सूर शासन — 1540–1555
शेरशाह से इस्लाम शाह तक : मुगल सत्ता का अंतराल और प्रशासनिक पुनर्गठन
1540 में कन्नौज के युद्ध में हुमायूँ की पराजय के साथ उत्तर भारत में मुगल सत्ता का पहला चरण समाप्त हो गया। अगले लगभग पंद्रह वर्षों तक दिल्ली और आगरा पर मुगलों का शासन नहीं रहा। इस अवधि में अफगान मूल के सूर वंश ने सत्ता संभाली। इसीलिए 1526 से 1857 तक मुगल राजवंश की 331 वर्ष की ऐतिहासिक अवधि के भीतर 1540 से 1555 का समय एक स्पष्ट राजनीतिक अंतराल है।
सूर शासन का सबसे महत्वपूर्ण शासक शेरशाह सूरी था। उसने केवल हुमायूँ को पराजित कर दिल्ली की गद्दी प्राप्त नहीं की, बल्कि भूमि-राजस्व, सड़क, डाक, मुद्रा, सैन्य संगठन और प्रशासनिक नियंत्रण के क्षेत्र में ऐसी व्यवस्थाएँ विकसित कीं जिनका प्रभाव आगे अकबर के शासन पर भी दिखाई देता है।
इसलिए सूर शासन को केवल “मुगलों के बीच का पंद्रह वर्ष का अंतराल” मानना पर्याप्त नहीं है। यह उत्तर भारत के प्रशासनिक इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है।
शेरशाह सूरी कौन था?
शेरशाह का मूल नाम फरीद खान था। उसका परिवार अफगान सूर कबीले से संबंधित था।
उसके पिता हसन खान सूरी बिहार के सासाराम क्षेत्र से जुड़े एक जागीरदार थे। फरीद का प्रारंभिक जीवन पारिवारिक संघर्षों और प्रशासनिक अनुभव के बीच बीता।
युवावस्था में उसने अपने पिता की जागीर के प्रबंधन में रुचि ली और यहीं से उसे भूमि-राजस्व, कृषक व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन की व्यावहारिक समझ मिली।
बाद में वह बिहार के अफगान शासकों की सेवा में गया।
लोकप्रिय परंपरा के अनुसार एक शेर को अकेले मारने के कारण उसे “शेर खान” की उपाधि मिली।
हालांकि ऐसी कथाओं को पूरी तरह ऐतिहासिक प्रमाण मानना उचित नहीं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि 1520 और 1530 के दशक तक फरीद खान बिहार की अफगान राजनीति में प्रभावशाली व्यक्ति बन चुका था।
बाबर के समय शेर खान
बाबर के शासनकाल में भी शेर खान सक्रिय था।
उसने कुछ समय मुगल सत्ता के अधीन रहते हुए राजनीतिक परिस्थितियों को समझा। बाबर ने भी उसकी योग्यता को पहचाना था।
बाबर की मृत्यु के बाद जब हुमायूँ गद्दी पर बैठा, तब शेर खान ने धीरे-धीरे बिहार में अपनी शक्ति बढ़ानी शुरू की।
उसकी रणनीति स्पष्ट थी—सीधे मुगल सत्ता से टकराने के बजाय पहले स्थानीय आधार मजबूत करना।
उसने अफगान सरदारों को अपने साथ जोड़ा।
किलों पर नियंत्रण बढ़ाया।
राजस्व व्यवस्था संगठित की।
और बंगाल की दिशा में राजनीतिक विस्तार किया।
चुनार : रणनीतिक किला
गंगा घाटी के नियंत्रण में चुनार किले का बड़ा महत्व था।
हुमायूँ ने 1532 में चुनार की घेराबंदी की, लेकिन अंततः शेर खान के साथ समझौता कर लिया।
शेर खान ने औपचारिक अधीनता स्वीकार की और अपने पुत्र को मुगल दरबार भेजा।
हुमायूँ ने इसे पर्याप्त समझा और वापस लौट गया।
यही अवसर शेर खान के लिए वरदान सिद्ध हुआ।
उसे अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए समय मिल गया।
उसने बिहार पर नियंत्रण मजबूत किया और फिर बंगाल की दिशा में बढ़ा।
बंगाल पर प्रभाव
बंगाल उस समय आर्थिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध क्षेत्र था।
