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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–019 · अध्याय 01

बाबर — 1526–1530

भारत में मुगल सत्ता की स्थापना

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत हिंदी शोध संस्करण · 9 सितंबर 2026

मुगल शासन के इतिहास की शुरुआत 1526 में जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर की पानीपत विजय से होती है। हालांकि बाबर ने भारत में केवल लगभग चार वर्ष शासन किया, लेकिन इन चार वर्षों में उसने ऐसी राजनीतिक और सैन्य नींव खड़ी की जिस पर आगे चलकर अकबर ने विशाल मुगल साम्राज्य का निर्माण किया। बाबर का महत्व इसलिए केवल प्रथम मुगल बादशाह होने में नहीं है; उसने दिल्ली की लोदी सत्ता को समाप्त किया, राजपूत महासंघ की बड़ी चुनौती का सामना किया, अफगान सरदारों को नियंत्रित करने की कोशिश की और मध्य एशियाई सैन्य पद्धतियों को उत्तर भारत के युद्धक्षेत्र में प्रभावी ढंग से प्रयोग किया।

बाबर का पूरा नाम जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर था। उसका जन्म 14 फरवरी 1483 को फरगना में हुआ। पिता उमर शेख मिर्जा तैमूर की वंश-परंपरा से जुड़े थे और माता कुतलुग निगार खानम चंगेज खान की वंश-परंपरा से थीं। इस प्रकार बाबर की राजनीतिक विरासत मध्य एशिया की तैमूरी और चगताई परंपराओं से बनी थी। आधुनिक शोध उसे एक तैमूरी राजकुमार, कुशल सेनानायक और उल्लेखनीय साहित्यकार के रूप में देखता है।

फरगना से समरकंद और काबुल तक

1494 में पिता की मृत्यु के बाद लगभग बारह वर्ष की आयु में बाबर फरगना का शासक बना। लेकिन मध्य एशिया में तैमूरी राजकुमारों के बीच लगातार संघर्ष चल रहा था। बाबर की महत्वाकांक्षा समरकंद प्राप्त करने की थी, जो तैमूरी विरासत का प्रतिष्ठित केंद्र माना जाता था।

उसने समरकंद पर एक से अधिक बार अधिकार किया, लेकिन उसे स्थायी रूप से अपने पास नहीं रख सका। उजबेक नेता मुहम्मद शैबानी खान के उदय ने मध्य एशिया में बाबर की स्थिति और कठिन कर दी। अंततः बाबर को अपने पैतृक क्षेत्रों से पीछे हटना पड़ा।

1504 में उसने काबुल पर अधिकार कर लिया। यही उसका नया राजनीतिक आधार बना। काबुल से बाबर ने लगभग दो दशकों तक अपने राज्य को संभाला और धीरे-धीरे भारत की ओर ध्यान केंद्रित किया। उसने काबुल को केवल सैन्य ठिकाने के रूप में नहीं देखा; उसे शहर और बाग-बगीचों से गहरा लगाव था। बाद में उसकी मृत्यु के बाद उसका शव भी उसकी इच्छा के अनुसार काबुल ले जाकर दफनाया गया।

बाबर की नजर भारत पर क्यों पड़ी?

बाबर की भारत-विजय किसी अचानक किए गए अभियान का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे कई कारण थे।

पहला कारण मध्य एशिया में उसके पुराने क्षेत्रों को पुनः प्राप्त करने की संभावनाओं का घट जाना था। दूसरा, काबुल का सीमित आर्थिक आधार था। बाबर के लिए अपने सैनिकों और सरदारों को संतुष्ट रखने के लिए अधिक समृद्ध प्रदेश आवश्यक थे। स्वयं बाबर की योजना भारत को अपने साम्राज्य का नया आधार बनाने की थी।

तीसरा कारण उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिति थी। दिल्ली की लोदी सल्तनत आंतरिक मतभेदों से जूझ रही थी। इब्राहिम लोदी और कई अफगान सरदारों के संबंध खराब थे। पंजाब के शक्तिशाली सरदार दौलत खान लोदी तथा इब्राहिम लोदी के कुछ विरोधियों ने भी बाबर से संपर्क किया।

