हुमायूँ — 1530–1540 तथा 1555–1556
पराजय, निर्वासन और दिल्ली की पुनर्प्राप्ति
बाबर ने 1526 से 1530 के बीच भारत में मुगल सत्ता की नींव रखी, लेकिन उसके पुत्र हुमायूँ को वह साम्राज्य विरासत में मिला जो अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ था। दिल्ली और आगरा पर मुगलों का अधिकार था, किंतु अफगान शक्ति समाप्त नहीं हुई थी, अनेक स्थानीय शासक स्वतंत्र या अर्धस्वतंत्र थे, गुजरात में बहादुर शाह एक बड़ी शक्ति बन चुका था और बाबर के अपने पुत्रों में भी सत्ता को लेकर प्रतिस्पर्धा मौजूद थी।
इस परिस्थिति में हुमायूँ का शासन एक ऐसे शासक की कहानी बन गया जिसने पहले साम्राज्य खोया, फिर लगभग पंद्रह वर्ष निर्वासन में बिताए और अंततः दिल्ली की गद्दी पुनः प्राप्त की। लेकिन विडंबना यह रही कि दिल्ली वापस पाने के कुछ ही महीनों बाद उसकी मृत्यु हो गई।
हुमायूँ का शासन मुगल इतिहास का वह संक्रमणकाल है जिसने एक ओर मुगल सत्ता की कमजोरी उजागर की और दूसरी ओर यह भी सिद्ध किया कि बाबर द्वारा स्थापित राजवंश पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था।
हुमायूँ का प्रारंभिक जीवन
हुमायूँ का जन्म 6 मार्च 1508 को काबुल में हुआ। उसका पूरा नाम नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ था। वह बाबर का ज्येष्ठ पुत्र था।
बाबर ने अपने जीवनकाल में ही हुमायूँ को प्रशासन और युद्ध का अनुभव देना शुरू कर दिया था। उसे विभिन्न क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई और उसने बाबर के भारतीय अभियानों में भी भाग लिया।
पानीपत के प्रथम युद्ध के बाद आगरा पर अधिकार करने में हुमायूँ की भूमिका रही। बाबरनामा में उसके सैन्य अभियानों और परिवार के भीतर उसकी स्थिति के अनेक उल्लेख मिलते हैं।
बाबर की मृत्यु 26 दिसंबर 1530 को हुई। इसके कुछ ही दिनों बाद हुमायूँ आगरा में मुगल सिंहासन पर बैठा।
उस समय उसकी आयु लगभग 22 वर्ष थी।
हुमायूँ को विरासत में क्या मिला?
हुमायूँ के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि बाबर ने साम्राज्य जीत तो लिया था, लेकिन उसे पूरी तरह संगठित प्रशासनिक राज्य में नहीं बदल पाया था।
हुमायूँ को जो क्षेत्र मिला, उसमें दिल्ली, आगरा, पंजाब के हिस्से और गंगा-यमुना क्षेत्र के महत्वपूर्ण भाग शामिल थे।
लेकिन इस सत्ता की कई सीमाएँ थीं।
अफगान सरदारों की शक्ति अभी बनी हुई थी।
पूर्वी भारत में अनेक अफगान नेता मुगलों को विदेशी सत्ता मानकर चुनौती दे रहे थे।
राजस्थान में राजपूत शक्ति समाप्त नहीं हुई थी।
गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह की शक्ति तेजी से बढ़ रही थी।
दक्कन मुगल सत्ता से बाहर था।
सबसे गंभीर समस्या यह थी कि बाबर के अन्य पुत्र—कामरान, अस्करी और हिंदाल—भी स्वतंत्र महत्वाकांक्षाएँ रखते थे।
भाइयों में साम्राज्य का विभाजन
तैमूरी परंपरा में राज्य को केवल ज्येष्ठ पुत्र की निजी संपत्ति नहीं माना जाता था। राजवंश के अन्य पुरुष सदस्यों का भी सत्ता पर दावा होता था।
हुमायूँ ने अपने भाइयों को अलग-अलग क्षेत्र दिए।
कामरान को काबुल और कंधार पर मजबूत नियंत्रण मिला और बाद में उसने पंजाब पर भी प्रभाव स्थापित किया।
अस्करी और हिंदाल को भी प्रदेश और पद दिए गए।
