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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–019 · अध्याय 13

आलमगीर द्वितीय — 1754–1759

अब्दाली का हस्तक्षेप, मराठों का विस्तार और मुगल सम्राट की हत्या

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत हिंदी शोध संस्करण · 9 सितंबर 2026

1754 में अहमद शाह बहादुर को पदच्युत करने के बाद दिल्ली की राजनीति पर इमाद-उल-मुल्क का प्रभाव स्थापित हो चुका था। उसे ऐसा मुगल सम्राट चाहिए था जो राजवंशीय वैधता प्रदान करे, लेकिन वास्तविक शक्ति उसके हाथ में रहे। इसी उद्देश्य से अज़ीज़ुद्दीन नामक एक वृद्ध मुगल राजकुमार को सिंहासन पर बैठाया गया। उसने “आलमगीर द्वितीय” की उपाधि धारण की।

यह नाम स्वयं बहुत कुछ कहता है। “आलमगीर” औरंगज़ेब की प्रसिद्ध उपाधि थी। लेकिन नया आलमगीर उस शक्तिशाली औरंगज़ेब का राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं था। उसके पास न स्वतंत्र सेना थी, न मजबूत खजाना, न प्रांतों पर प्रभावी नियंत्रण। वह दिल्ली के सिंहासन पर बैठा अवश्य था, किंतु वास्तविक सत्ता इमाद-उल-मुल्क और उससे जुड़े अमीरों के हाथ में थी।

1754 से 1759 का उसका शासन मुगल पतन की सबसे नाटकीय अवस्थाओं में से एक है। इसी काल में अहमद शाह अब्दाली ने फिर भारत पर आक्रमण किया, 1757 में दिल्ली पर कब्जा किया, मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में व्यापक हिंसा हुई, मराठे उत्तर भारत में तेजी से बढ़े और पंजाब तक पहुँच गए, अफगान-मराठा संघर्ष निर्णायक होने लगा, तथा अंततः 1759 में स्वयं आलमगीर द्वितीय की हत्या कर दी गई।

आलमगीर द्वितीय कौन था?

आलमगीर द्वितीय का मूल नाम अज़ीज़ुद्दीन था।

वह बहादुर शाह प्रथम का पुत्र था।

इस प्रकार वह औरंगज़ेब का पौत्र और मुहम्मद शाह की पीढ़ी से वरिष्ठ राजकुमार था।

वह लंबे समय तक शाही परिवार के भीतर लगभग निष्क्रिय जीवन बिताता रहा।

जब 1754 में उसे सिंहासन पर बैठाया गया, तब उसकी आयु लगभग पचपन वर्ष थी।

वह युवा महत्वाकांक्षी सेनानायक नहीं था।

उसे राजनीति और युद्ध का वैसा अनुभव भी नहीं था जैसा मुगल साम्राज्य के पुराने शक्तिशाली सम्राटों को होता था।

उसका चयन उसकी क्षमता के कारण कम और उसकी उपयोगिता के कारण अधिक हुआ।

इमाद-उल-मुल्क : वास्तविक सत्ता

आलमगीर द्वितीय के शासन को समझने के लिए इमाद-उल-मुल्क को समझना आवश्यक है।

उसका मूल नाम गाज़ीउद्दीन खान फिरोज जंग द्वितीय था।

वह निजाम-उल-मुल्क आसफ जाह का पौत्र था।

कम आयु में ही उसने दिल्ली की राजनीति में असाधारण महत्वाकांक्षा दिखाई।

मराठों से संबंध बनाकर उसने अहमद शाह बहादुर को हटाने में बड़ी भूमिका निभाई।

इसके बाद वह वजीर बना और दिल्ली की वास्तविक सत्ता पर नियंत्रण स्थापित किया।

आलमगीर द्वितीय उसके लिए वैधानिक शाही मुखौटा था।

बादशाह और वजीर का संबंध

आलमगीर द्वितीय अपनी स्थिति से संतुष्ट नहीं था।

वह जानता था कि उसके नाम से फरमान जारी होते हैं, लेकिन निर्णय इमाद-उल-मुल्क करता है।

