फर्रुखसियर — 1713–1719
सैयद बंधुओं का उदय, 1717 का अंग्रेजी कंपनी को फरमान और सम्राट का रक्तरंजित अंत
1713 में फर्रुखसियर मुगल सिंहासन पर बैठा, लेकिन उसकी सत्ता की नींव उसकी अपनी सैन्य शक्ति से अधिक सैयद बंधुओं के समर्थन पर टिकी हुई थी। यही तथ्य उसके पूरे शासन की दिशा निर्धारित करता है। वह सम्राट तो बन गया, पर शीघ्र ही उसे इस बात से बेचैनी होने लगी कि जिन लोगों ने उसे सिंहासन दिलाया था, वही उसके शासन पर अत्यधिक प्रभाव रखते हैं।
उसका शासन केवल छह वर्ष चला, किंतु इन छह वर्षों में तीन महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं।
पहली—सैयद बंधु दिल्ली की राजनीति में इतने शक्तिशाली हुए कि वे बादशाह बनाने और हटाने की स्थिति में पहुँच गए।
दूसरी—1717 में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापारिक सुविधाओं वाला एक महत्वपूर्ण शाही फरमान मिला, जिसने आगे बंगाल में कंपनी की स्थिति को मजबूत किया। आधुनिक शोध इसे कंपनी की व्यापारिक शक्ति बढ़ाने वाले निर्णायक दस्तावेजों में गिनता है।
तीसरी—1719 में फर्रुखसियर को पदच्युत कर अंधा किया गया और अंततः मार दिया गया। यह घटना मुगल बादशाह की गिरती प्रतिष्ठा का अत्यंत भयावह प्रतीक थी।
जन्म और वंश
फर्रुखसियर का जन्म 1685 में हुआ था।
वह अजीम-उश-शान का पुत्र था।
अजीम-उश-शान बहादुर शाह प्रथम का पुत्र और औरंगज़ेब का पौत्र था।
इस प्रकार फर्रुखसियर मुगल राजवंश की प्रत्यक्ष शाही शाखा से था।
उसके पिता अजीम-उश-शान बंगाल, बिहार और पूर्वी भारत की राजनीति में अत्यंत प्रभावशाली थे।
1712 में बहादुर शाह की मृत्यु के बाद जब उसके पुत्रों में उत्तराधिकार युद्ध हुआ, तब अजीम-उश-शान भी सिंहासन के प्रमुख दावेदारों में था।
लेकिन वह युद्ध में मारा गया।
जहांदार शाह विजयी हुआ।
यहीं से फर्रुखसियर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागी।
पिता की मृत्यु और सिंहासन का दावा
अजीम-उश-शान की मृत्यु के बाद फर्रुखसियर ने जहांदार शाह को वैध सम्राट के रूप में सहजता से स्वीकार नहीं किया।
उसके पास बंगाल और बिहार के संसाधनों तक कुछ पहुँच थी, लेकिन दिल्ली तक पहुँचने के लिए उसे शक्तिशाली सैन्य सहयोग की आवश्यकता थी।
यहीं दो महत्वपूर्ण व्यक्ति उसके साथ जुड़े—
सैयद अब्दुल्ला खान,
और सैयद हुसैन अली खान।
दोनों बारहा के प्रभावशाली सैयद परिवार से थे।
उनकी सैन्य प्रतिष्ठा मजबूत थी।
फर्रुखसियर ने उनके सहयोग से जहांदार शाह के विरुद्ध अभियान शुरू किया।
सैयद बंधु कौन थे?
