नर्मदा बचाओ आंदोलन
विकास, विस्थापन और पर्यावरण न्याय का ऐतिहासिक संघर्ष
नर्मदा बचाओ आंदोलन किसी एक बाँध का विरोध मात्र नहीं था। उसने सरदार सरोवर और घाटी की दूसरी परियोजनाओं के माध्यम से भारतीय विकास-नीति के सामने मूल प्रश्न रखा—सिंचाई, पेयजल और बिजली के व्यापक लाभों की कीमत यदि किसान, आदिवासी, मछुआरे और नदी-आश्रित समुदाय अपनी भूमि, आजीविका तथा संस्कृति खोकर चुकाते हैं, तो पुनर्वास और निर्णय-प्रक्रिया में उनका न्यायपूर्ण हिस्सा कहाँ है? स्थानीय समितियों से मेधा पाटकर, बाबा आमटे, विश्व बैंक की स्वतंत्र समीक्षा और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा यह संघर्ष विस्थापन को प्रशासनिक समस्या से अधिकार के प्रश्न में बदलने की दीर्घ यात्रा है।
नर्मदा घाटी, सभ्यता और सरदार सरोवर की पृष्ठभूमि
प्रस्तावना : एक बाँध से कहीं बड़ा आंदोलन
नर्मदा बचाओ आंदोलन को केवल सरदार सरोवर बाँध के विरोध का आंदोलन मानना इसके ऐतिहासिक महत्व को बहुत सीमित कर देना होगा। यह स्वतंत्र भारत में विकास की अवधारणा पर उठे सबसे प्रभावशाली जन-प्रश्नों में से एक था—विकास किसके लिए, विकास की कीमत कौन चुकाएगा, विस्थापित व्यक्ति का अधिकार क्या है, जंगल और नदी पर निर्भर आदिवासी समुदाय की क्षति का मूल्यांकन कैसे होगा और क्या राज्य किसी बड़ी परियोजना के संभावित सामूहिक लाभ के नाम पर स्थानीय समुदायों से उनकी भूमि और आजीविका छीन सकता है?
नर्मदा घाटी में बड़े बाँधों की योजना स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों से विकसित हो रही थी। अंततः घाटी में अनेक बड़ी, मध्यम और छोटी परियोजनाओं की परिकल्पना बनी। इनमें गुजरात का सरदार सरोवर बाँध तथा मध्य प्रदेश के इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर और महेश्वर जैसे बाँध विशेष रूप से महत्वपूर्ण बने। सर्वोच्च न्यायालय के 2000 के निर्णय में दर्ज योजना के अनुसार नर्मदा बेसिन में 30 बड़े, 135 मध्यम और 3,000 से अधिक छोटे बाँधों की व्यापक विकास-परिकल्पना थी।
इसी विशाल परियोजना-तंत्र के बीच नर्मदा बचाओ आंदोलन ने प्रश्न उठाया कि बिजली, सिंचाई और पेयजल की गणना के साथ डूबने वाले गाँवों, जंगलों, खेतों, सांस्कृतिक भूगोल और समुदायों की लागत भी विकास के हिसाब में शामिल होनी चाहिए।
नर्मदा : नदी, घाटी और सभ्यता
नर्मदा भारत की प्रमुख पश्चिमवाहिनी नदियों में है। इसका उद्गम मध्य प्रदेश के अमरकंटक क्षेत्र से होता है और यह मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र की सीमा के हिस्सों तथा गुजरात से गुजरते हुए अरब सागर की खंभात की खाड़ी में मिलती है।
नर्मदा घाटी केवल नदी का जलग्रहण क्षेत्र नहीं थी। इसकी घाटियों और जंगलों में सदियों से अनेक आदिवासी समुदाय, छोटे किसान, मछुआरे, खेतिहर मजदूर और नदी-आधारित समुदाय रहते आए थे।
यहीं विकास का मूल अंतर्विरोध पैदा हुआ।
सिंचाई + बिजली + पेयजल + क्षेत्रीय विकास
जबकि स्थानीय समुदायों के लिए वही नदी
भूमि + जंगल + खेती + मत्स्य-संसाधन + सामाजिक संबंध + संस्कृति + जीवन-पद्धति
नर्मदा आंदोलन ने इन दोनों दृष्टियों के टकराव को राष्ट्रीय विमर्श में ला दिया।
सरदार सरोवर परियोजना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
नर्मदा के पानी के उपयोग की योजनाएँ स्वतंत्रता से पहले भी विचाराधीन थीं, लेकिन स्वतंत्र भारत में नदी घाटी विकास को राष्ट्र-निर्माण की परियोजना के रूप में देखा गया।
देश में बड़े बाँध आधुनिकता के प्रतीक बने।
भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड, दामोदर घाटी और अन्य परियोजनाओं की तरह नर्मदा घाटी को भी कृषि उत्पादन, सिंचाई और बिजली उत्पादन की दृष्टि से विकसित करने की योजना बनी।
सरदार सरोवर परियोजना की औपचारिक शुरुआत से जुड़ा महत्वपूर्ण पड़ाव 1961 था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने परियोजना की आधारशिला रखी।
लेकिन इसके बाद गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच नर्मदा जल के बँटवारे तथा बाँध की ऊँचाई जैसे मुद्दों पर विवाद पैदा हुआ।
जल विवाद न्यायाधिकरण, नियंत्रण प्राधिकरण और विकास का वादा
नर्मदा जल विवाद और न्यायाधिकरण
अंतरराज्यीय विवाद बढ़ने पर केंद्र सरकार ने अंतरराज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के अंतर्गत 1969 में नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण—Narmada Water Disputes Tribunal (NWDT) गठित किया।
लंबी सुनवाई के बाद न्यायाधिकरण ने 1979 में अपना अंतिम निर्णय दिया।
न्यायाधिकरण ने 75 प्रतिशत निर्भरता के आधार पर नर्मदा में उपलब्ध उपयोगी जल की मात्रा 28 मिलियन एकड़ फीट निर्धारित की।
लेकिन न्यायाधिकरण का फैसला केवल पानी के बँटवारे तक सीमित नहीं था।
उसने विस्थापितों के पुनर्वास के बारे में भी महत्वपूर्ण प्रावधान किए।
सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत था कि प्रभावित लोगों के पुनर्वास को बाँध की प्रगति और डूब से जोड़ा जाए।
यही सिद्धांत बाद में नर्मदा आंदोलन और न्यायालयी संघर्ष का केंद्रीय आधार बना।
नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण
न्यायाधिकरण के निर्णय को लागू करने के लिए नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण—Narmada Control Authority (NCA) की व्यवस्था की गई।
इसके अतिरिक्त समीक्षा समिति और सरदार सरोवर निर्माण सलाहकार समिति जैसी संस्थागत व्यवस्थाएँ भी बनाई गईं।
नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण में केंद्र तथा संबंधित राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल किए गए।
और परियोजना के अंतरराज्यीय समन्वय
आगे चलकर यही संस्था बाँध की ऊँचाई बढ़ाने की मंजूरी देने की प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण बनी।
विकास का वादा : परियोजना के पक्ष में तर्क
सरदार सरोवर परियोजना के समर्थकों का सबसे मजबूत तर्क गुजरात के जल-संकट से जुड़ा था।
और सूखा-प्रभावित क्षेत्रों में पानी पहुँचाने को परियोजना का प्रमुख औचित्य बताया गया।
सरकार के अनुसार परियोजना से विशाल क्षेत्र में सिंचाई उपलब्ध होनी थी, लाखों लोगों को पेयजल मिलना था और जलविद्युत उत्पादन होना था।
2017 में अंतिम चरण की मंजूरी देते समय केंद्र सरकार ने कहा कि अतिरिक्त जल-संग्रह से लगभग आठ लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई, लगभग एक करोड़ लोगों को सुनिश्चित पेयजल तथा विद्युत उत्पादन क्षमता में वृद्धि संभव होगी।
इसीलिए नर्मदा विवाद को केवल "पर्यावरणवादी बनाम बाँध" के सरल द्वंद्व में नहीं रखा जा सकता।
एक तरफ विस्थापन और पर्यावरण का प्रश्न था, दूसरी तरफ सूखाग्रस्त क्षेत्रों की जल आवश्यकता।
विस्थापन का प्रश्न, स्थानीय संगठन और मेधा पाटकर
समस्या कहाँ से शुरू हुई?