सम्राट के पास स्वतंत्र सेना नहीं थी।

खजाना कमजोर था।

दरबार में वजीर के समर्थक शक्तिशाली थे।

इस कारण सम्राट और वजीर के बीच अविश्वास लगातार बढ़ता गया।

आलमगीर द्वितीय अपने लिए बाहरी समर्थन तलाशने लगा।

इसी राजनीतिक कमजोरी ने आगे उसे अहमद शाह अब्दाली की ओर देखने के लिए प्रेरित किया।

दिल्ली की वास्तविक स्थिति

1754 तक दिल्ली अब एक विशाल साम्राज्य की राजधानी की बजाय संघर्षरत शक्ति-केंद्र बन चुकी थी।

बंगाल लगभग स्वतंत्र था।

अवध स्वतंत्र नीति चला रहा था।

हैदराबाद अपने निजाम के नियंत्रण में था।

मराठे मालवा, बुंदेलखंड और दिल्ली क्षेत्र तक पहुँच चुके थे।

जाट भरतपुर में मजबूत थे।

रोहिल्ले उत्तर भारत में प्रभावशाली थे।

पंजाब पर अफगान दबाव था।

ऐसी स्थिति में मुगल सम्राट का प्रभाव मुख्यतः दिल्ली और उससे जुड़े सीमित क्षेत्रों तक सिमट रहा था।

अहमद शाह अब्दाली का बढ़ता दबाव

अहमद शाह अब्दाली पहले ही कई बार भारत पर आक्रमण कर चुका था।

1752 तक पंजाब पर मुगल नियंत्रण बहुत कमजोर हो गया था।

अब्दाली का प्रभाव लाहौर और मुल्तान तक पहुँच चुका था।

उसकी दृष्टि अब केवल सीमावर्ती इलाकों पर नहीं थी।

दिल्ली की कमजोरी उसे बार-बार भारत आने के लिए प्रेरित कर रही थी।

पंजाब में सत्ता संघर्ष

पंजाब की राजनीति अत्यंत जटिल थी।

स्थानीय मुगल अधिकारी,

अफगान समर्थक गुट,

सिख समूह,

और मराठा प्रभाव—

सभी धीरे-धीरे सक्रिय थे।

अदीना बेग खान जैसे स्थानीय नेता परिस्थिति के अनुसार गठबंधन बदलते थे।

दिल्ली अब पंजाब के अधिकारियों को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं थी।

इसलिए पंजाब कई शक्तियों के संघर्ष का मैदान बन गया।

1756–1757 : अब्दाली का बड़ा आक्रमण

1756 के अंत में अहमद शाह अब्दाली ने फिर भारत की ओर अभियान किया।

उसने पंजाब से आगे बढ़कर दिल्ली की दिशा पकड़ी।

मुगल केंद्र उसके सामने प्रभावी सैन्य प्रतिरोध नहीं कर सका।

1757 की शुरुआत में वह दिल्ली पहुँचा।

आलमगीर द्वितीय मुगल सम्राट था, लेकिन उसके पास राजधानी की रक्षा करने लायक स्वतंत्र शक्ति नहीं थी।

1757 : दिल्ली पर अब्दाली का कब्जा

अब्दाली ने दिल्ली पर अपना प्रभाव स्थापित किया।

राजधानी पर उसकी सेना का नियंत्रण हो गया।

मुगल सम्राट को औपचारिक रूप से सिंहासन पर रहने दिया गया, लेकिन वास्तविक शक्ति अफगान विजेता के पास थी।

यह 1739 में नादिर शाह की घटना की पुनरावृत्ति जैसी थी।

अंतर यह था कि अब दिल्ली की दुर्बलता किसी को आश्चर्यचकित नहीं कर रही थी।

वह पहले ही विश्व के सामने उजागर हो चुकी थी।

दिल्ली की लूट

अब्दाली की सेना ने दिल्ली से धन और संपत्ति प्राप्त की।

1739 की नादिर शाह वाली लूट जितनी विशाल शाही संपदा अब बची नहीं थी।

फिर भी राजधानी को भारी आर्थिक और सामाजिक क्षति हुई।

शाही परिवार, अमीर और नागरिक अफगान सैनिकों के दबाव में थे।

दिल्ली की पुरानी सुरक्षा और प्रतिष्ठा की धारणा लगभग पूरी तरह टूट चुकी थी।

मथुरा-वृंदावन की त्रासदी

1757 के अब्दाली अभियान का सबसे भयावह अध्याय मथुरा-वृंदावन और ब्रज क्षेत्र में हुई हिंसा थी।