बारहा के सैयद उत्तर भारत के पुराने सैनिक-अभिजात समुदाय से जुड़े थे।
वे स्वयं को पैगंबर मुहम्मद की वंश-परंपरा से जोड़ते थे और मुगल सेना में लंबे समय से प्रभावशाली थे।
अब्दुल्ला खान राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से कुशल था।
हुसैन अली खान अधिक सक्रिय सैन्य नेता था।
दोनों भाइयों की संयुक्त शक्ति ने उन्हें मुगल दरबार के सबसे प्रभावशाली गुटों में बदल दिया।
फर्रुखसियर उनके लिए केवल एक राजकुमार नहीं था।
वह ऐसा उम्मीदवार था जिसके माध्यम से वे दिल्ली की सत्ता में निर्णायक स्थान प्राप्त कर सकते थे।
जहांदार शाह के विरुद्ध अभियान
फर्रुखसियर और सैयद बंधुओं ने बिहार और बंगाल से अपनी शक्ति संगठित की।
जहांदार शाह की ओर से जुल्फिकार खान शासन का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति था।
इस प्रकार संघर्ष केवल दो राजकुमारों का नहीं था।
एक ओर—
जहांदार शाह और जुल्फिकार खान।
दूसरी ओर—
फर्रुखसियर और सैयद बंधु।
यानी मुगल सिंहासन अब शक्तिशाली कुलीन गुटों की प्रतिद्वंद्विता का केंद्र बन चुका था।
1713 : जहांदार शाह की पराजय
जनवरी 1713 में फर्रुखसियर की सेना ने जहांदार शाह की सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया।
जहांदार शाह दिल्ली भागा।
लेकिन उसे पकड़ लिया गया।
कुछ समय बाद उसकी हत्या कर दी गई।
जुल्फिकार खान को भी समाप्त कर दिया गया।
इसके बाद फर्रुखसियर दिल्ली पहुँचा और मुगल सम्राट बना।
लेकिन जिस क्षण वह सिंहासन पर बैठा, उसी क्षण उसकी एक राजनीतिक समस्या जन्म ले चुकी थी—
उसे पता था कि वह अपने बल पर बादशाह नहीं बना था।
सैयद बंधुओं को पुरस्कार
सिंहासन प्राप्त करने के बाद फर्रुखसियर को अपने समर्थकों को बड़ी शक्तियाँ देनी पड़ीं।
सैयद अब्दुल्ला खान को वजीर बनाया गया।
हुसैन अली खान को मीर बख्शी बनाया गया और बाद में दक्कन की जिम्मेदारियाँ भी दी गईं।
दोनों भाइयों के पास सेना, नियुक्ति और प्रशासन पर भारी प्रभाव आ गया।
यह स्थिति फर्रुखसियर के लिए शीघ्र ही असहज होने लगी।
उसे भय था कि जिसने उसे बनाया है, वह उसे हटा भी सकता है।
और अंततः यही हुआ।
सम्राट और सैयद बंधुओं के बीच अविश्वास
फर्रुखसियर का शासन धीरे-धीरे षड्यंत्रों से भर गया।
सम्राट सैयद बंधुओं की शक्ति कम करना चाहता था।
सैयद बंधु सम्राट के इरादों से सावधान थे।
दरबार में अलग-अलग गुट बनने लगे।
कुछ अमीर सम्राट को सैयद बंधुओं से मुक्त करना चाहते थे।
कुछ सैयद बंधुओं से जुड़े थे।
इस वातावरण में प्रशासनिक निर्णय व्यक्तिगत अविश्वास और सत्ता-संघर्ष से प्रभावित होने लगे।
फर्रुखसियर की राजनीतिक कमजोरी
फर्रुखसियर की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वह स्वतंत्र शक्ति केंद्र तैयार नहीं कर पाया।
वह सैयद बंधुओं को हटाना चाहता था, लेकिन उसके पास ऐसी विश्वसनीय सेना या अमीरों का स्थायी गुट नहीं था जो उनके बराबर खड़ा हो सके।
वह कभी एक दरबारी को आगे बढ़ाता।
फिर दूसरे को।
कभी गुप्त आदेश देता।
कभी समझौता करता।
इस अस्थिर व्यवहार से उसके प्रति विश्वास और घटता गया।
राजपूत संबंध
फर्रुखसियर के शासन में राजपूत राजनीति भी महत्वपूर्ण रही।
मारवाड़ के महाराजा अजित सिंह शक्तिशाली हो चुके थे।
मुगल केंद्र की कमजोरी का लाभ उठाकर वे अपनी स्थिति मजबूत कर रहे थे।
फर्रुखसियर ने प्रारंभ में उन पर दबाव डाला।
बाद में समझौता हुआ।
राजनीतिक संबंध मजबूत करने के लिए फर्रुखसियर का विवाह अजित सिंह की पुत्री से कराया गया।
यह विवाह मुगल-राजपूत संबंधों में उस पुरानी परंपरा का नया उदाहरण था जिसे अकबर के समय विकसित किया गया था।
लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल चुकी थीं।
यह संबंध शक्तिशाली सम्राट द्वारा अधीनस्थ राजपूत शासक को साथ लेने की नीति से अधिक एक कमजोर केंद्र द्वारा प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्ति से समझौते जैसा था।
अजित सिंह और मुगल दरबार
महाराजा अजित सिंह केवल मारवाड़ के शासक नहीं रहे थे।
वे 18वीं शताब्दी की शुरुआत में दिल्ली की राजनीति में सक्रिय शक्ति बन रहे थे।
फर्रुखसियर के साथ उनका संबंध कभी सहयोगी, कभी तनावपूर्ण रहा।
