पंजाब किसान आंदोलन
बेटरमेंट लेवी से बीकेयू पंजाब और शंभू–खनौरी तक · 1959–2026
पंजाब का किसान आंदोलन स्वतंत्र भारत की कृषि राजनीति की सबसे लंबी प्रयोगशालाओं में एक है। 1959 में नहर-सिंचाई से बढ़ी भूमि-कीमत पर बेटरमेंट लेवी के विरोध से शुरू हुआ प्रश्न हरित क्रांति के बाद लाभकारी मूल्य, बिजली, पानी, कर्ज और सरकारी खरीद की राजनीति में बदल गया। बीकेयू पंजाब के गठन और विभाजनों, उगराहां जैसे जनसंगठन मॉडल, कृषि संकट, खेत मजदूर तथा महिलाओं की सीमित प्रतिनिधित्व-बहस से गुजरते हुए यही धारा 2020–21 के दिल्ली सीमा आंदोलन और 2024–26 के शंभू–खनौरी संघर्ष तक पहुँची।
बेटरमेंट लेवी से हरित क्रांति की नई अर्थव्यवस्था तक
1959 : बेटरमेंट लेवी आंदोलन से आरंभ
स्वतंत्रता और विभाजन के बाद पंजाब की कृषि अर्थव्यवस्था पुनर्निर्माण के दौर में थी। विस्थापन, भूमि पुनर्वितरण, सिंचाई परियोजनाओं और कृषि आधुनिकीकरण के बीच भाखड़ा–नंगल परियोजना नई पंजाब अर्थव्यवस्था की धुरी बनने लगी।
सरकार का तर्क था कि नई सिंचाई परियोजनाओं से जिन जमीनों की उत्पादकता और कीमत बढ़ी है, उनके मालिकों से उस ‘बेहतरी’ का एक अंश वसूलना उचित है। इसी अवधारणा से बेटरमेंट चार्ज/लेवी जुड़ी थी।
1959 में पंजाब सरकार ने Punjab Betterment Charges and Acreage Rates (Amendment) Ordinance के माध्यम से भाखड़ा–नंगल और अन्य नई सिंचाई योजनाओं से लाभान्वित भूमि-मालिकों से देय राशि निर्धारित की। किसानों का तर्क था कि आकलन अत्यधिक है और सिंचाई से मिलने वाले संभावित लाभ को वास्तविक कृषि आय मानकर उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला जा रहा है।
इस आंदोलन में कम्युनिस्ट नेतृत्व और किसान संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई गांवों में सामूहिक रूप से लेवी न देने का फैसला हुआ। आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच टकराव भी हुआ और गिरफ्तारियां की गईं।
इस संघर्ष की ऐतिहासिकता का महत्वपूर्ण प्रमाण स्वयं जवाहरलाल नेहरू के 25 मार्च 1959 के मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में मिलता है। नेहरू ने पंजाब में बेटरमेंट लेवी के विरुद्ध हुए आंदोलन का उल्लेख किया। नेहरू अभिलेखागार में उपलब्ध संबंधित टिप्पणी बताती है कि किसान लेवी को बहुत अधिक मानते थे, कम्युनिस्ट नेतृत्व में गांवों ने भुगतान से इनकार किया और पुलिस से टकराव हुआ। अंततः 20 मार्च 1959 को पारित संशोधित विधेयक ने लेवी की रकम घटाई और आंदोलनकारियों को मुक्त किया गया।
यह स्वतंत्र भारत के पंजाब में राज्य की विकास परियोजना और किसान के बीच एक बुनियादी विवाद था
अगर सार्वजनिक सिंचाई से जमीन की उत्पादकता बढ़ी है तो उस अतिरिक्त मूल्य पर अधिकार किसका है—राज्य का या किसान का?
यह प्रश्न आगे चलकर अलग-अलग रूपों में बार-बार लौटने वाला था।
बेटरमेंट लेवी आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व
1959 का संघर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह औपनिवेशिक किसान आंदोलन और स्वतंत्र भारत के नए किसान आंदोलनों के बीच एक पुल था।
औपनिवेशिक दौर में किसान का प्रमुख प्रतिपक्ष जमींदार, साहूकार और औपनिवेशिक राज्य था। स्वतंत्रता के बाद जमींदारी उन्मूलन और नई लोकतांत्रिक व्यवस्था के बावजूद राज्य स्वयं कृषि अर्थव्यवस्था का बड़ा नियामक बन गया।
सिंचाई चाहिए थी, बिजली चाहिए थी, ऋण चाहिए था, उर्वरक चाहिए था, न्यूनतम मूल्य चाहिए था, सरकारी खरीद चाहिए थी,
और उसी सरकार द्वारा लगाए गए कर और शुल्क का विरोध भी करना था।
यहीं से पंजाब किसान राजनीति में ‘राज्य पर निर्भरता और राज्य के विरुद्ध प्रतिरोध’ का द्वंद्व पैदा हुआ।
हरित क्रांति : किसान आंदोलन की अर्थव्यवस्था बदल गई
1960 के दशक के मध्य से पंजाब भारतीय हरित क्रांति का केंद्रीय क्षेत्र बन गया।
नई उच्च उपज वाली गेहूं और बाद में धान की किस्में, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, ट्रैक्टर, विद्युत और डीजल पंप, नहर सिंचाई, संस्थागत कृषि ऋण तथा सरकारी खरीद व्यवस्था ने कृषि उत्पादन की पूरी संरचना बदल दी।
कृषि अब अधिक पूंजी-प्रधान हुई।
किसान की आय बढ़ सकती थी, लेकिन उसकी लागत भी बाजार और राज्य से जुड़ गई।
अब किसान के आर्थिक समीकरण में केवल जमीन नहीं थी। उसमें शामिल हो गए
बीज, उर्वरक, कीटनाशक, बिजली, डीजल, मशीनरी, ऋण का ब्याज, मजदूरी और सरकारी खरीद मूल्य।
यही परिवर्तन आगे आने वाले किसान आंदोलन की मांगों का आधार बना।
हरित क्रांति का विरोधाभास और नए किसानवाद का उदय
हरित क्रांति का विरोधाभास
हरित क्रांति ने पंजाब को भारत का अन्न भंडार बनाया। केंद्रीय पूल के लिए पंजाब से गेहूं और धान की बड़े पैमाने पर खरीद होने लगी।
लेकिन इसी सफलता ने एक नई निर्भरता पैदा की।
किसान को अपनी फसल बेचने के लिए सरकारी मंडी और खरीद तंत्र चाहिए था। लाभ बनाए रखने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ना आवश्यक था। बिजली और सिंचाई महंगी होने पर उत्पादन लागत बढ़ती थी। उर्वरक और मशीनरी की कीमत बढ़ने से लाभ घटता था।
इस प्रकार किसान आंदोलन धीरे-धीरे भूमि और काश्तकारी अधिकारों से ‘कृषि की विनिमय शर्तों’ की ओर बढ़ा।
मेरी उपज का मूल्य कौन तय करेगा और जिन वस्तुओं से मैं उत्पादन करता हूं उनकी कीमत कौन तय करता है?
