वायुसेना, नौसेना और संयुक्त संचालन
ऑपरेशन सफेद सागर और ऑपरेशन तलवार ने सीमित युद्ध को व्यापक सामरिक दबाव में बदला
करगिल अभियान भूमि-युद्ध केंद्रित था, लेकिन उसकी सफलता में भारतीय वायुसेना की सटीक मार, टोही और रसद सहायता तथा भारतीय नौसेना की रणनीतिक तैनाती महत्वपूर्ण थी। इसने तीनों सेनाओं के समन्वय की क्षमता और कमियाँ दोनों उजागर कीं।
ऊँचाई पर वायु शक्ति का प्रयोग
25 मई को वायु शक्ति के प्रयोग को मंजूरी मिली और 26 मई से भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर आरंभ किया। लक्ष्य नियंत्रण रेखा के भारतीय भाग में घुसपैठियों के ठिकाने, रसद मार्ग और सहायता-स्थल थे। राजनीतिक निर्देश स्पष्ट था कि भारतीय विमान नियंत्रण रेखा पार नहीं करेंगे।
अत्यधिक ऊँचाई, छोटे और चट्टानी लक्ष्य, बादल, वायु-रक्षा मिसाइलें और सीमित लक्ष्य-जानकारी ने अभियान को कठिन बनाया। प्रारंभिक चरण में एक मिग-21 और एक मिग-27 खोए तथा एक Mi-17 हेलीकॉप्टर मार गिराया गया। इसके बाद रणनीति, उड़ान-प्रोफाइल और हथियार-प्रयोग में परिवर्तन किया गया।
मिराज 2000 और लेजर-निर्देशित बम
मिराज 2000 विमानों ने टोही, लक्ष्य-निर्धारण और सटीक बमबारी में केंद्रीय भूमिका निभाई। लेजर-निर्देशित हथियारों से मुंथो ढालो तथा टाइगर हिल परिसर जैसे लक्ष्यों पर प्रहार ने ऊँचाई पर स्थित ठिकानों की रसद और कमांड व्यवस्था को कमजोर किया।
वायुसेना ने सेना की अग्रिम प्रगति के लिए शत्रु को दबाया, जबकि परिवहन विमान और हेलीकॉप्टरों ने सैनिक, सामग्री और चिकित्सा निकासी में सहायता दी। करगिल के बाद सटीक हथियार, निगरानी और थल–वायु समन्वय पर अधिक निवेश का तर्क मजबूत हुआ।
अरब सागर में नौसैनिक दबाव
भारतीय नौसेना ने पश्चिमी और पूर्वी बेड़ों के प्रमुख पोतों को अरब सागर में तैनात कर ऑपरेशन तलवार चलाया। इसका उद्देश्य समुद्री मार्गों पर नजर रखना, पाकिस्तान पर व्यापक रणनीतिक दबाव बनाना और संघर्ष के विस्तार की स्थिति में तैयार रहना था।
प्रत्यक्ष नौसैनिक युद्ध नहीं हुआ, लेकिन कराची और पाकिस्तानी समुद्री व्यापार की संवेदनशीलता ने भारत को महत्वपूर्ण प्रतिरोधक लाभ दिया। इस तैनाती ने संदेश दिया कि करगिल में सीमित भू-संघर्ष के बावजूद भारत के पास व्यापक सैन्य विकल्प उपलब्ध हैं।
संयुक्तता की उपलब्धियाँ और सीमाएँ
सेना, वायुसेना और नौसेना ने अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावी कार्रवाई की, किंतु युद्ध ने एकीकृत योजना, साझा खुफिया चित्र और शीर्ष स्तर पर एकल सैन्य सलाह की आवश्यकता उजागर की। प्रारंभिक चरण में वायु शक्ति के उपयोग और लक्ष्य-समन्वय पर मतभेदों ने संस्थागत सुधार का आधार बनाया।
युद्धोत्तर मंत्रियों के समूह ने संयुक्तता बढ़ाने, इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ स्थापित करने और सरकार को एकल-बिंदु सैन्य सलाह की दिशा में सुधार सुझाए। बाद की संस्थागत व्यवस्थाओं—HQ IDS, DIA और अंततः CDS—पर करगिल के अनुभव की स्पष्ट छाप रही।
करगिल में वायु और समुद्री शक्ति का प्रभाव केवल नष्ट किए गए लक्ष्यों से नहीं मापा जा सकता। वायुसेना ने ऊँचाइयों पर लड़ रही सेना की लागत घटाई और नौसेना ने युद्ध को फैलाए बिना सामरिक दबाव बनाया। अनुभव ने सिद्ध किया कि आधुनिक संघर्ष में सेवा-विशेष की सफलता को संयुक्त राजनीतिक-सैन्य उद्देश्य से जोड़ना आवश्यक है।