जैसे-जैसे परियोजना आगे बढ़ी, यह स्पष्ट होने लगा कि बाँध और जलाशय के कारण बड़ी संख्या में गाँव प्रभावित होंगे।
विशेष चिंता उन आदिवासी क्षेत्रों की थी जहाँ भूमि केवल संपत्ति नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक अस्तित्व का आधार थी।
प्रभावित लोगों के सामने कई समस्याएँ थीं
सामुदायिक संसाधनों की क्षति,
पुनर्वास स्थलों की गुणवत्ता,
वनभूमि पर परंपरागत अधिकारों की मान्यता,
और नकद मुआवजे बनाम जमीन के बदले जमीन का प्रश्न।
यहीं से स्थानीय विरोध धीरे-धीरे व्यापक जनांदोलन में परिवर्तित हुआ।
प्रारंभिक स्थानीय संगठन
नर्मदा बचाओ आंदोलन अचानक 1985 या 1989 में पैदा नहीं हुआ।
इससे पहले गुजरात और मध्य प्रदेश के प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर संगठन बन चुके थे।
गुजरात में नर्मदा असरग्रस्त संघर्ष समिति जैसे संगठनों ने प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और अधिकारों को लेकर आवाज उठाई।
मध्य प्रदेश में भी प्रभावित गाँवों का संगठन विकसित होने लगा।
महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में विस्थापन और पुनर्वास को लेकर विरोध बढ़ा।
इन्हीं स्थानीय संघर्षों ने आगे चलकर घाटी-स्तरीय आंदोलन की जमीन तैयार की।
मेधा पाटकर का आगमन
1980 के दशक के मध्य में मेधा पाटकर ने नर्मदा घाटी के प्रभावित क्षेत्रों का विस्तृत दौरा किया।
उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों से बातचीत की और परियोजना से होने वाले विस्थापन, पुनर्वास तथा पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन किया।
धीरे-धीरे वे आंदोलन का सबसे प्रमुख सार्वजनिक चेहरा बन गईं।
लेकिन आंदोलन को केवल मेधा पाटकर तक सीमित करके देखना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा।
इसमें अनेक स्थानीय आदिवासी नेताओं, किसानों, महिलाओं, कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों, शोधकर्ताओं और समर्थकों की भूमिका थी।
मेधा पाटकर ने इन बिखरे संघर्षों को राष्ट्रीय और बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज देने में निर्णायक भूमिका निभाई।
नर्मदा धरणग्रस्त समिति से नर्मदा बचाओ आंदोलन
मध्य प्रदेश में प्रभावित लोगों को संगठित करने के लिए नर्मदा धरणग्रस्त समिति जैसे संगठन सक्रिय हुए।
महाराष्ट्र और गुजरात के संगठनों के साथ संपर्क बढ़ा।
1980 के दशक के उत्तरार्ध में विभिन्न स्थानीय संगठनों और संघर्षों को एक व्यापक पहचान मिलने लगी
यह नाम स्वयं आंदोलन के विस्तार का संकेत था।
अब प्रश्न केवल मुआवजे का नहीं था।
नर्मदा घाटी का विकास किस मॉडल पर होगा?
मूल मांगें, पर्यावरणीय मंजूरी और विश्व बैंक
आंदोलन की मूल माँगें
समय के साथ आंदोलन की माँगें बदलती और विस्तृत होती गईं।
प्रारंभिक चरण में प्रमुख प्रश्न था
सभी प्रभावितों की सही गणना की जाए।
पर्यावरणीय प्रभावों का पूर्ण अध्ययन किया जाए।
और अंततः आंदोलन के एक प्रभावशाली हिस्से ने परियोजना की मूल संरचना, बाँध की ऊँचाई तथा बड़े बाँध आधारित विकास मॉडल पर ही सवाल खड़ा कर दिया।
पर्यावरणीय मंजूरी का विवाद
सरदार सरोवर परियोजना को पर्यावरणीय दृष्टि से मंजूरी देने की प्रक्रिया स्वयं विवाद का विषय बनी।
1987 में परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी दी गई, लेकिन उसके साथ अनेक शर्तें और अध्ययन जुड़े हुए थे।
क्या परियोजना के सभी पर्यावरणीय प्रभावों का पूर्ण अध्ययन निर्माण से पहले होना चाहिए था?
या निर्माण और पर्यावरणीय अध्ययन समानांतर रूप से चल सकते थे?
आंदोलन का तर्क था कि इतने बड़े बाँध के निर्माण से पहले उसके संपूर्ण सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को समझना आवश्यक था।
विश्व बैंक का प्रवेश
सरदार सरोवर विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने वाला सबसे बड़ा कारण था विश्व बैंक।
1985 में विश्व बैंक ने परियोजना के लिए लगभग 45 करोड़ डॉलर की वित्तीय सहायता मंजूर की।
इससे परियोजना केवल भारत की घरेलू विकास योजना नहीं रही।
अब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था भी इसके परिणामों के लिए जवाबदेही के दायरे में आने लगी।
आंदोलनकारियों ने विश्व बैंक की अपनी पुनर्वास और पर्यावरणीय नीतियों का हवाला देकर पूछा
यदि बैंक की नीतियाँ विस्थापितों और पर्यावरण की सुरक्षा की अपेक्षा करती हैं तो सरदार सरोवर को वित्तीय सहायता कैसे दी जा रही है?
