अकबर — 1556–1605
मुगल साम्राज्य का प्रमुख निर्माता : युद्ध, प्रशासन, राजपूत नीति, धार्मिक प्रयोग और साम्राज्य-विस्तार
मुगल इतिहास में जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर का शासन निर्णायक मोड़ था। बाबर ने भारत में मुगल सत्ता की नींव रखी थी, हुमायूँ ने उस सत्ता को खोकर फिर प्राप्त किया, लेकिन अकबर ने उसे एक स्थायी, संगठित और विशाल साम्राज्य में बदल दिया। लगभग आधी शताब्दी के उसके शासन में मुगल राज्य पंजाब और दिल्ली-आगरा तक सीमित अस्थिर सत्ता से निकलकर उत्तर, पश्चिम, पूर्व और मध्य भारत के विशाल भूभाग पर प्रभावी साम्राज्य बन गया।
अकबर की उपलब्धि केवल क्षेत्र जीतने में नहीं थी। उससे पहले भी भारतीय इतिहास में बड़े साम्राज्य बने थे। उसकी विशिष्टता यह थी कि उसने विभिन्न नस्लीय, धार्मिक, क्षेत्रीय और राजनीतिक समूहों को एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था में जोड़ने का प्रयास किया जिसमें सम्राट सर्वोच्च केंद्र था। उसने मनसबदारी व्यवस्था विकसित की, भूमि-राजस्व प्रणाली को व्यवस्थित किया, प्रांतों का पुनर्गठन किया, राजपूत शासकों को सत्ता-संरचना में स्थान दिया और धार्मिक मामलों में धीरे-धीरे उलेमा के प्रभाव से स्वयं को स्वतंत्र किया। उसके शासन में फारसी दरबारी संस्कृति और भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं का व्यापक मेल भी दिखाई देता है।
लेकिन अकबर का इतिहास केवल सहिष्णुता और सांस्कृतिक समन्वय की कहानी नहीं है। उसका साम्राज्य युद्ध और विजय के माध्यम से बना था। चित्तौड़ की विजय के बाद व्यापक रक्तपात हुआ। अनेक राजपूत और अफगान शक्तियों से कठोर सैन्य संघर्ष हुए। गुजरात, बंगाल, कश्मीर, सिंध और दक्कन तक साम्राज्य का विस्तार बल प्रयोग से हुआ। इसलिए अकबर को समझने के लिए उसके शासन के दोनों पक्ष—साम्राज्यवादी सैन्य शक्ति और राजनीतिक समावेशन—एक साथ देखने आवश्यक हैं।
अमरकोट में जन्म : राज्यविहीन पिता का पुत्र
अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 को सिंध के अमरकोट में हुआ। उस समय उसके पिता हुमायूँ दिल्ली के सम्राट नहीं थे। वे शेरशाह सूरी से पराजित होकर भटक रहे थे और अमरकोट के स्थानीय राजपूत शासक ने उन्हें आश्रय दिया था।
यह मुगल इतिहास की बड़ी विडंबना थी।
जिस व्यक्ति ने आगे चलकर मुगल साम्राज्य को सबसे मजबूत राजनीतिक संरचना दी, उसका जन्म तब हुआ जब उसके पिता के पास अपना राज्य तक नहीं था।
उसकी माता हमीदा बानो बेगम थीं।
अकबर का प्रारंभिक जीवन स्थिर राजमहल में नहीं बल्कि राजनीतिक संघर्ष, प्रवास और सैन्य वातावरण में बीता। औपचारिक शिक्षा सीमित रही। उसके पढ़ने-लिखने की क्षमता को लेकर इतिहासकारों में बहस रही है, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि उसे पुस्तकों, विद्वानों, धार्मिक विचारों, इतिहास, कला और ज्ञान में गहरी रुचि थी। वह ग्रंथों को स्वयं न पढ़ पाने की स्थिति में भी विद्वानों से पढ़वाकर सुनता था। ईरानिका भी उसके औपचारिक शिक्षण की सीमाओं के साथ उसकी असाधारण जिज्ञासा और सीखने की रुचि पर बल देती है।
हुमायूँ की वापसी और अकबर की स्थिति
1555 में हुमायूँ ने दिल्ली फिर प्राप्त कर ली।
उस समय अकबर किशोर अवस्था में था और उसे पंजाब में जिम्मेदारियाँ दी गई थीं। बैरम खान उसका मार्गदर्शक और संरक्षक था।
लेकिन हुमायूँ की पुनर्स्थापित सत्ता अधिक समय नहीं चली।
जनवरी 1556 में दिल्ली में सीढ़ियों से गिरने के बाद हुमायूँ की मृत्यु हो गई।
अकबर उस समय पंजाब में था।
उसकी उम्र लगभग तेरह वर्ष थी।
मुगल सत्ता अभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं थी।
सिकंदर सूरी पंजाब में सक्रिय था।
अफगान शक्तियाँ उत्तर भारत में समाप्त नहीं हुई थीं।
आदिल शाह सूरी का प्रभाव पूर्व में बना हुआ था।
और इसी समय उसका अत्यंत सक्षम सेनापति हेमू तेजी से उभर रहा था।
कलानौर में राज्यारोहण
14 फरवरी 1556 को पंजाब के कलानौर में अकबर को मुगल सम्राट घोषित किया गया।
उस समय वास्तविक प्रशासन और सैन्य नेतृत्व बैरम खान के हाथ में था।
अकबर के लिए स्थिति अत्यंत कठिन थी।
हुमायूँ द्वारा दिल्ली वापस प्राप्त किए एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था।
मुगल सत्ता के पास अभी मजबूत संस्थागत आधार नहीं था।
ऐसे समय में हेमू का उदय हुआ।
हेमू : अकबर की पहली बड़ी चुनौती
हेमचंद्र, जिसे हेमू कहा जाता है, सूर शासन के अंतिम चरण में मुहम्मद आदिल शाह का अत्यंत प्रभावशाली सेनापति बन चुका था।
उसने अनेक युद्ध जीते और उत्तर भारत में अपनी सैन्य प्रतिष्ठा स्थापित की।
हुमायूँ की मृत्यु के बाद उत्पन्न अस्थिरता का उसने लाभ उठाया।
उसने आगरा की दिशा में बढ़ते हुए मुगल अधिकारियों को पीछे हटने पर मजबूर किया और अक्टूबर 1556 में दिल्ली पर अधिकार कर लिया।
हेमू ने स्वयं स्वतंत्र शासक के रूप में सत्ता ग्रहण की और “विक्रमादित्य” की उपाधि धारण की।
इस समय अकबर की स्थिति गंभीर थी।
कुछ मुगल सरदार पीछे हटकर काबुल लौटने के पक्ष में थे।
लेकिन बैरम खान ने निर्णायक युद्ध का निर्णय लिया।
1556 : पानीपत का दूसरा युद्ध
5 नवंबर 1556 को पानीपत के मैदान में मुगल सेना और हेमू की सेना आमने-सामने हुईं।
यह वही क्षेत्र था जहां तीस वर्ष पहले बाबर ने इब्राहिम लोदी को पराजित किया था।
हेमू की सेना शक्तिशाली थी और उसके पास बड़ी संख्या में युद्ध हाथी थे।
युद्ध के प्रारंभिक चरण में उसकी स्थिति मजबूत दिखाई दी।
लेकिन लड़ाई के दौरान एक तीर हेमू की आंख में लगा और वह बेहोश हो गया।
उसका नेतृत्व समाप्त होते ही सेना में अव्यवस्था फैल गई।
हेमू को पकड़कर मुगल शिविर में लाया गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई।
पानीपत की दूसरी विजय ने अकबर के सिंहासन को तत्काल बचा लिया।
लेकिन इसका अर्थ अभी पूरे उत्तर भारत पर स्थिर मुगल अधिकार नहीं था। सिकंदर सूरी और अन्य अफगान शक्तियों को भी दबाना बाकी था।
बैरम खान का शासन
1556 से 1560 तक बैरम खान अकबर का संरक्षक और साम्राज्य का वास्तविक प्रमुख प्रशासक रहा।
उसने मुगल सेना और प्रशासन को स्थिर किया।
अफगान प्रतिरोध का सामना किया।
मुगल सरदारों को नियंत्रित रखा।
और युवा अकबर की सत्ता सुरक्षित की।
लेकिन जैसे-जैसे अकबर बड़ा हुआ, वह स्वयं शासन अपने हाथ में लेना चाहता था।
दरबार में बैरम खान के विरोधी भी बढ़ गए।
1560 में अकबर ने उसे पद से हटने और मक्का की यात्रा करने का आदेश दिया।
बैरम खान ने प्रारंभ में विद्रोह किया, लेकिन बाद में आत्मसमर्पण कर दिया।
अकबर ने उसे क्षमा कर दिया और मक्का जाने की अनुमति दी।
1561 में गुजरात की यात्रा के दौरान उसकी हत्या कर दी गई।
इसके बाद अकबर ने शासन की वास्तविक कमान स्वयं संभाल ली।
क्या अकबर प्रारंभ से ही वैसा था जैसा बाद में बना?
