भूमि अधिग्रहण, विशेष आर्थिक क्षेत्र और औद्योगिक गलियारे
कृषि भूमि से औद्योगिक भूगोल तक : उदारीकरण, भूमि संघर्ष और भारत का नया विकास मॉडल
भूमि अधिग्रहण को केवल सरकार और भू-स्वामी किसान के बीच प्रतिकर-विवाद मानना उसके व्यापक सामाजिक अर्थ को सीमित कर देता है। उदारीकरण के बाद कृषि भूमि कारखाने के साथ विशेष आर्थिक क्षेत्र, एक्सप्रेसवे, मालवाहक रेल, भंडारण केंद्र, नए औद्योगिक नगर और पूरे विकास-गलियारों की आधारभूमि बनी। इससे किसान की मांग भी “जमीन मत लो” से “उचित प्रतिकर, पुनर्वास और भविष्य में बढ़ने वाले भूमि-मूल्य में स्थायी हिस्सा दो” तक बदली। यह अध्ययन उसी नीतिगत परिवर्तन को 1894 के औपनिवेशिक कानून से 2013 के अधिकार-कानून और 2026 के औद्योगिक भूगोल तक क्रमबद्ध करता है।
भूमि का प्रश्न और 1894 की औपनिवेशिक विरासत
भूमि का प्रश्न केवल मुआवजे का प्रश्न नहीं
भारत में भूमि अधिग्रहण को अक्सर किसान और सरकार के बीच मुआवजे के विवाद के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन बीसवीं सदी के अंतिम दशक और इक्कीसवीं सदी के पहले ढाई दशकों का इतिहास बताता है कि विवाद इससे कहीं बड़ा है। इसके केंद्र में प्रश्न है—भूमि किसके लिए, किसकी सहमति से, किस कीमत पर और विकास से पैदा होने वाले भविष्य के लाभ में किसकी भागीदारी के साथ ली जाए?
औपनिवेशिक शासन में राज्य को भूमि अधिग्रहण की असाधारण शक्ति भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 से मिली थी। स्वतंत्र भारत ने लंबे समय तक इसी कानून का उपयोग बांध, कारखाने, सार्वजनिक प्रतिष्ठान, खदान, सड़क, शहर और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए किया। लेकिन 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भूमि की मांग की प्रकृति बदल गई। अब अधिग्रहण केवल सरकारी परियोजनाओं के लिए नहीं था। निजी उद्योग, सार्वजनिक–निजी भागीदारी, विशेष आर्थिक क्षेत्र, एक्सप्रेसवे, निजी नगर, बिजली परियोजनाएं, बंदरगाह, खनन क्षेत्र और बाद में औद्योगिक गलियारे भूमि बाजार के बड़े दावेदार बन गए।
यहीं से भारतीय किसान आंदोलन का पुराना प्रश्न—लगान और काश्तकारी अधिकार—धीरे-धीरे एक नए प्रश्न में बदलने लगा—विकास के लिए भूमि कौन देगा और विकास का लाभ किसे मिलेगा?
1894 का भूमि अधिग्रहण कानून : औपनिवेशिक विरासत
भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 का मूल दर्शन राज्य की “प्रख्यात अधिकार शक्ति” अर्थात सार्वजनिक प्रयोजन के लिए निजी संपत्ति को अनिवार्य रूप से लेने की क्षमता पर आधारित था।
इस कानून में राज्य का अधिकार मजबूत और भूमिधारक की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर थी। विवाद मुख्यतः इस बात पर हो सकता था कि अधिग्रहण वैध सार्वजनिक प्रयोजन के लिए है या नहीं और मुआवजा कितना होगा।
सबसे बड़ी समस्या “सार्वजनिक प्रयोजन” की व्यापक अवधारणा थी। समय के साथ औद्योगिक और निजी परियोजनाओं के लिए भी सरकारी अधिग्रहण संभव होता गया।
स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों में इसे राष्ट्र-निर्माण के संदर्भ में स्वीकार्यता मिली। भाखड़ा-नांगल जैसे बांध, सार्वजनिक क्षेत्र के इस्पात संयंत्र, खनन और आधारभूत संरचना विकास को राष्ट्रीय परियोजनाओं के रूप में देखा गया।
लेकिन जैसे-जैसे निजी पूंजी की भूमिका बढ़ी, सवाल उठने लगा—
क्या सरकार किसी निजी कंपनी के व्यावसायिक लाभ के लिए किसान से उसकी भूमि अनिवार्य रूप से ले सकती है?
