omkarchaudhary.comJOURNALIST · AUTHOR · RESEARCHEROCN Research Desk
दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · समेकित विशेष अध्ययन 01

बांध, खनन और आदिवासी भूमि-अधिकार

विकास, विस्थापन और संसाधन-न्याय की भारतीय यात्रा

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंपादित समेकित शोध संस्करण · 31 अगस्त 2026

बांध और खदानें आधुनिक भारत को पानी, बिजली, इस्पात और खनिज देती हैं; किंतु इन परियोजनाओं की स्थानीय कीमत अक्सर किसान, आदिवासी और वन-आश्रित समुदाय अपनी भूमि, आजीविका तथा सांस्कृतिक भूगोल खोकर चुकाते हैं। यह अध्ययन औपनिवेशिक वन-नियंत्रण से बड़े बांधों, खनन पट्टियों, नर्मदा, नियमगिरि और पोलावरम तक उस ऐतिहासिक यात्रा को समझता है जिसमें संघर्ष की भाषा मुआवजे से पुनर्वास, ग्रामसभा, सामुदायिक वन-अधिकार और संसाधन-लाभ में न्यायपूर्ण भागीदारी तक विकसित हुई।

खंड 1

प्रस्तावना और औपनिवेशिक भूमि–वन विरासत

प्रस्तावना : विकास का लाभ किसे, उसकी कीमत कौन चुकाए?

स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद ही कोई प्रश्न ऐसा हो जिसमें राष्ट्र-निर्माण और नागरिक अधिकारों का टकराव बांध, खनन और आदिवासी भूमि-अधिकार जितनी तीव्रता से दिखाई देता हो। बड़े बांधों ने सिंचाई दी, बिजली पैदा की, बाढ़ नियंत्रण में भूमिका निभाई और औद्योगिकीकरण को ऊर्जा उपलब्ध कराई। खनन ने कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, मैंगनीज और दूसरे खनिज उपलब्ध कराकर आधुनिक अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत की। इस दृष्टि से बांध और खदानें केवल परियोजनाएं नहीं थीं; वे स्वतंत्र भारत की विकास-कल्पना का हिस्सा थीं।

लेकिन इसी कहानी का दूसरा पक्ष विस्थापन है।

जलाशय के नीचे डूबने वाला गांव, खदान में बदलता पहाड़, उद्योग के लिए अधिग्रहित खेत और वनभूमि से हटाया जाता समुदाय विकास के राष्ट्रीय लाभ की स्थानीय कीमत चुकाता है। यह कीमत केवल मकान या खेत खोने की नहीं होती। इसके साथ जंगल, नदी, चरागाह, सामुदायिक भूमि, देवस्थल, पूर्वजों की स्मृतियां, सामाजिक संबंध, परंपरागत पेशे और पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था जुड़ी होती है।

आदिवासी समाज के मामले में यह प्रश्न और गहरा है। जमीन को केवल खरीदने-बेचने योग्य संपत्ति मानने वाली आधुनिक कानूनी अवधारणा और भूमि-जंगल-पहाड़ को सामुदायिक जीवन का हिस्सा मानने वाली आदिवासी अवधारणा हमेशा एक जैसी नहीं रही।

इसी अंतर्विरोध से आधुनिक भारत का एक केंद्रीय प्रश्न पैदा हुआ—

क्या राष्ट्रीय विकास के नाम पर किसी स्थानीय समुदाय से उसकी भूमि और संसाधन लिए जा सकते हैं? यदि हां, तो किन शर्तों पर? मुआवजा पर्याप्त है या पुनर्वास भी अधिकार है? ग्रामसभा से केवल परामर्श होना चाहिए या सहमति भी आवश्यक है? और जिस जमीन तथा खनिज से दीर्घकालिक संपदा पैदा होगी, उसमें मूल निवासियों की हिस्सेदारी क्या होगी?

यही प्रश्न बांध और खनन विरोधी आंदोलनों को सामान्य भूमि-अधिग्रहण विवाद से आगे ले जाकर संसाधन-न्याय के आंदोलन में बदलता है।

जंगल पर राज्य का नियंत्रण और आदिवासी भूमि का संकट

आदिवासी भूमि-अधिकार की आधुनिक समस्या 1947 में अचानक पैदा नहीं हुई। इसकी जड़ें औपनिवेशिक शासन में थीं।

ब्रिटिश शासन ने वन कानूनों, राजस्व बंदोबस्त और प्रशासनिक वर्गीकरण के माध्यम से जंगलों पर राज्य का नियंत्रण बढ़ाया। जिन जंगलों पर समुदाय पीढ़ियों से खेती, चराई, शिकार, फल-फूल, लकड़ी और अन्य वन उत्पादों के लिए निर्भर थे, उनमें से अनेक पर राज्य ने आरक्षित अथवा संरक्षित वन की अवधारणा लागू की।

इससे दो व्यवस्थाओं का टकराव हुआ।

एक ओर लिखित सरकारी रिकॉर्ड था; दूसरी ओर परंपरागत और सामुदायिक अधिकार।

इसी भूमि-जंगल संकट की पृष्ठभूमि में कोल विद्रोह, संथाल हूल, भील प्रतिरोध, मुंडा उलगुलान और बस्तर भूमकाल जैसे अनेक आदिवासी विद्रोह हुए। इन आंदोलनों के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में आदिवासी भूमि के हस्तांतरण को रोकने वाली विशेष व्यवस्थाएं विकसित हुईं।

छोटानागपुर में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 और संथाल परगना की विशेष भूमि व्यवस्था इसी ऐतिहासिक संघर्ष की विरासत थीं।

इसलिए स्वतंत्र भारत में जब खदान, बांध और उद्योग आदिवासी इलाकों तक पहुंचे, तो संघर्ष केवल नई परियोजना से नहीं था। उसके पीछे पहले से मौजूद ऐतिहासिक स्मृति थी—बाहरी सत्ता द्वारा भूमि और जंगल पर नियंत्रण की स्मृति।

खंड 2

विकासवादी राज्य, बड़े बांध और बार-बार विस्थापन

बड़े बांध : आधुनिक भारत के मंदिर और विस्थापन की शुरुआत

आजादी के बाद भारतीय नेतृत्व के सामने वास्तविक और कठिन चुनौतियां थीं। कृषि वर्षा पर अत्यधिक निर्भर थी। बिजली का उत्पादन कम था। उद्योग सीमित थे। बाढ़ और सूखे दोनों गंभीर समस्याएं थीं।

इसीलिए बड़े बहुउद्देश्यीय बांध आधुनिकता के प्रतीक बने।

भाखड़ा-नांगल, दामोदर घाटी, हीराकुंड, रिहंद और बाद में नर्मदा घाटी जैसी परियोजनाओं को राष्ट्रीय निर्माण की परियोजनाओं के रूप में देखा गया।

उनके लाभ वास्तविक थे।

लेकिन एक बड़ी प्रशासनिक कमजोरी भी धीरे-धीरे सामने आई—परियोजना निर्माण को प्राथमिक और विस्थापितों के पुनर्वास को गौण माना गया।

सरकार परियोजना की इंजीनियरिंग, लागत और निर्माण समय पर विस्तृत योजना बनाती थी, लेकिन विस्थापित परिवारों की नई आजीविका, सामाजिक पुनर्स्थापन और सामुदायिक संसाधनों की भरपाई उतनी व्यवस्थित नहीं होती थी।

