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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–013 · स्वतंत्र भारत के किसान आंदोलन · अध्याय 13

सिंगूर और नंदीग्राम भूमि आंदोलन

औद्योगीकरण, भूमि-अधिग्रहण और किसान अधिकारों का निर्णायक संघर्ष

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंपादित समेकित शोध संस्करण · 30 अगस्त 2026

सिंगूर और नंदीग्राम केवल दो स्थानीय भूमि विवाद नहीं थे। उन्होंने उस वाम मोर्चा सरकार को उसके ही ऐतिहासिक आधार—भूमि सुधार और किसान अधिकार—की कसौटी पर खड़ा किया, जिसने तीन दशक से अधिक समय तक पश्चिम बंगाल पर शासन किया था। सिंगूर में टाटा नैनो कारखाने के लिए उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण और नंदीग्राम में प्रस्तावित रासायनिक औद्योगिक क्षेत्र की आशंका ने भूमि-मालिकों, बर्गादारों, खेत मजदूरों, उद्योग, दलों और राज्य-शक्ति के संबंधों को नए सिरे से परिभाषित किया। 14 मार्च 2007 की पुलिस कार्रवाई, 2008 में टाटा की विदाई, 2011 का सत्ता परिवर्तन और 2016–2025 के न्यायिक निर्णय इस संघर्ष को स्वतंत्र भारत की भूमि-अधिग्रहण राजनीति का निर्णायक अध्याय बनाते हैं।

खंड 1

भूमि सुधार से औद्योगीकरण के संकट तक

जिस भूमि सुधार ने वाम मोर्चे को शक्ति दी, वही भूमि उसके संकट का कारण बनी

1977 में सत्ता में आए पश्चिम बंगाल के वाम मोर्चे की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में भूमि सुधार और ऑपरेशन बर्गा थे। बटाईदारों को दर्ज करना, ग्रामीण सत्ता-संबंधों में बदलाव और पंचायत व्यवस्था ने सीपीआई(एम) तथा वाम मोर्चे को विशाल ग्रामीण सामाजिक आधार दिया।

लेकिन 1990 के दशक के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था बदल रही थी। उदारीकरण, निजी पूंजी, नए उद्योग और राज्यों के बीच निवेश आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा बढ़ी। पश्चिम बंगाल के सामने प्रश्न था कि कृषि क्षेत्र की उपलब्धियों के बाद बड़े पैमाने पर रोजगार कहां से आएगा।

ज्योति बसु के बाद 2000 में मुख्यमंत्री बने ने औद्योगिक पुनरुत्थान को प्राथमिकता दी।

यहीं वाम राजनीति का ऐतिहासिक अंतर्विरोध सामने आया।

जिस सरकार ने किसान को भूमि-अधिकार देकर अपनी ग्रामीण वैधता बनाई थी, वही अब बड़े उद्योग के लिए कृषि भूमि जुटा रही थी।

समस्या केवल उद्योग की नहीं थी—भूमि चुनने की प्रक्रिया भी विवाद का केंद्र थी

सरकार का तर्क था कि पश्चिम बंगाल को रोजगार, पूंजी और विनिर्माण की आवश्यकता है। उद्योग के बिना केवल कृषि पर निर्भर अर्थव्यवस्था युवा आबादी को पर्याप्त रोजगार नहीं दे सकती।

यह तर्क अपने आप में असंगत नहीं था।

भूमि मालिक की सहमति कितनी आवश्यक?

बर्गादार और खेत मजदूर का क्या होगा?

किसान को केवल भूमि की बाजार कीमत मिलेगी या उसकी भावी आजीविका की भी भरपाई होगी?

निजी कंपनी की परियोजना के लिए राज्य अपनी अनिवार्य अधिग्रहण शक्ति क्यों इस्तेमाल करे?

इन प्रश्नों ने सिंगूर को स्थानीय मुआवजा विवाद से उठाकर राष्ट्रीय विकास-मॉडल की बहस बना दिया।

1894 का भूमि अधिग्रहण कानून : औपनिवेशिक कानून से इक्कीसवीं सदी का औद्योगीकरण

सिंगूर विवाद के कानूनी केंद्र में था भूमि अधिग्रहण कानून, 1894।

यह ब्रिटिश औपनिवेशिक काल का कानून था, जिसके माध्यम से राज्य ‘सार्वजनिक प्रयोजन’ के लिए निजी भूमि अधिग्रहित कर सकता था।

सिंगूर ने एक बुनियादी प्रश्न खड़ा किया

यदि जमीन अंततः एक निजी कंपनी के कारखाने के लिए इस्तेमाल होनी है तो उसे ‘सार्वजनिक प्रयोजन’ मानकर राज्य क्यों अधिग्रहित करे?

2016 में यही प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा और अधिग्रहण प्रक्रिया की वैधता निर्णायक मुद्दा बनी। न्यायालय के रिकॉर्ड से पता चलता है कि 30 मई 2006 के कैबिनेट ज्ञापन में टाटा मोटर्स की छोटी कार परियोजना के लिए 1,053 एकड़ तथा अलग आवासीय-सामाजिक आधारभूत ढांचे के लिए 200 एकड़ तक का प्रारंभिक प्रस्ताव था; बाद की वास्तविक अधिग्रहण प्रक्रिया का क्षेत्र इससे अलग रहा।

इसलिए प्रारंभिक प्रस्तावित क्षेत्र और अंततः अधिग्रहित लगभग 997 एकड़ भूमि को मिलाना नहीं चाहिए।

खंड 2

सिंगूर का चयन, टाटा परियोजना और भूमि का प्रश्न

सिंगूर क्यों चुना गया?

सिंगूर हुगली जिले का कृषि प्रधान इलाका था और कोलकाता के अपेक्षाकृत निकट था। सड़क और बाजार संपर्क के कारण उद्योग के दृष्टिकोण से स्थान आकर्षक था।

टाटा मोटर्स ने पश्चिम बंगाल में अपनी महत्वाकांक्षी छोटी कार परियोजना लगाने का निर्णय किया। कंपनी और सरकार दोनों इसे बंगाल के औद्योगिक पुनरुत्थान का प्रतीक बनाना चाहते थे।

सरकार के लिए टाटा जैसा प्रतिष्ठित औद्योगिक घराना आना संदेश था कि पश्चिम बंगाल निवेश के लिए फिर खुल रहा है।

लेकिन किसान के लिए वही भूमि केवल एक ‘औद्योगिक स्थल’ नहीं थी।

और सामाजिक पहचान का आधार थी।

यहीं राज्य और ग्रामीण समाज भूमि को दो बिल्कुल अलग अर्थों में देख रहे थे।

मई 2006 : चुनावी विजय के तुरंत बाद टाटा परियोजना

2006 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चा भारी बहुमत से सत्ता में लौटा। इसके तुरंत बाद टाटा मोटर्स की छोटी कार परियोजना का प्रश्न तेजी से आगे बढ़ा।

30 मई 2006 के सरकारी कैबिनेट ज्ञापन से स्पष्ट है कि परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण की योजना औपचारिक सरकारी प्रक्रिया में आ चुकी थी। सर्वोच्च न्यायालय के बाद के निर्णय में इस दस्तावेज और टाटा मोटर्स तथा सरकार के पत्राचार का विस्तार से परीक्षण हुआ।

विरोधियों ने आरोप लगाया कि चुनाव में भूमि अधिग्रहण को इस रूप में जनादेश नहीं मिला था।

सरकार का प्रत्युत्तर था कि औद्योगीकरण उसके घोषित विकास कार्यक्रम का हिस्सा था।

लगभग 997 एकड़ और ‘इच्छुक बनाम अनिच्छुक’ किसान

अंततः लगभग 997 एकड़ भूमि परियोजना से जुड़ी।

लेकिन इस आंकड़े से कहीं अधिक महत्वपूर्ण विवाद था—कितने किसानों ने स्वेच्छा से मुआवजा स्वीकार किया और कितने किसान जमीन देना ही नहीं चाहते थे?