यही प्रश्न आगे चलकर सिंगूर, नंदीग्राम, भट्टा–पारसौल और अनेक एसईजेड विवादों के केंद्र में आया।
उदारीकरण के बाद भूमि की बदलती अर्थव्यवस्था
1991 के बाद भूमि की अर्थव्यवस्था बदल गई
आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत ने निजी और विदेशी निवेश आकर्षित करने की नीति अपनाई। राज्यों के बीच उद्योग आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा बढ़ी।
अब उद्योग के लिए केवल कारखाने की जमीन नहीं चाहिए थी। नए औद्योगिक मॉडल में एक साथ चाहिए थे—
औद्योगिक क्षेत्र, चौड़ी सड़कें, एक्सप्रेसवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे, बिजली, आवासीय क्षेत्र, वाणिज्यिक क्षेत्र, लॉजिस्टिक्स पार्क और नई शहरी बस्तियां।
इससे भूमि की मांग का पैमाना कई गुना बढ़ गया।
इसी समय कृषि भूमि के मूल्य में भी एक विचित्र द्वंद्व पैदा हुआ। किसान को मुआवजा कृषि उपयोग के आधार पर मिलता था, लेकिन वही जमीन औद्योगिक या शहरी उपयोग में परिवर्तित होते ही कई गुना अधिक मूल्यवान हो सकती थी।
यही “भूमि मूल्य वृद्धि” भूमि आंदोलनों का केंद्रीय आर्थिक प्रश्न बन गई।
किसान पूछने लगा—
यदि मेरी जमीन के उपयोग में परिवर्तन के कारण उसका मूल्य दस या बीस गुना हो रहा है तो उस बढ़े हुए मूल्य का लाभ केवल विकास प्राधिकरण, सरकार या निजी विकासकर्ता को क्यों मिले?
विशेष आर्थिक क्षेत्र : नया औद्योगिक मॉडल और भूमि-संघर्ष
विशेष आर्थिक क्षेत्र : नए औद्योगिक मॉडल का आगमन
भारत में निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्रों का इतिहास पुराना है। कांडला में 1965 में एशिया के शुरुआती निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्रों में से एक स्थापित किया गया था। लेकिन 2000 के दशक में नीति ने बहुत बड़ा मोड़ लिया।
विशेष आर्थिक क्षेत्र नीति 2000 में सामने आई और इसके बाद संसद ने विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम, 2005 पारित किया। राष्ट्रपति की स्वीकृति 23 जून 2005 को मिली और विशेष आर्थिक क्षेत्र नियम, 2006 10 फरवरी 2006 से लागू हुए।
एसईजेड का उद्देश्य था—
निर्यात बढ़ाना, घरेलू और विदेशी निवेश आकर्षित करना, रोजगार पैदा करना, आधारभूत संरचना विकसित करना और उद्योगों को अपेक्षाकृत सरल नियामकीय वातावरण उपलब्ध कराना। वाणिज्य मंत्रालय आज भी इन्हीं उद्देश्यों को एसईजेड व्यवस्था का आधार बताता है।
लेकिन जल्द ही आर्थिक नीति का यह प्रश्न भूमि राजनीति में बदल गया।
एसईजेड और भूमि का टकराव
एसईजेड के लिए बड़े और कई मामलों में एकसाथ जुड़े हुए भूखंड आवश्यक थे। उद्योग और आधारभूत संरचना के लिए बड़ी मात्रा में भूमि उपलब्ध कराने का दायित्व मुख्यतः राज्यों पर आया।
समस्या यह थी कि अनेक प्रस्तावित क्षेत्र उन्हीं इलाकों में थे जहां—
उपजाऊ कृषि भूमि थी, सिंचाई उपलब्ध थी, गांव बसे हुए थे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर थी।
इसलिए एसईजेड विवाद केवल जमीन के मालिक किसानों तक सीमित नहीं रहा।
खेत मजदूर, बटाईदार, पट्टेदार, ग्रामीण कारीगर, दुकानदार, पशुपालक और अन्य लोग भी जमीन के उपयोग परिवर्तन से प्रभावित होते थे।
भूमि का कानूनी स्वामी मुआवजा पा सकता था; लेकिन भूमि पर निर्भर गैर-मालिक ग्रामीण परिवारों की आजीविका का क्या होगा?
यही वह प्रश्न था जिसे 1894 का कानून पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करता था।
एसईजेड : विकास इंजन या भूमि का कॉरपोरेटीकरण?
2005–08 के दौर में एसईजेड को लेकर तीखी राष्ट्रीय बहस हुई।
समर्थकों का तर्क था कि चीन जैसे देशों की औद्योगिक सफलता में विशेष आर्थिक क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारत को भी वैश्विक विनिर्माण, निर्यात और रोजगार बढ़ाने के लिए बड़े औद्योगिक समूहों की आवश्यकता है।
आलोचकों ने तीन मुख्य प्रश्न उठाए।
पहला—क्या एसईजेड वास्तव में अतिरिक्त औद्योगिक निवेश पैदा कर रहे हैं अथवा मौजूदा उद्योग केवल कर लाभ के लिए एसईजेड में स्थानांतरित हो रहे हैं?
दूसरा—क्या अत्यधिक कर रियायतों का राजकोषीय मूल्य रोजगार और निर्यात लाभ से उचित ठहराया जा सकता है?
और तीसरा तथा राजनीतिक रूप से सबसे विस्फोटक प्रश्न—
एसईजेड के लिए भूमि कौन देगा?
