब्यास जल बंटवारा,

आनंदपुर साहिब प्रस्ताव,

धार्मिक मांगें,

और गिरफ्तार अकाली कार्यकर्ताओं का प्रश्न।

संत हरचंद सिंह लोंगोवाल तथा अन्य अकाली नेताओं से केंद्र सरकार संपर्क में थी।

लेकिन समझौता नहीं हुआ।

यहां इतिहासकारों के बीच बड़ा विवाद है।

एक दृष्टिकोण कहता है कि अकाली नेतृत्व लगातार मांगें बढ़ाता रहा और भिंडरांवाले की हिंसा के बीच सरकार के लिए समझौता कठिन होता गया।

दूसरा दृष्टिकोण कहता है कि केंद्र सरकार के पास समझौते के पर्याप्त अवसर थे, लेकिन राजनीतिक गणना और निर्णयहीनता के कारण उन्हें गंवा दिया गया।

दोनों में कुछ तथ्यात्मक आधार हैं।

स्पष्ट यह है कि मई 1984 के अंत तक संवाद लगभग विफल हो चुका था और हिंसा जारी थी।

4. अनाज रोकने की घोषणा और अंतिम दबाव

अकाली नेतृत्व ने जून 1984 से पंजाब से खाद्यान्न की आवाजाही रोकने तथा सरकारी राजस्व भुगतान के खिलाफ आंदोलन तेज करने की योजना बनाई थी।

यह केंद्र सरकार के लिए गंभीर संकेत था।

पंजाब उस समय देश का प्रमुख खाद्यान्न उत्पादक राज्य था।

यदि राजनीतिक आंदोलन आवश्यक आपूर्ति व्यवस्था को बाधित करता, तो संकट केवल पंजाब तक सीमित नहीं रहता।

सरकार ने इसे कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा दोनों के लिए चुनौती के रूप में देखा।

इसी अवधि में सैन्य विकल्प को अंतिम रूप दिया गया।

5. क्या सेना का उपयोग पहले से विचाराधीन था?

बाद में सार्वजनिक हुए ब्रिटिश दस्तावेजों ने इस प्रश्न में महत्वपूर्ण जानकारी जोड़ी।

2014 में ब्रिटिश सरकार की जांच में पुष्टि हुई कि फरवरी 1984 में भारत सरकार के अनुरोध पर एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी ने भारत जाकर एक संभावित ऑपरेशन के संबंध में सलाह दी थी।

लेकिन उसी समीक्षा ने यह निष्कर्ष भी निकाला कि फरवरी में दी गई सलाह और जून में हुए वास्तविक ऑपरेशन के बीच महत्वपूर्ण अंतर था।

ब्रिटिश सलाह में सीमित, आश्चर्य-आधारित और हेलिकॉप्टर-सहायित कार्रवाई की अवधारणा थी, जबकि जून का ऑपरेशन व्यापक जमीनी सैन्य हमला था।

ब्रिटिश सरकार ने कहा कि फरवरी की सलाह का जून के ऑपरेशन पर प्रभाव सीमित था। उसने यह भी कहा कि जून तक उग्रवादियों की संख्या और परिसर की किलेबंदी फरवरी की तुलना में काफी बढ़ चुकी थी।

इससे एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट होता है—

सरकार जून से कई महीने पहले ही किसी प्रकार की बलपूर्वक कार्रवाई की संभावना पर विचार कर रही थी।

6. सेना की कमान

ऑपरेशन की सर्वोच्च सैन्य जिम्मेदारी तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल ए.एस. वैद्य के पास थी।

पश्चिमी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल के. सुंदरजी ऑपरेशन की वरिष्ठ कमान व्यवस्था में थे।

अमृतसर में प्रत्यक्ष कार्रवाई की कमान मेजर जनरल कुलदीप सिंह बराड़ ने संभाली।

सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में जनरल वैद्य की हत्या से संबंधित मामले में उल्लेख किया कि उन्हें प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश पर स्वर्ण मंदिर परिसर से उग्रवादियों को निकालने का कठिन कार्य सौंपा गया था। बाद में ब्लू स्टार की वजह से ही वैद्य उग्रवादियों के प्रतिशोध का निशाना बने।

