मुहम्मद शाह — 1719–1748
रंगीला दरबार, बिखरता साम्राज्य और नादिर शाह का प्रहार
1719 में मुहम्मद शाह जब मुगल सिंहासन पर बैठा, तब वह उस साम्राज्य का उत्तराधिकारी था जिसकी बाहरी प्रतिष्ठा अभी जीवित थी, लेकिन केंद्रीय प्रशासन की संरचना भीतर से तेजी से टूट चुकी थी। औरंगज़ेब की मृत्यु के केवल बारह वर्ष बाद स्थिति इतनी बदल गई थी कि दिल्ली का बादशाह स्वयं अपनी शक्ति के आधार पर नहीं, बल्कि शक्तिशाली अमीरों की इच्छा से सिंहासन पर बैठाया जा रहा था।
फर्रुखसियर को सैयद बंधुओं ने हटाया और मार डाला था। उसके बाद कुछ महीनों में रफी-उद-दराजात और शाहजहाँ द्वितीय जैसे अल्पायु बादशाह गद्दी पर बैठाए गए और शीघ्र ही उनकी मृत्यु हो गई। अंततः सितंबर 1719 में रोशन अख्तर नामक युवा राजकुमार को मुहम्मद शाह के नाम से सम्राट बनाया गया।
उस समय वास्तविक शक्ति सैयद अब्दुल्ला खान और सैयद हुसैन अली खान के हाथों में थी। वे इतने प्रभावशाली हो चुके थे कि इतिहास में “बादशाह निर्माता” के रूप में प्रसिद्ध हुए।
मुहम्मद शाह का शासन 1719 से 1748 तक चला। यह औरंगज़ेब के बाद किसी मुगल बादशाह का सबसे लंबा शासन था। लेकिन उसकी लंबी अवधि साम्राज्य को पुनर्जीवित नहीं कर सकी। इसके विपरीत इसी काल में हैदराबाद, अवध और बंगाल जैसे प्रांत लगभग स्वतंत्र उत्तराधिकारी राज्यों में बदल गए; मराठों ने मालवा और बुंदेलखंड होते हुए दिल्ली के दरवाजे तक अपनी सैन्य शक्ति पहुँचा दी; और 1739 में फारस के नादिर शाह ने करनाल में मुगल सेना को पराजित कर दिल्ली पर कब्जा कर लिया। आधुनिक मुगल इतिहासकारों में एक प्रभावशाली मत यह है कि लगभग 1720 तक केंद्रीकृत मुगल साम्राज्य की मूल संरचना अपूरणीय रूप से विघटित हो चुकी थी।
जन्म और वंश
मुहम्मद शाह का जन्म 7 अगस्त 1702 को हुआ।
उसका मूल नाम रोशन अख्तर था।
वह बहादुर शाह प्रथम के पुत्र जहान शाह का पुत्र था।
इस प्रकार वह औरंगज़ेब का परपौत्र था।
1712 के उत्तराधिकार युद्ध में उसके पिता जहान शाह मारे गए थे।
इसके बाद मुगल राजवंश की राजनीति लगातार बदलती रही।
जहांदार शाह आया।
फर्रुखसियर आया।
फिर सैयद बंधुओं ने कुछ महीनों में दो अल्पायु बादशाह बदल दिए।
ऐसे वातावरण में 17 वर्षीय रोशन अख्तर को सिंहासन मिला।
सैयद बंधुओं ने उसे क्यों चुना?
सैयद बंधुओं को ऐसा बादशाह चाहिए था जो मुगल राजवंश से वैधता रखता हो, लेकिन उनकी शक्ति को चुनौती देने की स्थिति में न हो।
युवा रोशन अख्तर इस दृष्टि से उपयुक्त था।
उसे “अबुल फतह नासिरुद्दीन मुहम्मद शाह” की शाही उपाधि के साथ सिंहासन पर बैठाया गया।
लेकिन प्रारंभ में वह वास्तविक अर्थ में स्वतंत्र सम्राट नहीं था।
वजीर सैयद अब्दुल्ला खान और मीर बख्शी सैयद हुसैन अली खान प्रशासन, सेना और नियुक्तियों पर भारी प्रभाव रखते थे।
बादशाह निर्माता
सैयद बंधुओं की शक्ति मुगल इतिहास में एक बड़े परिवर्तन का प्रतीक थी।
अकबर के समय अमीर सम्राट की शक्ति से पद प्राप्त करते थे।
अब अमीर स्वयं तय कर रहे थे कि सम्राट कौन होगा।
फर्रुखसियर का अंत इसका प्रमाण था।
रफी-उद-दराजात और शाहजहाँ द्वितीय का संक्षिप्त शासन भी यही दिखाता था।
मुहम्मद शाह जानता था कि यदि वह सैयद बंधुओं से मुक्त नहीं हुआ तो उसके पास केवल शाही नाम रहेगा।
सैयद विरोधी गुट
मुगल दरबार के अनेक पुराने अमीर भी सैयद बंधुओं के अत्यधिक प्रभाव से असंतुष्ट थे।
तूरानी और ईरानी अमीरों के कुछ गुट उन्हें अपनी प्रतिष्ठा के लिए खतरा मानते थे।
निजाम-उल-मुल्क चिन किलिच खान,
मुहम्मद अमीन खान,
और अन्य प्रभावशाली कुलीन धीरे-धीरे सैयद-विरोधी राजनीति में आए।
युवा मुहम्मद शाह भी गुप्त रूप से इसी दिशा में बढ़ा।
1720 : हुसैन अली खान की हत्या
सैयद हुसैन अली खान मुगल सेना का अत्यंत शक्तिशाली अधिकारी था।
1720 में उसकी हत्या कर दी गई।