अफगान सेना दिल्ली से आगे ब्रज क्षेत्र की ओर बढ़ी।

मथुरा, वृंदावन और आसपास के क्षेत्रों में लूट, हत्या और व्यापक विनाश के विवरण समकालीन तथा बाद के स्रोतों में मिलते हैं।

ब्रज क्षेत्र धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

इसलिए वहां हुई हिंसा का स्मृति और सांस्कृतिक इतिहास पर गहरा प्रभाव पड़ा।

धार्मिक और आर्थिक दोनों लक्ष्य

अब्दाली की सेना का उद्देश्य केवल धार्मिक नहीं था।

युद्धकालीन लूट उसका प्रमुख आर्थिक आधार भी थी।

धनी नगर,

मंदिर,

व्यापारी केंद्र,

और संपन्न बस्तियाँ स्वाभाविक लक्ष्य बनते थे।

लेकिन मथुरा-वृंदावन जैसे प्रमुख हिंदू धार्मिक केंद्रों पर हिंसा ने इस आक्रमण को स्पष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक आयाम भी दिया।

इन दोनों पहलुओं को अलग करके देखना उचित नहीं होगा।

जाट प्रतिरोध

ब्रज और भरतपुर क्षेत्र में जाट शक्ति तेजी से उभर रही थी।

महाराजा सूरजमल इस समय उत्तर भारत के सबसे सक्षम क्षेत्रीय शासकों में से एक थे।

उनका राज्य भरतपुर और आसपास के क्षेत्रों में संगठित प्रशासन, दुर्ग और सैन्य शक्ति पर आधारित था।

अब्दाली और जाटों के बीच संबंध संघर्षपूर्ण रहे।

जाट शक्ति आगे मराठों और मुगलों की राजनीति में भी निर्णायक भूमिका निभाने वाली थी।

अब्दाली की वापसी

अब्दाली दिल्ली में स्थायी रूप से शासन करने नहीं रुका।

उसने अपने हितों के अनुसार राजनीतिक व्यवस्था की और अफगान प्रभाव सुरक्षित करने का प्रयास किया।

पंजाब और उत्तर भारत में अपने प्रतिनिधियों तथा सहयोगियों को स्थापित कर वह वापस चला गया।

लेकिन उसके पीछे छोड़ी गई सत्ता-व्यवस्था स्थिर नहीं थी।

जल्द ही मराठा शक्ति उत्तर की ओर बढ़ने वाली थी।

नजीब-उद-दौला

अब्दाली ने रोहिल्ला नेता नजीब खान को दिल्ली की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका दी।

उसे नजीब-उद-दौला के रूप में जाना गया।

वह आगे अहमद शाह अब्दाली का प्रमुख भारतीय सहयोगी बना।

नजीब-उद-दौला और मराठों के बीच गहरा संघर्ष था।

यह विरोध आगे पानीपत के तीसरे युद्ध की राजनीति में निर्णायक होने वाला था।

इमाद-उल-मुल्क और अब्दाली

इमाद-उल-मुल्क के लिए अब्दाली का हस्तक्षेप खतरा था।

वह दिल्ली की राजनीति पर स्वयं नियंत्रण चाहता था।

अफगान प्रभाव उसकी शक्ति सीमित करता था।

इसलिए वह मराठों की ओर और अधिक झुका।

इस प्रकार दिल्ली की राजनीति अब दो बड़ी बाहरी/क्षेत्रीय शक्तियों के बीच फँसती जा रही थी—

अब्दाली और उसके रोहिल्ला सहयोगी,

और मराठे।

मुगल सम्राट दोनों के बीच लगभग निर्बल था।

मराठों की वापसी

अब्दाली के लौटने के बाद मराठों ने उत्तर भारत में तेजी से अभियान शुरू किया।

उनका लक्ष्य था—

दिल्ली से अफगान प्रभाव हटाना,

पंजाब तक अपना प्रभाव बढ़ाना,

और मुगल बादशाह की वैधानिक प्रतिष्ठा का उपयोग अपनी शक्ति को वैधता देने में करना।

मराठों के लिए दिल्ली पर नियंत्रण का अर्थ सीधे मुगल राजवंश समाप्त करना नहीं था।

वे बादशाह को सिंहासन पर रखकर वास्तविक सैन्य और राजनीतिक शक्ति अपने हाथ में ले सकते थे।