यह व्यवस्था अल्पकाल में पारिवारिक संघर्ष को रोकने का प्रयास थी, लेकिन दीर्घकाल में हुमायूँ की कमजोरी बन गई।
कामरान के पास पंजाब और अफगानिस्तान का नियंत्रण होने के कारण हुमायूँ की सैन्य भर्ती और पश्चिमोत्तर मार्ग पर निर्भरता बढ़ गई।
जब शेरशाह से निर्णायक संघर्ष का समय आया, तब भाइयों की पूर्ण निष्ठा हुमायूँ को नहीं मिली।
अफगान शक्ति की चुनौती
पानीपत में इब्राहिम लोदी की मृत्यु के बाद भी अफगान राजनीतिक शक्ति समाप्त नहीं हुई थी।
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में अनेक अफगान सरदार सक्रिय थे।
इन्हीं में एक व्यक्ति धीरे-धीरे सबसे शक्तिशाली बन रहा था—फरीद खान।
यही व्यक्ति आगे चलकर शेर खान और फिर शेरशाह सूरी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
शेर खान ने बिहार में अफगान सरदारों के बीच अपना प्रभाव बढ़ाया। वह केवल सैनिक नेता नहीं था, बल्कि कुशल प्रशासक और व्यावहारिक राजनीतिज्ञ भी था।
हुमायूँ ने उसके उभार को प्रारंभिक अवस्था में निर्णायक रूप से नहीं रोका।
यही गलती आगे चलकर मुगल साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुई।
कालिंजर अभियान
हुमायूँ के शासन के प्रारंभिक वर्षों में बुंदेलखंड के कालिंजर दुर्ग की ओर अभियान हुआ।
कालिंजर अत्यंत शक्तिशाली किला था और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था।
लेकिन हुमायूँ इस अभियान में निर्णायक सफलता प्राप्त नहीं कर सका।
अफगान विद्रोह और अन्य राजनीतिक समस्याओं के कारण उसे अपना ध्यान अन्य दिशाओं में लगाना पड़ा।
यह उसके शासन की एक बड़ी समस्या थी—एक मोर्चे पर अभियान पूरा होने से पहले दूसरा संकट खड़ा हो जाता था।
महमूद लोदी की चुनौती
इब्राहिम लोदी का भाई महमूद लोदी भी मुगल सत्ता के खिलाफ सक्रिय था।
उसने अफगान सरदारों को संगठित करने का प्रयास किया।
1532 में हुमायूँ ने दौहरिया के निकट अफगान शक्तियों को पराजित किया।
इस सफलता से कुछ समय के लिए मुगल सत्ता मजबूत दिखाई दी, लेकिन वास्तविक अफगान चुनौती अभी समाप्त नहीं हुई थी।
शेर खान लगातार अपनी शक्ति बढ़ा रहा था।
चुनार का किला और शेर खान
चुनार का किला गंगा घाटी के नियंत्रण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।
शेर खान का इस किले पर प्रभाव था।
1532 में हुमायूँ ने चुनार की घेराबंदी की।
लेकिन निर्णायक विजय के बजाय समझौता हुआ।
शेर खान ने औपचारिक रूप से हुमायूँ की अधीनता स्वीकार की और अपने एक पुत्र को मुगल दरबार भेजा।
हुमायूँ ने घेराबंदी समाप्त कर दी।
यह निर्णय बाद में उसकी सबसे गंभीर रणनीतिक भूलों में गिना गया।
शेर खान को समय मिल गया।
उसने बिहार में अपनी शक्ति मजबूत की और बंगाल की दिशा में विस्तार शुरू कर दिया।
गुजरात का बहादुर शाह
इसी समय पश्चिम भारत में गुजरात का सुल्तान बहादुर शाह तेजी से शक्तिशाली हो रहा था।
उसने मालवा पर अधिकार किया और राजस्थान की राजनीति में हस्तक्षेप बढ़ाया।
1535 में उसने चित्तौड़ पर आक्रमण किया।
चित्तौड़ की स्थिति ने उत्तर और पश्चिम भारत की राजनीति को प्रभावित किया।
हुमायूँ ने बहादुर शाह के विरुद्ध अभियान शुरू किया।
मुगल सेना ने गुजरात और मालवा के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया।