नहीं।
अकबर की नीतियाँ एक ही समय में तैयार नहीं हुई थीं।
उसके शासन के प्रारंभिक और अंतिम चरण में बड़ा अंतर है।
युवा अकबर मुख्यतः सैन्य विस्तार और केंद्रीय सत्ता को मजबूत करने में लगा था।
धार्मिक सहिष्णुता, जजिया समाप्ति, इबादतखाना, सुलह-ए-कुल और विभिन्न धर्मों के संवाद की उसकी नीतियाँ धीरे-धीरे विकसित हुईं।
इसी प्रकार राजस्व और मनसबदारी व्यवस्थाएँ भी एक ही आदेश से नहीं बनीं। कई वर्षों के प्रयोग और संशोधन के बाद उनका परिपक्व स्वरूप सामने आया। ईरानिका भी अकबर के प्रशासनिक सुधारों को दीर्घ प्रयोग और राजनीतिक संघर्ष का परिणाम मानती है।
राजपूत नीति : युद्ध और साझेदारी दोनों
अकबर की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक नीतियों में राजपूतों के साथ संबंध थे।
लेकिन इसे केवल “मैत्री नीति” कहना अधूरा है।
जिन राजपूत राज्यों ने मुगल अधीनता और सहयोग स्वीकार किया, उन्हें साम्राज्य में सम्मान, पद और अधिकार मिला।
जिन्होंने अधीनता स्वीकार नहीं की, उनके विरुद्ध युद्ध हुआ।
यानी अकबर की राजपूत नीति में सहयोग और सैन्य दबाव दोनों साथ-साथ चलते थे।
आमेर के साथ संबंध
1562 में आमेर के राजा भारमल ने अकबर की अधीनता स्वीकार की।
उनकी पुत्री का विवाह अकबर से हुआ।
लोकप्रिय इतिहास में उन्हें अक्सर “जोधाबाई” कहा जाता है, लेकिन समकालीन मुगल स्रोतों में इस नाम का प्रयोग स्पष्ट रूप से नहीं मिलता। उन्हें बाद में मरियम-उज-जमानी की उपाधि मिली।
इस संबंध ने राजपूतों को मुगल सत्ता में शामिल करने की एक नई दिशा खोली।
राजा भारमल के पुत्र भगवानदास और पौत्र मानसिंह आगे चलकर मुगल साम्राज्य के अत्यंत महत्वपूर्ण सेनापति बने।
राजा मानसिंह को अकबर ने उच्च मनसब दिया और बंगाल सहित कई महत्वपूर्ण अभियानों की जिम्मेदारी सौंपी।
इस नीति का राजनीतिक लाभ बहुत बड़ा था।
मुगल साम्राज्य को भारत के प्रतिष्ठित योद्धा राजवंशों का सैन्य सहयोग मिला।
राजपूतों को विशाल साम्राज्य में ऊंचे पद और व्यापक राजनीतिक अवसर मिले।
वैवाहिक संबंधों की वास्तविकता
अकबर ने कुछ प्रमुख राजपूत परिवारों से वैवाहिक संबंध बनाए, लेकिन सभी राजपूत राज्यों ने ऐसा नहीं किया।
और यह भी गलत है कि मुगल-राजपूत समझौता केवल विवाह पर आधारित था।
वास्तविक आधार था—
सैन्य सहयोग,
मनसब,
जागीर,
दरबारी प्रतिष्ठा,
स्थानीय राजसत्ता की मान्यता,
और सम्राट के प्रति निष्ठा।
राजपूत सहयोग आगे मुगल साम्राज्य की सैन्य शक्ति का प्रमुख स्तंभ बना।
चित्तौड़ : समझौते की सीमा
मेवाड़ ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।
महाराणा उदयसिंह द्वितीय मेवाड़ के शासक थे।
चित्तौड़ केवल एक किला नहीं था; वह राजपूत प्रतिष्ठा और मेवाड़ की स्वतंत्र राजनीतिक परंपरा का प्रतीक था।
1567 में अकबर ने चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी शुरू की।
महाराणा उदयसिंह पहाड़ी क्षेत्रों की ओर चले गए और किले की रक्षा जयमल तथा पत्ता जैसे सेनानायकों ने संभाली।
घेराबंदी कई महीनों तक चली।
फरवरी 1568 में मुगल सेना ने किले पर अधिकार कर लिया।
चित्तौड़ का रक्तपात
चित्तौड़ विजय अकबर के इतिहास का सबसे कठोर प्रसंग है।
किला गिरने के बाद बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या हुई।
अकबरनामा सहित स्रोत इस व्यापक वध का उल्लेख करते हैं।
संख्याओं को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि विजय अत्यंत रक्तरंजित थी।
अकबर ने इस विजय को राजनीतिक और धार्मिक विजय दोनों की भाषा में प्रस्तुत किया।
इस घटना को उसके बाद विकसित हुए अधिक समावेशी शासन के आधार पर अनदेखा नहीं किया जा सकता।
अकबर के ऐतिहासिक मूल्यांकन में चित्तौड़ का रक्तपात उतना ही वास्तविक है जितनी उसकी बाद की सहिष्णुता नीति।
रणथंभौर
1569 में अकबर ने रणथंभौर पर अभियान किया।
यह भी अत्यंत शक्तिशाली दुर्ग था।
राजपूत शासक राव सुर्जन हाड़ा ने अंततः मुगल अधीनता स्वीकार की।
चित्तौड़ और रणथंभौर की विजय के बाद राजस्थान में अकबर की सैन्य प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई।
कई अन्य राजपूत राज्यों ने समझौता करना अधिक व्यावहारिक समझा।
लेकिन मेवाड़ का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था।
महाराणा प्रताप का उदय
1572 में महाराणा उदयसिंह की मृत्यु के बाद महाराणा प्रताप मेवाड़ के शासक बने।
उन्होंने मुगल अधीनता स्वीकार नहीं की।
अकबर ने कई बार दूत भेजकर समझौता कराने की कोशिश की।
राजा मानसिंह सहित राजपूत और मुगल प्रतिनिधियों को भेजा गया।
लेकिन महाराणा प्रताप ने ऐसी अधीनता स्वीकार नहीं की जिसमें उन्हें अकबर की सर्वोच्च सत्ता माननी पड़ती।
अंततः संघर्ष अपरिहार्य हो गया।
1576 : हल्दीघाटी का युद्ध
18 जून 1576 को हल्दीघाटी के क्षेत्र में महाराणा प्रताप की सेना और मुगल सेना के बीच युद्ध हुआ।
मुगल सेना का नेतृत्व राजा मानसिंह कर रहे थे।