सरकार ने उच्च स्तर की मुआवजा स्वीकृति को परियोजना के प्रति समर्थन का प्रमाण बताया।

विरोधी आंदोलन ने कहा कि मुआवजा स्वीकार न करने वाले किसानों की भूमि भी अधिग्रहित कर ली गई और लगभग 400 एकड़ भूमि ‘अनिच्छुक किसानों’ की थी।

यहीं से 400 एकड़ लौटाओ सिंगूर आंदोलन का सबसे प्रभावशाली नारा बना।

महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘मुआवजा स्वीकार करना’ और ‘अधिग्रहण के लिए स्वतंत्र सहमति देना’ हमेशा एक ही बात नहीं होते। भूमि कानूनी रूप से अधिग्रहित हो जाने के बाद कुछ किसान व्यावहारिक विवशता में भी मुआवजा स्वीकार कर सकते थे।

भूमिधर से आगे : बर्गादार और खेत मजदूर

सिंगूर विवाद का एक कम चर्चित लेकिन महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि भूमि अर्थव्यवस्था केवल मालिक किसान पर आधारित नहीं थी।

और अन्य ग्रामीण परिवारों की आजीविका जुड़ी हो सकती थी।

भूमि के मालिक को नकद मुआवजा देना संभव था। लेकिन जिसका जीवन उस भूमि पर मजदूरी से चलता था, उसकी आय के स्थायी नुकसान का मूल्य कैसे तय किया जाए?

आगे चलकर भारत की पुनर्वास नीति में यही प्रश्न केंद्रीय हुआ।

खंड 3

किसान प्रतिरोध, तापसी मलिक और अनशन

आंदोलन में ममता बनर्जी का प्रवेश

सिंगूर ने को वह राजनीतिक मुद्दा दिया जिसके माध्यम से वे वाम मोर्चे के सबसे मजबूत ग्रामीण आधार में प्रवेश कर सकीं।

तृणमूल कांग्रेस ने भूमि देने से इनकार करने वाले किसानों का पक्ष लिया।

आंदोलन धीरे-धीरे केवल स्थानीय किसानों की लड़ाई नहीं रहा। इसमें विपक्षी दल, सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक समूह शामिल होने लगे।

ममता बनर्जी ने इसे विकास-विरोध के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध के रूप में स्थापित किया।

यह राजनीतिक भाषा निर्णायक साबित हुई।

दिसंबर 2006 : टकराव तीखा होता है

भूमि की घेराबंदी और परियोजना स्थल पर प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करने के दौरान तनाव बढ़ा। पुलिस बल की मौजूदगी और प्रदर्शनकारियों के प्रतिरोध ने सिंगूर को राष्ट्रीय समाचार बना दिया।

राज्य सरकार के लिए प्रश्न था

भूमि कानूनी रूप से अधिग्रहित हो चुकी है, इसलिए परियोजना कैसे रोकी जाए?

कानून यदि किसान की इच्छा के विरुद्ध उसकी आजीविका छीनता है तो क्या केवल कानूनी प्रक्रिया उसे न्यायपूर्ण बना देती है?

इस तरह वैधानिकता बनाम वैधता का अंतर सिंगूर संघर्ष का केंद्रीय विषय बन गया।

तापसी मलिक : आंदोलन का भावनात्मक मोड़

दिसंबर 2006 में युवा आंदोलनकारी तापसी मलिक का जला हुआ शव परियोजना क्षेत्र के निकट मिलने से आंदोलन अत्यंत भावनात्मक और राजनीतिक रूप से विस्फोटक हो गया।

मामला आपराधिक जांच में गया और आरोप-प्रत्यारोप तेज हुए।

तापसी मलिक आंदोलन के लिए केवल एक अपराध की पीड़िता नहीं रहीं; वे उस राजनीतिक कथा का प्रतीक बन गईं जिसमें भूमि की रक्षा, राज्य शक्ति और ग्रामीण प्रतिरोध आपस में जुड़ गए थे।

इस प्रकरण की न्यायिक यात्रा और दोषसिद्धि/अपील के विभिन्न चरणों को अलग विस्तृत स्रोत-टिप्पणी में रखना आवश्यक है, क्योंकि बाद की न्यायिक कार्यवाही ने शुरुआती राजनीतिक दावों को अधिक जटिल बनाया।

ममता बनर्जी का 26 दिन का अनशन

दिसंबर 2006 में ममता बनर्जी ने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की।

इसने सिंगूर को पश्चिम बंगाल के बाहर राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बना दिया। राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक स्थिति को लेकर चिंता पहुंची।

अब संघर्ष का प्रतीकात्मक समीकरण बन चुका था

एक ओर औद्योगीकरण का दावा करने वाली वाम सरकार, दूसरी ओर किसान की जमीन वापस मांगती विपक्षी नेता।

विडंबना यह थी कि राष्ट्रीय स्तर पर वाम दल उस समय यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे।

खंड 4

नंदीग्राम में रासायनिक केंद्र के विरुद्ध उभार

इसी समय नंदीग्राम में एक और विस्फोट तैयार था

सिंगूर आंदोलन अभी जारी ही था कि पूर्व मेदिनीपुर के नंदीग्राम में उससे भी गंभीर संघर्ष की जमीन तैयार हो गई।

नंदीग्राम में प्रस्तावित विशाल रासायनिक औद्योगिक केंद्र और विशेष आर्थिक क्षेत्र का विचार सामने आया।

संसद में केंद्रीय गृह मंत्री के वक्तव्य के अनुसार लगभग 10,000 एकड़ क्षेत्र में मेगा केमिकल हब और बहु-उत्पाद विशेष आर्थिक क्षेत्र का प्रस्ताव विचाराधीन था। 28 दिसंबर 2006 को हल्दिया विकास प्राधिकरण ने संभावित परियोजना स्थान के बारे में सूचना प्रसारित की।