भूमि राजनीति का विस्फोट और राज्य की भूमिका
भूमि अधिग्रहण और एसईजेड राजनीति का विस्फोट
2006 के बाद विभिन्न राज्यों में एसईजेड परियोजनाओं के विरुद्ध विरोध तेज हुआ।
भूमि अधिग्रहण के कारण पश्चिम बंगाल का सिंगूर राष्ट्रीय विवाद बना। यद्यपि वह तकनीकी रूप से एसईजेड परियोजना नहीं थी, उसने उद्योग के लिए कृषि भूमि अधिग्रहण के प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति में ला दिया।
इसके तुरंत बाद नंदीग्राम में प्रस्तावित रासायनिक औद्योगिक क्षेत्र/विशेष आर्थिक क्षेत्र के विरुद्ध आंदोलन ने भूमि राजनीति को निर्णायक रूप से बदल दिया।
14 मार्च 2007 की पुलिस कार्रवाई और मौतों ने यह संदेश पूरे देश में पहुंचाया कि औद्योगीकरण की परियोजना यदि स्थानीय सहमति के बिना लागू की गई तो उसका राजनीतिक मूल्य बहुत बड़ा हो सकता है।
सिंगूर और नंदीग्राम ने अंततः पश्चिम बंगाल की राजनीति तक बदलने में योगदान दिया।
भूमि अधिग्रहण में राज्य की भूमिका पर पुनर्विचार
एसईजेड विवादों के बाद केंद्र सरकार के भीतर भी प्रश्न उठा कि निजी परियोजनाओं के लिए राज्य को कितनी भूमि अधिग्रहित करनी चाहिए।
2009 के आधिकारिक एसईजेड निर्देशों में भी भूमि अधिग्रहण के लिए पृथक दिशानिर्देश जारी किए गए। इससे स्पष्ट था कि भूमि प्रश्न एसईजेड व्यवस्था का एक संवेदनशील नीतिगत क्षेत्र बन चुका था।
धीरे-धीरे नीति का झुकाव इस दिशा में बढ़ा कि निजी विकासकर्ता जहां संभव हो सीधे भूमि खरीदे और राज्य की अनिवार्य अधिग्रहण शक्ति का उपयोग सीमित किया जाए।
लेकिन समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। किसान और कंपनी की सौदेबाजी शक्ति समान नहीं होती। कई छोटे भूखंडों को जोड़कर विशाल परियोजना बनाना भी निजी खरीद से कठिन था।
एक्सप्रेसवे, भट्टा–पारसौल और बदलती किसान मांग
एक्सप्रेसवे ने भूमि प्रश्न को नया रूप दिया
एसईजेड विवाद के समानांतर भारत में एक्सप्रेसवे आधारित विकास का मॉडल उभरा।
विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यमुना एक्सप्रेसवे और उससे जुड़े शहरी तथा औद्योगिक विकास ने भूमि अधिग्रहण को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया।
यहां समस्या केवल सड़क के लिए ली गई जमीन नहीं थी। एक्सप्रेसवे के आसपास की भूमि के भविष्य के शहरी और व्यावसायिक मूल्य ने विवाद को तीखा किया।
किसान देख रहा था कि जिस भूमि को उससे कृषि दरों के आसपास लिया गया, उसी क्षेत्र में बाद में औद्योगिक, आवासीय या वाणिज्यिक भूखंड कहीं अधिक कीमत पर विकसित हो सकते हैं।
भट्टा–पारसौल : भूमि संघर्ष का राष्ट्रीयकरण
2011 में गौतम बुद्ध नगर के भट्टा–पारसौल क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध किसान आंदोलन और पुलिस टकराव ने राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया।
इस संघर्ष का राजनीतिक महत्व असाधारण था।
भूमि अधिग्रहण अब केवल स्थानीय प्रशासन बनाम किसान का मुद्दा नहीं रहा। विपक्षी दलों, राष्ट्रीय मीडिया और संसद तक यह प्रश्न पहुंचा।
सिंगूर–नंदीग्राम और भट्टा–पारसौल ने मिलकर 1894 के औपनिवेशिक भूमि कानून को बनाए रखना राजनीतिक रूप से कठिन कर दिया।
किसान की मांग बदल चुकी थी
पुराने किसान आंदोलन का प्रमुख प्रश्न था—
“लगान कितना?”
स्वतंत्रता के बाद प्रश्न बना—
“जमीन किसकी?”
उदारीकरण के बाद प्रश्न बदलकर हुआ—
“जमीन का भविष्य का मूल्य किसका?”
