जहांगीर — 1605–1627
साम्राज्य की निरंतरता, नूरजहां का प्रभाव और नए राजनीतिक तनाव
1605 में अकबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सलीम “नूरुद्दीन मुहम्मद जहांगीर” के नाम से मुगल सिंहासन पर बैठा। जहांगीर को एक ऐसा साम्राज्य विरासत में मिला जो बाबर और हुमायूँ के समय की अस्थिर सत्ता नहीं रहा था। अकबर लगभग आधी शताब्दी में एक विशाल प्रशासनिक और सैन्य ढांचा खड़ा कर चुका था। मनसबदारी, जागीर, राजस्व, प्रांतीय प्रशासन और राजपूत सहयोग जैसी व्यवस्थाएँ स्थापित हो चुकी थीं। इसलिए जहांगीर के सामने सबसे बड़ी चुनौती नया साम्राज्य बनाने की नहीं, बल्कि अकबर की विरासत को संभालने और उसकी विशाल सत्ता को स्थिर रखने की थी।
जहांगीर का शासन अकबर और शाहजहाँ के बीच एक संक्रमणकाल भी था। इस अवधि में मुगल साम्राज्य की राजनीतिक शक्ति बनी रही, चित्रकला और प्रकृति-अध्ययन अभूतपूर्व ऊंचाई पर पहुंचे, यूरोपीय व्यापारिक शक्तियों के साथ संपर्क बढ़ा, मेवाड़ के साथ दशकों पुराना संघर्ष समाप्त हुआ, लेकिन साथ ही राजकुमारों के विद्रोह, दरबारी गुटबाजी, नूरजहां परिवार का प्रभाव, गुरु अर्जन देव की मृत्यु और दक्कन की कठिनाइयाँ भविष्य की समस्याओं का संकेत भी देने लगीं।
जहांगीर स्वयं एक जटिल व्यक्तित्व था। वह कला, प्रकृति, पशु-पक्षियों और बागों का अत्यंत सूक्ष्म पर्यवेक्षक था। उसने अपनी आत्मकथा में शासन, परिवार, शिकार, न्याय, शराब, बीमारी, विद्रोह और दरबार तक के अनेक प्रसंग खुले रूप में लिखे। लेकिन उसके शासन में कठोर राजनीतिक निर्णय, विद्रोही पुत्रों का दमन और धार्मिक-सामुदायिक तनाव भी दिखाई देते हैं।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
जहांगीर का जन्म 31 अगस्त 1569 को फतेहपुर सीकरी में हुआ।
उसका जन्म अकबर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि कई वर्षों तक उसके जीवित पुत्र नहीं रहे थे।
अकबर सूफी संत शेख सलीम चिश्ती से अत्यंत प्रभावित था। पुत्र जन्म के बाद बालक का नाम सलीम रखा गया।
राजपरिवार में उसे कभी-कभी “शेखू बाबा” भी कहा जाता था।
उसकी माता आमेर के राजा भारमल की पुत्री थीं, जिन्हें बाद में मरियम-उज-जमानी की उपाधि मिली।
इस प्रकार सलीम की वंशीय पहचान स्वयं मुगल-राजपूत राजनीतिक गठबंधन का प्रतीक थी।
उसे शाही राजकुमार के अनुरूप युद्ध, प्रशासन, भाषाओं और दरबारी व्यवहार का प्रशिक्षण दिया गया।
लेकिन युवावस्था से ही उसके और अकबर के संबंधों में तनाव आने लगा।
अकबर और सलीम का संघर्ष
अकबर के जीवन के अंतिम वर्षों में राजकुमार सलीम सिंहासन प्राप्त करने के लिए अत्यंत अधीर हो गया था।
उसने इलाहाबाद में अपना स्वतंत्र शक्ति केंद्र बनाया।
अपने नाम से आदेश जारी किए और लगभग स्वतंत्र शासक जैसा व्यवहार किया।
अकबर के प्रमुख दरबारी और इतिहासकार अबुल फजल सलीम के प्रभाव के रास्ते में बड़ा अवरोध माने जाते थे।
1602 में बुंदेला सरदार वीर सिंह देव ने सलीम के संकेत पर अबुल फजल की हत्या कर दी।
अकबर इस घटना से अत्यंत क्रोधित हुआ।
लेकिन अकबर के अन्य पुत्र मुराद और दानियाल की मृत्यु हो जाने के कारण अंततः सलीम ही प्रमुख उत्तराधिकारी बचा।
पिता-पुत्र में समझौता हुआ।
1605 में अकबर की मृत्यु के बाद सलीम ने सिंहासन संभाला।
जहांगीर नाम का अर्थ
सिंहासन पर बैठने के बाद सलीम ने “नूरुद्दीन मुहम्मद जहांगीर बादशाह गाजी” की उपाधि धारण की।
“जहांगीर” का अर्थ सामान्यतः “विश्व-विजेता” या “दुनिया को जीतने वाला” समझा जाता है।