7. पंजाब का सैन्य घेराव

जून के शुरुआती दिनों में पंजाब में सेना की तैनाती बढ़ाई गई।

3 जून को अमृतसर और पंजाब के बड़े हिस्से में कठोर कर्फ्यू लगाया गया।

यात्रा और संचार पर प्रतिबंध लगाए गए।

पत्रकारों की आवाजाही सीमित हुई।

बाहरी संचार लगभग ठप कर दिया गया।

3 जून का दिन विशेष रूप से संवेदनशील था क्योंकि गुरु अर्जन देव के शहादत दिवस के कारण स्वर्ण मंदिर में सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक श्रद्धालु मौजूद थे।

यही बाद के सबसे गंभीर विवादों में से एक बना—

यदि सैन्य कार्रवाई संभावित थी तो श्रद्धालुओं को पर्याप्त समय देकर परिसर खाली क्यों नहीं कराया गया?

सरकारी पक्ष ने अभियान की गोपनीयता और उग्रवादियों के भागने की संभावना जैसे कारण दिए।

आलोचकों का तर्क है कि धार्मिक पर्व के समय कार्रवाई ने नागरिक हताहतों का जोखिम अनावश्यक रूप से बढ़ाया।

8. सूचना अवरोध और मीडिया प्रतिबंध

ऑपरेशन के दौरान स्वतंत्र पत्रकारिता पर कठोर प्रतिबंध थे।

अमृतसर को बाहरी दुनिया से काफी हद तक काट दिया गया।

इस कारण ऑपरेशन के दौरान वास्तव में क्या हुआ, कितने लोग परिसर में थे और किस समय किस हथियार का उपयोग किया गया—इन प्रश्नों पर तत्काल स्वतंत्र सत्यापन संभव नहीं रहा।

इसी कारण बाद के सरकारी और गैर-सरकारी मृत्यु आंकड़ों में भारी अंतर देखने को मिलता है।

यही सूचना-अभाव ऑपरेशन ब्लू स्टार से जुड़े विवादों को आज तक जीवित रखने वाला एक महत्वपूर्ण कारण है।

9. 4 जून : गोलीबारी तेज हुई

4 जून से सेना और परिसर में मौजूद हथियारबंद लोगों के बीच गंभीर गोलीबारी शुरू हुई।

सेना ने आसपास की ऊंची इमारतों और उन स्थानों को निशाना बनाया जहां से फायरिंग हो रही थी।

लेकिन प्रतिरोध अपेक्षा से अधिक मजबूत था।

परिसर की जटिल वास्तु संरचना ने कार्रवाई कठिन बनाई।

इसके बीच सामान्य श्रद्धालु भी फंसे हुए थे।

यहां सेना के सामने अत्यंत कठिन परिचालन समस्या थी—

उसे हथियारबंद लोगों को निष्क्रिय करना था, लेकिन वह ऐसा स्थान था जहां हर व्यक्ति लड़ाका नहीं था।

10. 5 जून की रात : निर्णायक हमला

5 जून की रात से 6 जून की सुबह तक ऑपरेशन का सबसे भीषण चरण चला।

सेना ने अकाल तख्त और आसपास की इमारतों की ओर बढ़ने का प्रयास किया।

कमांडो और पैदल सैनिकों को भारी गोलीबारी का सामना करना पड़ा।

फायरिंग पोजीशन मजबूत थीं और आगे बढ़ने वाले सैनिक खुले क्षेत्र में आ रहे थे।

शुरुआती प्रयासों में सैनिकों को भारी नुकसान हुआ।

परिस्थिति अपेक्षा से अधिक गंभीर होने के बाद भारी हथियारों और बख्तरबंद वाहनों का उपयोग किया गया।

यही निर्णय ऑपरेशन ब्लू स्टार का सबसे विवादास्पद सैन्य निर्णय बना।

11. टैंकों और भारी हथियारों का उपयोग

अकाल तख्त से हो रहे प्रतिरोध को समाप्त करने के लिए सेना ने बख्तरबंद वाहनों और टैंक-आधारित फायर सपोर्ट का उपयोग किया।

सरकार और सेना का तर्क था कि भारी प्रतिरोध और सैनिक हताहतों के कारण इसके बिना परिसर पर नियंत्रण स्थापित करना अत्यंत कठिन था।

आलोचकों का प्रश्न था—

क्या सिखों की सर्वोच्च धार्मिक-सांसारिक संस्था के भवन के खिलाफ इतने भारी हथियारों का उपयोग अपरिहार्य था?