यही परिवर्तन भूमि राजनीति को समझने की कुंजी है।
किसान अब केवल अधिक मुआवजा नहीं मांग रहा था। मांगों में शामिल होने लगे—
उच्च मुआवजा, विकसित भूमि में हिस्सा, परिवार के लिए रोजगार, पुनर्वास, वार्षिकी, वैकल्पिक आवास, सामाजिक आधारभूत सुविधाएं और परियोजना के भविष्य के आर्थिक लाभ में हिस्सेदारी।
2013 का कानून : सामाजिक प्रभाव, सहमति, प्रतिकर और पुनर्वास
2013 : औपनिवेशिक भूमि कानून का अंत
लगभग 119 वर्ष बाद 1894 के कानून की जगह भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013 आया।
यह 26 सितंबर 2013 को अधिनियमित हुआ और 1 जनवरी 2014 से प्रभावी हुआ। कानून के घोषित उद्देश्य में ही प्रभावित परिवारों को विकास में भागीदार बनाने और अधिग्रहण के बाद उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधारने की बात कही गई।
यह दर्शन 1894 के कानून से मूलभूत परिवर्तन था।
सामाजिक प्रभाव आकलन
2013 के कानून की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक सामाजिक प्रभाव आकलन थी।
अब केवल यह देखना पर्याप्त नहीं था कि सरकार को जमीन चाहिए।
यह भी जांचा जाना था कि—
कितने परिवार प्रभावित होंगे, आजीविका पर क्या असर होगा, सार्वजनिक और सामुदायिक संसाधनों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, परियोजना का सामाजिक लाभ उसकी सामाजिक लागत से अधिक है या नहीं और क्या आवश्यक भूमि की मात्रा वास्तव में उचित है।
कानून की धाराएं 4 से 8 सामाजिक प्रभाव आकलन, सार्वजनिक सुनवाई और विशेषज्ञ समूह द्वारा परीक्षण की व्यवस्था करती हैं।
इससे भूमि अधिग्रहण पहली बार व्यापक अर्थ में सामाजिक लागत के परीक्षण के अधीन आया।
सहमति का सिद्धांत
2013 के कानून ने निजी परियोजनाओं और सार्वजनिक–निजी भागीदारी के मामले में प्रभावित परिवारों की सहमति को महत्वपूर्ण बनाया।
निजी कंपनी के लिए अधिग्रहण में कम-से-कम 80 प्रतिशत प्रभावित परिवारों और सार्वजनिक–निजी भागीदारी परियोजना के लिए 70 प्रतिशत प्रभावित परिवारों की पूर्व सहमति आवश्यक की गई, जहां कानून की संबंधित शर्तें लागू होती हैं। सहमति की प्रक्रिया सामाजिक प्रभाव आकलन के साथ जुड़ी है।
यह भारतीय भूमि कानून में बड़ा परिवर्तन था।
1894 के मॉडल में किसान मुख्यतः अधिग्रहण का विषय था; 2013 का कानून कम-से-कम सिद्धांततः उसे निर्णय प्रक्रिया का पक्षकार बनाता था।
मुआवजे की नई अवधारणा
2013 के कानून ने बाजार मूल्य की गणना और उस पर गुणक, शत-प्रतिशत अतिरिक्त राशि तथा अन्य लाभों के माध्यम से मुआवजे को पुराने कानून की तुलना में काफी बढ़ाने का ढांचा बनाया।
लोकप्रिय राजनीतिक भाषा में इसे ग्रामीण क्षेत्रों में बाजार मूल्य के चार गुना तक और शहरी क्षेत्रों में दो गुना तक मुआवजे के रूप में प्रस्तुत किया गया, हालांकि वास्तविक गणना कानून में निर्धारित बाजार मूल्य, गुणक और अन्य घटकों के आधार पर होती है।
इसलिए “चार गुना” को हर मामले में स्वचालित चार गुना राशि समझना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा।
पुनर्वास पहली बार केंद्रीय अधिकार
2013 का कानून केवल जमीन की कीमत का कानून नहीं था।
इसने पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन को अधिग्रहण प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बनाया।
यही उसका ऐतिहासिक महत्व था।
क्योंकि विस्थापन का वास्तविक नुकसान केवल जमीन खोना नहीं होता। परिवार खो सकता है—
आवास, रोजगार, सामाजिक संबंध, साझा चरागाह, जल स्रोत, बाजार तक पहुंच और समुदाय का सामाजिक तंत्र।
इसलिए कानून में पुनर्वास योजना और पुरस्कार के लिए अलग अध्याय और प्रक्रियाएं रखी गईं।
2015 का विवाद और कानून बचाने की लड़ाई
2015 का विवाद : कानून बनने के बाद नई लड़ाई
2014 में नई केंद्र सरकार आने के बाद 2013 के कानून में संशोधन का प्रयास हुआ।
सरकार का तर्क था कि अत्यधिक प्रक्रियागत शर्तें आधारभूत संरचना, रक्षा, ग्रामीण विकास, औद्योगिक गलियारों और आवास जैसी परियोजनाओं को धीमा कर सकती हैं।
2014 के अंत से अध्यादेशों और 2015 के संशोधन विधेयक के माध्यम से कुछ श्रेणियों को सामाजिक प्रभाव आकलन तथा सहमति जैसी आवश्यकताओं से छूट देने का प्रयास हुआ।
किसान संगठनों और विपक्ष ने इसे 2013 में प्राप्त भूमि अधिकारों को कमजोर करने के रूप में प्रस्तुत किया।
यह विवाद इतना राजनीतिक हुआ कि केंद्र सरकार मूल प्रस्तावित संशोधनों को स्थायी केंद्रीय कानून के रूप में पारित नहीं करा सकी।
इस प्रकरण ने एक महत्वपूर्ण तथ्य स्थापित किया—
भूमि अधिग्रहण अब तकनीकी प्रशासनिक विषय नहीं, राष्ट्रीय चुनावी राजनीति का विषय बन चुका था।
विशेष आर्थिक क्षेत्रों से औद्योगिक गलियारों तक
एसईजेड से औद्योगिक गलियारों की ओर
2005–10 के दशक का प्रमुख शब्द था—विशेष आर्थिक क्षेत्र।
2010 के बाद विकास विमर्श में एक नया शब्द तेजी से प्रमुख हुआ—
औद्योगिक गलियारा।
अंतर महत्वपूर्ण है।
एसईजेड सामान्यतः एक परिभाषित औद्योगिक/निर्यात क्षेत्र होता है। औद्योगिक गलियारा कहीं अधिक विस्तृत भू-आर्थिक अवधारणा है।
इसमें एक लंबी परिवहन धुरी के आसपास अनेक औद्योगिक शहर, विनिर्माण क्षेत्र, लॉजिस्टिक्स केंद्र, बंदरगाह संपर्क, राजमार्ग, रेलवे और शहरी केंद्र विकसित किए जाते हैं।
दिल्ली–मुंबई औद्योगिक गलियारा : नए मॉडल की शुरुआत
भारत में इस मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक उदाहरण दिल्ली–मुंबई औद्योगिक गलियारा है।
यह पश्चिमी समर्पित मालवाहक रेल गलियारे को परिवहन रीढ़ बनाकर विकसित किया गया। राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास निगम के अनुसार इसका लगभग 1,504 किलोमीटर का विस्तार दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से मुंबई के जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह तक है और यह उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र से जुड़ता है।
इस मॉडल की मूल अवधारणा थी—
परिवहन गलियारा + औद्योगिक नोड + नया शहर + लॉजिस्टिक्स + निवेश।
इसने भारतीय भूमि नीति को परियोजना-आधारित अधिग्रहण से आगे बढ़ाकर क्षेत्रीय भू-आर्थिक पुनर्गठन की दिशा में पहुंचा दिया।
औद्योगिक गलियारा वास्तव में क्या बदलता है?