यही प्रवृत्ति बताती है कि राजपूत राज्य अब मुगल केंद्र पर पहले की तरह निर्भर नहीं थे।
वे अपने हितों के आधार पर दिल्ली से संबंध तय कर रहे थे।
सिख प्रश्न
फर्रुखसियर के शासन में बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व वाला सिख संघर्ष जारी था।
बहादुर शाह प्रथम बंदा सिंह को पूरी तरह पराजित नहीं कर पाया था।
पंजाब में सिख लड़ाके छापामार और संगठित दोनों प्रकार की लड़ाई जारी रखे हुए थे।
मुगल राज्य के लिए यह केवल धार्मिक प्रश्न नहीं रहा था।
यह क्षेत्रीय राजनीतिक और सैन्य चुनौती बन चुका था।
बंदा सिंह बहादुर के विरुद्ध अभियान
फर्रुखसियर के शासन में मुगल प्रशासन ने सिख प्रतिरोध को दबाने के लिए बड़े अभियान चलाए।
पंजाब में सिखों के ठिकानों पर दबाव बढ़ाया गया।
1715 में बंदा सिंह बहादुर और उनके साथियों को गुरदास नंगल क्षेत्र में घेर लिया गया।
लंबी घेराबंदी के बाद वे पकड़े गए।
उन्हें बड़ी संख्या में सिख बंदियों के साथ दिल्ली लाया गया।
1716 : बंदा सिंह बहादुर का मृत्युदंड
1716 में दिल्ली में बंदा सिंह बहादुर और उनके अनेक साथियों को मृत्युदंड दिया गया।
सिख परंपरा में इस प्रसंग को अत्यंत क्रूर दमन के रूप में स्मरण किया जाता है।
बंदा सिंह की मृत्यु के बावजूद सिख शक्ति समाप्त नहीं हुई।
बल्कि मुगल दमन और निरंतर संघर्ष ने सिख समुदाय में स्वतंत्र सैन्य-राजनीतिक संगठन को और मजबूत किया।
आगे 18वीं शताब्दी में मिसलों और फिर महाराजा रणजीत सिंह के राज्य तक यही प्रक्रिया विकसित होने वाली थी।
मराठा प्रश्न
दक्कन में मराठा शक्ति अब औरंगज़ेब के समय वाली छापामार चुनौती से आगे बढ़ चुकी थी।
शाहू छत्रपति के रूप में स्थापित हो रहे थे।
ताराबाई का गुट भी मौजूद था।
पेशवा पद का महत्व बढ़ने लगा था।
दिल्ली के कमजोर होते केंद्र के सामने मराठों की सबसे बड़ी मांग चौथ और सरदेशमुखी के अधिकारों को मान्यता दिलाना थी।
सैयद हुसैन अली और दक्कन
सैयद हुसैन अली खान को दक्कन भेजा गया।
यह नियुक्ति स्वयं फर्रुखसियर की राजनीति का हिस्सा थी।
सम्राट संभवतः उसे दिल्ली से दूर रखना चाहता था।
लेकिन इसका परिणाम उलटा हुआ।
दक्कन जाकर हुसैन अली खान ने मराठों से संबंध विकसित किए।
यह संबंध आगे स्वयं फर्रुखसियर के विरुद्ध निर्णायक होने वाला था।
शाहू और सैयद बंधुओं का समझौता
सैयद हुसैन अली खान ने मराठों से समझौता किया।
शाहू के पक्ष को मुगल मान्यता देने और चौथ तथा सरदेशमुखी जैसे अधिकारों पर समझौते की दिशा बनी।
बदले में मराठा सेना सैयद बंधुओं को सैन्य सहयोग दे सकती थी।
यह घटना अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
एक समय मराठों को समाप्त करने के लिए औरंगज़ेब ने अपना जीवन दक्कन में बिता दिया था।
अब मुगल साम्राज्य का शक्तिशाली वजीर-गुट उसी मराठा सेना का उपयोग मुगल बादशाह के विरुद्ध करने जा रहा था।
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी और फर्रुखसियर
फर्रुखसियर के शासन का सबसे दूरगामी आर्थिक प्रसंग 1717 का शाही फरमान था।
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में लगभग एक शताब्दी से व्यापार कर रही थी।
सूरत, मद्रास और बंगाल में उसकी उपस्थिति बढ़ चुकी थी।
लेकिन वह अभी राजनीतिक रूप से मुगल साम्राज्य के अधीन व्यापारिक संस्था थी।
उसे व्यापारिक अधिकारों और कर-रियायतों के लिए मुगल शासकों तथा प्रांतीय अधिकारियों की स्वीकृति चाहिए होती थी।
1717 का फरमान
1717 में फर्रुखसियर ने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक महत्वपूर्ण फरमान जारी किया।
इससे कंपनी की बंगाल सहित मुगल साम्राज्य के कुछ क्षेत्रों में व्यापारिक सुविधाएँ काफी बढ़ीं। आधुनिक कैम्ब्रिज शोध इसे कंपनी को मिला महत्वपूर्ण शुल्क-मुक्त व्यापारिक अधिकार बताता है।
कंपनी को अपने व्यापारिक माल के लिए विशेष दस्तावेजों—दस्तक—के आधार पर शुल्क संबंधी सुविधा मिली।
बंगाल में कंपनी को सालाना निश्चित भुगतान के बदले व्यापक व्यापारिक रियायतें मिलीं।
कंपनी को कलकत्ता के आसपास अतिरिक्त गाँव किराए पर लेने या अधिकार बढ़ाने की सुविधा भी मिली।
गुजरात और दक्कन से जुड़े कुछ पुराने व्यापारिक अधिकारों की पुष्टि भी हुई।
क्या 1717 में अंग्रेजों को बंगाल कर-मुक्त दे दिया गया था?
