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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · अध्याय 13

समावेशिता या तुष्टिकरण — 1937 के फैसले की सबसे कठिन परीक्षा

क्या 1937 का फैसला—

राष्ट्रीय समावेशिता था?

या—

मुस्लिम तुष्टिकरण?

इसका उत्तर देने से पहले “तुष्टिकरण” को परिभाषित करना होगा।

धार्मिक स्वतंत्रता और तुष्टिकरण में अंतर

यदि कोई नागरिक कहता है—

“मेरी धार्मिक आस्था मुझे किसी देवी की उपासना की अनुमति नहीं देती, इसलिए मुझे ऐसा करने के लिए बाध्य न किया जाए”—

तो उसकी मांग को स्वीकार करना तुष्टिकरण नहीं है।

यह धार्मिक स्वतंत्रता हो सकती है।

लेकिन यदि कोई राजनीतिक संगठन कहे—

“हमारे धार्मिक समुदाय की ओर से हम मांग करते हैं कि राष्ट्रीय परंपरा ही बदल दी जाए”—

तो प्रश्न अलग हो जाता है।

और यदि राजनीतिक दल चुनावी अथवा सामुदायिक समर्थन खोने के भय से बिना स्वतंत्र परीक्षण के मांग स्वीकार कर ले, तो उसे तुष्टिकरण कहना अधिक उचित हो सकता है।

1937 का मामला इन दोनों के बीच स्थित है।

कांग्रेस के पक्ष में प्रमाण

कांग्रेस के पक्ष में सबसे मजबूत प्रमाण स्वयं नेहरू का 20 अक्टूबर का पत्र है।

वे जानते थे कि विरोध का बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निर्मित था।

इसलिए वे सांप्रदायिक नेतृत्व को प्रसन्न करने के पक्ष में नहीं थे।

लेकिन स्वतंत्र जांच के बाद उन्हें शिकायत में कुछ वास्तविक आधार दिखाई दिया। (The Nehru Archive)

29 अक्टूबर को उन्होंने फिर स्पष्ट किया कि फैसला केवल इसलिए नहीं किया गया कि आपत्ति उठी थी। कांग्रेस ने स्वयं जांच की और कुछ आपत्तियां वैध पाईं। (The Nehru Archive)

यह तुष्टिकरण की सबसे सरल व्याख्या के विरुद्ध मजबूत प्रमाण है।

आलोचकों के पक्ष में प्रमाण

लेकिन आलोचना भी कमजोर नहीं है।

राजनीतिक घटनाक्रम देखें—

मुस्लिम लीग ने मुद्दा उठाया।

उसे कांग्रेस के कथित हिंदू चरित्र से जोड़ा।

कांग्रेस पर दबाव बढ़ा।

और कुछ ही समय बाद कांग्रेस ने राष्ट्रीय प्रयोग बदल दिया।

अर्थात राजनीतिक दबाव और नीतिगत परिवर्तन के बीच कालक्रमिक संबंध मौजूद है।

दूसरा प्रश्न परिणाम का है।

यदि समझौते से मुस्लिम लीग संतुष्ट हो जाती, सांप्रदायिक विवाद कम हो जाता और साझा राष्ट्रवाद मजबूत होता, तो कांग्रेस के फैसले को सफल समावेशी समाधान कहना आसान होता।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

1938 का प्रमाण

6 अप्रैल 1938 को नेहरू ने जिन्ना को एक विस्तृत पत्र लिखा।

उसमें उन्होंने वंदे मातरम् का प्रश्न फिर उठाया और अक्टूबर 1937 के कार्यसमिति वक्तव्य की याद दिलाई।

नेहरू ने कहा कि कांग्रेस ने कभी औपचारिक राष्ट्रगान घोषित नहीं किया था, लेकिन वंदे मातरम् तीस वर्ष से अधिक समय से भारतीय राष्ट्रवाद और बलिदान से जुड़ा था। आपत्तियां आने पर कार्यसमिति ने उन हिस्सों को राष्ट्रीय मंच पर न गाने की सिफारिश की जिनमें रूपकात्मक संदर्भ थे। (The Nehru Archive)

इसके बाद नेहरू का तर्क महत्वपूर्ण है।

पहले दो अंतरों में ऐसा कोई शब्द या वाक्यांश नहीं है जिससे किसी को किसी दृष्टिकोण से आपत्ति होनी चाहिए—यह उनका दावा था। साथ ही वे कहते हैं कि यदि किसी को दूसरा राष्ट्रीय गीत अधिक पसंद है तो उसे पूरी स्वतंत्रता है; लेकिन बड़ी संख्या में लोगों को उस गीत को छोड़ने के लिए बाध्य करना जिससे वे लंबे समय से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं, राष्ट्रीय आंदोलन को चोट पहुंचाएगा। (The Nehru Archive)

अर्थात कांग्रेस पहले ही काफी दूर जा चुकी थी—

उसने विवादित हिस्से राष्ट्रीय मंच से अलग कर दिए।

फिर भी विवाद समाप्त नहीं हुआ।

यहीं “तुष्टिकरण” की आलोचना मजबूत होती है

यहां आलोचक पूछ सकता है—

यदि वास्तविक धार्मिक शिकायत का समाधान पहले दो अंतरों से हो चुका था, तो इसके बाद भी वंदे मातरम् का प्रश्न क्यों बना रहा?

यदि आपत्ति धार्मिक थी, तो गैर-धार्मिक पहले दो अंतरों पर विवाद समाप्त हो जाना चाहिए था।

यदि विवाद समाप्त नहीं हुआ, तो क्या असली समस्या गीत से अधिक कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व से थी?

यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है।

हमारा अंतरिम निर्णय

1937 के फैसले को केवल तुष्टिकरण कहना ऐतिहासिक प्रक्रिया को अत्यधिक सरल कर देता है।

लेकिन उसे केवल आदर्शवादी समावेशिता कहना भी पर्याप्त नहीं है।

अधिक उपयुक्त वर्गीकरण होगा—

“सांप्रदायिक राजनीतिक दबाव के बीच किया गया समावेशी समझौता।”

उसमें वास्तविक धार्मिक संवेदनशीलता थी।

राजनीतिक गणना भी थी।

मुस्लिम लीग का दबाव भी था।

और कांग्रेस की अखिल भारतीय छवि बचाने की चिंता भी।

अगला प्रश्न है—

क्या समझौता सफल हुआ?

उसका उत्तर अधिक नकारात्मक दिखाई देता है।