यही प्रश्न आज भी ऑपरेशन ब्लू स्टार पर विमर्श का केंद्र है।

सैनिक दृष्टि से निर्णय का उद्देश्य मजबूत फायरिंग पोजीशन को दबाना था।

धार्मिक दृष्टि से परिणाम विनाशकारी था।

12. अकाल तख्त की भारी क्षति

लड़ाई के दौरान अकाल तख्त को गंभीर संरचनात्मक क्षति पहुंची।

उसकी इमारत का बड़ा भाग नष्ट हो गया।

बाद के सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले में भी कहा गया कि ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान अकाल तख्त गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुआ और इसने सिख समुदाय की भावनाओं पर दूरगामी प्रभाव डाला।

यह केवल एक इमारत की क्षति नहीं थी।

सिख इतिहास में अकाल तख्त सत्ता, धार्मिक स्वाभिमान और सामुदायिक अधिकार का प्रतीक है।

इसलिए उसकी टूटी हुई तस्वीरें दुनिया भर के सिखों के लिए गहरे अपमान और शोक का प्रतीक बन गईं।

ऑपरेशन के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को केवल मृत्यु संख्या से समझा ही नहीं जा सकता।

अकाल तख्त की क्षति संभवतः उसका सबसे शक्तिशाली प्रतीकात्मक परिणाम थी।

13. हरमंदिर साहिब और परिसर की अन्य क्षति

मुख्य हरमंदिर साहिब भी गोलीबारी से पूरी तरह अछूता नहीं रहा, हालांकि अकाल तख्त की तुलना में उसकी संरचनात्मक क्षति सीमित थी।

परिसर की अन्य इमारतें भी क्षतिग्रस्त हुईं।

सिख संदर्भ ग्रंथों और ऐतिहासिक दस्तावेजों वाली सिख रेफरेंस लाइब्रेरी के नष्ट होने अथवा उसकी सामग्री के गायब होने को लेकर भी दशकों से गंभीर विवाद है।

इस विषय में सरकारी और सिख संस्थागत विवरणों में मतभेद हैं।

इसलिए यह कहना सावधानीपूर्ण होगा कि ऑपरेशन के दौरान अथवा उसके तुरंत बाद पुस्तकालय की बहुमूल्य सामग्री का बड़ा हिस्सा नष्ट या अनुपलब्ध हुआ; दस्तावेजों के पूर्ण स्वरूप और बाद में सरकारी कब्जे में गई सामग्री को लेकर विवाद आज तक समाप्त नहीं हुआ।

14. भिंडरांवाले की मृत्यु

6 जून तक भारतीय सेना ने अकाल तख्त क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

जरनैल सिंह भिंडरांवाले लड़ाई में मारे गए।

मेजर जनरल शाबेग सिंह भी मृत पाए गए।

ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन से जुड़े अमरीक सिंह भी मारे गए।

इस प्रकार ऑपरेशन के तत्काल सैन्य लक्ष्य का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पूरा हुआ—

भिंडरांवाले और उसके प्रमुख हथियारबंद नेतृत्व का केंद्र समाप्त हो गया।

लेकिन मृत्यु के साथ भिंडरांवाले का राजनीतिक प्रभाव खत्म नहीं हुआ।

उलटे उसके समर्थकों के बीच वह “शहीद” के रूप में स्थापित हो गया।

यह ऑपरेशन के सबसे महत्वपूर्ण अनपेक्षित परिणामों में था।

15. हताहत — आधिकारिक आंकड़े

हताहतों का प्रश्न आज तक विवादित है।

भारत सरकार के 1984 के White Paper on the Punjab Agitation में ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए निम्न आंकड़े दिए गए—

भारतीय सैनिक मारे गए — 83

भारतीय सैनिक घायल — 249

नागरिक/उग्रवादी मारे गए — 493

उग्रवादी एवं अन्य घायल — 86

नागरिक/उग्रवादी हिरासत में लिए गए — 592

इन आंकड़ों का उल्लेख बाद की विभिन्न रिपोर्टों में भी सरकारी श्वेतपत्र के आधिकारिक आंकड़ों के रूप में किया गया है।

इन आंकड़ों के आधार पर कुल आधिकारिक मृत्यु संख्या लगभग 576 बैठती है—83 सैनिक और 493 नागरिक/उग्रवादी।

ब्रिटिश सरकार की 2014 की समीक्षा ने भी भारतीय आधिकारिक आंकड़ों को लगभग 575 मृतक बताया।

16. लेकिन वास्तविक मृत्यु संख्या कितनी थी?

