पृष्ठभूमि, भूगोल और घुसपैठ
सियाचिन, लाहौर घोषणा और करगिल की दुर्गम चोटियों के बीच तैयार हुई पाकिस्तानी योजना
करगिल युद्ध को समझने के लिए नियंत्रण रेखा, श्रीनगर–लेह मार्ग, ऊँची पर्वतीय चौकियों और 1998–99 के भारत–पाक संबंधों को साथ पढ़ना आवश्यक है। घुसपैठ किसी आकस्मिक स्थानीय कार्रवाई का परिणाम नहीं, बल्कि ऊँचाइयों पर कब्जा कर भारत की संचार-रेखा पर दबाव बनाने का संगठित प्रयास थी।
नियंत्रण रेखा से सियाचिन तक
1949 की युद्धविराम रेखा को 1972 के शिमला समझौते के बाद नियंत्रण रेखा का स्वरूप मिला। करगिल–द्रास–बटालिक क्षेत्र में यह रेखा अत्यंत ऊँचे, विरल आबादी वाले और कठिन पर्वतीय भूभाग से गुजरती है। सर्दियों में कई अग्रिम चौकियाँ खाली करने की व्यावहारिक परंपरा दोनों ओर रही, किंतु इसी मौसमी रिक्तता ने 1998–99 में गंभीर सुरक्षा जोखिम पैदा किया।
1984 से सियाचिन पर जारी सैन्य टकराव ने पूरे उत्तरी क्षेत्र का सामरिक महत्व बढ़ाया। पाकिस्तान के लिए करगिल की ऊँचाइयों से राष्ट्रीय राजमार्ग 1A—तत्कालीन श्रीनगर–लेह जीवनरेखा—पर निगरानी और गोलाबारी की क्षमता भारत की लद्दाख तथा सियाचिन आपूर्ति को प्रभावित करने का साधन बन सकती थी।
परमाणु परीक्षण और लाहौर की आशा
मई 1998 में भारत और पाकिस्तान के परमाणु परीक्षणों ने दक्षिण एशिया को घोषित परमाणु प्रतिद्वंद्विता के नए चरण में पहुँचा दिया। फरवरी 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा और लाहौर घोषणा ने संवाद तथा परमाणु जोखिम घटाने की आशा जगाई।
इसी समय पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व ने करगिल क्षेत्र में अपनी योजना को आगे बढ़ाया। करगिल समीक्षा समिति ने बाद में माना कि पाकिस्तान की गणना में परमाणु प्रतिरोध, सीमित भारतीय प्रतिक्रिया और शीघ्र अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की अपेक्षा महत्वपूर्ण थी। इसीलिए युद्ध ने लाहौर प्रक्रिया और पाकिस्तानी सैन्य निर्णय के बीच तीखा विरोधाभास उजागर किया।
द्रास, मश्कोह, काकसर और बटालिक
संघर्ष चार प्रमुख उपक्षेत्रों में फैला था—मश्कोह घाटी, द्रास, काकसर और बटालिक। कई ठिकाने 15,000 से 18,000 फीट की ऊँचाई के आसपास थे। विरल हवा, हिम, खड़ी चट्टानें और खुले ढलान आक्रमणकारी सैनिकों को गंभीर नुकसान की स्थिति में रखते थे, जबकि ऊँचाई पर बैठे रक्षकों को निगरानी और गोलीबारी का लाभ मिलता था।
टोलोलिंग, टाइगर हिल, प्वाइंट 5140, प्वाइंट 4875 और खालूबार जैसी विशेषताएँ केवल मानचित्र के बिंदु नहीं थीं। इनके नियंत्रण से आसपास की घाटियों, सैन्य गतिविधियों और राजमार्ग पर प्रभाव पड़ता था। इसलिए भारतीय अभियान में हर चोटी की पुनर्प्राप्ति एक अलग, कठिन पैदल-सैन्य लड़ाई बनी।
नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री की भूमिका
पाकिस्तान ने प्रारंभ में घुसपैठियों को कश्मीरी ‘मुजाहिदीन’ बताने का प्रयास किया, लेकिन दस्तावेजों, शवों, युद्धबंदियों, संचार-अवरोधों और बाद के पाकिस्तानी वृत्तांतों से नियमित सेना—विशेषकर नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री—की केंद्रीय भूमिका स्पष्ट हुई। विशेष बल और तोपखाने ने भी अभियान को सहयोग दिया।
योजना का उद्देश्य ऊँचाइयों पर अनेक संगठित ‘संगर’ स्थापित करना, भारतीय गश्त से बचते हुए स्थिति मजबूत करना और देर से अपनी उपस्थिति प्रकट करना था। करगिल समीक्षा समिति के अनुसार पाकिस्तानी गणना थी कि अंतरराष्ट्रीय दबाव शीघ्र युद्धविराम करा देगा और कब्जे वाले भूभाग पर उसे सौदेबाजी की स्थिति मिल जाएगी।
घुसपैठ का पता और प्रारंभिक आकलन
मई के आरंभ में स्थानीय चरवाहों और भारतीय गश्तों से संदिग्ध गतिविधि की सूचना मिली। कैप्टन सौरभ कालिया के नेतृत्व वाली गश्ती टुकड़ी के लापता होने और विभिन्न उपक्षेत्रों में संपर्क के बाद घुसपैठ की गंभीरता सामने आने लगी। प्रारंभिक अनुमान सीमित आतंकवादी घुसपैठ का था; शीघ्र स्पष्ट हुआ कि अनेक ऊँचाइयों पर भारी हथियारों और रसद सहित नियमित सैनिक तैनात हैं।
करगिल समीक्षा समिति ने इस घुसपैठ को सरकार, सेना और खुफिया एजेंसियों के लिए ‘पूर्ण आश्चर्य’ माना। उपलब्ध संकेत अलग-अलग संस्थाओं तक पहुँचे, पर उनका समेकित मूल्यांकन बड़े सैन्य कब्जे की चेतावनी में नहीं बदल सका। यही युद्धोत्तर सुधारों का केंद्रीय प्रश्न बना।
करगिल की प्रारंभिक विफलता केवल एक गश्त या एक संस्था की चूक नहीं थी। भूगोल को लेकर बनी धारणाएँ, मौसमी तैनाती, बिखरी खुफिया सूचनाएँ और पाकिस्तान की रणनीतिक मंशा का कम आकलन परस्पर जुड़े कारण थे। दूसरी ओर पाकिस्तान की योजना भी भारत की प्रतिक्रिया, रसद की कठिनाई और विश्व जनमत—तीनों का गंभीर गलत अनुमान थी।