1757–1758 : दिल्ली पर मराठा प्रभाव

मराठा सेनाएँ उत्तर की ओर बढ़ीं।

उन्होंने दिल्ली और आसपास से अफगान समर्थकों को पीछे हटाया।

इमाद-उल-मुल्क ने मराठों के साथ सहयोग किया।

इससे आलमगीर द्वितीय की स्थिति और विचित्र हो गई।

वह मुगल सम्राट था—

लेकिन उसके आसपास की राजनीतिक व्यवस्था मराठा सेना और उसके अपने वजीर द्वारा नियंत्रित की जा रही थी।

1758 : मराठे पंजाब पहुँचे

मराठा शक्ति का उत्तर भारतीय विस्तार 1758 में अपने चरम पर पहुँचा।

रघुनाथराव और मल्हारराव होलकर जैसे मराठा सेनानायकों के नेतृत्व में सेना पंजाब की ओर बढ़ी।

अदीना बेग खान और अन्य स्थानीय शक्तियों से सहयोग किया गया।

लाहौर पर मराठा प्रभाव स्थापित हुआ।

इसके बाद मराठा सेना अटक तक पहुँची।

यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षण था।

अटक तक मराठा ध्वज

अटक सिंधु नदी के निकट अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक स्थान था।

18वीं शताब्दी के मध्य में मराठों का यहां तक पहुँचना यह दर्शाता है कि शक्ति-संतुलन कितना बदल चुका था।

औरंगज़ेब के समय मुगल सेना मराठों का पीछा महाराष्ट्र के किलों तक करती थी।

अब उसके लगभग पचास वर्ष बाद—

मराठा सेना दिल्ली पार करके पंजाब और अटक तक पहुँच चुकी थी।

मुगल साम्राज्य के पुराने उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में अब मराठा और अफगान प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा थी।

क्या मराठों ने मुगल साम्राज्य पर कब्जा कर लिया था?

नहीं।

मराठों ने मुगल बादशाहत को औपचारिक रूप से समाप्त नहीं किया।

उनके लिए मुगल सम्राट राजनीतिक वैधता का उपयोगी प्रतीक था।

वे उसके नाम से सनद और अधिकार प्राप्त कर सकते थे।

वास्तविक शक्ति अपने हाथ में रखते हुए शाही वैधता का उपयोग करना अधिक व्यावहारिक था।

यही मॉडल आगे शाह आलम द्वितीय के समय और स्पष्ट होगा।

पंजाब में मराठों की समस्या

लाहौर और अटक तक पहुँचना एक बड़ी सैन्य उपलब्धि थी।

लेकिन इतने दूर क्षेत्र को पुणे से स्थायी रूप से नियंत्रित करना कठिन था।

आपूर्ति,

स्थानीय राजनीति,

सिख समूह,

अफगान प्रतिरोध,

और लंबी दूरी—

सभी बड़ी चुनौतियाँ थीं।

अदीना बेग खान की मृत्यु के बाद स्थिति और कठिन हो गई।

अब्दाली भी पंजाब को स्थायी रूप से खोने को तैयार नहीं था।

अब्दाली की प्रतिक्रिया

मराठों के पंजाब तक पहुँचने की खबर अहमद शाह अब्दाली के लिए गंभीर चुनौती थी।

पंजाब उसके अफगान साम्राज्य और भारत के बीच सामरिक क्षेत्र था।

मराठों का अटक तक पहुँचना उसके प्रभाव पर प्रत्यक्ष आघात था।

उसने फिर भारत आने की तैयारी शुरू कर दी।

यही आगे 1759–1761 के महान अफगान-मराठा संघर्ष की भूमिका बनी।

आलमगीर द्वितीय और मराठे

सम्राट की स्थिति अत्यंत कमजोर थी।

वह इमाद-उल-मुल्क के नियंत्रण से मुक्त होना चाहता था।

उसे मराठों के अत्यधिक प्रभाव से भी चिंता थी।

इसलिए उसने विभिन्न विरोधी शक्तियों से संपर्क की कोशिश की।

उसकी नजर अहमद शाह अब्दाली की ओर भी गई।

यदि अब्दाली उसे वजीर और मराठा प्रभाव से मुक्त कर दे तो शायद वह अपनी स्वतंत्र शाही सत्ता कुछ हद तक वापस पा सकता था।