यहीं स्वतंत्र भारत में विकास-जनित विस्थापन की समस्या ने आकार लिया।

हीराकुंड : शुरुआती चेतावनी

महानदी पर निर्मित हीराकुंड बांध स्वतंत्र भारत की शुरुआती बड़ी बहुउद्देश्यीय परियोजनाओं में था। सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और बिजली इसके प्रमुख उद्देश्य थे।

लेकिन जलाशय बनने से गांव और कृषि भूमि डूबे तथा बड़ी संख्या में परिवारों को स्थानांतरित होना पड़ा।

हीराकुंड के अनुभव ने वह समस्या बहुत जल्दी दिखा दी जो बाद की लगभग हर बड़ी परियोजना में सामने आने वाली थी—

मुआवजा और पुनर्वास एक ही चीज नहीं हैं।

नकद राशि देकर किसी परिवार को हटाया जा सकता है, लेकिन उसकी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था, सामुदायिक संबंध और साझा संसाधनों को नकद भुगतान से स्वतः पुनर्निर्मित नहीं किया जा सकता।

जनजातीय मामलों से संबंधित सरकारी अध्ययनों में भी बाद में इस समस्या को स्वीकार किया गया। 2014 की उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट ने विकास-जनित विस्थापन में भूमिहीनता, बेरोजगारी, बेघर होना, हाशियाकरण, खाद्य असुरक्षा, सामुदायिक संसाधनों की हानि और सामाजिक विघटन जैसी समस्याओं का उल्लेख किया तथा विभिन्न अध्ययनों के आधार पर प्रभावित लोगों में आदिवासियों की अत्यधिक हिस्सेदारी की ओर ध्यान दिलाया।

यहां सावधानी आवश्यक है: भारत में विकास परियोजनाओं से कुल विस्थापित लोगों की कोई एक निर्विवाद सर्वमान्य संख्या नहीं है। विभिन्न शोधों की अवधि, “विस्थापित” और “परियोजना प्रभावित” की परिभाषा तथा परियोजनाओं का दायरा अलग होने के कारण अनुमान काफी भिन्न हैं।

इसलिए किसी एक बड़े आंकड़े को अंतिम सरकारी सत्य मानना उचित नहीं है।

रिहंद और सोनभद्र : एक बार नहीं, बार-बार विस्थापन

रिहंद बांध और उसके आसपास विकसित सोनभद्र औद्योगिक क्षेत्र विस्थापन की एक और गंभीर समस्या समझाता है—बहुस्तरीय अथवा बार-बार विस्थापन।

एक परिवार पहले जलाशय के कारण अपनी भूमि खो सकता है और नई जगह बसने के बाद कोयला खनन, ताप विद्युत संयंत्र अथवा दूसरी औद्योगिक परियोजना से फिर प्रभावित हो सकता है।

ऐसे क्षेत्रों में विस्थापन को केवल “एक परियोजना–एक मुआवजा” मॉडल से समझना पर्याप्त नहीं है।

यहां विकास का पूरा भूगोल बदल जाता है।

कृषि भूमि औद्योगिक भूमि में बदलती है। गांव के आसपास की वन और सामुदायिक भूमि समाप्त होती है। पानी के स्रोत बदलते हैं। प्रदूषण बढ़ सकता है। पारंपरिक आजीविका और नई औद्योगिक अर्थव्यवस्था के बीच कौशल का अंतर पैदा होता है।

यही कारण है कि पुनर्वास का वास्तविक अर्थ केवल नया मकान देना नहीं बल्कि आजीविका का पुनर्निर्माण होना चाहिए।

खंड 3

खनिज-संपन्न आदिवासी भूगोल : झारखंड और ओडिशा

एक ऐतिहासिक विडंबना : खनिज जहां, आदिवासी आबादी भी वहीं

भारत के अनेक खनिज-संपन्न क्षेत्र मध्य और पूर्वी भारत की आदिवासी पट्टी में स्थित हैं।

झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के अनेक हिस्सों में कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट और दूसरे खनिजों के विशाल भंडार हैं।

इसी भूगोल में अनुसूचित जनजातियों की महत्वपूर्ण आबादी और बड़े वन क्षेत्र भी स्थित हैं।

इससे एक संरचनात्मक अंतर्विरोध पैदा हुआ—

राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को जिन संसाधनों की आवश्यकता थी, वे अक्सर उन्हीं क्षेत्रों के नीचे थे जहां भूमि और जंगल स्थानीय आदिवासी समाज की आजीविका तथा संस्कृति की बुनियाद थे।

भूमि की सतह पर समुदाय रहता था; जमीन के नीचे खनिज था; खनिज पर नियमन की शक्ति राज्य के पास थी।

यहीं भूमि-अधिकार और खनिज-अधिकार का टकराव पैदा हुआ।

झारखंड : खनिज संपदा और भूमि सुरक्षा का विरोधाभास

छोटानागपुर का इतिहास विशेष महत्व रखता है।

मुंडा उलगुलान और उससे पहले के आदिवासी प्रतिरोधों की पृष्ठभूमि में भूमि हस्तांतरण पर विशेष कानूनी सुरक्षा बनी। लेकिन बीसवीं सदी में यही क्षेत्र कोयला, इस्पात और भारी उद्योग का केंद्र भी बना।

जमशेदपुर, बोकारो, धनबाद, रांची और आसपास के क्षेत्रों में औद्योगिक तथा खनन विस्तार ने भूमि अधिग्रहण को लगातार महत्वपूर्ण बनाया।

रांची में स्थापित भारी इंजीनियरिंग निगम इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। 2014 की जनजातीय मामलों की उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार इस परियोजना के लिए 7,748.80 एकड़ भूमि अधिग्रहित हुई; 13 गांव पूर्ण और 22 आंशिक रूप से विस्थापित हुए तथा 3,090 विस्थापित परिवारों में 2,274 उरांव और मुंडा परिवार थे। रिपोर्ट ने अधिग्रहित भूमि के एक हिस्से के अनुपयोगी रह जाने का भी उल्लेख किया।

यह उदाहरण एक और प्रश्न उठाता है—

यदि “सार्वजनिक प्रयोजन” के लिए ली गई जमीन पूरी तरह उपयोग में न आए तो उसका क्या होना चाहिए?

यह प्रश्न बाद में भूमि अधिग्रहण कानून की बहस में बार-बार उठा।

ओडिशा : बॉक्साइट, इस्पात और पहाड़ का अधिकार

ओडिशा में खनन विवादों ने आदिवासी भूमि-अधिकार को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में पहुंचाया।

विशेषकर दक्षिण और पश्चिमी ओडिशा के बॉक्साइट क्षेत्रों में पहाड़ केवल खनिज भंडार नहीं थे। वे जल-स्रोत, वन अर्थव्यवस्था और स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन का आधार भी थे।

काशीपुर क्षेत्र में बॉक्साइट और एल्युमिनियम परियोजनाओं के विरुद्ध आंदोलन ने औद्योगिक विकास और स्थानीय अधिकार के संघर्ष को तीखा किया।

लेकिन इस पूरे विमर्श का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण बना—

नियमगिरि।

खंड 4

नर्मदा : विकास प्रतिमान पर राष्ट्रीय और न्यायिक बहस

नर्मदा घाटी विकास परियोजना

नर्मदा नदी पर अनेक बांधों की योजना बनी, जिनमें सरदार सरोवर सबसे अधिक विवादित हुआ।

समर्थकों का तर्क था कि परियोजना से सिंचाई, पेयजल और बिजली के बड़े लाभ मिलेंगे। विशेष रूप से जल-अभाव वाले क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने को इसका प्रमुख सामाजिक लाभ बताया गया।