नहीं।
यह बहुत महत्वपूर्ण सावधानी है।
फरमान ने अंग्रेजी कंपनी को बंगाल का शासन नहीं दिया।
न उसे दीवानी मिली।
न भू-राजस्व संग्रह का अधिकार मिला।
न राजनीतिक संप्रभुता।
वह अभी भी एक व्यापारिक कंपनी थी और मुगल राजनीतिक व्यवस्था के भीतर कार्य कर रही थी।
1765 में शाह आलम द्वितीय से प्राप्त दीवानी अधिकार बिल्कुल अलग घटना थी।
1717 के फरमान को सीधे “अंग्रेजों को बंगाल सौंप देना” कहना गलत होगा।
फिर 1717 का फरमान इतना महत्वपूर्ण क्यों था?
क्योंकि उसने कंपनी को अपने व्यापार की लागत और स्थानीय करों पर बड़ी सुविधा दी।
इससे बंगाल में उसकी व्यापारिक स्थिति मजबूत हुई।
कंपनी के कर्मचारियों ने आगे इन सुविधाओं की व्यापक व्याख्या की।
स्थानीय बंगाली अधिकारियों और कंपनी के बीच इस बात पर विवाद होने लगे कि किन वस्तुओं पर शुल्क देना चाहिए और किन पर नहीं।
आगे बंगाल के नवाबों ने शिकायत की कि कंपनी अपने विशेषाधिकारों का दुरुपयोग कर रही है।
1730 के दशक तक बंगाल के नवाब शुजा खान को भी कंपनी के इन अधिकारों के बढ़ते प्रभाव पर चिंता थी। कैम्ब्रिज के हालिया अध्ययन में स्पष्ट है कि उन्होंने 1717 के शुल्क-मुक्त व्यापारिक फरमान को बंगाल में कंपनी की बढ़ती जड़ें मजबूत करने वाला अधिकार माना।
अंग्रेजी कंपनी ने यह फरमान कैसे प्राप्त किया?
अंग्रेजों ने मुगल दरबार में एक प्रतिनिधिमंडल भेजा।
इसे प्रायः जॉन सरमन के नेतृत्व वाली दूत-मंडली से जोड़ा जाता है।
दरबार में लंबी बातचीत हुई।
एक लोकप्रिय कथा यह भी है कि अंग्रेज चिकित्सक विलियम हैमिल्टन ने फर्रुखसियर की बीमारी का सफल उपचार किया और इसके पुरस्कारस्वरूप कंपनी को सुविधाएँ मिलीं।
इस कथा का उल्लेख बार-बार मिलता है, लेकिन 1717 के फरमान को केवल “डॉक्टर ने इलाज किया, इसलिए व्यापारिक अधिकार मिल गए” जैसी सरल कहानी में बदलना उचित नहीं।
दरबारी कूटनीति, उपहार, लंबे व्यापारिक संबंध और कंपनी की बातचीत—सभी महत्वपूर्ण थे।
फरमान और भविष्य की अंग्रेजी शक्ति
1717 में किसी ने यह नहीं सोचा था कि यही कंपनी आगे बंगाल की राजनीतिक शक्ति बनेगी।
उस समय अंग्रेजी कंपनी मुगल व्यवस्था के भीतर कानूनी अधिकार चाहती थी और मुगल फरमान को अपनी वैधता का आधार मानती थी। कैम्ब्रिज के शोध में भी दिखाया गया है कि कंपनी लंबे समय तक अपनी एशियाई गतिविधियों के लिए मुगल अनुमति और फरमान की वैधानिकता पर निर्भर रही।
1757 की प्लासी और 1765 की दीवानी के बाद ही स्थिति मूल रूप से बदली।
इसलिए 1717 का फरमान अंग्रेजी राज की स्थापना नहीं था—
लेकिन वह कंपनी की बढ़ती आर्थिक शक्ति की महत्वपूर्ण सीढ़ी अवश्य था।
बंगाल का बदलता प्रशासन
फर्रुखसियर के समय बंगाल में मुर्शिद कुली खान की शक्ति बहुत बढ़ चुकी थी।
उसने राजस्व व्यवस्था को अत्यंत कठोर और कुशल ढंग से संगठित किया।
मुर्शिदाबाद बंगाल की राजनीतिक और वित्तीय राजधानी के रूप में उभरा।
दिल्ली से औपचारिक निष्ठा बनी रही, लेकिन बंगाल का वास्तविक प्रशासन धीरे-धीरे स्थानीय नवाबी सत्ता के हाथ में केंद्रित होने लगा।
यह मुगल साम्राज्य के विघटन का नया रूप था।
प्रांत सीधे विद्रोह कर स्वतंत्र घोषित नहीं हो रहे थे।
वे बादशाह का नाम स्वीकार करते हुए व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र होते जा रहे थे।
हैदराबाद और निजाम-उल-मुल्क
फर्रुखसियर काल में चिन किलिच खान—आगे निजाम-उल-मुल्क आसफ जाह—का प्रभाव भी बढ़ रहा था।