यहीं सबसे गंभीर विवाद शुरू होता है।

सरकारी श्वेतपत्र ने “civilians/terrorists” को एक साथ रखा।

इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि 493 मृतकों में कितने हथियारबंद उग्रवादी थे और कितने सामान्य श्रद्धालु या अन्य नागरिक।

गैर-सरकारी विवरणों और प्रत्यक्षदर्शी रिपोर्टों ने मृत्यु संख्या कहीं अधिक बताई।

ब्रिटिश सरकार ने 2014 में स्वीकार किया कि भारतीय सरकारी आंकड़े लगभग 575 मृत्यु बताते हैं, जबकि अन्य रिपोर्टों में संख्या 3,000 तक बताई गई है, जिनमें गोलीबारी के बीच फंसे तीर्थयात्री भी शामिल थे।

इन उच्च अनुमानों की निश्चित पुष्टि उपलब्ध रिकॉर्ड से नहीं की जा सकती।

इसी तरह सरकारी आंकड़े को पूर्ण और अंतिम सत्य मानना भी कठिन है क्योंकि स्वतंत्र मीडिया और पर्यवेक्षकों की पहुंच प्रतिबंधित थी और परिसर में मौजूद नागरिकों की सटीक संख्या स्पष्ट नहीं थी।

उपलब्ध स्रोतों के आधार पर मृत्यु संख्या को इस प्रकार दर्ज करना अधिक उचित है—

आधिकारिक आंकड़ा : 83 सैनिक तथा 493 नागरिक/उग्रवादी मृत।

वैकल्पिक अनुमान : इससे काफी अधिक, कुछ स्रोतों में हजारों तक।

दोनों के बीच अंतर आज तक विवाद का विषय है।

17. क्या नागरिकों को निकलने का पर्याप्त अवसर मिला?

यह ऑपरेशन पर सबसे गंभीर मानवीय प्रश्नों में से है।

3 जून गुरु अर्जन देव के शहादत दिवस से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक दिन था और बड़ी संख्या में श्रद्धालु परिसर में मौजूद थे।

कर्फ्यू और संचार प्रतिबंध के कारण उनका बाहर निकलना कठिन हो गया।

सरकारी पक्ष का तर्क रहा कि बार-बार आत्मसमर्पण की अपील की गई।

आलोचक कहते हैं कि व्यवहारिक रूप से नागरिकों को पर्याप्त सुरक्षित निकासी मार्ग नहीं दिया गया।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि कोई भी सैन्य कार्रवाई जिसमें हथियारबंद लोग और नागरिक एक ही सीमित परिसर में मौजूद हों, असाधारण नागरिक जोखिम पैदा करती है।

यही कारण है कि ऑपरेशन के समय-निर्धारण पर प्रश्न आज तक समाप्त नहीं हुए।

18. क्या और विकल्प मौजूद थे?

ऑपरेशन ब्लू स्टार का मूल्यांकन करते समय यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

सरकार के सामने संभावित विकल्प थे—

परिसर की लंबी घेराबंदी,

पानी और बिजली की आपूर्ति नियंत्रित कर आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना,

विशेष कमांडो अभियान,

प्रमुख नेताओं को परिसर से बाहर पकड़ने का प्रयास,

SGPC और अकाली नेतृत्व के माध्यम से दबाव,

अथवा राजनीतिक समझौते के लिए और समय देना।

इनमें से प्रत्येक विकल्प के अपने जोखिम थे।

लंबी घेराबंदी धार्मिक भावनाओं को भड़का सकती थी और हजारों श्रद्धालुओं को संकट में डालती।

कमांडो अभियान विफल हो सकता था।

भिंडरांवाले के समर्थकों के पास संगठित रक्षा थी।

और सरकार को आशंका थी कि विलंब से किलेबंदी और मजबूत होगी।

लेकिन आलोचना यह है कि सरकार ने 1982–83 में, जब परिस्थिति इतनी सैन्यीकृत नहीं हुई थी, निर्णायक पुलिस और राजनीतिक उपाय नहीं किए।

अर्थात असली प्रश्न केवल यह नहीं है कि—

“जून 1984 में सेना भेजना उचित था या नहीं?”