यह तथ्य स्वयं अकबर की राजपूत नीति की जटिलता दिखाता है—एक राजपूत सेनापति मुगल सम्राट की ओर से दूसरे राजपूत शासक से लड़ रहा था।
महाराणा प्रताप की सेना में हकीम खान सूर जैसे अफगान योद्धा भी शामिल थे।
इसलिए युद्ध को सरल “हिंदू बनाम मुस्लिम” संघर्ष के रूप में देखना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।
यह मुख्यतः राजनीतिक स्वतंत्रता और साम्राज्यवादी अधीनता का संघर्ष था।
हल्दीघाटी का परिणाम
युद्ध अत्यंत भीषण था।
महाराणा प्रताप युद्धभूमि से सुरक्षित निकल गए।
मुगल सेना ने मैदान पर नियंत्रण स्थापित किया, लेकिन महाराणा प्रताप पकड़े नहीं गए और मेवाड़ का प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ।
यही सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है।
यदि युद्ध का प्रश्न केवल मैदान में कौन रहा—इस आधार पर देखा जाए तो मुगल पक्ष को सामरिक सफलता मिली।
लेकिन यदि लक्ष्य महाराणा प्रताप को अधीन करना था, तो वह लक्ष्य पूरा नहीं हुआ।
आगे प्रताप ने पहाड़ी क्षेत्रों से संघर्ष जारी रखा।
महाराणा प्रताप की पुनर्प्राप्ति
कुछ वर्षों के बाद अकबर का ध्यान बंगाल, उत्तर-पश्चिम और अन्य क्षेत्रों में चला गया।
महाराणा प्रताप ने इस अवसर का लाभ उठाया।
उन्होंने मेवाड़ के अनेक क्षेत्रों पर फिर अधिकार स्थापित किया।
चित्तौड़ और कुछ प्रमुख दुर्ग मुगल नियंत्रण में रहे, लेकिन मेवाड़ की स्वतंत्र राजनीतिक परंपरा समाप्त नहीं हुई।
1582 का दिवेर अभियान महाराणा प्रताप की पुनर्स्थापना में महत्वपूर्ण माना जाता है।
1597 में महाराणा प्रताप की मृत्यु तक वे अकबर की अधीनता में नहीं आए।
यही कारण है कि भारतीय इतिहास में उनका स्थान केवल एक पराजित युद्धनायक के रूप में नहीं, बल्कि दीर्घकालीन स्वतंत्रता-प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में है।
गुजरात विजय
गुजरात आर्थिक और सामरिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण था।
उसके समुद्री बंदरगाहों से पश्चिम एशिया और अन्य क्षेत्रों के साथ व्यापार होता था।
1572 में अकबर ने गुजरात अभियान शुरू किया।
अहमदाबाद और अन्य महत्वपूर्ण स्थान मुगल नियंत्रण में आए।
1573 तक मुख्य विजय पूरी हो गई।
कुछ समय बाद विद्रोह हुआ तो अकबर ने अत्यंत तेज गति से गुजरात पहुंचकर उसे दबाया।
गुजरात विजय ने मुगल साम्राज्य को समुद्री व्यापार से जुड़े महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक पहुंच दी।
फतेहपुर सीकरी का प्रसिद्ध बुलंद दरवाजा गुजरात विजय की स्मृति से जुड़ा है।
बंगाल और बिहार
बंगाल में अफगान शक्तियाँ लंबे समय से मुगल शासन के लिए चुनौती थीं।
1576 में राजमहल के युद्ध में दाऊद खान कर्रानी की पराजय के बाद बंगाल में अफगान कर्रानी सत्ता का अंत हुआ।
इसके बावजूद बंगाल में मुगल नियंत्रण तुरंत पूर्ण नहीं हुआ।
स्थानीय जमींदारों और बारो-भुइयां जैसी क्षेत्रीय शक्तियों ने लंबे समय तक प्रतिरोध किया।
इसलिए बंगाल विजय को एक युद्ध में पूर्ण हुआ कार्य समझना गलत होगा।
काबुल और उत्तर-पश्चिम
अकबर के लिए काबुल केवल पारिवारिक विरासत नहीं था।
यह मध्य एशिया से भारत आने वाले मार्ग की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण था।
उसके सौतेले भाई मिर्जा हाकिम के कारण काबुल की राजनीति में समय-समय पर समस्या उत्पन्न हुई।
1581 में अकबर स्वयं काबुल की दिशा में गया।
मिर्जा हाकिम के प्रभाव को नियंत्रित किया गया।
1585 में उसकी मृत्यु के बाद काबुल सीधे मुगल प्रशासन के अंतर्गत आ गया।
कश्मीर
1586 में कश्मीर को मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।
कश्मीर का सामरिक महत्व बहुत बड़ा था।
यह उत्तर-पश्चिमी पर्वतीय सीमा और मध्य एशियाई मार्गों से जुड़ा हुआ था।
अकबर ने स्वयं कश्मीर की यात्राएँ भी कीं।
इसके बाद कश्मीर कई पीढ़ियों तक मुगल साम्राज्य का हिस्सा रहा।
सिंध और बलूच क्षेत्र
1590 के दशक में सिंध पर मुगल नियंत्रण बढ़ा।
ठट्टा और आसपास के क्षेत्रों को साम्राज्य में शामिल किया गया।
इसी क्रम में बलूचिस्तान के महत्वपूर्ण मार्गों और कंधार की दिशा पर भी मुगल ध्यान बढ़ा।
1595 में कंधार भी अकबर के नियंत्रण में आ गया।
इससे मुगल साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा अधिक सुरक्षित हुई।
दक्कन की ओर विस्तार
अपने शासन के अंतिम चरण में अकबर ने दक्कन की ओर अधिक ध्यान दिया।
अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुंडा और अन्य दक्कनी राज्यों की राजनीति जटिल थी।
1590 के दशक में मुगल दूत भेजे गए और अधीनता की मांग की गई।
अहमदनगर ने प्रतिरोध किया।
यहां चांद बीबी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
उन्होंने मुगल सेना के विरुद्ध अहमदनगर की रक्षा की।
लंबे संघर्ष के बाद मुगलों को क्षेत्र में कुछ सफलता मिली।