उपजाऊ भूमि, व्यापार, नदियों का जाल और घनी आबादी ने इसे रणनीतिक और वित्तीय दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण बनाया था।
शेर खान ने बंगाल के आंतरिक संघर्षों का लाभ उठाया।
धीरे-धीरे उसका प्रभाव इतना बढ़ा कि वह केवल बिहार का अफगान सरदार नहीं रहा, बल्कि पूर्वी भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गया।
हुमायूँ ने जब तक उसकी शक्ति का वास्तविक आकलन किया, तब तक वह काफी मजबूत हो चुका था।
चौसा : निर्णायक मोड़
1539 में हुमायूँ और शेर खान की सेनाएँ चौसा के निकट आमने-सामने थीं।
26 जून 1539 को शेर खान ने अचानक हमला किया।
मुगल सेना बिखर गई।
हुमायूँ बड़ी कठिनाई से जान बचाकर निकला।
यह शेर खान की निर्णायक विजय थी।
इस युद्ध के बाद उसने “शेरशाह” की उपाधि धारण की और स्वतंत्र शासक के रूप में अपना अधिकार घोषित किया।
लेकिन दिल्ली अभी उसके हाथ में नहीं आई थी।
इसके लिए एक और युद्ध आवश्यक था।
कन्नौज : मुगल सत्ता का पतन
मई 1540 में कन्नौज या बिलग्राम के युद्ध में हुमायूँ और शेरशाह फिर आमने-सामने हुए।
इस बार भी हुमायूँ पराजित हुआ।
अब दिल्ली और आगरा शेरशाह के लिए खुल गए।
हुमायूँ को भारत छोड़ना पड़ा।
1540 से उत्तर भारत में सूर वंश का शासन स्थापित हो गया।
यह वही बिंदु है जहां मुगल शासन लगभग पंद्रह वर्ष के लिए टूट जाता है।
शेरशाह का राज्यारोहण
दिल्ली पर अधिकार करने के बाद शेरशाह ने स्वयं को सम्राट घोषित किया।
उसका शासन 1540 से 1545 तक चला।
केवल लगभग पांच वर्ष के इस शासनकाल में उसने जिस प्रशासनिक सक्रियता का परिचय दिया, उसी कारण उसका नाम भारतीय प्रशासनिक इतिहास में विशेष स्थान रखता है।
उसने केवल विजय को पर्याप्त नहीं माना।
उसने शासन को सुव्यवस्थित करने का प्रयास किया।
यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता थी।
प्रशासनिक विभाजन
शेरशाह ने साम्राज्य को प्रशासनिक इकाइयों में बांटा।
विभिन्न क्षेत्रों में अधिकारियों की नियुक्ति की गई।
राजस्व, कानून-व्यवस्था और सैन्य नियंत्रण को अलग-अलग स्तरों पर व्यवस्थित किया गया।
स्थानीय अधिकारियों पर नियंत्रण रखने की कोशिश की गई ताकि वे अत्यधिक स्वतंत्र न हो जाएँ।
उसकी प्रशासनिक प्रणाली आगे मुगल शासन के संगठन में उपयोगी सिद्ध हुई।
अकबर ने बाद में अधिक व्यापक स्तर पर जिन व्यवस्थाओं को विकसित किया, उनमें सूर काल के प्रशासनिक अनुभव की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
भूमि-राजस्व व्यवस्था
शेरशाह की सबसे चर्चित उपलब्धियों में भूमि-राजस्व व्यवस्था थी।
उसने खेती योग्य भूमि के मापन पर जोर दिया।
भूमि की गुणवत्ता और फसल की प्रकृति के आधार पर राजस्व निर्धारित करने का प्रयास किया गया।
किसानों को उनके दायित्व स्पष्ट करने के लिए लिखित व्यवस्था विकसित की गई।
दो शब्द विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं—
पट्टा — इसमें किसान की भूमि और देय राजस्व का विवरण दर्ज किया जाता था।
कबूलियत — किसान द्वारा निर्धारित राजस्व स्वीकार करने का लिखित दस्तावेज।
इस व्यवस्था का उद्देश्य मनमानी वसूली को सीमित करना था।
लेकिन व्यवहार में हर क्षेत्र में यह व्यवस्था समान रूप से लागू हुई हो, ऐसा मानना सही नहीं होगा।
मध्यकालीन प्रशासन की क्षमता सीमित थी और स्थानीय अधिकारियों की भूमिका बहुत बड़ी थी।
किसान और राज्य