वह मुगल साम्राज्य के सबसे सक्षम अमीरों में था।
दरबार की गुटबाजी से उसका संघर्ष रहा।
आगे मुहम्मद शाह के शासन में वह दक्कन जाकर हैदराबाद की लगभग स्वतंत्र आसफजाही सत्ता स्थापित करेगा।
इस प्रकार फर्रुखसियर के समय कई ऐसे व्यक्ति सक्रिय थे जो आगे मुगल साम्राज्य से निकलने वाले उत्तराधिकारी राज्यों की नींव रखने वाले थे।
सैयद बंधुओं और फर्रुखसियर के बीच खुला संघर्ष
समय बीतने के साथ फर्रुखसियर ने सैयद बंधुओं से छुटकारा पाने की कई कोशिशें कीं।
उसने अन्य अमीरों को उनके विरुद्ध उकसाया।
गुप्त गठबंधन बनाए।
हुसैन अली को दक्कन भेजकर दूर करने का प्रयास किया।
अब्दुल्ला खान को अलग-थलग करने की कोशिश की।
लेकिन वह प्रत्येक योजना में सफल नहीं हुआ।
सैयद बंधु भी उसके इरादों से परिचित थे।
अविश्वास अब खुले संघर्ष में बदल रहा था।
सैयद बंधुओं का जवाब
हुसैन अली दक्कन में मराठों से समझौता कर चुका था।
उसने अपने लिए सैन्य समर्थन तैयार किया।
फिर वह उत्तर भारत की ओर बढ़ा।
सैयद अब्दुल्ला खान दिल्ली में राजनीतिक मोर्चा संभाले हुए था।
दोनों भाइयों ने तय किया कि फर्रुखसियर अब उनके लिए विश्वसनीय सम्राट नहीं रहा।
जिस बादशाह को उन्होंने बनाया था, उसे हटाने की तैयारी शुरू हुई।
मराठा सेना का दिल्ली आना
इस प्रसंग का प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा था।
मराठा सैनिक सैयद हुसैन अली के साथ उत्तर भारत की ओर आए।
औरंगज़ेब ने जिन मराठों को कुचलने में दशकों लगाए थे, वही मराठा अब दिल्ली की मुगल उत्तराधिकार राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।
यह मुगल केंद्रीय सत्ता की गिरती शक्ति का स्पष्ट संकेत था।
1719 : दिल्ली में संकट
फरवरी 1719 तक स्थिति निर्णायक हो गई।
सैयद बंधुओं और उनके समर्थकों ने दिल्ली पर राजनीतिक तथा सैन्य दबाव बढ़ा दिया।
महल के भीतर संघर्ष और तनाव हुआ।
फर्रुखसियर ने प्रतिरोध की कोशिश की।
लेकिन उसके समर्थकों की संख्या कम पड़ गई।
अंततः उसे शाही महल से पकड़ लिया गया।
फर्रुखसियर की पदच्युति
1719 में सैयद बंधुओं ने फर्रुखसियर को सिंहासन से हटा दिया।
एक मुगल बादशाह को उसके अपने वजीर और सैन्य अधिकारियों द्वारा इस तरह पदच्युत करना असाधारण घटना थी।
इसका प्रतीकात्मक प्रभाव बहुत गहरा था।
बादशाह अब ईश्वर प्रदत्त अथवा निर्विवाद शाही शक्ति का केंद्र नहीं दिखाई देता था।
वह दरबारी राजनीति में हटाया जा सकने वाला व्यक्ति बन चुका था।
अंधा किया जाना
पदच्युति के बाद फर्रुखसियर को अंधा कर दिया गया।
मध्यकालीन और प्रारंभिक आधुनिक राजवंशीय राजनीति में किसी संभावित शासक को शारीरिक रूप से अयोग्य बनाना सत्ता से स्थायी रूप से हटाने का एक तरीका माना जाता था।
लेकिन सैयद बंधुओं ने केवल इतना ही पर्याप्त नहीं समझा।
फर्रुखसियर जीवित रहता तो उसके नाम पर विद्रोह खड़ा किया जा सकता था।
इसलिए उसका अंत और अधिक क्रूर हुआ।
फर्रुखसियर की हत्या
अप्रैल 1719 में फर्रुखसियर की हत्या कर दी गई।
उसके अंतिम समय के विवरण अलग-अलग स्रोतों में भिन्न हैं और अत्यंत हिंसक हैं।
लेकिन मूल तथ्य स्पष्ट है—
उसे अपदस्थ किया गया,
अंधा किया गया,
और फिर मार दिया गया।
यह मुगल सम्राट की प्रतिष्ठा के पतन का वह दृश्य था जिसकी कल्पना अकबर, शाहजहाँ या औरंगज़ेब के समय कठिन थी।
क्या सैयद बंधु अब वास्तविक शासक थे?