वामपंथी किसान राजनीति से नए किसानवाद की ओर
स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में पंजाब के अनेक किसान संघर्ष कम्युनिस्ट और वामपंथी संगठनों के प्रभाव में थे। पंजाब में अखिल भारतीय किसान सभा की इकाई 1943 में ही स्थापित हो चुकी थी।
लेकिन हरित क्रांति ने ग्रामीण वर्ग संरचना बदल दी।
अब एक ऐसा किसान वर्ग मजबूत हुआ जो भूमि का मालिक था, बाजार के लिए उत्पादन करता था, मशीनरी और आधुनिक कृषि तकनीक इस्तेमाल करता था और राज्य से बेहतर कृषि मूल्य चाहता था।
1970 के दशक में इसी सामाजिक परिवर्तन से किसान संगठन की एक नई धारा उभरी।
यह वर्ग-संघर्ष की पारंपरिक कम्युनिस्ट भाषा से अलग थी।
कृषि बनाम उद्योग, उत्पादक किसान बनाम शहरी अर्थव्यवस्था और लाभकारी कृषि मूल्य।
1972 : पंजाब खेतीबाड़ी जमींदारा यूनियन
1972 में पंजाब खेतीबाड़ी जमींदारा यूनियन—पीकेजेडयू का गठन इस परिवर्तन का संस्थागत पड़ाव था। यही संगठन आगे चलकर पंजाब में भारतीय किसान यूनियन की पूर्ववर्ती संरचना बना।
इसके साथ किसान राजनीति के केंद्र में ऐसे किसान नेता आए जो आवश्यक रूप से कम्युनिस्ट राजनीतिक पृष्ठभूमि से नहीं थे।
इतिहासकारों ने इसे पंजाब किसान आंदोलन के चरित्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन माना है—1970 के दशक के मध्य तक जिन संघर्षों में कम्युनिस्ट नेतृत्व मजबूत था, वहां बाद में नए किसान संगठनों का प्रभाव बढ़ा।
लाभकारी मूल्य, बीकेयू का जन्म और आरंभिक मोर्चे
1970 के दशक का मूल्य प्रश्न
हरित क्रांति के बाद किसान आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक प्रश्न बन गया
लाभकारी मूल्य।
किसानों का तर्क था कि केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। यदि उर्वरक, डीजल, बिजली, मशीनरी और मजदूरी की लागत तेजी से बढ़ रही है तो कृषि उपज का मूल्य भी उसी अनुपात में बढ़ना चाहिए।
यहां से पंजाब की किसान राजनीति उस व्यापक भारतीय ‘नए किसान आंदोलन’ से जुड़ती है जिसे आगे महाराष्ट्र में शरद जोशी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत और कर्नाटक में एम. डी. नंजुंडास्वामी जैसे नेताओं ने अलग-अलग रूप दिए।
1980 : बीकेयू पंजाब का जन्म
1980 में पंजाब खेतीबाड़ी जमींदारा यूनियन को पंजाब की भारतीय किसान यूनियन—बीकेयू में परिवर्तित किया गया।
यह संगठनात्मक परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण था।
अब पंजाब का किसान आंदोलन एक ऐसे राष्ट्रीय किसान मंच का हिस्सा था जिसकी पहचान पार्टी राजनीति से औपचारिक दूरी और कृषि आर्थिक मुद्दों पर दबाव बनाने की थी।
बीकेयू की राजनीति में प्रमुख प्रश्न थे
कृषि उपज के लाभकारी मूल्य, बिजली दरें, सिंचाई, ऋण, कृषि आदानों की कीमत और सरकारी कृषि नीतियां।
1983 : बिजली बिल न देने का आंदोलन
बीकेयू के प्रारंभिक बड़े आंदोलनों में 20 जनवरी 1983 से बिजली बिल भुगतान न करने का आंदोलन उल्लेखनीय था। किसान आंदोलन पर उपलब्ध शोध इसे बीकेयू के शुरुआती बड़े संघर्षों में गिनता है।
1959 में किसान बेटरमेंट लेवी देने से इनकार कर रहा था।
1983 में वही राजनीतिक तकनीक बिजली बिल के प्रश्न पर दिखाई दी
इसमें किसान संगठन की वास्तविक शक्ति गांवों की सामूहिकता थी। यदि एक किसान बिल न चुकाए तो प्रशासन कार्रवाई कर सकता था; यदि हजारों किसान सामूहिक रूप से इनकार करें तो प्रश्न राजनीतिक बन जाता था।
1984 का चंडीगढ़ मोर्चा
1980 के दशक के किसान इतिहास में चंडीगढ़ मोर्चा एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना। यह उस नई किसान राजनीति का प्रदर्शन था जिसमें सरकार के प्रशासनिक केंद्र को घेरकर आर्थिक मांगें मनवाने का दबाव बनाया गया।
लेकिन इसी दशक में पंजाब आतंकवाद, धार्मिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण और असाधारण सुरक्षा संकट में चला गया।
इसका किसान संगठनों पर सीधा प्रभाव पड़ा।
सार्वजनिक सभाओं, रैलियों और बड़े जमावड़ों पर प्रतिबंध तथा असुरक्षा के कारण बीकेयू के लिए बड़े आंदोलन आयोजित करना कठिन हुआ। इसके बावजूद संगठन स्थानीय स्तर पर किसान समस्याओं पर सक्रिय रहा।
पंजाब संकट, बीकेयू विभाजन और राजनीति का प्रश्न
पंजाब संकट और किसान आंदोलन
1980 के दशक की पंजाब राजनीति को किसान आंदोलन से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता, लेकिन दोनों को एक मान लेना भी ऐतिहासिक भूल होगी।
किसान संगठनों का केंद्रीय एजेंडा आर्थिक था।
दूसरी ओर पंजाब का राजनीतिक-सुरक्षा संकट धार्मिक पहचान, संघीय संबंधों, अकाली राजनीति, उग्रवाद और राज्य की सुरक्षा प्रतिक्रिया से संचालित हो रहा था।
इन दोनों धाराओं के बीच सामाजिक आधार के कुछ हिस्से अवश्य मिलते थे, लेकिन उनके लक्ष्य समान नहीं थे।
यह अंतर पंजाब किसान आंदोलन के निष्पक्ष इतिहासलेखन के लिए आवश्यक है।
अप्रैल 1989 : बीकेयू का बड़ा विभाजन
अप्रैल 1989 में पंजाब बीकेयू दो प्रमुख धाराओं में टूट गया।
एक धड़े का नेतृत्व अजमेर सिंह लखोवाल कर रहे थे।
दूसरे में बलबीर सिंह राजेवाल और भूपिंदर सिंह मान प्रमुख थे।
यह विभाजन केवल व्यक्तियों का संघर्ष नहीं था। इसके पीछे नेतृत्व, राजनीतिक संबंध और आंदोलन की रणनीति से जुड़े मतभेद थे।
आगे चलकर यही विभाजन पंजाब में अनेक बीकेयू गुटों के निर्माण की शुरुआत बना।
किसान यूनियनों और राजनीति का जटिल संबंध
बीकेयू की घोषित पहचान गैर-दलीय किसान संगठन की रही, लेकिन व्यवहार में किसान नेताओं और राजनीतिक दलों के संबंध हमेशा जटिल रहे।
भूपिंदर सिंह मान 1990 में राज्यसभा पहुंचे। दूसरी ओर अजमेर सिंह लखोवाल का अकाली राजनीति से निकट संबंध बना और बाद में वे शिरोमणि अकाली दल–भाजपा शासन के दौरान पंजाब मंडी बोर्ड के अध्यक्ष भी रहे।
इससे किसान आंदोलन के भीतर पुराना प्रश्न बार-बार उठा
क्या किसान संगठन राजनीतिक दलों से पूर्णतः स्वतंत्र रह सकते हैं?
यही विवाद 2022 में एक नए रूप में फिर सामने आया।
बीकेयू एकता और आगे का विखंडन
1990 के दशक में पंजाब किसान राजनीति में नए संगठन उभरे।
बीकेयू की विभिन्न धाराओं से आगे चलकर
बीकेयू एकता उगराहां, बीकेयू एकता डकौंदा, बीकेयू एकता सिद्धूपुर, बीकेयू लखोवाल, बीकेयू राजेवाल
इनके अतिरिक्त किसान मजदूर संघर्ष कमेटी और अनेक वैचारिक तथा क्षेत्रीय किसान संगठन सक्रिय हुए।
इस विखंडन को केवल कमजोरी नहीं समझना चाहिए।
इसने पंजाब में किसान राजनीति को अत्यंत बहुकेंद्रीय बना दिया।
कोई एक नेता पूरे पंजाब किसान समाज की ओर से बोलने की स्थिति में नहीं रहा।
उगराहां मॉडल, उदारीकरण और गेहूं–धान संकट
बीकेयू उगराहां : जनसंगठन का अलग मॉडल
पंजाब की किसान राजनीति में बीकेयू एकता उगराहां विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनी।
इसका मजबूत आधार मालवा क्षेत्र में विकसित हुआ। संगठन ने गांव स्तर की सदस्यता, अनुशासित लामबंदी और बड़ी संख्या में किसानों को लंबे धरनों में बनाए रखने की क्षमता विकसित की।
इसकी राजनीति केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य तक सीमित नहीं रही। ऋण, आत्महत्या पीड़ित परिवार, भूमि, कृषि मजदूर और महिलाओं की भागीदारी जैसे मुद्दे भी इसके आंदोलनों में दिखाई दिए।
2020–21 में इसकी विशाल लामबंदी क्षमता राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट हुई।
उदारीकरण के बाद नया संकट
1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद पंजाब किसान आंदोलन का संदर्भ बदल गया।
अब भारतीय कृषि का प्रश्न केवल घरेलू मूल्य नीति तक सीमित नहीं था।
विश्व व्यापार संगठन, कृषि आयात, शुल्क, सब्सिडी, अंतरराष्ट्रीय कृषि व्यापार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भूमिका किसान विमर्श का हिस्सा बने।
यहीं किसान संगठनों में एक महत्वपूर्ण वैचारिक अंतर भी उभरा।
क्या भारतीय किसान को मुक्त वैश्विक बाजार से लाभ होगा?
