अहमद शाह बहादुर — 1748–1754
अब्दाली के आक्रमण, दरबारी गुटबाज़ी और मुगल सत्ता का और पतन
1748 में मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अहमद शाह बहादुर मुगल सिंहासन पर बैठा। लेकिन उसे जो साम्राज्य मिला, वह नाम मात्र में विशाल था और वास्तविकता में तेजी से बिखर चुका था। 1739 में नादिर शाह की दिल्ली लूट ने मुगल प्रतिष्ठा को गहरी चोट पहुँचा दी थी। बंगाल, अवध और हैदराबाद जैसे प्रांत लगभग स्वतंत्र हो चुके थे। मराठे मध्य और उत्तर भारत में फैल रहे थे। पंजाब में सिख शक्ति फिर उभर रही थी और उत्तर-पश्चिम से अहमद शाह अब्दाली का नया खतरा सामने था।
अहमद शाह बहादुर का शासन केवल छह वर्ष चला। इन छह वर्षों में मुगल बादशाह की व्यक्तिगत शक्ति और अधिक घट गई। वजीर, सेनापति, दरबारी गुट और प्रांतीय शासक वास्तविक राजनीति तय करने लगे। सफदरजंग, जावेद खान, इमाद-उल-मुल्क और मराठों जैसे शक्तिशाली तत्वों की राजनीति के बीच बादशाह स्वयं धीरे-धीरे प्रभावहीन होता गया।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
अहमद शाह बहादुर का जन्म 1725 में हुआ।
वह मुहम्मद शाह का पुत्र था।
उसकी माता कुदसिया बेगम थीं, जिन्हें दरबार में बड़ा प्रभाव प्राप्त था।
अहमद शाह ने युवावस्था में कोई विशेष सैन्य या प्रशासनिक क्षमता प्रदर्शित नहीं की थी।
जब 1748 में मुहम्मद शाह की मृत्यु हुई, वह लगभग 23 वर्ष का था।
उसे ऐसे समय सिंहासन मिला जब साम्राज्य को अत्यंत सक्रिय, अनुभवी और दृढ़ शासक की आवश्यकता थी।
लेकिन अहमद शाह बहादुर इस भूमिका के लिए तैयार नहीं था।
1748 : सिंहासनारोहण
अहमद शाह बहादुर मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद 1748 में गद्दी पर बैठा।
उस समय उत्तर-पश्चिमी सीमा पर अहमद शाह अब्दाली का दबाव था।
मुहम्मद शाह के अंतिम वर्ष में ही अब्दाली का पहला आक्रमण हो चुका था।
मुगल सेना ने उसे अस्थायी रूप से पीछे हटाया था।
लेकिन यह जीत स्थायी नहीं थी।
अब्दाली जल्द लौटने वाला था।
अहमद शाह अब्दाली कौन था?
अहमद शाह अब्दाली, जिसे आगे अहमद शाह दुर्रानी कहा गया, नादिर शाह की सेना का प्रमुख अफगान सेनानायक था।
1747 में नादिर शाह की हत्या के बाद उसने कंधार में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।
उसने अफगान दुर्रानी साम्राज्य की नींव रखी।
अब्दाली की महत्वाकांक्षा केवल अफगानिस्तान तक सीमित नहीं थी।
पंजाब और उत्तर-पश्चिम भारत की राजनीतिक कमजोरी उसे लगातार आकर्षित कर रही थी।
मुगल साम्राज्य की सीमा अब पहले जैसी सुरक्षित नहीं थी।
अब्दाली का पहला आक्रमण
1748 में अब्दाली भारत आया।
वह पंजाब की ओर बढ़ा।
मुगल सेना ने मनुपुर या सिरहिंद के निकट उसका सामना किया।
मुगल पक्ष को इस युद्ध में सफलता मिली और अब्दाली पीछे हट गया।
लेकिन इस विजय का बड़ा मूल्य चुकाना पड़ा।
मुगल सेना के प्रमुख सेनानायक और वजीर कमरुद्दीन खान युद्ध में मारे गए।
इससे दिल्ली की केंद्रीय राजनीति और कमजोर हुई।
क्या मुगल शक्ति अभी भी सक्षम थी?