1601 में खानदेश और असीरगढ़ पर अधिकार से दक्कन में मुगल विस्तार का आधार मजबूत हुआ।
लेकिन दक्कन की पूरी समस्या अकबर हल नहीं कर पाया।
यह जहांगीर, शाहजहाँ और विशेष रूप से औरंगजेब के लिए आगे बड़ी चुनौती बनी।
साम्राज्य का प्रशासनिक पुनर्गठन
अकबर की सबसे स्थायी उपलब्धि प्रशासन था।
उसने पुराने दिल्ली सल्तनत, सूर और तैमूरी प्रशासनिक अनुभवों को मिलाकर नई मुगल व्यवस्था विकसित की।
सम्राट सत्ता का सर्वोच्च केंद्र था।
उसके नीचे प्रमुख विभाग बने।
वित्त व्यवस्था दीवान के अधीन थी।
सैन्य और मनसब संबंधी प्रशासन मीर बख्शी देखता था।
शाही घरेलू व्यवस्था मीर सामान के अधीन थी।
धार्मिक अनुदान और कुछ न्यायिक मामलों में सद्र की भूमिका थी।
मुख्य काजी न्याय व्यवस्था से जुड़ा था।
प्रांतों में भी केंद्रीय ढांचे के समान अधिकारी नियुक्त किए गए।
सूबा व्यवस्था
1580 के आसपास अकबर ने साम्राज्य को प्रमुख प्रांतों—सूबों—में संगठित किया।
प्रत्येक सूबे में सूबेदार या सिपहसालार सैन्य-प्रशासनिक प्रमुख था।
दीवान राजस्व देखता था।
बख्शी सैन्य व्यवस्था से जुड़ा था।
काजी न्यायिक मामलों में कार्य करता था।
सद्र धार्मिक अनुदान से जुड़ा था।
इस व्यवस्था का एक उद्देश्य किसी एक अधिकारी को अत्यधिक शक्तिशाली होने से रोकना था।
सूबेदार के साथ स्वतंत्र दीवान रखने का अर्थ था कि प्रशासन और वित्त एक ही व्यक्ति के पूर्ण नियंत्रण में न हों।
मनसबदारी व्यवस्था
अकबर की प्रशासनिक संरचना का सबसे महत्वपूर्ण तत्व मनसबदारी व्यवस्था थी।
“मनसब” का अर्थ पद या श्रेणी था।
राज्य के उच्च अधिकारी और सैन्य सरदार मनसबदार कहलाते थे।
उनकी स्थिति एक संख्यात्मक श्रेणी से निर्धारित की जाती थी।
आगे इसमें मुख्यतः दो अवधारणाएँ महत्वपूर्ण हुईं—
जात — अधिकारी की व्यक्तिगत श्रेणी और वेतन से जुड़ी।
सवार — उसके द्वारा बनाए रखे जाने वाले घुड़सवारों की संख्या से संबंधित।
इस व्यवस्था का उद्देश्य वंश, जातीय समूह या कबीले पर आधारित स्वतंत्र शक्ति को कम करके प्रत्येक अधिकारी को सीधे सम्राट से जोड़ना था। मनसबदार की पदोन्नति, पदावनति और स्थानांतरण सम्राट के अधिकार में था।
मनसबदारी का राजनीतिक महत्व
मुगल अभिजात वर्ग बहुत विविध था।
उसमें तूरानी अर्थात मध्य एशियाई,
ईरानी,
अफगान,
भारतीय मुसलमान,
राजपूत,
और अन्य भारतीय समूह शामिल थे।
मनसब व्यवस्था ने इन सभी को एक साझा शाही ढांचे में बांधने में सहायता की।
किसी राजपूत राजा को उच्च मनसब मिल सकता था।
किसी ईरानी या तूरानी सरदार को भी।
इससे पुराने कुलीन वर्ग का एकाधिकार कमजोर हुआ और सम्राट को विभिन्न समूहों के बीच संतुलन बनाने का अवसर मिला।
जागीर व्यवस्था
मनसबदारों को वेतन का बड़ा हिस्सा जागीर के माध्यम से दिया जाता था।
जागीर का अर्थ सामान्यतः किसी निर्धारित क्षेत्र से राजस्व प्राप्त करने का अधिकार था।
यह उस भूमि का स्थायी निजी स्वामित्व नहीं होता था।
जागीरदारों का स्थानांतरण किया जा सकता था।
इसका उद्देश्य यह था कि कोई अधिकारी एक ही क्षेत्र में स्थायी स्थानीय शक्ति न बना ले।
कुछ क्षेत्र “खालसा” कहलाते थे, जहां से राजस्व सीधे शाही कोष में जाता था।
मनसब और जागीर मिलकर मुगल सैन्य-राजस्व व्यवस्था का केंद्रीय ढांचा बने।
राजस्व प्रणाली : राज्य की आर्थिक रीढ़
मुगल साम्राज्य की सबसे बड़ी आय भूमि से आती थी।
किसान उत्पादन करते थे और उस उत्पादन का हिस्सा राज्य राजस्व के रूप में लेता था।
अकबर ने राजस्व प्रणाली में कई चरणों में सुधार किए।
इसमें राजा टोडरमल की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
टोडरमल पहले शेरशाह की व्यवस्था से भी जुड़े रहे थे और बाद में अकबर के प्रमुख वित्तीय अधिकारियों में आए।
भूमि की माप
खेती योग्य भूमि को मापने का प्रयास किया गया।
मानक गज और बीघे के उपयोग को अधिक नियमित बनाया गया।
भूमि को उसकी खेती और उत्पादकता के आधार पर श्रेणियों में रखा गया।
राजस्व निर्धारण केवल स्थानीय अधिकारी की मनमानी पर निर्भर न रहे—यह लक्ष्य था।
लेकिन इतने विशाल साम्राज्य में हर क्षेत्र में एक समान प्रणाली लागू करना संभव नहीं था।
दहसाला और जब्त व्यवस्था
1570 से 1580 तक विभिन्न फसलों के उत्पादन, कीमतों और खेती के आंकड़ों का अध्ययन किया गया।
इसके आधार पर लगभग दस वर्षों के औसत से राजस्व दर निर्धारित करने की व्यवस्था विकसित हुई, जिसे प्रायः “दहसाला” से जोड़ा जाता है।
जब्त व्यवस्था के अंतर्गत भूमि का मापन और फसलों के लिए निर्धारित नकद दरों के आधार पर राजस्व तय किया जाता था।
सामान्य रूप से राज्य का दावा औसत उत्पादन के लगभग एक-तिहाई के आसपास रखा गया।
लेकिन यह व्यवस्था पूरे साम्राज्य में समान रूप से नहीं चलती थी।
जहां भूमि का नियमित सर्वेक्षण कठिन था, वहां फसल-बंटाई या पिछले रिकॉर्ड के आधार पर अन्य प्रणालियाँ भी चलती रहीं।
क्या टोडरमल ने अकेले पूरी व्यवस्था बनाई?