या सस्ते आयात और असमान वैश्विक सब्सिडी व्यवस्था भारतीय कृषि को कमजोर करेगी?
पंजाब के विभिन्न किसान संगठनों ने इसका अलग-अलग उत्तर दिया।
गेहूं–धान मॉडल : सफलता से संकट तक
हरित क्रांति का सबसे सफल मॉडल धीरे-धीरे पंजाब की सबसे बड़ी संरचनात्मक चुनौती बनने लगा।
सरकारी खरीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य ने गेहूं और धान को अपेक्षाकृत सुरक्षित फसल बनाया।
फसल विविधता में कमी, धान का असाधारण विस्तार, भूजल का तीव्र दोहन, रासायनिक आदानों पर निर्भरता और उत्पादन लागत में वृद्धि।
किसान के लिए समस्या यह थी कि सरकार फसल विविधीकरण चाहती थी, लेकिन वैकल्पिक फसलों के लिए गेहूं–धान जैसी सुनिश्चित खरीद व्यवस्था नहीं देती थी।
इसलिए पर्यावरणीय दृष्टि से अवांछनीय फसल चक्र आर्थिक दृष्टि से किसान के लिए तर्कसंगत बना रहा।
बिजली और भूजल का राजनीतिक अर्थशास्त्र
पंजाब किसान आंदोलन में मुफ्त अथवा रियायती कृषि बिजली केवल ‘लोकलुभावन सुविधा’ का प्रश्न नहीं है।
यह कृषि उत्पादन लागत का प्रश्न है।
लेकिन इसके दूसरे पक्ष में भूजल संकट है।
मुफ्त बिजली से सिंचाई लागत घटती है, किंतु भूजल पंपिंग की सीमांत लागत लगभग समाप्त हो जाने से अत्यधिक दोहन को प्रोत्साहन भी मिलता है।
इस प्रकार किसान हित और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण के बीच एक कठिन नीति-द्वंद्व पैदा हुआ।
कर्ज, आत्महत्याएं, खेत मजदूर और कपास संकट
कृषि ऋण और आत्महत्याएं
1990 के दशक के बाद पंजाब के किसान आंदोलन में कर्ज का प्रश्न अधिक केंद्रीय होता गया।
हरित क्रांति की पूंजी-प्रधान खेती में मशीनरी, बीज, उर्वरक, कीटनाशक और अन्य आदानों के लिए ऋण की आवश्यकता बढ़ी।
छोटे और सीमांत किसान विशेष रूप से जोखिम में थे।
फसल खराब होने, मूल्य गिरने अथवा पारिवारिक खर्च बढ़ने पर ऋण चक्र गहरा सकता था।
पंजाब में किसान और कृषि मजदूर आत्महत्याओं ने आंदोलन की भाषा बदल दी।
अब मांग केवल लाभकारी मूल्य नहीं थी।
भूमि और खेत मजदूर : किसान आंदोलन की आंतरिक सीमा
पंजाब के किसान आंदोलन का मूल्यांकन केवल भूमि-मालिक किसान के दृष्टिकोण से नहीं किया जा सकता।
राज्य में बड़ी दलित आबादी और भूमिहीन कृषि मजदूर हैं।
भूमि-मालिक किसान के लिए कम मजदूरी उत्पादन लागत कम करती है; कृषि मजदूर के लिए ऊंची मजदूरी जीवन का प्रश्न है।
इसी प्रकार पंचायत की शामलात जमीन के वितरण में दलित परिवारों और प्रभावशाली ग्रामीण समूहों के बीच संघर्ष सामने आए।
इसलिए ‘किसान एक वर्ग है’ मानना पंजाब के ग्रामीण समाज को अत्यधिक सरल बनाना होगा।
2015 : सफेद मक्खी और कपास संकट
2015 में पंजाब के मालवा क्षेत्र में कपास पर सफेद मक्खी के प्रकोप ने बड़े कृषि संकट को जन्म दिया।
अगस्त 2015 में अबोहर सहित विभिन्न क्षेत्रों में किसानों ने बर्बाद कपास लेकर प्रदर्शन किया।
सितंबर तक आठ किसान संगठनों ने बठिंडा में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया। उनकी प्रमुख मांग कपास उत्पादकों के लिए 40,000 रुपये प्रति एकड़ मुआवजा थी।
अक्टूबर के आरंभ तक बठिंडा का धरना सोलहवें दिन में पहुंच चुका था और पंजाब में 18 अन्य स्थानों पर धरने शुरू हो गए थे। किसान संगठनों ने कपास के साथ बासमती मूल्य और खेत मजदूरों के नुकसान का प्रश्न भी उठाया।
यह 2020 से पहले पंजाब में किसान यूनियनों की बड़ी संयुक्त लामबंदियों में महत्वपूर्ण पड़ाव था।
अनेक यूनियनें, लेकिन साझा संकट
2010 के दशक तक पंजाब में किसान संगठनों की संख्या बहुत बढ़ चुकी थी।
बीकेयू के अलग-अलग गुट, वामपंथी किसान संगठन, क्षेत्रीय संगठन और किसान-मजदूर मंच अलग-अलग काम कर रहे थे।
संगठनात्मक विखंडन के बावजूद उनके सामने कुछ साझा समस्याएं थीं
कर्ज, कृषि आय, एमएसपी, सरकारी खरीद, फसल क्षति, बिजली, कृषि आदानों की कीमत और कॉरपोरेट कृषि का भय।
यही साझा संकट 2020 में असाधारण एकता का आधार बना।
तीन कृषि अध्यादेशों से संयुक्त किसान मोर्चे तक
जून 2020 : तीन कृषि अध्यादेश
2020 में केंद्र सरकार ने कृषि विपणन और अनुबंध खेती से जुड़े तीन अध्यादेश जारी किए, जिन्हें सितंबर में संसद ने कानूनों में बदल दिया।
पंजाब में इसका तत्काल विरोध हुआ।
किसानों को सबसे बड़ा भय था कि नई व्यवस्था धीरे-धीरे मंडी–एपीएमसी और न्यूनतम समर्थन मूल्य आधारित सरकारी खरीद तंत्र को कमजोर कर सकती है।
सरकार का तर्क इसके विपरीत था—किसान को मंडी से बाहर बेचने की स्वतंत्रता और अधिक खरीदार मिलेंगे।
यहीं संघर्ष की मूल वैचारिक रेखा थी।
सरकार इसे बाजार विकल्प का विस्तार कह रही थी।
किसान संगठन इसे राज्य की खरीद जिम्मेदारी से संभावित वापसी के रूप में देख रहे थे।
पंजाब आंदोलन की प्रयोगशाला बना
2020 के मध्य से पंजाब में रेल रोको, टोल प्लाजा धरने, बड़े कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों के सामने प्रदर्शन और व्यापक ग्रामीण लामबंदी शुरू हुई।
यहां दशकों से मौजूद किसान यूनियन नेटवर्क निर्णायक साबित हुआ।
गांव स्तर की समितियां, गुरुद्वारे, सामुदायिक लंगर, ट्रैक्टर और ग्रामीण सामाजिक नेटवर्क ने आंदोलन को लंबी अवधि तक टिकने योग्य बनाया।
महिलाओं और युवाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय थी।
पंजाब में शुरू हुआ संघर्ष शीघ्र ही हरियाणा और अन्य राज्यों तक फैलने लगा।
नवंबर 2020 : ‘दिल्ली चलो’
26 नवंबर 2020 के आसपास पंजाब और हरियाणा से किसानों के विशाल जत्थों ने दिल्ली की ओर बढ़ना शुरू किया।
हरियाणा में पुलिस अवरोध, बैरिकेड, खाइयां और पानी की बौछारें आंदोलन को रोक नहीं सकीं।
किसान दिल्ली की सीमाओं तक पहुंचे।