1988–91 : विस्तार, बाबा आमटे और संघर्ष यात्रा
1988–89 : आंदोलन का निर्णायक विस्तार
1988–89 तक नर्मदा घाटी का संघर्ष राष्ट्रीय पहचान प्राप्त करने लगा।
प्रभावित गाँवों की सभाएँ, यात्राएँ और विरोध प्रदर्शन बढ़े।
1989 में मध्य प्रदेश के हरसूद में विशाल जनसभा इस आंदोलन का महत्वपूर्ण पड़ाव बनी।
यहाँ केवल नर्मदा घाटी के लोग नहीं, बल्कि देशभर से सामाजिक कार्यकर्ता और विकास परियोजनाओं से प्रभावित समुदाय जुड़े।
और आंदोलन की सबसे प्रसिद्ध प्रतिरोधात्मक अभिव्यक्तियों में से एक बनी
“कोई नहीं हटेगा, बाँध नहीं बनेगा।”
बाबा आमटे और आंदोलन
प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता बाबा आमटे का नर्मदा संघर्ष से जुड़ना आंदोलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।
उन्होंने बड़े बाँधों और विस्थापन की समस्या को केवल स्थानीय मुद्दा नहीं माना।
1990 में उन्होंने नर्मदा किनारे रहकर आंदोलन के साथ एकजुटता प्रदर्शित की।
उनकी नैतिक प्रतिष्ठा ने नर्मदा आंदोलन को व्यापक राष्ट्रीय समर्थन दिलाया।
इस दौर में नर्मदा प्रश्न मानवाधिकार, पर्यावरण और वैकल्पिक विकास की बहस का प्रतीक बनने लगा।
संघर्ष यात्रा : 1990–91
दिसंबर 1990 में आंदोलन ने एक बड़ी संघर्ष यात्रा आयोजित की।
राजघाट क्षेत्र से सरदार सरोवर की दिशा में हजारों आंदोलनकारी आगे बढ़े।
गुजरात सीमा पर उन्हें रोक दिया गया।
यह घटना आंदोलन के इतिहास में महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे स्पष्ट हुआ कि संघर्ष अब स्थानीय प्रशासनिक माँग से आगे बढ़कर परियोजना की वैधता और विकास मॉडल की राष्ट्रीय बहस बन चुका था।
मेधा पाटकर और अन्य कार्यकर्ताओं ने अनशन भी किए।
आंदोलन की संघर्ष-पद्धति
नर्मदा बचाओ आंदोलन ने गांधीवादी जन-प्रतिरोध की अनेक विधियाँ अपनाईं
इसका एक अत्यंत प्रभावशाली नारा था
जब पानी गाँवों और घरों तक पहुँचा तो लोगों ने पानी में खड़े होकर विरोध किया।
इसे जल-सत्याग्रह का रूप मिला।
मोर्स आयोग, विश्व बैंक की वापसी और बाँध का जारी रहना
विश्व बैंक पर अंतरराष्ट्रीय दबाव
आंदोलन ने एक महत्वपूर्ण रणनीतिक परिवर्तन किया।
उसने केवल भारत सरकार और राज्य सरकारों से संघर्ष नहीं किया बल्कि परियोजना के अंतरराष्ट्रीय वित्तदाता विश्व बैंक को भी जवाबदेह बनाने का प्रयास किया।
दुनिया के पर्यावरणवादी और मानवाधिकार संगठन नर्मदा विवाद से जुड़ने लगे।
क्या किसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था को ऐसी परियोजना को धन देना चाहिए जिसके सामाजिक और पर्यावरणीय परिणामों पर गंभीर विवाद हो?
अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता गया।
मोर्स आयोग : ऐतिहासिक स्वतंत्र समीक्षा
विश्व बैंक ने परियोजना की स्वतंत्र समीक्षा कराने का निर्णय किया।
अमेरिकी कांग्रेस के पूर्व सदस्य ब्रैडफोर्ड मोर्स के नेतृत्व में स्वतंत्र समीक्षा दल बनाया गया।
यह विश्व बैंक के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी क्योंकि बैंक द्वारा वित्तपोषित परियोजना की इस प्रकार बाहरी स्वतंत्र समीक्षा असाधारण कदम था।
जून 1992 में समीक्षा रिपोर्ट प्रकाशित हुई।
मोर्स समीक्षा ने पुनर्वास और पर्यावरणीय तैयारी में गंभीर कमियाँ बताईं।
विश्व बैंक स्वयं स्वीकार करता है कि समीक्षा ने भारत सरकार और बैंक दोनों की जिम्मेदारी की आलोचना की।
हालाँकि यह भी महत्वपूर्ण है कि विश्व बैंक प्रबंधन ने मोर्स रिपोर्ट की हर बात स्वीकार नहीं की। उसने कुछ निष्कर्षों से असहमति जताई, जबकि पुनर्वास की तैयारी में कमियाँ स्वीकार कीं। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी 2000 के निर्णय में कहा कि वह अपने निर्णय के लिए मोर्स रिपोर्ट पर निर्भर नहीं करेगा।
इसलिए इतिहासलेखन में यह कहना अधिक सही है कि मोर्स समीक्षा आंदोलन की बड़ी नैतिक और राजनीतिक उपलब्धि थी, लेकिन उसकी सभी निष्पत्तियाँ विश्व बैंक या भारतीय न्यायपालिका द्वारा अक्षरशः स्वीकार नहीं की गईं।
विश्व बैंक की वापसी : आंदोलन की ऐतिहासिक जीत
मोर्स रिपोर्ट के बाद विश्व बैंक पर दबाव और बढ़ा।
अंततः 1993 में भारत सरकार के अनुरोध पर विश्व बैंक के शेष ऋण को रद्द कर दिया गया।
विश्व बैंक की अपनी ऐतिहासिक समयरेखा इस तथ्य की पुष्टि करती है।
यह नर्मदा बचाओ आंदोलन की सबसे चर्चित उपलब्धियों में गिनी जाती है।
बड़े बाँधों और अन्य विकास परियोजनाओं के वित्तपोषण में
पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की जवाबदेही की बहस मजबूत हुई।
लेकिन बाँध नहीं रुका
विश्व बैंक की वापसी आंदोलन की बड़ी सफलता थी, परंतु इससे परियोजना समाप्त नहीं हुई।