बहादुर शाह को पीछे हटना पड़ा।
एक समय ऐसा लगा कि गुजरात पूरी तरह मुगल नियंत्रण में आ जाएगा।
लेकिन हुमायूँ ने यहां स्थायी प्रशासन स्थापित करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
उसे अपने भाइयों और पूर्वी भारत की स्थिति की चिंता थी।
मुगल सेना के हटते ही बहादुर शाह ने शीघ्र ही कई क्षेत्रों पर फिर अधिकार कर लिया।
इस अभियान ने हुमायूँ की एक बड़ी कमजोरी स्पष्ट कर दी—वह युद्ध जीत सकता था, लेकिन विजय को स्थायी शासन में बदलने में सफल नहीं हो रहा था।
शेर खान का तेज उदय
जब हुमायूँ पश्चिम भारत में व्यस्त था, शेर खान ने बिहार और बंगाल में अपना प्रभाव तेजी से बढ़ाया।
उसने बंगाल के सुल्तान की कमजोरी का लाभ उठाया और वहां की राजनीति में निर्णायक हस्तक्षेप किया।
बंगाल की संपन्नता ने उसे विशाल आर्थिक संसाधन दिए।
अब वह केवल क्षेत्रीय अफगान सरदार नहीं रहा था।
वह एक ऐसे प्रतिद्वंद्वी में बदल चुका था जिसके पास सैनिक, धन, किले और प्रशासनिक आधार सब मौजूद थे।
हुमायूँ को अब उसकी वास्तविक शक्ति का अनुमान हुआ।
1537 : चुनार की दूसरी घेराबंदी
1537 में हुमायूँ ने फिर चुनार की ओर अभियान किया।
इस बार उसने लंबे समय तक किले की घेराबंदी की और अंततः उसे जीत लिया।
लेकिन इस अभियान में कई महीने खर्च हो गए।
यही समय शेर खान के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुआ।
जब हुमायूँ चुनार में उलझा हुआ था, शेर खान ने बंगाल में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली।
इतिहासकारों ने हुमायूँ की इस रणनीति की आलोचना की है क्योंकि उसने शेर खान की मुख्य शक्ति पर सीधे प्रहार करने के बजाय एक किले पर लंबा समय खर्च किया।
गौड़ पर हुमायूँ का अधिकार
हुमायूँ आगे बढ़ते हुए बंगाल की राजधानी गौड़ पहुंचा।
शेर खान रणनीतिक रूप से पीछे हट गया।
हुमायूँ ने गौड़ पर अधिकार कर लिया।
कहा जाता है कि उसने गौड़ का नाम बदलकर “जन्नताबाद” रखा।
लेकिन यहां उसकी सेना लंबे समय तक ठहर गई।
इस बीच शेर खान ने पीछे से महत्वपूर्ण मार्गों और क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करना शुरू कर दिया।
बिहार और उत्तर भारत से हुमायूँ का संपर्क कमजोर हो गया।
यह स्थिति अत्यंत गंभीर थी।
हुमायूँ बंगाल में था, जबकि शेर खान उसके और दिल्ली-आगरा के बीच के मार्ग पर हावी होता जा रहा था।
1539 : चौसा का युद्ध
हुमायूँ को बंगाल से पश्चिम की ओर लौटना पड़ा।
शेर खान ने उसकी सेना का पीछा किया।
दोनों सेनाएँ वर्तमान बिहार के बक्सर के निकट चौसा क्षेत्र में आमने-सामने थीं।
26 जून 1539 को चौसा का निर्णायक युद्ध हुआ।
शेर खान ने अचानक आक्रमण किया।
मुगल सेना तैयार नहीं थी।
हुमायूँ की सेना में भगदड़ मच गई।
बड़ी संख्या में सैनिक गंगा में डूब गए या मारे गए।
हुमायूँ स्वयं बड़ी कठिनाई से अपनी जान बचाकर निकल पाया।
लोकप्रिय परंपरा के अनुसार एक भिश्ती ने पानी की मशक की सहायता से उसे नदी पार कराकर बचाया।
चौसा की पराजय हुमायूँ के जीवन का निर्णायक मोड़ थी।
इस विजय के बाद शेर खान ने ‘शेरशाह’ की उपाधि धारण की और स्वतंत्र शासक के रूप में अपना दावा मजबूत किया।
चौसा की हार क्यों हुई?
