शाह आलम द्वितीय — 1759–1806
बक्सर, दीवानी, मराठा संरक्षण और अंग्रेजी प्रभुत्व की ओर बढ़ता मुगल तख्त
शाह आलम द्वितीय का शासन मुगल इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण और विडंबनापूर्ण अध्यायों में से एक है। उसका वास्तविक नाम अली गौहर था। वह आलमगीर द्वितीय का पुत्र था और अपने पिता के शासनकाल में ही दिल्ली की दरबारी राजनीति से असंतुष्ट होकर राजधानी छोड़ चुका था। 1759 में आलमगीर द्वितीय की हत्या के बाद उसने स्वयं को सम्राट घोषित किया और “शाह आलम द्वितीय” की उपाधि धारण की।
लेकिन वह ऐसा मुगल बादशाह बना जिसके शासन के शुरुआती लगभग बारह वर्ष वह अपनी ही राजधानी दिल्ली से बाहर रहा। आधुनिक शोध के अनुसार 1759 से 1772 तक शाहजहानाबाद में कोई सक्रिय मुगल सम्राट उपस्थित नहीं था; शाह आलम इलाहाबाद, बनारस, बिहार और आसपास के क्षेत्रों में भटकता रहा और अंततः 1772 में मराठा संरक्षण में दिल्ली लौट सका।
उसके लंबे शासनकाल—1759 से 1806—में भारत की शक्ति-संरचना पूरी तरह बदल गई। 1761 में पानीपत का तीसरा युद्ध हुआ। 1764 में बक्सर में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल सम्राट, अवध के नवाब और बंगाल के अपदस्थ नवाब की संयुक्त शक्ति को हराया। 1765 में शाह आलम द्वितीय ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी दी। इसके बाद वह कुछ वर्षों तक कंपनी के संरक्षण में इलाहाबाद रहा। 1772 में मराठों की सहायता से दिल्ली लौटा। 1788 में गुलाम कादिर ने दिल्ली पर कब्जा कर उसे अंधा कर दिया। महादजी सिंधिया ने उसे फिर सिंहासन पर स्थापित किया। और अंततः 1803 में अंग्रेजी सेना ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया, जिसके बाद मुगल सम्राट अंग्रेजी संरक्षण और पेंशन पर निर्भर हो गया।
यही कारण है कि शाह आलम द्वितीय का शासन केवल एक कमजोर बादशाह की कहानी नहीं है। यह उस ऐतिहासिक संक्रमण की कहानी है जिसमें मुगल वैधानिक सत्ता धीरे-धीरे मराठों और फिर अंग्रेजी कंपनी की राजनीतिक छाया में चली गई।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
शाह आलम द्वितीय का जन्म 1728 में हुआ।
उसका नाम अली गौहर रखा गया।
वह आलमगीर द्वितीय का पुत्र था।
युवावस्था से ही उसे दिल्ली की दरबारी राजनीति का कठिन अनुभव मिला।
उस समय वास्तविक शक्ति इमाद-उल-मुल्क जैसे वजीरों के हाथ में थी।
अली गौहर जानता था कि यदि वह दिल्ली में रहा तो उसका जीवन भी खतरे में पड़ सकता है।
इसलिए उसने राजधानी छोड़कर पूर्वी भारत की दिशा में स्वतंत्र राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश की।
आधुनिक शोध बताता है कि 1758 के आसपास वह इमाद-उल-मुल्क के नियंत्रण से बचकर दिल्ली से निकल गया और अवध तथा बिहार की ओर गया।
आलमगीर द्वितीय की हत्या
1759 में उसके पिता आलमगीर द्वितीय की हत्या कर दी गई।
हत्या का संबंध इमाद-उल-मुल्क की राजनीति से था।
उस समय अली गौहर दिल्ली में नहीं था।
उसने स्वयं को सम्राट घोषित किया और “शाह आलम द्वितीय” की उपाधि ग्रहण की।
लेकिन उसके पास राजधानी नहीं थी।
लाल किला उसके नियंत्रण में नहीं था।
दिल्ली की सेना उसके अधीन नहीं थी।
यह मुगल इतिहास का असामान्य दृश्य था—
बादशाह था, लेकिन राजधानी उसके पास नहीं थी।
1759–1760 : बिहार और बंगाल की ओर अभियान
शाह आलम ने पूर्वी भारत में अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने की कोशिश की।
उसका लक्ष्य था बिहार और बंगाल जैसे समृद्ध प्रांतों पर शाही अधिकार पुनः स्थापित करना।
लेकिन बंगाल की राजनीति 1757 की प्लासी के बाद बदल चुकी थी।
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी अब वहां केवल व्यापारी संस्था नहीं रही थी।
वह नवाबों के चयन और राजनीति में निर्णायक हस्तक्षेप कर रही थी।
शाह आलम ने 1759 और 1760 में बिहार तथा बंगाल की दिशा में प्रयास किए, लेकिन कंपनी की सैन्य शक्ति और अवध के शुजा-उद-दौला के सीमित सहयोग के कारण सफलता नहीं मिली।
प्लासी के बाद का बंगाल
1757 में सिराजुद्दौला की हार के बाद मीर जाफर को नवाब बनाया गया था।
लेकिन कंपनी और नवाब के संबंध शीघ्र ही बिगड़ गए।
1760 में कंपनी ने मीर जाफर को हटाकर मीर कासिम को नवाब बनाया।
यही घटनाएँ दिखाती हैं कि बंगाल में सत्ता का वास्तविक केंद्र तेजी से कंपनी की ओर जा रहा था।
शाह आलम के लिए यह स्थिति अत्यंत अपमानजनक थी।
कभी बंगाल मुगल साम्राज्य का सबसे समृद्ध सूबा था।
अब मुगल सम्राट उसी बंगाल में अपनी वैधानिक सत्ता पुनः स्थापित नहीं कर पा रहा था।
कंपनी ने शाह आलम को मान्यता क्यों दी?