उसने अपने शासन के प्रारंभ में स्वयं को न्यायप्रिय और व्यवस्थित शासक के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया।
उसने कुछ करों और अनुचित वसूली को समाप्त करने तथा प्रशासनिक सुधारों से संबंधित आदेश जारी किए।
न्याय की जंजीर
जहांगीर की सबसे प्रसिद्ध छवियों में “न्याय की जंजीर” का उल्लेख मिलता है।
उसके अनुसार आगरा किले से नदी किनारे तक सोने की घंटियों वाली एक जंजीर लगाई गई थी।
ऐसा कहा गया कि कोई भी व्यक्ति जिसे अधिकारियों से न्याय नहीं मिलता, वह इस जंजीर को खींचकर सीधे सम्राट का ध्यान आकर्षित कर सकता था।
इतिहास में यह व्यवस्था वास्तविक न्यायिक प्रणाली से अधिक शाही न्याय के प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध हुई।
यह जहांगीर की उस छवि का हिस्सा थी जिसमें सम्राट स्वयं को अंतिम न्याय का स्रोत प्रस्तुत करता था।
लेकिन व्यवहार में विशाल साम्राज्य का अधिकांश न्याय स्थानीय काजियों, अधिकारियों, जमींदारों और परंपरागत संस्थाओं के माध्यम से ही चलता था।
खुसरो का विद्रोह
जहांगीर के सिंहासन पर बैठने के तुरंत बाद उसे अपने पुत्र खुसरो मिर्जा की चुनौती का सामना करना पड़ा।
1606 में खुसरो ने विद्रोह कर दिया।
वह पंजाब की ओर बढ़ा और अपने समर्थन के लिए विभिन्न सरदारों से संपर्क किया।
लेकिन जहांगीर की सेना ने उसे पराजित कर पकड़ लिया।
खुसरो के समर्थकों पर कठोर कार्रवाई हुई।
इस विद्रोह ने मुगल राजवंश की उस पुरानी समस्या को फिर सामने ला दिया जिसमें उत्तराधिकार के लिए पुत्र पिता के विरुद्ध और भाई भाई के विरुद्ध युद्ध करते थे।
अकबर भी अपने अंतिम वर्षों में सलीम के विद्रोह का सामना कर चुका था।
अब जहांगीर स्वयं उसी समस्या का सामना कर रहा था।
गुरु अर्जन देव और खुसरो
खुसरो के विद्रोह से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रसंग पांचवें सिख गुरु अर्जन देव का था।
खुसरो पंजाब से गुजरते समय गुरु अर्जन देव से मिला।
मुगल स्रोतों और सिख परंपराओं में घटना के विवरण में अंतर है, लेकिन यह स्पष्ट है कि जहांगीर ने गुरु अर्जन देव पर विद्रोही राजकुमार का समर्थन करने का आरोप लगाया।
1606 में गुरु अर्जन देव को गिरफ्तार किया गया और उनकी मृत्यु मुगल हिरासत में हुई।
सिख परंपरा में इसे शहादत माना जाता है।
गुरु अर्जन देव की मृत्यु मुगल-सिख संबंधों का निर्णायक मोड़ थी।
इसके बाद छठे गुरु हरगोबिंद ने सिख समुदाय में सैन्य संगठन और आत्मरक्षा के तत्व को अधिक स्पष्ट रूप से विकसित किया।
उन्होंने “मिरी” और “पीरी” की अवधारणा को प्रतिष्ठित किया—अर्थात सांसारिक और आध्यात्मिक सत्ता का समन्वय।
इस प्रकार जहांगीर काल की यह घटना आगे चलकर मुगल सत्ता और सिखों के बीच लंबे राजनीतिक-सैन्य तनाव की पृष्ठभूमि बनी।
मेवाड़ का प्रश्न
अकबर अपने पूरे शासनकाल में मेवाड़ को पूरी तरह अधीन नहीं कर पाया था।
महाराणा प्रताप ने मुगल सर्वोच्चता स्वीकार नहीं की।
1597 में प्रताप की मृत्यु के बाद उनके पुत्र महाराणा अमर सिंह मेवाड़ के शासक बने।
जहांगीर ने मेवाड़ पर दबाव जारी रखा।
उसने कई अभियान भेजे।
प्रारंभ में मुगल सेनाओं को निर्णायक सफलता नहीं मिली।
आखिरकार उसने अपने पुत्र खुर्रम—जो आगे शाहजहाँ बना—को अभियान की जिम्मेदारी दी।
1615 : मेवाड़ से समझौता
लगातार युद्ध से दोनों पक्ष थक चुके थे।
1615 में जहांगीर और महाराणा अमर सिंह के बीच समझौता हुआ।
इस समझौते की शर्तें अत्यंत महत्वपूर्ण थीं।