लेकिन यह प्रयास अत्यंत खतरनाक था।

सम्राट और अब्दाली के बीच संपर्क

आलमगीर द्वितीय के अब्दाली से संपर्क की आशंका इमाद-उल-मुल्क को थी।

यदि सम्राट अफगान संरक्षण प्राप्त कर लेता तो वजीर की स्थिति समाप्त हो सकती थी।

इसलिए आलमगीर और उसके अपने वजीर के बीच अविश्वास अब खुले शत्रुतापूर्ण स्तर तक पहुँच गया।

इमाद-उल-मुल्क को खतरा

इमाद-उल-मुल्क जानता था कि उसका राजनीतिक अस्तित्व मराठा सहयोग पर निर्भर है।

सम्राट यदि अब्दाली के पक्ष में चला जाता तो दिल्ली में उसका नियंत्रण टूट सकता था।

इसलिए उसने कठोर निर्णय लिया।

एक बार फिर मुगल इतिहास में वजीर स्वयं बादशाह के जीवन और मृत्यु का निर्णय करने वाला था।

1759 : आलमगीर द्वितीय की हत्या

नवंबर 1759 में आलमगीर द्वितीय को षड्यंत्रपूर्वक महल से बाहर बुलाया गया।

उसे यह विश्वास दिलाया गया कि वह किसी धार्मिक व्यक्ति से मिलने या किसी आवश्यक कार्य के लिए जा रहा है।

वहां उसकी हत्या कर दी गई।

उसका शव बाद में मिला।

मुगल सम्राट की हत्या उसके ही वजीर इमाद-उल-मुल्क की राजनीतिक योजना से जुड़ी मानी जाती है।

यह घटना मुगल बादशाहत की प्रतिष्ठा के पूर्ण पतन का एक और भयावह प्रमाण थी।

फर्रुखसियर से आलमगीर द्वितीय तक

1719 में फर्रुखसियर को सैयद बंधुओं ने पदच्युत कर मार दिया था।

1754 में अहमद शाह बहादुर को इमाद-उल-मुल्क ने हटाकर अंधा कर दिया।

1759 में आलमगीर द्वितीय की हत्या कर दी गई।

अब यह स्पष्ट था कि मुगल बादशाह का पद स्वयं सुरक्षा की गारंटी नहीं रहा।

वजीर और सैन्य अमीर शाही परिवार के सदस्यों को सत्ता में ला और हटा सकते थे।

आलमगीर द्वितीय का पुत्र : अली गौहर

आलमगीर द्वितीय का सबसे महत्वपूर्ण पुत्र अली गौहर था।

वह अपने पिता की तरह इमाद-उल-मुल्क के नियंत्रण में रहना नहीं चाहता था।

उसे आशंका थी कि वजीर उसे भी समाप्त कर देगा।

इसलिए वह दिल्ली से निकल गया।

वह पूर्वी भारत की ओर चला गया और स्वतंत्र राजनीतिक आधार खोजने लगा।

आगे यही अली गौहर “शाह आलम द्वितीय” बनेगा।

दिल्ली से बाहर उत्तराधिकारी

यह घटना भी असाधारण थी।

मुगल सिंहासन का वास्तविक उत्तराधिकारी राजधानी में सुरक्षित नहीं था।

उसे अपने वजीर से बचने के लिए दिल्ली छोड़नी पड़ी।

यह वही राजवंश था जिसके सम्राट कभी पूरे उपमहाद्वीप के शक्तिशाली अमीरों को नियुक्त करते थे।

अब शहज़ादा स्वयं अपने मंत्री से जान बचा रहा था।

शाहजहाँ तृतीय

आलमगीर द्वितीय की हत्या के बाद इमाद-उल-मुल्क ने एक अन्य मुगल राजकुमार को सिंहासन पर बैठाया।