यह हत्या एक व्यापक दरबारी षड्यंत्र का परिणाम थी जिसमें सैयद-विरोधी अमीर और शाही हित जुड़े हुए थे।
हुसैन अली की मृत्यु ने सत्ता-संतुलन बदल दिया।
अब उसके भाई अब्दुल्ला खान ने सैन्य प्रतिरोध का प्रयास किया।
सैयद अब्दुल्ला की पराजय
अब्दुल्ला खान ने एक वैकल्पिक राजकुमार को बादशाह बनाकर मुहम्मद शाह को चुनौती दी।
लेकिन उसे पराजित कर दिया गया।
1720 के अंत तक सैयद बंधुओं का प्रभुत्व समाप्त हो गया।
मुहम्मद शाह अब पहली बार वास्तविक रूप से स्वतंत्र सम्राट बना।
लेकिन यही वह समय था जब साम्राज्य की केंद्रीय संरचना पहले ही इतनी कमजोर हो चुकी थी कि केवल सैयद बंधुओं को हटाने से पुरानी शक्ति वापस नहीं आ सकती थी। कैम्ब्रिज के जॉन एफ. रिचर्ड्स 1720 को केंद्रीकृत मुगल साम्राज्य के विघटन की निर्णायक सीमा मानते हैं।
निजाम-उल-मुल्क
सैयद बंधुओं के पतन के बाद सबसे महत्वपूर्ण मुगल अमीरों में निजाम-उल-मुल्क चिन किलिच खान था।
वह औरंगज़ेब के समय से अनुभवी सैनिक और प्रशासक था।
मुहम्मद शाह ने उसे वजीर बनाया।
निजाम-उल-मुल्क समझता था कि साम्राज्य को बचाने के लिए दरबारी खर्च, भ्रष्टाचार, मनसबों की मनमानी और प्रांतीय स्वायत्तता पर नियंत्रण आवश्यक है।
लेकिन दिल्ली का वातावरण उसके लिए निराशाजनक था।
दरबार के गुट,
मनोरंजन,
व्यक्तिगत षड्यंत्र,
और शाही संरक्षण की राजनीति उसके सुधारवादी दृष्टिकोण से मेल नहीं खाते थे।
दिल्ली छोड़कर दक्कन की ओर
निजाम-उल-मुल्क ने अंततः दिल्ली की राजनीति से दूरी बनाई और दक्कन की ओर चला गया।
1724 में उसने मुबारिज खान को शकरखेड़ा के युद्ध में पराजित किया।
इसके बाद दक्कन में उसकी सत्ता लगभग स्वतंत्र हो गई।
उसने मुगल बादशाह की औपचारिक सर्वोच्चता को पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया।
सिक्का और वैधानिक भाषा में मुगल संबंध बना रहा।
लेकिन व्यावहारिक रूप से उसने हैदराबाद में एक स्वतंत्र आसफजाही राज्य की नींव रख दी।
यह मुगल विघटन की विशिष्ट प्रक्रिया थी—
प्रांत औपचारिक रूप से बादशाह के अधीन,
लेकिन वास्तविक रूप से स्वतंत्र।
कैम्ब्रिज के अध्ययन में हैदराबाद, अवध और बंगाल को कमजोर पड़ती मुगल सत्ता से निकले प्रमुख उत्तराधिकारी राज्यों में गिना गया है।
हैदराबाद राज्य का जन्म
निजाम-उल-मुल्क ने स्वयं को तत्काल स्वतंत्र “राजा” घोषित नहीं किया।
वह मुगल पद और उपाधि बनाए रहा।
लेकिन दक्कन में नियुक्तियाँ,
राजस्व,
सेना
और स्थानीय राजनीति पर वास्तविक नियंत्रण उसका था।
यही आसफजाही वंश आगे हैदराबाद के निजामों के रूप में 20वीं शताब्दी तक प्रभावशाली रहने वाला था।
यह मुगल केंद्र की कमजोरी का बड़ा प्रमाण था—
सबसे योग्य शाही वजीर ने दिल्ली को सुधारने के बजाय उससे दूर रहकर अपना राज्य बनाना अधिक व्यावहारिक समझा।
अवध का उदय
इसी अवधि में अवध भी लगभग स्वतंत्र राज्य बनने लगा।
सआदत खान बुरहान-उल-मुल्क को 1722 में अवध का सूबेदार नियुक्त किया गया।
उसने स्थानीय प्रशासन और राजस्व पर मजबूत नियंत्रण स्थापित किया।
समय के साथ अवध की नवाबी सत्ता दिल्ली की तुलना में अधिक स्वायत्त होती गई।
लखनऊ और फैजाबाद आगे इस उत्तराधिकारी राज्य के महत्वपूर्ण केंद्र बने।
बंगाल
बंगाल में मुर्शिद कुली खान पहले ही राजस्व और प्रशासन पर मजबूत पकड़ बना चुका था।
मुर्शिदाबाद उसकी सत्ता का केंद्र बना।
उसके उत्तराधिकारियों ने भी मुगल बादशाह की औपचारिक वैधता स्वीकार की, लेकिन बंगाल की वास्तविक राजनीति दिल्ली से लगभग स्वतंत्र हो गई।
इस प्रकार 1720 के दशक तक साम्राज्य के तीन सबसे समृद्ध क्षेत्रों—
बंगाल,
अवध,
और दक्कन—
में प्रांतीय शक्तियाँ अपने स्वतंत्र आधार बना चुकी थीं। कैम्ब्रिज के अध्ययन में भी इन्हें मुगल पतन के बीच बने प्रमुख उत्तराधिकारी राज्यों के रूप में रेखांकित किया गया है।
क्या मुगल साम्राज्य अचानक खत्म हो गया था?