महाराणा ने मुगल सम्राट की सर्वोच्चता स्वीकार की, लेकिन उन्हें स्वयं दरबार में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया गया।
उनके पुत्र करण सिंह को मुगल दरबार में भेजा गया।
मुगलों ने मेवाड़ के शासक से वैवाहिक संबंध की मांग भी नहीं की।
चित्तौड़ किला मेवाड़ को लौटा दिया गया, लेकिन उसकी किलेबंदी फिर न करने की शर्त थी।
यह समझौता अकबर से चले आ रहे लगभग आधी शताब्दी के मुगल-मेवाड़ संघर्ष का व्यावहारिक अंत था।
मेवाड़ ने राजनीतिक अधीनता का सीमित रूप स्वीकार किया, लेकिन उसकी आंतरिक प्रतिष्ठा और राजवंशीय गरिमा को काफी हद तक सुरक्षित रखा गया।
राजपूत संबंध
जहांगीर ने अकबर की राजपूत नीति को सामान्यतः जारी रखा।
राजा मानसिंह, राजा वीर सिंह देव बुंदेला और अन्य राजपूत सरदार मुगल राजनीति में महत्वपूर्ण बने रहे।
राजपूत सैन्य शक्ति साम्राज्य के अभियानों का प्रमुख हिस्सा थी।
अकबर द्वारा बनाई गई राजनीतिक साझेदारी जहांगीर काल में इतनी मजबूत हो चुकी थी कि मुगल साम्राज्य के उच्च प्रशासन में राजपूत उपस्थिति सामान्य बात बन गई।
हालांकि सभी राजपूत राज्यों के साथ संबंध हमेशा शांतिपूर्ण नहीं थे।
मुगल सत्ता की मूल अपेक्षा सम्राट की सर्वोच्चता और सैन्य सेवा थी।
नूरजहां का प्रवेश
जहांगीर के शासन का सबसे चर्चित राजनीतिक प्रसंग नूरजहां का उदय है।
नूरजहां का मूल नाम मेहरुन्निसा था।
उनका जन्म एक फारसी परिवार में हुआ था जो भारत आकर मुगल सेवा में शामिल हुआ।
उनके पिता मिर्जा गियास बेग आगे चलकर उच्च पद पर पहुंचे और “एतमाद-उद-दौला” की उपाधि प्राप्त की।
मेहरुन्निसा का पहला विवाह अली कुली इस्तज्लू से हुआ था, जिन्हें शेर अफगान कहा जाता था।
उनकी मृत्यु के बाद मेहरुन्निसा मुगल दरबार में आईं।
1611 में जहांगीर ने उनसे विवाह किया।
उन्हें पहले नूरमहल और बाद में नूरजहां—“विश्व का प्रकाश”—की उपाधि मिली।
नूरजहां की वास्तविक शक्ति
नूरजहां केवल प्रभावशाली शाही पत्नी नहीं थीं।
वे मुगल राजनीति में सक्रिय सत्ता-केंद्र बन गईं।
उनके नाम वाले सिक्के जारी होने के उदाहरण मिलते हैं।
शाही आदेशों पर उनका प्रभाव था।
वे स्वयं शिकार करती थीं।
दरबार में नियुक्तियों और विवाह-संबंधों पर उनका प्रभाव बढ़ा।
उनके पिता एतमाद-उद-दौला और भाई आसफ खान उच्च पदों पर थे।
इस कारण इतिहासकार कभी-कभी इस समूह को “नूरजहां गुट” या “नूरजहां परिवार” के रूप में वर्णित करते हैं।
लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि जहांगीर पूरी तरह सत्ता से हट गया था—ऐसा कहना अतिशयोक्ति होगी।
नूरजहां का प्रभाव बहुत बड़ा था, विशेषकर जहांगीर के स्वास्थ्य और मद्यपान की समस्याएँ बढ़ने के बाद, लेकिन अंतिम सम्राट वही था और सेना तथा दरबार में कई स्वतंत्र शक्ति केंद्र मौजूद थे।
जहांगीर और शराब
जहांगीर ने अपनी आत्मकथा में अपने मद्यपान की आदत का उल्लेख स्वयं किया है।
युवावस्था में उसका शराब सेवन अत्यधिक था।
बाद में स्वास्थ्य खराब होने पर उसने मात्रा कम करने की कोशिश की।
इसके बावजूद मद्य और अफीम से संबंधित उसकी निर्भरता उसके स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालती रही।
उसके शासन के उत्तरार्ध में कमजोरी और बीमारी बढ़ती गई।
इसी राजनीतिक वातावरण में नूरजहां तथा विभिन्न राजकुमारों और दरबारी गुटों का प्रभाव बढ़ा।
नूरजहां और उत्तराधिकार
जहांगीर के अंतिम वर्षों में सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न था—अगला सम्राट कौन होगा?
