ऑपरेशन विजय और निर्णायक लड़ाइयाँ
टोलोलिंग से टाइगर हिल और प्वाइंट 4875 तक भारतीय सेना का कठिन पर्वतीय प्रतिआक्रमण
भारतीय सेना ने घुसपैठियों को नियंत्रण रेखा के भारतीय भाग से हटाने के लिए ऑपरेशन विजय चलाया। अभियान का मूल स्वरूप ऊँचाई पर बैठे, पहले से तैयार शत्रु के विरुद्ध रात में चढ़ाई, तोपखाने की सघन सहायता और छोटी टुकड़ियों के साहसी आक्रमण का था।
सेना की तैनाती और रणनीति
स्थिति स्पष्ट होते ही अतिरिक्त ब्रिगेड और डिवीजन मुख्यालय करगिल क्षेत्र में भेजे गए। भारतीय रणनीति ने पहले घुसपैठ को फैलने से रोका, फिर राजमार्ग के लिए खतरा बने प्रमुख ठिकानों को अलग-अलग निशाना बनाया। नियंत्रण रेखा पार न करने के राजनीतिक निर्देश ने युद्ध को सीमित रखा, लेकिन सैन्य विकल्पों को कठिन भी बनाया।
155 मिमी बोफोर्स तोपों ने ऊँचाइयों पर बने ठिकानों, आपूर्ति मार्गों और संगठित प्रतिरोध पर प्रभावी प्रहार किए। अग्रिम प्रेक्षकों, पैदल सैनिकों और तोपखाने का समन्वय अनेक लड़ाइयों में निर्णायक रहा। पर्वतीय युद्ध ने प्रशिक्षण, रसद, विशेष वस्त्र, संचार और चिकित्सा निकासी की सीमाओं की भी परीक्षा ली।
टोलोलिंग की विजय
द्रास क्षेत्र में टोलोलिंग पर कब्जा राष्ट्रीय राजमार्ग की सुरक्षा और भारतीय अभियान के मनोबल के लिए निर्णायक था। आरंभिक प्रयासों में भारी हताहत हुए। 2 राजपूताना राइफल्स ने सुविचारित रात्रि-आक्रमण और तोपखाने की सहायता से 13 जून को शीर्ष पर नियंत्रण स्थापित किया।
मेजर विवेक गुप्ता सहित अनेक सैनिकों ने इस लड़ाई में सर्वोच्च बलिदान दिया। टोलोलिंग की सफलता ने दिखाया कि अत्यंत प्रतिकूल ऊँचाई के बावजूद व्यवस्थित तैयारी और लगातार दबाव से पाकिस्तानी ठिकाने तोड़े जा सकते हैं। इसके बाद द्रास उपक्षेत्र में अभियान की गति बदली।
प्वाइंट 5140
13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स को प्वाइंट 5140 पर कब्जे का दायित्व मिला। कैप्टन विक्रम बत्रा और लेफ्टिनेंट जामवाल की टुकड़ियों ने कठिन चढ़ाई के बाद शत्रु ठिकानों पर धावा बोला। इस सफलता ने टोलोलिंग परिसर में आगे की कार्रवाई के लिए सामरिक बढ़त दी।
विजय संदेश ‘ये दिल माँगे मोर’ जनस्मृति का हिस्सा बना, लेकिन सैन्य दृष्टि से इसकी असली महत्ता यह थी कि भारतीय सेना ने द्रास क्षेत्र में एक और ऊँचा प्रभुत्वशाली ठिकाना वापस लिया और शत्रु की परस्पर सहायता करने वाली स्थितियों को कमजोर किया।
टाइगर हिल का पुनः नियंत्रण
टाइगर हिल की विशिष्ट आकृति और राजमार्ग पर दृष्टि के कारण यह युद्ध का प्रतीक बन गया। 18 ग्रेनेडियर्स, 8 सिख और सहयोगी टुकड़ियों ने बहुदिशीय आक्रमण किया। ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव ने घातक चोटों के बावजूद अग्रिम चढ़ाई और बंकर निष्क्रिय करने में असाधारण भूमिका निभाई।
4 जुलाई तक शीर्ष पर भारतीय नियंत्रण स्थापित हो गया। इस विजय का प्रभाव सामरिक होने के साथ मनोवैज्ञानिक और कूटनीतिक भी था—उसी दिन वॉशिंगटन में नवाज शरीफ पर नियंत्रण रेखा बहाल करने का दबाव बढ़ा।
खालूबार, प्वाइंट 4875 और अंतिम चरण
बटालिक क्षेत्र में खालूबार पर 1/11 गोरखा राइफल्स की कार्रवाई में लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय ने अग्रिम नेतृत्व करते हुए कई ठिकाने नष्ट किए और बलिदान दिया। मश्कोह क्षेत्र के प्वाइंट 4875 पर 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स की लड़ाई में कैप्टन विक्रम बत्रा शहीद हुए; राइफलमैन संजय कुमार ने भी असाधारण साहस प्रदर्शित किया।
जुलाई के मध्य तक प्रमुख ऊँचाइयाँ वापस ली जा चुकी थीं और पाकिस्तानी वापसी शुरू हो गई। 14 जुलाई को प्रधानमंत्री वाजपेयी ने ऑपरेशन की सफलता की घोषणा की दिशा स्पष्ट की; 26 जुलाई को सेना ने घुसपैठियों की पूर्ण बेदखली घोषित की। यही तिथि करगिल विजय दिवस बनी।
ऑपरेशन विजय की सफलता भारतीय पैदल सैनिकों के साहस के साथ तोपखाने, इंजीनियरिंग, रसद और नेतृत्व की संयुक्त उपलब्धि थी। फिर भी आरंभिक आश्चर्य और उपकरणों की कमी ने भारी मानवीय कीमत वसूल की। करगिल की लड़ाइयाँ बताती हैं कि पर्वतीय युद्ध में छोटी सामरिक ऊँचाइयाँ भी राष्ट्रीय स्तर के परिणाम उत्पन्न कर सकती हैं।