नहीं।
यही इस काल को समझने की महत्वपूर्ण बात है।
दिल्ली का बादशाह अभी भी अत्यंत प्रतिष्ठित था।
प्रांतीय शासक मुगल उपाधियाँ चाहते थे।
वे शाही सनद और वैधानिक स्वीकृति को महत्व देते थे।
सिक्कों और खुतबे में मुगल बादशाह का नाम राजनीतिक वैधता देता था।
लेकिन वास्तविक शासन की क्षमता अब दिल्ली के पास नहीं थी।
इसलिए साम्राज्य “समाप्त” होने के बजाय एक ढीले राजनीतिक ढांचे में बदल रहा था।
मुहम्मद शाह “रंगीला”
मुहम्मद शाह के साथ “रंगीला” उपनाम प्रसिद्ध है।
उसकी रुचि संगीत,
नृत्य,
चित्रकला,
वस्त्र,
शिकार,
कविता
और दरबारी मनोरंजन में थी।
इस कारण बाद के इतिहास में उसे अक्सर केवल विलासी शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया।
लेकिन उसका पूरा शासन केवल मनोरंजन में बीता—यह निष्कर्ष अत्यधिक सरल है।
उसने सैयद बंधुओं की शक्ति समाप्त करने में भूमिका निभाई।
दरबार की राजनीति में सक्रिय रहा।
मराठों और प्रांतों से निपटने के प्रयास किए।
नादिर शाह के आक्रमण के समय सेना संगठित की।
फिर भी यह सच है कि वह औरंगज़ेब या अकबर जैसी लगातार प्रशासनिक निगरानी रखने वाला सम्राट नहीं था।
कैम्ब्रिज के एक अध्ययन में उसके शासन को प्रशासन और सैनिक नेतृत्व की अपेक्षा शिकार और महल के मनोरंजन में अधिक रुचि वाला बताया गया है।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण
राजनीतिक पतन के बावजूद मुहम्मद शाह का दरबार सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत जीवंत था।
संगीत,
चित्रकला,
कविता,
नृत्य,
और दिल्ली की शहरी संस्कृति ने नई ऊर्जा प्राप्त की।
इसलिए राजनीतिक पतन को सांस्कृतिक पतन के समान समझना गलत होगा।
दरबार की शक्ति घट रही थी, लेकिन कला और संगीत कई क्षेत्रों में खिल रहे थे।
संगीत
मुहम्मद शाह स्वयं संगीत में गहरी रुचि रखता था।
उसके शासन में नियामत खान “सदारंग” और फिरोज खान “अदारंग” जैसे महान संगीतज्ञ प्रसिद्ध हुए।
खयाल गायकी के विकास के इतिहास में उनका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।
आधुनिक संगीत इतिहास के शोध में मुहम्मद शाह के शासन को मुगल दरबारी संगीत के महत्वपूर्ण पुनरुत्थान का काल कहा गया है।
चित्रकला
औरंगज़ेब के काल में शाही चित्रकला का संरक्षण कम हुआ था।
मुहम्मद शाह के समय दरबारी चित्रकला को फिर संरक्षण मिला।
चित्रों में संगीत,
नृत्य,
प्रेम,
दरबारी समारोह,
बाग,
शिकार
और शाही जीवन के दृश्य दिखाई देते हैं।
मुगल चित्रकला की शैली अधिक कोमल और सजावटी हुई।
लेकिन दिल्ली की राजनीतिक अस्थिरता के कारण कलाकार धीरे-धीरे अवध, राजस्थान, पंजाब और दक्कन जैसे क्षेत्रीय दरबारों की ओर भी जाने लगे।
नादिर शाह के बाद यह विस्थापन और तेज हुआ।
उर्दू और दिल्ली की संस्कृति
18वीं शताब्दी के प्रारंभ में दिल्ली फारसी उच्च संस्कृति और विकसित होती उर्दू साहित्यिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र बन रही थी।
फारसी अभी प्रशासन और उच्च साहित्य की प्रमुख भाषा थी।
लेकिन शहर की बोलचाल और काव्य परंपराओं से उर्दू का साहित्यिक रूप तेजी से उभर रहा था।
आगे मीर तकी मीर जैसे कवियों का युग इसी राजनीतिक-सांस्कृतिक वातावरण से निकलेगा।
मराठा शक्ति का नया चरण
मुहम्मद शाह के शासन की सबसे बड़ी भारतीय राजनीतिक चुनौती मराठा विस्तार था।
औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मराठों को दबाना तो दूर, वे अधिक संगठित हुए।
शाहू के शासन में पेशवा पद का प्रभाव बढ़ा।
बालाजी विश्वनाथ के बाद उसके पुत्र बाजीराव प्रथम 1720 में पेशवा बने।
बाजीराव की नीति स्पष्ट थी—
मराठा शक्ति को दक्कन से बाहर निकालकर उत्तर और मध्य भारत तक फैलाना।
बाजीराव प्रथम
बाजीराव असाधारण गति और घुड़सवार युद्ध-पद्धति के लिए प्रसिद्ध था।
उसने मालवा,
बुंदेलखंड,
गुजरात
और उत्तर भारत की दिशा में मराठा प्रभाव बढ़ाया।
मुगल सेना विशाल थी लेकिन धीमी।
मराठा सेना हल्की और तीव्र गति वाली थी।
यही अंतर बार-बार मुगलों के लिए समस्या बना।
मालवा
मालवा उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र था।
मराठों ने यहां लगातार दबाव बढ़ाया।
स्थानीय मुगल अधिकारी उन्हें रोकने में कठिनाई महसूस कर रहे थे।
धीरे-धीरे चौथ और वास्तविक राजनीतिक प्रभाव मराठों के हाथ में जाने लगा।
यह केवल कर की बात नहीं थी।
मालवा पर मराठा प्रभाव का अर्थ था—
दिल्ली की ओर जाने का मार्ग खुलना।
बुंदेलखंड और छत्रसाल
बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल लंबे समय से मुगल सत्ता के खिलाफ स्वतंत्र शक्ति बना चुके थे।
मुहम्मद खान बंगश के साथ संघर्ष में उन्होंने बाजीराव से सहायता मांगी।
बाजीराव ने हस्तक्षेप किया और बंगश को पीछे हटना पड़ा।
इसके बाद बुंदेलखंड के हिस्सों में मराठों की स्थिति और मजबूत हुई।