उसके पुत्रों में खुसरो पहले ही विद्रोह कर चुका था।
खुर्रम अत्यंत प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी था।
परवेज भी राजकुमार था।
सबसे छोटा शहरयार नूरजहां के निकट था और उसका विवाह नूरजहां की पुत्री लाडली बेगम से हुआ था।
दूसरी ओर नूरजहां के भाई आसफ खान की पुत्री अर्जुमंद बानो बेगम का विवाह राजकुमार खुर्रम से हुआ था।
यही अर्जुमंद बानो आगे “मुमताज महल” के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
इस प्रकार नूरजहां परिवार के भीतर भी उत्तराधिकार के अलग-अलग संबंध बन गए थे।
राजकुमार खुर्रम
जहांगीर का पुत्र खुर्रम प्रारंभ में उसका अत्यंत प्रिय राजकुमार था।
मेवाड़ अभियान की सफलता के बाद उसकी प्रतिष्ठा बढ़ी।
दक्कन में भी उसने महत्वपूर्ण अभियान किए।
जहांगीर ने उसे “शाहजहाँ” की उपाधि दी।
लेकिन उत्तराधिकार और दरबारी गुटबाजी के कारण पिता-पुत्र के संबंध बिगड़ गए।
1622 के बाद खुर्रम ने विद्रोह कर दिया।
यह विद्रोह कई वर्षों तक चला।
अंततः उसने समझौता किया, लेकिन इस घटना ने जहांगीर शासन के अंतिम वर्षों को अस्थिर कर दिया।
खुसरो की मृत्यु
खुसरो जहांगीर का विद्रोही पुत्र था, लेकिन एक समय उसे भी संभावित उत्तराधिकारी माना जाता था।
1622 में राजकुमार खुर्रम के नियंत्रण में उसकी मृत्यु हुई।
समकालीन और बाद के स्रोत इस मृत्यु को संदेह की दृष्टि से देखते हैं और व्यापक रूप से इसे राजनीतिक हत्या माना गया।
खुसरो की मृत्यु ने उत्तराधिकार की प्रतिस्पर्धा में खुर्रम की स्थिति मजबूत की।
दक्कन की समस्या
अकबर ने अपने शासन के अंतिम वर्षों में दक्कन की ओर मुगल विस्तार शुरू किया था।
जहांगीर को वहां अहमदनगर और मलिक अंबर की चुनौती का सामना करना पड़ा।
मलिक अंबर मुगल इतिहास के अत्यंत महत्वपूर्ण विरोधियों में था।
वह मूल रूप से अफ्रीकी था, दास के रूप में भारत आया और बाद में अहमदनगर की राजनीति का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गया।
उसने मराठा घुड़सवारों और तेज चलायमान युद्ध-पद्धति का कुशल उपयोग किया।
मलिक अंबर
मलिक अंबर ने मुगलों के खिलाफ ऐसी युद्ध-पद्धति अपनाई जिसमें विशाल मुगल सेनाएँ अक्सर असहाय साबित होती थीं।
वह सीधी निर्णायक लड़ाई से बचता।
तेज गति से हमला करता।
आपूर्ति मार्ग काटता।
छोटे दस्तों से परेशान करता।
और फिर पीछे हट जाता।
आगे मराठा शक्ति ने भी इसी प्रकार की चलायमान युद्ध-पद्धति को बड़े स्तर पर विकसित किया।
जहांगीर की आत्मकथा में मलिक अंबर के प्रति तीखी व्यक्तिगत भाषा मिलती है, जो यह बताती है कि मुगल दरबार उसे कितनी बड़ी बाधा मानता था।
खुर्रम की दक्कन सफलता
1616–1617 के आसपास खुर्रम को दक्कन भेजा गया।
मुगल सैन्य दबाव और राजनीतिक समझौतों के परिणामस्वरूप अहमदनगर पक्ष को कुछ समय के लिए समझौता करना पड़ा।
खुर्रम की प्रतिष्ठा इतनी बढ़ी कि उसे “शाहजहाँ” की उपाधि दी गई।
लेकिन दक्कन का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ।
मलिक अंबर ने फिर शक्ति संगठित की।
जहांगीर की मृत्यु तक मुगल साम्राज्य दक्कन पर स्थायी निर्णायक नियंत्रण स्थापित नहीं कर पाया।
यह संघर्ष आगे शाहजहाँ और औरंगजेब के काल में और बढ़ा।
कंधार और फारस
मुगल साम्राज्य के लिए कंधार अत्यंत महत्वपूर्ण था।
यह भारत, मध्य एशिया और फारस के बीच सामरिक द्वार था।
अकबर ने 1595 में कंधार पर अधिकार किया था।
लेकिन फारस के सफवी शासक भी उस पर दावा करते थे।
1622 में शाह अब्बास प्रथम ने कंधार पर आक्रमण किया।
मुगल सत्ता उसे बचा नहीं सकी।
कंधार फारस के हाथ चला गया।
यह जहांगीर की विदेश नीति की बड़ी विफलताओं में गिना जाता है।
जहांगीर खुर्रम को कंधार अभियान पर भेजना चाहता था, लेकिन राजकुमार ने राजनीतिक परिस्थितियों के कारण आदेश मानने में हिचक दिखाई।
इसी तनाव ने खुर्रम के विद्रोह को बढ़ाया।
मुगल और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी
जहांगीर के काल में यूरोपीय व्यापारिक शक्तियों के साथ संबंध अधिक महत्वपूर्ण होने लगे।