नंदीग्राम के किसानों ने सिंगूर को सामने घटित होते देख लिया था।

यदि अभी प्रतिरोध नहीं किया गया तो अगला सिंगूर नंदीग्राम हो सकता है।

सलीम समूह और रासायनिक केंद्र

नंदीग्राम परियोजना को इंडोनेशिया के सलीम समूह से जुड़े निवेश प्रस्तावों और राज्य की औद्योगिक नीति के संदर्भ में देखा गया।

यहां भी सरकार का उद्देश्य बड़े निवेश और औद्योगिक विकास को आकर्षित करना था।

लेकिन प्रस्तावित क्षेत्र अत्यधिक आबादी वाला ग्रामीण भूभाग था, जहां कृषि, पान की खेती, मत्स्य पालन और ग्रामीण आजीविका का व्यापक जाल मौजूद था।

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने बाद में दर्ज किया कि क्षेत्र के लोग धान, आलू, दाल, जूट, पान आदि की कृषि तथा मछली पालन पर निर्भर थे।

अर्थात भूमि केवल खेत नहीं थी—वह पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था थी।

3 जनवरी 2007 : नंदीग्राम फट पड़ा

3 जनवरी 2007 को भूमि अधिग्रहण की आशंका के बीच बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्र हुए। पुलिस और ग्रामीणों के बीच टकराव हुआ।

कलकत्ता उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड में 3 जनवरी को पहला बड़ा हिंसक टकराव दर्ज है और इसके बाद 4, 5, 6, 7, 8 जनवरी तथा आगे भी हिंसा की घटनाएं दर्ज की गईं।

इसके बाद ग्रामीणों ने प्रशासन और पुलिस के प्रवेश को रोकने के लिए

नंदीग्राम के कुछ हिस्सों में राज्य प्रशासन का सामान्य प्रवेश लगभग समाप्त हो गया।

यह साधारण धरना नहीं रह गया था।

यह क्षेत्रीय नियंत्रण का संघर्ष बन गया।

भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति

विरोध को संगठित करने के लिए भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति—भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति उभरी।

इसमें अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक धाराएं थीं। तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता महत्वपूर्ण थे, लेकिन आंदोलन केवल तृणमूल का संगठन नहीं था। स्थानीय समूह, एसयूसीआई, जमीयत से जुड़े लोग और वाम-विरोधी अथवा भूमि अधिग्रहण-विरोधी अन्य तत्व भी इसमें सक्रिय थे।

यही व्यापक गठबंधन नंदीग्राम की ताकत था।

लेकिन इसी कारण आंदोलन के भीतर राजनीतिक और वैचारिक विविधता भी बहुत अधिक थी।

खंड 5

आंतरिक विस्थापन, प्रशासन और टकराव की तैयारी

संघर्ष का दूसरा चेहरा : सीपीआई(एम) समर्थकों का विस्थापन

नंदीग्राम की निष्पक्ष ऐतिहासिक व्याख्या में यह तथ्य नहीं छूटना चाहिए कि हिंसा केवल एक दिशा में नहीं हुई।

भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के प्रभाव वाले क्षेत्रों से अनेक सीपीआई(एम) समर्थक परिवारों को निकलना पड़ा। दूसरी ओर खेजुरी और आसपास के सीपीआई(एम) प्रभाव वाले इलाकों से आंदोलनकारियों पर हमलों के आरोप लगे।

इसलिए नंदीग्राम को केवल ‘शांत किसान बनाम पुलिस’ की कहानी मानना भी अधूरा इतिहास होगा।

लेकिन राज्य और सत्तारूढ़ दल की शक्ति सामान्य नागरिक अथवा विपक्षी संगठन से समान नहीं होती। इसीलिए राज्य की जवाबदेही का मानक अधिक कठोर था।

मुख्यमंत्री पीछे हटने का संकेत देते हैं

स्थिति बिगड़ने पर मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सार्वजनिक रूप से कहा कि स्थानीय लोगों की इच्छा के विरुद्ध परियोजना नहीं थोपी जाएगी।

15 मार्च को विधानसभा में दिए वक्तव्य में उन्होंने कहा कि यदि नंदीग्राम के लोग इच्छुक नहीं हैं तो वहां रासायनिक केंद्र नहीं बनेगा और परियोजना दूसरी जगह स्थापित की जाएगी। यह वक्तव्य कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले में भी उद्धृत हुआ।

लेकिन तब तक अविश्वास इतना गहरा हो चुका था कि आंदोलनकारियों ने सरकारी आश्वासन पर भरोसा नहीं किया।

यही नंदीग्राम संकट का एक निर्णायक बिंदु था

सरकार ने परियोजना से पीछे हटने का संकेत दिया, लेकिन राजनीतिक विश्वास वापस नहीं आया।

प्रशासन नंदीग्राम में वापस क्यों जाना चाहता था?

सरकार के सामने दूसरा प्रश्न था।

यदि भूमि अधिग्रहण नहीं होगा, तब भी क्या कोई आंदोलनकारी संगठन किसी इलाके में सड़क काटकर पुलिस और प्रशासन का प्रवेश रोक सकता है?

राज्य का तर्क था कि कानून का शासन बहाल करना आवश्यक है।

भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति का तर्क था कि पुलिस प्रवेश के बाद जबरन भूमि अधिग्रहण अथवा सत्तारूढ़ दल का नियंत्रण वापस आ सकता है।

दोनों पक्षों के बीच विश्वास लगभग शून्य था।

14 मार्च 2007।

खंड 6

14 मार्च 2007 : गोलीबारी, कानून और जनमत

14 मार्च 2007 : नंदीग्राम का सबसे रक्तरंजित दिन

14 मार्च को बड़ी संख्या में पुलिस बल नंदीग्राम में प्रवेश के लिए आगे बढ़ा।

भांगराबेड़िया और अन्य प्रवेश क्षेत्रों में ग्रामीण बड़ी संख्या में एकत्र थे।

पुलिस का दावा था कि उसे हिंसक प्रतिरोध, अवरोध और हमले का सामना करना पड़ा।

इसके बाद पुलिस ने गोली चलाई।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बाद में दर्ज किया कि 14 मार्च की कार्रवाई में 14 लोग मारे गए और लगभग 300 लोग घायल हुए, जिनमें 52 पुलिसकर्मी भी शामिल थे।

यह संख्या इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विभिन्न राजनीतिक वक्तव्यों में अलग-अलग आंकड़े चलते रहे हैं; आधिकारिक और मानवाधिकार आयोग के अभिलेख में 14 मृत्यु स्थापित संख्या है।

पुलिस कार्रवाई संवैधानिक कसौटी पर

14 मार्च की घटना केवल राजनीतिक विवाद नहीं रही।

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मामले में हस्तक्षेप किया।

अदालत ने पुलिस गोलीबारी को असंवैधानिक ठहराया और सीबीआई जांच जारी रखने का निर्देश दिया। मृतकों के परिवारों के लिए पांच लाख रुपये, घायलों के लिए एक लाख रुपये तथा बलात्कार पीड़ितों के लिए दो लाख रुपये मुआवजे के निर्देश भी दिए गए।