विरोध का केंद्र था—

भूमि डूबना, आदिवासी गांवों का विस्थापन, जंगल की क्षति, पर्यावरणीय प्रभाव और पुनर्वास की पर्याप्तता।

यहीं से नर्मदा बचाओ आंदोलन राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन बना।

नर्मदा बचाओ आंदोलन की ऐतिहासिक भूमिका

नर्मदा आंदोलन का महत्व केवल सरदार सरोवर की ऊंचाई पर हुए विवाद में नहीं था।

इस आंदोलन ने विकास की गणना बदलने की मांग की।

यदि बांध से दस लाख लोगों को लाभ हो लेकिन हजारों परिवार अपनी भूमि और गांव खो दें, तो लाभार्थियों की संख्या मात्र से परियोजना न्यायपूर्ण सिद्ध नहीं होती। प्रभावित समुदाय की लागत को भी समान गंभीरता से मापना आवश्यक है।

आंदोलन ने विशेष रूप से उठाया—

जमीन के बदले जमीन, पुनर्वास, पर्यावरणीय अध्ययन, प्रभावित गांवों की सुनवाई और परियोजना के विकल्प।

यहीं भारतीय सार्वजनिक विमर्श में “विकास-जनित विस्थापन” एक स्वतंत्र राजनीतिक अवधारणा बनकर उभरा।

विश्व बैंक और मोर्स समीक्षा

सरदार सरोवर को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता भी मिली थी।

लगातार विवाद के बाद विश्व बैंक ने परियोजना की स्वतंत्र समीक्षा कराई। 1992 की मोर्स समीक्षा ने पुनर्वास और पर्यावरण संबंधी गंभीर कमियों की ओर संकेत किया। विश्व बैंक के अपने ऐतिहासिक अभिलेख के अनुसार भारत सरकार के अनुरोध पर 1993 में शेष ऋण रद्द कर दिया गया।

इस घटना का अंतरराष्ट्रीय महत्व था।

अब किसी बड़े बांध को केवल राष्ट्रीय सरकार और इंजीनियरिंग एजेंसी के बीच का मामला मानना संभव नहीं था। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था को भी पर्यावरणीय और सामाजिक जवाबदेही का सामना करना पड़ा।

नर्मदा और सर्वोच्च न्यायालय

विवाद अंततः सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा।

न्यायालय के सामने कठिन संतुलन था। एक तरफ निर्वाचित सरकार की विकास नीति थी, दूसरी ओर विस्थापित लोगों के अधिकार और पर्यावरणीय अनुपालन।

अदालत ने परियोजना को पूरी तरह रोकने का रास्ता नहीं अपनाया और विभिन्न चरणों में शर्तों तथा पुनर्वास संबंधी आवश्यकताओं के साथ निर्माण आगे बढ़ने दिया।

नर्मदा विवाद का स्थायी महत्व यही है कि इसके बाद पुनर्वास परियोजना का परिशिष्ट नहीं बल्कि परियोजना न्यायसंगत होने की कसौटी बन गया।

खंड 5

संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची

अनुच्छेद 244 और पांचवीं अनुसूची

संविधान निर्माताओं ने यह स्वीकार किया कि आदिवासी क्षेत्रों की सामाजिक और भूमि संबंधी परिस्थितियां विशेष सुरक्षा मांगती हैं।

अनुच्छेद 244(1) के साथ पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन की विशेष व्यवस्था करती है।

पांचवीं अनुसूची में राज्यपाल को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन पर राष्ट्रपति को रिपोर्ट तथा जनजातीय सलाहकार परिषद जैसी व्यवस्थाएं इसी संरचना का हिस्सा हैं।

विशेष रूप से महत्वपूर्ण है भूमि हस्तांतरण को प्रतिबंधित अथवा नियंत्रित करने की राज्यपाल की विनियामक शक्ति।

यह सामान्य भूमि कानून से अलग संवैधानिक दर्शन है—

आदिवासी भूमि की रक्षा के लिए बाजार की सामान्य स्वतंत्रता पर भी प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

छठी अनुसूची : स्वायत्तता का दूसरा मॉडल

पूर्वोत्तर भारत के कुछ जनजातीय क्षेत्रों के लिए संविधान की छठी अनुसूची ने अलग व्यवस्था बनाई।

इसमें स्वायत्त जिला और क्षेत्रीय परिषदों को विधायी तथा प्रशासनिक अधिकार दिए गए।

इसलिए “आदिवासी भूमि कानून” को पूरे भारत में एक समान समझना गलत होगा।

पांचवीं अनुसूची वाले मध्य भारतीय क्षेत्रों और छठी अनुसूची वाले पूर्वोत्तर क्षेत्रों की संवैधानिक संरचना अलग है।

यही अंतर बांध, खनन और भूमि परियोजनाओं के विश्लेषण में भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

खंड 6

वन संरक्षण और समता निर्णय

वन संरक्षण कानून, 1980

1980 का वन संरक्षण कानून एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था। इसने वनभूमि को गैर-वन प्रयोजन में बदलने के लिए केंद्रीय स्वीकृति की व्यवस्था स्थापित की। वर्तमान इंडिया कोड में यही कानून संशोधित नाम वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के रूप में उपलब्ध है।

इससे बांध, खदान, सड़क और उद्योग जैसी परियोजनाओं के लिए वनभूमि का उपयोग केवल राज्य स्तर का प्रशासनिक निर्णय नहीं रहा।

लेकिन वन संरक्षण और वनवासियों के अधिकार एक ही प्रश्न नहीं थे।

वन को बचाना और जंगल में रहने वाले समुदाय के अधिकार को मान्यता देना—दो अलग कानूनी चुनौतियां थीं।

दूसरी चुनौती का व्यापक उत्तर 2006 में आया।

समता बनाम आंध्र प्रदेश, 1997

भारतीय आदिवासी भूमि-अधिकार के न्यायिक इतिहास में समता बनाम आंध्र प्रदेश अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला है।

विवाद अनुसूचित क्षेत्र में खनन पट्टों और आंध्र प्रदेश अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण विनियम से संबंधित था।

सर्वोच्च न्यायालय की बहुमत पीठ ने संबंधित विनियम की व्यापक व्याख्या करते हुए राज्य द्वारा गैर-आदिवासी निजी पक्षों के पक्ष में खनन पट्टा देने को भी “हस्तांतरण” के दायरे में माना।

इससे अनुसूचित क्षेत्र में आदिवासी भूमि संरक्षण को मजबूत न्यायिक आधार मिला।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण शोध-सावधानी आवश्यक है।

समता को पूरे भारत के सभी अनुसूचित क्षेत्रों में निजी खनन पर स्वतः लागू पूर्ण संवैधानिक प्रतिबंध मानना सही नहीं है।

बाद के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में स्वयं यह स्पष्ट किया गया कि समता में आंध्र प्रदेश के विशेष भूमि हस्तांतरण विनियम की व्याख्या हुई थी और जहां दूसरे राज्य का कानून वैसा नहीं है, वहां वही निष्कर्ष स्वतः लागू नहीं होता।

यह कानूनी सूक्ष्मता अत्यंत महत्वपूर्ण है।

खंड 7

पेसा, ग्रामसभा और परामर्श–सहमति का प्रश्न

पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996

1996 का पेसा कानून आदिवासी स्वशासन की दिशा में ऐतिहासिक कदम था।

73वें संविधान संशोधन की पंचायती राज व्यवस्था को अनुसूचित क्षेत्रों की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप विस्तारित करते हुए पेसा ने ग्रामसभा को केंद्रीय स्थान दिया।