हुमायूँ की पराजय के कई कारण थे।
उसने शेर खान की सैन्य क्षमता को लंबे समय तक कम आंका।
बंगाल में उसने अत्यधिक समय बिताया।
उसकी आपूर्ति और संपर्क व्यवस्था कमजोर हो गई।
भाइयों से उसे अपेक्षित सहायता नहीं मिली।
सेना में अनुशासन की समस्या थी।
इसके विपरीत शेर खान क्षेत्र की परिस्थितियों को बेहतर समझता था।
उसकी सेना अधिक गतिशील थी।
वह युद्ध के समय और स्थान का चुनाव सावधानी से करता था।
चौसा में उसने हुमायूँ की कमजोरी का पूरी तरह लाभ उठाया।
1540 : कन्नौज या बिलग्राम का युद्ध
चौसा की हार के बाद भी हुमायूँ के पास दिल्ली और आगरा बचाने का अवसर था।
उसने फिर सेना संगठित की।
लेकिन उसके भाइयों के साथ मतभेद जारी रहे।
कामरान ने अपनी शक्ति और क्षेत्रों की रक्षा को प्राथमिकता दी।
हुमायूँ और शेरशाह की सेनाएँ मई 1540 में कन्नौज के निकट बिलग्राम में आमने-सामने हुईं।
यह युद्ध निर्णायक सिद्ध हुआ।
मुगल सेना फिर पराजित हुई।
हुमायूँ को युद्धभूमि छोड़नी पड़ी।
अब दिल्ली और आगरा उसके हाथ से निकल गए।
शेरशाह सूरी उत्तर भारत का शासक बन गया।
मुगल शासन का पहला चरण समाप्त हो गया।
1540 से 1555 : मुगल शासन का अंतराल
यही वह बिंदु है जो “भारत पर मुगलों के लगातार 331 वर्ष शासन” वाली धारणा को तथ्यात्मक रूप से सुधारता है।
1540 से 1555 तक दिल्ली पर मुगल शासन नहीं था।
इस अवधि में सूर वंश की सत्ता रही।
शेरशाह सूरी ने 1540 से 1545 तक शासन किया।
उसके बाद इस्लाम शाह और अन्य सूर शासक आए।
इस पंद्रह वर्ष की अवधि में हुमायूँ दिल्ली का शासक नहीं था।
इसलिए 1526 से 1857 तक 331 वर्ष मुगल राजवंश की ऐतिहासिक अवधि अवश्य है, लेकिन निरंतर शासन नहीं।
हुमायूँ का पलायन
कन्नौज की पराजय के बाद हुमायूँ दिल्ली से पश्चिम की ओर भागा।
उसने पहले पंजाब की ओर जाने की कोशिश की।
लेकिन कामरान से उसे स्थायी सहयोग नहीं मिला।
कामरान अपने नियंत्रण वाले काबुल और पंजाब को बचाना चाहता था।
हुमायूँ की स्थिति लगातार कमजोर होती गई।
वह सिंध की ओर चला गया।
यह उसके जीवन का अत्यंत कठिन दौर था।
एक समय का दिल्ली का बादशाह अब शरण की तलाश में भटक रहा था।
हमीदा बानो बेगम से विवाह
इसी निर्वासन के दौरान हुमायूँ का विवाह हमीदा बानो बेगम से हुआ।
हमीदा उस समय किशोरावस्था में थीं।
हुमायूँ के भाई हिंदाल के धार्मिक गुरु मीर बाबा दोस्त के परिवार से उनका संबंध था।
प्रारंभ में हमीदा विवाह के लिए तैयार नहीं थीं, लेकिन बाद में विवाह हुआ।
यह विवाह मुगल इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ क्योंकि इन्हीं से आगे चलकर अकबर का जन्म हुआ।
अमरकोट में अकबर का जन्म
1542 तक हुमायूँ की स्थिति इतनी कठिन हो चुकी थी कि उसके पास सुरक्षित राज्य नहीं था।
सिंध में भी उसे स्थायी सहायता नहीं मिली।
अंततः अमरकोट के राणा प्रसाद ने उसे आश्रय दिया।
वर्तमान सिंध के उमरकोट में 15 अक्टूबर 1542 को हमीदा बानो बेगम ने पुत्र को जन्म दिया।
यह बालक आगे चलकर जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर कहलाया।
इतिहास की यह विडंबना उल्लेखनीय है कि मुगल साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली सम्राट उस समय पैदा हुआ जब उसका पिता स्वयं राज्यविहीन शरणार्थी शासक था।
फारस की ओर प्रस्थान
सिंध और राजस्थान में स्थायी आधार न मिलने के बाद हुमायूँ ने फारस जाने का निर्णय लिया।
उस समय फारस पर सफवी शासक शाह तहमास्प प्रथम का शासन था।
हुमायूँ ने शाह तहमास्प से सहायता मांगी।
शाह ने उसका स्वागत किया, लेकिन यह सहायता पूरी तरह निःस्वार्थ नहीं थी।
फारस और मुगल दरबार के धार्मिक तथा राजनीतिक संबंध जटिल थे।
सफवी शासक शिया था जबकि हुमायूँ सुन्नी था।
समकालीन और बाद के स्रोत बताते हैं कि हुमायूँ पर कुछ समय के लिए शिया दरबारी रीति स्वीकार करने का दबाव पड़ा।
इसके बदले शाह तहमास्प ने उसे सैनिक सहायता दी।
कंधार का प्रश्न
फारसी सहायता से हुमायूँ ने कंधार की ओर अभियान किया।
कंधार मध्य एशिया, फारस और भारत के बीच अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक केंद्र था।
हुमायूँ ने कंधार पर अधिकार किया।
फारसी सहायता के बदले इसे शाह तहमास्प को देने का प्रश्न उठा, लेकिन अंततः हुमायूँ ने कंधार अपने नियंत्रण में रखा।
इसके बाद उसने काबुल की ओर ध्यान दिया।
कामरान से संघर्ष
काबुल पर हुमायूँ के भाई कामरान का नियंत्रण था।
दोनों भाइयों के बीच कई वर्षों तक संघर्ष चलता रहा।
काबुल एक से अधिक बार हाथ बदलता रहा।
कामरान कभी समझौता करता और फिर विद्रोह कर देता।
हुमायूँ ने लंबे समय तक उसके प्रति अपेक्षाकृत नरमी दिखाई।
लेकिन बार-बार विद्रोह के बाद अंततः कामरान को अंधा कर दिया गया और मक्का भेज दिया गया।
यह घटना मुगल राजवंश के भीतर उत्तराधिकार और सत्ता संघर्ष की कठोर वास्तविकता को दर्शाती है।
हुमायूँ ने अंततः काबुल और कंधार पर अपना स्थायी नियंत्रण स्थापित कर लिया।
अब उसके पास भारत लौटने के लिए आधार था।
इस बीच भारत में क्या हो रहा था?