भारत सरकार और संबंधित राज्य सरकारों ने परियोजना को अपने संसाधनों से आगे बढ़ाने का निर्णय किया।
यहीं आंदोलन के सामने रणनीतिक चुनौती पैदा हुई।
विश्व बैंक को हटाना संभव हुआ, लेकिन भारतीय राज्य की विकास नीति बदलना कहीं अधिक कठिन सिद्ध हुआ।
अब संघर्ष का प्रमुख क्षेत्र न्यायपालिका बन गया।
सर्वोच्च न्यायालय और 2000 का ऐतिहासिक फैसला
सर्वोच्च न्यायालय में संघर्ष
नर्मदा बचाओ आंदोलन ने 1994 में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की।
उसमें परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव, पुनर्वास, विस्थापन और बाँध की ऊँचाई सहित कई प्रश्न उठाए गए।
1995 के आसपास न्यायालयी हस्तक्षेप के कारण बाँध निर्माण की प्रगति पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा।
न्यायालय ने परियोजना की विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की।
इस अवधि में आंदोलन की रणनीति तीन मोर्चों पर चल रही थी
घाटी में जनसंघर्ष + दिल्ली में राजनीतिक दबाव + सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी लड़ाई।
1993 की पाँच सदस्यीय समिति
केंद्र सरकार ने अगस्त 1993 में योजना आयोग के सदस्य जयंत पाटिल की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय समूह गठित किया।
इसमें वसंत गोवारीकर, रामास्वामी आर. अय्यर, एल.सी. जैन आदि शामिल थे।
समिति को परियोजना के विभिन्न विवादास्पद पहलुओं की समीक्षा करनी थी।
दिसंबर 1994 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करने का निर्देश दिया।
बाद में बाँध की ऊँचाई, जल-विज्ञान, पुनर्वास और पर्यावरण जैसे प्रश्नों पर अतिरिक्त विचार हुआ।
1999 : निर्माण फिर आगे बढ़ा
लंबे न्यायालयी गतिरोध के बाद 1999 में बाँध की ऊँचाई बढ़ाने की अनुमति दी गई।
लेकिन मूल सिद्धांत कायम रखा गया कि
बाँध की ऊँचाई और पुनर्वास साथ-साथ चलें।
1996 में नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की समीक्षा समिति में यह व्यवस्था बनी कि प्रत्येक पाँच मीटर की ऊँचाई वृद्धि पर पुनर्वास और पर्यावरणीय अनुपालन की समीक्षा की जाए।
इसे सामान्यतः pari passu सिद्धांत कहा गया
अर्थात निर्माण की प्रगति के साथ-साथ पुनर्वास और पर्यावरणीय उपाय भी आगे बढ़ें।
18 अक्टूबर 2000 : ऐतिहासिक सर्वोच्च न्यायालय फैसला
नर्मदा बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 18 अक्टूबर 2000 को बहुमत से महत्वपूर्ण निर्णय दिया।
न्यायालय ने परियोजना को रोकने की माँग स्वीकार नहीं की।
बाँध निर्माण को आगे बढ़ाने की अनुमति दी गई, लेकिन पुनर्वास और पर्यावरणीय शर्तों के अनुपालन को उससे जोड़ा गया।
न्यायालय ने नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण और उसकी संबंधित उपसमितियों की निगरानी भूमिका को महत्वपूर्ण माना।
इस प्रकार निर्णय का मूल संदेश था
परियोजना चलेगी, लेकिन पुनर्वास और पर्यावरणीय शर्तों के साथ।
न्यायमूर्ति एस.पी. भरूचा की असहमति
2000 का फैसला सर्वसम्मत नहीं था।
न्यायमूर्ति एस.पी. भरूचा ने असहमति व्यक्त की।
उनका दृष्टिकोण पर्यावरणीय मंजूरी और अध्ययन की पर्याप्तता को लेकर बहुमत से भिन्न था।
यह असहमति भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र में महत्वपूर्ण बनी क्योंकि इससे यह मूल प्रश्न सामने आया कि
क्या किसी विशाल परियोजना को पर्यावरणीय अध्ययनों के अधूरे रहते आगे बढ़ाना चाहिए?
अदालत में हार या आंशिक उपलब्धि?
2000 का निर्णय आंदोलन के लिए स्पष्ट जीत नहीं था क्योंकि बाँध रोकने की मुख्य माँग स्वीकार नहीं हुई।
लेकिन इसे पूर्ण पराजय भी नहीं कहा जा सकता।
आंदोलन ने पुनर्वास को निर्माण की प्रगति से संस्थागत रूप से जोड़ने के प्रश्न को अत्यंत मजबूत बनाया।
न्यायाधिकरण का यह प्रावधान कि प्रभावित लोगों को डूब से पहले पुनर्वास मिलना चाहिए, आगे की पूरी लड़ाई का कानूनी आधार बना रहा।
2002–06 : पुनर्वास, भ्रष्टाचार और अन्य नर्मदा परियोजनाएं
2002–06 : पुनर्वास का नया संघर्ष
जैसे-जैसे बाँध की ऊँचाई बढ़ी, नए गाँव डूब क्षेत्र में आते गए।
इसके साथ प्रभावित परिवारों की संख्या, पात्रता, भूमि उपलब्धता और पुनर्वास की वास्तविक स्थिति पर विवाद बढ़ा।
विशेषकर मध्य प्रदेश में सवाल उठे
क्या जमीन के बदले पर्याप्त जमीन उपलब्ध है?
क्या नकद मुआवजा वास्तविक पुनर्वास है?
क्या सभी प्रभावित परिवारों को सही ढंग से दर्ज किया गया है?
क्या वयस्क पुत्रों को अलग परिवार माना जाएगा?
क्या भूमिहीन मजदूर और अन्य आजीविका-निर्भर लोग पर्याप्त सुरक्षा पा रहे हैं?