सिंघु, टिकरी और गाजीपुर जैसे स्थल अस्थायी किसान नगरों में बदल गए।
पंजाब का आंदोलन अब राष्ट्रीय आंदोलन था।
संयुक्त किसान मोर्चा
अनेक किसान संगठनों को एक साझा मंच पर समन्वित करने के लिए संयुक्त किसान मोर्चा—एसकेएम निर्णायक संरचना बना।
इसकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि उसने संगठनात्मक विविधता को समाप्त किए बिना साझा संघर्ष संभव बनाया।
किसी एक संगठन ने दूसरे में विलय नहीं किया।
किसी एक सर्वोच्च नेता का निर्माण नहीं हुआ।
निर्णय सामूहिक वार्ता से किए गए।
यह भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में संघीय आंदोलन संरचना का उल्लेखनीय उदाहरण था।
मांगें, 26 जनवरी का संकट और कृषि कानूनों की वापसी
आंदोलन की प्रमुख मांगें
2020–21 में केंद्रीय मांग थी
तीनों कृषि कानून वापस लिए जाएं।
इसके साथ एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाने, बिजली संबंधी प्रस्तावित कानून, पराली मामलों और अन्य किसान प्रश्नों को भी उठाया गया।
सरकार और किसान संगठनों के बीच अनेक दौर की वार्ता हुई।
सरकार संशोधन के लिए तैयार थी।
किसान संगठन कानूनों की पूर्ण वापसी पर अड़े रहे।
26 जनवरी 2021 और आंदोलन का संकट
गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में ट्रैक्टर परेड के दौरान निर्धारित मार्ग से विचलन और लाल किला सहित कुछ स्थानों पर हुई घटनाओं ने आंदोलन को गंभीर संकट में डाल दिया।
किसान नेतृत्व ने हिंसा और निर्धारित कार्यक्रम से विचलन से दूरी बनाई।
कुछ समय के लिए लगा कि आंदोलन कमजोर पड़ सकता है।
लेकिन गाजीपुर सीमा पर राकेश टिकैत की भावनात्मक अपील और उत्तर भारत से किसानों की नई लामबंदी ने आंदोलन को फिर ऊर्जा दी।
इस चरण ने एक महत्वपूर्ण तथ्य दिखाया
पंजाब आंदोलन का प्रारंभिक केंद्र था, लेकिन अब आंदोलन केवल पंजाब का नहीं रहा था।
एक वर्ष लंबा सीमा आंदोलन
2021 के अधिकांश समय किसान दिल्ली सीमाओं पर टिके रहे।
गर्मी, सर्दी, बारिश और महामारी के बीच स्थायी शिविर बनाए रखना स्वयं आंदोलन की बड़ी संगठनात्मक उपलब्धि थी।
लंगर, पुस्तकालय, चिकित्सा शिविर, मंच और सामुदायिक सेवाओं ने इसे केवल धरना नहीं रहने दिया।
पंजाब की किसान यूनियनों की दशकों पुरानी संगठनात्मक संस्कृति यहां निर्णायक साबित हुई।
19 नवंबर 2021 : कानून वापसी की घोषणा
19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की।
इसके बाद संसद ने Farm Laws Repeal Act, 2021 पारित किया।
किसान आंदोलन के इतिहास में यह असाधारण उपलब्धि थी।
एक वर्ष के लंबे आंदोलन ने संसद से पारित तीन केंद्रीय कानूनों को वापस करवाया।
लेकिन आंदोलन समाप्त होते समय एक महत्वपूर्ण प्रश्न अधूरा रहा
एमएसपी की कानूनी गारंटी।
यही 2024 के आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बना।
आंदोलन की जीत, चुनावी प्रयोग और नई दरार
आंदोलन की जीत और एकता की परीक्षा
कानून वापसी के बाद संयुक्त मोर्चे के सामने कठिन प्रश्न था
आंदोलन के दौरान साझा शत्रु स्पष्ट था।
कानून हटने के बाद संगठनों के पुराने वैचारिक और राजनीतिक मतभेद फिर सामने आए।
विशेष रूप से चुनावी राजनीति में भागीदारी ने बड़ा विवाद पैदा किया।
2022 : संयुक्त समाज मोर्चा
पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले कुछ किसान नेताओं और संगठनों ने संयुक्त समाज मोर्चा बनाकर चुनावी राजनीति में उतरने का प्रयास किया।
बलबीर सिंह राजेवाल इसका प्रमुख चेहरा बने।
लेकिन चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
यह किसान आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण प्रयोग था।
इससे फिर वही पुराना प्रश्न सामने आया
आंदोलन को सत्ता से बाहर रहकर दबाव समूह होना चाहिए या स्वयं सत्ता हासिल करने का प्रयास करना चाहिए?
2022 का अनुभव दूसरे विकल्प की कठिनाई दिखाता है।
एसकेएम, एसकेएम (गैर-राजनीतिक) और नई दरार
2020–21 की विशाल एकता बाद के वर्षों में बरकरार नहीं रह सकी।
एक ओर मूल संयुक्त किसान मोर्चा रहा।
दूसरी ओर संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) की धारा विकसित हुई।
किसान मजदूर मोर्चा भी एक महत्वपूर्ण मंच बना।
जगजीत सिंह डल्लेवाल और सरवन सिंह पंधेर 2024 के आंदोलन में दो प्रमुख चेहरे बनकर सामने आए।
इस संगठनात्मक अंतर को समझे बिना 2024–26 के संघर्ष को 2020–21 का सीधा दूसरा भाग मानना गलत होगा।
दिल्ली चलो 2.0, पांच फसलों का प्रस्ताव और शुभकरण सिंह
13 फरवरी 2024 : ‘दिल्ली चलो 2.0’
13 फरवरी 2024 से एसकेएम (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा से जुड़े किसानों ने दिल्ली की ओर मार्च करने का प्रयास किया।
हरियाणा प्रशासन ने पंजाब–हरियाणा सीमाओं पर व्यापक अवरोध लगाए।
शंभू और खनौरी दो मुख्य मोर्चे बने।
सभी फसलों के लिए एमएसपी की कानूनी गारंटी, कर्जमाफी, स्वामीनाथन आयोग के मूल्य सूत्र से जुड़ी मांग, किसानों और मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा तथा 2020–21 आंदोलन से जुड़े लंबित प्रश्न।
केंद्र सरकार का पांच फसलों वाला प्रस्ताव
फरवरी 2024 में केंद्र और किसान प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई।
एक चरण में सरकार की ओर से सहकारी संस्थाओं के माध्यम से कुछ फसलों—विशेषकर दालों, मक्का और कपास—की खरीद से जुड़ा बहुवर्षीय प्रस्ताव सामने आया।
आंदोलनकारी संगठनों ने इसे व्यापक एमएसपी कानूनी गारंटी का विकल्प मानने से इनकार कर दिया।
यहां विवाद फिर उसी मूल प्रश्न पर लौट आया
क्या सरकार चुनिंदा फसलों के लिए खरीद आश्वासन देगी या सभी अधिसूचित फसलों के लिए वैधानिक मूल्य सुरक्षा?