लेकिन यह कहना सरलीकरण होगा कि बाबर केवल “बुलावे” पर भारत आया। वह पहले ही पंजाब और उत्तर-पश्चिम भारत की ओर कई अभियान कर चुका था और स्वयं यहां स्थायी राज्य स्थापित करना चाहता था।

1526 : पानीपत का प्रथम युद्ध

बाबर और दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के बीच निर्णायक संघर्ष पानीपत में हुआ।

बाबर की सेना संख्या में लोदी सेना से काफी छोटी थी। उसने स्वयं अपनी सेना की संख्या लगभग 12 हजार बताई है, हालांकि अभियान के दौरान स्थानीय सहयोग और अन्य सैनिक भी उससे जुड़े थे। इब्राहिम लोदी की सेना की संख्या के बारे में विभिन्न स्रोत अलग-अलग अनुमान देते हैं। बाबर स्वयं उसे लगभग एक लाख बताता है, लेकिन इस संख्या को आधुनिक इतिहासकार सावधानी से देखते हैं।

बाबर की सबसे बड़ी ताकत संख्या नहीं बल्कि सैन्य संगठन था।

उसने मैदान में गाड़ियों को जोड़कर एक रक्षात्मक अवरोध बनाया। इनके बीच से तोपों और बंदूकों के संचालन की व्यवस्था की गई। दोनों ओर तेज गति वाले घुड़सवार दस्ते तैनात किए गए। उसने मध्य एशियाई घुड़सवार युद्ध-पद्धति और बारूद आधारित हथियारों को एक साथ उपयोग किया।

21 अप्रैल 1526 को निर्णायक युद्ध हुआ। इब्राहिम लोदी की सेना बाबर की व्यवस्थित रक्षात्मक संरचना को तोड़ नहीं सकी। मुगल घुड़सवारों ने उसके दोनों किनारों पर दबाव बनाया और तोपखाने ने सामने से हमला रोका।

इब्राहिम लोदी युद्धभूमि में मारा गया।

दिल्ली सल्तनत के लोदी शासन का अंत हो गया।

इतिहास में यह युद्ध इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने केवल एक सुल्तान को हटाकर दूसरे शासक को नहीं बैठाया; इसने उत्तर भारत में एक नए राजवंश की स्थापना का रास्ता खोल दिया।

क्या बाबर तोपों के कारण ही जीता?

लोकप्रिय विवरणों में अक्सर यह कहा जाता है कि बाबर ने पानीपत केवल इसलिए जीता क्योंकि उसके पास तोपें थीं और लोदी सेना के पास नहीं।

यह व्याख्या अधूरी है।

बाबर के पास उस समय तोपखाने के अनुभवी विशेषज्ञ उस्ताद अली कुली और मुस्तफा जैसे लोग थे, लेकिन उपलब्ध शोध बताता है कि पानीपत में उसकी सफलता केवल तकनीकी श्रेष्ठता का परिणाम नहीं थी। उसके पास सीमित तोपें थीं। उसकी वास्तविक शक्ति सेनाओं की गति, अनुशासन, क्षेत्र का उपयोग, गाड़ियों से बनी रक्षात्मक पंक्ति और घुड़सवारों की संगठित कार्रवाई थी।

यानी बाबर ने युद्ध की विभिन्न तकनीकों को एक संयुक्त सैन्य योजना में बदल दिया।

दिल्ली और आगरा पर अधिकार

पानीपत की विजय के बाद बाबर दिल्ली और फिर आगरा पहुंचा। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य समझना चाहिए।

दिल्ली और आगरा पर कब्जा हो जाने का अर्थ पूरे भारत पर कब्जा नहीं था।

बाबर के सामने तत्काल तीन बड़ी समस्याएँ थीं।

पहली—अफगान सरदार अभी शक्तिशाली थे।

दूसरी—राजस्थान में मेवाड़ के महाराणा सांगा के नेतृत्व में शक्तिशाली राजपूत संघ मौजूद था।

तीसरी—बाबर की अपनी सेना का बड़ा भाग भारत में स्थायी रूप से रहना नहीं चाहता था। सैनिक मध्य एशिया लौटना चाहते थे। गर्मी, जलवायु और अपरिचित परिस्थितियों से वे असंतुष्ट थे।

बाबर ने अपने सरदारों को समझाया कि वह भारत में केवल लूट के अभियान के लिए नहीं आया है। उसका लक्ष्य यहीं स्थायी राज्य स्थापित करना था।