1748 की सफलता यह दिखाती है कि मुगल सैन्य शक्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।
यदि नेतृत्व सक्षम होता और प्रांत सहयोग करते, तो साम्राज्य अभी भी कुछ बड़े आक्रमणों का सामना कर सकता था।
लेकिन समस्या थी—
एकीकृत कमान का अभाव,
दरबारी गुटबाजी,
वित्तीय कमजोरी,
और प्रांतीय स्वायत्तता।
इसलिए एक युद्ध जीतना संभव था, लेकिन लंबे समय तक सीमा सुरक्षित रखना कठिन।
सफदरजंग का उदय
अवध का नवाब सफदरजंग अहमद शाह बहादुर के शासन में अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति बना।
उसे वजीर नियुक्त किया गया।
सफदरजंग केवल मुगल अधिकारी नहीं था।
वह अवध का शक्तिशाली प्रांतीय शासक भी था।
यही नई मुगल राजनीति की विशेषता थी—
वजीर अब दिल्ली के नौकर मात्र नहीं रहे।
वे अपने स्वतंत्र राज्य, सेना और राजस्व आधार के साथ दरबार में आते थे।
अवध की बढ़ती स्वतंत्रता
सफदरजंग के पास अवध के संसाधन थे।
दिल्ली में वजीर होने के बावजूद उसकी प्राथमिक शक्ति अवध से आती थी।
इससे मुगल प्रशासन में एक नया विरोधाभास पैदा हुआ।
केंद्रीय सरकार को शक्तिशाली प्रांतीय शासक की मदद चाहिए थी।
लेकिन वही प्रांतीय शासक जितना मजबूत होता, दिल्ली उतनी निर्भर होती।
जावेद खान
अहमद शाह बहादुर के शासन में जावेद खान नामक दरबारी का प्रभाव भी बहुत बढ़ा।
वह शाही हरम और कुदसिया बेगम के निकट था।
धीरे-धीरे वह दरबार की नियुक्तियों और राजनीतिक निर्णयों में हस्तक्षेप करने लगा।
पुराने अमीर इस प्रभाव से अत्यंत नाराज थे।
जावेद खान की शक्ति मुगल दरबार की गिरती संस्थागत गरिमा का प्रतीक बन गई।
कुदसिया बेगम
अहमद शाह बहादुर की माता कुदसिया बेगम का शासन में बड़ा प्रभाव था।
वह शाही परिवार और दरबार की राजनीति में सक्रिय थीं।
लेकिन उनके चारों ओर बना गुट पुराने मुगल अमीरों को असहज करता था।
अहमद शाह बहादुर की व्यक्तिगत कमजोरी के कारण उनकी माता और उनके निकट लोगों का राजनीतिक प्रभाव और अधिक दिखाई देता है।
सफदरजंग बनाम जावेद खान
दरबार धीरे-धीरे दो प्रमुख गुटों में बंट गया।
एक ओर वजीर सफदरजंग।
दूसरी ओर जावेद खान और कुदसिया बेगम से जुड़ा शाही गुट।
दोनों के बीच तीखा संघर्ष हुआ।
इस संघर्ष का साम्राज्य पर गंभीर प्रभाव पड़ा क्योंकि प्रशासन की ऊर्जा बाहरी खतरों के बजाय भीतर की प्रतिद्वंद्विता में खर्च होने लगी।
अब्दाली का दूसरा आक्रमण
1749–1750 के आसपास अहमद शाह अब्दाली फिर भारत की ओर बढ़ा।
पंजाब की स्थिति कमजोर थी।
मुगल प्रशासन उसे निर्णायक रूप से रोकने की स्थिति में नहीं था।
अब्दाली ने सीमावर्ती क्षेत्रों पर दबाव बढ़ाया।
मुगल सरकार ने कई बार सैन्य युद्ध की बजाय धन और राजनीतिक समझौते के माध्यम से संकट टालने की कोशिश की।