1719 तक उनकी शक्ति अपने चरम पर थी।
फर्रुखसियर हट चुका था।
अब वे ऐसा सम्राट चाहते थे जो उन पर निर्भर रहे।
उन्होंने राजवंश के दूसरे सदस्यों में से नए बादशाह चुने।
कुछ ही महीनों में दिल्ली की गद्दी बार-बार बदली।
यही कारण है कि उन्हें इतिहास में “किंगमेकर” अर्थात—
बादशाह निर्माता
कहा गया।
रफी-उद-दराजात
फर्रुखसियर को हटाने के बाद सैयद बंधुओं ने रफी-उद-दराजात को सिंहासन पर बैठाया।
वह युवा और बीमार था।
वास्तविक सत्ता सैयद बंधुओं के हाथ में रही।
कुछ ही महीनों में उसकी मृत्यु हो गई।
शाहजहाँ द्वितीय
इसके बाद रफी-उद-दौला को शाहजहाँ द्वितीय के नाम से सिंहासन पर बैठाया गया।
उसका शासन भी बहुत छोटा रहा।
उसकी भी शीघ्र मृत्यु हो गई।
इन घटनाओं ने मुगल गद्दी की प्रतिष्ठा को और कमजोर कर दिया।
मुहम्मद शाह का मार्ग
1719 के अंत में सैयद बंधुओं ने रोशन अख्तर को मुगल सम्राट बनाया।
यही आगे मुहम्मद शाह “रंगीला” कहलाया।
वह लंबे समय तक शासन करेगा—1719 से 1748 तक।
लेकिन इसी काल में नादिर शाह दिल्ली पर आक्रमण करेगा और मुगल साम्राज्य की शक्ति को विनाशकारी आघात लगेगा।
सैयद बंधुओं की नीति
सैयद बंधुओं को केवल व्यक्तिगत षड्यंत्रकारी समझना पर्याप्त नहीं है।
वे साम्राज्य को चलाने के लिए राजपूत, मराठा और अन्य शक्तियों से समझौते की नीति अपनाना चाहते थे।
उनके सामने वास्तविक प्रश्न था—
कमजोर केंद्र इतने विशाल साम्राज्य को बल से कैसे संभाले?
उनका उत्तर था—
राजनीतिक साझेदारी और क्षेत्रीय शक्तियों को अधिकार देना।
लेकिन इससे मुगल अमीरों के दूसरे गुटों को भय था कि सैयद बंधु स्वयं स्थायी रूप से सत्ता पर कब्जा कर लेंगे।
धार्मिक नीति
फर्रुखसियर के शासन को धार्मिक दृष्टि से औरंगज़ेब की सीधी निरंतरता मानना उचित नहीं।
दरबार का मुख्य संघर्ष इस अवधि में धार्मिक सिद्धांत की तुलना में सत्ता और अमीर गुटों के बीच था।
राजपूतों से वैवाहिक समझौते हुए।
हिंदू अधिकारी प्रशासन में रहे।
मराठों से राजनीतिक समझौते हुए।
लेकिन पंजाब में सिखों के विरुद्ध अत्यंत कठोर दमन भी हुआ।
इससे स्पष्ट है कि राजनीतिक चुनौती के आधार पर नीति बदलती थी।
फर्रुखसियर का व्यक्तित्व
फर्रुखसियर के समकालीन और बाद के विवरण उसे संदेहशील, अस्थिर और निर्णय लेने में कमजोर शासक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
उसमें महत्वाकांक्षा बहुत थी।
वह सैयद बंधुओं के नियंत्रण से मुक्त होना चाहता था।
लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रभावी संगठन में अंतर था।
वह विरोधियों के विरुद्ध योजनाएँ बनाता रहा, लेकिन उन्हें सफलतापूर्वक पूरा नहीं कर सका।
इससे उसके सहयोगी भी उस पर भरोसा खोते गए।
क्या वह पूरी तरह कठपुतली था?
नहीं।
फर्रुखसियर ने स्वतंत्र रूप से शासन करने की लगातार कोशिश की।
यदि वह कठपुतली मात्र होता, तो सैयद बंधुओं से उसका इतना गंभीर संघर्ष नहीं होता।
समस्या यह थी कि उसकी स्वतंत्र होने की इच्छा उसकी वास्तविक शक्ति से बड़ी थी।
यही विरोधाभास अंततः उसकी मृत्यु का कारण बना।
1717 के फरमान पर ऐतिहासिक सावधानी
बाद के ब्रिटिश इतिहासलेखन ने 1717 के फरमान को कभी-कभी कंपनी के लिए लगभग “मैग्ना कार्टा” जैसा निर्णायक दस्तावेज बताया।
इस उपमा का उपयोग सावधानी से करना चाहिए।
फरमान महत्वपूर्ण था।
इसने कंपनी को विशेष व्यापारिक सुविधाएँ दीं।
लेकिन 1717 में कंपनी संप्रभु शक्ति नहीं बनी।
वह मुगल साम्राज्य की वैधानिक संरचना के भीतर विशेषाधिकार प्राप्त व्यापारी संस्था थी।
कैम्ब्रिज के आधुनिक शोध में भी 1717 की व्यवस्था को मुगल बादशाह से प्राप्त व्यापारिक अधिकार के रूप में ही देखा गया है; कंपनी स्वयं लंबे समय तक मुगल अनुमति को अपनी वैधता का आधार बनाती रही।
लेकिन आगे इसका दुरुपयोग क्यों महत्वपूर्ण हुआ?