यही निर्णय उसे पहले के अनेक मध्य एशियाई आक्रमणकारियों से अलग करता है।

महाराणा सांगा और बाबर

1526 की विजय के बाद बाबर की सत्ता के सामने सबसे गंभीर चुनौती मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह—राणा सांगा—से आई।

राणा सांगा अपने समय के सबसे प्रभावशाली राजपूत शासकों में थे। मेवाड़ के प्रभाव का विस्तार राजस्थान से बाहर मालवा तक था और उनके नेतृत्व में अनेक राजपूत शासक तथा सरदार एकत्र हुए।

बाबर और राणा सांगा के संबंधों को लेकर स्रोतों में मतभेद हैं। बाबर ने दावा किया कि राणा सांगा ने पहले उसे इब्राहिम लोदी के विरुद्ध आने के लिए प्रोत्साहित किया था और बाद में अपने वचन से पीछे हट गए। इस दावे को स्वयं बाबर के दृष्टिकोण से दर्ज स्रोत के रूप में देखना चाहिए; इसे बिना आलोचनात्मक परीक्षण के अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।

पानीपत के बाद दोनों शक्तियों के हित सीधे टकराने लगे।

यदि बाबर दिल्ली और आगरा में स्थायी सत्ता स्थापित करना चाहता था तो उसे राजपूत संघ की चुनौती का सामना करना ही था।

1527 : खानवा का युद्ध

16 मार्च अथवा 17 मार्च 1527 के आसपास खानवा के मैदान में निर्णायक संघर्ष हुआ। विश्वसनीय आधुनिक संदर्भ 17 मार्च की तारीख देते हैं।

बाबर के लिए यह पानीपत से भी कठिन चुनौती थी।

राजपूत सेना अत्यंत युद्धक थी। प्रारंभिक स्थिति में बाबर की सेना में भय और अस्थिरता दिखाई दी। इसी समय बाबर ने शराब त्यागने की घोषणा की और अपने सैनिकों के सामने धार्मिक तथा सैन्य प्रतिबद्धता का वातावरण तैयार किया। उसने इस युद्ध को अपने सैनिकों के मनोबल से जोड़ दिया।

खानवा में उसने फिर गाड़ियों, तोपखाने और घुड़सवार घेरेबंदी की रणनीति का उपयोग किया।

भीषण युद्ध के बाद राजपूत महासंघ पराजित हुआ।

लेकिन इस युद्ध को “राजपूत शक्ति का अंत” कहना गलत होगा। मेवाड़ और अनेक राजपूत राज्य उसके बाद भी शक्तिशाली बने रहे। अकबर को लगभग चार दशक बाद फिर चित्तौड़ और राजस्थान के विभिन्न राज्यों से दीर्घ संघर्ष तथा समझौते करने पड़े।

खानवा की वास्तविक ऐतिहासिक महत्ता यह थी कि बाबर ने दिल्ली में स्थापित अपनी नई सत्ता के सामने मौजूद सबसे बड़ी संगठित सैन्य चुनौती को तत्काल रोक दिया।

खानवा : भारतीय इतिहास का निर्णायक मोड़

यदि पानीपत ने बाबर को दिल्ली की गद्दी दी तो खानवा ने उसे वहां टिकने का अवसर दिया।

पानीपत में उसका सामना एक संकटग्रस्त सल्तनत से था। खानवा में उसका सामना ऐसी क्षेत्रीय शक्ति से हुआ जो स्वयं उत्तर भारत की राजनीति को नया रूप देने की क्षमता रखती थी।

इसलिए कुछ इतिहासकार खानवा को बाबर की भारत-विजय का अधिक निर्णायक युद्ध मानते हैं।

हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि बाबर की विजय के बाद भी मुगल शासन अभी स्थिर साम्राज्य नहीं बना था। उसे आगे चंदेरी और पूर्वी भारत के अफगानों से युद्ध करना पड़ा।

1528 : चंदेरी

खानवा की विजय के बाद बाबर ने मध्य भारत की ओर ध्यान दिया।

चंदेरी पर मेदिनी राय का अधिकार था, जो राणा सांगा के सहयोगी रहे थे। जनवरी 1528 में बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण किया।