शेरशाह ने किसानों को राज्य की आय का मूल आधार माना।
उसने अधिकारियों को निर्देश दिया कि युद्ध या सैन्य अभियान के दौरान खेती को अनावश्यक नुकसान न पहुँचाया जाए।
यदि सेना के कारण खेतों को नुकसान होता तो क्षतिपूर्ति की व्यवस्था की जानी चाहिए—ऐसे निर्देशों का उल्लेख इतिहास स्रोतों में मिलता है।
इस नीति का उद्देश्य केवल किसान कल्याण नहीं था।
इसके पीछे स्पष्ट आर्थिक तर्क था।
कृषि सुरक्षित रहेगी तभी राज्य को नियमित राजस्व मिलेगा।
इस प्रकार शेरशाह की किसान नीति में व्यावहारिक प्रशासनिक दृष्टि दिखाई देती है।
रुपया : मुद्रा व्यवस्था
शेरशाह ने मुद्रा व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार किया।
उसके शासन में उच्च गुणवत्ता वाला चांदी का सिक्का जारी किया गया, जिसे “रुपया” कहा गया।
रुपये की परंपरा बाद के मुगल शासन में भी जारी रही और बहुत लंबे समय तक भारतीय मुद्रा प्रणाली पर इसका प्रभाव बना रहा।
सोने और तांबे के सिक्कों की व्यवस्था भी थी।
मानक वजन और गुणवत्ता वाली मुद्रा ने व्यापार और राजस्व दोनों में सहायता की।
यह शेरशाह की सबसे स्थायी आर्थिक विरासतों में गिनी जाती है।
सड़क व्यवस्था
शेरशाह का नाम सबसे अधिक उसकी सड़क व्यवस्था के साथ जोड़ा जाता है।
उसने साम्राज्य के विभिन्न भागों को जोड़ने वाली प्रमुख सड़कों की मरम्मत, विस्तार और सुरक्षा पर ध्यान दिया।
सबसे प्रसिद्ध मार्ग बंगाल से उत्तर भारत होते हुए पंजाब और आगे पश्चिमोत्तर क्षेत्र तक जाता था।
आगे ब्रिटिश काल में इसी बड़े मार्ग के अनेक हिस्सों को “ग्रैंड ट्रंक रोड” के रूप में विकसित किया गया।
इसलिए यह कहना कि पूरी आधुनिक ग्रैंड ट्रंक रोड शेरशाह ने शून्य से बनाई थी, सरलीकरण होगा।
इनमें कई प्राचीन मार्ग पहले से मौजूद थे।
शेरशाह का योगदान उन्हें व्यवस्थित करना, जोड़ना और प्रशासनिक उपयोग के लिए विकसित करना था।
सरायों का निर्माण
सड़कों के साथ निश्चित दूरी पर सरायें बनाई गईं।
इनका उपयोग यात्रियों, व्यापारियों, सैनिकों और शाही संदेशवाहकों द्वारा किया जाता था।
सराय केवल विश्रामस्थल नहीं थीं।
वे प्रशासनिक और संचार केंद्र भी बन सकती थीं।
कई स्थानों पर पानी, घोड़ों और यात्रियों की सुविधा की व्यवस्था रहती थी।
सड़क और सराय के इस जाल ने राज्य के विभिन्न हिस्सों के बीच संपर्क मजबूत किया।
डाक और संदेश व्यवस्था
शेरशाह ने डाक और शाही संदेश व्यवस्था को भी संगठित किया।
सरायों और निर्धारित पड़ावों पर घोड़े और संदेशवाहक रखे जाते थे।
इससे शाही आदेश अपेक्षाकृत तेजी से दूर-दराज क्षेत्रों तक पहुंच सकते थे।
मध्यकालीन साम्राज्य के लिए तेज सूचना-प्रवाह अत्यंत महत्वपूर्ण था।
किसी विद्रोह, सैन्य खतरे या प्रशासनिक समस्या की सूचना जितनी तेजी से राजधानी तक पहुंचती, राज्य उतनी जल्दी प्रतिक्रिया दे सकता था।
इसलिए सड़क और डाक व्यवस्था को केवल जनसुविधा के रूप में नहीं बल्कि राज्य की शक्ति के उपकरण के रूप में भी देखना चाहिए।
कानून और व्यवस्था
शेरशाह ने मार्गों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया।
चोरी या लूट की घटनाओं के लिए स्थानीय अधिकारियों और गांवों को जिम्मेदार ठहराने की व्यवस्था थी।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि व्यापारिक मार्ग सुरक्षित रहें।