अधिक गहरा प्रश्न है—

“क्या सरकार ने ऐसी स्थिति बनने दी जिसमें जून 1984 तक उसके विकल्प लगभग सभी खराब विकल्प बन चुके थे?”

19. ब्रिटिश सलाह का विवाद

2014 में सार्वजनिक दस्तावेजों से यह सामने आने के बाद बड़ा विवाद हुआ कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर की सरकार ने भारत को सैन्य सलाह दी थी।

ब्रिटिश सरकार की अपनी जांच ने स्वीकार किया कि फरवरी 1984 में एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी भारत आया था।

लेकिन उसने निष्कर्ष दिया कि उसकी सलाह केवल परामर्शात्मक थी और जून के वास्तविक ऑपरेशन पर उसका प्रभाव सीमित था।

विशेष रूप से ब्रिटिश रिपोर्ट ने कहा कि फरवरी में सुझाई गई अवधारणा में हेलिकॉप्टर और आश्चर्य तत्व शामिल थे, जबकि जून में भारतीय सेना ने व्यापक जमीनी हमला किया। जून तक हथियारबंद लोगों की संख्या और किलेबंदी भी काफी बढ़ चुकी थी।

इसलिए “ऑपरेशन ब्लू स्टार ब्रिटेन ने बनाया था” कहना उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड से समर्थित नहीं है।

लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भारत सरकार फरवरी तक सैन्य विकल्पों पर बाहरी विशेषज्ञ सलाह लेने के स्तर तक पहुंच चुकी थी।

20. पूरे पंजाब में ऑपरेशन

“ऑपरेशन ब्लू स्टार” शब्द अक्सर केवल स्वर्ण मंदिर की लड़ाई के लिए प्रयोग होता है, लेकिन सैन्य कार्रवाई पंजाब के अन्य धार्मिक स्थलों और संदिग्ध उग्रवादी ठिकानों तक भी फैली थी।

सेना ने राज्य के अन्य गुरुद्वारों में भी हथियारबंद व्यक्तियों की खोज और गिरफ्तारी के अभियान चलाए।

इसके बाद ग्रामीण क्षेत्रों में ऑपरेशन वुडरोज जैसी कार्रवाई हुई।

इन अभियानों में बड़ी संख्या में युवकों को हिरासत में लेने और ग्रामीण क्षेत्रों में कठोर सैन्य कार्रवाई के आरोप लगे।

इससे सिख ग्रामीण समाज में यह धारणा और गहरी हुई कि कार्रवाई केवल भिंडरांवाले के विरुद्ध नहीं बल्कि व्यापक समुदाय के विरुद्ध की जा रही है।

सरकारी दृष्टिकोण इसके विपरीत था—उसके अनुसार उद्देश्य उग्रवादी नेटवर्क को पुनर्गठित होने से रोकना था।

21. सिख सैनिकों में विद्रोह और विचलन

ऑपरेशन ब्लू स्टार का प्रभाव भारतीय सेना के भीतर भी महसूस हुआ।

देश के विभिन्न सैन्य ठिकानों पर कुछ सिख सैनिकों ने विद्रोह अथवा अनुशासनहीनता की।

बिहार के रामगढ़ स्थित सिख रेजिमेंटल सेंटर में गंभीर विद्रोह हुआ और हथियार उठाए गए।

एक बाद के न्यायिक निर्णय में दर्ज है कि 10 जून 1984 को रामगढ़ में सिख रेजिमेंट सेंटर के सैनिकों ने विद्रोह किया और हथियार लूटे; इसका कारण स्वर्ण मंदिर में सेना का प्रवेश और वहां हुआ रक्तपात बताया गया।

यह घटना ऑपरेशन के मनोवैज्ञानिक प्रभाव का असाधारण संकेत थी।

भारतीय सेना जैसे अनुशासित संस्थान में भी धार्मिक आघात ने कुछ सैनिकों को आदेश-व्यवस्था से विचलित कर दिया।