इससे आंदोलन को अत्यंत महत्वपूर्ण न्यायिक आधार मिला।

अब प्रश्न यह नहीं था कि विपक्ष पुलिस कार्रवाई को गलत कह रहा है।

उच्च न्यायालय स्वयं राज्य की कार्रवाई की संवैधानिक वैधता पर कठोर निष्कर्ष दे चुका था।

14 मार्च ने बंगाल के बुद्धिजीवी समाज को बदल दिया

नंदीग्राम का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रभाव कोलकाता के उस सांस्कृतिक-बौद्धिक समाज पर पड़ा जिसका एक बड़ा हिस्सा लंबे समय तक वाम राजनीति के प्रति सहानुभूतिशील रहा था।

लेखक, कलाकार, रंगकर्मी, फिल्मकार और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे।

महाश्वेता देवी जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पहले से भूमि संघर्षों के प्रश्न पर सक्रिय थे। नंदीग्राम के बाद वाम सरकार की नैतिक वैधता पर प्रश्न उस समाज के भीतर से उठने लगा जिसे उसका प्राकृतिक सांस्कृतिक समर्थक माना जाता था।

यह केवल चुनावी नुकसान नहीं था।

यह नैतिक-सांस्कृतिक समर्थन का क्षरण था।

19 मार्च : सरकार औपचारिक रूप से भूमि अधिग्रहण से पीछे

पूर्व मेदिनीपुर के जिलाधिकारी ने 19 मार्च 2007 को अधिसूचना जारी कर स्पष्ट किया कि नंदीग्राम में उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहित नहीं की जाएगी।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इसे अपनी जांच में दर्ज किया।

सैद्धांतिक रूप से भूमि आंदोलन का मूल उद्देश्य प्राप्त हो चुका था।

लेकिन संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।

क्योंकि अब लड़ाई जमीन से आगे बढ़कर

विस्थापित परिवारों की वापसी,

और सीपीआई(एम)-भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति शक्ति संघर्ष

खंड 7

दो राजनीतिक भूगोल और नवंबर का पुनर्दखल

मार्च से अक्टूबर 2007 : एक क्षेत्र, दो राजनीतिक भूगोल

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस अवधि को अपेक्षाकृत शांत लेकिन भीतर से विस्फोटक चरण माना।

भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति का नियंत्रण कई क्षेत्रों में बना रहा। पुलिस प्रवेश सीमित रहा। सीपीआई(एम) समर्थक खेजुरी की ओर संगठित हुए।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच ने बाद में अत्यंत गंभीर टिप्पणी की कि इस अवधि में हथियार और जनशक्ति जुटाई गई तथा पुलिस मूकदर्शक बनी रही।

अर्थात मार्च की पुलिस कार्रवाई के बाद भी राज्य सामान्य प्रशासन स्थापित नहीं कर पाया।

नवंबर 2007 : ‘ऑपरेशन सूर्योदय’ अथवा ‘पुनर्दखल’

नवंबर में स्थिति फिर विस्फोटक हो गई।

सीपीआई(एम) समर्थकों ने नंदीग्राम के भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति नियंत्रित क्षेत्रों पर पुनः नियंत्रण स्थापित करने की कार्रवाई की।

राजनीतिक विमर्श में इसे अक्सर ‘ऑपरेशन सूर्योदय’ अथवा ‘रिकैप्चर’ कहा गया।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच के अनुसार 6 नवंबर के बाद सीपीआई(एम) समर्थकों ने नाकाबंदी वाले क्षेत्र पर कब्जा करने का प्रयास किया और तेहखाली पुलिस चौकी हटाए जाने से हमले को सुविधा मिली। आयोग ने उस चरण में पुलिस की भूमिका को पक्षपातपूर्ण पाया।

यह निष्कर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है।

क्योंकि इससे नंदीग्राम का प्रश्न केवल मार्च की पुलिस गोलीबारी तक सीमित नहीं रहता; नवंबर में राज्य मशीनरी की निष्पक्षता भी जांच के केंद्र में आती है।

राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी की असाधारण भूमिका

तत्कालीन राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी ने नंदीग्राम की हिंसा पर असामान्य रूप से स्पष्ट सार्वजनिक चिंता व्यक्त की।

भारतीय संवैधानिक परंपरा में राज्यपाल सामान्यतः निर्वाचित सरकार के राजनीतिक निर्णयों पर ऐसी सार्वजनिक भाषा का प्रयोग कम करते हैं।

इसलिए उनकी प्रतिक्रिया स्वयं एक महत्वपूर्ण संवैधानिक-राजनीतिक घटना बन गई।

आगे सिंगूर संकट में भी वही राज्यपाल सरकार और विपक्ष के बीच मध्यस्थ बने।

इस तरह गोपालकृष्ण गांधी सिंगूर–नंदीग्राम के बीच एक महत्वपूर्ण संस्थागत सेतु बन गए।

खंड 8

सिंगूर कारखाना, 400 एकड़ और निर्णायक धरना

सिंगूर में इस बीच कारखाना लगभग तैयार हो रहा था

नंदीग्राम में रक्तपात हो रहा था, जबकि सिंगूर में टाटा नैनो संयंत्र का निर्माण आगे बढ़ रहा था।

जनवरी 2008 में टाटा नैनो का सार्वजनिक अनावरण हुआ। इसे दुनिया की सबसे सस्ती कार बनाने की महत्वाकांक्षी परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया गया।

पश्चिम बंगाल सरकार के लिए अब बहुत कुछ दांव पर था।

यदि परियोजना सफल होती तो वह औद्योगिक पुनरुत्थान का प्रतीक बन सकती थी।

यदि विफल होती तो संदेश जाता कि पश्चिम बंगाल बड़े निवेश को संभाल नहीं सकता।

इसलिए सिंगूर अब केवल जमीन नहीं था

यह बंगाल की औद्योगिक प्रतिष्ठा बनाम किसान अधिकार की लड़ाई बन चुका था।

2008 : 400 एकड़ की मांग निर्णायक

ममता बनर्जी ने कहा कि अनिच्छुक किसानों की लगभग 400 एकड़ भूमि परियोजना क्षेत्र से वापस की जाए।

सरकार का तर्क था कि इतनी भूमि वापस करने पर परियोजना और उससे जुड़े सहायक उद्योगों की संरचना व्यावहारिक नहीं रहेगी।

टाटा मोटर्स भी परियोजना के लिए भूमि व्यवस्था में बड़े परिवर्तन को लेकर सहमत नहीं थी।

यहीं समाधान की संभावनाएं संकुचित होती गईं।

कुछ भूमि परियोजना क्षेत्र के भीतर से,

और प्रभावित परिवारों के लिए बेहतर पुनर्वास।

लेकिन राजनीतिक अविश्वास इतना अधिक था कि तकनीकी समझौता टिक नहीं सका।

अगस्त–सितंबर 2008 : कारखाने के द्वार पर निर्णायक धरना

अगस्त 2008 में तृणमूल कांग्रेस ने सिंगूर परियोजना स्थल के बाहर व्यापक धरना शुरू किया।