एक पारंपरिक कारखाना कुछ सौ या कुछ हजार एकड़ भूमि मांग सकता है।
लेकिन औद्योगिक गलियारा केवल कारखाना नहीं बनाता।
वह क्षेत्र के पूरे आर्थिक भूगोल को बदल सकता है।
कृषि भूमि औद्योगिक भूमि बनती है। गांव शहरी क्षेत्र में बदलते हैं। राजमार्ग के किनारे लॉजिस्टिक्स पार्क आते हैं। भूमि मूल्य बढ़ता है। प्रवासी श्रमिक आते हैं। आवासीय और वाणिज्यिक बाजार बनते हैं।
इसलिए औद्योगिक गलियारा वस्तुतः भूमि उपयोग परिवर्तन का विशाल तंत्र है।
राष्ट्रीय गलियारा कार्यक्रम, भूमि और 2024 का विस्तार
राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम
आज भारत का औद्योगिक गलियारा कार्यक्रम काफी विस्तृत हो चुका है।
सरकारी दस्तावेजों के अनुसार राष्ट्रीय कार्यक्रम में 11 औद्योगिक गलियारे शामिल हैं—दिल्ली–मुंबई, अमृतसर–कोलकाता, चेन्नई–बेंगलुरु, पूर्वी तट/विशाखापत्तनम–चेन्नई, बेंगलुरु–मुंबई, चेन्नई–बेंगलुरु का कोयंबटूर होते हुए कोच्चि विस्तार, हैदराबाद–नागपुर, हैदराबाद–वारंगल, हैदराबाद–बेंगलुरु, ओडिशा आर्थिक गलियारा और दिल्ली–नागपुर औद्योगिक गलियारा।
व्यापक योजना 11 गलियारों के अंतर्गत 32 परियोजनाओं/नोडों की परिकल्पना करती है।
जमीन कौन उपलब्ध कराता है?
यह भूमि-अधिकार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।
औद्योगिक गलियारा कार्यक्रम का वित्तीय-संस्थागत मॉडल मोटे तौर पर केंद्र और राज्य की साझेदारी पर आधारित है।
उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग के अनुसार केंद्र ट्रंक आधारभूत संरचना के लिए इक्विटी/ऋण के रूप में धन उपलब्ध कराता है और संबंधित राज्य सरकारें भूमि उपलब्ध कराती हैं।
राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास निगम के पूर्व वार्षिक प्रतिवेदन में भी व्यवस्था का वर्णन है कि परियोजना विशेष प्रयोजन कंपनियों में केंद्र की ओर से निवेश होता है जबकि संबंधित राज्य सरकार भूमि को अपने इक्विटी योगदान के रूप में हस्तांतरित कर सकती है।
यानी किसान और औद्योगिक गलियारे के बीच सबसे महत्वपूर्ण मध्यस्थ आज भी प्रायः राज्य सरकार है।
2024 के बाद औद्योगिक भूगोल का नया विस्तार
अगस्त 2024 में केंद्र ने 12 नए औद्योगिक स्मार्ट सिटी/औद्योगिक क्षेत्र परियोजनाओं को स्वीकृति दी।
इनमें खुरपिया, राजपुरा–पटियाला, दिघी बंदरगाह औद्योगिक क्षेत्र, पालक्काड, जोधपुर–पाली–मारवाड़, हिसार, आगरा, प्रयागराज, गया, ओरवकल, कोप्पर्थी और जहीराबाद शामिल हैं। सरकारी विवरण में इन परियोजनाओं के भूमि क्षेत्र भी दर्ज हैं।
इससे स्पष्ट है कि भूमि-अधिग्रहण का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ है; उसका संस्थागत स्वरूप बदल गया है।
पहले बहस एसईजेड की थी। अब स्मार्ट औद्योगिक शहर, औद्योगिक विनिर्माण समूह, लॉजिस्टिक्स केंद्र और गलियारा-आधारित विकास उसके नए रूप हैं।
औद्योगिक गलियारों के आर्थिक तर्क और किसान का प्रश्न
औद्योगिक गलियारे के पक्ष में आर्थिक तर्क
औद्योगिक गलियारों के समर्थकों के तर्क को भी पूरी गंभीरता से समझना आवश्यक है।
भारत लंबे समय से विनिर्माण क्षेत्र की अपेक्षाकृत कम हिस्सेदारी, उच्च लॉजिस्टिक्स लागत, अव्यवस्थित औद्योगिक शहरों और कमजोर माल परिवहन संरचना से जूझता रहा है।
यदि उद्योग अलग-अलग बिखरे हुए स्थानों पर स्थापित किए जाएं तो सड़क, रेल, बिजली, पानी और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ती है।
गलियारा मॉडल इन सुविधाओं को एकीकृत करने का प्रयास करता है।
सरकार इन्हें “तत्काल उपयोग हेतु तैयार” आधारभूत संरचना, बहु-माध्यम संपर्क और भविष्य के औद्योगिक शहरों के रूप में विकसित करने की बात करती है।
अर्थात निवेशक को तैयार औद्योगिक भूखंड और आधारभूत सुविधाएं मिलें।
लेकिन किसान के लिए प्रश्न क्या है?