व्यापारियों और यात्रियों की सुरक्षा से राज्य को भी लाभ होता था क्योंकि व्यापार बढ़ने से कर और बाजार गतिविधियाँ बढ़ती थीं।
उसने स्थानीय अधिकारियों पर कठोर निगरानी रखी।
उसकी प्रशासनिक छवि एक ऐसे शासक की बनी जो भ्रष्टाचार और लापरवाही को सहन नहीं करता था।
सेना का संगठन
शेरशाह स्वयं एक अनुभवी सैनिक था।
उसने सेना पर व्यक्तिगत नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश की।
घोड़ों की पहचान और सैनिकों का विवरण दर्ज करने जैसी व्यवस्थाएँ आगे मुगल सैन्य प्रशासन में भी दिखाई देती हैं।
घोड़ों पर दाग लगाने की व्यवस्था का उद्देश्य यह रोकना था कि अधिकारी निरीक्षण के समय घटिया घोड़े प्रस्तुत कर वेतन या भत्ते में धोखाधड़ी करें।
सैनिकों का विवरण रखने से काल्पनिक सैनिक दिखाकर धन लेने की संभावना कम होती थी।
यह सैन्य संगठन प्रशासनिक अनुशासन का हिस्सा था।
भ्रष्टाचार पर नियंत्रण
शेरशाह अधिकारियों की शक्तियों को सीमित रखने के पक्ष में था।
वह स्थानांतरण और निरीक्षण के माध्यम से उन्हें नियंत्रित करता था।
उसकी चिंता यह थी कि कोई अधिकारी किसी क्षेत्र में इतना शक्तिशाली न हो जाए कि वह केंद्रीय सत्ता को चुनौती देने लगे।
इस नीति के पीछे उसका अपना राजनीतिक अनुभव भी था।
वह स्वयं एक क्षेत्रीय अफगान अधिकारी से बढ़कर शासक बना था।
इसलिए वह जानता था कि कमजोर केंद्र और शक्तिशाली स्थानीय सरदार साम्राज्य को कैसे चुनौती दे सकते हैं।
न्याय की छवि
शेरशाह से जुड़ी अनेक कथाएँ उसे कठोर लेकिन न्यायप्रिय शासक के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
कुछ वर्णन बताते हैं कि उसने अपने परिवार या उच्च अधिकारियों के खिलाफ भी शिकायत होने पर कार्रवाई की।
ऐसी कथाओं में बाद की प्रशस्तिपरक परंपरा भी शामिल हो सकती है।
इसलिए प्रत्येक कथा को अक्षरशः ऐतिहासिक तथ्य मानने से पहले स्रोत की प्रकृति देखनी चाहिए।
फिर भी इतना स्पष्ट है कि शेरशाह की शासन-छवि में न्याय और प्रशासनिक अनुशासन को केंद्रीय स्थान दिया गया।
व्यापारिक व्यवस्था
शेरशाह की सड़क, सुरक्षा और मुद्रा संबंधी नीतियों से व्यापार को लाभ हुआ।
मानक सिक्का लेन-देन को सरल बनाता था।
सुरक्षित मार्ग व्यापारियों को लंबी दूरी तक जाने में मदद करते थे।
सराय और संचार व्यवस्था ने यात्रा आसान की।
राज्य को भी इससे सीमा शुल्क, बाजार कर और अन्य राजस्व मिलते थे।
इस प्रकार व्यापार और शासन एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
रोहतास और सैन्य वास्तुकला
शेरशाह ने कई किलों और भवनों का निर्माण कराया।
वर्तमान पाकिस्तान में स्थित रोहतास किला उसकी महत्वपूर्ण सैन्य परियोजनाओं में गिना जाता है।
यह उत्तर-पश्चिमी मार्ग और स्थानीय शक्तियों पर नियंत्रण के लिए बनाया गया था।
दिल्ली के पुराने किले के परिसर में स्थित किला-ए-कुहना मस्जिद और शेर मंडल से भी सूर काल जुड़ा हुआ है।
सासाराम में शेरशाह का मकबरा उसकी स्थापत्य विरासत का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
जलाशय के बीच स्थित यह विशाल मकबरा हिंदुस्तानी और इस्लामी स्थापत्य तत्वों का प्रभावशाली संयोजन प्रस्तुत करता है।
बंगाल से सिंध तक नियंत्रण का प्रयास
शेरशाह ने अपने शासनकाल में उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर अधिकार स्थापित किया।