पुर्तगाली पहले से भारत के समुद्री व्यापार में मजबूत थे।
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी 1600 में स्थापित हो चुकी थी।
कंपनी भारत में स्थायी व्यापारिक अधिकार चाहती थी।
कैप्टन विलियम हॉकिन्स 1608 के आसपास जहांगीर के दरबार पहुंचा।
वह अंग्रेज राजा जेम्स प्रथम की ओर से व्यापारिक सुविधा चाहता था।
लेकिन पुर्तगाली प्रभाव और दरबारी राजनीति के कारण उसे व्यापक स्थायी सफलता नहीं मिली।
सर थॉमस रो
1615 में इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम ने सर थॉमस रो को जहांगीर के दरबार में राजदूत बनाकर भेजा।
रो कई वर्षों तक मुगल दरबार में रहा।
उसका उद्देश्य अंग्रेज व्यापारियों के लिए स्थायी व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करना था।
जहांगीर ने अंग्रेजों को कुछ व्यापारिक अवसर दिए।
सूरत सहित पश्चिमी तट पर अंग्रेजी व्यापार मजबूत होने लगा।
उस समय मुगल दरबार अंग्रेजों को भविष्य की साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में नहीं देखता था।
वे अनेक विदेशी व्यापारियों में से एक छोटे यूरोपीय व्यापारिक समूह थे।
किसी को कल्पना भी नहीं थी कि लगभग ढाई शताब्दी बाद यही कंपनी मुगल सम्राट को सत्ता से बाहर करने वाली शक्ति बन जाएगी।
पुर्तगालियों के साथ तनाव
जहांगीर के समय पुर्तगालियों का समुद्री प्रभुत्व अभी मजबूत था।
1613 में पुर्तगालियों द्वारा एक शाही जहाज पकड़े जाने की घटना ने मुगल दरबार को नाराज किया।
इस जहाज का संबंध मरियम-उज-जमानी से बताया जाता है।
मुगल प्रशासन ने पुर्तगाली प्रतिष्ठानों के विरुद्ध कार्रवाई की।
इसी प्रकार की घटनाओं ने अंग्रेज व्यापारियों के लिए अवसर बढ़ाया क्योंकि मुगल दरबार समुद्री व्यापार में पुर्तगाली एकाधिकार से असंतुष्ट था।
व्यापार और अर्थव्यवस्था
जहांगीर के शासन में मुगल भारत विश्व व्यापार का बड़ा केंद्र बना रहा।
भारतीय सूती वस्त्र, रेशम, नील, मसाले और अन्य वस्तुओं की अंतरराष्ट्रीय मांग थी।
सूरत पश्चिमी समुद्री व्यापार का प्रमुख बंदरगाह था।
बंगाल वस्त्र और अन्य उत्पादों का बड़ा केंद्र था।
आगरा, लाहौर, अहमदाबाद और दिल्ली जैसे नगर व्यापार तथा उत्पादन के महत्वपूर्ण केंद्र बने रहे।
यूरोपीय व्यापारी भारत से वस्तुओं के बदले बड़ी मात्रा में चांदी लाते थे।
इससे भारतीय मौद्रिक अर्थव्यवस्था में चांदी की उपलब्धता बढ़ी।
लेकिन विशाल साम्राज्य की समृद्धि और सामान्य किसान की समृद्धि एक ही बात नहीं थी।
राज्य की मुख्य आय भूमि-राजस्व से आती थी और इसका भार कृषक समाज पर था।
जहांगीर और चित्रकला
जहांगीर का नाम मुगल चित्रकला के इतिहास में विशेष सम्मान से लिया जाता है।
अकबर के समय विशाल कथा-चित्र परियोजनाएँ विकसित हुई थीं।
जहांगीर के समय चित्रकला अधिक सूक्ष्म, प्राकृतिक और व्यक्तिकेंद्रित हुई।
उसे चित्रों की पहचान और कलाकारों की शैली पहचानने की अद्भुत क्षमता होने का दावा था।
उसने अपनी आत्मकथा में लिखा कि वह किसी चित्र में अलग-अलग कलाकारों के बनाए हिस्सों तक को पहचान सकता था।
दरबार में व्यक्तिचित्रों का विकास हुआ।
प्राकृतिक दृश्य,
पशु-पक्षी,
दुर्लभ जीव,
फूल-पौधे,
और विदेशी व्यक्तियों के चित्र बड़ी सूक्ष्मता से बनाए गए।
उस्ताद मंसूर
जहांगीर के दरबार के महान चित्रकारों में उस्ताद मंसूर का नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
वह पशु-पक्षियों और प्राकृतिक वस्तुओं के अत्यंत सूक्ष्म चित्र बनाने के लिए प्रसिद्ध था।
जहांगीर ने उसे “नादिर-उल-असर”—अर्थात युग का अद्वितीय व्यक्ति—जैसी उपाधि दी।
उसके बनाए पक्षियों और जानवरों के चित्र आज भी इतिहास, कला और प्राकृतिक अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
जहांगीर की प्रकृति में रुचि के कारण मुगल चित्रकला केवल दरबार और युद्ध तक सीमित नहीं रही।
प्रकृति का पर्यवेक्षक
जहांगीर की आत्मकथा में पशु-पक्षियों, पेड़ों, फूलों, मौसम और असामान्य प्राकृतिक घटनाओं के विस्तृत विवरण मिलते हैं।