यह उस बदली हुई वास्तविकता का संकेत था जिसमें दिल्ली अब उत्तर-पश्चिम की रक्षा के लिए पर्याप्त शक्ति जुटाने में कठिनाई महसूस कर रही थी।
पंजाब पर दबाव
पंजाब मुगल साम्राज्य और अफगानिस्तान के बीच सुरक्षा-कवच था।
यदि पंजाब कमजोर होता, तो दिल्ली का मार्ग खुल जाता।
लेकिन लाहौर और मुल्तान पर दिल्ली की पकड़ ढीली पड़ रही थी।
स्थानीय गवर्नर अपनी स्थिति बचाने के लिए कभी दिल्ली और कभी अब्दाली से समझौते कर रहे थे।
केंद्रीय सत्ता का कमजोर होना सीमावर्ती प्रांतों को स्वयं अपनी सुरक्षा नीति बनाने की ओर धकेल रहा था।
1752 : पंजाब का बड़ा नुकसान
अहमद शाह अब्दाली ने फिर पंजाब पर आक्रमण किया।
मुगल साम्राज्य उसे प्रभावी रूप से रोक नहीं सका।
1752 के आसपास हुए समझौते में पंजाब और मुल्तान पर अब्दाली की सर्वोच्चता स्वीकार करने की स्थिति बनी।
यह मुगल साम्राज्य के लिए बहुत बड़ा क्षेत्रीय और सामरिक नुकसान था।
अब उत्तर-पश्चिम की पुरानी मुगल सीमा टूट चुकी थी।
पंजाब खोने का अर्थ
पंजाब केवल भूमि नहीं था।
यह दिल्ली की पश्चिमी सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र था।
काबुल पहले ही मुगल नियंत्रण से निकल चुका था।
अब पंजाब पर भी अफगान प्रभाव बढ़ गया।
इससे दिल्ली बाहरी आक्रमणों के लिए और असुरक्षित हो गई।
आगे अहमद शाह अब्दाली बार-बार भारत आएगा और दिल्ली की राजनीति में हस्तक्षेप करेगा।
मराठा शक्ति का विस्तार
इसी समय मराठा शक्ति लगातार उत्तर की ओर बढ़ रही थी।
बाजीराव प्रथम की मृत्यु 1740 में हो चुकी थी।
उसके बाद बालाजी बाजीराव—नाना साहब पेशवा—के समय मराठा विस्तार जारी रहा।
मराठा प्रभाव मालवा, बुंदेलखंड, गुजरात और राजस्थान से दिल्ली की राजनीति तक पहुँच चुका था।
अब मुगल बादशाह कभी मराठों से लड़ता, कभी उन्हीं से सहायता मांगता।
मुगल-मराठा संबंधों का विरोधाभास
औरंगज़ेब ने मराठों को समाप्त करने के लिए दशकों युद्ध किया था।
अब स्थिति यह थी कि दिल्ली के वजीर और बादशाह अपने प्रतिद्वंद्वियों से निपटने के लिए मराठा सेना का सहारा लेने लगे।
यह मुगल शक्ति के पतन का अत्यंत स्पष्ट संकेत था।
मराठे अब विद्रोही नहीं, बल्कि उत्तर भारत की सत्ता-संतुलन की निर्णायक शक्ति बन रहे थे।
जाट शक्ति
भरतपुर क्षेत्र में जाट शक्ति भी बढ़ रही थी।
बदन सिंह और आगे सूरजमल ने मजबूत राज्य खड़ा किया।
जाटों ने आगरा-मथुरा क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाया।
मुगल केंद्र के लिए यह क्षेत्र कभी राजधानी के निकट का राजस्व क्षेत्र था।
अब वहीं स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्ति उभर रही थी।
महाराजा सूरजमल जल्द ही उत्तर भारतीय राजनीति के सबसे सक्षम शासकों में गिने जाने वाले थे।