लोकप्रिय इतिहास में पूरी अकबरी राजस्व प्रणाली को कभी-कभी केवल टोडरमल की व्यक्तिगत रचना बता दिया जाता है।
यह भी अधूरा है।
राजस्व सुधार कई दशकों की प्रक्रिया थे।
उनमें शेरशाह की पूर्व व्यवस्था, पुराने स्थानीय लेखांकन, कई मुगल अधिकारियों के प्रयोग और टोडरमल के प्रशासनिक कौशल—सभी की भूमिका थी।
टोडरमल का योगदान महत्वपूर्ण था, लेकिन व्यवस्था सामूहिक प्रशासनिक विकास का परिणाम थी।
किसान पर प्रभाव
व्यवस्थित दरों का एक लाभ यह था कि किसान को अपेक्षाकृत पहले से पता हो सकता था कि राज्य कितना राजस्व मांगेगा।
अकाल या खराब फसल की परिस्थितियों में कुछ राहत के प्रावधान भी थे।
लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि मुगल राज्य की विशाल सैन्य और दरबारी व्यवस्था किसान के अधिशेष पर ही निर्भर थी।
एक-तिहाई के आसपास का दावा भी हल्का नहीं था।
उसके ऊपर स्थानीय जमींदार, अधिकारी, ऋण और खराब मौसम का दबाव अलग हो सकता था।
इसलिए राजस्व प्रशासन को केवल किसान-हितैषी व्यवस्था कहना उचित नहीं होगा।
उसका प्राथमिक उद्देश्य स्थिर और अधिक विश्वसनीय शाही आय प्राप्त करना था।
तीर्थ कर और जजिया की समाप्ति
अकबर की धार्मिक नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन 1560 के दशक से दिखाई देते हैं।
1563 में उसने तीर्थयात्रा कर समाप्त किया।
1564 में गैर-मुस्लिम प्रजा पर लगाया जाने वाला जजिया कर समाप्त कर दिया।
यह निर्णय केवल धार्मिक प्रतीक नहीं था।
यह इस सिद्धांत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था कि राज्य की प्रजा के राजनीतिक अधिकार केवल धर्म से निर्धारित न हों।
इसके साथ हिंदू सरदारों की प्रशासनिक भागीदारी लगातार बढ़ती गई।
धार्मिक नीति का विकास
अकबर जन्म से सुन्नी मुसलमान था।
प्रारंभिक शासन में इस्लामी धार्मिक प्रतिष्ठान का प्रभाव भी था।
लेकिन धीरे-धीरे वह उलेमा की परस्पर बहस और संकीर्णता से असंतुष्ट होने लगा।
उसे विभिन्न धर्मों और दर्शन में रुचि होने लगी।
यहीं से उसके धार्मिक प्रयोगों का नया चरण शुरू होता है।
इबादतखाना
1575 में फतेहपुर सीकरी में अकबर ने इबादतखाना स्थापित कराया।
प्रारंभ में यहां मुस्लिम धार्मिक विद्वानों के बीच विचार-विमर्श होता था।
लेकिन इन बहसों में तीखे विवाद देखकर अकबर ने दायरा बढ़ाया।
हिंदू विद्वान,
जैन आचार्य,
पारसी धर्माचार्य,
ईसाई पादरी,
सूफी,
और अन्य विचारक भी चर्चाओं में शामिल हुए।
गोवा से जेसुइट ईसाई मिशनरी भी उसके दरबार में आए।
अकबर ने ईसाई धर्मग्रंथों और विचारों में रुचि दिखाई, हालांकि वह ईसाई नहीं बना।
1579 का महजर
1579 में एक महत्वपूर्ण घोषणा सामने आई जिसे सामान्यतः “महजर” कहा जाता है।
इसके माध्यम से धार्मिक कानून की विभिन्न व्याख्याओं में मतभेद होने पर सम्राट को अंतिम निर्णय की भूमिका दी गई।
यह अकबर द्वारा उलेमा की राजनीतिक शक्ति सीमित करने की दिशा में बड़ा कदम था।
इसका अर्थ यह नहीं था कि उसने स्वयं को पैगंबर घोषित कर दिया।
बल्कि वह राज्य की सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता को धार्मिक प्रतिष्ठान से स्वतंत्र करना चाहता था।
सुलह-ए-कुल
अकबर की शासन-दृष्टि के साथ “सुलह-ए-कुल” की अवधारणा जुड़ी।
इसका सामान्य अर्थ “सभी के साथ शांति” या सार्वभौमिक सह-अस्तित्व समझा जाता है।
राज्य को प्रजा के विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए—यह इसका राजनीतिक सार था।
अबुल फजल ने अकबर की सम्राट संबंधी अवधारणा को ऐसे सार्वभौमिक शासक के रूप में प्रस्तुत किया जिसकी जिम्मेदारी सभी प्रजा के प्रति है।
यही विचार राजपूतों, हिंदू अधिकारियों, जैनों, पारसियों और अन्य समुदायों के साथ अकबर के व्यवहार में अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है।
दीन-ए-इलाही : वास्तव में क्या था?
अकबर के धार्मिक इतिहास से जुड़ी सबसे अधिक गलत समझी गई अवधारणा “दीन-ए-इलाही” है।
लोकप्रिय वर्णन में इसे कभी-कभी अकबर द्वारा स्थापित नया धर्म कहा जाता है।
यह पूरी तरह सही नहीं है।
इसका कोई व्यापक जनधर्म, अलग धार्मिक ग्रंथ, सामूहिक पूजा-व्यवस्था या विशाल अनुयायी समुदाय नहीं था।
अकबर के निकट कुछ चुनिंदा दरबारियों से जुड़ी एक नैतिक-आध्यात्मिक प्रतिबद्धता विकसित हुई, जिसे बाद के इतिहास में दीन-ए-इलाही नाम से प्रसिद्धि मिली।
इसके अनुयायियों की संख्या बहुत कम थी।
राजा बीरबल को इसके प्रमुख हिंदू सदस्यों में गिना जाता है।
इसे इस्लाम, हिंदू धर्म, जैन धर्म, पारसी धर्म और ईसाई धर्म को मिलाकर बनाया गया जनधर्म कहना ऐतिहासिक रूप से अतिरंजित होगा।
क्या अकबर धर्मविरोधी हो गया था?