वह कभी जानवरों की शारीरिक विशेषताओं का निरीक्षण करता।
कभी किसी नए पक्षी का वर्णन कराता।
कभी पौधों और फलों की तुलना करता।
इसी कारण कुछ आधुनिक इतिहासकार उसे अपने समय का असाधारण प्राकृतिक पर्यवेक्षक मानते हैं।
यह आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति नहीं थी, लेकिन मध्यकालीन राजदरबार के संदर्भ में उसकी जिज्ञासा उल्लेखनीय थी।
जहांगीरनामा
जहांगीर ने अपनी आत्मकथा लिखी जिसे ‘तुजुक-ए-जहांगीरी’ या ‘जहांगीरनामा’ कहा जाता है।
यह मुगल इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत है।
इसमें वह अपने शासन की घटनाओं के साथ व्यक्तिगत पसंद-नापसंद तक दर्ज करता है।
वह विद्रोहियों की चर्चा करता है।
कलाकारों की प्रशंसा करता है।
जानवरों का वर्णन करता है।
शराब की अपनी आदत लिखता है।
दंडों और नियुक्तियों का उल्लेख करता है।
इससे इतिहासकार को केवल सम्राट की राजनीति नहीं बल्कि उसके मन और दृष्टि की भी झलक मिलती है।
लेकिन किसी आत्मकथा की तरह यह भी लेखक के अपने दृष्टिकोण वाला स्रोत है।
जहांगीर विरोधियों का मूल्यांकन निष्पक्ष इतिहासकार की तरह नहीं बल्कि सम्राट की तरह करता है।
स्थापत्य
जहांगीर का शासन शाहजहाँ की तरह विशाल भवन निर्माण के लिए प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन इस समय स्थापत्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।
नूरजहां ने अपने पिता एतमाद-उद-दौला का मकबरा आगरा में बनवाया।
इस मकबरे में सफेद संगमरमर और रंगीन पत्थरों की जड़ाई का अत्यंत सुंदर उपयोग दिखाई देता है।
इसे कई बार शाहजहाँ काल की परिपक्व संगमरमर वास्तुकला की महत्वपूर्ण पूर्वपीठिका माना जाता है।
जहांगीर का अपना मकबरा लाहौर के निकट शाहदरा में बना।
यह भी मुगल उद्यान-मकबरा परंपरा का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
धार्मिक नीति
जहांगीर ने अकबर की धार्मिक नीति को पूरी तरह उलट नहीं दिया।
राजपूत और हिंदू अधिकारी उच्च पदों पर बने रहे।
जजिया फिर लागू नहीं किया गया।
विभिन्न धार्मिक समुदाय सामान्य रूप से साम्राज्य में सक्रिय रहे।
लेकिन जहांगीर अकबर जैसे व्यापक धार्मिक प्रयोगों में रुचि नहीं रखता था।
उसके शासन में इबादतखाना जैसी परियोजना आगे नहीं बढ़ी।
उसका व्यवहार कभी सहिष्णु और कभी कठोर दिखाई देता है।
गुरु अर्जन देव की मृत्यु इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है।
कुछ जैन और अन्य धार्मिक व्यक्तियों के साथ भी तनाव के प्रसंग मिलते हैं।
इसलिए जहांगीर की धार्मिक नीति को न अकबर जैसी पूर्ण निरंतरता और न औरंगजेब जैसी बाद की रूढ़िवादी नीति के समान समझना चाहिए।
जहांगीर और इस्लामी पहचान
जहांगीर स्वयं मुसलमान शासक था और अपनी धार्मिक पहचान से जुड़ा था।
वह सूफी संतों के प्रति सम्मान रखता था।
अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गया।
लेकिन प्रशासनिक पदों के लिए धर्म एकमात्र कसौटी नहीं था।
राजपूत और अन्य हिंदू अधिकारी राज्य के प्रमुख पदों पर बने रहे।
मुगल शासन की व्यावहारिक राजनीतिक संरचना अकबर के समय से इतनी गहराई से मिश्रित हो चुकी थी कि उसे अचानक धार्मिक आधार पर पुनर्गठित करना आसान नहीं था।
महाबत खान का विद्रोह
जहांगीर के शासन के अंतिम वर्षों में एक असाधारण घटना हुई।
महाबत खान मुगल साम्राज्य का शक्तिशाली सेनापति था।
नूरजहां और दरबारी राजनीति से उसका तनाव बढ़ गया।
1626 में उसने जहांगीर को लगभग बंदी बना लिया।
यह घटना झेलम नदी के क्षेत्र से जुड़ी थी।
नूरजहां ने अत्यंत साहस और राजनीतिक चतुराई से स्थिति संभालने की कोशिश की।
वह स्वयं महाबत खान के नियंत्रण में गई और धीरे-धीरे उसके प्रभाव को कमजोर किया।
अंततः जहांगीर और नूरजहां उसके नियंत्रण से निकलने में सफल हुए।
यह घटना बताती है कि सम्राट के शासन के अंतिम चरण तक केंद्रीय सत्ता के भीतर गुटबाजी कितनी बढ़ चुकी थी।
नूरजहां : सत्ता की सबसे प्रभावशाली मुगल महिला?