22 अगस्त को रतन टाटा ने संकेत दिया कि लगातार हिंसा और असुरक्षा रही तो परियोजना पश्चिम बंगाल से बाहर जा सकती है।

3 सितंबर को टाटा मोटर्स ने काम निलंबित कर दिया।

या तो सरकार और ममता बनर्जी समझौता करते

खंड 9

राज्यपाल की मध्यस्थता और टाटा की विदाई

राज्यपाल की मध्यस्थता और 7 सितंबर समझौता

राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी ने मध्यस्थता स्वीकार की।

5 सितंबर से राजभवन में वार्ता हुई।

7 सितंबर को एक समझ विकसित हुई कि जिन किसानों ने मुआवजा स्वीकार नहीं किया है, उनकी मांगों का समाधान खोजा जाएगा और अधिकतम संभव भूमि परियोजना क्षेत्र के भीतर से उपलब्ध कराने की संभावना देखी जाएगी।

राजभवन की मध्यस्थता उस समय संकट समाप्त करने की सबसे गंभीर कोशिश थी। समकालीन समयरेखा भी 3–7 सितंबर के बीच राज्यपाल की मध्यस्थता और सरकार द्वारा मुआवजा न लेने वाले किसानों की मांगों पर प्रतिक्रिया देने की सहमति दर्ज करती है।

लेकिन जमीन की मात्रा और स्थान पर सहमति नहीं बनी।

3 अक्टूबर 2008 : टाटा सिंगूर छोड़ता है

3 अक्टूबर 2008 को टाटा मोटर्स ने औपचारिक रूप से घोषणा की कि नैनो परियोजना सिंगूर से हटाई जाएगी।

कंपनी ने आंदोलन, कर्मचारियों की सुरक्षा, धमकी, अवरोध और परियोजना संचालन की असंभव परिस्थितियों को कारण बताया। टाटा मोटर्स की आधिकारिक घोषणा में विपक्ष-नेतृत्व वाले आंदोलन और कर्मचारियों तथा ठेकेदारों की सुरक्षा संबंधी चिंता को परियोजना स्थानांतरण का आधार बताया गया।

कुछ ही समय बाद परियोजना गुजरात के साणंद चली गई।

सिंगूर आंदोलन जीत गया था या बंगाल हार गया था?

यही प्रश्न अगले कई वर्षों तक राजनीति को बांटता रहा।

क्या टाटा का जाना किसान आंदोलन की जीत था?

इसका उत्तर दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।

जबरन भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध प्रतिरोध ने एक विशाल कॉर्पोरेट परियोजना रोक दी।

सरकार और उद्योग समर्थकों के लिए

एक लगभग तैयार औद्योगिक परियोजना के चले जाने से निवेश, रोजगार और पश्चिम बंगाल की औद्योगिक विश्वसनीयता को नुकसान हुआ।

दोनों कथनों में आंशिक सत्य है।

इसीलिए सिंगूर का मूल्यांकन ‘किसान जीत गया’ अथवा ‘उद्योग हार गया’ जैसे सरल वाक्य में नहीं किया जा सकता।

खंड 10

पंचायत से सत्ता परिवर्तन तक

2008 पंचायत चुनाव : राजनीतिक परिणाम दिखाई देने लगे

सिंगूर और नंदीग्राम का प्रभाव ग्रामीण चुनावों में दिखाई देने लगा।

विशेषकर पूर्व मेदिनीपुर और दक्षिण बंगाल के कई क्षेत्रों में वाम मोर्चे की ग्रामीण पकड़ कमजोर हुई।

भूमि प्रश्न ने ममता बनर्जी को वह राजनीतिक गठबंधन बनाने में मदद की जिसे उन्होंने बाद में ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे में रूपांतरित किया।

यह नारा अत्यंत प्रभावशाली था क्योंकि उसमें

मां = सामाजिक-सांस्कृतिक भाव,

2009 लोकसभा चुनाव : सत्ता परिवर्तन की पूर्वपीठिका

2009 के लोकसभा चुनाव तक स्पष्ट हो गया कि पश्चिम बंगाल की राजनीति संरचनात्मक रूप से बदल रही है।

तृणमूल कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने वाम मोर्चे को गंभीर चुनौती दी।

सिंगूर और नंदीग्राम ने ममता को केवल विपक्षी नेता नहीं रहने दिया था।

वे ग्रामीण असंतोष की मुख्य राजनीतिक प्रतिनिधि बन चुकी थीं।

वाम मोर्चे के लिए इससे भी गंभीर बात यह थी कि उसका नुकसान उसी ग्रामीण बंगाल में हो रहा था जिसने तीन दशकों तक उसकी सत्ता को स्थिर रखा था।

2011 : 34 वर्ष के वाम शासन का अंत

1977 से पश्चिम बंगाल में लगातार वाम मोर्चा शासन था।

2011 के विधानसभा चुनाव में वह समाप्त हो गया।

तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में आया और ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं।

सत्ता परिवर्तन के अनेक कारण थे

इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि केवल सिंगूर और नंदीग्राम ने वाम सरकार गिराई।

लेकिन यह कहना उचित है कि दोनों ने वाम शासन के विरुद्ध असंतोष को एक शक्तिशाली राजनीतिक कथा और प्रतीक प्रदान किया।

जिस किसान राजनीति ने वाम मोर्चे को सत्ता तक पहुंचाया था, उसी भूमि प्रश्न ने उसके पतन को तेज किया।

सत्ता मिलते ही ममता का पहला बड़ा भूमि निर्णय

नई सरकार के सामने राजनीतिक और नैतिक प्रश्न था

यदि सिंगूर आंदोलन भूमि वापसी के लिए था तो सत्ता में आने के बाद जमीन लौटेगी कैसे?

20 जून 2011 को पश्चिम बंगाल सरकार ने सिंगूर भूमि पुनर्वास और विकास कानून, 2011 बनाया। आधिकारिक अभिलेख में अधिनियम की प्रवर्तन तिथि 20 जून 2011 दर्ज है।

कानून का उद्देश्य टाटा को पट्टे पर दी गई भूमि वापस राज्य के नियंत्रण में लेना और किसानों को भूमि लौटाने का मार्ग बनाना था।

टाटा मोटर्स ने इसे अदालत में चुनौती दी।

खंड 11

सिंगूर कानून से सर्वोच्च न्यायालय तक

कलकत्ता उच्च न्यायालय : एकल पीठ से खंडपीठ तक

28 सितंबर 2011 को कलकत्ता उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने कानून की वैधता कायम रखी।

लेकिन मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ।

22 जून 2012 को उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने कानून के महत्वपूर्ण प्रावधानों को असंवैधानिक माना और पूरा अधिनियम प्रभावहीन हो गया।

न्यायालय ने केंद्रीय भूमि अधिग्रहण कानून के साथ टकराव और राष्ट्रपति की स्वीकृति न होने जैसे संवैधानिक प्रश्नों पर विचार किया। सर्वोच्च न्यायालय के बाद के निर्णय में इस न्यायिक यात्रा को दर्ज किया गया है।

मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा।

लेकिन वहां एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।

सर्वोच्च न्यायालय ने प्रश्न ही बदल दिया

2016 में सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य विवाद को केवल 2011 के ममता सरकार के कानून की वैधता तक सीमित नहीं रखा।

2006 में किया गया अधिग्रहण स्वयं वैध था या नहीं?