1761 में अंग्रेजी कंपनी ने शाह आलम को मुगल सम्राट के रूप में मान्यता दी।
इसके पीछे आदर्शवाद नहीं बल्कि राजनीतिक व्यावहारिकता थी।
कंपनी को अपने द्वारा स्थापित नवाब मीर कासिम की वैधता के लिए मुगल सनद उपयोगी लगती थी।
शाह आलम ने मीर कासिम के लिए सनद जारी की।
यानी वास्तविक शक्ति कंपनी और प्रांतीय नवाबों के हाथ में थी—
लेकिन वैधता के लिए अभी भी मुगल सम्राट की मुहर उपयोगी थी।
1761 : पानीपत का तीसरा युद्ध
शाह आलम द्वितीय के शासन के प्रारंभिक काल में ही 14 जनवरी 1761 को पानीपत का तीसरा युद्ध हुआ।
एक ओर अहमद शाह अब्दाली और उसके भारतीय सहयोगी थे।
दूसरी ओर सदाशिवराव भाऊ के नेतृत्व में मराठा सेना।
यह युद्ध मुगल सम्राट की सेना और किसी आक्रमणकारी के बीच नहीं था।
यही तथ्य मुगल पतन की गहराई दिखाता है।
दिल्ली और उत्तर भारत की सर्वोच्चता के लिए अब अफगान और मराठा शक्ति लड़ रही थीं, जबकि मुगल सम्राट स्वयं पूर्वी भारत में भटक रहा था।
पानीपत का परिणाम
मराठा सेना को विनाशकारी पराजय मिली।
सदाशिवराव भाऊ और विश्वासराव सहित अनेक प्रमुख मराठा नेता मारे गए।
मराठों को उत्तर भारत से अस्थायी रूप से पीछे हटना पड़ा।
लेकिन अहमद शाह अब्दाली ने भी भारत में स्थायी साम्राज्य स्थापित नहीं किया।
इसलिए पानीपत ने कोई नया स्थायी अखिल भारतीय साम्राज्य पैदा नहीं किया।
उसने केवल शक्ति-रिक्ति और बढ़ाई।
मुगल साम्राज्य के पुनरुत्थान का अवसर भी इससे नहीं निकला।
पानीपत के बाद कौन मजबूत हुआ?
अब्दाली वापस अफगानिस्तान चला गया।
मराठे कुछ वर्षों में फिर संगठित हो गए।
जाट शक्ति बनी रही।
सिख पंजाब में बढ़ने लगे।
अवध अपनी स्वतंत्र राजनीति चला रहा था।
बंगाल में कंपनी मजबूत हो रही थी।
यानी पानीपत के बाद दिल्ली की सत्ता फिर भी किसी एक शक्ति के हाथ स्थायी रूप से नहीं आई।
शाह आलम इस समय भी अपनी राजधानी से दूर था।
मीर कासिम और कंपनी का संघर्ष
मीर कासिम शीघ्र ही अंग्रेजी कंपनी के नियंत्रण से असंतुष्ट हो गया।
उसने अपनी प्रशासनिक और सैन्य शक्ति मजबूत करने का प्रयास किया।
कंपनी के व्यापारिक विशेषाधिकारों और दस्तक के दुरुपयोग पर विवाद बढ़ा।
अंततः संघर्ष खुला युद्ध बन गया।
1763 में मीर कासिम पराजित होकर अवध भाग गया।
वह वहां शुजा-उद-दौला के पास पहुँचा।
अब कंपनी के विरुद्ध एक बड़ा गठबंधन बनने लगा।
तीन शक्तियों का गठबंधन
कंपनी के विरुद्ध गठबंधन में मुख्यतः तीन पक्ष थे—
मीर कासिम,
अवध का नवाब शुजा-उद-दौला,
और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय।
शाह आलम अभी भी साम्राज्य पुनः प्राप्त करने की आशा रखता था।
शुजा-उद-दौला बिहार की दिशा में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था।
मीर कासिम अपना बंगाल वापस चाहता था।
इस प्रकार तीनों की आवश्यकताएँ अलग थीं, लेकिन विरोधी एक था—
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी।
1764 : बक्सर का युद्ध
23 अक्टूबर 1764 को बक्सर के निकट निर्णायक युद्ध हुआ।
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना का सामना मीर कासिम, शुजा-उद-दौला और शाह आलम द्वितीय से जुड़े संयुक्त पक्ष से हुआ।
कंपनी की सेना ने निर्णायक विजय प्राप्त की।
कैम्ब्रिज के अनुसार इस युद्ध में कंपनी ने मीर कासिम, अवध के नवाब और स्वयं शाह आलम द्वितीय की संयुक्त शक्ति को पराजित किया, और इसके बाद कंपनी पूर्वी भारत की निर्विवाद प्रमुख सैन्य शक्ति बन गई।
प्लासी और बक्सर में अंतर
प्लासी 1757 महत्वपूर्ण थी।
लेकिन बक्सर 1764 राजनीतिक दृष्टि से और भी निर्णायक सिद्ध हुआ।
प्लासी में कंपनी ने बंगाल के नवाब को हराया था।
बक्सर में उसने—
बंगाल के पूर्व नवाब,
अवध के नवाब,