1545 में शेरशाह सूरी की कालिंजर अभियान के दौरान बारूद विस्फोट में मृत्यु हो गई।
उसका पुत्र इस्लाम शाह सूरी सिंहासन पर बैठा।
इस्लाम शाह ने कुछ वर्षों तक सूर सत्ता को संभाले रखा।
लेकिन 1553 में उसकी मृत्यु के बाद सूर वंश में उत्तराधिकार संघर्ष शुरू हो गया।
विभिन्न अफगान दावेदार आपस में लड़ने लगे।
सिकंदर शाह सूरी, आदिल शाह सूरी, इब्राहिम सूरी और अन्य प्रतिद्वंद्वियों ने अलग-अलग क्षेत्रों पर दावा किया।
यही विघटन हुमायूँ के लिए अवसर बना।
हुमायूँ की वापसी
1554 के आसपास हुमायूँ ने भारत की ओर अभियान की तैयारी शुरू की।
उसके सबसे महत्वपूर्ण सेनापतियों में बैरम खान था।
बैरम खान आगे चलकर अकबर के शासन के प्रारंभिक वर्षों में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
हुमायूँ ने पंजाब की ओर बढ़ना शुरू किया।
मुगल सेना ने एक के बाद एक क्षेत्रों पर अधिकार किया।
लाहौर बिना किसी बड़े प्रतिरोध के मुगलों के हाथ में आ गया।
इसके बाद सरहिंद की दिशा में निर्णायक संघर्ष हुआ।
1555 : सरहिंद की विजय
22 जून 1555 को सरहिंद के निकट मुगल सेना ने सिकंदर शाह सूरी की सेना को पराजित किया।
इस युद्ध में बैरम खान की बड़ी भूमिका रही।
सिकंदर सूरी पीछे हट गया।
अब दिल्ली की राह लगभग खुल गई।
लगभग पंद्रह वर्ष के निर्वासन के बाद हुमायूँ फिर उत्तर भारत की सत्ता के केंद्र की ओर लौट रहा था।
दिल्ली की पुनर्प्राप्ति
जुलाई 1555 में हुमायूँ ने दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया।
इसके साथ मुगल शासन फिर स्थापित हुआ।
1530 में पिता से प्राप्त जिस साम्राज्य को उसने 1540 में खो दिया था, उसे उसने पंद्रह वर्ष बाद वापस पा लिया।
लेकिन यह वही साम्राज्य नहीं था।
अब परिस्थितियाँ बदल चुकी थीं।
सूर शासन ने उत्तर भारत के प्रशासन में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए थे।
अफगान शक्ति अभी समाप्त नहीं हुई थी।
मुगल राज्य को फिर संगठित करना बाकी था।
और सबसे बड़ी विडंबना—हुमायूँ को इसके लिए समय ही नहीं मिला।
शेरशाह से पराजय ने हुमायूँ को क्या सिखाया?