मुगल इतिहास में कई शाही महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन नूरजहां का प्रभाव असाधारण था।
उनके नाम पर सिक्के,
उनके परिवार की उच्च नियुक्तियाँ,
विवाह संबंधों की राजनीति,
शिकार और सार्वजनिक उपस्थिति,
और उत्तराधिकार प्रश्न में उनकी भूमिका उन्हें विशिष्ट बनाती है।
लेकिन उन्हें “मुगल साम्राज्य की वास्तविक शासक” कह देना भी अत्यधिक सरल निष्कर्ष होगा।
उनकी शक्ति जहांगीर की वैधानिक सत्ता पर आधारित थी।
साथ ही राजकुमार खुर्रम, महाबत खान, आसफ खान और अन्य कुलीन स्वतंत्र शक्ति केंद्र थे।
उनका प्रभाव अत्यंत बड़ा था, लेकिन पूर्ण नहीं।
जहांगीर और कश्मीर
जहांगीर को कश्मीर से विशेष प्रेम था।
वह कई बार वहां गया।
कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता, बागों और जलवायु का उसने अपनी आत्मकथा में उल्लेख किया।
मुगल बाग संस्कृति के विकास में कश्मीर महत्वपूर्ण केंद्र बना।
शालीमार और अन्य बागों की परंपरा जहांगीर और शाहजहाँ काल में विशेष रूप से विकसित हुई।
कश्मीर की यात्राएँ अंततः जहांगीर के जीवन के अंतिम अध्याय से भी जुड़ीं।
स्वास्थ्य का गिरना
1620 के दशक तक जहांगीर का स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा।
दमा,
शराब और अफीम का लंबे समय तक सेवन,
और अन्य बीमारियों ने उसे कमजोर कर दिया।
वह बेहतर जलवायु के लिए कश्मीर और पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों की यात्रा करता रहा।
राजनीतिक निर्णयों में नूरजहां और निकट अधिकारियों की भूमिका बढ़ती गई।
लेकिन उसी समय उत्तराधिकार संघर्ष भी अधिक तीखा होता गया।
जहांगीर की मृत्यु
1627 में कश्मीर से लौटते समय जहांगीर की तबीयत बहुत खराब हो गई।
28 अक्टूबर 1627 को राजौरी और भीमबर के बीच यात्रा के दौरान उसकी मृत्यु हुई।
उसके शव को लाहौर ले जाया गया।
शाहदरा में उसे दफनाया गया।
उसका मकबरा बाद में नूरजहां और शाहजहाँ काल से जुड़े निर्माणों के माध्यम से पूरा हुआ।
उसकी मृत्यु के साथ उत्तराधिकार संघर्ष खुलकर सामने आ गया।
जहांगीर की मृत्यु के बाद सत्ता संघर्ष
नूरजहां अपने दामाद शहरयार को सिंहासन पर बैठाना चाहती थीं।
दूसरी ओर उनके भाई आसफ खान राजकुमार खुर्रम का समर्थन कर रहे थे।
आसफ खान ने तेजी से राजनीतिक नियंत्रण संभाला।
कुछ समय के लिए दावर बख्श को प्रतीकात्मक रूप से सिंहासन पर बैठाया गया।
खुर्रम को संदेश भेजा गया।
अंततः खुर्रम विजयी हुआ।
1628 में उसने “शाहजहाँ” के नाम से मुगल सिंहासन संभाला।
शहरयार सहित संभावित प्रतिद्वंद्वियों को समाप्त कर दिया गया।
इस प्रकार जहांगीर की मृत्यु के बाद वही रक्तरंजित उत्तराधिकार परंपरा फिर दोहराई गई जो मुगल राजवंश की स्थायी कमजोरी थी।
जहांगीर की प्रमुख उपलब्धियाँ
जहांगीर ने अकबर का साम्राज्य बड़े पैमाने पर सुरक्षित रखा।
मेवाड़ के साथ लंबे संघर्ष का राजनीतिक समाधान किया।
राजकुमार खुर्रम के माध्यम से दक्कन में अस्थायी सफलताएँ प्राप्त कीं।
मुगल प्रशासन और मनसबदारी की मूल संरचना को जारी रखा।
यूरोपीय व्यापारियों के साथ संपर्क बढ़ा।
चित्रकला और प्राकृतिक अध्ययन को अभूतपूर्व संरक्षण दिया।
नूरजहां और उनके परिवार के माध्यम से फारसी सांस्कृतिक प्रभाव और गहरा हुआ।
जहांगीरनामा जैसा महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत छोड़ा।
प्रमुख विफलताएँ और समस्याएँ
कंधार का फारस के हाथ चले जाना बड़ी सामरिक क्षति थी।
दक्कन में मलिक अंबर को निर्णायक रूप से नहीं हराया जा सका।
खुसरो और खुर्रम के विद्रोहों ने उत्तराधिकार समस्या को उजागर किया।
महाबत खान द्वारा सम्राट को बंदी बना लेना केंद्रीय सत्ता की कमजोरी का गंभीर संकेत था।
नूरजहां गुट और अन्य दरबारी समूहों की प्रतिस्पर्धा ने शासन के अंतिम वर्षों को अस्थिर किया।
गुरु अर्जन देव की मृत्यु ने सिख समुदाय और मुगल सत्ता के संबंधों में दीर्घकालीन तनाव पैदा किया।