और स्वयं मुगल सम्राट
के संयुक्त पक्ष को पराजित किया।
अब कंपनी केवल बंगाल की दरबारी राजनीति की शक्ति नहीं थी।
वह उत्तर भारतीय राजनीति में भी बड़ी सैन्य शक्ति बन चुकी थी।
बक्सर के बाद शाह आलम की स्थिति
बक्सर के बाद शाह आलम के पास कंपनी से समझौते के अलावा बहुत कम विकल्प थे।
शुजा-उद-दौला भी पराजित हुआ।
कंपनी की सेना आगे बढ़ी।
शाह आलम अंग्रेजी संरक्षण में आ गया।
यह मुगल इतिहास का दूसरा बड़ा मोड़ था।
1759 में वह दिल्ली से बाहर बिना राजधानी का सम्राट था।
1765 तक वह विजयी अंग्रेजी कंपनी के संरक्षण में बैठा सम्राट बन चुका था।
1765 : इलाहाबाद की संधि
1765 में रॉबर्ट क्लाइव और भारतीय पक्षों के बीच इलाहाबाद में समझौते हुए।
इन समझौतों ने पूर्वी भारत की सत्ता-संरचना बदल दी।
शाह आलम द्वितीय ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्रदान की।
दीवानी का अर्थ था राजस्व-संग्रह और वित्तीय प्रशासन का अधिकार।
12 अगस्त 1765 को जारी शाही दीवानी सनद का उल्लेख समकालीन अभिलेखीय अध्ययनों में मिलता है।
दीवानी का वास्तविक अर्थ
यह घटना भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कंपनी अब केवल व्यापारिक संस्था नहीं रही।
अब उसके पास भारत के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में से एक से राजस्व प्राप्त करने का वैधानिक मुगल अधिकार था।
कैम्ब्रिज के अध्ययन के अनुसार कंपनी को बंगाल की दीवानी मिलने का अर्थ था कि वह मुगल सम्राट की ओर से प्रांतीय राजस्व की प्राप्तकर्ता और वित्तीय प्रशासक बनी।
लेकिन इसे तुरंत पूर्ण ब्रिटिश शासन समझना भी सरलकरण होगा।
1765 की व्यवस्था में पुरानी मुगल प्रांतीय संस्थाओं के कई औपचारिक तत्व बने रहे और कंपनी का प्रत्यक्ष प्रशासन क्रमिक रूप से विकसित हुआ।
बंगाल, बिहार और उड़ीसा
दीवानी में सामान्यतः बंगाल, बिहार और उड़ीसा के राजस्व अधिकार का उल्लेख किया जाता है।
लेकिन यहां भी ऐतिहासिक सावधानी जरूरी है।
1765 में कंपनी को कागज पर व्यापक दीवानी अधिकार मिला, पर उड़ीसा के सभी क्षेत्रों पर उसका वास्तविक प्रत्यक्ष नियंत्रण उसी क्षण स्थापित नहीं हो गया था; राजनीतिक नियंत्रण क्रमिक था और मराठा प्रभाव वाले उड़ीसा के हिस्सों का पूर्ण अधिग्रहण बाद में हुआ।
इसलिए “1765 में पूरा बंगाल-बिहार-उड़ीसा अंग्रेजों का हो गया” कहना अत्यधिक सरल होगा।
सही कथन है—
कंपनी ने मुगल सम्राट से इन प्रांतों की दीवानी का वैधानिक अधिकार प्राप्त किया और इसी आधार पर उसकी राजस्व-सत्ता तेजी से बढ़ी।
शाह आलम को क्या मिला?
बदले में शाह आलम को वार्षिक धनराशि देने की व्यवस्था की गई।
उसे इलाहाबाद और कोरा जैसे क्षेत्र भी उसके शाही खर्च के लिए उपलब्ध कराए गए।
कंपनी ने भविष्य में उसे दिल्ली वापस पहुँचाने का अस्पष्ट आश्वासन भी दिया।
लेकिन वह कंपनी का आश्रित बन गया।
कैम्ब्रिज के अध्ययन के अनुसार इलाहाबाद समझौते में शाह आलम को शाही परिवार के खर्च के लिए भूभाग और बंगाल के राजस्व से वार्षिक भुगतान दिया गया, जबकि कंपनी ने दीवानी प्राप्त की।
भारत के इतिहास का असाधारण विरोधाभास
1765 की स्थिति पर ध्यान दें।
1526 में बाबर ने दिल्ली जीतकर मुगल शासन स्थापित किया था।
अकबर के समय बंगाल मुगल साम्राज्य के भीतर लाया गया।
शाहजहाँ और औरंगज़ेब के काल में बंगाल शाही खजाने की सबसे समृद्ध आय-स्रोतों में था।
अब 1765 में—
मुगल बादशाह स्वयं एक विदेशी व्यापारिक कंपनी को बंगाल का राजस्व लेने का अधिकार दे रहा था।
यही सत्ता-संतुलन के उलट जाने का स्पष्ट संकेत था।
कंपनी की वैधता के लिए मुगल सम्राट क्यों जरूरी था?
कंपनी बक्सर जीत चुकी थी।
फिर भी उसने शाह आलम से दीवानी की सनद ली।
क्यों?