मेदिनी राय ने आत्मसमर्पण नहीं किया।

मुगल सेना ने किले पर अधिकार कर लिया और युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में रक्षकों की मृत्यु हुई। राजपूत परंपरा के अनुसार किले में जौहर भी हुआ।

चंदेरी की विजय ने मालवा और मध्य भारत की दिशा में बाबर की सामरिक स्थिति मजबूत की।

अफगान चुनौती समाप्त नहीं हुई थी

इब्राहिम लोदी की मृत्यु के बावजूद अफगान राजनीतिक शक्ति खत्म नहीं हुई थी।

बिहार और पूर्वी उत्तर भारत में अनेक अफगान सरदार सक्रिय थे। इब्राहिम लोदी का भाई महमूद लोदी भी मुगल-विरोधी शक्तियों का केंद्र बना।

बाबर को इसलिए अपनी सेना पूर्व की ओर ले जानी पड़ी।

यहीं एक ऐसा अफगान सरदार भी धीरे-धीरे उभर रहा था जो बाबर की मृत्यु के बाद उसके पुत्र हुमायूँ के लिए सबसे बड़ा खतरा बनेगा—शेर खान, जो आगे चलकर शेरशाह सूरी कहलाया।

1529 : घाघरा का युद्ध

1529 में बाबर ने बिहार और बंगाल की दिशा में अभियान किया।

घाघरा नदी क्षेत्र में मुगल सेना का अफगान शक्तियों से संघर्ष हुआ। बंगाल की राजनीति भी इस संघर्ष से जुड़ी थी।

बाबर की सेना ने अफगान विरोध को पीछे धकेला और पूर्वी उत्तर भारत में मुगल प्रभाव बढ़ाया।

घाघरा अभियान के बाद उसके जीवन के चार प्रमुख भारतीय सैन्य संघर्षों की श्रृंखला लगभग पूरी हुई—

पानीपत ने लोदी शासन समाप्त किया।

खानवा ने राजपूत महासंघ की तत्काल चुनौती को रोका।

चंदेरी ने मध्य भारत की दिशा मजबूत की।

घाघरा ने पूर्वी भारत की अफगान चुनौती को सीमित किया।

इसके बावजूद बाबर के जीवनकाल में मुगल राज्य उतना सुदृढ़ नहीं हो पाया था जितना अकबर के समय हुआ।

बाबर और धर्म

बाबर की धार्मिक नीति को भी उसके समय और राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझना आवश्यक है।

वह सुन्नी मुसलमान था और अपनी तैमूरी इस्लामी पहचान से स्पष्ट रूप से जुड़ा था। खानवा के युद्ध के समय उसने धार्मिक भाषा का उपयोग किया और स्वयं को ‘गाजी’ कहा।

उसके अभियानों में धार्मिक प्रतीकों का उपयोग हुआ, किंतु उसकी राजनीति केवल धर्म के आधार पर संचालित नहीं होती थी। वह अफगान मुसलमानों से भी उतनी ही कठोरता से लड़ता था जितनी हिंदू राजपूतों से। उसका प्रमुख उद्देश्य राजनीतिक सत्ता स्थापित करना था।

बाबर की निजी रचनाओं में धार्मिक आस्था के साथ शराब, कविता, प्रकृति, मित्रता, प्रेम, युद्ध और व्यक्तिगत भावनाओं का भी खुला वर्णन मिलता है। यही उसके व्यक्तित्व को अन्य मध्यकालीन विजेताओं से अलग ढंग से समझने में मदद करता है।

बाबर और मंदिरों का प्रश्न

बाबर के संबंध में मंदिर-विध्वंस के अनेक दावे आधुनिक राजनीतिक विमर्श में आते हैं। यहां प्राथमिक स्रोतों और बाद की परंपराओं में अंतर करना जरूरी है।

बाबर के सैन्य अभियानों में कुछ धार्मिक स्थलों के विनाश के उल्लेख मिलते हैं, लेकिन हर बाद की परंपरा को सीधे उसके आदेश से जोड़ना इतिहास की दृष्टि से सुरक्षित नहीं है।