बंगाल, बिहार, दिल्ली, आगरा, पंजाब के हिस्से और मध्य भारत तक उसका प्रभाव था।
उसने मालवा और राजस्थान की दिशा में भी अभियान किए।
हालांकि उसका राज्य आधुनिक भारत की वर्तमान सीमाओं के पूरे भूभाग पर नहीं था।
दक्कन और दक्षिण भारत का बड़ा हिस्सा उसकी सत्ता से बाहर था।
फिर भी पांच वर्षों में उसने उत्तर भारतीय साम्राज्य को काफी व्यापक रूप दिया।
रायसीन अभियान
1543 के आसपास शेरशाह ने रायसीन के शासक पूरनमल के विरुद्ध अभियान किया।
इस अभियान और उसके बाद हुई घटनाओं को लेकर इतिहास में गंभीर विवाद है।
समकालीन स्रोतों के अनुसार समझौते के बाद पूरनमल और उसके लोगों को सुरक्षा का आश्वासन दिया गया था, लेकिन बाद में संघर्ष और व्यापक हत्या हुई।
यह घटना शेरशाह की न्यायप्रिय छवि पर महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करती है।
इसीलिए उसके शासन का मूल्यांकन करते समय केवल प्रशासनिक उपलब्धियों को देखना पर्याप्त नहीं है।
मध्यकालीन साम्राज्यवादी राजनीति की हिंसा उसके शासन का भी हिस्सा थी।
मारवाड़ और मालदेव
राजस्थान में मारवाड़ के शासक राव मालदेव राठौड़ एक बड़ी शक्ति थे।
1544 में शेरशाह ने उनके विरुद्ध अभियान किया।
सम्मेल या गिरी-सुमेल के युद्ध से जुड़ा एक प्रसिद्ध कथन शेरशाह के नाम से जोड़ा जाता है कि वह “एक मुट्ठी बाजरे के लिए हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता।”
इस कथन की लोकप्रियता बहुत है, लेकिन इतिहास में ऐसे वाक्यों को स्रोत-समीक्षा के साथ लेना चाहिए।
संघर्ष के बाद शेरशाह ने मारवाड़ के कुछ क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया, लेकिन राजपूत प्रतिरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
कालिंजर का अंतिम अभियान
1545 में शेरशाह ने बुंदेलखंड के कालिंजर दुर्ग पर अभियान किया।
यह वही शक्तिशाली किला था जिस पर हुमायूँ भी अपने शासन के प्रारंभ में अभियान कर चुका था।
शेरशाह की सेना ने किले की घेराबंदी की।
22 मई 1545 के आसपास बारूद से संबंधित विस्फोट में शेरशाह गंभीर रूप से जल गया।
इसके बावजूद उसकी सेना ने अभियान जारी रखा और किले पर अधिकार किया।
कुछ समय बाद शेरशाह की मृत्यु हो गई।
उसने केवल लगभग पांच वर्ष दिल्ली के सम्राट के रूप में शासन किया।
लेकिन इन पांच वर्षों में उसका प्रशासनिक प्रभाव उसकी शासन-अवधि से कहीं बड़ा सिद्ध हुआ।
शेरशाह के बाद इस्लाम शाह
शेरशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जलाल खान “इस्लाम शाह सूरी” के नाम से गद्दी पर बैठा।
उसका शासन 1545 से 1553 तक चला।
इस्लाम शाह अपने पिता जितना प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन सूर सत्ता को कुछ वर्षों तक एकजुट रखने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अफगान सरदारों को नियंत्रित करने की थी।
अफगान राजनीतिक परंपरा में सरदार अपने को अत्यधिक स्वतंत्र समझते थे।
शेरशाह की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा उन्हें नियंत्रित कर सकती थी।
इस्लाम शाह को यह नियंत्रण कठोर प्रशासन और दमन के माध्यम से बनाए रखना पड़ा।
इस्लाम शाह की कठोरता
इस्लाम शाह ने शक्तिशाली अफगान अमीरों की स्वतंत्रता सीमित करने की कोशिश की।
कई विद्रोह हुए।
उसने संदिग्ध सरदारों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की।