21 फरवरी 2024 : शुभकरण सिंह की मृत्यु
21 फरवरी को खनौरी सीमा पर टकराव के दौरान युवा किसान शुभकरण सिंह की मृत्यु ने आंदोलन को गहरा भावनात्मक और राजनीतिक मोड़ दिया।
घटना ने पंजाब और हरियाणा के बीच पुलिस अधिकार क्षेत्र, बल प्रयोग और जवाबदेही को लेकर गंभीर विवाद पैदा किया।
आंदोलन में शुभकरण सिंह किसान प्रतिरोध के प्रतीक बन गए।
शंभू–खनौरी, डल्लेवाल अनशन और राज्य से टकराव
शंभू और खनौरी : सीमा स्वयं राजनीतिक स्थल बनी
2024 आंदोलन की एक विशिष्टता यह थी कि किसान दिल्ली पहुंच ही नहीं सके।
इसलिए पंजाब–हरियाणा सीमा स्वयं आंदोलन स्थल बन गई।
पंजाब → हरियाणा → दिल्ली सीमा।
इस अंतर का बड़ा राजनीतिक अर्थ था।
आंदोलन का राष्ट्रीय दृश्य प्रभाव 2020 जितना व्यापक नहीं हुआ, लेकिन शंभू और खनौरी ने एमएसपी की कानूनी गारंटी को राष्ट्रीय बहस में बनाए रखा।
जगजीत सिंह डल्लेवाल का अनशन
2024 के उत्तरार्ध में बीकेयू एकता सिद्धूपुर से जुड़े और एसकेएम (गैर-राजनीतिक) के प्रमुख नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने एमएसपी की कानूनी गारंटी सहित किसान मांगों को लेकर लंबा अनशन शुरू किया।
इसने खनौरी को आंदोलन का प्रतीकात्मक केंद्र बना दिया।
डल्लेवाल की बिगड़ती स्थिति ने सरकार, न्यायपालिका और किसान संगठनों के सामने कठिन प्रश्न खड़े किए।
आंदोलन अब केवल सड़क अवरोध नहीं था; वह जीवन और मृत्यु से जुड़े नैतिक दबाव का रूप ले रहा था।
2025 : वार्ता और पंजाब सरकार का टकराव
2025 में केंद्र और आंदोलनकारी किसान संगठनों के बीच वार्ताओं का क्रम फिर चला।
19 मार्च 2025 को केंद्र के प्रतिनिधियों और किसान संगठनों की बातचीत हुई। यह फरवरी 2024 से चल रही प्रक्रिया का सातवां दौर बताया गया। बातचीत निर्णायक परिणाम तक नहीं पहुंची।
लेकिन उसी दिन एक अप्रत्याशित मोड़ आया।
पंजाब पुलिस ने शंभू और खनौरी आंदोलन स्थलों को खाली कराने की कार्रवाई शुरू कर दी। जगजीत सिंह डल्लेवाल और किसान मजदूर मोर्चा के सरवन सिंह पंधेर सहित नेताओं को हिरासत में लिया गया।
लगभग 399 दिनों से चले आ रहे दोनों सीमा शिविरों को हटाया गया।
पंजाब सरकार बनाम किसान संगठन
यह घटना पंजाब किसान आंदोलन के इतिहास में दिलचस्प राजनीतिक उलटफेर थी।
2020–21 में पंजाब की मुख्यधारा राजनीति किसान आंदोलन के प्रति व्यापक रूप से सहानुभूतिपूर्ण थी।
लेकिन 2025 तक स्थिति बदल गई।
राज्य सरकार के सामने व्यापार, यातायात, सड़क अवरोध और प्रशासनिक व्यवस्था के प्रश्न थे।
दूसरी ओर किसान संगठनों ने इसे आंदोलन के दमन के रूप में देखा।
एसकेएम और बीकेयू उगराहां ने कार्रवाई की आलोचना की और पंजाब सरकार की वार्ता पेशकश को तत्काल स्वीकार नहीं किया।
इसने स्पष्ट कर दिया कि किसान आंदोलन का संघर्ष केवल केंद्र सरकार के साथ नहीं रह सकता।
जब आंदोलन राज्य की आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित करता है, तो राज्य सरकार भी किसान–राज्य संघर्ष का पक्ष बन जाती है।
2026 : खनौरी फिर आंदोलन का केंद्र
मार्च 2025 की कार्रवाई ने किसान आंदोलन समाप्त नहीं किया।
2026 में खनौरी फिर आंदोलन गतिविधियों का केंद्र बना।
अगस्त 2026 में एसकेएम (गैर-राजनीतिक) से जुड़े किसानों ने ‘किसान बचाओ पदयात्रा’ की योजना बनाई।
51 किसानों के समूह को हरियाणा में प्रवेश से रोक दिया गया और अंतरराज्यीय मार्ग सील किया गया। प्रस्तावित पदयात्रा खनौरी–दाता सिंहवाला सीमा पर रुक गई।
इसके बाद किसानों ने जिला स्तर पर विरोध कार्यक्रम घोषित किए।
19 अगस्त 2026 को डल्लेवाल ने खनौरी में प्रतीकात्मक प्रदर्शन की घोषणा की।
इससे स्पष्ट है कि अगस्त 2026 तक एमएसपी-केंद्रित पंजाब किसान संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था।
1959–2026 की निरंतरता, बदलती मांगें और संघर्ष-पद्धति
1959 और 2026 : आश्चर्यजनक निरंतरता
67 वर्षों के अंतराल पर दोनों स्थितियों को रखिए।
1959: सरकार कहती है कि सिंचाई से किसान को लाभ मिला है, इसलिए बेटरमेंट लेवी उचित है।
किसान कहता है—राज्य मेरे कृषि लाभ का अनुचित आकलन कर रहा है।
2026: किसान कहता है कि मेरी उत्पादन लागत और जोखिम को ध्यान में रखते हुए राज्य को मेरी उपज का न्यूनतम लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना चाहिए।
अर्थात विवाद की भाषा बदल गई, लेकिन मूल प्रश्न लगभग वही रहा
कृषि उत्पादन से पैदा होने वाले आर्थिक लाभ और जोखिम का बंटवारा किसान, बाजार और राज्य के बीच कैसे होगा?
आंदोलन की मांगों का ऐतिहासिक रूपांतरण
पंजाब किसान आंदोलन को एक सूत्र में इस प्रकार देखा जा सकता है
1950–60 का दशक — कर और सिंचाई।
1960–70 — हरित क्रांति और कृषि मूल्य।
1970–80 — लाभकारी मूल्य और किसान संगठन।
1980–90 — बिजली, पानी, मूल्य और ऋण।
1990–2000 — उदारीकरण, वैश्वीकरण और कृषि व्यापार।
2000–10 — कर्ज, आत्महत्या, लागत और संसाधन संकट।
2010–20 — फसल संकट, मुआवजा, एमएसपी और कॉरपोरेट कृषि।
2020–21 — कृषि कानून और मंडी–खरीद व्यवस्था।
2022–26 — एमएसपी की कानूनी गारंटी, कर्ज और कृषि व्यापार की भविष्य दिशा।
संघर्ष-पद्धति : भुगतान-अस्वीकार से सीमा-शिविर तक
पंजाब के किसान आंदोलन की संघर्ष तकनीकें भी उल्लेखनीय हैं।
1980 के दशक में बिजली बिल न देना।
प्रशासनिक केंद्रों का घेराव।
कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों के सामने धरना।
दिल्ली सीमाओं पर स्थायी शिविर।
राज्य और अर्थव्यवस्था के सामान्य संचालन पर अहिंसक सामूहिक दबाव।
हालांकि विभिन्न चरणों में हिंसक टकराव और कानून-व्यवस्था संबंधी घटनाएं भी हुईं, मुख्य किसान संगठनों ने अपने आंदोलनों को व्यापक रूप से सामूहिक धरना, बहिष्कार और असहयोग की रणनीति पर खड़ा किया।
महिलाएं, युवा, उपलब्धियां और आंदोलन की सामाजिक सीमाएं
महिलाओं की भूमिका
पंजाब किसान आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालीन सामाजिक उपलब्धियों में ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी है।
विशेषकर बीकेयू उगराहां जैसे संगठनों ने महिला इकाइयों और ग्रामीण लामबंदी को बढ़ाया।