यह दिखाता है कि क्षेत्रीय शासक अब दिल्ली की बजाय मराठों जैसे नए शक्ति-केंद्रों से गठबंधन कर रहे थे।
1737 : बाजीराव दिल्ली तक
1737 में बाजीराव ने अत्यंत तेज सैन्य अभियान करते हुए दिल्ली तक पहुँचकर मुगल सत्ता को चौंका दिया।
मराठा सेना राजधानी के निकट पहुँच गई।
यह घटना प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
कुछ दशक पहले मुगल सेना दक्कन में मराठों के किलों का पीछा कर रही थी।
अब मराठा सेना स्वयं दिल्ली के द्वार तक आ गई थी।
राजधानी की सुरक्षा को पहली बार एक भारतीय क्षेत्रीय शक्ति ने इतने स्पष्ट रूप से चुनौती दी।
मुगल प्रतिक्रिया
मुहम्मद शाह ने मराठों को रोकने के लिए सेना संगठित की।
निजाम-उल-मुल्क को भी फिर केंद्रीय राजनीति में बुलाया गया।
लेकिन बाजीराव विशाल स्थायी युद्ध में उलझने के बजाय तेज गति से लौट गया।
उसका उद्देश्य दिल्ली पर स्थायी कब्जा करना नहीं था।
उसने यह दिखा दिया था कि मुगल साम्राज्य की राजधानी अब पहुंच से बाहर नहीं है।
भोपाल अभियान
1737–1738 में भोपाल क्षेत्र में मराठा और मुगल-निजामी शक्तियों का संघर्ष हुआ।
बाजीराव ने मुगल पक्ष की आपूर्ति काटकर दबाव बनाया।
अंततः समझौते में मराठों की मालवा संबंधी स्थिति मजबूत हुई।
इससे मध्य भारत पर मुगल पकड़ और कमजोर हुई।
मराठा चुनौती का अर्थ
मराठा शक्ति अब मुगल साम्राज्य की परिधि पर विद्रोही शक्ति नहीं थी।
वह साम्राज्य की भूमि, कर और राजनीतिक संरक्षण की प्रतिस्पर्धी शक्ति बन चुकी थी।
मराठा सरदार आगे ग्वालियर,
इंदौर,
बड़ौदा
और नागपुर जैसे नए शक्ति-केंद्र स्थापित करेंगे।
18वीं शताब्दी का भारत अब दिल्ली-केंद्रित एक साम्राज्य के बजाय अनेक क्षेत्रीय शक्तियों का राजनीतिक क्षेत्र बनने लगा था। इसी व्यापक विघटन में मराठा, सिख, जाट और उत्तराधिकारी प्रांतीय राज्य उभरे।
जाट शक्ति का विस्तार
आगरा और मथुरा के आसपास जाट शक्ति भी मजबूत हो रही थी।
चूड़ामन के बाद बदन सिंह और फिर सूरजमल जैसे नेता भरतपुर राज्य को संगठित करने वाले थे।
मुगल केंद्र के लिए जाट अब केवल कृषक विद्रोही नहीं रहे।
वे किलों, सेना और स्वतंत्र राजस्व व्यवस्था वाली क्षेत्रीय शक्ति बन रहे थे।
सिख शक्ति
बंदा सिंह बहादुर के मृत्युदंड के बाद कुछ समय के लिए मुगल प्रशासन ने समझा कि सिख चुनौती नियंत्रित हो गई है।
लेकिन पंजाब में सिख समुदाय फिर विभिन्न सैन्य जत्थों में संगठित होने लगा।
आगे यही जत्थे “मिसल” प्रणाली में विकसित होंगे।
मुहम्मद शाह के अंतिम वर्षों तक पंजाब में मुगल शक्ति विदेशी अफगान आक्रमणों और स्थानीय सिख उभार—दोनों से दबाव में आने लगी थी।
साम्राज्य का वित्तीय संकट
प्रांतीय स्वायत्तता का सबसे बड़ा आर्थिक प्रभाव यह था कि दिल्ली तक नियमित राजस्व पहुंचना कम हुआ।
कागज पर बंगाल, अवध और दक्कन मुगल साम्राज्य के हिस्से थे।
लेकिन वास्तविक आय का बड़ा हिस्सा स्थानीय शासक अपने प्रशासन और सेना पर खर्च करने लगे।
केंद्रीय खजाना कमजोर हुआ।
इससे मुगल सेना की गुणवत्ता और वेतन व्यवस्था प्रभावित हुई।
मनसबदारी और जागीर व्यवस्था की पुरानी समस्याएँ और गंभीर हो गईं।
आधुनिक शोध मुगल पतन की व्याख्या में राजसत्ता, मनसबदार, जमींदार और किसान के बीच बढ़ते आर्थिक तनाव तथा क्षेत्रीय शक्तियों के उदय को केंद्रीय कारणों में गिनता है।
सेना की समस्या
मुगल सेना अभी भी संख्या और भव्यता में विशाल दिखाई दे सकती थी।
लेकिन उसके संगठन में गंभीर समस्याएँ थीं।
मनसबदार अपने दस्ते रखते थे।
केंद्रीय अनुशासन पहले जैसा नहीं था।
तोपखाना भारी था।
सेना की गति धीमी थी।
अलग-अलग अमीरों में प्रतिद्वंद्विता थी।
1739 के करनाल युद्ध में ये सभी कमजोरियाँ विनाशकारी रूप से सामने आने वाली थीं।
नादिर शाह : पश्चिम से उठता नया खतरा
18वीं शताब्दी के तीसरे दशक में फारस में नादिर का उदय हुआ।
वह असाधारण सैनिक नेता था।
उसने अफगान होतकी सत्ता को पराजित किया,
सफवी फारस की सीमाएँ पुनः स्थापित कीं,
और अंततः स्वयं ईरान का शासक बना।
उसकी सेना अत्यंत अनुशासित, गतिशील और आधुनिक आग्नेयास्त्रों के उपयोग में दक्ष थी।
इसके विपरीत मुगल साम्राज्य का सैन्य नेतृत्व बिखरा हुआ था।
अफगान सीमा और मुगल कमजोरी
कंधार और अफगानिस्तान का क्षेत्र मुगल और फारसी राजनीति के बीच लंबे समय से महत्वपूर्ण था।
मुगल केंद्रीय सत्ता कमजोर होने के कारण उत्तर-पश्चिमी सीमा की रक्षा पहले जैसी प्रभावी नहीं रही।
नादिर शाह ने कंधार और काबुल की दिशा में अपनी शक्ति बढ़ाई और फिर भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ा। कैम्ब्रिज के विवरण में 1739 के अभियान से पहले नादिर द्वारा कंधार और काबुल की दिशा में विजय और फिर मुगल क्षेत्र में प्रवेश का उल्लेख है।
मुगलों ने खतरे को क्यों नहीं पहचाना?