31 अगस्त 2016 को सर्वोच्च न्यायालय ने सिंगूर भूमि अधिग्रहण को रद्द कर दिया।

अदालत ने भूमि किसानों/कृषकों को लौटाने का निर्देश दिया।

जिन्हें मुआवजा मिल चुका था, उनसे उसे वापस नहीं लिया जाना था; जिन्होंने नहीं लिया था, वे जमा मुआवजा निकाल सकते थे। भूमि लगभग दस वर्ष उनके उपयोग से बाहर रही थी—न्यायालय ने इस परिस्थिति को भी ध्यान में रखा।

यह सिंगूर आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक परिणति थी।

सिंगूर निर्णय का वास्तविक कानूनी महत्व

2016 का निर्णय अक्सर केवल इस रूप में बताया जाता है कि ‘सुप्रीम कोर्ट ने जमीन किसानों को लौटा दी।’

लेकिन उसका महत्व इससे बड़ा था।

न्यायालय ने अधिग्रहण की प्रक्रिया, ‘सार्वजनिक प्रयोजन’, निजी कंपनी की परियोजना के लिए राज्य शक्ति के इस्तेमाल और भूमि अधिग्रहण अधिनियम की प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं का परीक्षण किया।

इससे यह सिद्धांत मजबूत हुआ कि

विकास का उद्देश्य अपने आप किसी दोषपूर्ण भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को वैध नहीं बना देता।

राज्य को विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना ही होगा।

अक्टूबर 2025 : सर्वोच्च न्यायालय का बाद का स्पष्टीकरण

सर्वोच्च न्यायालय ने 13 अक्टूबर 2025 को पश्चिम बंगाल सरकार बनाम शांति सिरेमिक्स प्राइवेट लिमिटेड मामले में स्पष्ट किया कि 2016 के केदारनाथ यादव निर्णय में किसानों और काश्तकारों के लिए दिया गया भूमि-वापसी का उपचार हर उस व्यावसायिक इकाई को स्वतः नहीं मिल सकता जिसने मुआवजा स्वीकार किया, अधिग्रहण को समय पर चुनौती नहीं दी और वर्षों बाद समान राहत मांगी। न्यायालय ने कंपनी को बची हुई संरचनाएं और मशीनरी हटाने अथवा उनकी नीलामी का विकल्प दिया तथा राज्य को भूमि का पुनः सीमांकन कर कब्जा लेने का निर्देश दिया। इस निर्णय ने 2016 की किसान-केंद्रित राहत और अन्य व्यावसायिक दावों के बीच कानूनी सीमा को अधिक स्पष्ट किया।

खंड 12

2013 का भूमि कानून और दोनों संघर्षों का अंतर

2013 का नया भूमि अधिग्रहण कानून और सिंगूर–नंदीग्राम की विरासत

सिंगूर और नंदीग्राम अकेले वे घटनाएं नहीं थीं जिनसे 2013 का नया कानून बना। देश के दूसरे हिस्सों—कलिंगनगर, भट्टा–पारसौल और विभिन्न औद्योगिक/बुनियादी ढांचा परियोजनाओं—में भी भूमि संघर्ष बढ़ रहे थे।

फिर भी सिंगूर–नंदीग्राम ने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ प्रश्नों को राजनीतिक रूप से अपरिहार्य बना दिया

आजीविका गंवाने वाले गैर-मालिक समुदाय,

निजी परियोजनाओं के लिए राज्य की भूमिका।

इसी व्यापक पृष्ठभूमि में 1894 का औपनिवेशिक कानून अंततः हटाकर भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर तथा पारदर्शिता का अधिकार कानून, 2013 लाया गया।

सिंगूर और नंदीग्राम में मूल अंतर

दोनों को एक साथ पढ़ना चाहिए, लेकिन अंतर याद रखना अत्यंत आवश्यक है।

प्रश्न — सिंगूर — नंदीग्राम

परियोजना — टाटा मोटर्स छोटी कार संयंत्र — रासायनिक केंद्र/विशेष आर्थिक क्षेत्र

भूमि — लगभग 997 एकड़ अधिग्रहित — प्रस्तावित विशाल क्षेत्र; अधिग्रहण अंततः नहीं

मुख्य संघर्ष — अधिग्रहित भूमि वापस करना — अधिग्रहण होने ही न देना

प्रमुख विपक्ष — तृणमूल + स्थानीय किसान — भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति का व्यापक गठबंधन

निर्णायक घटना — टाटा परियोजना का हटना — 14 मार्च 2007 गोलीबारी

प्रमुख राजनीतिक परिणाम — औद्योगीकरण बनाम भूमि अधिकार — राज्य हिंसा और राजनीतिक नियंत्रण का प्रश्न

अंतिम कानूनी परिणाम — 2016 में अधिग्रहण रद्द — परियोजना नंदीग्राम से हटाई गई

क्या आंदोलन उद्योग-विरोधी था?

यह सबसे विवादित प्रश्नों में से है।

वाम सरकार और उसके समर्थकों का तर्क था कि पश्चिम बंगाल में रोजगार पैदा करने के लिए औद्योगीकरण अपरिहार्य था। कृषि अकेले बढ़ती आबादी और युवाओं को पर्याप्त आय नहीं दे सकती थी।

यह आर्थिक तर्क गंभीर था और उसे खारिज नहीं किया जा सकता।

औद्योगीकरण चाहिए या नहीं—यह असली प्रश्न नहीं; औद्योगीकरण कैसे होगा, यह प्रश्न है।

क्या उसे भविष्य की औद्योगिक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी मिलेगी?

क्या बर्गादार और मजदूर सुरक्षित होंगे?