उसकी नीति का उद्देश्य केंद्रीय सत्ता को मजबूत करना था।
लेकिन इससे अफगान अभिजात वर्ग के बीच असंतोष भी बढ़ा।
सूर साम्राज्य की एक मूल समस्या यही थी—
उसकी शक्ति अफगान सरदारों के सहयोग पर निर्भर थी, लेकिन वही सरदार अत्यधिक केंद्रीय नियंत्रण स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं रहते थे।
हुमायूँ के लिए रास्ता अभी बंद था
इस्लाम शाह के शासनकाल में हुमायूँ तुरंत भारत वापस नहीं आ सका।
उस समय वह कंधार और काबुल में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा था।
जब तक इस्लाम शाह जीवित रहा, सूर सत्ता में पर्याप्त शक्ति बनी रही।
इसलिए हुमायूँ ने प्रत्यक्ष बड़ा आक्रमण नहीं किया।
निर्णायक अवसर इस्लाम शाह की मृत्यु के बाद पैदा हुआ।
1553 : उत्तराधिकार संकट
1553 में इस्लाम शाह की मृत्यु हो गई।
उसके बाद उसका अल्पायु पुत्र फिरोज शाह गद्दी पर बैठा।
लेकिन कुछ ही दिनों में उसकी हत्या कर दी गई।
मुबारिज खान ने सत्ता पर कब्जा कर “मुहम्मद आदिल शाह” की उपाधि धारण की।
यहीं से सूर साम्राज्य तेजी से टूटने लगा।
विभिन्न अफगान सरदारों ने स्वतंत्र दावे शुरू कर दिए।
सूर साम्राज्य का विखंडन
अब एक ही सूर सम्राट की सत्ता नहीं थी।
सिकंदर शाह सूरी ने पंजाब और दिल्ली की दिशा में दावा किया।
इब्राहिम सूरी ने अलग क्षेत्र में अपना अधिकार स्थापित किया।
मुहम्मद आदिल शाह की अपनी सत्ता थी।
बंगाल में भी अलग शक्तियाँ उभरने लगीं।
एक समय ऐसा आया जब सूर वंश के कई दावेदार एक साथ “बादशाह” होने का दावा कर रहे थे।
शेरशाह ने जिस केंद्रीय सत्ता को अपने सैन्य और प्रशासनिक कौशल से बनाया था, उसकी व्यक्तिगत आधारशिला उसके उत्तराधिकारियों में टिक नहीं सकी।
हेमू का उदय
सूर शासन के अंतिम चरण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्ति उभरा—हेमचंद्र, जिसे इतिहास में हेमू के नाम से जाना जाता है।
वह प्रारंभ में व्यापार और आपूर्ति से जुड़े कार्यों में था, लेकिन अपनी प्रशासनिक और सैनिक प्रतिभा के कारण मुहम्मद आदिल शाह के शासन में तेजी से ऊपर उठा।
आगे वह प्रधान मंत्री और प्रमुख सेनापति जैसा प्रभावशाली अधिकारी बन गया।
उसने आदिल शाह की ओर से कई विरोधी शक्तियों को पराजित किया।
1555 में हुमायूँ की वापसी के समय सूर सत्ता बिखरी हुई थी, लेकिन हेमू का राजनीतिक और सैन्य उदय जारी था।
हुमायूँ की मृत्यु के बाद यही व्यक्ति दिल्ली पर अधिकार कर अकबर के सामने सबसे गंभीर चुनौती बनेगा।
हुमायूँ की पुनर्वापसी
सूर वंश के आंतरिक संघर्ष ने हुमायूँ को वह अवसर दिया जिसका वह वर्षों से इंतजार कर रहा था।
काबुल से उसने भारत की ओर अभियान किया।
बैरम खान उसकी सेना का प्रमुख आधार था।
1555 में मुगल सेना पंजाब में आगे बढ़ी।
लाहौर पर अधिकार हुआ।
फिर सरहिंद में सिकंदर सूरी की सेना से निर्णायक संघर्ष हुआ।
22 जून 1555 को मुगल सेना ने सिकंदर सूरी को पराजित कर दिया।
इसके बाद दिल्ली और आगरा की राह खुल गई।
जुलाई 1555 में हुमायूँ दिल्ली में वापस आ गया।
लगभग पंद्रह वर्ष का सूर शासन समाप्त हो गया।
लेकिन सूर शक्ति पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी।
अफगान प्रतिरोध जारी रहा और हेमू शीघ्र ही फिर दिल्ली पर अधिकार करने वाला था।
सूर शासन क्यों टूटा?