दिल्ली दरबार को नादिर शाह की गतिविधियों की सूचना थी।
लेकिन उसका सही आकलन नहीं किया गया।
दरबार के अमीर आपसी प्रतिस्पर्धा में उलझे थे।
सीमा पर पर्याप्त तैयारी नहीं हुई।
जब नादिर शाह भारत की ओर बढ़ा, तब मुगल प्रशासन को संकट की वास्तविक गंभीरता समझ आई।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
नादिर शाह का भारत प्रवेश
1738–1739 में नादिर शाह ने मुगल सीमा तोड़ी।
काबुल और पेशावर होते हुए वह पंजाब की ओर बढ़ा।
लाहौर पर उसका नियंत्रण स्थापित हुआ।
अब उसका रास्ता दिल्ली की ओर था।
मुहम्मद शाह ने विशाल मुगल सेना संगठित की।
दोनों सेनाओं का निर्णायक सामना करनाल में हुआ।
1739 : करनाल का युद्ध
24 फरवरी 1739 को करनाल के निकट मुगल और नादिर शाह की सेनाएँ आमने-सामने हुईं।
संख्या में मुगल सेना बड़ी थी।
लेकिन उसका नेतृत्व विभाजित था।
सआदत खान,
खान-ए-दौरान,
निजाम-उल-मुल्क
और अन्य बड़े अमीरों के बीच समन्वय कमजोर था।
नादिर शाह की सेना अपेक्षाकृत छोटी लेकिन अनुशासित और युद्ध-अनुभवी थी।
मुगल पराजय
करनाल का युद्ध कुछ ही घंटों में मुगल पक्ष के लिए विनाशकारी साबित हुआ।
खान-ए-दौरान गंभीर रूप से घायल हुआ और बाद में उसकी मृत्यु हुई।
सआदत खान बंदी बना लिया गया।
मुगल सेना की विशाल संख्या वास्तविक सैन्य प्रभाव में नहीं बदल सकी।
नादिर शाह ने मुगल नेतृत्व की अव्यवस्था का पूरा लाभ उठाया।
मुहम्मद शाह अंततः नादिर के नियंत्रण में आ गया।
कैम्ब्रिज के आधुनिक अध्ययन में इस पराजय को अव्यवस्थित और खराब नेतृत्व वाली मुगल सेना की तेज हार बताया गया है।
दिल्ली की ओर नादिर शाह
करनाल के बाद नादिर शाह मुहम्मद शाह को साथ लेकर दिल्ली की ओर बढ़ा।
राजधानी ने विजेता का स्वागत करने के लिए स्वयं को तैयार किया।
नादिर शाह ने दिल्ली में प्रवेश किया।
औपचारिक रूप से मुहम्मद शाह अभी मौजूद था, लेकिन वास्तविक सैन्य शक्ति फारसी विजेता के हाथ में थी।
मुगल साम्राज्य की राजधानी पहली बार किसी विदेशी विजेता के पूर्ण नियंत्रण में आ गई।
22 मार्च 1739 : दिल्ली का नरसंहार
दिल्ली में अफवाह फैली कि नादिर शाह मारा गया है।
शहर के कुछ लोगों ने फारसी सैनिकों पर हमला कर दिया।
इसके बाद नादिर शाह ने सामूहिक हत्या का आदेश दिया।
दिल्ली में व्यापक नरसंहार हुआ।
हजारों लोग मारे गए।
संपत्ति लूटी गई।
शहर आतंक में डूब गया।
आधुनिक कैम्ब्रिज अध्ययन नादिर शाह के दिल्ली अभियान को हजारों नागरिकों की मृत्यु और राजधानी की भारी लूट से जोड़ता है।
कितने लोग मारे गए?
मृतकों की संख्या के बारे में विभिन्न स्रोत अलग-अलग आंकड़े देते हैं।
कुछ समकालीन और बाद के विवरण बहुत बड़ी संख्याएँ बताते हैं।
ठीक संख्या निश्चित करना कठिन है।
इसलिए इतिहासलेखन में सावधानी आवश्यक है।
लेकिन इस बात पर कोई गंभीर विवाद नहीं कि नरसंहार व्यापक और भयावह था।
दिल्ली की जनसंख्या, अर्थव्यवस्था और मनोविज्ञान पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा।
मयूर सिंहासन
नादिर शाह ने मुगल खजाने की विशाल संपत्ति अपने कब्जे में ली।
शाहजहाँ का प्रसिद्ध मयूर सिंहासन फारस ले जाया गया।
यह सिंहासन मुगल राजकीय वैभव का प्रतीक था।
उसका दिल्ली से जाना केवल संपत्ति की चोरी नहीं था—
वह मुगल सत्ता की प्रतिष्ठा छिन जाने का दृश्य प्रतीक बन गया।
कोहिनूर
नादिर शाह को मुगल खजाने से प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी प्राप्त हुआ।
उसके साथ दर्या-ए-नूर जैसे अन्य प्रसिद्ध रत्नों को भी फारसी विजय से जोड़ा जाता है।
कैम्ब्रिज के अध्ययन में 1739 की लूट में मयूर सिंहासन और कोहिनूर दोनों के ले जाए जाने का स्पष्ट उल्लेख है।
कितनी संपत्ति लूटी गई?