क्योंकि मुगल राजवंश की वैधानिक प्रतिष्ठा अभी जीवित थी।
भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में शाही फरमान अधिकार को कानूनी और राजनीतिक वैधता देता था।
कंपनी भी अपनी विजय को शाही स्वीकृति से ढकना चाहती थी।
आधुनिक शोध बताता है कि कंपनी ने मुगल सम्राट की वैधानिक सत्ता का उपयोग अपने बंगाल अधिकारों को अन्य भारतीय और यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों के सामने अधिक सुरक्षित बनाने के लिए किया।
इलाहाबाद में सम्राट
1765 के बाद शाह आलम इलाहाबाद में रहा।
वह अंग्रेजी कंपनी के संरक्षण में था।
उसकी स्थिति विचित्र थी।
वह कागज पर हिंदुस्तान का बादशाह था।
लेकिन—
उसकी राजधानी दिल्ली उसके पास नहीं थी,
बंगाल का राजस्व कंपनी ले रही थी,
अवध स्वतंत्र नवाब के हाथ में था,
और उसकी सुरक्षा स्वयं कंपनी कर रही थी।
यही वह दौर है जब मुगल सम्राट का नाम उसकी वास्तविक शक्ति से बहुत बड़ा हो गया।
दिल्ली वापसी की बेचैनी
शाह आलम इलाहाबाद में स्थायी रूप से रहना नहीं चाहता था।
उसका लक्ष्य दिल्ली वापस जाना था।
दिल्ली केवल एक शहर नहीं थी।
वह मुगल वैधता का प्रतीक थी।
लाल किले और शाही राजधानी के बिना बादशाहत अधूरी थी।
लेकिन अंग्रेजी कंपनी उस समय उसे दिल्ली पहुँचाने के लिए गंभीर सैन्य अभियान करने को तैयार नहीं थी।
कंपनी का मुख्य हित बंगाल और पूर्वी भारत की आय सुरक्षित करना था।
अंग्रेजों से मोहभंग
समय के साथ शाह आलम का कंपनी से असंतोष बढ़ा।
उसे उम्मीद थी कि अंग्रेज उसे दिल्ली की वास्तविक सत्ता वापस दिलाएंगे।
लेकिन कंपनी ऐसा करने में रुचि नहीं रखती थी।
उसकी प्राथमिकता थी—
राजस्व,
बंगाल,
व्यापार,
और अवध को एक सुरक्षा-कवच के रूप में बनाए रखना।
दिल्ली उसके तत्काल सामरिक कार्यक्रम का केंद्र नहीं थी।
मराठों का पुनरुत्थान
1761 की पानीपत पराजय के बाद मराठा शक्ति कुछ समय के लिए कमजोर हुई थी।
लेकिन शीघ्र ही वह फिर संगठित हो गई।
पेशवा माधवराव प्रथम के समय मराठों ने अपनी शक्ति पुनः प्राप्त की।
उत्तर भारत में महादजी सिंधिया जैसे सेनानायक उभरे।
1770 के दशक तक मराठों ने दिल्ली की राजनीति में फिर निर्णायक प्रभाव स्थापित करना शुरू कर दिया।
शाह आलम और मराठा समझौता
शाह आलम ने समझ लिया कि दिल्ली लौटने के लिए मराठा सहायता सबसे व्यावहारिक रास्ता है।
उसने अंग्रेजी संरक्षण से दूरी बनाई।
मराठों से समझौता किया।
1771–1772 में मराठा सेना ने उसकी दिल्ली वापसी का मार्ग तैयार किया।
आधुनिक शोध के अनुसार शाह आलम 1772 के आरंभ में महादजी सिंधिया के संरक्षण में दिल्ली वापस आया।
1772 : दिल्ली वापसी
लगभग बारह वर्ष बाद शाह आलम द्वितीय ने फिर दिल्ली में प्रवेश किया।
यह मुगल वैधता की प्रतीकात्मक पुनर्स्थापना थी।
वह लाल किले में वापस आया।
लेकिन प्रश्न था—
वास्तविक शक्ति किसकी थी?
उत्तर था—
मराठों की।
शाह आलम दिल्ली का सम्राट था, लेकिन उसकी सुरक्षा और सत्ता मराठा सेना पर निर्भर थी।
“बादशाह शाह आलम, सल्तनत…”
इस काल से एक प्रसिद्ध कहावत जुड़ी—
“सल्तनत-ए-शाह आलम, अज़ दिल्ली ता पालम।”
अर्थात शाह आलम की सल्तनत दिल्ली से पालम तक।
इस कथन का प्रयोग उसकी वास्तविक सीमित सत्ता का मजाक उड़ाने के लिए किया जाता है।
इसे हर समय की सटीक भौगोलिक सीमा नहीं समझना चाहिए, लेकिन यह उस युग की राजनीतिक वास्तविकता का शक्तिशाली व्यंग्यात्मक प्रतीक है।
मुगल बादशाह का नाम विशाल था—
लेकिन प्रत्यक्ष क्षेत्रीय नियंत्रण अत्यंत छोटा।
मराठा संरक्षण
दिल्ली में शाह आलम के सबसे महत्वपूर्ण संरक्षकों में महादजी सिंधिया का नाम था।
महादजी पानीपत के युद्ध से बच निकला था और आगे मराठा शक्ति के महानतम पुनर्निर्माताओं में बना।
उसने उत्तर भारत में मराठा प्रभाव फिर खड़ा किया।
दिल्ली,
आगरा,
दोआब
और राजस्थान की राजनीति में उसकी भूमिका बढ़ती गई।
शाह आलम की शाही वैधता और सिंधिया की सैन्य शक्ति एक-दूसरे के लिए उपयोगी थीं।
बादशाह मराठों के लिए क्यों महत्वपूर्ण था?