विशेष रूप से अयोध्या की बाबरी मस्जिद और बाबर के प्रत्यक्ष आदेश के प्रश्न पर लंबे समय से विवाद रहा है। बाबरनामा के उपलब्ध पाठ में बाबर द्वारा अयोध्या में राम मंदिर तोड़ने का कोई प्रत्यक्ष विवरण नहीं मिलता। इसका यह अर्थ भी नहीं कि स्थल के पूर्व इतिहास का प्रश्न समाप्त हो जाता है; वह पुरातत्व, बाद के फारसी अभिलेखों, शिलालेखों, स्थानीय परंपराओं और न्यायिक साक्ष्यों का अलग विषय है।

इसलिए बाबर काल के शोध में “जो प्रमाणित है” और “जो बाद की परंपरा या दावा है”—इन दोनों को अलग रखना आवश्यक है।

बाबर की भारत के प्रति दृष्टि

बाबरनामा में भारत के बारे में बाबर की टिप्पणियां अत्यंत रोचक हैं।

वह यहां की जलवायु, भूगोल, नदियों, वृक्षों, पशु-पक्षियों, फलों और लोगों का विवरण देता है। कई भारतीय चीजों की वह आलोचना करता है और मध्य एशिया से तुलना करता है। उसे काबुल और समरकंद की ठंडी जलवायु, अंगूर, खरबूजे और बागों की याद आती थी।

लेकिन भारत की विशालता और आर्थिक संपन्नता को भी वह पहचानता था।

उसने यहां बाग बनाने शुरू किए। आगरा और अन्य स्थानों पर मध्य एशियाई तथा फारसी शैली के व्यवस्थित बाग बनाने की परंपरा प्रारंभ हुई। ईरानिका बाबर को भारतीय उपमहाद्वीप में तैमूरी-फारसी उद्यान परंपरा के प्रमुख आरंभिक वाहकों में गिनता है।

यह परंपरा आगे चलकर मुगल स्थापत्य और नगर-योजना का प्रमुख तत्व बनी।

बाबरनामा : एक असाधारण ऐतिहासिक स्रोत

बाबर की सबसे महत्वपूर्ण विरासतों में उसकी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ है।

उसने इसे चगताई तुर्की में लिखा। बाद में इसका फारसी और अनेक अन्य भाषाओं में अनुवाद हुआ।

यह केवल राजकीय विजयगाथा नहीं है। बाबर अपनी सफलताओं के साथ असफलताओं, भय, कमजोरियों, मित्रताओं, पारिवारिक संबंधों और व्यक्तिगत रुचियों का भी उल्लेख करता है।

वह नगरों, बाजारों, पहाड़ों, नदियों, वनस्पतियों और राजनीतिक व्यक्तियों का सूक्ष्म वर्णन करता है।

इसी कारण बाबरनामा प्रारंभिक मुगल इतिहास का सर्वोत्तम प्राथमिक स्रोत माना जाता है। ईरानिका के इतिहासलेखन संबंधी अध्ययन में भी बाबर की आत्मकथा और कविता को उसके जीवन के सर्वोत्तम स्रोतों में गिना गया है।

लेकिन किसी भी आत्मकथा की तरह इसे भी लेखक की दृष्टि वाला स्रोत समझना चाहिए। बाबर अपने विरोधियों का वर्णन अपने राजनीतिक नजरिए से करता है।

शासन-व्यवस्था : अभी संक्रमण का दौर

बाबर भारत में वह विस्तृत प्रशासनिक संरचना स्थापित नहीं कर पाया जिसे आगे अकबर ने विकसित किया।

उसका शासन मुख्यतः विजय से स्थायी राज्य की ओर संक्रमण की अवस्था में था।

पुरानी लोदी प्रशासनिक व्यवस्था के अनेक हिस्से जारी रहे। स्थानीय जमींदारों और अधिकारियों से समझौते किए गए। अपने अमीरों को क्षेत्र और आय के स्रोत दिए गए।

लेकिन नए राज्य की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि विजय में भाग लेने वाले तैमूरी-मध्य एशियाई सरदारों की अपेक्षाएँ बहुत अधिक थीं।

बाबर को उन्हें धन और पद देना था, जबकि साथ ही नए क्षेत्रों से नियमित राजस्व व्यवस्था स्थापित करनी थी।

उसके पास इसके लिए केवल चार वर्ष थे।

इसलिए प्रशासन के क्षेत्र में बाबर का योगदान मुख्यतः आधार तैयार करने तक सीमित रहा। मुगल शासन की संस्थागत संरचना का वास्तविक विकास अकबर के समय हुआ।