नादिर शाह ने सोना,
चांदी,
रत्न,
नकदी,
आभूषण,
शाही वस्तुएँ,
हाथी,
घोड़े
और अन्य संपदा की भारी मात्रा प्राप्त की।
लूट इतनी विशाल थी कि कहा जाता है कि वह फारस में कुछ समय के लिए करों में राहत देने में सक्षम हुआ।
विभिन्न इतिहासकार संपत्ति का अलग-अलग अनुमान देते हैं।
ठीक आधुनिक मौद्रिक मूल्य निकालना संभव नहीं है।
लेकिन यह निर्विवाद है कि मुगल साम्राज्य की संचित शाही संपदा का बड़ा हिस्सा दिल्ली से चला गया।
मुहम्मद शाह को सिंहासन वापस क्यों मिला?
नादिर शाह भारत में स्थायी शासन स्थापित करने नहीं आया था।
उसका मुख्य उद्देश्य धन, राजनीतिक प्रतिष्ठा और उत्तर-पश्चिमी सुरक्षा था।
उसने मुहम्मद शाह को फिर औपचारिक रूप से मुगल सिंहासन पर रहने दिया।
लेकिन सिंधु नदी के पश्चिम के कुछ क्षेत्रों पर मुगल दावे समाप्त हुए और फारसी प्रभाव बढ़ा।
मुहम्मद शाह बादशाह बना रहा—
पर उसकी प्रतिष्ठा नष्ट हो चुकी थी।
1739 के बाद मुगल साम्राज्य
नादिर शाह के लौटने के बाद वही लाल किला था।
वही बादशाह था।
वही दरबार था।
फरमान जारी होते रहे।
लेकिन राजनीतिक वास्तविकता बदल चुकी थी।
यदि एक विदेशी सेना इतनी आसानी से करनाल में मुगलों को हराकर दिल्ली लूट सकती थी, तो पूरे भारत की क्षेत्रीय शक्तियों को संदेश मिल गया कि केंद्रीय सत्ता अब अपनी राजधानी तक सुरक्षित नहीं रख सकती।
कैम्ब्रिज के इतिहास में 1739 को मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा पर ऐसा आघात माना गया है जिससे राजवंश कभी पूरी तरह उबर नहीं पाया।
क्या 1739 मुगल साम्राज्य का अंत था?
औपचारिक रूप से नहीं।
मुगल सम्राट 1857 तक रहे।
लेकिन कई इतिहासकार 1739 को प्रभावी साम्राज्यवादी शक्ति के अंत का निर्णायक प्रतीक मानते हैं।
कैम्ब्रिज के एक आर्थिक इतिहास के कालक्रम में 1739 में शाहजहांनाबाद पर नादिर शाह के कब्जे और मयूर सिंहासन की लूट को “प्रभावी मुगल शक्ति का अंत” तक कहा गया है।
दूसरे इतिहासकार केंद्रीय ढांचे के निर्णायक विघटन की तारीख इससे भी पहले, लगभग 1720, मानते हैं।
इसलिए अधिक उचित निष्कर्ष है—
1720 तक केंद्रीय संरचना बिखर चुकी थी; 1739 ने इस कमजोरी को पूरी दुनिया के सामने निर्वस्त्र कर दिया।
शाहजहानाबाद पर प्रभाव
1739 के बाद दिल्ली की स्थिति बदल गई।
शहर पहले साम्राज्य की राजधानी था।
अब वह लगातार आक्रमणों के लिए असुरक्षित दिखाई देने लगा।
कैम्ब्रिज के शाहजहानाबाद संबंधी अध्ययन के अनुसार नादिर शाह के प्रस्थान ने 1739 से 1803 तक दिल्ली के लंबे राजनीतिक और सामाजिक संकट का आरंभ किया।
शहर बादशाह का निवास बना रहा,
लेकिन अखिल भारतीय साम्राज्य की निर्विवाद राजधानी वाला उसका पुराना स्वरूप समाप्त होने लगा।
नादिर शाह की विजय का मराठों पर प्रभाव
नादिर शाह के आक्रमण ने मराठों के लिए भी एक नई राजनीतिक वास्तविकता पैदा की।
दिल्ली का केंद्र कमजोर था।
उत्तर भारत में शक्ति-रिक्ति बढ़ रही थी।
आगे मराठे मालवा से निकलकर दिल्ली,
पंजाब
और दोआब की राजनीति में अधिक सक्रिय होने वाले थे।
मुगल सम्राट धीरे-धीरे कभी मराठों, कभी अफगानों और कभी क्षेत्रीय अमीरों के संरक्षण पर निर्भर होने लगेगा।
अहमद शाह अब्दाली का उदय
नादिर शाह की सेना में एक प्रमुख अफगान सेनानायक अहमद खान अब्दाली था।
1747 में नादिर शाह की हत्या के बाद उसने अफगानिस्तान में स्वतंत्र दुर्रानी सत्ता स्थापित की।
यही अहमद शाह अब्दाली आगे बार-बार भारत पर आक्रमण करेगा।
इस प्रकार नादिर शाह का आक्रमण केवल एक घटना नहीं था।
उसने उत्तर-पश्चिम में ऐसी नई शक्ति पैदा होने की परिस्थितियाँ छोड़ीं जो अगले दो दशकों तक भारत की राजनीति को झकझोरती रहेगी।
1748 : अहमद शाह अब्दाली का पहला आक्रमण
मुहम्मद शाह के शासन के अंतिम वर्ष में अहमद शाह अब्दाली भारत की ओर बढ़ा।
उसने पंजाब में प्रवेश किया।
मुगल सेना ने उसका सामना किया।
1748 में मनुपुर या सिरहिंद के निकट हुए संघर्ष में मुगल पक्ष ने उसे पीछे हटने पर मजबूर किया।
इसे कमजोर होते मुगल साम्राज्य की एक उल्लेखनीय अंतिम सैन्य सफलता माना जा सकता है। आधुनिक भारतीय इतिहास के कैम्ब्रिज पाठ में 1748 में पहले अफगान आक्रमण को पीछे हटाने को सीमित और अस्थायी सफलता कहा गया है।