2020–21 में महिलाओं की उपस्थिति असाधारण रूप से दिखाई दी।
उन्होंने केवल लंगर या पारंपरिक सहयोगी भूमिकाएं नहीं निभाईं; मंचों, भाषणों, जुलूसों और संगठनात्मक गतिविधियों में भाग लिया।
इससे पंजाब किसान आंदोलन की पारंपरिक पुरुष-केंद्रित छवि में परिवर्तन आया।
युवा और प्रवासी पंजाबी समाज
2020–21 के आंदोलन में पंजाब के युवाओं और विदेशों में बसे पंजाबी समुदाय की भूमिका भी उल्लेखनीय रही।
सोशल मीडिया ने आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय दृश्यता दी।
लेकिन इसके साथ सूचना, दुष्प्रचार और राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई भी तेज हुई।
किसान आंदोलन अब केवल गांव की पंचायत और मंडी में नहीं लड़ा जा रहा था।
उसका एक मोर्चा डिजिटल दुनिया में भी था।
किसान आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धियां
पहली उपलब्धि है संगठनात्मक निरंतरता।
1959 से 2026 तक किसान प्रश्न पंजाब की सार्वजनिक राजनीति के केंद्र से कभी पूरी तरह गायब नहीं हुआ।
दूसरी उपलब्धि है राज्य को वार्ता के लिए बाध्य करने की क्षमता।
तीसरी उपलब्धि है कृषि मूल्य और सरकारी खरीद को राजनीतिक अधिकार के प्रश्न में बदलना।
चौथी उपलब्धि है 2021 में तीन केंद्रीय कृषि कानूनों की वापसी।
पांचवीं उपलब्धि है एमएसपी को तकनीकी मूल्य नीति से निकालकर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस में लाना।
छठी उपलब्धि ग्रामीण महिलाओं और युवाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी है।
लेकिन सीमाएं भी गंभीर हैं
पंजाब किसान आंदोलन की पहली सीमा उसका संगठनात्मक विखंडन है।
अनेक बीकेयू और अन्य किसान संगठन कभी ताकत तो कभी कमजोरी बनते हैं।
दूसरी सीमा नेतृत्व के राजनीतिक दलों से संबंध का प्रश्न है।
तीसरी सीमा भूमि-मालिक किसान और खेत मजदूर के हितों में अंतर है।
चौथी सीमा है कि आंदोलन गेहूं–धान खरीद व्यवस्था की रक्षा तो करता है, लेकिन पंजाब के पर्यावरणीय संकट का सर्वमान्य वैकल्पिक कृषि मॉडल अभी विकसित नहीं कर पाया।
पांचवीं सीमा यह है कि कृषि संकट का समाधान केवल अधिक एमएसपी में नहीं है।
भूमि जोत का सिकुड़ना, ग्रामीण रोजगार, भूजल, कृषि तकनीक, विपणन, प्रसंस्करण और गैर-कृषि रोजगार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
क्या पंजाब किसान आंदोलन ‘समृद्ध किसानों’ का आंदोलन है?
यह इतिहासलेखन का विवादास्पद प्रश्न रहा है।
हरित क्रांति के बाद उभरी बीकेयू राजनीति में मध्यम और बड़े भूमि-मालिक किसानों की प्रभावशाली भूमिका रही। शोध साहित्य ने भी नेतृत्व के सामाजिक चरित्र में इस परिवर्तन को रेखांकित किया है।
लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना कि आंदोलन में केवल समृद्ध किसान शामिल रहे, अतिसरलीकरण होगा।
छोटे और सीमांत किसानों की बड़ी संख्या भी किसान यूनियनों से जुड़ी।
कर्ज और आत्महत्या जैसे मुद्दों ने विशेष रूप से छोटे किसानों को प्रभावित किया।
इसलिए पंजाब किसान आंदोलन को वर्ग-अंतर्विरोधों वाला बहुस्तरीय कृषक गठबंधन कहना अधिक सटीक होगा।
क्या एमएसपी पंजाब की समस्या का समाधान है?
एमएसपी पंजाब किसान आंदोलन का केंद्रीय प्रश्न है, लेकिन अकेला समाधान नहीं।
कानूनी एमएसपी किसान को मूल्य गिरावट से सुरक्षा दे सकती है।
लेकिन पंजाब की दीर्घकालीन कृषि समस्या में इसके साथ चाहिए
फसल विविधीकरण, वैकल्पिक फसलों की सुनिश्चित खरीद, जल संरक्षण, कृषि प्रसंस्करण, ग्रामीण गैर-कृषि रोजगार, छोटे किसानों के लिए संस्थागत ऋण और स्थायी कृषि मॉडल।
यदि गेहूं–धान के बाहर विश्वसनीय बाजार नहीं बनेगा तो केवल किसान से फसल बदलने की अपील सफल नहीं होगी।
संगठनात्मक मानचित्र, इतिहासलेखन और प्रमुख स्रोत
प्रमुख संगठनों का संक्षिप्त संगठनात्मक मानचित्र
पंजाब किसान राजनीति को समझने के लिए मोटे तौर पर चार ऐतिहासिक धाराएं दिखाई देती हैं।
पहली—कम्युनिस्ट/वाम किसान सभा परंपरा, जिसकी जड़ें स्वतंत्रता से पहले तक जाती हैं।
दूसरी—1972 की पंजाब खेतीबाड़ी जमींदारा यूनियन से 1980 की बीकेयू पंजाब तक विकसित नया किसानवाद।
तीसरी—बीकेयू के विभाजनों से निकली लखोवाल, राजेवाल, मान, उगराहां, डकौंदा, सिद्धूपुर आदि धाराएं।
चौथी—इक्कीसवीं सदी के संयुक्त मंच—विशेषतः संयुक्त किसान मोर्चा, संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा।
इन संगठनों को एक संगठन की शाखाएं मानना गलत होगा। इनके नेतृत्व, विचार, सामाजिक आधार और रणनीति में महत्वपूर्ण अंतर हैं।
इतिहासलेखन : किसान से ‘फार्मर’ तक
पंजाब किसान आंदोलन के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन है
‘Peasant’ से ‘Farmer’ का संक्रमण।
पुराने किसान आंदोलन की केंद्रीय समस्याएं थीं
जमींदारी, भूमि अधिकार, काश्तकारी, बेगार, साहूकारी और लगान।
हरित क्रांति के बाद केंद्रीय प्रश्न हो गए
उत्पादन लागत, कृषि मूल्य, बिजली, ऋण, सरकारी खरीद और बाजार।
1972 में पंजाब खेतीबाड़ी जमींदारा यूनियन और 1980 में बीकेयू के उदय को शोध साहित्य इसी परिवर्तन के निर्णायक पड़ाव के रूप में देखता है।
प्राथमिक और प्रमुख समकालीन स्रोत
इस इतिहास के शोध में सबसे महत्वपूर्ण स्रोत समूह हैं
पंजाब सरकार के बेटरमेंट चार्ज संबंधी कानून और अधिसूचनाएं; जवाहरलाल नेहरू के मुख्यमंत्रियों को पत्र; पंजाब विधानसभा की कार्यवाही; किसान सभा और बीकेयू दस्तावेज; कृषि मूल्य एवं लागत आयोग की रिपोर्टें; पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के अध्ययन; पंजाब सरकार के कृषि, भूजल और ऋण संबंधी आंकड़े; किसान संगठनों के प्रस्ताव और मांगपत्र; 2020–21 में केंद्र सरकार और किसान संगठनों की वार्ताओं से जुड़े दस्तावेज; संसद में पारित तीन कृषि कानून तथा 2021 का निरसन अधिनियम; सर्वोच्च न्यायालय और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की प्रासंगिक कार्यवाहियां; तथा 2024–26 के केंद्र–किसान वार्ता दस्तावेज।
1959 के आंदोलन के लिए नेहरू का 25 मार्च का पत्र विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह समकालीन उच्चस्तरीय सरकारी दृष्टिकोण और 20 मार्च के समझौता-सदृश विधायी परिणाम दोनों की पुष्टि करता है।