22. सामान्य सिख मानस पर प्रभाव

ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले भिंडरांवाले पूरे सिख समुदाय का निर्विवाद नेता नहीं था।

बहुत से सिख उसकी हिंसक राजनीति और कट्टर भाषा से असहमत थे।

लेकिन सेना का स्वर्ण मंदिर में प्रवेश एक ऐसी घटना थी जिसने राजनीतिक मतभेदों से कहीं व्यापक भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न की।

दुनिया भर में अनेक सिखों के लिए प्रश्न यह नहीं रह गया कि वे भिंडरांवाले का समर्थन करते हैं या नहीं।

प्रश्न बन गया—

भारतीय सेना उनके सबसे पवित्र धार्मिक परिसर में कैसे प्रवेश कर सकती है?

अकाल तख्त की क्षतिग्रस्त तस्वीरों ने इस आघात को कई गुना बढ़ा दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी बाद के मुकदमों में स्वीकार किया कि ऑपरेशन ने सिख समुदाय की धार्मिक भावनाओं को गंभीर रूप से आहत किया।

23. भिंडरांवाले की मृत्यु से विचार का विस्तार

सैन्य रूप से भिंडरांवाले मारा गया।

लेकिन राजनीतिक रूप से उसकी मृत्यु ने समस्या का अंत नहीं किया।

वह अपने समर्थकों के बीच शहीद बन गया।

उसकी तस्वीरें गुरुद्वारों, पोस्टरों और प्रवासी सिख समुदाय के कुछ हिस्सों में प्रतीक बन गईं।

जो खालिस्तान की मांग पहले सीमित संगठनों तक थी, उसे ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद नया भावनात्मक आधार मिला।

यह भारतीय राज्य के लिए एक गंभीर रणनीतिक विरोधाभास था—

ऑपरेशन ने भिंडरांवाले को समाप्त कर दिया, लेकिन उसके प्रतीकात्मक प्रभाव को कई गुना बढ़ा दिया।

24. अकाली राजनीति पर प्रभाव

अकाली नेतृत्व की स्थिति भी बदल गई।

संत हरचंद सिंह लोंगोवाल सहित अनेक अकाली नेताओं को ऑपरेशन के बाद हिरासत में लिया गया।

पारंपरिक अकाली नेतृत्व भिंडरांवाले और सरकार—दोनों के बीच दब गया था।

ऑपरेशन के बाद उसके सामने नई चुनौती थी—

सिख भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए भारतीय संघ के भीतर राजनीतिक समाधान खोजना।

इसी प्रक्रिया से अगले वर्ष राजीव-लोंगोवाल समझौता निकला।

लेकिन उग्रवादी समूहों ने उसे स्वीकार नहीं किया।

सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय में उल्लेख है कि ऑपरेशन के बाद हुए राजीव-लोंगोवाल समझौते को भिंडरांवाले समर्थक समूहों ने सिख गौरव के “समर्पण” के रूप में देखा और अगस्त 1985 में संत लोंगोवाल की हत्या कर दी गई।

25. इंदिरा गांधी पर प्रतिशोध का खतरा

ऑपरेशन के तत्काल बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए सुरक्षा खतरा अत्यंत गंभीर हो गया।

उनके सुरक्षा तंत्र में यह प्रश्न उठा कि क्या सिख अंगरक्षकों को प्रधानमंत्री की निकट सुरक्षा से हटाया जाना चाहिए।

लेकिन धार्मिक भेदभाव की छवि पैदा होने का प्रश्न भी था।

ऑपरेशन से नाराज उग्रवादी इंदिरा गांधी को सीधे जिम्मेदार मानते थे।

बाद के आपराधिक मुकदमों में यही प्रतिशोध इंदिरा गांधी की हत्या की साजिश के संदर्भ का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

सर्वोच्च न्यायालय ने उनके हत्या मामले में दर्ज किया कि ब्लू स्टार के कारण सिख धार्मिक भावनाओं में व्यापक आक्रोश पैदा हुआ और अभियोजन का मामला था कि इसी आक्रोश ने हत्या की साजिश की पृष्ठभूमि तैयार की।