मीर मन्नू और मुगल प्रतिरोध
इस संघर्ष में पंजाब के मुगल नेतृत्व ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अहमद शाह अब्दाली को पहली बार स्थायी सफलता नहीं मिली।
लेकिन समस्या खत्म नहीं हुई।
वह फिर लौटेगा।
और मुहम्मद शाह के उत्तराधिकारी उसके आक्रमणों को रोकने में लगातार कठिनाई महसूस करेंगे।
मुहम्मद शाह की मृत्यु
नादिर शाह के आक्रमण के लगभग नौ वर्ष बाद मुहम्मद शाह का शासन समाप्त हुआ।
1748 में उसकी मृत्यु हो गई।
उसने लगभग 29 वर्ष शासन किया।
उसके बाद उसका पुत्र अहमद शाह बहादुर मुगल सिंहासन पर बैठा।
लेकिन उसे जो साम्राज्य मिला, वह अब अकबर या औरंगज़ेब का साम्राज्य नहीं था।
दिल्ली में सम्राट था—
पर बंगाल स्वतंत्र व्यवहार कर रहा था।
अवध स्वतंत्र था।
हैदराबाद स्वतंत्र था।
मराठे मध्य और उत्तर भारत में फैल रहे थे।
जाट मजबूत हो रहे थे।
सिख पंजाब में पुनर्गठित हो रहे थे।
और उत्तर-पश्चिम से अहमद शाह अब्दाली का नया खतरा सामने था।
1719–1748 : प्रमुख समयरेखा
सितंबर 1719 — रोशन अख्तर मुहम्मद शाह के नाम से मुगल सम्राट बना।
1719–1720 — सैयद बंधुओं का प्रभाव चरम पर।
1720 — सैयद हुसैन अली खान की हत्या।
1720 — सैयद अब्दुल्ला खान की शक्ति का अंत; मुहम्मद शाह सैयद नियंत्रण से मुक्त।
1720 के आसपास — केंद्रीकृत मुगल प्रशासन का निर्णायक विघटन; कई आधुनिक इतिहासकार इसे साम्राज्य के स्वरूप बदलने का प्रमुख मोड़ मानते हैं।
1722 — सआदत खान अवध का सूबेदार; आगे स्वतंत्र नवाबी सत्ता की नींव।
1724 — निजाम-उल-मुल्क ने दक्कन में अपनी स्वतंत्र शक्ति स्थापित की; हैदराबाद की आसफजाही सत्ता का उदय।
1720 का दशक — बंगाल, अवध और हैदराबाद का व्यावहारिक स्वायत्तकरण तेज।
1720 — बाजीराव प्रथम मराठा पेशवा बना; उत्तर भारत की ओर मराठा विस्तार का नया चरण।
1720–1730 का दशक — मालवा, बुंदेलखंड और गुजरात में मराठा प्रभाव बढ़ा।
1737 — बाजीराव की सेना दिल्ली के निकट पहुँची; मुगल राजधानी की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न।
1737–1738 — भोपाल क्षेत्र में मराठा दबाव; मुगल-निजामी पक्ष को समझौता करना पड़ा।
1738–1739 — नादिर शाह का भारत अभियान।
24 फरवरी 1739 — करनाल में मुगल सेना की निर्णायक पराजय।
मार्च 1739 — नादिर शाह का दिल्ली प्रवेश।
22 मार्च 1739 — दिल्ली में व्यापक नरसंहार।
1739 — मयूर सिंहासन, कोहिनूर और विशाल शाही संपत्ति फारस ले जाई गई।
1739 के बाद — दिल्ली और केंद्रीय मुगल प्रतिष्ठा में निर्णायक गिरावट।
1747 — नादिर शाह की हत्या; अहमद शाह अब्दाली ने अफगान दुर्रानी राज्य स्थापित किया।
1748 — अब्दाली का पहला भारत आक्रमण; मुगल सेना ने उसे अस्थायी रूप से पीछे हटाया।
1748 — मुहम्मद शाह की मृत्यु; अहमद शाह बहादुर उत्तराधिकारी।
मुहम्मद शाह की प्रमुख उपलब्धियाँ
सैयद बंधुओं के नियंत्रण से स्वयं को मुक्त किया।
लगभग तीन दशकों तक मुगल सिंहासन पर स्थिरता बनाए रखी।
दिल्ली में संगीत, चित्रकला और दरबारी संस्कृति को महत्वपूर्ण संरक्षण दिया।
उसके शासन में सदारंग और अदारंग जैसे महान संगीतज्ञों का उत्कर्ष हुआ।
1739 की तबाही के बाद भी मुगल राजवंश की औपचारिक सत्ता को समाप्त नहीं होने दिया।
1748 में पहले अहमद शाह अब्दाली आक्रमण को रोकने में मुगल पक्ष ने सीमित सफलता प्राप्त की।
उसकी प्रमुख विफलताएँ
केंद्रीय प्रशासन को फिर से संगठित नहीं कर सका।
निजाम-उल-मुल्क जैसे सक्षम अमीर को दिल्ली से दूर जाने से नहीं रोक सका।
हैदराबाद, अवध और बंगाल की बढ़ती स्वायत्तता को पलट नहीं सका।
मराठों के मालवा और उत्तर भारत विस्तार को प्रभावी ढंग से नहीं रोक पाया।
1737 में बाजीराव दिल्ली के निकट पहुँच गया।
उत्तर-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा विफल रही।
करनाल में मुगल सेना की संरचनात्मक कमजोरी उजागर हुई।
1739 में राजधानी को नादिर शाह के हाथों विनाशकारी लूट और नरसंहार झेलना पड़ा।
मुगल खजाने और शाही प्रतिष्ठा को ऐसा आघात लगा जिससे साम्राज्य कभी पूरी तरह उबर नहीं पाया।
क्या मुहम्मद शाह ही मुगल पतन का जिम्मेदार था?