नहीं।
अकबर ने धार्मिक प्रतिष्ठानों की शक्ति को चुनौती दी, लेकिन वह आध्यात्मिक प्रश्नों में गहरी रुचि रखता था।
वह अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जाता था।
शेख सलीम चिश्ती के प्रति उसका गहरा सम्मान था।
उसे जैन आचार्यों से प्रभावित होकर कुछ अवसरों पर पशु-वध सीमित करने की प्रेरणा मिली।
वह हिंदू दार्शनिक ग्रंथों के अध्ययन में रुचि रखता था।
अर्थात उसका मार्ग धार्मिक उदासीनता नहीं बल्कि विभिन्न परंपराओं से संवाद का था।
संस्कृत ग्रंथों का फारसी अनुवाद
अकबर के शासन में भारतीय ज्ञान परंपराओं को फारसीभाषी दरबार तक पहुंचाने की महत्वपूर्ण परियोजना चलाई गई।
महाभारत का फारसी अनुवाद “रज्मनामा” नाम से हुआ।
रामायण का भी फारसी अनुवाद कराया गया।
हरिवंश,
अथर्ववेद से संबंधित सामग्री,
लीलावती,
पंचतंत्र पर आधारित ग्रंथ,
और अन्य संस्कृत रचनाओं के अनुवाद हुए।
यह प्रक्रिया केवल साहित्यिक नहीं थी।
इससे दरबार के मुस्लिम और फारसीभाषी अभिजात वर्ग को भारतीय धर्म, दर्शन और इतिहास से परिचय मिला।
फतेहपुर सीकरी
अकबर ने आगरा के निकट फतेहपुर सीकरी को अपनी राजधानी के रूप में विकसित किया।
यह स्थान सूफी संत शेख सलीम चिश्ती से उसके संबंध के कारण विशेष महत्व रखता था।
यहां विशाल राजमहल परिसर, जामा मस्जिद, पंचमहल, दीवान-ए-खास, बुलंद दरवाजा और अन्य भवन बने।
फतेहपुर सीकरी की वास्तुकला में गुजरात, राजस्थान, मध्य एशिया और फारसी परंपराओं के अनेक तत्व दिखाई देते हैं।
कुछ वर्षों बाद राजधानी वहां से हटा दी गई।
इसके कारणों को केवल “पानी की कमी” से समझाना पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक और सामरिक आवश्यकताएँ भी महत्वपूर्ण थीं।
अकबर और कला
अकबर ने शाही चित्रशाला को व्यापक संरक्षण दिया।
हुमायूँ फारस से कुछ कलाकार भारत लाया था।
अकबर ने इस परंपरा में बड़ी संख्या में भारतीय कलाकारों को शामिल किया।
फारसी सूक्ष्म चित्रकला और भारतीय रंग, आकृतियाँ तथा कथा-परंपराएँ मिलकर विशिष्ट मुगल चित्रकला में विकसित हुईं।
हम्जानामा जैसी विशाल चित्रित परियोजनाएँ इसी काल की हैं।
अकबरनामा के अनेक दृश्य भी चित्रित किए गए।
इस कला में युद्ध, दरबार, शिकार, नगर, पशु-पक्षी और दैनिक जीवन तक का चित्रण हुआ।
संगीत
अकबर के दरबार में संगीत को भी संरक्षण मिला।
तानसेन का नाम सबसे प्रसिद्ध है।
वे ग्वालियर क्षेत्र की संगीत परंपरा से आए और अकबर के दरबार के प्रमुख संगीतज्ञ बने।
अकबर के दरबार में हिंदू और मुस्लिम दोनों संगीत परंपराओं के कलाकार उपस्थित थे।
“नवरत्न” शब्द लोकप्रिय परंपरा में बहुत प्रसिद्ध है, हालांकि समकालीन प्रशासनिक स्रोतों में किसी स्थायी आधिकारिक “नवरत्न परिषद” का स्पष्ट संस्थागत स्वरूप नहीं मिलता।
अबुल फजल, फैजी, टोडरमल, बीरबल, मानसिंह, तानसेन आदि निश्चित रूप से उसके दरबार के महत्वपूर्ण व्यक्तित्व थे, लेकिन लोकप्रिय “नौ रत्न” सूची को सावधानी से देखना चाहिए।
अबुल फजल और अकबरनामा
अकबर के शासन के अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत अबुल फजल की रचना ‘अकबरनामा’ है।
इसके तीसरे भाग को ‘आइन-ए-अकबरी’ कहा जाता है।
अकबरनामा में सम्राट के शासन का विस्तृत वर्णन है।
आइन-ए-अकबरी में प्रशासन, सेना, राजस्व, प्रांत, दरबार, भोजन, पशु, फसल, कीमतें, समाज और भारतीय धार्मिक विचारों तक का विस्तृत विवरण मिलता है।
लेकिन अबुल फजल अकबर का अत्यंत निकट सहयोगी और प्रशंसक था।
इसलिए उसके लेखन को अकेले अंतिम सत्य नहीं माना जाना चाहिए।
बदायूनी : दूसरा दृष्टिकोण
अब्दुल कादिर बदायूनी अकबर के दरबार से जुड़ा विद्वान था, लेकिन वह अकबर की धार्मिक नीतियों का आलोचक था।
उसकी रचनाओं में अकबर के धार्मिक प्रयोगों, हिंदू ग्रंथों के अनुवाद और दरबारी नीतियों पर तीखी आलोचना मिलती है।
इसलिए अकबर के शासन को समझने में अबुल फजल और बदायूनी दोनों को पढ़ना उपयोगी है।
एक सम्राट की प्रशस्ति करता है।
दूसरा उसकी कई नीतियों से असहमत है।
इन दोनों दृष्टियों की तुलना इतिहास को अधिक संतुलित बनाती है।
अकबर और महिलाएँ
मुगल शाही परिवार की महिलाओं की राजनीतिक और आर्थिक भूमिका महत्वपूर्ण थी।
अकबर की माता हमीदा बानो बेगम,
पालनकर्ता माहम अनगा,
मरियम-उज-जमानी,
गुलबदन बेगम,
और सलीमा सुल्तान बेगम जैसी महिलाओं का दरबार और शाही परिवार में प्रभाव था।
मरियम-उज-जमानी बड़े व्यापारिक उपक्रमों में भी सक्रिय थीं।
मुगल हरम को केवल बंद और निष्क्रिय स्त्री-क्षेत्र समझना गलत होगा। शाही महिलाएँ संपत्ति, व्यापार, संरक्षण और पारिवारिक राजनीति में सक्रिय थीं।
अकबर का व्यक्तित्व और शासन शैली
अकबर अत्यंत सक्रिय शासक था।
वह सेना के साथ अभियान में स्वयं जाता था।
हाथियों को नियंत्रित करने, शिकार और शारीरिक साहस से जुड़े अनेक विवरण मिलते हैं।
लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उसका ध्यान राजनीतिक दर्शन, शासन और धर्म पर अधिक केंद्रित हुआ।
उसकी विशेषता विरोधियों को जीतने के बाद साम्राज्य में शामिल करना थी।
कई पूर्व शत्रु बाद में उसके प्रमुख अधिकारी बने।