सफदरजंग और जाट
सफदरजंग ने अपने राजनीतिक संघर्षों में जाटों और मराठों की सहायता ली।
यही तथ्य मुगल सत्ता की बदलती वास्तविकता दिखाता है।
वजीर स्वयं केंद्रीय मुगल सेना पर पूरी तरह निर्भर नहीं था।
वह क्षेत्रीय शक्तियों के साथ निजी राजनीतिक गठबंधन बना सकता था।
इससे सम्राट की भूमिका और कमजोर हुई।
रोहिल्ला शक्ति
उत्तर प्रदेश के रोहिलखंड क्षेत्र में अफगान रोहिल्ला सरदार भी मजबूत हो रहे थे।
अली मुहम्मद खान रोहिल्ला और उसके उत्तराधिकारी इस क्षेत्र में स्वतंत्र प्रभाव स्थापित कर चुके थे।
रोहिल्ले आगे अवध, मराठों और मुगल राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले थे।
इस प्रकार दिल्ली के चारों ओर कई नई राजनीतिक शक्तियाँ उभर रही थीं—
जाट,
रोहिल्ले,
मराठे,
अवध,
और अफगान।
सफदरजंग का संघर्ष
सफदरजंग का रोहिल्लों और बंगश अफगानों से संघर्ष हुआ।
उसने उनसे लड़ने के लिए जाट और मराठा सहायता ली।
युद्ध लंबा चला।
इस संघर्ष में विशाल संसाधन खर्च हुए।
दिल्ली की केंद्रीय सत्ता के बजाय क्षेत्रीय गठबंधन युद्ध का फैसला कर रहे थे।
जावेद खान की हत्या
1752 में सफदरजंग ने जावेद खान को मरवा दिया।
इससे दरबार की राजनीति और हिंसक हो गई।
जावेद खान का प्रभाव समाप्त हुआ, लेकिन इससे सफदरजंग की स्थिति स्थायी रूप से मजबूत नहीं हुई।
सम्राट और वजीर के बीच विश्वास टूट चुका था।
सफदरजंग का पतन
अहमद शाह बहादुर और उसकी माता के साथ सफदरजंग के संबंध बिगड़ गए।
1753 में उसे वजीर पद से हटा दिया गया।
उसने विद्रोही मुद्रा अपनाई।
दिल्ली के आसपास संघर्ष हुआ।
अंततः समझौते के बाद वह अवध लौट गया।
यह घटना फिर बताती है कि मुगल बादशाह अपने ही वजीर पर पूर्ण नियंत्रण नहीं रखता था।
और वजीर के पास स्वयं इतना बड़ा क्षेत्रीय आधार था कि पद से हटाए जाने के बाद भी वह स्वतंत्र शक्ति बना रह सकता था।
इमाद-उल-मुल्क का उदय
सफदरजंग के पतन के बाद गाजीउद्दीन खान फिरोज जंग द्वितीय तेजी से उभरा।
वह इतिहास में इमाद-उल-मुल्क के नाम से अधिक प्रसिद्ध है।
वह निजाम-उल-मुल्क का पौत्र था।
युवा होने के बावजूद अत्यंत महत्वाकांक्षी था।
उसने मराठों से संबंध बनाए और दिल्ली की राजनीति में प्रभाव बढ़ाया।
आगे वह स्वयं मुगल बादशाहों को बनाने और हटाने वाला सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बनने वाला था।
अहमद शाह बहादुर की व्यक्तिगत कमजोरी
अहमद शाह बहादुर को समकालीन और बाद के इतिहास में कमजोर, अनुभवहीन और शासन में कम रुचि रखने वाला बादशाह बताया गया है।
उसकी सबसे बड़ी समस्या यह नहीं थी कि वह केवल विलासी था।
वास्तविक समस्या थी कि उसमें अपने चारों ओर मौजूद शक्तिशाली गुटों को संतुलित करने की क्षमता नहीं थी।