कंपनी के अधिकारी व्यापारिक दस्तकों का उपयोग केवल आधिकारिक कंपनी माल तक सीमित रखने के बजाय निजी व्यापार में भी करने लगे।
इससे बंगाल सरकार की सीमा-शुल्क आय प्रभावित होती थी।
स्थानीय भारतीय व्यापारी शुल्क देते थे जबकि कंपनी से जुड़े व्यापारी विशेषाधिकार का दावा कर सकते थे।
यही असमानता आगे बंगाल के नवाबों और कंपनी के बीच बड़े विवाद का कारण बनी।
इसलिए 1717 का फरमान अपने समय में व्यापारिक सुविधा था—
लेकिन आगे सत्ता-संघर्ष में आर्थिक हथियार बन गया।
1713–1719 : प्रमुख समयरेखा
जनवरी 1713 — जहांदार शाह की पराजय।
1713 — फर्रुखसियर मुगल सम्राट बना।
1713 — सैयद अब्दुल्ला खान वजीर और हुसैन अली खान मीर बख्शी बना।
1713–1715 — सम्राट और सैयद बंधुओं के बीच शक्ति-संघर्ष बढ़ा।
1715 — बंदा सिंह बहादुर गुरदास नंगल की घेराबंदी के बाद पकड़े गए।
1716 — बंदा सिंह बहादुर और बड़ी संख्या में सिख बंदियों को दिल्ली में मृत्युदंड।
1717 — अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को फर्रुखसियर का महत्वपूर्ण व्यापारिक फरमान।
1717–1718 — सैयद हुसैन अली खान की दक्कन में भूमिका; मराठों से संपर्क और समझौते।
1718–1719 — फर्रुखसियर द्वारा सैयद बंधुओं की शक्ति तोड़ने की असफल कोशिशें।
1719 — सैयद हुसैन अली मराठा सहयोग के साथ उत्तर की ओर बढ़ा।
फरवरी 1719 — दिल्ली में सैयद बंधुओं का निर्णायक दबाव; फर्रुखसियर पदच्युत।
1719 — फर्रुखसियर को अंधा किया गया।
अप्रैल 1719 — फर्रुखसियर की हत्या।
1719 — रफी-उद-दराजात सिंहासन पर।
1719 — उसके बाद शाहजहाँ द्वितीय।
सितंबर 1719 — मुहम्मद शाह सिंहासन पर; सैयद बंधुओं का प्रभाव चरम पर।
फर्रुखसियर की प्रमुख उपलब्धियाँ
उसने जहांदार शाह को पराजित कर मुगल सिंहासन प्राप्त किया।
उसके शासन में बंगाल और अन्य प्रांतों की प्रशासनिक व्यवस्था अभी औपचारिक रूप से मुगल वैधता के भीतर रही।
1717 का फरमान भारतीय और वैश्विक व्यापार इतिहास की महत्वपूर्ण घटना बना।
सिख विद्रोह के विरुद्ध मुगल प्रशासन ने बंदा सिंह बहादुर को पकड़ने में सफलता प्राप्त की।
राजपूत शक्तियों से समझौते के माध्यम से संबंध बनाए रखने का प्रयास हुआ।
लेकिन इनमें से अधिकांश उपलब्धियाँ सम्राट की व्यक्तिगत शक्ति से अधिक उसके अधिकारियों और शक्तिशाली अमीरों की कार्रवाइयों से जुड़ी थीं।
उसकी प्रमुख विफलताएँ
सैयद बंधुओं के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सका।
अपने विश्वसनीय राजनीतिक गुट का निर्माण नहीं कर पाया।
दरबार को लगातार षड्यंत्रों में उलझाए रखा।
राजपूत, मराठा और प्रांतीय शक्तियों पर पुराने मुगल स्तर का नियंत्रण स्थापित नहीं कर सका।
सैयद हुसैन अली को दक्कन भेजकर कमजोर करने की उसकी योजना उलटी पड़ी।
मराठा सैन्य सहयोग सैयद बंधुओं को प्राप्त हो गया।
अंततः वह स्वयं अपनी राजधानी में पकड़ा गया, अंधा किया गया और मार दिया गया।
फर्रुखसियर की हत्या इतनी महत्वपूर्ण क्यों थी?