यही सिंगूर की दीर्घकालीन प्रासंगिकता है।

खंड 13

राजनीतिक उपलब्धियां, रणनीतिक भूलें और सीमाएं

वाम मोर्चे की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल

वाम सरकार की सबसे बड़ी समस्या शायद औद्योगीकरण का निर्णय नहीं थी।

समस्या थी राजनीतिक संवाद और भूमि शासन का तरीका।

जिस पार्टी के पास गांवों में तीन दशक पुराना संगठन था, वह किसानों को औद्योगीकरण में सहभागी बनाने के बजाय कई स्थानों पर प्रशासनिक अधिग्रहण की भाषा में दिखाई देने लगी।

परिवार के सदस्य को कौशल और रोजगार,

और निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी

जैसे विकल्प मिलते, तो संभव है संघर्ष की प्रकृति अलग होती।

सिंगूर ने भारत को यही सबक दिया कि मुआवजा विकास-सहमति का विकल्प नहीं है।

ममता बनर्जी की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि

ममता बनर्जी ने दो अलग संघर्षों को एक राजनीतिक भाषा में जोड़ दिया।

इससे तृणमूल कांग्रेस शहरी विरोधी दल से ग्रामीण बंगाल की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन गई।

ममता की सफलता यह थी कि उन्होंने वामपंथ की पारंपरिक भाषा—किसान, भूमि और राज्य शक्ति—को उसी वाम सरकार के विरुद्ध इस्तेमाल किया।

भारतीय राजनीतिक इतिहास में यह अत्यंत महत्वपूर्ण वैचारिक उलटफेर था।

आंदोलन की सीमाएं भी थीं

इतिहास को संतुलित रखने के लिए आंदोलन की सीमाएं भी दर्ज करनी होंगी।

सिंगूर के बाद पश्चिम बंगाल की औद्योगिक छवि को नुकसान पहुंचने की धारणा बनी।

नंदीग्राम में आंदोलनकारी पक्ष के भीतर भी हिंसा हुई।

सीपीआई(एम) समर्थक परिवार भी विस्थापित हुए।

राजनीतिक दलों ने किसान प्रश्न का चुनावी उपयोग किया।

भूमि बच जाना अपने आप ग्रामीण परिवारों की दीर्घकालीन आय वृद्धि की गारंटी नहीं था।

यदि कृषि भूमि नहीं ली जाएगी तो बड़े उद्योग कहां लगेंगे?

आंदोलन ने यह प्रश्न उठाया कि विकास कैसे होना चाहिए; उसने इसका हर परिस्थिति में लागू होने वाला पूर्ण आर्थिक मॉडल नहीं दिया।

उपलब्धियां

फिर भी सिंगूर–नंदीग्राम की ऐतिहासिक उपलब्धियां बहुत बड़ी हैं।

इन आंदोलनों ने स्थापित किया कि इक्कीसवीं सदी के लोकतांत्रिक भारत में भूमि को केवल प्रशासनिक अधिसूचना द्वारा ‘उपलब्ध संसाधन’ मानना राजनीतिक रूप से संभव नहीं रहेगा।

को विकास नीति का हिस्सा बनाना होगा।

भूमि का बाजार मूल्य और भूमि का सामाजिक मूल्य अलग-अलग हैं।

यह इन आंदोलनों का सबसे स्थायी संदेश है।

खंड 14

विस्तृत समयरेखा

विस्तृत समयरेखा

मई 2006 — पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की पुनः सरकार; टाटा छोटी कार परियोजना तेजी से आगे बढ़ती है।

30 मई 2006 — सरकारी कैबिनेट ज्ञापन में सिंगूर परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण प्रस्ताव दर्ज।

2006 के मध्य — भूमि सर्वेक्षण, अधिग्रहण प्रक्रिया और किसान विरोध।

दिसंबर 2006 — सिंगूर में भूमि की घेराबंदी को लेकर तनाव; ममता बनर्जी का अनशन।

दिसंबर 2006 — तापसी मलिक प्रकरण।

27–28 दिसंबर 2006 — नंदीग्राम रासायनिक केंद्र की संभावित भूमि को लेकर राजनीतिक/प्रशासनिक संकेत; हल्दिया विकास प्राधिकरण की सूचना।

3 जनवरी 2007 — नंदीग्राम में पहला बड़ा टकराव।

जनवरी 2007 — सड़कें काटी गईं; भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति का नियंत्रण मजबूत।

फरवरी 2007 — मुख्यमंत्री कहते हैं कि लोगों की इच्छा के विरुद्ध परियोजना नहीं होगी।

14 मार्च 2007 — पुलिस प्रवेश और गोलीबारी; 14 मौतें।

15 मार्च 2007 — मुख्यमंत्री विधानसभा में बयान देते हैं कि अनिच्छा होने पर रासायनिक केंद्र नंदीग्राम में नहीं बनेगा।

19 मार्च 2007 — जिला प्रशासन घोषणा करता है कि नंदीग्राम में उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहित नहीं की जाएगी।

मार्च–अक्टूबर 2007 — नंदीग्राम में राजनीतिक नियंत्रण और हिंसा का लंबा गतिरोध।

नवंबर 2007 — सीपीआई(एम) समर्थकों का ‘पुनर्दखल’; गंभीर हिंसा और पुलिस पक्षपात के आरोप; राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जांच में गंभीर निष्कर्ष।

2008 — सिंगूर में नैनो कारखाना लगभग तैयार होने की दिशा में।

अगस्त 2008 — ममता बनर्जी का सिंगूर धरना; 400 एकड़ वापसी की मांग।

3 सितंबर 2008 — टाटा मोटर्स सिंगूर में काम निलंबित करती है।

5–7 सितंबर 2008 — राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी की मध्यस्थता और समझौते का प्रयास।

3 अक्टूबर 2008 — टाटा मोटर्स सिंगूर से नैनो परियोजना हटाने की घोषणा करती है।

अक्टूबर 2008 — परियोजना गुजरात के साणंद जाने की दिशा स्पष्ट।

2008–09 — पंचायत और लोकसभा चुनावों में वाम मोर्चे की राजनीतिक गिरावट स्पष्ट।

2011 — विधानसभा चुनाव; 34 वर्ष पुराने वाम शासन का अंत।

20 जून 2011 — सिंगूर भूमि पुनर्वास एवं विकास अधिनियम लागू।

28 सितंबर 2011 — कलकत्ता उच्च न्यायालय की एकल पीठ कानून को कायम रखती है।

22 जून 2012 — उच्च न्यायालय की खंडपीठ कानून को असंवैधानिक ठहराती है।

2013 — नया राष्ट्रीय भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन कानून।

31 अगस्त 2016 — सर्वोच्च न्यायालय सिंगूर अधिग्रहण रद्द कर भूमि वापस करने का आदेश देता है।

खंड 15

समेकित निष्कर्ष और ऐतिहासिक स्थान

निष्कर्ष : सिंगूर–नंदीग्राम को इतिहास में कहां रखें?

सिंगूर और नंदीग्राम भारतीय किसान आंदोलन की उस ऐतिहासिक यात्रा का आधुनिक चरण हैं जिसमें प्रश्न ‘जमींदार से जमीन बचाने’ से बदलकर ‘विकास परियोजना में जमीन और किसान की भूमिका’ तक पहुंच गया।

क्या रोजगार पैदा करने वाली निजी औद्योगिक परियोजना के लिए राज्य किसान की भूमि अनिवार्य रूप से अधिग्रहित कर सकता है?

क्या किसान संभावित अधिग्रहण को होने से पहले ही सामूहिक प्रतिरोध द्वारा रोक सकता है?

14 मार्च ने तीसरा प्रश्न जोड़ दिया

लोकतांत्रिक राज्य विकास नीति लागू करने के लिए कितनी शक्ति प्रयोग कर सकता है?