हुमायूँ की पहली शासनावधि में कई कमजोरियाँ दिखीं।
वह एक साथ कई मोर्चों पर अभियान करता रहा।
विजय के बाद प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत करने में कई बार देर हुई।
शेर खान को प्रारंभ में पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया।
भाइयों के साथ सत्ता-विभाजन ने केंद्रीय नेतृत्व को कमजोर किया।
लेकिन निर्वासन ने हुमायूँ को बदल भी दिया।
दूसरे शासनकाल तक वह पहले से अधिक सावधान और अनुभवी हो चुका था।
काबुल और कंधार के संघर्षों ने उसकी सैन्य क्षमता बढ़ाई।
फारसी दरबार से संपर्क का मुगल संस्कृति पर भी प्रभाव पड़ा।
आगे अकबर के समय मुगल चित्रकला, दरबारी संस्कृति और फारसी प्रभाव के विस्तार में निर्वासन के दौरान बने इन संबंधों की भूमिका थी।
दीनपनाह : हुमायूँ का स्वप्न
अपने पहले शासनकाल में हुमायूँ ने दिल्ली में एक नए नगर की योजना बनाई थी जिसे ‘दीनपनाह’ कहा गया।
इसका अर्थ लगभग “धर्म का आश्रय” या “आस्था का आश्रय” माना जाता है।
यह क्षेत्र वर्तमान पुराने किले से जुड़ा है।
हुमायूँ की महत्वाकांक्षा इसे विद्वानों, धार्मिक विचारकों और सत्ता के नए केंद्र के रूप में विकसित करने की थी।
लेकिन राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह योजना पूरी तरह विकसित नहीं हो सकी।
बाद में शेरशाह ने इसी क्षेत्र में निर्माण करवाया।
दिल्ली का पुराना किला इस जटिल इतिहास का साक्षी है।
हुमायूँ का व्यक्तित्व
हुमायूँ का व्यक्तित्व बाबर से काफी अलग था।
वह शिक्षित, साहित्य और ज्योतिष में रुचि रखने वाला शासक था।
उसे खगोल विज्ञान और ज्योतिष में विशेष रुचि थी।
कहा जाता है कि वह प्रशासनिक और दरबारी मामलों में ग्रहों और दिनों के आधार पर रंग और प्रतीक निर्धारित करता था।
उसकी यह प्रवृत्ति बाद के इतिहासकारों को कभी आकर्षक तो कभी अव्यावहारिक लगी।
हुमायूँ उदार स्वभाव का भी माना जाता है।
लेकिन शासन में अत्यधिक उदारता कई बार कमजोरी बन गई।
विशेषकर अपने भाइयों के लगातार विद्रोह के बावजूद वह लंबे समय तक कठोर कार्रवाई से बचता रहा।
क्या हुमायूँ अयोग्य शासक था?
लोकप्रिय इतिहास में हुमायूँ को अक्सर असफल शासक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यह निष्कर्ष अधूरा है।
यह सही है कि उसने 1540 में अपना साम्राज्य खो दिया।
उससे रणनीतिक गलतियाँ हुईं।
उसने शेरशाह की शक्ति को देर से पहचाना।
उसका शासन बाबर और अकबर की तुलना में कम प्रभावशाली था।
लेकिन दूसरी ओर यह भी तथ्य है कि राज्यविहीन होने के बाद उसने हार स्वीकार नहीं की।
वह सिंध से फारस गया।
फिर कंधार और काबुल पर अधिकार किया।
भाइयों के विद्रोहों का सामना किया।
और लगभग पंद्रह वर्ष बाद दिल्ली फिर प्राप्त की।
एक बार पूरी तरह सत्ता से बाहर हो चुके मध्यकालीन शासक का इतने लंबे अंतराल के बाद वापस आकर अपना सिंहासन प्राप्त करना साधारण उपलब्धि नहीं थी।
फारसी प्रभाव और मुगल संस्कृति
हुमायूँ के निर्वासन का मुगल सांस्कृतिक इतिहास पर गहरा प्रभाव पड़ा।
फारस में उसने सफवी दरबार की कला, स्थापत्य और चित्रकला परंपराओं को निकट से देखा।
वह कुछ फारसी कलाकारों और विद्वानों को अपने साथ लाया।
इनमें मीर सैयद अली और अब्दुस समद जैसे कलाकार विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे।
आगे अकबर के समय इन कलाकारों ने मुगल चित्रकला की प्रारंभिक शाही परंपरा विकसित करने में बड़ी भूमिका निभाई।
इस अर्थ में हुमायूँ का निर्वासन राजनीतिक पराजय तो था, लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से मुगल दरबार के विकास का महत्वपूर्ण माध्यम भी बना।