सूर साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण यह नहीं था कि उसकी प्रशासनिक व्यवस्था खराब थी।
सबसे बड़ी समस्या उत्तराधिकार थी।
शेरशाह जैसा शक्तिशाली संस्थापक केवल पांच वर्ष शासन कर पाया।
इस्लाम शाह ने आठ वर्ष तक राज्य संभाला, लेकिन उसके बाद स्थिर उत्तराधिकारी नहीं था।
अफगान सरदारों में परस्पर प्रतिस्पर्धा बढ़ गई।
केंद्रीय सत्ता कई हिस्सों में बंट गई।
सैन्य संसाधन आपसी युद्धों में खर्च होने लगे।
इस विखंडन का लाभ हुमायूँ ने उठाया।
इसलिए सूर शासन का अंत बाहरी आक्रमण जितना ही आंतरिक राजनीतिक विघटन का परिणाम था।
क्या अकबर ने शेरशाह की व्यवस्था अपनाई?
यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अक्सर कहा जाता है कि अकबर की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था शेरशाह से ली गई थी।
यह भी अतिशयोक्ति है।
शेरशाह से पहले भी दिल्ली सल्तनत में भूमि-राजस्व, मुद्रा, सड़क, डाक और सैन्य प्रशासन की व्यवस्थाएँ मौजूद थीं।
शेरशाह ने इनमें कई महत्वपूर्ण सुधार किए।
अकबर ने बाद में अपने विशाल साम्राज्य की आवश्यकताओं के अनुसार इन्हें अधिक संगठित, विस्तृत और संस्थागत रूप दिया।
इसलिए अधिक सही निष्कर्ष यह है कि शेरशाह ने पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं को सुधारकर एक मजबूत मॉडल प्रस्तुत किया और अकबर के प्रशासन ने उन अनुभवों सहित अनेक परंपराओं को आगे विकसित किया।
शेरशाह और अकबर : अंतर
दोनों में कुछ समानताएँ थीं।
दोनों ने भूमि-राजस्व व्यवस्था पर गंभीर ध्यान दिया।
दोनों ने स्थानीय अधिकारियों और अभिजात वर्ग को केंद्रीय सत्ता के अधीन रखने की कोशिश की।
दोनों ने सड़क और संचार को राज्य की शक्ति से जोड़ा।
दोनों समझते थे कि केवल सैन्य विजय से विशाल साम्राज्य नहीं चलता।
लेकिन दोनों की राजनीतिक परिस्थितियाँ अलग थीं।
शेरशाह के पास केवल पांच वर्ष थे।
अकबर ने लगभग आधी शताब्दी शासन किया।
अकबर के पास अपनी नीतियों को कई दशकों तक विकसित और संशोधित करने का अवसर था।
शेरशाह को वह समय नहीं मिला।
सूर शासन की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ
सूर काल की प्रमुख उपलब्धियों को व्यापक रूप से पांच क्षेत्रों में देखा जा सकता है।
पहला—भूमि-राजस्व के अधिक व्यवस्थित निर्धारण का प्रयास।
दूसरा—मानक मुद्रा, विशेषकर चांदी के रुपये को मजबूत आधार देना।
तीसरा—सड़कों, सरायों और डाक व्यवस्था का विस्तार।
चौथा—केंद्रीय प्रशासन और स्थानीय अधिकारियों पर नियंत्रण।
पांचवां—तेज और गतिशील सैन्य संगठन।
इन सुधारों के कारण सूर शासन की ऐतिहासिक महत्ता उसकी पंद्रह वर्ष की छोटी अवधि से कहीं अधिक है।
सीमाएँ और कठोर पक्ष
शेरशाह की प्रशंसा करते समय उसके शासन की सीमाएँ नहीं भूलनी चाहिए।
वह भी एक मध्यकालीन साम्राज्यवादी शासक था।
सत्ता विस्तार के लिए युद्ध किए गए।
दमन हुआ।
राजपूत शासकों से संघर्षों में हिंसा हुई।
रायसीन जैसी घटनाएँ उसकी न्यायप्रिय छवि को जटिल बनाती हैं।
राजस्व व्यवस्था का उद्देश्य मुख्य रूप से राज्य की आय को सुनिश्चित करना था।
किसानों को संरक्षण का लाभ मिल सकता था, लेकिन वे राज्य के राजस्व तंत्र का मूल आधार भी थे।