यही गुण विशाल साम्राज्य को केवल विजय की श्रृंखला से अधिक टिकाऊ संरचना में बदलने में सहायक हुआ।
अकबर और धार्मिक स्थलों की नीति
अकबर के शासन को मंदिर-विध्वंस के संदर्भ में भी सूक्ष्मता से समझना चाहिए।
उसके प्रारंभिक सैन्य अभियानों में धार्मिक प्रतीकों और युद्धकालीन विनाश के उदाहरण मिलते हैं।
चित्तौड़ अभियान में उसकी विजय-भाषा कठोर थी।
लेकिन शासन के विकसित चरण में वह हिंदू धार्मिक संस्थानों और साधुओं को अनुदान देने, विभिन्न धार्मिक परंपराओं को संरक्षण देने और धार्मिक कर हटाने की दिशा में गया।
इसलिए अकबर को एक ही स्थिर धार्मिक नीति वाले शासक के रूप में देखना उचित नहीं।
उसकी नीति समय के साथ महत्वपूर्ण रूप से बदली।
अकबर के शासन में हिंदुओं की भागीदारी
अकबर से पहले भी मुस्लिम राजदरबारों में हिंदू अधिकारी होते थे।
लेकिन अकबर के समय उनकी भागीदारी अधिक व्यवस्थित और ऊंचे स्तर तक पहुंची।
राजा टोडरमल,
राजा भगवानदास,
राजा मानसिंह,
बीरबल
और अनेक अन्य हिंदू अधिकारी महत्वपूर्ण पदों पर थे।
यह धार्मिक समानता की आधुनिक लोकतांत्रिक नीति नहीं थी।
यह साम्राज्यवादी प्रशासन की व्यावहारिक और राजनीतिक रणनीति थी।
लेकिन इसका प्रभाव महत्वपूर्ण था—मुगल सत्ता केवल मध्य एशियाई और ईरानी कुलीनों की सत्ता नहीं रही।
उत्तराधिकार का संकट : सलीम का विद्रोह
अकबर के शासन के अंतिम वर्षों में सबसे गंभीर समस्या उसके पुत्र सलीम से संबंधों की थी।
यही सलीम आगे जहांगीर बना।
सलीम अधीर था और स्वयं सत्ता चाहता था।
उसने इलाहाबाद में स्वतंत्र शक्ति केंद्र बनाने का प्रयास किया।
अकबर के प्रिय दरबारी अबुल फजल को सलीम अपना विरोधी मानता था।
1602 में बुंदेला सरदार वीर सिंह देव ने सलीम के संकेत पर अबुल फजल की हत्या कर दी।
इस घटना से अकबर अत्यंत दुखी और क्रोधित हुआ।
पिता-पुत्र के संबंध लंबे समय तक तनावपूर्ण रहे।
मुराद और दानियाल
अकबर के अन्य पुत्र मुराद और दानियाल भी जीवित थे, लेकिन दोनों को मद्यपान की गंभीर समस्या रही।
मुराद की मृत्यु 1599 में हुई।
दानियाल की मृत्यु 1605 में हुई।
इससे अंततः सलीम ही प्रमुख उत्तराधिकारी बचा।
अकबर और सलीम में समझौता हुआ और उत्तराधिकार का मार्ग साफ हुआ।
अकबर की मृत्यु
1605 में अकबर बीमार पड़ा।
उसका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया।
27 अक्टूबर 1605 को आगरा में उसकी मृत्यु हो गई।
उसकी आयु लगभग 63 वर्ष थी।
उसका शासन लगभग 49 वर्ष चला।
उसे सिकंदरा में दफनाया गया।
उसके बाद सलीम “नूरुद्दीन मुहम्मद जहांगीर” के नाम से मुगल सम्राट बना।
अकबर की ऐतिहासिक छवि कैसे बनी?
अकबर को इतिहास में “अकबर” कहने के पीछे केवल उसका विशाल साम्राज्य नहीं था।
उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि राज्य की संरचना थी।
उसने सैन्य अभिजात वर्ग को मनसबदारी में बांधा।
राजस्व व्यवस्था को अधिक संगठित किया।
राजपूतों सहित विभिन्न भारतीय शक्तियों को साम्राज्य में सम्मिलित किया।
धार्मिक पहचान से ऊपर सम्राट की सार्वभौमिक सत्ता की अवधारणा विकसित की।
साम्राज्य के भीतर सांस्कृतिक संवाद को संरक्षण दिया।
और लगभग आधी शताब्दी तक सत्ता को स्थिर रखा।
ईरानिका भी उसकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि केवल विजय नहीं बल्कि शासन की ऐसी व्यावहारिक व्यवस्था विकसित करना मानती है जो उसके उत्तराधिकारियों के समय तक प्रभावी रही।
लेकिन महिमामंडन से बचना क्यों जरूरी है?
अकबर साम्राज्यवादी शासक था।
उसका राज्य लोकतांत्रिक या आधुनिक अर्थ में धर्मनिरपेक्ष नहीं था।
उसके विस्तार के लिए युद्ध हुए।
चित्तौड़ जैसे स्थानों पर व्यापक रक्तपात हुआ।
किसानों से भारी भूमि-राजस्व लिया गया।
विद्रोहों को बलपूर्वक दबाया गया।
राजपूत सहयोग स्वैच्छिक मित्रता के साथ-साथ मुगल सैन्य दबाव का परिणाम भी था।
इसलिए उसकी उपलब्धियों को दर्ज करते हुए राज्य की हिंसक साम्राज्यवादी प्रकृति को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
अकबर और महाराणा प्रताप : दो अलग राजनीतिक दृष्टियाँ
अकबर और महाराणा प्रताप को केवल व्यक्तिगत शत्रु मानना भी उचित नहीं।
अकबर का लक्ष्य एक विशाल केंद्रीकृत साम्राज्य बनाना था जिसमें क्षेत्रीय राजाओं को सम्राट की सर्वोच्चता स्वीकार करनी थी।
महाराणा प्रताप के लिए मेवाड़ की स्वतंत्रता और अपनी राजकीय संप्रभुता सर्वोपरि थी।
दोनों दृष्टियों का टकराव इसलिए लगभग अपरिहार्य था।
अकबर कई राजपूत राज्यों को अपने प्रशासन में सफलतापूर्वक जोड़ सका।
लेकिन महाराणा प्रताप ने यह मॉडल स्वीकार नहीं किया।
इसीलिए दोनों की ऐतिहासिक विरासत अलग है—
अकबर साम्राज्य-निर्माण का प्रतीक है,
महाराणा प्रताप राजनीतिक स्वतंत्रता के प्रतिरोध का।
1556–1605 : प्रमुख समयरेखा
14 फरवरी 1556 — कलानौर में अकबर का राज्यारोहण।
5 नवंबर 1556 — पानीपत का दूसरा युद्ध; हेमू की पराजय।
1556–1560 — बैरम खान संरक्षक और प्रमुख प्रशासक।
1560 — अकबर द्वारा व्यक्तिगत रूप से शासन की कमान संभालना।
1562 — आमेर के राजा भारमल के परिवार से वैवाहिक संबंध; राजपूत सहयोग की नीति मजबूत।
1563 — तीर्थयात्रा कर समाप्त।