बीकेयू के संगठनात्मक विकास के लिए पंजाब खेतीबाड़ी जमींदारा यूनियन की 1972 स्थापना, 1980 में बीकेयू में परिवर्तन और 1989 विभाजन के विवरण पर उपलब्ध इतिहास उपयोगी है।
चुनिंदा द्वितीयक संदर्भ
पंजाब किसान आंदोलन पर शोध करते समय रोंकी राम के पंजाब किसान संघर्ष संबंधी अध्ययन विशेष उपयोगी हैं। उनके विश्लेषण में 1972 की पंजाब खेतीबाड़ी जमींदारा यूनियन और 1980 के बीकेयू गठन को आंदोलन के सामाजिक-राजनीतिक चरित्र में निर्णायक परिवर्तन माना गया है।
इसके अतिरिक्त पंजाब के कृषि इतिहास, हरित क्रांति, ग्रामीण वर्ग संरचना, किसान यूनियन राजनीति, कृषि संकट, कर्ज और आत्महत्या पर आर्थिक एवं राजनीतिक साप्ताहिक तथा अन्य अकादमिक पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध आवश्यक पूरक सामग्री प्रदान करते हैं।
समकालीन घटनाओं के लिए समाचार स्रोतों का उपयोग करते समय किसान संगठनों के दावों, सरकारी वक्तव्यों और स्वतंत्र रिपोर्टिंग को अलग-अलग पढ़ना आवश्यक है—विशेषतः 2024–26 की घटनाएं अभी स्वयं इतिहास निर्माण की प्रक्रिया में हैं।
विस्तृत समयरेखा : 1959–2026
विस्तृत समयरेखा : 1959–2026
1959 — पंजाब में बेटरमेंट लेवी विरोध; गांवों में भुगतान-अस्वीकार और पुलिस टकराव; 20 मार्च को संशोधित कानून से लेवी में कमी और आंदोलनकारियों की रिहाई।
1960 का दशक — सिंचाई, उच्च उपज वाली किस्मों और सरकारी खरीद के आधार पर हरित क्रांति का विस्तार।
1965 के बाद — गेहूं उत्पादन में तेज वृद्धि; पंजाब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का केंद्रीय राज्य बनता है।
1972 — पंजाब खेतीबाड़ी जमींदारा यूनियन का गठन।
1970 का उत्तरार्ध — कृषि मूल्य और उत्पादन लागत किसान राजनीति के प्रमुख प्रश्न।
1980 — पंजाब खेतीबाड़ी जमींदारा यूनियन का पंजाब बीकेयू में रूपांतरण।
20 जनवरी 1983 — बिजली बिल न देने का महत्वपूर्ण बीकेयू आंदोलन शुरू।
1980 का दशक — चंडीगढ़ मोर्चा और आर्थिक मांगें; पंजाब के सुरक्षा संकट के कारण बड़े किसान आंदोलनों पर प्रभाव।
अप्रैल 1989 — बीकेयू पंजाब का विभाजन; लखोवाल तथा राजेवाल–मान धाराएं अलग।
1990 — भूपिंदर सिंह मान राज्यसभा पहुंचे।
1990 का दशक — बीकेयू की नई धाराओं और ‘एकता’ संगठनों का विकास।
1991 के बाद — उदारीकरण और वैश्विक कृषि व्यापार किसान विमर्श में प्रवेश।
2000 का दशक — कृषि ऋण, किसान आत्महत्या, मुफ्त बिजली, भूजल और फसल विविधीकरण प्रमुख मुद्दे।
2015 — सफेद मक्खी से कपास संकट; मालवा में बड़ा किसान आंदोलन।
सितंबर–अक्टूबर 2015 — बठिंडा सहित अनेक स्थानों पर लंबे धरने; मुआवजा, बासमती मूल्य और मजदूर राहत की मांग।
जून 2020 — तीन केंद्रीय कृषि अध्यादेशों के खिलाफ पंजाब में विरोध शुरू।
सितंबर 2020 — संसद से तीन कृषि कानून पारित; आंदोलन तीव्र।
सितंबर–नवंबर 2020 — रेल रोको, टोल और कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों पर धरने।
26–27 नवंबर 2020 — ‘दिल्ली चलो’; पंजाब–हरियाणा के किसान दिल्ली सीमाओं पर पहुंचे।
दिसंबर 2020–जनवरी 2021 — केंद्र और किसान संगठनों के बीच अनेक दौर की वार्ता।
26 जनवरी 2021 — ट्रैक्टर परेड; दिल्ली और लाल किला घटनाएं; आंदोलन गंभीर संकट से गुजरता है।
2021 — सिंघु, टिकरी और गाजीपुर पर लंबा आंदोलन जारी।
19 नवंबर 2021 — प्रधानमंत्री द्वारा तीन कृषि कानून वापस लेने की घोषणा।
29 नवंबर 2021 — संसद में कृषि कानून निरसन विधेयक पारित।
दिसंबर 2021 — दिल्ली सीमा आंदोलन स्थगित; एमएसपी सहित कई प्रश्न लंबित।
2022 — कुछ किसान संगठनों और नेताओं द्वारा संयुक्त समाज मोर्चा के माध्यम से पंजाब विधानसभा चुनाव में भागीदारी।
2022–23 — संयुक्त किसान मोर्चे के भीतर राजनीतिक और रणनीतिक मतभेद स्पष्ट।
13 फरवरी 2024 — एसकेएम (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा का दिल्ली चलो अभियान; शंभू–खनौरी मोर्चे बने।
फरवरी 2024 — केंद्र और किसान प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की वार्ता।
21 फरवरी 2024 — खनौरी पर टकराव और शुभकरण सिंह की मृत्यु।
2024 — शंभू और खनौरी पर लंबे धरने।
26 नवंबर 2024 के आसपास — जगजीत सिंह डल्लेवाल का लंबा अनशन आरंभ।
19 मार्च 2025 — केंद्र और किसान प्रतिनिधियों की वार्ता; निर्णायक समझौता नहीं।
19 मार्च 2025 — पंजाब पुलिस द्वारा डल्लेवाल, पंधेर सहित नेताओं को हिरासत में लेना और शंभू–खनौरी शिविर हटाने की कार्रवाई।
मार्च 2025 — पंजाब सरकार और किसान संगठनों के संबंधों में तीखा तनाव।
अगस्त 2026 — एसकेएम (गैर-राजनीतिक) की किसान बचाओ पदयात्रा को खनौरी–दाता सिंहवाला पर रोका गया।
19 अगस्त 2026 — खनौरी में किसानों का प्रतीकात्मक प्रदर्शन; डल्लेवाल और एसकेएम (गैर-राजनीतिक) की सक्रियता जारी।
28 अगस्त 2026 तक — पंजाब किसान आंदोलन का एमएसपी-केंद्रित संघर्ष समाप्त अध्याय नहीं है; संगठनात्मक रूप और रणनीति बदलने के बावजूद आंदोलन जारी है।
सात चरण, राज्य की भूमिका और ऐतिहासिक विरासत
1959 से 2026 : सात चरणों में पंजाब किसान आंदोलन
पूरे इतिहास को सात चरणों में बांटना उपयोगी है।
पहला चरण, 1959–65: विकास राज्य के कर और किसान प्रतिरोध—बेटरमेंट लेवी।
दूसरा, 1965–79: हरित क्रांति और नए उत्पादक किसान वर्ग का निर्माण।
तीसरा, 1980–89: बीकेयू का उदय, बिजली और लाभकारी मूल्य तथा चंडीगढ़ जैसे मोर्चे।
चौथा, 1989–2014: संगठनात्मक विभाजन, उदारीकरण, बिजली, कर्ज और कृषि संकट।
पांचवां, 2015–19: कपास संकट, कर्ज और किसान यूनियनों की पुनः संयुक्त लामबंदी।
छठा, 2020–22: कृषि कानून विरोध, संयुक्त किसान मोर्चा और कानूनों की वापसी।
सातवां, 2023–26: एमएसपी की कानूनी गारंटी, एसकेएम की विभिन्न धाराएं और शंभू–खनौरी संघर्ष।
समेकित मूल्यांकन : आंदोलन आखिर चाहता क्या रहा है?
ऊपरी तौर पर पंजाब किसान आंदोलन की मांगें बहुत बदलती दिखाई देती हैं।
कभी एमएसपी की कानूनी गारंटी।
लेकिन इनके नीचे एक स्थायी आर्थिक प्रश्न है
कृषि का जोखिम कौन उठाए और लाभ का वितरण कैसे हो?