गुलबदन बेगम और हुमायूँनामा
हुमायूँ के जीवन को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत उसकी बहन गुलबदन बेगम द्वारा लिखा गया ‘हुमायूँनामा’ है।
गुलबदन बाबर की पुत्री और हुमायूँ की बहन थीं।
अकबर के आदेश पर उन्होंने अपने परिवार की स्मृतियों को लिखा।
हुमायूँनामा केवल राजकीय घटनाओं का विवरण नहीं है।
इसमें मुगल परिवार की निजी जिंदगी, महिलाओं की भूमिका, विवाह, यात्राएँ, पारिवारिक संबंध और भाइयों के संघर्ष की जानकारी भी मिलती है।
इस कारण यह मुगल काल के सामाजिक और पारिवारिक इतिहास का असाधारण स्रोत है।
मृत्यु : सत्ता वापस मिली, समय नहीं मिला
जनवरी 1556 में हुमायूँ दिल्ली के पुराने किले में स्थित शेर मंडल नामक भवन में था।
इस भवन का उपयोग पुस्तकालय और अध्ययन स्थल के रूप में किया जाता था।
परंपरागत विवरण के अनुसार अजान की आवाज सुनकर वह सीढ़ियों पर बैठने या झुकने का प्रयास कर रहा था।
उसका पैर वस्त्र में उलझा और वह सीढ़ियों से नीचे गिर गया।
उसे गंभीर चोट लगी।
कुछ दिनों बाद, 27 जनवरी 1556 को उसकी मृत्यु हो गई।
वह लगभग 47 वर्ष का था।
दिल्ली पुनः प्राप्त किए उसे एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था।
हुमायूँ का मकबरा
हुमायूँ की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी हाजी बेगम—बेगा बेगम—ने दिल्ली में उसका भव्य मकबरा बनवाया।
यह मकबरा भारतीय उपमहाद्वीप की मुगल वास्तुकला के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
चारबाग योजना, ऊंचे चबूतरे, लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का उपयोग तथा विशाल गुंबद आगे के मुगल स्थापत्य के लिए उदाहरण बने।
हुमायूँ का मकबरा ताजमहल से लगभग एक शताब्दी पहले बना और उसे मुगल मकबरा स्थापत्य की निर्णायक कड़ी माना जाता है।
हुमायूँ और अकबर
हुमायूँ की सबसे स्थायी ऐतिहासिक विरासत राजनीतिक रूप से उसके पुत्र अकबर के रूप में सामने आई।
हुमायूँ की मृत्यु के समय अकबर पंजाब क्षेत्र में था।
उसकी आयु केवल तेरह वर्ष थी।
बैरम खान उसके संरक्षक और प्रमुख सेनापति थे।
हुमायूँ की मृत्यु की खबर कुछ समय तक छिपाई गई ताकि सत्ता परिवर्तन व्यवस्थित ढंग से हो सके।
फरवरी 1556 में पंजाब के कलानौर में अकबर को मुगल सम्राट घोषित किया गया।
लेकिन दिल्ली में मुगल सत्ता अभी सुरक्षित नहीं थी।
कुछ ही महीनों बाद हेमू ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया।
इससे पानीपत के दूसरे युद्ध की भूमिका बनी।
इस प्रकार हुमायूँ की मृत्यु के साथ मुगल सत्ता का संकट समाप्त नहीं हुआ—उसका अगला और कहीं बड़ा अध्याय अकबर के सामने खुलने वाला था।
हुमायूँ की दो शासन अवधियाँ
हुमायूँ का इतिहास समझने के लिए उसकी दो अलग-अलग शासन अवधियों को स्पष्ट रखना जरूरी है।
पहली अवधि : 1530–1540
इसमें उसने बाबर की विरासत संभाली, गुजरात अभियान किया, शेर खान के उदय का सामना किया और अंततः चौसा तथा कन्नौज में पराजित होकर साम्राज्य खो दिया।
निर्वासन : 1540–1555
इसमें सिंध में भटकाव, अमरकोट में अकबर का जन्म, फारस में शरण, कंधार-काबुल की पुनर्प्राप्ति और कामरान से संघर्ष शामिल हैं।
दूसरी अवधि : 1555–1556
सरहिंद की विजय के बाद दिल्ली की पुनर्प्राप्ति और कुछ महीनों बाद आकस्मिक मृत्यु।
यही संरचना हुमायूँ को मुगल इतिहास के सबसे असामान्य शासकों में रखती है।
1530–1556 : प्रमुख समयरेखा
दिसंबर 1530 — बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूँ मुगल सम्राट बना।