1564 — जजिया समाप्त।
1567–1568 — चित्तौड़ की घेराबंदी और विजय।
1569 — रणथंभौर विजय।
1571 के आसपास — फतेहपुर सीकरी को प्रमुख शाही केंद्र के रूप में विकसित करना।
1572–1573 — गुजरात विजय।
1575 — इबादतखाना की स्थापना।
1576 — हल्दीघाटी का युद्ध; बंगाल में राजमहल का निर्णायक संघर्ष।
1579 — महजर; धार्मिक मामलों में सम्राट की सर्वोच्च भूमिका मजबूत।
1580 — प्रांतीय तथा राजस्व प्रशासन का व्यापक पुनर्गठन; जब्त-दहसाला व्यवस्था का परिपक्व चरण।
1581 — काबुल अभियान।
1582 के आसपास — अकबर के निकट आध्यात्मिक अनुशासन से जुड़ी उस परंपरा का विकास जिसे आगे दीन-ए-इलाही कहा गया।
1586 — कश्मीर का मुगल साम्राज्य में समावेश।
1590 का दशक — सिंध और उत्तर-पश्चिम की ओर विस्तार।
1595 — कंधार पर मुगल अधिकार।
1590 के दशक के उत्तरार्ध — दक्कन अभियानों की शुरुआत।
1601 — असीरगढ़ तथा खानदेश पर मुगल नियंत्रण मजबूत।
1602 — अबुल फजल की हत्या।
1605 — अकबर की मृत्यु; सलीम जहांगीर के रूप में उत्तराधिकारी।
अकबर की प्रमुख उपलब्धियाँ
अकबर की उपलब्धियों को किसी एक नीति तक सीमित नहीं किया जा सकता।
उसने अस्थिर मुगल सत्ता को स्थायी साम्राज्य बनाया।
अफगान चुनौती को नियंत्रित किया।
राजपूतों के बड़े हिस्से को मुगल सत्ता का सहयोगी बनाया।
गुजरात, बंगाल, कश्मीर, सिंध और उत्तर-पश्चिम तक विस्तार किया।
दक्कन में मुगल हस्तक्षेप की शुरुआत की।
मनसबदारी विकसित की।
जागीर और केंद्रीय प्रशासन को व्यवस्थित किया।
राजस्व व्यवस्था को मापन और अभिलेख के आधार पर अधिक व्यवस्थित किया।
तीर्थ कर और जजिया हटाया।
विभिन्न धार्मिक परंपराओं के बीच संवाद को प्रोत्साहित किया।
भारतीय ग्रंथों के फारसी अनुवाद कराए।
चित्रकला, स्थापत्य, संगीत और साहित्य को असाधारण संरक्षण दिया।
और सबसे महत्वपूर्ण—उसने साम्राज्य के शासन में बड़ी संख्या में भारतीय तत्वों को सम्मिलित किया।
उसकी प्रमुख सीमाएँ
उसकी उपलब्धियों के बावजूद कई समस्याएँ भविष्य के लिए बनी रहीं।
मनसबदारों और जागीरों पर आधारित व्यवस्था सम्राट की शक्ति पर अत्यधिक निर्भर थी।
स्थानीय जमींदारों की शक्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
कृषि-राजस्व की ऊंची मांग ग्रामीण समाज पर दबाव डाल सकती थी।
उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं बनाया गया।
इसलिए प्रत्येक बादशाह की मृत्यु के बाद राजकुमारों के बीच युद्ध का खतरा बना रहा।
दक्कन की समस्या अधूरी छोड़ी गई।
और विशाल साम्राज्य को नियंत्रित रखने की लागत लगातार बढ़ रही थी।
ईरानिका भी अकबर के सुधारों की सफलता के साथ उन अंतर्निहित कमजोरियों की ओर संकेत करती है जो आगे मुगल व्यवस्था के संकट का कारण बनीं।
निष्कर्ष
अकबर का शासन मुगल इतिहास का वास्तविक संस्थापक चरण था।
बाबर ने 1526 में दिल्ली की सत्ता जीती थी।
हुमायूँ ने उसे खोकर 1555 में वापस पाया था।
लेकिन 1556 में जब तेरह वर्षीय अकबर सिंहासन पर बैठा, तब मुगल राज्य फिर भी अस्थिर था।
1605 में जब उसकी मृत्यु हुई, तब स्थिति बिल्कुल अलग थी।
मुगल साम्राज्य उत्तर भारत की एक अस्थायी सैन्य सत्ता नहीं रहा था। वह एक विशाल प्रशासनिक व्यवस्था बन चुका था जिसकी सेना, राजस्व, प्रांत, मनसब, जागीर, दरबार और शाही विचारधारा का अपना सुव्यवस्थित ढांचा था।
अकबर ने विरोधियों को केवल युद्ध में पराजित नहीं किया; बड़ी संख्या में उन्हें सत्ता-संरचना में शामिल भी किया।
यही उसकी सबसे प्रभावशाली राजनीतिक क्षमता थी।
आमेर के राजपूत उसके सेनापति बने।
राजा मानसिंह साम्राज्य के प्रमुख सैन्य अधिकारियों में पहुंचे।
राजा टोडरमल राजस्व प्रशासन के प्रमुख स्तंभ बने।
लेकिन दूसरी ओर मेवाड़ ने उसकी सर्वोच्चता स्वीकार नहीं की और महाराणा प्रताप जीवन भर स्वतंत्र रहे।
इस प्रकार अकबर का काल भारतीय इतिहास की दो समानांतर धाराओं को सामने लाता है—
एक ओर विशाल साम्राज्य का निर्माण और राजनीतिक समावेशन, दूसरी ओर उस साम्राज्य के विस्तार के विरुद्ध क्षेत्रीय स्वतंत्रता का प्रतिरोध।
उसकी धार्मिक नीति भी इसी प्रकार क्रमिक परिवर्तन की कहानी है।
चित्तौड़ विजय के समय कठोर साम्राज्यवादी धार्मिक भाषा प्रयोग करने वाला अकबर आगे तीर्थ कर और जजिया समाप्त करता है, इबादतखाना बनाता है, हिंदू, जैन, पारसी और ईसाई विद्वानों से संवाद करता है और सुलह-ए-कुल के व्यापक राजनीतिक सिद्धांत की ओर बढ़ता है।
इसलिए अकबर को न तो केवल एक “उदार बादशाह” के छोटे से खांचे में रखा जा सकता है, न केवल एक विजेता में।
वह दोनों था—
कठोर साम्राज्य निर्माता भी और शासन की नई भारतीय-साम्राज्यवादी व्यवस्था का प्रयोगकर्ता भी।
उसका सबसे स्थायी योगदान किसी एक इमारत, युद्ध या धार्मिक निर्णय में नहीं था।
उसका स्थायी योगदान वह राजनीतिक संरचना थी जिसने अगले सौ वर्षों से अधिक समय तक मुगल साम्राज्य को भारत की सबसे शक्तिशाली सत्ता बनाए रखा।
इसीलिए मुगल इतिहास की श्रृंखला में बाबर को संस्थापक, हुमायूँ को सत्ता पुनर्प्राप्त करने वाला, और अकबर को उचित रूप से मुगल साम्राज्य का प्रमुख निर्माता कहा जा सकता है।