मराठे चाहें तो मुगल राजवंश समाप्त करने की कोशिश कर सकते थे।
लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
क्योंकि शाह आलम का नाम अभी भी राजनीतिक वैधता देता था।
उसके नाम से उपाधियाँ,
सनदें,
मनसब,
और प्रशासनिक अधिकार वैध ठहराए जा सकते थे।
इस प्रकार मराठा सैन्य शक्ति मुगल शाही प्रतीक का उपयोग करने लगी।
दिल्ली की स्थिति
1770 और 1780 के दशक में दिल्ली का दरबार अभी भी सांस्कृतिक महत्व रखता था।
फारसी और उर्दू साहित्य,
संगीत,
सूफी परंपरा,
और शहरी जीवन बना रहा।
लेकिन राजनीतिक अस्थिरता गहरी थी।
मराठा प्रभाव,
रोहिल्ला सरदार,
स्थानीय अमीर,
जाट,
सिख,
अवध,
और अंग्रेज—
सभी उत्तर भारतीय राजनीति में सक्रिय थे।
रोहिल्ला संघर्ष
रोहिलखंड में रोहिल्ला अफगान शक्ति भी महत्वपूर्ण थी।
अवध और अंग्रेजों ने 1770 के दशक में रोहिल्लों के विरुद्ध अभियान किया।
शाह आलम का प्रत्यक्ष नियंत्रण इस संघर्ष पर बहुत सीमित था।
यह फिर दिखाता है कि उत्तर भारत की राजनीति अब अलग-अलग क्षेत्रीय शक्तियों द्वारा संचालित हो रही थी।
अंग्रेजी कंपनी की बढ़ती ताकत
इस बीच कंपनी बंगाल के राजस्व पर अपने नियंत्रण को मजबूत करती गई।
1765 में दीवानी मिलने के बाद बंगाल उसका आर्थिक आधार बन गया।
इसी आय ने कंपनी को विशाल सेना बनाए रखने की क्षमता दी।
कंपनी अब भारतीय राजस्व से भारतीय युद्ध लड़ सकती थी।
यह परिवर्तन ब्रिटिश विस्तार की वास्तविक शक्ति बना।
कैम्ब्रिज के अध्ययन में 1765 की दीवानी को बंगाल में कंपनी के प्रभुत्व के विकास की निर्णायक सीमा माना गया है, हालांकि प्रत्यक्ष शासन क्रमिक रूप से विकसित हुआ।
शाह आलम और कंपनी के संबंध
दिल्ली लौटने के बाद शाह आलम कंपनी से पूर्णतः अलग नहीं हुआ।
वह विभिन्न शक्तियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता रहा।
लेकिन उसकी वास्तविक निर्भरता मराठों पर थी।
कंपनी की शक्ति पूर्व में लगातार बढ़ रही थी।
जल्द ही कंपनी और मराठों के बीच संघर्ष उत्तर भारत के शक्ति-संतुलन को फिर बदलने वाला था।
1788 : गुलाम कादिर का आतंक
शाह आलम द्वितीय के जीवन का सबसे भयावह अध्याय 1788 में आया।
गुलाम कादिर रोहिल्ला अफगान सरदार था।
वह नजीब-उद-दौला के परिवार से जुड़ा था।
दिल्ली की राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर उसने राजधानी पर कब्जा किया।
उसका उद्देश्य धन, बदला और राजनीतिक प्रभुत्व था।
लाल किले पर कब्जा
गुलाम कादिर ने लाल किले और शाही परिवार को अपने नियंत्रण में ले लिया।
उसे विश्वास था कि शाही महल में विशाल गुप्त खजाना छिपा है।
लेकिन 1739 में नादिर शाह और बाद की लूटों के बाद पुराना अपार मुगल खजाना अब नहीं था।
गुलाम कादिर ने सम्राट और शाही परिवार पर खजाने का स्थान बताने के लिए अत्याचार शुरू किए।
शाही परिवार का अपमान
मुगल इतिहास में अनेक बार राजकुमारों की हत्या हुई थी।
लेकिन 1788 में शाही परिवार पर जो अपमान और अत्याचार हुआ, वह मुगल प्रतिष्ठा के पूर्ण पतन का प्रतीक बन गया।
महल की महिलाओं तक को अपमान और हिंसा का सामना करना पड़ा।
शाह आलम वृद्ध था।
उसके पास प्रतिरोध की कोई वास्तविक शक्ति नहीं थी।
शाह आलम को अंधा किया गया
गुलाम कादिर ने शाह आलम द्वितीय की आँखें निकलवा दीं।
आधुनिक कैम्ब्रिज स्रोत भी इस घटना का अत्यंत स्पष्ट विवरण देते हैं और बताते हैं कि 1788 में गुलाम कादिर ने सम्राट को अंधा कर दिया।
यह मुगल इतिहास का भयावह दृश्य था।
अकबर का वंशज,
भारत का औपचारिक बादशाह,
लाल किले में,
एक स्थानीय सरदार द्वारा अंधा किया जा रहा था।