भारतीय अभिजात वर्ग के प्रति नीति

बाबर केवल सभी पुराने अधिकारियों को हटाकर मध्य एशियाई लोगों से शासन चलाने की स्थिति में नहीं था।

उसने भारतीय अभिजात वर्ग और स्थानीय सरदारों के कुछ हिस्सों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की। ईरानिका के अनुसार उसने भारतीय कुलीनों के साथ समझौता और समन्वय की नीति भी अपनाई।

यह राजनीतिक आवश्यकता थी।

भारत का विशाल भूभाग केवल कुछ हजार विदेशी सैनिकों से प्रशासित नहीं किया जा सकता था।

यही व्यावहारिक वास्तविकता आगे अकबर के समय अधिक विकसित भारतीयकरण और राजपूत साझेदारी की नीति में दिखाई दी।

बाबर और कोहिनूर

पानीपत के बाद आगरा में एक प्रसिद्ध हीरे का उल्लेख बाबरनामा में मिलता है।

बाबर लिखता है कि ग्वालियर के शासक विक्रमजीत के परिवार ने हुमायूँ को एक विशाल और प्रसिद्ध हीरा दिया था। बाद के इतिहास में इसे कोहिनूर से जोड़ा गया।

हालांकि कोहिनूर की प्रारंभिक पहचान और उससे जुड़ी कई कथाओं को लेकर इतिहासकार सावधान रहते हैं। ईरानिका के अनुसार 1526 के बाद बाबर के संस्मरणों में जिस बड़े हीरे का प्रमाणित उल्लेख मिलता है, उसे बाद में कोहिनूर की परंपरा से जोड़ा गया, लेकिन उससे पहले के इतिहास में अनेक कथाएँ अप्रमाणित हैं।

बाबर की मृत्यु

1530 में बाबर का बड़ा पुत्र हुमायूँ गंभीर रूप से बीमार पड़ा।

बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम से जुड़ी बाद की परंपरा के अनुसार बाबर ने ईश्वर से प्रार्थना की कि पुत्र के बदले उसका जीवन ले लिया जाए। उसने कथित रूप से हुमायूँ के बिस्तर के चारों ओर चक्कर लगाए और उसके जीवन के बदले अपना जीवन देने की प्रार्थना की।

हुमायूँ स्वस्थ हुआ और कुछ समय बाद बाबर स्वयं बीमार पड़ गया।

26 दिसंबर 1530 को आगरा में बाबर की मृत्यु हुई।

पहले उसे आगरा में दफनाया गया। बाद में उसके अवशेष काबुल ले जाए गए, जहां बाग-ए-बाबर में उसकी कब्र आज भी है।

उसके बाद हुमायूँ मुगल सिंहासन पर बैठा।

केवल चार वर्ष—फिर भी इतना महत्व क्यों?

1526 से 1530 का बाबर का भारतीय शासन अत्यंत छोटा था।

लेकिन इन चार वर्षों में उसने चार महत्वपूर्ण परिवर्तन किए।

उसने दिल्ली सल्तनत के अंतिम अफगान राजवंश लोदी को पराजित किया।

उसने दिल्ली–आगरा क्षेत्र में तैमूरी सत्ता स्थापित की।

उसने खानवा में शक्तिशाली राजपूत गठबंधन की चुनौती को तत्काल नियंत्रित किया।

और उसने भारत को अस्थायी लूट अभियान के बजाय अपने राजवंश का स्थायी राजनीतिक आधार बनाने का निर्णय लिया।

यही उसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

यदि बाबर पानीपत जीतने के बाद वापस काबुल लौट जाता तो संभव है उसकी भारत विजय भी तैमूर की 1398 की दिल्ली लूट की तरह एक अभियान भर बनकर रह जाती।

बाबर रुका।

और यही निर्णय भारतीय इतिहास में मुगल युग की वास्तविक शुरुआत बना।

फिर भी बाबर का राज्य असुरक्षित था

बाबर की सफलताओं को देखते हुए यह धारणा बन सकती है कि 1530 तक मुगल साम्राज्य पूरी तरह स्थापित हो चुका था।