उसे शाहजहाँ तृतीय कहा गया।

लेकिन उसकी सत्ता बहुत अल्पकालिक और प्रतीकात्मक थी।

वास्तविक उत्तराधिकारी अली गौहर स्वयं को शाह आलम द्वितीय घोषित करने वाला था।

इससे मुगल गद्दी की स्थिति और अधिक भ्रमपूर्ण हो गई।

1759 में अब्दाली की वापसी

इसी समय अहमद शाह अब्दाली फिर भारत की ओर बढ़ रहा था।

उसका लक्ष्य पंजाब में मराठों के प्रभाव को समाप्त करना था।

मराठा और अफगान टकराव अब अपरिहार्य था।

दिल्ली की मुगल सत्ता इस संघर्ष की निर्णायक शक्ति नहीं थी।

वह संघर्ष का पुरस्कार और वैधानिक प्रतीक बन चुकी थी।

नजीब-उद-दौला और अब्दाली गठबंधन

नजीब-उद-दौला ने अब्दाली को भारत आने के लिए प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रोहिल्ला शक्ति मराठा विस्तार से चिंतित थी।

अवध के शुजा-उद-दौला की भूमिका भी आगे निर्णायक होने वाली थी।

इस प्रकार उत्तर भारत में गठबंधन बनने लगे—

एक ओर मराठा।

दूसरी ओर अब्दाली, रोहिल्ले और अंततः अवध।

और बीच में कमजोर मुगल बादशाहत।

पानीपत की भूमिका तैयार

आलमगीर द्वितीय की हत्या के समय तक तीसरे पानीपत युद्ध की लगभग सभी परिस्थितियाँ तैयार हो चुकी थीं।

मराठे पंजाब तक फैल चुके थे।

अब्दाली पंजाब वापस लेना चाहता था।

नजीब-उद-दौला मराठों का विरोधी था।

दिल्ली का केंद्र कमजोर था।

जाट अलग शक्ति थे।

अवध की भूमिका निर्णायक हो सकती थी।

सिख पंजाब में बढ़ रहे थे।

इन सभी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा जनवरी 1761 में पानीपत में विस्फोटक रूप लेने वाली थी।

प्रशासनिक स्थिति

आलमगीर द्वितीय के पास वास्तविक प्रशासनिक पुनर्गठन की शक्ति नहीं थी।

राजस्व का बड़ा हिस्सा दिल्ली तक नहीं पहुँचता था।

प्रांत स्वायत्त थे।

सेना पर वजीर और शक्तिशाली अमीरों का प्रभाव था।

सम्राट की अपनी स्वतंत्र सैन्य शक्ति बहुत सीमित थी।

इसीलिए उसके शासन को प्रशासनिक उपलब्धियों की बजाय राजनीतिक निर्बलता से पहचाना जाता है।

आर्थिक स्थिति

दिल्ली की अर्थव्यवस्था 1739 की नादिर शाह लूट से पूरी तरह उबर नहीं पाई थी।

बार-बार की राजनीतिक अस्थिरता,

सैन्य दलों की आवाजाही,

अफगान आक्रमण,

मराठा अभियान,

और व्यापारिक असुरक्षा—

इन सबने शहर और आसपास के क्षेत्र को प्रभावित किया।

इसके विपरीत बंगाल, अवध और कुछ अन्य प्रांत अपने स्वतंत्र आर्थिक आधार पर अपेक्षाकृत अधिक मजबूत हो रहे थे।

यानी मुगल साम्राज्य का आर्थिक केंद्र भी दिल्ली से हट रहा था।

अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी : दूर बंगाल में बड़ा परिवर्तन

आलमगीर द्वितीय के शासनकाल में ही भारत के पूर्व में एक ऐसी घटना हुई जिसका प्रभाव आगे दिल्ली तक पहुँचने वाला था।

1757 में बंगाल में प्लासी का युद्ध हुआ।

रॉबर्ट क्लाइव और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने सिराजुद्दौला को पराजित किया।

मीर जाफर बंगाल का नवाब बनाया गया।

दिल्ली में उस समय अब्दाली और मराठों की राजनीति चल रही थी।

लेकिन बंगाल में एक यूरोपीय व्यापारिक कंपनी पहली बार भारतीय प्रांत की सत्ता-निर्माता बन चुकी थी।