वह कभी माता के गुट पर निर्भर हुआ।
कभी जावेद खान पर।
कभी सफदरजंग पर।
अंत में इमाद-उल-मुल्क और मराठों के सामने कमजोर पड़ गया।
1754 : सत्ता परिवर्तन
1754 तक इमाद-उल-मुल्क ने मराठा सहयोग के साथ दिल्ली की राजनीति पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
अहमद शाह बहादुर के विरुद्ध अभियान हुआ।
सम्राट के पास पर्याप्त स्वतंत्र सैन्य शक्ति नहीं थी।
उसे पदच्युत कर दिया गया।
इसके साथ उसका छह वर्ष का शासन समाप्त हो गया।
अंधा किया जाना
अहमद शाह बहादुर को केवल सिंहासन से हटाया नहीं गया।
उसे अंधा भी कर दिया गया।
उसकी माता कुदसिया बेगम को भी राजनीतिक रूप से निष्क्रिय कर दिया गया।
यह घटना फर्रुखसियर की पदच्युति की याद दिलाती है।
एक बार फिर मुगल सम्राट को उसके अपने अमीरों ने सत्ता से हटाकर शारीरिक रूप से अयोग्य बना दिया।
अब ऐसा होना असाधारण घटना नहीं रह गई थी।
आलमगीर द्वितीय सिंहासन पर
अहमद शाह बहादुर को हटाने के बाद इमाद-उल-मुल्क ने अजीजुद्दीन नामक एक वृद्ध मुगल राजकुमार को सिंहासन पर बैठाया।
वह “आलमगीर द्वितीय” के नाम से सम्राट बना।
नाम का चुनाव भी प्रतीकात्मक था।
“आलमगीर” औरंगज़ेब की उपाधि थी।
लेकिन नया आलमगीर अपने शक्तिशाली पूर्वज की तरह शक्तिशाली नहीं था।
वह इमाद-उल-मुल्क के नियंत्रण में रहने वाला प्रतीकात्मक बादशाह था।
अहमद शाह बहादुर का आगे का जीवन
सिंहासन से हटने के बाद अहमद शाह बहादुर ने लंबा जीवन बंदी अवस्था में बिताया।
वह राजनीतिक रूप से निष्क्रिय हो गया।
उसकी मृत्यु कई दशकों बाद हुई।
इस प्रकार उसका जीवन मुगल बादशाहत की विडंबना का प्रतीक बना—
जन्म से शहज़ादा,
युवा अवस्था में सम्राट,
और फिर अपने ही साम्राज्य में लगभग आजीवन बंदी।
क्या उसके शासन में मुगल साम्राज्य अभी मौजूद था?
नाम के स्तर पर—हाँ।
वास्तविक नियंत्रण के स्तर पर—बहुत सीमित।
दिल्ली और आसपास के कुछ क्षेत्र अभी मुगल प्रशासन से जुड़े थे।
लेकिन—
बंगाल स्वतंत्र नवाबी सत्ता था।
अवध स्वतंत्र था।
हैदराबाद स्वतंत्र था।
पंजाब पर अब्दाली का दबाव था।
मराठे मालवा और मध्य भारत में शक्तिशाली थे।
जाट भरतपुर में मजबूत थे।
रोहिल्ले उत्तर भारत में प्रभावशाली थे।
इसलिए “मुगल साम्राज्य” अब अखिल भारतीय शासन की तुलना में वैधानिक छत्र अधिक बनता जा रहा था।
बंगाल की स्थिति
अहमद शाह बहादुर के काल में बंगाल की नवाबी सत्ता दिल्ली से लगभग स्वतंत्र थी।
अलीवर्दी खान बंगाल के वास्तविक शासक थे।
उन्हें मराठा बर्गी आक्रमणों का लंबे समय तक सामना करना पड़ा।
दिल्ली बंगाल की रक्षा करने की स्थिति में नहीं थी।
यह तथ्य दिखाता है कि आर्थिक रूप से सबसे समृद्ध प्रांत अब केंद्रीय मुगल सुरक्षा से बाहर था।