1532 — अफगान शक्तियों के विरुद्ध अभियान; चुनार की पहली घेराबंदी।
1535–1536 — गुजरात के बहादुर शाह के विरुद्ध अभियान; मालवा और गुजरात के क्षेत्रों पर अस्थायी मुगल नियंत्रण।
1537–1538 — चुनार पर कब्जा; बंगाल की ओर अभियान।
1538 — गौड़ पर हुमायूँ का अधिकार।
26 जून 1539 — चौसा का युद्ध; शेर खान से निर्णायक पराजय।
17 मई 1540 के आसपास — कन्नौज/बिलग्राम का युद्ध; शेरशाह की विजय; हुमायूँ का भारत से पलायन।
1540–1542 — सिंध और पश्चिमी भारत में भटकाव।
15 अक्टूबर 1542 — अमरकोट में अकबर का जन्म।
1543–1544 — हुमायूँ का फारस की ओर प्रस्थान।
1545 — फारसी सहायता से कंधार और फिर काबुल की दिशा में सफलता; इसी वर्ष शेरशाह की मृत्यु।
1545–1553 — कामरान और अन्य भाइयों से संघर्ष; काबुल पर नियंत्रण सुदृढ़।
1554–1555 — भारत की पुनर्विजय का अभियान।
22 जून 1555 — सरहिंद के निकट सिकंदर सूरी पर मुगल विजय।
जुलाई 1555 — दिल्ली और आगरा पर हुमायूँ का पुनः अधिकार।
जनवरी 1556 — दिल्ली में सीढ़ियों से गिरकर गंभीर रूप से घायल।
27 जनवरी 1556 — हुमायूँ की मृत्यु।
हुमायूँ की सबसे बड़ी भूलें
हुमायूँ के प्रथम शासनकाल की विफलता के पीछे कई कारण थे।
उसने बाबर से प्राप्त अस्थिर साम्राज्य को पहले संगठित करने के बजाय कई दिशाओं में अभियान चलाए।
उसने भाइयों को अत्यधिक स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्ति प्राप्त करने दी।
शेर खान को उसकी प्रारंभिक अवस्था में समाप्त नहीं किया।
गुजरात में विजय को स्थायी प्रशासन में नहीं बदल सका।
बंगाल में जरूरत से अधिक समय बिताया।
चौसा से पहले अपने संपर्क और आपूर्ति मार्गों को सुरक्षित नहीं रखा।
और निर्णायक संकट के समय राजवंश के भीतर एकता बनाए रखने में विफल रहा।
लेकिन इन गलतियों के साथ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसे एक अत्यंत प्रतिभाशाली प्रतिद्वंद्वी मिला था।
शेरशाह केवल अवसरवादी सरदार नहीं था; वह अपने युग के सर्वोत्तम सैन्य और प्रशासनिक नेताओं में था।
सबसे बड़ी उपलब्धि
यदि हुमायूँ की सबसे बड़ी विफलता 1540 में साम्राज्य खोना थी, तो उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1555 में उसी साम्राज्य को फिर हासिल करना थी।
पंद्रह वर्ष का निर्वासन किसी भी राजवंश को इतिहास से मिटा सकता था।
लेकिन हुमायूँ ने काबुल में अपनी शक्ति पुनः संगठित की।
सही अवसर की प्रतीक्षा की।
सूर सत्ता के विघटन का लाभ उठाया।
और दिल्ली लौट आया।
इसी पुनर्प्राप्ति ने अकबर के लिए वह राजनीतिक मंच तैयार किया जिस पर आगे मुगल साम्राज्य का वास्तविक विस्तार हुआ।
निष्कर्ष
हुमायूँ का जीवन विजय और पराजय के बीच झूलती हुई असाधारण कथा है।
1530 में उसे बाबर का साम्राज्य मिला।
1540 में वह सब कुछ खो बैठा।
1542 में उसका पुत्र अकबर एक ऐसी अवस्था में पैदा हुआ जब पिता स्वयं राज्यविहीन था।
हुमायूँ को भारत छोड़कर फारस में शरण लेनी पड़ी।
वह फिर लौटा।
कंधार और काबुल जीते।
अपने ही भाइयों से लड़ा।
और अंततः 1555 में दिल्ली की गद्दी वापस प्राप्त की।
लेकिन सत्ता ने उसे अधिक समय नहीं दिया।
जनवरी 1556 की दुर्घटना ने उसके जीवन का अचानक अंत कर दिया।
इतिहास में हुमायूँ बाबर और अकबर के बीच दबा हुआ नाम दिखाई देता है, लेकिन उसके बिना मुगल सत्ता की दूसरी स्थापना संभव नहीं होती।
बाबर ने मुगल सत्ता की नींव रखी थी।
हुमायूँ ने उसे खोया और फिर वापस पाया।
और अकबर ने उसी पुनर्प्राप्त सत्ता को आगे चलकर एक विशाल तथा संगठित साम्राज्य में बदल दिया।