किसान की दृष्टि से समस्या अलग है।
एकमुश्त मुआवजा मिल जाने के बाद जमीन हमेशा के लिए चली जाती है।
यदि किसान परिवार को दस या बीस वर्ष बाद धन समाप्त होने पर स्थायी आय का स्रोत नहीं मिलता तो उच्च मुआवजा भी दीर्घकालीन आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं है।
दूसरी ओर उसी जमीन का औद्योगिक और शहरी मूल्य लगातार बढ़ सकता है।
इसलिए नई भूमि राजनीति में केवल “उचित मुआवजा” पर्याप्त अवधारणा नहीं रह गई।
नई अवधारणा होनी चाहिए—
“भूमि मूल्य वृद्धि में किसान की हिस्सेदारी।”
भूमिहीन, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और रोजगार
भूमि-मालिक और भूमिहीन का अंतर
भूमि अधिग्रहण नीति की एक स्थायी कमजोरी यह रही कि जमीन का मालिक दिखाई देता है, लेकिन जमीन पर निर्भर समाज अक्सर अदृश्य रहता है।
एक गांव में भूमि अधिग्रहण से प्रभावित हो सकते हैं—
भूमिहीन कृषि मजदूर, बटाईदार, पट्टेदार, चरवाहे, छोटे दुकानदार, कारीगर और ग्रामीण सेवा प्रदाता।
यदि पूरा कृषि क्षेत्र औद्योगिक शहर में बदल जाए तो इनके रोजगार का पारंपरिक आधार भी समाप्त हो सकता है।
2013 का कानून “प्रभावित परिवार” की व्यापक अवधारणा के माध्यम से इस समस्या को पहले की तुलना में अधिक स्वीकार करता है।
यही कारण है कि पुनर्वास को केवल भूमिधर किसान तक सीमित नहीं समझा जाना चाहिए।
खाद्य सुरक्षा का प्रश्न
बड़े पैमाने पर औद्योगिक भूमि परिवर्तन का एक दूसरा प्रश्न खाद्य सुरक्षा है।
यदि सबसे अच्छी सिंचित और बहुफसली भूमि शहरों तथा उद्योगों में परिवर्तित होती जाए तो दीर्घकाल में कृषि उत्पादन पर दबाव पड़ सकता है।
इसीलिए 2013 के कानून में खाद्य सुरक्षा की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान रखा गया है। कानून की संरचना में बहुफसली सिंचित भूमि के अधिग्रहण पर विशेष नियंत्रण का सिद्धांत शामिल है।
यह प्रावधान इस मान्यता से पैदा हुआ कि हर भूमि केवल बाजार में बिकने वाली संपत्ति नहीं है; कुछ भूमि राष्ट्रीय खाद्य प्रणाली का हिस्सा भी है।
पर्यावरण का प्रश्न
औद्योगिक गलियारे केवल भूमि उपयोग नहीं बदलते।
वे बदल सकते हैं—
जल मांग, भूजल स्तर, नदी तंत्र, प्रदूषण भार, यातायात, शहरीकरण और स्थानीय पारिस्थितिकी।
इसलिए किसी औद्योगिक गलियारे का वास्तविक मूल्यांकन केवल निवेश राशि और रोजगार संख्या से नहीं किया जा सकता।
उसका संचयी पर्यावरणीय प्रभाव भी देखना होगा।
एक कारखाने का पर्यावरणीय प्रभाव अलग-अलग मंजूरी में स्वीकार्य दिखाई दे सकता है, लेकिन उसी क्षेत्र में दर्जनों औद्योगिक इकाइयों, राजमार्गों, शहरों और लॉजिस्टिक्स केंद्रों का संयुक्त प्रभाव कहीं अधिक हो सकता है।
जमीन से रोजगार तक संक्रमण की समस्या
सरकार और उद्योग अक्सर तर्क देते हैं कि औद्योगीकरण किसानों के बच्चों के लिए रोजगार पैदा करेगा।
यह संभावना वास्तविक है, लेकिन स्वचालित नहीं।
कृषि से औद्योगिक अर्थव्यवस्था में जाने के लिए आवश्यक हैं—
शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, कौशल, शहरी अनुकूलन और स्थानीय भर्ती के अवसर।
यदि जमीन स्थानीय किसान देता है लेकिन उच्च कौशल वाले रोजगार बाहर से आए श्रमिकों को मिलते हैं और स्थानीय परिवार केवल मुआवजे पर निर्भर रह जाते हैं, तो औद्योगिक विकास स्थानीय सामाजिक असंतोष पैदा कर सकता है।
इसलिए कौशल विकास भूमि पुनर्वास का हिस्सा होना चाहिए, अलग सरकारी योजना नहीं।
विशेष आर्थिक क्षेत्र और औद्योगिक गलियारे का तुलनात्मक बदलाव
एसईजेड से औद्योगिक गलियारे तक क्या बदला?