इसका दर्शन यह था कि आदिवासी गांव केवल प्रशासन की सबसे निचली इकाई नहीं है; उसकी अपनी सामाजिक संस्थाएं, परंपराएं और सामुदायिक संसाधन हैं।

केंद्रीय कानून अनुसूचित क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण और प्रभावित व्यक्तियों के पुनर्वास से पहले ग्रामसभा अथवा उपयुक्त स्तर की पंचायत से परामर्श की व्यवस्था करता है। केंद्र सरकार ने 2025 और अगस्त 2026 में भी इस प्रावधान को आधिकारिक रूप से दोहराया है।

परामर्श और सहमति का अंतर

यहीं अक्सर तथ्यात्मक गलती होती है।

पेसा के भूमि अधिग्रहण संबंधी केंद्रीय प्रावधान में शब्द परामर्श है, प्रत्येक परिस्थिति में अनिवार्य “सहमति” नहीं।

दूसरे कानूनों, नियमों, परियोजना श्रेणियों और वन अधिकार प्रक्रियाओं में ग्रामसभा की भूमिका अलग हो सकती है।

इसलिए प्रत्येक परियोजना में लागू कानून अलग देखकर ही यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि ग्रामसभा से परामर्श, संस्तुति अथवा सहमति में से क्या आवश्यक है।

खंड 8

वन अधिकार कानून और बेदखली से सुरक्षा

“ऐतिहासिक अन्याय” की कानूनी स्वीकृति

2006 का अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी वन अधिकारों की मान्यता अधिनियम भारतीय वन शासन में बुनियादी परिवर्तन था।

इस कानून ने स्वीकार किया कि औपनिवेशिक और स्वतंत्रता-उत्तर वन व्यवस्थाओं में वनवासियों के परंपरागत अधिकार पर्याप्त रूप से दर्ज नहीं किए गए।

कानून व्यक्तिगत खेती संबंधी अधिकार तक सीमित नहीं है।

इसमें सामुदायिक अधिकार और सामुदायिक वन संसाधन की अवधारणा भी है। कानून की परिभाषा में परंपरागत ग्राम सीमा के भीतर ऐसी साझा वनभूमि भी शामिल है जिस तक समुदाय की पारंपरिक पहुंच रही हो।

इसका महत्व खनन और बांध दोनों के लिए बहुत बड़ा है।

किसी जंगल को सरकारी रिकॉर्ड में “सरकारी वनभूमि” लिख देने भर से वहां रहने वाले समुदाय के अधिकार समाप्त नहीं माने जा सकते।

पहले यह निर्धारित करना आवश्यक हो सकता है कि वहां मान्यता योग्य वन अधिकार मौजूद हैं या नहीं।

बेदखली के विरुद्ध सुरक्षा

वन अधिकार कानून की धारा 4(5) का विशेष महत्व है।

केंद्र सरकार ने अगस्त 2026 में संसद में पुनः स्पष्ट किया कि वन अधिकारों की मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक किसी वनवासी अनुसूचित जनजाति अथवा अन्य परंपरागत वन निवासी को उसके कब्जे वाली वनभूमि से बेदखल या हटाया नहीं जाना चाहिए।

इस प्रावधान ने परियोजना स्वीकृति और भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया में एक नया प्रश्न जोड़ा—

क्या प्रभावित वन समुदाय के अधिकार पहले निर्धारित किए गए हैं?

खंड 9

नियमगिरि से हसदेव तक खनन-विरोधी संघर्ष

डोंगरिया कोंध और नियमगिरि

ओडिशा की नियमगिरि पहाड़ियां बॉक्साइट भंडार के कारण खनन परियोजना के केंद्र में आईं।

लेकिन डोंगरिया कोंध समुदाय के लिए नियमगिरि केवल खनिजयुक्त भूगर्भीय संरचना नहीं थी।

वह जल, जंगल, आजीविका, सामाजिक पहचान और धार्मिक विश्वास से जुड़ा भू-दृश्य था।

यहीं आधुनिक विकास की दो मूल्य प्रणालियां आमने-सामने आईं—

एक तरफ पहाड़ का आर्थिक मूल्य; दूसरी तरफ पहाड़ का सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्य।

सर्वोच्च न्यायालय और ग्रामसभाएं

2013 के ओडिशा खनन निगम मामले ने इस विवाद को ऐतिहासिक बना दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने वन अधिकार कानून के अंतर्गत समुदायों के धार्मिक और सामुदायिक अधिकारों के निर्धारण में ग्रामसभा की भूमिका को महत्व दिया।

इसके बाद संबंधित ग्रामसभाओं ने प्रस्तावित खनन का विरोध किया।

नियमगिरि ने भारतीय भूमि-अधिकार विमर्श में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया—

किसी भूभाग का मूल्य केवल उसका बाजार मूल्य अथवा जमीन के नीचे मौजूद खनिज नहीं है।

उसका सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामुदायिक अर्थ भी कानून और नीति में प्रासंगिक हो सकता है।

काशीपुर से हसदेव तक

ओडिशा के काशीपुर में बॉक्साइट परियोजनाओं के विरोध, झारखंड के विभिन्न खनन क्षेत्रों, छत्तीसगढ़ के लौह अयस्क और कोयला क्षेत्रों तथा बाद के वर्षों में हसदेव अरण्य से जुड़े विवादों ने यही मूल प्रश्न अलग-अलग रूपों में उठाया।

खनन समर्थक पक्ष का तर्क भी गंभीर है।

भारत को बिजली चाहिए। इस्पात चाहिए। एल्युमिनियम चाहिए। रेलवे, सड़क, रक्षा, आवास, बिजली तंत्र और आधुनिक विनिर्माण खनिजों के बिना नहीं चल सकते।

ऊर्जा संक्रमण स्वयं तांबा, लिथियम, निकल, कोबाल्ट और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की मांग बढ़ाता है।

इसलिए समाधान “खनन बिल्कुल नहीं” जितना सरल नहीं हो सकता।

वास्तविक प्रश्न है—

खनन कहां हो, किस पर्यावरणीय लागत पर हो, स्थानीय समुदाय की भूमिका क्या हो और उससे पैदा होने वाली संपदा में उस क्षेत्र की हिस्सेदारी कितनी हो?

खंड 10

औपनिवेशिक भूमि अधिग्रहण से 2013 के अधिकार-कानून तक

1894 का भूमि अधिग्रहण अधिनियम

ब्रिटिश काल का भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 स्वतंत्रता के बाद भी दशकों तक भारत की प्रमुख अधिग्रहण व्यवस्था बना रहा।

राज्य “सार्वजनिक प्रयोजन” के लिए निजी भूमि अधिग्रहित कर सकता था।

लेकिन आधुनिक विकास के विस्तार के साथ इसकी सीमाएं स्पष्ट होने लगीं।

भूमि का बाजार मूल्य देना और वास्तविक सामाजिक नुकसान की भरपाई करना अलग-अलग बातें थीं।

विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में भूमि का रिकॉर्डेड मालिक ही एकमात्र प्रभावित व्यक्ति नहीं होता।

भूमिहीन मजदूर, वन उत्पाद एकत्र करने वाला परिवार, चरवाहा, कारीगर और साझा वन पर निर्भर महिला—सभी प्रभावित हो सकते हैं।

लेकिन पारंपरिक अधिग्रहण कानून भूमि के स्वामित्व को केंद्र में रखता था।

यही उसका मूल संरचनात्मक दोष था।

नया कानून क्यों आवश्यक हुआ?