ऐसा नहीं था।

मुगल सत्ता अभी नई थी।

अफगान शक्ति जीवित थी।

राजपूत राज्यों का अस्तित्व और शक्ति बनी हुई थी।

पूर्वी भारत का नियंत्रण अधूरा था।

दक्कन और दक्षिण भारत मुगल अधिकार से बहुत दूर थे।

शासन की स्थायी संस्थाएँ अभी विकसित नहीं हुई थीं।

और सबसे महत्वपूर्ण—राजवंश की सत्ता काफी हद तक स्वयं बाबर के सैन्य नेतृत्व और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा पर निर्भर थी।

उसकी मृत्यु के दस वर्ष बाद ही हुमायूँ शेरशाह सूरी से पराजित होकर भारत से बाहर हो गया।

इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि बाबर ने साम्राज्य का तैयार भवन नहीं छोड़ा था; उसने उसकी नींव रखी थी।

बाबर का ऐतिहासिक मूल्यांकन

बाबर का मूल्यांकन दो अतियों से बचकर करना चाहिए।

उसे केवल प्रमुख साहित्यकार और बागों का प्रेमी बताना उसके सैन्य आक्रमणों, युद्धों और सत्ता-विस्तार की हिंसा को कम करके दिखाना होगा।

दूसरी ओर उसे केवल लुटेरा कह देना भी तथ्यात्मक रूप से अधूरा है, क्योंकि पानीपत के बाद उसने भारत को छोड़ने के बजाय यहीं स्थायी राज्य स्थापित करने का निर्णय लिया, प्रशासन और निर्माण पर ध्यान दिया और अपने उत्तराधिकारियों के लिए राजनीतिक आधार छोड़ा।

वह मूलतः एक विजेता था।

लेकिन ऐसा विजेता जिसने विजय को स्थायी राजवंशीय शासन में बदलने का प्रयास किया।

वह अपने समय की धार्मिक और सैन्य मानसिकताओं से प्रभावित था।

लेकिन साथ ही वह असाधारण आत्मनिरीक्षण करने वाला लेखक, प्रकृति प्रेमी, कवि और पर्यवेक्षक भी था।

इन विरोधाभासों को एक साथ समझे बिना बाबर का सही ऐतिहासिक चित्र नहीं बनता।

1526–1530 : संक्षिप्त समयरेखा

21 अप्रैल 1526 — पानीपत का प्रथम युद्ध इब्राहिम लोदी पर विजय; दिल्ली सल्तनत के लोदी शासन का अंत।

अप्रैल–मई 1526 — दिल्ली और आगरा पर अधिकार उत्तर भारत में नई तैमूरी-मुगल सत्ता की स्थापना की शुरुआत।

17 मार्च 1527 — खानवा का युद्ध महाराणा सांगा के नेतृत्व वाले राजपूत महासंघ की पराजय।

जनवरी 1528 — चंदेरी अभियान मेदिनी राय की शक्ति का अंत और मध्य भारत में बाबर की स्थिति मजबूत।

1529 — घाघरा अभियान पूर्वी उत्तर भारत में अफगान शक्तियों के विरुद्ध मुगल प्रभाव का विस्तार।

26 दिसंबर 1530 — बाबर की मृत्यु आगरा में निधन; हुमायूँ उत्तराधिकारी बना।

निष्कर्ष

बाबर का भारतीय शासन केवल चार वर्षों का था, लेकिन मुगल इतिहास की दिशा इन्हीं चार वर्षों में तय हुई।

1526 के पानीपत ने उसे दिल्ली दी।

1527 के खानवा ने उसकी सत्ता को तत्काल सबसे बड़ी चुनौती से बचाया।

1528 के चंदेरी अभियान ने मध्य भारत की दिशा में दबाव बढ़ाया।

1529 के घाघरा अभियान ने पूर्वी अफगान प्रतिरोध को सीमित किया।

1530 में उसकी मृत्यु के समय मुगल राज्य अभी नाजुक था, लेकिन दिल्ली–आगरा केंद्रित एक नई राजवंशीय सत्ता जन्म ले चुकी थी।

इसलिए बाबर को विशाल मुगल साम्राज्य का निर्माता कहना पूरी तरह उचित नहीं होगा—वह भूमिका मुख्यतः अकबर की थी। लेकिन बाबर के बिना वह साम्राज्य अस्तित्व में नहीं आता।

उसने भारत में मुगल सत्ता की नींव रखी; भवन उसके उत्तराधिकारियों ने बनाया।