यह परिवर्तन भारतीय विकास नीति के विकासक्रम को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पहला चरण: सार्वजनिक परियोजना के लिए भूमि।
दूसरा चरण: निजी उद्योग के लिए भूमि।
तीसरा चरण: विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए विशाल समेकित भूमि।
चौथा चरण: एक्सप्रेसवे के साथ औद्योगिक और शहरी विकास।
पांचवां चरण: औद्योगिक गलियारा—जहां परिवहन, उद्योग, लॉजिस्टिक्स और नया शहरीकरण एक ही भू-आर्थिक परियोजना बन जाते हैं।
इसलिए भूमि संघर्ष का पैमाना भी लगातार बढ़ा है।
सिंगूर, नंदीग्राम और भट्टा–पारसौल की ऐतिहासिक भूमिका
इन तीन संघर्षों को अलग-अलग राजनीतिक घटनाओं के रूप में देखना अधूरा होगा।
इनका संयुक्त ऐतिहासिक प्रभाव था—
भारत की भूमि अधिग्रहण नीति को लोकतांत्रिक सहमति के प्रश्न के सामने खड़ा करना।
सिंगूर ने पूछा—
उद्योग बनाम किसान में संतुलन कैसे होगा?
नंदीग्राम ने पूछा—
क्या स्थानीय समाज की असहमति के बावजूद औद्योगिक क्षेत्र थोपा जा सकता है?
भट्टा–पारसौल ने पूछा—
यदि जमीन का भविष्य का मूल्य कई गुना बढ़ना है तो किसान को केवल अधिग्रहण के समय की कीमत क्यों मिले?
इन संघर्षों की राजनीतिक पृष्ठभूमि के बिना 2013 का कानून पूरी तरह समझ में नहीं आता।
संघर्षों और कानून की प्रमुख उपलब्धियां
उपलब्धियां
भूमि आंदोलनों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने भारतीय विकास विमर्श की भाषा बदल दी।
कभी राज्य कह सकता था—
“यह सार्वजनिक प्रयोजन है, इसलिए जमीन ली जाएगी।”
अब प्रश्न उठते हैं—
सामाजिक प्रभाव क्या है?
किसकी सहमति है?
मुआवजा कितना है?
पुनर्वास कहां होगा?
आजीविका का क्या होगा?
ग्रामसभा की भूमिका क्या है?
कृषि भूमि क्यों ली जा रही है?
वैकल्पिक भूमि क्यों नहीं?
परियोजना में स्थानीय समुदाय का हिस्सा क्या होगा?
यह परिवर्तन स्वयं भारतीय किसान आंदोलनों की बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि है।
नीति तथा आंदोलनों की सीमाएं
सीमाएं
फिर भी 2013 का कानून भूमि संघर्ष का अंतिम समाधान नहीं है।
पहली समस्या—बाजार मूल्य का निर्धारण।
पंजीकृत बिक्री मूल्य अक्सर वास्तविक बाजार मूल्य से कम हो सकता है।
दूसरी—भूमि अधिग्रहण और प्रत्यक्ष खरीद के बीच अंतर।
यदि सरकार औपचारिक अधिग्रहण न करके अन्य माध्यमों से भूमि समेकित करती है तो अधिकारों का स्वरूप बदल सकता है।
तीसरी—राज्यवार संशोधन और प्रक्रियागत विविधता।
चौथी—पुनर्वास का क्रियान्वयन।
पांचवीं—गैर-भूमिधर परिवारों की पहचान।
छठी—दीर्घकालीन आय सुरक्षा।
और सबसे बड़ी समस्या—
भूमि देने वाला व्यक्ति विकास से पैदा होने वाली दीर्घकालीन संपत्ति में कितना भागीदार बनता है?