नर्मदा जैसे आंदोलनों, देश भर के अधिग्रहण विवादों और विशेष रूप से इक्कीसवीं सदी के सिंगूर, नंदीग्राम, भट्टा-पारसौल तथा अन्य संघर्षों ने 1894 के कानून की राजनीतिक वैधता को गंभीर चुनौती दी।

परिणाम था—

भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013।

यह 1 जनवरी 2014 से लागू हुआ।

2013 कानून का वैचारिक परिवर्तन

इस कानून के लंबे शीर्षक में ही परिवर्तन की पूरी दिशा दिखाई देती है।

कानून भूमि अधिग्रहण को मानवीय, सहभागी, सूचित और पारदर्शी प्रक्रिया बनाने; प्रभावित परिवारों को उचित प्रतिकर देने; पुनर्वास और पुनर्स्थापन सुनिश्चित करने तथा अधिग्रहण के बाद प्रभावित लोगों को विकास में भागीदार बनाने की बात करता है।

यह 1894 से बहुत बड़ा वैचारिक परिवर्तन था।

पुराना मॉडल था—

राज्य भूमि लेता है → मुआवजा देता है।

नया आदर्श बना—

सामाजिक प्रभाव का आकलन → सहभागिता → अधिग्रहण → उचित प्रतिकर → पुनर्वास → पुनर्स्थापन → विकास में भागीदारी।

यद्यपि व्यवहार में इस आदर्श की पूर्ण प्राप्ति अलग प्रश्न है।

खंड 11

मुआवजा, महिलाएं, भूमिहीन और आजीविका-पुनर्वास

जमीन केवल संपत्ति क्यों नहीं?

आदिवासी और ग्रामीण भूमि-अधिकार आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक उपलब्धि यह है कि उसने भूमि के पांच अलग मूल्य सामने रखे—

आर्थिक मूल्य, आजीविका मूल्य, सामाजिक मूल्य, सांस्कृतिक मूल्य और भविष्य की सुरक्षा का मूल्य।

बाजार मूल्य मुख्यतः पहले को मापता है।

बाकी चार का मूल्यांकन कठिन है।

एक किसान को दस लाख रुपये देकर उसकी भूमि ली जा सकती है। लेकिन यदि पैसा कुछ वर्षों में समाप्त हो गया और उसके पास स्थायी रोजगार नहीं है तो वह संपत्ति-मालिक से मजदूर बन सकता है।

यही कारण है कि पुनर्वास नीति में जमीन के बदले जमीन की मांग इतनी महत्वपूर्ण बनी।

महिलाओं की अदृश्य क्षति

विस्थापन का लैंगिक पक्ष लंबे समय तक पर्याप्त महत्व नहीं पा सका।

भूमि का कानूनी स्वामित्व अक्सर पुरुष के नाम होता है, लेकिन ग्रामीण और आदिवासी अर्थव्यवस्था में महिलाओं की निर्भरता साझा संसाधनों पर अधिक हो सकती है।

ईंधन, पानी, पशुचारा, खाद्य वन उत्पाद और औषधीय पौधों तक पहुंच समाप्त होने से महिला का कार्यभार बढ़ सकता है।

यदि मुआवजा केवल भूमि-स्वामी को मिलता है तो वह महिला जिसने उसी भूमि और जंगल पर अपना पूरा आर्थिक जीवन आधारित किया था, कानूनी रूप से “भूमि-विहीन प्रभावित” बन सकती है।

इसलिए आधुनिक पुनर्वास नीति में परिवार और आजीविका की व्यापक परिभाषा अत्यंत आवश्यक है।

भूमिहीनों की समस्या

इसी तरह खेतिहर मजदूर, बटाईदार, मछुआरे, चरवाहे और वन-निर्भर लोग परियोजना से आजीविका खो सकते हैं, भले उनकी कोई भूमि अधिग्रहित न हुई हो।

इसने “भूमि विस्थापित” और “परियोजना प्रभावित” के बीच महत्वपूर्ण अंतर पैदा किया।

2013 के कानून की बड़ी उपलब्धियों में से एक प्रभावित परिवार की अवधारणा को केवल दर्ज भूमिधर तक सीमित न रखना था।

मकान देना पुनर्वास नहीं

पुनर्वास की विफलता का सबसे बड़ा कारण इसे आवास निर्माण समझना रहा है।

वास्तविक पुनर्वास के कम से कम छह आयाम हैं—

भूमि अथवा वैकल्पिक आजीविका, आवास, पानी, शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी सार्वजनिक सुविधाएं, सामुदायिक संबंधों का पुनर्निर्माण, और दीर्घकालिक आय।

सरकारी समितियों ने भी इस समस्या को पहचाना है। जनजातीय मामलों से संबंधित रिपोर्टों में परियोजना विस्थापन के कारण भूमिहीनता, रोजगार हानि और सामुदायिक संसाधनों से वंचित होने की समस्या दर्ज है।

खंड 12

पोलावरम और निर्णयकारी ग्रामसभा

बांध विवाद समाप्त नहीं हुए

यह मानना गलत होगा कि नर्मदा के बाद बड़े बांध और आदिवासी विस्थापन का प्रश्न समाप्त हो गया।

पोलावरम जैसी परियोजनाओं में आदिवासी क्षेत्रों, पुनर्वास, डूब क्षेत्र और अंतरराज्यीय प्रभावों से जुड़े प्रश्न लंबे समय तक विवाद का विषय बने रहे।

इसी प्रकार जलविद्युत परियोजनाओं में हिमालयी पारिस्थितिकी, वनभूमि, स्थानीय आजीविका और पुनर्वास के प्रश्न सामने आए।

इससे स्पष्ट है कि नर्मदा किसी समाप्त युग का संघर्ष नहीं था।

उसने भविष्य के बांधों के मूल्यांकन की भाषा बदल दी।

सबसे बड़ा संस्थागत परिवर्तन

यदि बांध और खनन संघर्षों की एक सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालिक उपलब्धि चुननी हो तो वह शायद ग्रामसभा की बढ़ी हुई कानूनी भूमिका होगी।

औपनिवेशिक व्यवस्था में स्थानीय समुदाय प्रशासन का विषय था।

स्वतंत्र भारत के शुरुआती विकास मॉडल में वह परियोजना का लाभार्थी अथवा विस्थापित था।

पेसा और वन अधिकार कानून के बाद वह सिद्धांततः अधिकारधारी भी है।

यात्रा इस प्रकार हुई—

प्रजा → नागरिक → परियोजना प्रभावित व्यक्ति → अधिकारधारी → निर्णय प्रक्रिया का सहभागी।

लेकिन व्यवहार में यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है।

खंड 13

जिला खनिज प्रतिष्ठान : लाभ-साझेदारी और सीमाएं

खनन लाभ-साझेदारी की नई अवधारणा

खनन क्षेत्र की एक पुरानी शिकायत थी—

खनिज हमारे क्षेत्र से जाता है, राजस्व सरकार को मिलता है, लाभ उद्योग को मिलता है, लेकिन प्रदूषण और विस्थापन हमारे हिस्से आता है।

इस असमानता को कम करने के लिए खान और खनिज कानून में जिला खनिज प्रतिष्ठान—डीएमएफ की व्यवस्था विकसित हुई।

एमएमडीआर अधिनियम की धारा 9बी राज्य सरकारों को खनन से प्रभावित व्यक्तियों और क्षेत्रों के हित तथा लाभ के लिए जिला खनिज प्रतिष्ठान स्थापित करने की शक्ति देती है।