किसान का तर्क है कि उत्पादन जोखिम उसके ऊपर है
मौसम उसका जोखिम, कीट उसका जोखिम, फसल विफलता उसका जोखिम, बाजार मूल्य गिरना उसका जोखिम, ऋण उसका जोखिम।
इसलिए राज्य केवल खाद्य सुरक्षा के लिए उससे उत्पादन की अपेक्षा नहीं कर सकता; उसे आय सुरक्षा भी देनी होगी।
यदि हर कृषि जोखिम की पूरी गारंटी सार्वजनिक वित्त से दी जाए तो उसकी लागत कितनी होगी? बाजार संकेत कैसे काम करेंगे? फसल विविधीकरण कैसे होगा? जल संरक्षण कैसे होगा?
यही पंजाब कृषि नीति की मूल दुविधा है।
बेटरमेंट लेवी से एमएसपी तक : राज्य की भूमिका उलट गई
1959 और 2026 की तुलना इस इतिहास का सबसे प्रभावशाली निष्कर्ष देती है।
1959 में राज्य किसान से कह रहा था
हमने सिंचाई देकर तुम्हारी जमीन का मूल्य बढ़ाया है; इसलिए उसका हिस्सा राज्य को दो।
2026 में किसान राज्य से कह रहा है
हम देश की खाद्य सुरक्षा के लिए उत्पादन करते हैं; इसलिए हमारी लागत और आय की न्यूनतम सुरक्षा राज्य सुनिश्चित करे।
इस बीच भारतीय कृषि राज्य ने असाधारण यात्रा की।
विकास परियोजना बनाने वाला राज्य,
हरित क्रांति संचालित करने वाला राज्य,
उर्वरक और बिजली पर सहायता देने वाला राज्य,
एमएसपी घोषित करने वाला राज्य,
और अंततः कृषि बाजार को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने का प्रयास करने वाला राज्य।
हर परिवर्तन के साथ किसान ने पूछा
मेरी जगह इस नई व्यवस्था में कहां है?
पंजाब किसान आंदोलन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विरासत
पंजाब किसान आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि कोई एक कानून, मूल्य अथवा मुआवजा नहीं है।
किसान को स्थायी राजनीतिक हित-समूह में बदल देना।
किसान केवल चुनाव में मतदान करने वाला ग्रामीण नागरिक नहीं रहा।
आर्थिक गणना प्रस्तुत करता है।
राष्ट्रीय राजधानी को चुनौती देता है।
और आवश्यकता पड़ने पर संसद से पारित कानून वापस करवाने की राजनीतिक शक्ति भी दिखाता है।
निष्कर्ष : बेटरमेंट लेवी से शंभू–खनौरी तक
निष्कर्ष : बेटरमेंट लेवी से शंभू–खनौरी तक
1959 में भाखड़ा–नंगल की नहरों से सिंचित खेतों के किसान बेटरमेंट लेवी के विरुद्ध खड़े हुए थे। राज्य उन्हें विकास का लाभार्थी मानकर उसका हिस्सा मांग रहा था। किसानों ने सामूहिक भुगतान-अस्वीकार किया। सरकार को लेवी घटानी पड़ी और गिरफ्तार आंदोलनकारी छोड़े गए।
उस समय किसी ने शायद कल्पना नहीं की होगी कि यही पंजाब कुछ वर्षों बाद भारत की हरित क्रांति का केंद्र बनेगा।
हरित क्रांति ने किसान को समृद्धि दी, लेकिन साथ ही उसे बाजार, बिजली, बैंक, उर्वरक, मशीनरी और सरकारी खरीद से बांध दिया।
इसी नई कृषि अर्थव्यवस्था से 1972 की पंजाब खेतीबाड़ी जमींदारा यूनियन और 1980 की बीकेयू पंजाब निकली।
1980 के दशक में किसान ने बिजली और लाभकारी मूल्य के लिए लड़ाई लड़ी।
1989 के बाद बीकेयू टूटी, लेकिन किसान राजनीति समाप्त नहीं हुई। उलटे अनेक यूनियनें बनीं।
उदारीकरण ने नए प्रश्न खड़े किए।
कर्ज और किसान आत्महत्या ने हरित क्रांति की सफलता के पीछे छिपे संकट को सामने रखा।
2015 की सफेद मक्खी ने दिखाया कि तकनीकी कृषि संकट कुछ ही सप्ताह में राजनीतिक विद्रोह बन सकता है।
और 2020 ने साबित किया कि पंजाब की दशकों पुरानी ग्रामीण संगठनात्मक संरचना पूरे देश के किसान आंदोलन को गति दे सकती है।
2021 में तीन कृषि कानूनों की वापसी उसकी सबसे बड़ी प्रत्यक्ष राजनीतिक विजय बनी।
लेकिन विजय ने आंदोलन समाप्त नहीं किया।
यदि कृषि कानून नहीं, तो भविष्य की कृषि बाजार व्यवस्था क्या होगी?
इसी प्रश्न से एमएसपी की कानूनी गारंटी का संघर्ष निकला।
2024 में किसान फिर दिल्ली के लिए निकला।
इस बार वह दिल्ली नहीं पहुंच पाया।
शंभू और खनौरी ही उसके आंदोलन की सीमा और प्रतीक बन गए।
2025 में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ—जिस पंजाब राज्य ने कभी केंद्रीय कृषि कानूनों के विरुद्ध किसान आंदोलन का समर्थन किया था, उसी की सरकार ने शंभू–खनौरी के लंबे धरने हटवाए। किसान आंदोलन और राज्य सत्ता के संबंध का यह एक नया अध्याय था।
और फिर भी संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।
अगस्त 2026 में किसान फिर खनौरी पर दिखाई दिया। दिल्ली की ओर प्रस्तावित पदयात्रा फिर रोकी गई।
इसलिए 1959–2026 का पंजाब किसान आंदोलन किसी एक विचारधारा, नेता, संगठन या मांग का इतिहास नहीं है।
यह उस किसान की यात्रा है जो पहले राज्य से कहता था
मेरे खेत पर अनुचित कर मत लगाओ।
मेरी फसल का लाभकारी मूल्य दो।
मेरी बिजली और उत्पादन लागत नियंत्रित रखो।
मुझे कर्ज के चक्र से निकालो।
मेरी मंडी और खरीद व्यवस्था को असुरक्षित मत करो।
मेरी उपज के न्यूनतम मूल्य को कानूनी सुरक्षा दो।
इसी अर्थ में बेटरमेंट लेवी से बीकेयू, संयुक्त किसान मोर्चा और शंभू–खनौरी तक की यात्रा स्वतंत्र भारत के किसान–राज्य संबंधों का एक संक्षिप्त इतिहास भी है।
1959 में प्रश्न था—राज्य किसान से कितना ले सकता है।
2026 में प्रश्न है—राज्य किसान को कितनी आर्थिक सुरक्षा देने के लिए बाध्य है।
इन दोनों प्रश्नों के बीच के 67 वर्ष ही आधुनिक पंजाब किसान आंदोलन का इतिहास हैं।
पंजाब किसान आंदोलन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि किसान को स्थायी राजनीतिक हित-समूह में बदलना रही है। उसने कर और लेवी से लेकर मूल्य, बिजली, कर्ज, खरीद तथा कानूनी गारंटी तक राज्य को कृषि जोखिम में भागीदार मानने की मांग स्थापित की। फिर भी अनेक संगठनात्मक विभाजनों, चुनावी प्रयोगों, समृद्ध किसान की छवि, भूजल–फसल विविधीकरण संकट, भूमिहीन खेत मजदूरों, दलित कृषि समुदायों और महिलाओं के प्रतिनिधित्व की सीमाओं ने इसकी व्यापकता को चुनौती दी। 1959 और 2026 को जोड़ने वाला केंद्रीय प्रश्न यही है—कृषि उत्पादन का जोखिम कौन उठाए और उसके लाभ का न्यायपूर्ण वितरण किसान, बाजार तथा राज्य के बीच कैसे हो?
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: विभिन्न बीकेयू धड़ों के गठन-वर्ष, नेतृत्व-क्रम, सदस्यता और आंदोलनकारी दावों में संगठनात्मक स्रोत भिन्न हो सकते हैं। आत्महत्या, ऋण, फसल-लागत, आंदोलन में मृत्यु और पुलिस कार्रवाई के आंकड़ों को सरकारी प्रतिवेदन, किसान संगठनों के दस्तावेज, न्यायिक अभिलेख तथा स्वतंत्र अध्ययनों से मिलाकर पढ़ना आवश्यक है।