प्लासी और मुगल साम्राज्य का संबंध

1757 की प्लासी में मुगल सम्राट की कोई निर्णायक सैन्य भूमिका नहीं थी।

यही तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है।

बंगाल कभी मुगल साम्राज्य के सबसे समृद्ध प्रांतों में था।

लेकिन अब वहां सत्ता परिवर्तन हो रहा था और दिल्ली उसे नियंत्रित करने की स्थिति में नहीं थी।

1717 में अंग्रेजी कंपनी फर्रुखसियर से व्यापारिक फरमान मांगती थी।

1757 में वही कंपनी बंगाल का नवाब तय कर रही थी।

इस परिवर्तन की गति असाधारण थी।

आलमगीर द्वितीय की धार्मिक नीति

आलमगीर द्वितीय व्यक्तिगत रूप से धार्मिक प्रवृत्ति वाला माना जाता है।

उसने औरंगज़ेब का “आलमगीर” नाम भी अपनाया था।

लेकिन उसके पास ऐसी राजनीतिक शक्ति नहीं थी कि वह कोई व्यापक धार्मिक नीति लागू कर सके।

इसलिए उसके शासन में धर्म की तुलना में सत्ता-संघर्ष प्रमुख विषय रहा।

वास्तविक निर्णय वजीर, मराठा, अफगान और क्षेत्रीय शक्तियाँ कर रही थीं।

क्या वह केवल कठपुतली था?

उसकी वास्तविक शक्ति बहुत सीमित थी।

इस अर्थ में उसे कठपुतली शासक कहना काफी हद तक उचित है।

लेकिन वह पूरी तरह निष्क्रिय नहीं था।

उसने इमाद-उल-मुल्क से स्वतंत्र होने का प्रयास किया।

अब्दाली से संपर्क खोजा।

अपने पुत्र अली गौहर के लिए स्वतंत्र राजनीतिक संभावना बनाने की कोशिश की।

यही स्वतंत्र होने का प्रयास अंततः उसके लिए घातक सिद्ध हुआ।

उसकी सबसे बड़ी त्रासदी

आलमगीर द्वितीय ने सिंहासन पाया—

लेकिन सत्ता नहीं।

उसके नाम पर सिक्के चल सकते थे।

फरमान जारी हो सकते थे।

खुतबा पढ़ा जा सकता था।

लेकिन वह अपने वजीर को हटाने की स्थिति में नहीं था।

वह राजधानी की सुरक्षा नहीं कर सकता था।

अब्दाली के प्रवेश को रोक नहीं सकता था।

मराठों की सेना को नियंत्रित नहीं कर सकता था।

और अंततः अपने ही जीवन की रक्षा नहीं कर सका।

यही उसके शासन का सार है।

1754–1759 : प्रमुख समयरेखा

1754 — अहमद शाह बहादुर पदच्युत; अज़ीज़ुद्दीन आलमगीर द्वितीय के नाम से सिंहासन पर।

1754 — इमाद-उल-मुल्क वास्तविक केंद्रीय शक्ति और वजीर बना।

1756 के अंत — अहमद शाह अब्दाली का नया भारत अभियान।

1757 — अब्दाली का दिल्ली पर नियंत्रण।

1757 — दिल्ली और उत्तर भारत में अफगान लूट।

1757 — मथुरा-वृंदावन और ब्रज क्षेत्र में व्यापक हिंसा एवं विनाश।

1757 — प्लासी का युद्ध; बंगाल में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का निर्णायक राजनीतिक हस्तक्षेप।

1757–1758 — मराठों का दिल्ली क्षेत्र में फिर प्रभाव।

1758 — मराठा सेना पंजाब की ओर बढ़ी।

1758 — लाहौर पर मराठा प्रभाव स्थापित।

1758 — मराठा शक्ति अटक तक पहुँची।

1758–1759 — पंजाब में मराठा-अफगान प्रतिस्पर्धा तेज।

1759 — अहमद शाह अब्दाली का फिर भारत अभियान।

1759 — आलमगीर द्वितीय और इमाद-उल-मुल्क के बीच संबंध निर्णायक रूप से बिगड़े।

29 नवंबर 1759 के आसपास — आलमगीर द्वितीय की हत्या।

1759 — उसके पुत्र अली गौहर ने आगे शाह आलम द्वितीय के रूप में बादशाहत का दावा किया।