2006 : 121.92 मीटर और दिल्ली का अनशन
2006 में बाँध की ऊँचाई लगभग 121.92 मीटर तक बढ़ाने की अनुमति ने नया बड़ा संघर्ष पैदा किया।
नर्मदा बचाओ आंदोलन ने दावा किया कि प्रभावित परिवारों का पूर्ण पुनर्वास किए बिना ऊँचाई बढ़ाई जा रही है।
मेधा पाटकर ने दिल्ली में अनशन किया।
मामला राष्ट्रीय राजनीति में फिर केंद्र में आया।
केंद्रीय मंत्रियों की टीम ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया।
सर्वोच्च न्यायालय में भी मामला पहुँचा।
न्यायालय ने पुनर्वास के नियमों के अनुपालन पर जोर दिया, लेकिन परियोजना को स्थायी रूप से रोकने का आदेश नहीं दिया।
पुनर्वास में भ्रष्टाचार के आरोप
मध्य प्रदेश में पुनर्वास प्रक्रिया के दौरान फर्जी रजिस्ट्रियों और मुआवजा व्यवस्था में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आए।
इसके बाद न्यायमूर्ति एस.एस. झा आयोग गठित किया गया।
आयोग ने पुनर्वास व्यवस्था से जुड़े अनेक मामलों की जाँच की।
“पुनर्वास प्रशासन में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार”
इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर और महेश्वर
नर्मदा बचाओ आंदोलन केवल सरदार सरोवर तक सीमित नहीं रहा।
इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर और महेश्वर
परियोजनाओं से प्रभावित समुदायों के संघर्ष भी इससे जुड़े।
इससे आंदोलन की प्रकृति और व्यापक हुई।
विशेष रूप से मध्य प्रदेश में जल-सत्याग्रह की घटनाओं ने राष्ट्रीय ध्यान खींचा।
लोग कई दिनों तक जलाशय के पानी में खड़े होकर भूमि और पुनर्वास अधिकारों की माँग करते रहे।
महेश्वर परियोजना का प्रश्न
महेश्वर जलविद्युत परियोजना के विरुद्ध संघर्ष ने निजी पूँजी, बिजली परियोजनाओं और पुनर्वास के संबंध पर नया प्रश्न उठाया।
आंदोलन ने परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता, बिजली की लागत और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को लेकर आपत्तियाँ उठाईं।
इस प्रकार नर्मदा आंदोलन धीरे-धीरे बड़े बाँध से आगे बढ़कर
विकास परियोजना की आर्थिक जवाबदेही
आदिवासी, महिलाएं, गांधीवादी प्रतिरोध और आलोचनाएं
आदिवासी प्रश्न : आंदोलन का केंद्रीय आयाम
नर्मदा घाटी के अनेक प्रभावित गाँव आदिवासी बहुल थे।
इन समुदायों के लिए विस्थापन केवल एक भूखंड छोड़ना नहीं था।
नकद मुआवजा इस समग्र क्षति की भरपाई नहीं कर सकता था।
इसीलिए “जमीन के बदले जमीन” की माँग आंदोलन की केंद्रीय माँग बनी।
महिलाओं की भूमिका
नर्मदा बचाओ आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय थी।
और पुलिस कार्रवाई का सामना करने तक में सक्रिय भूमिका निभाई।
महिलाओं ने विस्थापन को अलग दृष्टि से सामने रखा।
नई जगह बसने पर केवल खेत नहीं छूटता
और घरेलू अर्थव्यवस्था का पूरा तंत्र बदलता है।
इस दृष्टि ने पुनर्वास की परिभाषा को व्यापक बनाया।
आंदोलन और गांधीवादी परंपरा
नर्मदा आंदोलन की राजनीतिक भाषा पर गांधीवादी प्रभाव स्पष्ट था।
इसकी रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से थे।
लेकिन आंदोलन पारंपरिक गांधीवाद तक सीमित नहीं था।
को भी संघर्ष के औजार के रूप में इस्तेमाल किया।
आंदोलन के आलोचक क्या कहते थे?
नर्मदा आंदोलन की आलोचना भी गंभीर रही है और समग्र इतिहास में उसे शामिल करना आवश्यक है।
आलोचकों का तर्क था कि आंदोलन
बड़े बाँधों के लाभों को कम करके दिखाता है;
गुजरात के सूखाग्रस्त क्षेत्रों की जल आवश्यकता को पर्याप्त महत्व नहीं देता;
परियोजना में पहले ही हुए विशाल निवेश की अनदेखी करता है;
पुनर्वास में हुए सुधारों को स्वीकार नहीं करता;
और विकासशील देश में बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता को आदर्शवादी दृष्टि से देखता है।
गुजरात में परियोजना के समर्थन का मजबूत सामाजिक आधार भी रहा।
इसलिए नर्मदा संघर्ष कभी भी सरल
एक क्षेत्र के संभावित लाभार्थियों बनाम दूसरे क्षेत्र के विस्थापित समुदायों
आंदोलन का प्रत्युत्तर
नर्मदा बचाओ आंदोलन का उत्तर था कि वह पानी या विकास का विरोध नहीं कर रहा।
क्या समान लाभ कम सामाजिक लागत वाले विकल्पों से प्राप्त किए जा सकते हैं?
और विकेंद्रीकृत योजनाओं को पर्याप्त महत्व दिया गया?
और यदि बड़ा बाँध अपरिहार्य है तो
क्या विस्थापित व्यक्ति को विकास की कीमत अकेले चुकानी चाहिए?
2014–19 : अंतिम ऊँचाई, पुनर्वास आदेश और नई डूब
2014 : बाँध की ऊँचाई का अंतिम चरण
2014 में केंद्र में नई सरकार बनने के बाद नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण ने बाँध को उसकी अंतिम निर्धारित ऊँचाई की दिशा में आगे बढ़ाने की मंजूरी दी।
द्वार लगाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
प्रभावित परिवारों का तर्क था कि पुनर्वास अभी पूरा नहीं हुआ।
सरकार का दावा था कि आवश्यक पुनर्वास व्यवस्थाएँ की जा रही हैं।
फरवरी 2017 : सर्वोच्च न्यायालय का पुनर्वास आदेश
8 फरवरी 2017 को सर्वोच्च न्यायालय ने सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास से जुड़े मामलों पर महत्वपूर्ण आदेश दिया।
न्यायालय ने कुछ श्रेणियों के परियोजना-प्रभावित परिवारों के लिए आर्थिक पैकेज की व्यवस्था की और पुनर्वास पूरा करने के लिए समयसीमा निर्धारित की।
यह चरण महत्वपूर्ण था क्योंकि अब विवाद बाँध के अस्तित्व से अधिक
अंतिम डूब से पहले शेष परिवारों के पुनर्वास
जून 2017 : अंतिम ऊँचाई की मंजूरी
17 जून 2017 को नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण ने सरदार सरोवर बाँध के द्वार बंद कर जलाशय को पूर्ण जलाशय स्तर
सरकार ने कहा कि पर्यावरण और पुनर्वास उपसमितियों ने प्रगति की समीक्षा की थी और संबंधित राज्य सरकारों ने शेष मुद्दों के समाधान का आश्वासन दिया था।
यह परियोजना के इतिहास का निर्णायक क्षण था।
सितंबर 2017 : सरदार सरोवर का लोकार्पण
17 सितंबर 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार सरोवर बाँध राष्ट्र को समर्पित किया।
सरकार के लिए यह दशकों पुरानी परियोजना की ऐतिहासिक पूर्णता थी।
लेकिन नर्मदा बचाओ आंदोलन के लिए संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।
बाँध का निर्माण पूरा होना पुनर्वास पूरा होने का प्रमाण नहीं है।
यहीं विकास की दो विपरीत कथाएँ सबसे स्पष्ट दिखाई देती हैं।
सूखे क्षेत्र तक पानी पहुँचाने वाली राष्ट्रीय परियोजना।
अपनी जमीन, गाँव और आजीविका खोने वाले समुदायों का अधूरा पुनर्वास।
2019 : पूर्ण जलाशय स्तर और नई डूब
2019 में सरदार सरोवर जलाशय को पूर्ण जलाशय स्तर के करीब भरने के साथ मध्य प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में डूब का प्रश्न फिर गंभीर हुआ।
आंदोलन ने आरोप लगाया कि अनेक परिवार और संपत्तियाँ अभी भी प्रभावित क्षेत्र में हैं।
सरकारी एजेंसियों ने पुनर्वास की प्रगति और पात्र परिवारों के स्थानांतरण के अपने आँकड़े प्रस्तुत किए।
इस विवाद ने नर्मदा संघर्ष की एक स्थायी समस्या उजागर की
सरकार और आंदोलन की गणना कई बार अलग रही।
कानूनी संघर्ष की दीर्घायु
नर्मदा विवाद 2000 के फैसले पर समाप्त नहीं हुआ।
पुनर्वास, पात्रता, भूमि आवंटन और मुआवजे से जुड़े मामले आगे भी सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचे।
2022 तक के न्यायिक निर्णयों में भी प्रभावित परिवारों की भूमि और पुनर्वास अधिकारों से जुड़े प्रश्न दिखाई देते हैं।
इससे पता चलता है कि बड़े बाँध का निर्माण इंजीनियरिंग की दृष्टि से पूरा हो सकता है, लेकिन उसका सामाजिक समापन दशकों तक लंबित रह सकता है।
पुनर्वास का अधिकार, जमीन और पर्यावरणीय आकलन
नर्मदा आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि : पुनर्वास को अधिकार बनाना
नर्मदा बचाओ आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि बाँध रोकना नहीं थी—क्योंकि वह अंततः बाँध को रोक नहीं पाया।
विस्थापन को विकास की अनिवार्य और अदृश्य कीमत मानने की धारणा को चुनौती देना।
आंदोलन से पहले विकास परियोजनाओं में अक्सर यह सोच प्रभावी थी
परियोजना राष्ट्रीय हित में है;
उन्हें मुआवजा दे दिया जाएगा।
नर्मदा आंदोलन ने इसे बदलकर पूछा
क्या विस्थापित व्यक्ति केवल मुआवजे का पात्र है या पुनर्वास उसका अधिकार है?