अधिग्रहण से स्थायी भागीदारी तक
भविष्य का मॉडल : अधिग्रहण से भागीदारी तक
भारत को उद्योग चाहिए। सड़कें चाहिए। रेल गलियारे चाहिए। शहर चाहिए। रोजगार चाहिए।
इसलिए हर भूमि अधिग्रहण का विरोध समाधान नहीं हो सकता।
लेकिन यह मान लेना भी संभव नहीं कि औद्योगीकरण के नाम पर स्थानीय समाज की आर्थिक नींव समाप्त कर दी जाए।
भविष्य की भूमि नीति को कम-से-कम पांच सिद्धांतों पर आगे बढ़ना होगा—
भूमि का न्यूनतम आवश्यक अधिग्रहण; वास्तविक और सूचित सहमति; उचित मुआवजा; आजीविका और पुनर्वास की दीर्घकालीन सुरक्षा; तथा विकसित भूमि अथवा भूमि मूल्य वृद्धि में मूल भूमिधारक और प्रभावित समुदाय की भागीदारी।
यही “भूमि अधिग्रहण” से “विकास में साझेदारी” की यात्रा होगी।
समेकित निष्कर्ष : खेत से औद्योगिक शहर तक
भारत में भूमि प्रश्न ने दो शताब्दियों में असाधारण परिवर्तन देखा है।
औपनिवेशिक काल में किसान पूछता था—
मेरी उपज पर लगान कितना?
जमींदारी व्यवस्था के विरुद्ध उसने पूछा—
जमीन पर अधिकार किसका?
स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधारों ने पूछा—
जोतने वाले को जमीन मिलेगी या नहीं?
1991 के बाद प्रश्न हुआ—
उद्योग और शहर के लिए कृषि भूमि किस शर्त पर ली जाएगी?
एसईजेड युग ने पूछा—
निर्यात और निवेश के लिए कितनी जमीन उचित है?
सिंगूर और नंदीग्राम ने पूछा—
क्या औद्योगीकरण बिना सामाजिक सहमति के संभव है?
भट्टा–पारसौल ने पूछा—
कृषि मूल्य पर ली गई भूमि के शहरी मूल्य का लाभ किसे मिलेगा?
2013 के कानून ने पहली बार व्यापक कानूनी उत्तर देने का प्रयास किया—
मुआवजा + सामाजिक प्रभाव + सहमति + पुनर्वास + पारदर्शिता।
और औद्योगिक गलियारों का वर्तमान दौर एक और बड़ा प्रश्न हमारे सामने रखता है—
क्या किसान केवल अपनी भूमि बेचकर विकास से बाहर हो जाएगा, या वह उस विकास से पैदा होने वाली नई संपत्ति का साझेदार बनेगा?
यही इक्कीसवीं सदी की भारतीय भूमि राजनीति का केंद्रीय प्रश्न है।
विशेष आर्थिक क्षेत्र से औद्योगिक गलियारों तक भारत ने विकास की इकाई को “कारखाने” से “पूरे क्षेत्र” तक विस्तारित कर दिया है। राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा कार्यक्रम में आज 11 गलियारों और 32 परियोजनाओं/नोडों की व्यापक परिकल्पना इसी परिवर्तन का प्रमाण है।
इसलिए भूमि नीति भी पुराने “अधिग्रहण और मुआवजे” के ढांचे में नहीं रह सकती।
भारत के लिए अगला चरण होना चाहिए—
भूमि अधिग्रहण → पुनर्वास → भूमि मूल्य साझेदारी → विकास में स्थायी भागीदारी।
यही वह बिंदु है जहां किसान आंदोलन, भूमि अधिकार और भारत का औद्योगिक भविष्य एक-दूसरे से मिलते हैं।
विशेष आर्थिक क्षेत्रों से औद्योगिक गलियारों तक विकास की इकाई एक कारखाने या भूखंड से बढ़कर पूरे क्षेत्र में बदल गई है। इससे आधारभूत संरचना, निवेश और रोजगार की संभावनाएं बढ़ती हैं, किंतु भूमि देने वाले किसान तथा आजीविका खोने वाले भूमिहीन परिवार के सामने जोखिम भी दीर्घकालिक हो जाता है। 2013 के कानून ने सामाजिक प्रभाव, सहमति, पुनर्वास और खाद्य सुरक्षा को वैधानिक स्थान देकर औपनिवेशिक व्यवस्था से निर्णायक दूरी बनाई; फिर भी उसके क्रियान्वयन, राज्यों के अलग कानूनों, भूमि-बैंक, रोजगार की अनिश्चितता और भूमि-मूल्य वृद्धि से किसान के बाहर रह जाने की समस्या बनी हुई है। न्यायपूर्ण अगला चरण केवल एकमुश्त प्रतिकर नहीं, बल्कि विकसित भूमि, वार्षिकी, हिस्सेदारी, कौशल और स्थानीय रोजगार के संयोजन से विकास में स्थायी भागीदारी होना चाहिए।
प्राथमिक और प्रमुख संस्थागत स्रोत
स्रोत-सावधानी: 2013 के कानून में 70 और 80 प्रतिशत सहमति के प्रावधान संबंधित सार्वजनिक–निजी भागीदारी और निजी परियोजनाओं की विशिष्ट वैधानिक परिस्थितियों में लागू होते हैं; उन्हें प्रत्येक प्रकार के अधिग्रहण पर समान रूप से लागू न समझें। औद्योगिक गलियारों के लिए भूमि उपलब्ध कराने की विधि राज्य, परियोजना और पहले से उपलब्ध सरकारी भूमि के अनुसार बदल सकती है।