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी
इस समय अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल में व्यापार बढ़ा रही थी।
1717 के फर्रुखसियर फरमान से मिले व्यापारिक विशेषाधिकार अभी महत्वपूर्ण थे।
लेकिन कंपनी अभी बंगाल की राजनीतिक सत्ता नहीं थी।
अलीवर्दी खान जैसे नवाबों के सामने कंपनी को स्थानीय नियमों और राजनीतिक सीमाओं का पालन करना पड़ता था।
1757 की प्लासी अभी तीन वर्ष दूर थी जब अहमद शाह बहादुर पदच्युत हुआ।
यानी दिल्ली की मुगल शक्ति के पतन और बंगाल में अंग्रेजी कंपनी के राजनीतिक उदय के बीच का अंतर अब बहुत छोटा रह गया था।
1748–1754 : प्रमुख समयरेखा
1748 — मुहम्मद शाह की मृत्यु; अहमद शाह बहादुर सिंहासन पर।
1748 — अहमद शाह अब्दाली का पहला बड़ा भारत आक्रमण; मनुपुर/सिरहिंद क्षेत्र में मुगल प्रतिरोध।
1748 — वजीर कमरुद्दीन खान की युद्ध में मृत्यु।
1748 के बाद — सफदरजंग का केंद्रीय राजनीति में उदय; वजीर नियुक्त।
1749–1750 — अब्दाली का पुनः उत्तर-पश्चिम पर दबाव।
1751–1752 — अब्दाली का पंजाब पर बड़ा आक्रमण।
1752 — पंजाब और मुल्तान पर मुगल नियंत्रण का गंभीर क्षरण; अफगान प्रभाव स्वीकार करना पड़ा।
1752 — सफदरजंग द्वारा जावेद खान की हत्या।
1752–1753 — सफदरजंग और दरबारी गुटों का संघर्ष।
1753 — सफदरजंग वजीर पद से हटाया गया; दिल्ली के निकट संघर्ष; बाद में अवध वापसी।
1753–1754 — इमाद-उल-मुल्क का तेजी से उदय।
1754 — इमाद-उल-मुल्क और मराठों ने अहमद शाह बहादुर को पदच्युत किया।
1754 — अहमद शाह बहादुर को अंधा किया गया।
1754 — अजीजुद्दीन आलमगीर द्वितीय के नाम से सिंहासन पर बैठाया गया।
अहमद शाह बहादुर की प्रमुख उपलब्धियाँ
उसके शासन में स्थायी उपलब्धियाँ बहुत सीमित थीं।
1748 में मुगल पक्ष ने अब्दाली के प्रथम आक्रमण को पीछे हटाने में सफलता प्राप्त की।
साम्राज्य की औपचारिक राजवंशीय निरंतरता बनी रही।
अवध और अन्य प्रांतीय शक्तियों के सहारे दिल्ली कुछ समय तक राजनीतिक संतुलन बनाए रख सकी।
लेकिन इन उपलब्धियों में सम्राट की व्यक्तिगत भूमिका सीमित थी।
उसकी प्रमुख विफलताएँ
केंद्रीय शासन पर नियंत्रण स्थापित नहीं कर सका।
माता और दरबारी गुटों पर अत्यधिक निर्भर रहा।
सफदरजंग और जावेद खान की प्रतिद्वंद्विता को नियंत्रित नहीं कर पाया।
पंजाब को अहमद शाह अब्दाली के दबाव से नहीं बचा सका।
मराठों के बढ़ते प्रभाव को रोक नहीं सका।
जाट और रोहिल्ला जैसी क्षेत्रीय शक्तियों को दिल्ली के अधीन नहीं ला सका।
इमाद-उल-मुल्क के उदय को नियंत्रित नहीं कर पाया।
अंततः स्वयं पदच्युत और अंधा कर दिया गया।
क्या वह केवल अयोग्य बादशाह था?