जमीन के बदले जमीन
नर्मदा संघर्ष ने भारतीय पुनर्वास विमर्श में “भूमि के बदले भूमि” को अत्यंत प्रभावशाली सिद्धांत बनाया।
विशेषकर कृषक और आदिवासी परिवार के लिए केवल नकद भुगतान पर्याप्त नहीं माना गया।
किसान के लिए भूमि केवल बाजार मूल्य वाली संपत्ति नहीं है।
पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की राजनीति
नर्मदा आंदोलन का प्रभाव भारत में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की व्यापक बहस पर पड़ा।
उसने यह स्थापित करने में योगदान दिया कि किसी परियोजना का मूल्यांकन केवल
2000 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में भी प्रतिपूरक वनीकरण, कमांड क्षेत्र विकास, वनस्पति-जीव सर्वेक्षण, पुरातात्विक-अंथ्रोपोलॉजिकल अध्ययन, भूकंपीयता, स्वास्थ्य और मत्स्य विकास जैसे अनेक पर्यावरणीय मुद्दों का उल्लेख मिलता है।
विश्व बैंक की नीतियों पर प्रभाव
नर्मदा आंदोलन का महत्व भारत से बाहर भी पहुँचा।
मोर्स समीक्षा और विश्व बैंक की वापसी ने अंतरराष्ट्रीय विकास वित्त की जवाबदेही पर व्यापक बहस पैदा की।
विश्व बैंक के अपने दस्तावेज बताते हैं कि नर्मदा अनुभव के बाद बैंक ने अनैच्छिक पुनर्वास से संबंधित अपने व्यापक पोर्टफोलियो की समीक्षा और प्रक्रियागत सुधारों पर काम किया।
इस अर्थ में नर्मदा घाटी के आदिवासी और किसान संघर्ष ने वैश्विक विकास संस्थाओं तक प्रभाव डाला।
उपलब्धियां, सीमाएं और किसान आंदोलनों में स्थान
आंदोलन की सीमाएँ
इतिहास का संतुलित मूल्यांकन आंदोलन की सीमाओं के बिना पूरा नहीं होगा।
पहली सीमा — बाँध नहीं रोक पाया
सरदार सरोवर अंततः अपनी निर्धारित पूर्ण ऊँचाई तक पहुँचा।
दूसरी सीमा — गुजरात में सीमित जनाधार
गुजरात के बड़े हिस्से में बाँध को पानी और विकास की परियोजना माना गया।
इसलिए आंदोलन वहाँ व्यापक राजनीतिक बहुमत नहीं बना पाया।
तीसरी सीमा — लाभार्थी बनाम विस्थापित
आंदोलन के सामने सबसे कठिन प्रश्न था
यदि परियोजना से सूखाग्रस्त क्षेत्रों को पानी मिलता है तो उसके विकल्प का व्यावहारिक मॉडल क्या है?
चौथी सीमा — लंबा संघर्ष और थकान
तीन दशकों से अधिक लंबे संघर्ष में संगठनात्मक ऊर्जा और स्थानीय सामाजिक परिस्थितियाँ बदलती रहीं।
पाँचवीं सीमा — पुनर्वास बनाम बाँध-विरोध
कभी-कभी आंदोलन के भीतर भी रणनीतिक प्रश्न रहा
मुख्य लक्ष्य बाँध रोकना है या सर्वोत्तम संभव पुनर्वास सुनिश्चित करना?
दोनों लक्ष्य हमेशा समान रणनीति की माँग नहीं करते थे।
क्या नर्मदा आंदोलन असफल रहा?
यदि सफलता का एकमात्र पैमाना हो
“क्या सरदार सरोवर बाँध रुक गया?”
क्या आंदोलन ने भारत में विस्थापन की राजनीति बदल दी?
क्या उसने पुनर्वास को राष्ट्रीय प्रश्न बनाया?
क्या उसने विश्व बैंक को अपनी परियोजना की स्वतंत्र समीक्षा कराने पर मजबूर किया?
क्या विश्व बैंक का वित्तपोषण समाप्त हुआ?
क्या पर्यावरणीय प्रभाव और सामाजिक लागत राष्ट्रीय विमर्श में आए?
क्या परियोजना प्रभावित लोगों के अधिकार न्यायपालिका और प्रशासन के केंद्र में आए?
यही कारण है कि किसी जनांदोलन की सफलता केवल उसकी अंतिम अधिकतम माँग से नहीं मापी जानी चाहिए।
किसान आंदोलन के इतिहास में नर्मदा का स्थान
भारतीय किसान आंदोलनों की लंबी यात्रा में नर्मदा बचाओ आंदोलन एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है।
औपनिवेशिक काल में किसान संघर्ष मुख्यतः
स्वतंत्रता के बाद संघर्ष का नया प्रश्न बना
राज्य स्वयं जब विकास के लिए भूमि लेता है तब किसान का अधिकार क्या है?