इसके साथ प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना जुड़ी।

डीएमएफ का पैमाना

यह अब मामूली योजना नहीं रही।

केंद्र सरकार के अनुसार नवंबर 2024 तक देश के डीएमएफ में संचयी रूप से ₹1,02,083.03 करोड़ एकत्र हुए थे। लगभग ₹87,357 करोड़ की परियोजनाएं स्वीकृत और ₹54,892 करोड़ खर्च किए जा चुके थे।

2024 के संशोधित दिशा-निर्देशों में कम-से-कम 70 प्रतिशत धन सीधे प्रभावित क्षेत्रों और उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर केंद्रित करने सहित जवाबदेही के अतिरिक्त प्रावधान किए गए। अनुसूचित क्षेत्रों में डीएमएफ व्यय को पांचवीं–छठी अनुसूची, पेसा और वन अधिकार कानून के अनुरूप संचालित करने की बात भी स्पष्ट की गई।

यह भारतीय संसाधन नीति में महत्वपूर्ण वैचारिक बदलाव है।

अब सिद्धांत यह है—

जिस क्षेत्र से खनिज निकले, उस क्षेत्र को खनिज अर्थव्यवस्था के लाभ में विशेष हिस्सा मिलना चाहिए।

पैसा ही भागीदारी नहीं है

डीएमएफ की सफलता केवल संग्रहित राशि से नहीं मापी जा सकती।

तीन प्रश्न निर्णायक हैं—

क्या पैसा सबसे अधिक प्रभावित गांवों तक पहुंचता है?

क्या स्थानीय समुदाय अपनी प्राथमिकताएं निर्धारित करता है?

क्या धन अस्पताल और सड़क जैसी सामान्य सरकारी जिम्मेदारियों की जगह ले रहा है या खनन से पैदा हुई अतिरिक्त सामाजिक-पर्यावरणीय क्षति की भरपाई कर रहा है?

2024 के संशोधित दिशा-निर्देशों में ग्रामसभा और स्थानीय निकायों को योजना निर्माण में सहयोग देने तथा लेखा-परीक्षा और निगरानी बढ़ाने की व्यवस्था इसीलिए महत्वपूर्ण है।

इससे एक सिद्धांत स्पष्ट होता है—

राजस्व-साझेदारी और निर्णय-साझेदारी अलग-अलग चीजें हैं।

खंड 14

बांध–खनन की आवश्यकता और पर्यावरणीय न्याय

बांध क्यों बनते हैं?

संतुलित इतिहास में केवल आंदोलनकारी पक्ष लिखना पर्याप्त नहीं होगा।

बांधों के पक्ष में वास्तविक सार्वजनिक तर्क मौजूद हैं—

सिंचाई, पेयजल, जल भंडारण, जलविद्युत, बाढ़ नियंत्रण और क्षेत्रीय विकास।

जलवायु परिवर्तन के युग में जल-संग्रह और ऊर्जा सुरक्षा के प्रश्न और जटिल हो रहे हैं।

इसलिए हर बांध को स्वभावतः अन्यायपूर्ण मान लेना उतना ही असंतुलित होगा जितना हर बांध को स्वभावतः विकासकारी मान लेना।

खनन क्यों आवश्यक है?

इसी प्रकार खनन के बिना आधुनिक अर्थव्यवस्था संभव नहीं है।

इस्पात के बिना रेल, पुल और भवन नहीं बन सकते।

एल्युमिनियम के बिना आधुनिक परिवहन और अनेक औद्योगिक क्षेत्र प्रभावित होंगे।

कोयला लंबे समय तक भारतीय विद्युत व्यवस्था का प्रमुख आधार रहा है।

और हरित ऊर्जा की ओर संक्रमण भी खनन समाप्त नहीं करता; बल्कि अनेक महत्वपूर्ण खनिजों की नई मांग पैदा करता है।

इसलिए प्रश्न—

खनन बनाम खनन-विरोध

नहीं बल्कि—

न्यायपूर्ण, पर्यावरणीय रूप से स्वीकार्य और समुदाय-सम्मत संसाधन उपयोग

है।

जंगल बचाने वाला कौन?

कई बार विकास विवाद को तीन पक्षों में बांट दिया जाता है—

सरकार और उद्योग विकास चाहते हैं; पर्यावरणवादी जंगल बचाना चाहते हैं; आदिवासी स्थानीय अधिकार चाहते हैं।

वास्तविकता इससे अधिक जटिल है।

आदिवासी समुदाय का जंगल संरक्षण उसके आर्थिक जीवन से जुड़ा हो सकता है।

पर्यावरणीय संरक्षण नीति कभी-कभी स्वयं स्थानीय समुदाय के वन उपयोग पर प्रतिबंध लगा सकती है।

इसलिए आदिवासी अधिकार और पर्यावरण संरक्षण हमेशा स्वतः समानार्थी नहीं हैं।

वन अधिकार कानून का महत्व इसी कारण है—यह संरक्षण और समुदाय के अधिकारों के बीच संतुलन खोजने का प्रयास करता है।

खंड 15

2026 का नया खनिज संदर्भ और सरकारी स्थिति

खनिज सुरक्षा का नया युग

2020 के दशक में खनन नीति में नया आयाम जुड़ा—महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिज।

ऊर्जा संक्रमण, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, रक्षा और उच्च प्रौद्योगिकी ने खनिज सुरक्षा को राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा बना दिया।

इसी क्रम में खनन कानून में लगातार संशोधन हुए।

अगस्त 2026 में संसद ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पारित किया। यह 10 अगस्त को लोकसभा में पेश हुआ, 12 अगस्त को लोकसभा और 13 अगस्त को राज्यसभा से पारित हुआ।

इससे यह स्पष्ट है कि आदिवासी भूमि और खनन का प्रश्न भविष्य में कम नहीं होने वाला।

बल्कि महत्वपूर्ण खनिजों की बढ़ती मांग इसे और महत्वपूर्ण बनाएगी।

आदिवासी भूमि और परियोजनाओं पर केंद्र का ताजा स्पष्टीकरण

6 अगस्त 2026 को लोकसभा में जनजातीय कार्य मंत्रालय ने आदिवासी भूमि-अधिकार और परियोजनाओं में सहमति/परामर्श संबंधी प्रश्न के उत्तर में कई महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट कीं।

केंद्र ने कहा कि भूमि और उसका प्रबंधन संविधान की राज्य सूची का विषय है; भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास विभिन्न केंद्रीय और राज्य कानूनों के अंतर्गत होते हैं।

सरकार ने पेसा, वन अधिकार कानून तथा भूमि अधिग्रहण-पुनर्वास कानून सहित लागू सुरक्षा व्यवस्थाओं का उल्लेख किया और यह भी दोहराया कि वन अधिकार कानून के तहत अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया पूरी होने से पहले पात्र दावेदारों को हटाया नहीं जाना चाहिए।

इसका अर्थ है कि 2026 में भी मूल विवाद वही है—

विकास परियोजना की वैधानिक स्वीकृति और स्थानीय अधिकारों की वैधानिक पूर्ति—दोनों आवश्यक प्रक्रियाएं हैं।

खंड 16

आंदोलनों की प्रमुख उपलब्धियां

आंदोलन क्या बदल पाए?