महादजी सिंधिया की वापसी
महादजी सिंधिया ने अंततः हस्तक्षेप किया।
उसकी सेना दिल्ली की ओर बढ़ी।
गुलाम कादिर भागा।
उसे बाद में पकड़ लिया गया।
शाह आलम को फिर सिंहासन पर स्थापित किया गया।
कैम्ब्रिज स्रोत बताते हैं कि महादजी सिंधिया ने दिल्ली पर फिर नियंत्रण स्थापित कर अंधे शाह आलम को शाही स्थिति में वापस रखा।
अंधा सम्राट और मराठा संरक्षक
1788 के बाद शाह आलम स्वयं राज्य के दैनिक प्रशासन में पहले से भी कम सक्षम था।
वह शारीरिक रूप से अंधा था।
मराठा संरक्षण उसके लिए अनिवार्य बन गया।
महादजी सिंधिया उत्तर भारत की वास्तविक शक्ति था।
शाह आलम का नाम अब भी महत्वपूर्ण था—
लेकिन शक्ति पूरी तरह उसके बाहर थी।
महादजी सिंधिया की मृत्यु
1794 में महादजी सिंधिया की मृत्यु हुई।
इसके बाद दौलतराव सिंधिया ने ग्वालियर और उत्तर भारतीय मराठा प्रभाव संभाला।
लेकिन मराठा महासंघ के भीतर गुटीय संघर्ष बढ़ रहे थे।
पेशवा,
सिंधिया,
होलकर,
भोंसले
और गायकवाड़—
सभी की अपनी राजनीतिक दिशा थी।
यही विभाजन अंग्रेजी कंपनी के लिए आगे बड़ा अवसर बना।
शाह आलम की स्थिति 1800 के आसपास
18वीं शताब्दी के अंत तक शाह आलम का राजनीतिक जीवन लगभग पूर्ण निर्भरता का प्रतीक था।
उसने जीवन में—
अफगान दबाव देखा,
पानीपत देखा,
बक्सर की हार देखी,
दीवानी अंग्रेजों को दी,
इलाहाबाद में अंग्रेज संरक्षण लिया,
मराठों के साथ दिल्ली लौटा,
गुलाम कादिर की यातना झेली,
और फिर सिंधिया के संरक्षण में रहा।
अब उसके जीवन का अंतिम राजनीतिक परिवर्तन बाकी था—
अंग्रेजों का दिल्ली पर अधिकार।
1803 : दूसरा अंग्रेज-मराठा युद्ध
1803 में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा शक्तियों के बीच दूसरा अंग्रेज-मराठा युद्ध शुरू हुआ।
उत्तर भारत में सिंधिया की शक्ति अंग्रेजों के लिए प्रमुख चुनौती थी।
कंपनी की सेना का नेतृत्व जनरल जेरार्ड लेक कर रहा था।
उसने पहले अलीगढ़ की दिशा में सिंधिया की शक्ति पर प्रहार किया।
फिर दिल्ली की ओर बढ़ा।
पटपड़गंज का युद्ध
दिल्ली के निकट पटपड़गंज क्षेत्र में अंग्रेजी सेना और सिंधिया की सेना का मुकाबला हुआ।
जनरल लेक ने मराठा सेना को पराजित किया।
इसके बाद दिल्ली और लाल किले की रक्षा मराठों के हाथ से निकल गई।
1803 में अंग्रेजी सेना दिल्ली में प्रवेश कर गई।
कैम्ब्रिज के स्रोत के अनुसार अलीगढ़ लेने के बाद लेक दिल्ली की ओर बढ़ा, पटपड़गंज के निकट मराठा सेना को पराजित किया और उसके बाद शाह आलम अंग्रेजी संरक्षण में आ गया।
14 सितंबर 1803 : ऐतिहासिक परिवर्तन
सितंबर 1803 में शाह आलम द्वितीय ने अंग्रेजी संरक्षण स्वीकार किया।
अब मुगल सम्राट व्यावहारिक रूप से अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का पेंशनभोगी बन गया।
कैम्ब्रिज के एक ऐतिहासिक स्रोत में इसे इस रूप में दर्ज किया गया है कि 1803 में दिल्ली के मुगल सम्राट मराठा नियंत्रण से निकलकर ब्रिटिश संरक्षण और अधिक नरम निगरानी में चले गए।
यह 1765 से भी बड़ा प्रतीकात्मक परिवर्तन था।
1765 में कंपनी ने मुगल सम्राट से दीवानी ली थी।
1803 में वही कंपनी स्वयं मुगल सम्राट की रक्षक बन गई।
कौन किसका अधीन था?
1765 की भाषा में कंपनी शाही दीवान थी।
कागज पर वह सम्राट से अधिकार प्राप्त करती थी।
1803 तक वास्तविकता उलट चुकी थी।
सम्राट की सुरक्षा,
पेंशन,
राजधानी
और बाहरी संबंध—
सब अंग्रेजी शक्ति पर निर्भर होने लगे।
मुगल शाही नाम बचा था।
सत्ता कंपनी के पास थी।
अंग्रेजों ने मुगल बादशाह को हटाया क्यों नहीं?