की ऐतिहासिक यात्रा का प्रतिनिधित्व करता है।
नर्मदा से सिंगूर, नंदीग्राम और भूमि अधिग्रहण तक
नर्मदा आंदोलन द्वारा उठाए गए प्रश्न आगे चलकर दूसरे आंदोलनों में दिखाई दिए
और अन्य भूमि-अधिग्रहण संघर्षों में।
क्या विकास परियोजना में प्रभावित समुदाय की सहमति आवश्यक है?
आजीविका की क्षति का मूल्य क्या है?
पुनर्वास कब पूरा माना जाएगा?
इन बहसों ने अंततः भारत की भूमि-अधिग्रहण नीति में व्यापक परिवर्तन की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार की और 2013 के नए भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन कानून तक पहुँचने वाले राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित किया।
विस्तृत समयरेखा
विस्तृत समयरेखा
1940–50 के दशक — नर्मदा घाटी के जल संसाधन विकास पर प्रारंभिक योजनाएँ।
1961 — सरदार सरोवर परियोजना की आधारशिला।
1969 — नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण गठित।
1979 — न्यायाधिकरण का अंतिम निर्णय; जल बँटवारा और पुनर्वास प्रावधान।
1980 के दशक — प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय संगठन सक्रिय।
1985 — विश्व बैंक द्वारा सरदार सरोवर परियोजना के लिए वित्तीय सहायता स्वीकृत।
1985–88 — मेधा पाटकर और अन्य कार्यकर्ताओं द्वारा घाटी में संगठन विस्तार।
1987 — परियोजना को शर्तों सहित पर्यावरणीय मंजूरी।
1988–89 — स्थानीय संगठनों का व्यापक नर्मदा बचाओ आंदोलन में समेकन।
1989 — हरसूद में विशाल जनसभा; आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर उभरा।
1990 — बाबा आमटे की सक्रिय भागीदारी; संघर्ष तेज।
दिसंबर 1990–जनवरी 1991 — संघर्ष यात्रा और अनशन।
1991–92 — विश्व बैंक पर अंतरराष्ट्रीय दबाव।
जून 1992 — मोर्स स्वतंत्र समीक्षा प्रकाशित।
1993 — भारत सरकार के अनुरोध पर विश्व बैंक की शेष ऋण सहायता समाप्त।
अगस्त 1993 — केंद्र द्वारा जयंत पाटिल की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय समूह।
1994 — नर्मदा बचाओ आंदोलन सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा।
1995 — बाँध निर्माण की प्रगति पर न्यायिक हस्तक्षेप।
1996 — प्रत्येक पाँच मीटर वृद्धि के साथ पुनर्वास और पर्यावरण समीक्षा की व्यवस्था।
1999 — बाँध निर्माण पुनः आगे बढ़ा।
18 अक्टूबर 2000 — सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक बहुमत निर्णय; परियोजना को शर्तों के साथ आगे बढ़ने की अनुमति।
2002–05 — पुनर्वास संबंधी नई न्यायिक लड़ाइयाँ।
2006 — बाँध की ऊँचाई 121.92 मीटर करने पर व्यापक विरोध और मेधा पाटकर का दिल्ली अनशन।
2000 के दशक का उत्तरार्ध — पुनर्वास में भ्रष्टाचार और फर्जी रजिस्ट्रियों का विवाद; झा आयोग।
2010 का दशक — ओंकारेश्वर, इंदिरा सागर और अन्य परियोजनाओं में जल-सत्याग्रह।
2014 — सरदार सरोवर को अंतिम ऊँचाई की दिशा में ले जाने की मंजूरी।
8 फरवरी 2017 — सर्वोच्च न्यायालय का प्रभावित परिवारों के पुनर्वास पर महत्वपूर्ण आदेश।
17 जून 2017 — नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण द्वारा द्वार बंद करने और जलाशय को 138.68 मीटर पूर्ण स्तर तक ले जाने की अनुमति।
17 सितंबर 2017 — सरदार सरोवर बाँध राष्ट्र को समर्पित।
2019 — जलाशय के पूर्ण स्तर तक भरने के साथ डूब और शेष पुनर्वास विवाद फिर तेज।
2020 के दशक — भूमि, मुआवजा, पुनर्वास, आजीविका और प्रभावित परिवारों की पात्रता से जुड़े विवाद जारी; 2022 तक सर्वोच्च न्यायालय में भी पुनर्वास संबंधी मामले आते रहे।
प्रमुख व्यक्तित्व, संस्थाएं, स्रोत और इतिहासलेखन
प्रमुख व्यक्तित्व
मेधा पाटकर
आंदोलन का सबसे प्रमुख सार्वजनिक चेहरा; घाटी में संगठन, सत्याग्रह, अनशन, न्यायिक और अंतरराष्ट्रीय अभियान में केंद्रीय भूमिका।
बाबा आमटे
आंदोलन को राष्ट्रीय नैतिक प्रतिष्ठा और व्यापक जनसमर्थन दिलाने वाले प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता।
स्थानीय आदिवासी और किसान नेतृत्व
नर्मदा आंदोलन की वास्तविक सामाजिक शक्ति। इनके बिना आंदोलन को केवल शहरी पर्यावरणवादी अभियान मानना गंभीर ऐतिहासिक भूल होगी।
ब्रैडफोर्ड मोर्स
विश्व बैंक द्वारा गठित स्वतंत्र समीक्षा दल के प्रमुख; 1992 की रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद की दिशा बदल दी।
न्यायमूर्ति एस.पी. भरूचा
2000 के सर्वोच्च न्यायालय फैसले में असहमति के कारण पर्यावरणीय न्यायशास्त्र के इतिहास में महत्वपूर्ण।
प्रमुख संस्थाएँ
नर्मदा बचाओ आंदोलन के इतिहास को समझने के लिए निम्न संस्थाएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं
नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की पुनर्वास एवं पर्यावरण उपसमितियाँ
भारत सरकार का पर्यावरण एवं वन मंत्रालय
राज्य स्तरीय शिकायत निवारण प्राधिकरण
इन संस्थाओं के बीच संबंध ने नर्मदा विवाद को भारत की सबसे जटिल विकास-प्रशासन प्रक्रियाओं में बदल दिया।
स्रोत और इतिहासलेखन : किन दस्तावेजों को आधार बनाना चाहिए
नर्मदा बचाओ आंदोलन पर शोध करते समय आंदोलन समर्थक और सरकारी—दोनों प्रकार के स्रोतों को साथ पढ़ना आवश्यक है।
सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोतों में
नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का अंतिम अवार्ड, पर्यावरणीय मंजूरी संबंधी सरकारी दस्तावेज, नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की कार्यवाहियाँ, सर्वोच्च न्यायालय के 2000, 2005, 2017 और बाद के निर्णय, विश्व बैंक के परियोजना दस्तावेज, 1992 की मोर्स स्वतंत्र समीक्षा, पुनर्वास एवं शिकायत निवारण प्राधिकरणों की रिपोर्टें, झा आयोग से संबंधित सामग्री, और नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा संकलित दस्तावेज
विश्व बैंक की आधिकारिक ऐतिहासिक सामग्री 1992 की स्वतंत्र समीक्षा और 1993 में शेष ऋण समाप्त किए जाने की पुष्टि करती है।
सर्वोच्च न्यायालय का 18 अक्टूबर 2000 का निर्णय परियोजना के इतिहास, न्यायाधिकरण, जल आवंटन, पुनर्वास, पर्यावरण और न्यायिक विवाद की विस्तृत प्राथमिक सामग्री उपलब्ध कराता है।
2017 की अंतिम ऊँचाई से संबंधित सरकारी पक्ष के लिए नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की मंजूरी पर केंद्र सरकार की आधिकारिक सूचना महत्वपूर्ण है।
आंदोलन के अपने दृष्टिकोण और दस्तावेजों के लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन का अभिलेखीय संकलन उपयोगी है, लेकिन इसे सरकारी और न्यायिक दस्तावेजों से मिलाकर पढ़ना चाहिए।
समेकित मूल्यांकन : विकास की कीमत कौन चुकाता है?