मुगल राजवंश में शासकों की हत्या नई बात नहीं थी।
भाइयों और राजकुमारों को पहले भी मारा गया था।
लेकिन यहां अंतर यह था—
फर्रुखसियर विधिवत शासन कर रहा सम्राट था।
और उसे किसी प्रतिद्वंद्वी राजकुमार ने खुले युद्ध में नहीं हराया।
उसे उसके अपने शक्तिशाली अमीरों ने हटाया।
यही घटना बताती है कि शाही सत्ता की प्रकृति बदल चुकी थी।
अब वजीर बादशाह का अधिकारी मात्र नहीं था।
वह बादशाह का निर्माता और विनाशक भी बन सकता था।
जहांदार शाह से फर्रुखसियर तक : दोहराता पैटर्न
जहांदार शाह जुल्फिकार खान के सहयोग से सत्ता में आया।
फर्रुखसियर सैयद बंधुओं के सहयोग से।
जहांदार शाह ने जुल्फिकार खान पर निर्भरता दिखाई।
फर्रुखसियर ने सैयद बंधुओं से मुक्त होने की कोशिश की।
दोनों का अंत हिंसक हुआ।
इससे स्पष्ट हो गया कि मुगल संकट केवल “कमजोर बादशाह” का संकट नहीं था।
समस्या उस राजनीतिक व्यवस्था में आ गई थी जिसमें शक्तिशाली अमीरों की निजी सेनाएँ और प्रांतीय संसाधन केंद्रीय राजसत्ता को चुनौती देने लगे थे।
अंग्रेजी कंपनी की दृष्टि से उसका शासन
फर्रुखसियर को अंग्रेजी कंपनी के इतिहास में मुख्यतः 1717 के फरमान के कारण याद किया जाता है।
लेकिन एक गहरी ऐतिहासिक विडंबना है।
1717 में कंपनी मुगल बादशाह से विशेषाधिकार मांग रही थी।
वह शाही दस्तावेज को अपने व्यापार की कानूनी सुरक्षा मानती थी।
1757 में वही कंपनी बंगाल के नवाब को युद्ध में हराएगी।
1765 में वही कंपनी मुगल बादशाह से बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त करेगी।
और 1857 में उसी ब्रिटिश सत्ता के अधीन अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को दिल्ली से निर्वासित किया जाएगा।
1717 इस लंबी यात्रा की एक आरंभिक, लेकिन महत्वपूर्ण कड़ी थी।
निष्कर्ष
फर्रुखसियर का शासन मुगल साम्राज्य के इतिहास में एक अत्यंत निर्णायक मोड़ था।
1713 में वह सैयद बंधुओं की तलवार के सहारे सिंहासन पर बैठा।
1719 में उन्हीं सैयद बंधुओं ने उसे सिंहासन से उतार दिया।
इन छह वर्षों में दिल्ली की राजनीतिक वास्तविकता पूरी तरह उजागर हो गई—
बादशाह अब अकेला सत्ता का स्रोत नहीं रहा था।
सैयद बंधु सेना, दरबार और क्षेत्रीय गठबंधनों के सहारे सम्राट से भी अधिक प्रभावशाली हो गए थे।
राजपूत अपने हितों के आधार पर समझौते कर रहे थे।
मराठे दिल्ली की उत्तराधिकार राजनीति में प्रवेश कर चुके थे।
बंगाल आर्थिक रूप से अधिक स्वायत्त होता जा रहा था।
दक्कन में नए शक्ति-केंद्र पैदा हो रहे थे।
सिख प्रतिरोध कठोर दमन के बावजूद समाप्त नहीं हुआ।
और इसी बीच एक यूरोपीय व्यापारिक कंपनी ने 1717 में ऐसा शाही व्यापारिक अधिकार प्राप्त किया जिसे वह आने वाले दशकों में अपने आर्थिक विस्तार के लिए बार-बार उपयोग करने वाली थी।
फर्रुखसियर की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि वह अपनी कमजोरी पहचानता था, लेकिन उसे दूर करने की क्षमता नहीं रखता था।
वह सैयद बंधुओं से डरता था।
उन्हें हटाना चाहता था।
षड्यंत्र करता था।
लेकिन अंततः वही उसके भाग्य का निर्णय करने वाले बने।
1719 में एक शासनरत मुगल सम्राट को उसके अपने अमीरों द्वारा पकड़ना, अंधा करना और मार डालना केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं थी।
वह पूरे साम्राज्य के लिए संदेश था—
दिल्ली का तख्त अब अभेद्य नहीं रहा।
इसके बाद मुगल गद्दी कुछ महीनों के भीतर दो और अल्पायु सम्राट देखेगी—
रफी-उद-दराजात — 1719 और शाहजहाँ द्वितीय — 1719
इसके बाद आएगा लंबा लेकिन निर्णायक शासन—
मुहम्मद शाह — 1719–1748, जिसके समय 1739 में नादिर शाह दिल्ली पर टूट पड़ेगा और मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को ऐसा आघात लगेगा जिससे वह फिर कभी पूरी तरह उबर नहीं पाएगा।