उसकी व्यक्तिगत कमजोरी स्पष्ट थी।
लेकिन उसके सामने परिस्थितियाँ भी असाधारण रूप से कठिन थीं।
उसके पास अकबर जैसा केंद्रीकृत प्रशासन नहीं था।
औरंगज़ेब जैसी सेना नहीं थी।
शाहजहाँ जैसा समृद्ध केंद्रीय खजाना नहीं था।
प्रांतों का राजस्व दिल्ली तक नियमित नहीं आता था।
अमीरों की अपनी सेनाएँ थीं।
मराठा और अफगान बाहरी दबाव थे।
इसलिए सक्षम शासक भी संकट में होता।
लेकिन अहमद शाह बहादुर की कमजोरी ने उस संकट को और तेज किया।
दिल्ली की बदलती स्थिति
अहमद शाह बहादुर के समय दिल्ली अब स्वयं एक संघर्ष-क्षेत्र बन चुकी थी।
वजीर,
दरबारी अमीर,
मराठे,
अफगान,
जाट—
सभी दिल्ली की राजनीति पर प्रभाव डाल सकते थे।
यह वही राजधानी थी जहां कभी अकबर और शाहजहाँ की इच्छा सर्वोच्च आदेश होती थी।
अब बादशाह स्वयं कभी एक अमीर और कभी दूसरे गुट की सुरक्षा पर निर्भर था।
सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन
इस काल का सबसे बड़ा परिवर्तन यह था कि मुगल बादशाह का नाम अभी भी राजनीतिक वैधता देता था—
लेकिन उसके पास उस वैधता को बलपूर्वक लागू करने की क्षमता बहुत कम बची थी।
यही कारण है कि शक्तिशाली अमीर बादशाह को हटाते नहीं थे और राजवंश खत्म नहीं करते थे।
वे किसी अन्य मुगल राजकुमार को गद्दी पर बैठाते थे।
उन्हें अभी भी मुगल नाम की वैधानिक प्रतिष्ठा चाहिए थी।
सत्ता उनका,
सिंहासन मुगल का।
यही 18वीं शताब्दी के मध्य की दिल्ली की राजनीतिक वास्तविकता बन गई।
निष्कर्ष
अहमद शाह बहादुर का शासन मुगल साम्राज्य के पतन की उस अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें सम्राट अब स्वयं सत्ता का स्वामी कम और सत्ता-संघर्ष का पुरस्कार अधिक बन चुका था।
1748 में वह युवा बादशाह के रूप में गद्दी पर बैठा।
उसे उत्तर-पश्चिम से अहमद शाह अब्दाली का खतरा मिला।
दरबार में सफदरजंग और जावेद खान की लड़ाई मिली।
अवध अपनी शक्ति के आधार पर दिल्ली से व्यवहार कर रहा था।
मराठे तेजी से उत्तर भारत में बढ़ रहे थे।
जाट और रोहिल्ले स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्तियाँ बन रहे थे।
और बंगाल दिल्ली से लगभग स्वतंत्र हो चुका था।
1752 तक पंजाब पर मुगल पकड़ गंभीर रूप से टूट गई।
1753 तक बादशाह अपने वजीर सफदरजंग के साथ संघर्ष में था।
1754 तक इमाद-उल-मुल्क मराठों के सहारे दिल्ली की वास्तविक सत्ता पर अधिकार कर चुका था।
और अंततः—
सम्राट को गद्दी से उतार दिया गया।
उसे अंधा कर दिया गया।
उसकी माता की राजनीतिक शक्ति समाप्त कर दी गई।
और दूसरे मुगल राजकुमार को उसकी जगह बैठा दिया गया।
यही इस काल का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है—
मुगल राजवंश अभी जीवित था, लेकिन मुगल साम्राज्य की स्वतंत्र केंद्रीय शक्ति तेजी से समाप्त हो रही थी।
और इस पतन का अगला चरण और अधिक नाटकीय होगा।