1759 — अफगान-मराठा संघर्ष पानीपत की दिशा में बढ़ा।

आलमगीर द्वितीय की प्रमुख उपलब्धियाँ

उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियाँ बहुत सीमित थीं।

मुगल राजवंश की औपचारिक निरंतरता उसके नाम से बनी रही।

उसने इमाद-उल-मुल्क के पूर्ण नियंत्रण से बाहर निकलने का प्रयास किया।

उसका पुत्र अली गौहर शाही राजवंश की वैधानिक धारा को आगे ले जाने में सफल हुआ।

लेकिन उसके शासन के बड़े घटनाक्रमों—अब्दाली का आक्रमण, मराठा विस्तार और पंजाब का संघर्ष—पर उसका वास्तविक नियंत्रण नगण्य था।

उसकी प्रमुख विफलताएँ

वजीर पर नियंत्रण नहीं कर सका।

स्वतंत्र सेना तैयार नहीं कर सका।

अहमद शाह अब्दाली से दिल्ली की रक्षा नहीं कर सका।

1757 की अफगान लूट और ब्रज क्षेत्र की हिंसा रोक नहीं सका।

मराठा प्रभाव को नियंत्रित नहीं कर सका।

पंजाब में स्थायी मुगल सत्ता बहाल नहीं हुई।

अपने पुत्र और उत्तराधिकारी को दिल्ली में सुरक्षित नहीं रख पाया।

अंततः अपने ही वजीर की राजनीति का शिकार होकर मारा गया।

इस काल की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक वास्तविकता

1754 से 1759 तक “मुगल साम्राज्य” शब्द का अर्थ लगभग पूरी तरह बदल चुका था।

1526 में बाबर सेना लेकर दिल्ली जीतता है।

1556 में अकबर युद्ध जीतकर साम्राज्य बचाता है।

1658 में औरंगज़ेब स्वयं विशाल सेना का नेतृत्व कर सिंहासन जीतता है।

लेकिन 1750 के दशक में—

वजीर बादशाह चुनता है।

मराठा राजधानी की सत्ता तय करते हैं।

अब्दाली दिल्ली में प्रवेश करता है।

अंग्रेज बंगाल का नवाब तय करते हैं।

और मुगल सम्राट अपने ही महल में असुरक्षित है।

यह परिवर्तन केवल “कमजोर बादशाहों” का परिणाम नहीं था।

अखिल भारतीय राजनीतिक शक्ति कई स्वतंत्र केंद्रों में बँट चुकी थी।

निष्कर्ष

आलमगीर द्वितीय का शासन मुगल इतिहास का वह चरण है जब बादशाहत की वैधानिक प्रतिष्ठा और वास्तविक सत्ता के बीच लगभग पूर्ण विच्छेद हो चुका था।

वह लाल किले में बैठा सम्राट था—

लेकिन दिल्ली पर इमाद-उल-मुल्क का प्रभाव था।

पंजाब पर अब्दाली और मराठे लड़ रहे थे।

भरतपुर में सूरजमल की शक्ति थी।

रोहिलखंड में रोहिल्ले थे।

अवध अपने नवाब के अधीन था।

बंगाल में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी नया राजनीतिक खेल शुरू कर चुकी थी।

और हैदराबाद पहले ही स्वतंत्र दिशा में जा चुका था।

1757 की घटनाएँ इस पतन का असाधारण प्रतीक हैं।

उसी वर्ष—

अहमद शाह अब्दाली दिल्ली पर कब्जा करता है।

ब्रज क्षेत्र विनाशकारी हिंसा झेलता है।

और लगभग उसी समय—

प्लासी में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल की सत्ता-राजनीति पर निर्णायक पकड़ बनाती है।

पश्चिमोत्तर से अफगान शक्ति और पूर्व से अंग्रेजी कंपनी—

दोनों मुगल व्यवस्था की कमजोरी का लाभ उठा रहे थे।

बीच में मराठा शक्ति तेजी से फैल रही थी।

1758 में मराठे अटक तक पहुँच गए।

अब टकराव सीधे मराठों और अब्दाली के बीच होना था।

आलमगीर द्वितीय उस संघर्ष को देखने के लिए जीवित नहीं रहा।

1759 में उसकी हत्या कर दी गई।

उसका पुत्र अली गौहर दिल्ली से दूर था।

यही अली गौहर आगे बनेगा—