1605–1627 : प्रमुख समयरेखा
अक्टूबर 1605 — अकबर की मृत्यु; सलीम जहांगीर के रूप में सिंहासन पर।
1606 — राजकुमार खुसरो का विद्रोह।
1606 — गुरु अर्जन देव की गिरफ्तारी और मृत्यु; मुगल-सिख संबंधों में निर्णायक मोड़।
1608 के आसपास — विलियम हॉकिन्स मुगल दरबार पहुंचा।
1611 — जहांगीर का मेहरुन्निसा से विवाह; आगे नूरजहां के रूप में उनका उदय।
1613 — पुर्तगालियों से समुद्री व्यापार संबंधी गंभीर तनाव।
1615 — मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह से समझौता।
1615 — सर थॉमस रो जहांगीर के दरबार में अंग्रेज राजदूत के रूप में पहुंचा।
1616–1617 — राजकुमार खुर्रम का दक्कन अभियान; प्रतिष्ठा में वृद्धि।
1622 — सफवी फारस द्वारा कंधार पर अधिकार।
1622 — खुसरो की मृत्यु।
1622–1625 के आसपास — राजकुमार खुर्रम का विद्रोह।
1626 — महाबत खान द्वारा जहांगीर को बंदी बनाए जाने की घटना।
28 अक्टूबर 1627 — जहांगीर की मृत्यु।
1628 — उत्तराधिकार संघर्ष के बाद खुर्रम शाहजहाँ के रूप में सम्राट बना।
अकबर और जहांगीर में मूल अंतर
अकबर साम्राज्य निर्माता था।
जहांगीर साम्राज्य का उत्तराधिकारी और संरक्षक।
अकबर ने नई प्रशासनिक संस्थाएँ विकसित कीं।
जहांगीर ने उन्हें मुख्यतः जारी रखा।
अकबर विभिन्न धर्मों की विचारधाराओं के प्रयोग में गहराई से गया।
जहांगीर ने उस प्रयोगशीलता को बहुत आगे नहीं बढ़ाया।
अकबर ने बड़े पैमाने पर भू-राजनीतिक विस्तार किया।
जहांगीर के समय विस्तार सीमित रहा और मुख्य जोर मौजूदा क्षेत्रों को बनाए रखने पर था।
लेकिन चित्रकला, प्राकृतिक अध्ययन और व्यक्तिचित्र में जहांगीर का काल अकबर से भी अधिक परिष्कृत सिद्ध हुआ।
जहांगीर का ऐतिहासिक मूल्यांकन
जहांगीर अक्सर अकबर और शाहजहाँ की चमक के बीच दब जाता है।
अकबर को विशाल साम्राज्य का निर्माता कहा जाता है।
शाहजहाँ ताजमहल और स्थापत्य के कारण विश्व प्रसिद्ध है।
इस बीच जहांगीर को कई बार केवल नूरजहां के प्रभाव और शराब की आदत से जोड़कर देखा जाता है।
यह दृष्टि अधूरी है।
उसने बाईस वर्ष तक विशाल साम्राज्य को संभाला।
मेवाड़ जैसे पुराने संघर्ष को समाप्त किया।
कला को अद्वितीय स्तर पर पहुंचाया।
विदेशी व्यापारियों को नियंत्रित वातावरण में प्रवेश दिया।
प्रकृति और चित्रकला के ऐसे अभिलेख छोड़े जो इतिहास के लिए अत्यंत मूल्यवान हैं।
लेकिन उसका शासन यह भी दिखाता है कि अकबर द्वारा बनाई गई मजबूत संरचना के भीतर दरबारी और राजवंशीय तनाव लगातार मौजूद थे।
निष्कर्ष
1605 में जहांगीर को अपने पिता अकबर से एक विशाल और संगठित साम्राज्य मिला था।
1627 में उसने अपने उत्तराधिकारी के लिए उस साम्राज्य का अधिकांश हिस्सा सुरक्षित छोड़ा।
इस अर्थ में उसका शासन मुगल सत्ता के विघटन का काल नहीं था।
लेकिन सतह के नीचे कई समस्याएँ उभर रही थीं।
राजकुमार विद्रोह कर रहे थे।
उत्तराधिकार का नियम अब भी नहीं था।
दक्कन मुगल सेना को चुनौती दे रहा था।
कंधार हाथ से निकल गया था।
सिख समुदाय के साथ संबंधों में नई कठोरता आ गई थी।
और दरबार में शाही परिवार तथा सैन्य कुलीनों के अलग-अलग गुट सक्रिय थे।
फिर भी सांस्कृतिक क्षेत्र में यह काल असाधारण था।
जहांगीर की आंख युद्धभूमि से अधिक प्रकृति की बारीकियों को भी देखती थी।
वह किसी दुर्लभ पक्षी को चित्रित कराता था।
किसी नए पशु का वर्णन लिखता था।
कलाकार की रेखा पहचानने का दावा करता था।
और अपने निजी जीवन की कमजोरियों तक को आत्मकथा में दर्ज करता था।
यही उसका विशिष्ट स्थान है।
यदि बाबर ने मुगल सत्ता की नींव रखी, हुमायूँ ने उसे खोकर वापस पाया, और अकबर ने उसे विशाल संगठित साम्राज्य बनाया,
तो जहांगीर ने उस साम्राज्य को स्थिरता, दरबारी परिष्कार और सांस्कृतिक गहराई प्रदान की।
लेकिन उसके शासन के अंतिम वर्षों में जो उत्तराधिकार संघर्ष और दरबारी गुटबाजी दिखाई दी, वही आगे शाहजहाँ के अंतिम काल में कहीं अधिक हिंसक रूप में सामने आने वाली थी।