समेकित मूल्यांकन : नर्मदा ने भारत से क्या प्रश्न पूछा?
नर्मदा बचाओ आंदोलन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विरासत किसी एक बाँध के पक्ष या विपक्ष में नहीं है।
उसकी विरासत एक प्रश्न में है
“विकास की कीमत कौन चुकाता है?”
सरदार सरोवर से पानी पाने वाला किसान भी भारत का नागरिक है।
कच्छ के गाँव में पेयजल की प्रतीक्षा करने वाला परिवार भी विकास का अधिकार रखता है।
लेकिन नर्मदा घाटी में अपनी जमीन, जंगल और गाँव खोने वाला आदिवासी भी उतना ही नागरिक है।
यही नर्मदा विवाद का नैतिक केंद्र है।
इसलिए इस आंदोलन का निष्पक्ष मूल्यांकन न तो यह कहकर किया जा सकता है कि
“बड़े बाँध हमेशा विनाशकारी हैं”
“राष्ट्रीय विकास के लिए कुछ लोगों का विस्थापन अपरिहार्य कीमत है।”
नर्मदा ने इन दोनों ध्रुवों के बीच तीसरा सिद्धांत स्थापित किया
विकास तभी न्यायपूर्ण है जब उसके लाभ और उसकी कीमत दोनों न्यायपूर्ण ढंग से बाँटे जाएँ।
सरदार सरोवर बाँध बन गया। उसकी ऊँचाई 138.68 मीटर तक पहुँच गई। पानी और सिंचाई का नेटवर्क विकसित हुआ। जिस परियोजना को आंदोलन ने दशकों तक चुनौती दी, वह अंततः भौतिक रूप से पूरी हुई। इस अर्थ में नर्मदा बचाओ आंदोलन अपने अधिकतम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाया।
लेकिन इतिहास केवल बाँध की ऊँचाई से नहीं मापा जाएगा।
आंदोलन ने विस्थापित व्यक्ति को विकास की गणना में वापस रखा।
उसने आदिवासी से पूछा नहीं कि उसकी जमीन की बाजार कीमत कितनी है; उसने राज्य से पूछा
उसकी पूरी जीवन-पद्धति की कीमत कैसे तय करोगे?
उसने विश्व बैंक जैसी वैश्विक संस्था को स्वतंत्र समीक्षा के लिए बाध्य किया।
उसने भारत के सर्वोच्च न्यायालय को बार-बार पुनर्वास, पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन पर विचार करने के लिए बाध्य किया।
उसने "मुआवजा" और "पुनर्वास" के अंतर को राष्ट्रीय राजनीति को समझाया।
और उसने भारतीय किसान आंदोलन को एक नया प्रश्न दिया।
औपनिवेशिक भारत का किसान पूछता था
“मेरी फसल पर इतना लगान क्यों?”
जमींदारी के विरुद्ध किसान पूछता था
“जमीन जोतता मैं हूँ, अधिकार किसका?”
स्वतंत्र भारत के नर्मदा घाटी के किसान और आदिवासी ने पूछा
“देश के विकास के लिए मेरी जमीन ली जा रही है तो उस विकास में मेरा हिस्सा कहाँ है?”
यही प्रश्न नर्मदा को बिजोलिया, अवध, तेभागा या तेलंगाना से अलग युग का किसान आंदोलन बनाता है।
यह राज्य के विरुद्ध किसान की पुरानी कथा भर नहीं था।
यह विकासशील लोकतांत्रिक राज्य के भीतर न्यायपूर्ण विकास की शर्तों का संघर्ष था।
इसीलिए नर्मदा बचाओ आंदोलन भारतीय किसान, आदिवासी और पर्यावरण आंदोलनों के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ है—भूमि बचाने के संघर्ष से विकास में अधिकार और भागीदारी की माँग तक की ऐतिहासिक यात्रा।
नर्मदा आंदोलन बाँध को रोक नहीं सका, लेकिन उसे केवल इसी कसौटी पर असफल कहना इतिहास को अधूरा पढ़ना होगा। उसने पुनर्वास को राज्य की दया से नागरिक अधिकार बनाया, जमीन के बदले जमीन की मांग को राष्ट्रीय विमर्श में स्थापित किया, पर्यावरणीय मंजूरी और प्रभाव आकलन की जवाबदेही बढ़ाई तथा विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था को स्वतंत्र समीक्षा और परियोजना से वापसी के लिए बाध्य किया। इसकी सीमाएं भी स्पष्ट हैं—गुजरात में सीमित जनाधार, लाभार्थियों और विस्थापितों का वास्तविक द्वंद्व, लंबा संघर्ष, पुनर्वास बनाम पूर्ण बाँध-विरोध की रणनीतिक उलझन और परियोजना को अंततः न रोक पाना। इसकी स्थायी विरासत यह प्रश्न है कि विकास के लाभ और उसकी मानवीय–पर्यावरणीय कीमत न्यायपूर्ण ढंग से कैसे बाँटी जाए।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: विस्थापित परिवारों की संख्या, पुनर्वास की वास्तविक स्थिति, सिंचाई और पेयजल लाभ, पर्यावरणीय शर्तों के अनुपालन तथा डूब-क्षेत्र के आंकड़ों पर सरकारी एजेंसियों, आंदोलन, राज्य सरकारों और स्वतंत्र अध्ययनों में अंतर मिलता है। न्यायाधिकरण के निर्णय, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश, पुनर्वास अभिलेख, विश्व बैंक समीक्षा और गांव-स्तरीय साक्ष्यों का परस्पर मिलान आवश्यक है।