और 2016 के सर्वोच्च न्यायालय निर्णय ने चौथा

विकास का उद्देश्य कितना भी आकर्षक क्यों न हो, क्या विधिसम्मत अधिग्रहण प्रक्रिया को दरकिनार किया जा सकता है?

इन आंदोलनों का सबसे बड़ा परिणाम टाटा नैनो का बंगाल से जाना अथवा किसी रासायनिक केंद्र का न बनना नहीं था।

सबसे बड़ा परिणाम था भारतीय विकास विमर्श में किसान को फिर से निर्णय के केंद्र में ला देना।

भूमि अब केवल सरकार द्वारा अधिग्रहित की जाने वाली संपत्ति नहीं थी। वह आजीविका, सामाजिक सुरक्षा, संस्कृति, पहचान और भविष्य की आर्थिक हिस्सेदारी थी।

और पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना भी यही रही

1977 में जिस भूमि-सुधार और किसान सशक्तीकरण ने वाम मोर्चे के दीर्घ शासन की नींव मजबूत की थी, 2006–07 में उसी भूमि के प्रश्न ने उसकी राजनीतिक वैधता को सबसे गहरी चोट पहुंचाई।

नंदीग्राम में प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण रुक गया।

लेकिन इन दोनों जगहों से निकला प्रश्न आज भी भारतीय विकास नीति के सामने खड़ा है

विकास आवश्यक है, पर विकास की जमीन किसकी होगी, उसका निर्णय कौन करेगा, उसकी कीमत कौन चुकाएगा और उसके लाभ में भूमि देने वाले की हिस्सेदारी कितनी होगी?

इसी कारण सिंगूर और नंदीग्राम केवल पश्चिम बंगाल के दो भूमि आंदोलन नहीं हैं; वे इक्कीसवीं सदी के भारत में ‘विकास के अधिकार’ और ‘भूमि के अधिकार’ के बीच नया सामाजिक अनुबंध खोजने की निर्णायक ऐतिहासिक घटनाएं हैं।

प्रमुख सत्यापन स्रोत

इस अध्याय के सबसे संवेदनशील तथ्यों—सिंगूर अधिग्रहण, सरकारी कैबिनेट ज्ञापन और 2016 निर्णय—के लिए सर्वोच्च न्यायालय का केदारनाथ यादव बनाम पश्चिम बंगाल राज्य निर्णय केंद्रीय स्रोत है। नंदीग्राम के लिए 14 मार्च 2007 पर संसद में केंद्रीय गृह मंत्री का वक्तव्य, कलकत्ता उच्च न्यायालय का लोकतांत्रिक अधिकार संरक्षण संघ बनाम पश्चिम बंगाल राज्य निर्णय तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। टाटा के सिंगूर छोड़ने के कारणों के लिए कंपनी की 3 अक्टूबर 2008 की आधिकारिक घोषणा भी प्राथमिक स्रोत है।

OCN ऐतिहासिक आकलन

सिंगूर और नंदीग्राम ने भारतीय किसान राजनीति के प्रश्न को ‘जमींदार बनाम किसान’ से आगे बढ़ाकर ‘औद्योगिक विकास के लिए भूमि किस प्रक्रिया से ली जाए’ तक पहुँचा दिया। आंदोलन ने अनिवार्य अधिग्रहण, वास्तविक सहमति, उपजाऊ बहुफसली भूमि, बर्गादार–खेत मजदूर की आजीविका, राज्य की निष्पक्षता और पुलिस बल की संवैधानिक सीमा को राष्ट्रीय बहस बनाया। इसकी सबसे बड़ी राजनीतिक परिणति 2011 में 34 वर्ष पुराने वाम शासन का अंत थी; कानूनी विरासत 2013 के नए भूमि कानून और 2016 के सर्वोच्च न्यायालय के सिंगूर निर्णय में दिखाई दी। फिर भी टाटा परियोजना का पलायन, रोजगार के खोए अवसर, दलगत हिंसा, विस्थापित राजनीतिक कार्यकर्ता और नंदीग्राम में आंदोलन के बाद के विकास-विवाद बताते हैं कि इसे केवल किसान विजय या औद्योगीकरण की पराजय कहना अधूरा होगा। इसका स्थायी संदेश है—विकास तभी वैध है जब भूमि चुनने, सहमति लेने, मुआवजा तय करने, आजीविका बचाने और विरोध सुनने की प्रक्रिया न्यायपूर्ण हो।

शोधार्थियों के लिए

प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत

सर्वोच्च न्यायालयसिंगूर भूमि अधिग्रहण पर 2016 का केदारनाथ यादव निर्णय और 2025 में शांति सिरेमिक्स प्रकरण का बाद का स्पष्टीकरण।स्रोत तक जाएँ ↗
13 अक्टूबर 2025 का सर्वोच्च न्यायालय निर्णयकिसान-केंद्रित भूमि-वापसी राहत और मुआवजा स्वीकार कर चुके व्यावसायिक दावेदार के बीच कानूनी अंतर स्पष्ट करने वाला आधिकारिक निर्णय।स्रोत तक जाएँ ↗
सिंगूर भूमि पुनर्वास और विकास कानून, 2011सिंगूर की भूमि वापस लेने तथा प्रभावित किसानों के पुनर्वास के लिए पश्चिम बंगाल का कानून।स्रोत तक जाएँ ↗
भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर तथा पारदर्शिता का अधिकार कानून, 2013सामाजिक प्रभाव आकलन, सहमति, मुआवजा, पुनर्वास और पारदर्शिता का केंद्रीय वैधानिक ढांचा।स्रोत तक जाएँ ↗
कलकत्ता उच्च न्यायालयनंदीग्राम पुलिस कार्रवाई, सिंगूर अधिग्रहण और 2011 के राज्य कानून से जुड़े न्यायिक अभिलेख।स्रोत तक जाएँ ↗
पश्चिम बंगाल भूमि एवं भूमि सुधार विभागसिंगूर भूमि-वापसी, अभिलेख, पुनर्वास और राज्य की भूमि-नीति से संबंधित सरकारी सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗
आधुनिक अकादमिक शोधसिंगूर, नंदीग्राम, भूमि अधिग्रहण, किसान राजनीति और पश्चिम बंगाल के सत्ता परिवर्तन पर शोध-पुस्तकें तथा शोध-प्रबंध।स्रोत तक जाएँ ↗

स्रोत-सावधानी: सिंगूर में सहमति देने और न देने वाले किसानों की संख्या, अधिग्रहित भूमि का वर्गीकरण, नंदीग्राम हिंसा के हताहतों, राजनीतिक विस्थापन तथा 2007 के पुनर्दखल के विवरणों पर सरकारी, दलीय, आंदोलनकारी और स्वतंत्र स्रोतों में अंतर मिलता है। न्यायिक निर्णय, भूमि अभिलेख, आयोगीय–जाँच सामग्री, समकालीन समाचार और प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य का परस्पर मिलान आवश्यक है।