बांध, खनन और आदिवासी भूमि आंदोलनों की उपलब्धियों को केवल इस आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए कि कितनी परियोजनाएं रुकीं।

इन आंदोलनों ने भारतीय शासन की भाषा बदल दी।

पहला परिवर्तन—पुनर्वास। विस्थापन अब केवल मुआवजे का प्रश्न नहीं रहा।

दूसरा—सामाजिक प्रभाव। परियोजना की लागत में सामाजिक क्षति भी शामिल हुई।

तीसरा—ग्रामसभा। स्थानीय समुदाय निर्णय प्रक्रिया की वैधानिक इकाई बना।

चौथा—वन अधिकार। रिकॉर्ड में दर्ज न रहे परंपरागत अधिकारों को मान्यता देने का ढांचा बना।

पांचवां—सामुदायिक अधिकार। भूमि केवल व्यक्तिगत पट्टा नहीं; साझा जंगल और संसाधन भी अधिकार का विषय बने।

छठा—लाभ-साझेदारी। डीएमएफ ने खनिज संपदा में प्रभावित क्षेत्र के विशेष दावे को संस्थागत रूप दिया।

सातवां—न्यायिक समीक्षा। समता और नियमगिरि जैसे मामलों ने संवैधानिक सुरक्षा और ग्रामसभा को न्यायिक विमर्श के केंद्र में रखा।

आठवां—भूमि अधिग्रहण कानून का परिवर्तन। 1894 की औपनिवेशिक व्यवस्था की जगह 2013 में अधिकार, पारदर्शिता और पुनर्वास केंद्रित कानून आया।

खंड 17

क्रियान्वयन और आंदोलनों की सीमाएं

कानून होने के बावजूद संघर्ष क्यों जारी है?

कानून बनना और जमीन पर अधिकार मिलना अलग-अलग चरण हैं।

सबसे बड़ी समस्या क्रियान्वयन है।

वन अधिकार दावे लंबित रह सकते हैं।

भूमि रिकॉर्ड अधूरे हो सकते हैं।

ग्रामसभा की बैठक की प्रक्रिया विवादित हो सकती है।

परियोजना प्रभावित क्षेत्र की सीमा पर विवाद हो सकता है।

मुआवजे की गणना पर असहमति हो सकती है।

पुनर्वास स्थल आजीविका से दूर हो सकता है।

डीएमएफ का पैसा समुदाय की वास्तविक प्राथमिकताओं पर खर्च न हो सकता है।

यानी कानून ने संघर्ष समाप्त नहीं किया; उसने संघर्ष की नई संवैधानिक भाषा उपलब्ध कराई।

आंदोलन की अपनी सीमाएं

आंदोलनकारी पक्ष का आलोचनात्मक मूल्यांकन भी आवश्यक है।

हर स्थानीय समुदाय किसी परियोजना के विरुद्ध एकमत नहीं होता।

कुछ परिवार बेहतर मुआवजा चाहते हैं, परियोजना समाप्त करना नहीं।

कुछ युवा औद्योगिक रोजगार को अवसर मान सकते हैं।

भूमिधर और भूमिहीन के हित अलग हो सकते हैं।

स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व, गैर-सरकारी संगठन, दल और बाहरी कार्यकर्ता भी आंदोलन की दिशा प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए “राज्य बनाम आदिवासी” का सरल द्वैत कई मामलों की वास्तविक जटिलता को छिपा देता है।

खंड 18

प्रमुख ऐतिहासिक समयरेखा

बांध–खनन–आदिवासी भूमि अधिकार : प्रमुख ऐतिहासिक पड़ाव

औपनिवेशिक काल — वन और राजस्व कानूनों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य नियंत्रण का विस्तार।

1831–32 — कोल विद्रोह।

1855–56 — संथाल हूल।

1899–1900 — मुंडा उलगुलान।

1908 — छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम।

1910 — बस्तर भूमकाल; जंगल और औपनिवेशिक नियंत्रण के विरुद्ध व्यापक प्रतिरोध।

1947 के बाद — बड़े बांधों और भारी औद्योगिकीकरण का युग।

1948–57 के आसपास — हीराकुंड परियोजना और बड़े पैमाने के पुनर्वास प्रश्न।

1950–60 के दशक — दामोदर, रिहंद, भारी उद्योग, इस्पात और खनन क्षेत्रों का विस्तार।

1970–80 के दशक — विकास-जनित विस्थापन राष्ट्रीय सामाजिक प्रश्न के रूप में उभरता है।

1980 — वन संरक्षण कानून; वनभूमि के गैर-वन उपयोग पर केंद्रीय नियंत्रण मजबूत।

1980 के दशक — नर्मदा बचाओ आंदोलन का उभार।

1992 — सरदार सरोवर की स्वतंत्र मोर्स समीक्षा प्रकाशित।

1993 — विश्व बैंक का शेष सरदार सरोवर ऋण भारत के अनुरोध पर रद्द।

1996 — पेसा कानून।

1997 — समता निर्णय।

2000 के दशक — ओडिशा और अन्य क्षेत्रों में खनन विरोधी संघर्षों का विस्तार।

2006 — वन अधिकार अधिनियम।

2013 — नियमगिरि पर सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय और ग्रामसभा प्रक्रिया।

2013 — नया भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन कानून।

1 जनवरी 2014 — 2013 कानून प्रभावी।

2015 — जिला खनिज प्रतिष्ठान और प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना का नया ढांचा प्रमुखता से लागू।

2024 — डीएमएफ/प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना के संशोधित दिशा-निर्देश।

2025 — केंद्र ने संसद में पांचवीं अनुसूची, पेसा, वन अधिकार कानून और डीएमएफ के परस्पर संबंध को फिर स्पष्ट किया।

6 अगस्त 2026 — केंद्र सरकार ने लोकसभा में आदिवासी भूमि-अधिकार, पेसा परामर्श और वन अधिकार सुरक्षा संबंधी वर्तमान स्थिति स्पष्ट की।

अगस्त 2026 — खनन कानून में नया संशोधन संसद से पारित; महत्वपूर्ण खनिजों और संसाधन सुरक्षा की नई बहस के बीच भूमि-अधिकार प्रश्न और प्रासंगिक।

खंड 19

मुआवजे से संसाधन-न्याय तक

समेकित मूल्यांकन : मुआवजे से संसाधन-न्याय तक

इस पूरे इतिहास को एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है कि भारतीय बांध, खनन और आदिवासी भूमि आंदोलन की यात्रा “कितना मुआवजा?” से “संसाधन पर अधिकार किसका?” तक की यात्रा है।

पहला चरण था—

राज्य भूमि ले सकता है; प्रश्न केवल मुआवजे का है।

दूसरा चरण—

मुआवजा पर्याप्त नहीं; पुनर्वास आवश्यक है।

तीसरा—

पुनर्वास भी पर्याप्त नहीं; आजीविका पुनर्स्थापित होनी चाहिए।

चौथा—

आजीविका के साथ सामुदायिक और वन अधिकार भी मान्य होने चाहिए।

पांचवां—

निर्णय प्रक्रिया में ग्रामसभा की भूमिका होनी चाहिए।

छठा—

जिस संसाधन से संपदा पैदा होती है, उसके लाभ में स्थानीय समुदाय की हिस्सेदारी होनी चाहिए।

और आज प्रश्न सातवें चरण में प्रवेश कर चुका है—

क्या स्थानीय समुदाय को विकास का मुआवजा पाने वाला पीड़ित नहीं बल्कि विकास का अधिकार-संपन्न साझेदार बनाया जा सकता है?