26. जनरल वैद्य की हत्या

ब्लू स्टार की प्रतिशोध-श्रृंखला इंदिरा गांधी की हत्या के साथ समाप्त नहीं हुई।

ऑपरेशन के समय सेनाध्यक्ष रहे जनरल ए.एस. वैद्य 1986 में पुणे में उग्रवादियों द्वारा गोली मारकर हत्या कर दिए गए।

सर्वोच्च न्यायालय ने वैद्य हत्या प्रकरण में स्पष्ट रूप से ऑपरेशन ब्लू स्टार को हत्या के प्रतिशोधी उद्देश्य की पृष्ठभूमि माना।

यह दिखाता है कि जून 1984 के सैन्य अभियान के राजनीतिक परिणाम वर्षों तक जारी रहे।

27. ऑपरेशन सफल था या विफल?

इस प्रश्न के दो अलग उत्तर हैं।

सैन्य दृष्टि से

ऑपरेशन ने अपना तत्काल लक्ष्य हासिल किया।

भिंडरांवाले मारा गया।

शाबेग सिंह मारा गया।

अकाल तख्त में स्थापित हथियारबंद प्रतिरोध समाप्त किया गया।

परिसर सरकार के नियंत्रण में आ गया।

राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से

तस्वीर बहुत अधिक जटिल है।

अकाल तख्त की क्षति ने सिख भावनाओं को गहराई से आहत किया।

उग्रवाद समाप्त नहीं हुआ।

इसके बाद पंजाब में आतंकवाद और अधिक हिंसक हुआ।

इंदिरा गांधी की हत्या हुई।

जनरल वैद्य की हत्या हुई।

सिख सैनिकों में विद्रोह हुआ।

विदेशों में खालिस्तानी आंदोलन को नया प्रचार-आधार मिला।

इसलिए ब्लू स्टार टैक्टिकल सफलता लेकिन रणनीतिक रूप से अत्यंत महंगी कार्रवाई कहा जा सकता है।

28. क्या ऑपरेशन सिखों के खिलाफ था?

ऐतिहासिक विश्लेषण में इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट होना चाहिए।

भारत सरकार ने ऑपरेशन को सिख समुदाय के विरुद्ध नहीं बल्कि हथियारबंद उग्रवादियों के विरुद्ध कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया।

भारतीय सेना में बड़ी संख्या में सिख अधिकारी और सैनिक थे।

ऑपरेशन का आधिकारिक लक्ष्य भिंडरांवाले तथा हथियारबंद समूह थे।

इसलिए सरकारी नीति के स्तर पर इसे “सिखों के विरुद्ध युद्ध” कहना सटीक नहीं होगा।

लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही वास्तविक है—

कार्रवाई सिख धर्म के सर्वोच्च धार्मिक परिसरों में से एक में हुई,

अकाल तख्त क्षतिग्रस्त हुआ,

नागरिक श्रद्धालु मारे गए,

और पूरे समुदाय के बड़े हिस्से ने इसे अपनी धार्मिक अस्मिता पर हमला माना।

इतिहास के लिए दोनों तथ्यों को एक साथ स्वीकार करना आवश्यक है।

29. जिम्मेदारी का प्रश्न

ऑपरेशन ब्लू स्टार की पूरी जिम्मेदारी केवल एक पक्ष पर डाल देना ऐतिहासिक समस्या को सरल बना देता है।

हथियारबंद समूहों ने धार्मिक परिसर का उपयोग सशस्त्र ठिकाने के रूप में किया।

भिंडरांवाले के नेतृत्व के आसपास हत्या और भय की राजनीति बढ़ी।

SGPC और अकाली नेतृत्व परिसर के सैन्यीकरण को रोक नहीं सके।

पंजाब सरकार कानून-व्यवस्था बहाल नहीं कर सकी।

केंद्र सरकार ने समस्या को शुरुआती चरण में निर्णायक राजनीतिक या पुलिस समाधान से नियंत्रित नहीं किया।

और अंततः ऐसा सैन्य विकल्प चुना गया जिसने एक धार्मिक स्थल को युद्धक्षेत्र बना दिया।

अर्थात ऑपरेशन का इतिहास उग्रवादी जिम्मेदारी और राज्य की जिम्मेदारी—दोनों की जांच मांगता है।