नहीं।
पतन की जड़ें उससे पहले की थीं।
औरंगज़ेब के लंबे दक्कनी युद्धों ने वित्त और प्रशासन को कमजोर किया था।
मनसब-जागीर व्यवस्था में संकट था।
1707 के बाद लगातार उत्तराधिकार युद्ध हुए।
सैयद बंधुओं का उदय केंद्रीय सत्ता की कमजोरी का परिणाम था।
प्रांतों ने पहले से अधिक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी।
मराठा शक्ति औरंगज़ेब के समय ही समाप्त होने के बजाय मजबूत हो गई थी।
आर्थिक इतिहासकार मुगल पतन को राजसत्ता, मनसबदारों, जमींदारों, किसानों और उभरते क्षेत्रीय शासकों के बीच बढ़ते संरचनात्मक तनाव से जोड़ते हैं।
लेकिन मुहम्मद शाह की कमजोरी ने इन समस्याओं को उलटने का अवसर खो दिया।
उसके लंबे 29 वर्ष के शासन में कोई ऐसा व्यापक प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं हुआ जो केंद्र को पुनः मजबूत कर पाता।
“रंगीला” कहकर क्या इतिहास सरल कर दिया गया?
बहुत हद तक।
मुहम्मद शाह की संगीत और मनोरंजन में रुचि वास्तविक थी।
उसका दरबार रंगीन था।
लेकिन यह कहना कि मुगल साम्राज्य उसके नृत्य-संगीत प्रेम के कारण गिर गया, इतिहास को हास्य-कथा में बदलना होगा।
मुगल संकट सैन्य,
वित्तीय,
प्रांतीय,
राजवंशीय
और सामाजिक था।
उसकी व्यक्तिगत कमजोरियाँ इन समस्याओं को संभालने में बाधा बनीं—
पर समस्याएँ उससे कहीं बड़ी थीं।
इसी प्रकार उसके शासन में सांस्कृतिक उत्कर्ष को केवल “विलासिता” कहना भी गलत होगा।
राजनीतिक संकट के बीच दिल्ली संगीत और कला का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र बनी रही।
1739 का वास्तविक अर्थ
यदि इस पूरे शासन से एक घटना चुननी हो जो मुगल साम्राज्य के बदलते इतिहास को सबसे स्पष्ट रूप से व्यक्त करती है, तो वह नादिर शाह का आक्रमण होगा।
बाबर 1526 में उत्तर-पश्चिम से आया था और दिल्ली की सत्ता जीतकर एक नया राजवंश स्थापित किया था।
213 वर्ष बाद 1739 में नादिर शाह उसी दिशा से आया।
लेकिन इस बार मुगल साम्राज्य बाहरी आक्रमण रोक नहीं सका।
करनाल में सेना टूटी।
सम्राट विजेता के साथ दिल्ली आया।
राजधानी पर कब्जा हुआ।
लोग मारे गए।
शाही खजाना लूटा गया।
मयूर सिंहासन चला गया।
कोहिनूर चला गया।
और दिल्ली का यह भ्रम भी टूट गया कि मुगल बादशाह अब भी उपमहाद्वीप की निर्विवाद सर्वोच्च शक्ति है।
कैम्ब्रिज के अध्ययनों में नादिर शाह की 1739 की विजय को मुगल राजवंश के लिए ऐसा “crushing blow” माना गया है जिससे वह वास्तविक अर्थ में फिर कभी नहीं उबर सका।
निष्कर्ष
मुहम्मद शाह के 29 वर्ष के शासन में मुगल साम्राज्य औपचारिक रूप से जीवित रहा, लेकिन उसका स्वरूप बदल गया।
1719 में जब वह सिंहासन पर बैठा, तब समस्या थी—
दिल्ली पर सैयद बंधुओं का नियंत्रण।
1720 में उसने उनसे मुक्ति पाई।
लेकिन शीघ्र ही दूसरी वास्तविकता सामने आई—
साम्राज्य के प्रांत स्वयं शक्ति-केंद्र बन चुके थे।
हैदराबाद में निजाम।
अवध में नवाब।
बंगाल में स्वतंत्र प्रशासन।
दक्कन और मध्य भारत में मराठे।
भरतपुर क्षेत्र में जाट।
पंजाब में पुनर्गठित होते सिख।
दिल्ली का बादशाह अब इन सभी पर वैसा नियंत्रण नहीं रखता था जैसा अकबर, शाहजहाँ या औरंगज़ेब रखते थे।
1737 में बाजीराव दिल्ली के पास पहुँचकर यह दिखा चुका था कि राजधानी अब किसी भारतीय शक्ति की पहुँच से बाहर नहीं है।
1739 में नादिर शाह ने इससे भी अधिक भयावह सच सामने रख दिया—
राजधानी विदेशी सेना से भी सुरक्षित नहीं थी।
इसलिए मुहम्मद शाह का शासन दो बिल्कुल विपरीत छवियाँ छोड़ता है।
एक ओर—
संगीत,
चित्रकला,
कविता,
रंग,
नृत्य,
और जीवंत दिल्ली।
दूसरी ओर—
बिखरते प्रांत,
खाली होता केंद्रीय अधिकार,
मराठा विस्तार,
करनाल की हार,
दिल्ली का नरसंहार
और लुटता मुगल खजाना।
यही मुहम्मद शाह के काल का सबसे बड़ा विरोधाभास है—
दरबार जितना रंगीन होता गया, साम्राज्य का राजनीतिक नक्शा उतना ही फीका पड़ता गया।
1748 में उसकी मृत्यु के समय मुगल बादशाहत समाप्त नहीं हुई थी।
लेकिन मुगल साम्राज्य अब अखिल भारतीय सर्वोच्च सत्ता नहीं रहा था।
अगले शासक—