क्योंकि तत्काल उसकी आवश्यकता नहीं थी।
शाह आलम का नाम अभी भी वैधानिक प्रतिष्ठा रखता था।
कंपनी उसके संरक्षणकर्ता के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर सकती थी।
इससे उत्तर भारत में उसकी सत्ता को राजनीतिक वैधता मिलती थी।
अंग्रेजों ने मुगल राजवंश को तत्काल समाप्त करने के बजाय नियंत्रित प्रतीक के रूप में बनाए रखना अधिक उपयोगी समझा।
यही नीति 1857 तक विभिन्न रूपों में जारी रही।
शाह आलम की मृत्यु
शाह आलम द्वितीय की मृत्यु 19 नवंबर 1806 को हुई।
उसने लगभग 47 वर्ष तक औपचारिक रूप से शासन किया।
यह लंबा शासन था—
लेकिन वास्तविक सत्ता के दृष्टिकोण से लगातार घटती हुई शक्ति का इतिहास था।
उसके बाद उसके पुत्र अकबर शाह द्वितीय मुगल सिंहासन पर बैठे।
लेकिन 1806 तक स्थिति बिल्कुल स्पष्ट थी—
दिल्ली पर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण था।
मुगल सम्राट अब स्वतंत्र शासक नहीं था।
1759–1806 : प्रमुख समयरेखा
1759 — आलमगीर द्वितीय की हत्या; अली गौहर ने शाह आलम द्वितीय के रूप में बादशाहत का दावा किया।
1759–1760 — बिहार और बंगाल में शाही अधिकार स्थापित करने के असफल प्रयास।
14 जनवरी 1761 — पानीपत का तीसरा युद्ध; मराठों की अब्दाली से पराजय।
1761 — कंपनी ने शाह आलम को सम्राट के रूप में स्वीकार कर मीर कासिम की वैधता के लिए शाही सनद प्राप्त की।
1763 — मीर कासिम और कंपनी का खुला संघर्ष।
23 अक्टूबर 1764 — बक्सर का युद्ध; कंपनी ने मीर कासिम, शुजा-उद-दौला और शाह आलम के संयुक्त पक्ष को पराजित किया।
12 अगस्त 1765 — शाह आलम द्वारा बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी कंपनी को प्रदान करने की सनद।
1765 के बाद — शाह आलम इलाहाबाद में कंपनी संरक्षण में।
1771–1772 — मराठा सहयोग से दिल्ली वापसी की तैयारी।
1772 — महादजी सिंधिया के संरक्षण में शाह आलम की दिल्ली वापसी।
1770–1780 का दशक — दिल्ली पर मराठा प्रभाव बढ़ा।
1788 — गुलाम कादिर ने दिल्ली पर कब्जा किया और शाह आलम को अंधा कर दिया।
1788–1789 — महादजी सिंधिया ने दिल्ली पर पुनः नियंत्रण स्थापित किया; गुलाम कादिर पकड़ा और दंडित किया गया।
1794 — महादजी सिंधिया की मृत्यु।
1803 — दूसरा अंग्रेज-मराठा युद्ध; जनरल लेक ने दिल्ली के निकट सिंधिया की सेना को पराजित किया।
सितंबर 1803 — शाह आलम द्वितीय अंग्रेजी संरक्षण में; दिल्ली पर कंपनी की राजनीतिक-सैन्य पकड़ स्थापित।
19 नवंबर 1806 — शाह आलम द्वितीय की मृत्यु।
शाह आलम द्वितीय की प्रमुख उपलब्धियाँ
परिस्थितियाँ अत्यंत प्रतिकूल होने के बावजूद उसने मुगल राजवंश की वैधानिक निरंतरता बनाए रखी।
दिल्ली से बाहर रहते हुए भी उसने अपने बादशाह होने के दावे को जीवित रखा।
1760 के दशक में पूर्वी भारत में मुगल सत्ता पुनः स्थापित करने का प्रयास किया।
1772 में लगभग बारह वर्ष बाद दिल्ली वापस आया।
गुलाम कादिर की क्रूरता के बाद भी जीवित रहा और शाही संस्था का प्रतीक बना रहा।
उसका नाम 18वीं शताब्दी की बदलती भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में वैधता का महत्वपूर्ण स्रोत बना रहा।
लेकिन उसकी सबसे बड़ी विफलताएँ
बंगाल और बिहार पर वास्तविक शाही सत्ता पुनः स्थापित नहीं कर सका।
बक्सर में कंपनी के विरुद्ध संयुक्त पक्ष पराजित हुआ।
1765 में कंपनी को दीवानी देनी पड़ी।
दिल्ली लौटने के लिए मराठों पर निर्भर होना पड़ा।
दिल्ली में स्वतंत्र सैन्य शक्ति विकसित नहीं कर सका।
1788 में अपने और शाही परिवार की रक्षा नहीं कर सका।
गुलाम कादिर ने उसे अंधा कर दिया।
1803 में अंग्रेजी संरक्षण स्वीकार करना पड़ा।
उसकी मृत्यु तक मुगल बादशाहत स्वतंत्र साम्राज्य से बदलकर अंग्रेजी नियंत्रण में एक प्रतीकात्मक राजसत्ता बन चुकी थी।
क्या शाह आलम ने भारत अंग्रेजों को दे दिया?