एक को स्वीकार करने के लिए दूसरे को नकारना जरूरी नहीं है।

30. 1–10 जून 1984 : संक्षिप्त समयरेखा

1–2 जून — पंजाब में सेना की व्यापक तैनाती; स्वर्ण मंदिर परिसर की निगरानी और घेराबंदी तेज।

3 जून — कर्फ्यू, यातायात और संचार पर कठोर प्रतिबंध; गुरु अर्जन देव से जुड़े धार्मिक अवसर के कारण बड़ी संख्या में श्रद्धालु परिसर में मौजूद।

4 जून — सेना और परिसर के हथियारबंद लोगों के बीच तीव्र गोलीबारी।

5 जून — सेना का मुख्य जमीनी हमला शुरू।

5–6 जून की रात — अकाल तख्त क्षेत्र में सबसे भीषण लड़ाई; भारी हथियार और बख्तरबंद वाहन इस्तेमाल।

6 जून — भिंडरांवाले, शाबेग सिंह और अमरीक सिंह सहित प्रमुख हथियारबंद नेताओं की मृत्यु; अकाल तख्त पर सेना का नियंत्रण।

7 जून — परिसर के शेष हिस्सों की तलाशी और प्रतिरोध समाप्त करने की कार्रवाई जारी।

8 जून और उसके बाद — परिसर तथा पंजाब के अन्य क्षेत्रों में तलाशी, हिरासत और बाद के सुरक्षा अभियान।

10 जून के आसपास — विभिन्न सैन्य ठिकानों पर कुछ सिख सैनिकों में विद्रोह और अनुशासनहीनता की घटनाएं; रामगढ़ का विद्रोह प्रमुख उदाहरण।

निष्कर्ष — सैन्य विजय, राजनीतिक विस्फोट

ऑपरेशन ब्लू स्टार उस बिंदु पर हुआ जब पंजाब में कानून-व्यवस्था गंभीर संकट में थी और स्वर्ण मंदिर परिसर के भीतर वास्तविक हथियारबंद चुनौती स्थापित हो चुकी थी।

इस तथ्य को नकारना इतिहास को अधूरा बनाता है।

लेकिन उतना ही अधूरा यह कहना होगा कि चूंकि हथियारबंद लोग मौजूद थे, इसलिए ऑपरेशन का समय, तरीका और परिणाम स्वतः विवाद से परे हो जाते हैं।

सरकार को कार्रवाई करनी थी—यह एक तर्क है।

सरकार को इसी तरह कार्रवाई करनी थी—यह अलग और कहीं कठिन प्रश्न है।

ऑपरेशन ने तत्काल सैन्य लक्ष्य प्राप्त कर लिया, लेकिन इसकी राजनीतिक कीमत असाधारण थी।

भिंडरांवाले मारा गया, पर एक प्रतीक बन गया।

अकाल तख्त का सशस्त्र केंद्र समाप्त हुआ, लेकिन उसका क्षतिग्रस्त स्वरूप विश्व भर में सिख आक्रोश का प्रतीक बन गया।

हथियारबंद प्रतिरोध समाप्त हुआ, लेकिन पंजाब का उग्रवाद समाप्त नहीं हुआ।

और सबसे गंभीर परिणाम यह हुआ कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं प्रतिशोध का प्रमुख लक्ष्य बन गईं।

सर्वोच्च न्यायालय के बाद के निर्णयों ने भी ऑपरेशन ब्लू स्टार, सिख धार्मिक भावनाओं पर उसके प्रभाव, इंदिरा गांधी की हत्या और जनरल वैद्य की हत्या के बीच इस प्रतिशोधी क्रम को दर्ज किया है।

जून 1984 में भारतीय राज्य ने स्वर्ण मंदिर परिसर पर नियंत्रण वापस ले लिया था, लेकिन पंजाब संकट पर नियंत्रण नहीं पाया था।

वास्तव में संकट अब एक और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश कर चुका था।

अगले चार महीनों में प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ीं। उनके विरुद्ध प्रतिशोध की धमकियां सामने आईं। इसके बावजूद उनकी सुरक्षा व्यवस्था में दो सिख सुरक्षाकर्मी—बेअंत सिंह और सतवंत सिंह—तैनात रहे।

31 अक्टूबर 1984 की सुबह वही संकट प्रधानमंत्री आवास के भीतर पहुंच गया।