इसलिए शेरशाह को आधुनिक जनकल्याणकारी शासक के रूप में प्रस्तुत करना इतिहास पर आधुनिक अवधारणाएँ थोपना होगा।
उसकी विशेषता अपने युग के संदर्भ में अधिक कुशल प्रशासन थी।
1540–1555 : प्रमुख समयरेखा
मई 1540 — कन्नौज/बिलग्राम का युद्ध हुमायूँ पराजित; शेरशाह का दिल्ली और आगरा पर अधिकार।
1540 — सूर शासन की स्थापना शेरशाह उत्तर भारत का प्रमुख सम्राट बना।
1540–1545 — प्रशासनिक पुनर्गठन भूमि-राजस्व, मुद्रा, सड़क, सराय, डाक और सैन्य व्यवस्था में सुधार।
1543 के आसपास — रायसीन अभियान पूरनमल के विरुद्ध संघर्ष और विवादास्पद रक्तपात।
1544 — मारवाड़ अभियान राव मालदेव राठौड़ से संघर्ष।
1545 — कालिंजर अभियान बारूद विस्फोट में शेरशाह गंभीर रूप से घायल; बाद में मृत्यु।
1545 — इस्लाम शाह सूरी का राज्यारोहण सूर सत्ता को अगले लगभग आठ वर्षों तक बनाए रखा।
1545–1553 — इस्लाम शाह का शासन अफगान अमीरों पर केंद्रीय नियंत्रण मजबूत करने का प्रयास।
1553 — इस्लाम शाह की मृत्यु उत्तराधिकार संकट प्रारंभ।
1553 — फिरोज शाह की हत्या मुहम्मद आदिल शाह का उदय।
1553–1555 — सूर सत्ता का विखंडन सिकंदर सूरी, इब्राहिम सूरी, आदिल शाह और अन्य दावेदारों में संघर्ष।
1555 — हुमायूँ का भारत अभियान मुगल सेना पंजाब की ओर बढ़ी।
22 जून 1555 — सरहिंद का युद्ध सिकंदर सूरी पर मुगल विजय।
जुलाई 1555 — दिल्ली की पुनर्प्राप्ति हुमायूँ फिर दिल्ली की गद्दी पर; सूर शासन का केंद्रीय चरण समाप्त।
सूर शासन का ऐतिहासिक महत्व
सूर शासन भारतीय इतिहास में एक अनोखी स्थिति रखता है।
उसने मुगल साम्राज्य की पहली स्थापना और उसकी वास्तविक संस्थागत मजबूती के बीच सेतु का काम किया।
बाबर विजेता था।
हुमायूँ अपनी पहली अवधि में साम्राज्य को स्थिर नहीं कर सका।
शेरशाह ने उसी राजनीतिक क्षेत्र में अधिक नियंत्रित प्रशासन स्थापित करने का प्रयास किया।
फिर अकबर ने वापस आई मुगल सत्ता को कहीं अधिक व्यापक और दीर्घजीवी संस्थागत रूप दिया।
इसलिए शेरशाह को केवल “हुमायूँ को हराने वाला अफगान शासक” मानना उसकी ऐतिहासिक भूमिका को बहुत छोटा कर देना होगा।
निष्कर्ष
1540 से 1555 का सूर काल मुगल इतिहास का विराम अवश्य था, लेकिन भारतीय प्रशासनिक इतिहास का विराम नहीं।
हुमायूँ की पराजय ने शेरशाह को अवसर दिया।
शेरशाह ने केवल दिल्ली की गद्दी नहीं जीती; उसने अपने छोटे शासनकाल में राज्य को राजस्व, सड़क, डाक, मुद्रा और सैन्य अनुशासन के माध्यम से अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया।
1545 में उसकी असमय मृत्यु ने इस व्यवस्था को ऐसे उत्तराधिकारियों के हाथों में छोड़ दिया जिनके पास उसकी जैसी राजनीतिक प्रतिष्ठा नहीं थी।
इस्लाम शाह ने कुछ समय तक साम्राज्य संभाला, लेकिन 1553 के बाद उत्तराधिकार संघर्ष ने सूर सत्ता को तोड़ दिया।
1555 में हुमायूँ लौट आया।
इस प्रकार पंद्रह वर्ष के अंतराल के बाद दिल्ली में मुगल सत्ता फिर स्थापित हुई।
लेकिन इस अंतराल ने मुगलों को एक बड़ी सीख दी थी—
केवल युद्ध जीतना पर्याप्त नहीं है; साम्राज्य को टिकाने के लिए राजस्व, सड़क, संचार, सेना और प्रशासन—सबको एक व्यवस्थित संरचना में बांधना पड़ता है।
यही पाठ अकबर के शासन में कहीं अधिक व्यापक रूप में सामने आया।