यह कहना गलत और अत्यधिक सरल होगा।
1765 में उसने कंपनी को दीवानी अवश्य प्रदान की।
लेकिन यह निर्णय बक्सर की सैन्य हार और उसके बाद उत्पन्न मजबूरी की स्थिति में हुआ।
कंपनी पहले ही बंगाल में भारी सैन्य शक्ति प्राप्त कर चुकी थी।
दीवानी ने उस शक्ति को शाही वैधानिक आधार दिया।
दूसरा, 1765 में स्वयं शाह आलम को यह अनुमान नहीं हो सकता था कि कंपनी आगे पूरे भारत पर साम्राज्य स्थापित करेगी।
उस समय मराठे,
मैसूर,
हैदराबाद,
अवध,
सिख,
और अनेक अन्य शक्तियाँ मौजूद थीं।
इसलिए इतिहास को पीछे से देखकर यह कहना कि शाह आलम ने जानबूझकर अंग्रेजी राज स्थापित किया, सही नहीं होगा।
लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि—
1765 की दीवानी कंपनी के राजनीतिक साम्राज्य बनने की निर्णायक सीढ़ियों में से एक थी।
प्लासी से बक्सर और दीवानी तक
इस परिवर्तन को तीन घटनाओं में समझा जा सकता है—
1757 — प्लासी कंपनी बंगाल के नवाब को हटाने वाली सत्ता बनी।
1764 — बक्सर कंपनी ने बंगाल, अवध और मुगल सम्राट के संयुक्त पक्ष को सैन्य रूप से पराजित किया।
1765 — दीवानी कंपनी ने मुगल सम्राट से बंगाल-बिहार-उड़ीसा के राजस्व अधिकार का वैधानिक आधार प्राप्त किया।
यहीं व्यापारी कंपनी और क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति के बीच की सीमा टूटती दिखाई देती है।
1803 का इससे भी बड़ा अर्थ
लेकिन शाह आलम की कहानी 1765 पर समाप्त नहीं होती।
1803 और भी बड़ा राजनीतिक संकेत है।
1765 में कंपनी कहती है—
हम सम्राट के दीवान हैं।
1803 में वास्तविकता है—
सम्राट हमारी सुरक्षा में है।
यानी लगभग चार दशकों में शक्ति-संबंध पूरी तरह उलट गया।
कैम्ब्रिज के कालक्रम में 1803 के बाद शाह आलम को “दिल्ली का राजा” जैसी सीमित स्थिति की ओर जाते मुगल शासक के रूप में दिखाया गया है, जबकि वास्तविक उपमहाद्वीपीय शक्ति अब अन्य हाथों में थी।
शाह आलम का शासन : मुगल वैधता की आश्चर्यजनक दीर्घायु
इतनी कमजोरी के बावजूद एक प्रश्न महत्वपूर्ण है—
मुगल बादशाहत समाप्त क्यों नहीं हुई?
क्योंकि मुगल नाम अभी भी गहरी राजनीतिक प्रतिष्ठा रखता था।
कंपनी को उसकी सनद चाहिए थी।
मराठों को उसकी मान्यता उपयोगी थी।
क्षेत्रीय शासक मुगल उपाधियाँ लेते थे।
दरबार अभी सांस्कृतिक प्रतिष्ठा का केंद्र था।
इसलिए साम्राज्य की सैन्य शक्ति समाप्त होने के बाद भी उसकी वैधानिक भाषा जीवित रही।
यह मुगल इतिहास की सबसे उल्लेखनीय बातों में से एक है।
शाह आलम द्वितीय का ऐतिहासिक मूल्यांकन
शाह आलम को केवल “कमजोर सम्राट” कह देना आसान है।
लेकिन उसका जीवन 18वीं शताब्दी के भारत के असाधारण राजनीतिक परिवर्तन का दर्पण है।
वह जन्मा तब मुगल नाम अभी सर्वोच्च राजनीतिक वैधता रखता था।
उसने युवावस्था में दिल्ली से भागकर अपनी जान बचाई।
बक्सर में अंग्रेजों की शक्ति देखी।
दीवानी उन्हें दी।
उनके संरक्षण में रहा।
फिर उनसे अलग होकर मराठों की मदद ली।
दिल्ली लौटा।
एक रोहिल्ला सरदार ने उसे अंधा किया।
मराठों ने फिर बचाया।
और अंततः अंग्रेजों ने मराठों को हराकर उसकी राजधानी पर कब्जा कर लिया।
एक ही व्यक्ति ने मुगल, अफगान, मराठा और अंग्रेजी सत्ता-संतुलन का पूरा परिवर्तन अपने जीवन में देखा।
निष्कर्ष
शाह आलम द्वितीय के शासन में मुगल बादशाहत की राजनीतिक यात्रा लगभग पूर्ण वृत्त बनाती है।
1759 में वह बिना राजधानी का बादशाह था।
1764 में अंग्रेजी कंपनी से युद्ध में पराजित पक्ष का सम्राट था।
1765 में वह उसी कंपनी को दीवानी देने वाला शाही वैधता-स्रोत बना।
इलाहाबाद में वह कंपनी की सुरक्षा पर निर्भर रहा।
1772 में उसने अंग्रेजों की बजाय मराठों के सहारे दिल्ली वापसी की।
1788 में उसकी असहायता इतनी बढ़ चुकी थी कि गुलाम कादिर ने लाल किले में उसे अंधा कर दिया।
मराठों ने उसे फिर बचाया।
और 1803 में अंग्रेजों ने मराठों को पराजित कर स्वयं उसकी राजधानी पर अधिकार कर लिया।
इस पूरी अवधि का सबसे बड़ा ऐतिहासिक परिवर्तन यह था—
सत्ता मुगल सम्राट से निकल चुकी थी, लेकिन वैधता अभी भी उसके नाम में बची हुई थी।
अंग्रेजों ने भी प्रारंभ में इसी वैधता का उपयोग किया।
1765 में कंपनी मुगल दीवान बनी।
1803 में कंपनी मुगल सम्राट की संरक्षक बनी।
और आगे धीरे-धीरे वही संरक्षक वास्तविक स्वामी बन जाएगी।
शाह आलम की मृत्यु 1806 में हुई।
उसके बाद—
अकबर शाह द्वितीय — 1806–1837
सिंहासन पर बैठेंगे।
लेकिन अब मुगल शासन का अर्थ लगभग पूरी तरह बदल चुका था।
अकबर शाह द्वितीय दिल्ली के स्वतंत्र सम्राट नहीं होंगे।
वे अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की निगरानी और पेंशन के भीतर रहने वाले शाही प्रतीक होंगे।
और उनके बाद आएगा अंतिम अध्याय—
बहादुर शाह ज़फ़र — 1837–1857, जिसके साथ 1526 में बाबर से आरंभ हुई मुगल राजवंशीय सत्ता का औपचारिक अंत हो जाएगा।