खंड 20

अधिकार-सम्मत विकास : निष्कर्ष

निष्कर्ष : विकास बनाम अधिकार नहीं—अधिकार-सम्मत विकास

भारत बांध बनाना बंद नहीं कर सकता।

खनन भी समाप्त नहीं कर सकता।

एक आधुनिक अर्थव्यवस्था को पानी, बिजली, इस्पात, एल्युमिनियम और महत्वपूर्ण खनिजों की आवश्यकता है।

लेकिन भारत अब उस दौर में भी वापस नहीं जा सकता जब किसी गांव को परियोजना मानचित्र पर केवल “डूब क्षेत्र” और जंगल को केवल “खनिज ब्लॉक” माना जा सके।

संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूचियां, पेसा, वन अधिकार कानून, 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून, समता और नियमगिरि जैसे न्यायिक हस्तक्षेप तथा डीएमएफ जैसी लाभ-साझेदारी व्यवस्थाएं मिलकर एक नया सिद्धांत विकसित करती हैं—

प्राकृतिक संसाधन पर राज्य की नियामक शक्ति असीमित सामाजिक अधिकार नहीं है। विकास को संविधान, कानून, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के वैध अधिकारों की सीमाओं के भीतर संचालित होना होगा।

आदिवासी समुदाय के लिए जमीन केवल अचल संपत्ति नहीं है।

वह खेत है, जंगल है, नदी है, चरागाह है, देवस्थल है, पूर्वजों की स्मृति है, सामाजिक सुरक्षा है और आने वाली पीढ़ियों की पूंजी है।

इसीलिए केवल बाजार मूल्य चुकाकर उस क्षति का पूरा हिसाब नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर राष्ट्रीय संसाधनों को पूरी तरह स्थानीय नियंत्रण का विषय मान देना भी आधुनिक संघीय अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं का समाधान नहीं है।

भविष्य का रास्ता इन दोनों अतियों के बीच है—

वैधानिक अधिकार + वास्तविक परामर्श/जहां कानून अपेक्षित करे वहां सहमति + न्यूनतम विस्थापन + उचित प्रतिकर + जमीन और आजीविका का पुनर्स्थापन + सामुदायिक अधिकारों की रक्षा + पर्यावरणीय उत्तरदायित्व + खनिज लाभ में स्थानीय हिस्सेदारी + पारदर्शी ग्रामसभा।

यही बांध, खनन और आदिवासी भूमि-अधिकार के लगभग दो शताब्दियों के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है।

किसान और आदिवासी संघर्ष की पुरानी भाषा थी—

“हमारी जमीन मत लो।”

विस्थापन आंदोलनों ने इसमें जोड़ा—

“यदि लेते हो तो हमें न्यायपूर्ण पुनर्वास दो।”

पेसा और वन अधिकार कानून के युग ने कहा—

“हमसे पूछे बिना हमारे संसाधनों का भविष्य तय मत करो।”

और इक्कीसवीं सदी का संसाधन-न्याय इससे एक कदम आगे जाता है—

“जिस जमीन, जंगल, पानी और खनिज से राष्ट्र समृद्ध होता है, उस समृद्धि में वहां रहने वाले समुदाय को भी स्थायी, न्यायपूर्ण और अधिकार-आधारित भागीदार बनाओ।”

यहीं भूमि-अधिकार से विकास में भागीदारी तक की भारतीय यात्रा पूरी होती है—और यहीं से उसका अगला अध्याय शुरू होता है।

OCN ऐतिहासिक आकलन

इन संघर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि किसी एक परियोजना को रोक देना नहीं, बल्कि विकास की वैधता की कसौटी बदलना है। भूमि अब केवल बाजार-मूल्य वाली संपत्ति नहीं और विस्थापित परिवार केवल नकद प्रतिकर पाने वाला प्रशासनिक मामला नहीं माना जा सकता। पुनर्वास, आजीविका, सामुदायिक वन-अधिकार, ग्रामसभा, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और खनिज-लाभ में स्थानीय हिस्सेदारी इस विमर्श के स्थायी अंग बने हैं। फिर भी कानून और धरातल के बीच गहरी दूरी, अपूर्ण भूमि अभिलेख, विवादित ग्रामसभा प्रक्रियाएं, भूमिहीनों तथा महिलाओं की अदृश्य क्षति और परियोजना-लाभार्थियों व प्रभावित समुदायों के वास्तविक मतभेद बने हुए हैं। इसलिए इतिहास का निष्कर्ष बांध अथवा खनन का पूर्ण निषेध नहीं, बल्कि न्यूनतम विस्थापन और अधिकार-सम्मत विकास है।

शोधार्थियों के लिए

प्राथमिक और प्रमुख संस्थागत स्रोत

भारत का संविधानअनुच्छेद 244 तथा पांचवीं और छठी अनुसूची सहित अनुसूचित क्षेत्रों की संवैधानिक शासन-व्यवस्था।स्रोत तक जाएँ ↗
वन अधिकार कानून और नियमवनवासी अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य परंपरागत वन निवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों का आधिकारिक संकलन।स्रोत तक जाएँ ↗
जनजातीय कार्य मंत्रालय का ज्ञान-संग्रहपेसा, वन अधिकार, भूमि और पुनर्वास से संबंधित कानूनों, नियमों तथा मार्गदर्शिकाओं का सरकारी संग्रह।स्रोत तक जाएँ ↗
वर्जीनियस खाखा उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट, 2014विकास-जनित विस्थापन, आदिवासी भूमि-अधिकार, आजीविका और सामाजिक क्षति पर महत्वपूर्ण सरकारी अध्ययन।स्रोत तक जाएँ ↗
वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980वनभूमि के गैर-वन उपयोग और केंद्रीय स्वीकृति से संबंधित आधिकारिक कानून-पाठ।स्रोत तक जाएँ ↗
समता बनाम आंध्र प्रदेशअनुसूचित क्षेत्रों में भूमि हस्तांतरण और खनन पट्टों पर सर्वोच्च न्यायालय का 1997 का निर्णय।स्रोत तक जाएँ ↗
जिला खनिज प्रतिष्ठान और कल्याण योजनाखनन-प्रभावित क्षेत्रों के लिए जिला खनिज प्रतिष्ठान और प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना का आधिकारिक परिचय।स्रोत तक जाएँ ↗
संशोधित खनिज क्षेत्र कल्याण दिशा-निर्देश, 2024प्रत्यक्ष प्रभावित क्षेत्रों, उच्च प्राथमिकता वाले कामों, ग्रामसभा, लेखा-परीक्षा और निगरानी के संशोधित प्रावधान।स्रोत तक जाएँ ↗
खान और खनिज कानूनों का आधिकारिक संग्रहखान और खनिज (विकास और विनियमन) कानून तथा 2026 के संशोधन सहित केंद्रीय अधिनियम।स्रोत तक जाएँ ↗
नर्मदा बचाओ आंदोलन—OCN शोधसरदार सरोवर, विश्व बैंक, पुनर्वास, न्यायिक संघर्ष और पर्यावरणीय प्रभाव का स्वतंत्र विस्तृत अध्याय।स्रोत तक जाएँ ↗

स्रोत-सावधानी: विकास परियोजनाओं से कुल विस्थापित और परियोजना-प्रभावित लोगों की कोई एक निर्विवाद संख्या उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग अध्ययनों की अवधि, परियोजना-सीमा और परिभाषाएं भिन्न हैं। ग्रामसभा की भूमिका भी हर कानून और परिस्थिति में समान नहीं है; पेसा के परामर्श, वन अधिकार कानून की प्रक्रिया और किसी विशिष्ट परियोजना में अपेक्षित सहमति को एक-दूसरे का पर्याय नहीं मानना चाहिए।