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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · अध्याय 12

26 अक्टूबर–1 नवंबर 1937 — कांग्रेस कार्यसमिति ने वास्तव में क्या फैसला किया?

कलकत्ता की बैठक

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक कलकत्ता में 26 अक्टूबर से 1 नवंबर 1937 तक चली।

वंदे मातरम् का प्रश्न उसके सामने था।

लेकिन 29 अक्टूबर का नेहरू का समकालीन वक्तव्य बताता है कि इस विषय पर विचार केवल कलकत्ता पहुंचने के बाद शुरू नहीं हुआ था।

उन्होंने लिखा कि कार्यसमिति ने इस विषय पर बहुत गंभीर और लंबे विचार के बाद वक्तव्य तैयार किया तथा जितने लोगों से संभव था, उनसे परामर्श किया। नेहरू के अनुसार कई सप्ताह से पत्राचार और बंगाल सहित विभिन्न स्थानों के प्रमुख व्यक्तियों से बातचीत चल रही थी। (The Nehru Archive)

यह विवरण महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे “लीग ने प्रस्ताव पास किया और कांग्रेस ने दस दिन में आत्मसमर्पण कर दिया” जैसी सरल व्याख्या कमजोर पड़ती है।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि मुस्लिम लीग के दबाव का कोई प्रभाव नहीं था।

दोनों प्रक्रियाएं साथ चल रही थीं।

कार्यसमिति का बुनियादी निष्कर्ष

कांग्रेस ने माना कि वंदे मातरम् के कुछ हिस्सों पर मुस्लिम आपत्ति में वैधता थी।

यह बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है।

कांग्रेस ने यह नहीं कहा कि मुस्लिम लीग द्वारा उठाई गई प्रत्येक आपत्ति सही है।

उसने यह भी नहीं कहा कि वंदे मातरम् सांप्रदायिक गीत है।

इसके विपरीत उसका तर्क था कि तीन दशकों से अधिक समय में यह गीत भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के साथ इतना गहराई से जुड़ चुका है कि आनंदमठ की मूल कथात्मक पृष्ठभूमि से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसका बाद का राष्ट्रीय जीवन है। (The Nehru Archive)

लेकिन साथ ही—

बाद के कुछ हिस्सों में रूपकात्मक धार्मिक संदर्भ थे।

इसलिए राष्ट्रीय सभाओं में पहले दो अंतरे गाने की सिफारिश की गई। (The Nehru Archive)

नेहरू का 29 अक्टूबर का स्पष्टीकरण

फैसले के तुरंत बाद प्रतिक्रिया हुई।

अखबारों में बड़ी सुर्खियां छपीं और कांग्रेस कार्यसमिति के निर्णय पर नाराजगी भी व्यक्त की गई।

नेहरू ने 29 अक्टूबर को इसका उत्तर दिया।

उनका स्पष्टीकरण इस विवाद की समझ के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने मूलतः कहा—

कांग्रेस ने इस प्रश्न पर इसलिए विचार नहीं किया कि किसी ने आपत्ति कर दी और कांग्रेस उससे डर गई।

कांग्रेस इतनी कमजोर नहीं कि केवल आपत्ति के कारण अपना निर्णय बदल दे।

उसने विचार इसलिए किया क्योंकि स्वयं जांच करने पर उसे लगा कि एक-दो मामलों में वैध आपत्ति संभव है।

और चूंकि कांग्रेस अखिल भारतीय संगठन है, इसलिए उसे प्रश्न को अखिल भारतीय दृष्टि से देखना होगा। (The Nehru Archive)

यह कांग्रेस का 1937 का आधिकारिक औचित्य समझने की कुंजी है।

निर्णय का दर्शन

इसे सूत्र रूप में रखें तो कांग्रेस का तर्क था—

राष्ट्रीय परंपरा का सम्मान + धार्मिक रूप से विवादित हिस्से से परहेज = सर्वस्वीकार्य राष्ट्रीय गीत।

यानी पूरा गीत नष्ट नहीं किया गया।

पहले दो अंतरे राष्ट्रीय मंच के लिए चुने गए।

लेकिन यहां आलोचना का आधार भी है

निर्णय जिस राजनीतिक वातावरण में हुआ, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

मुस्लिम लीग कुछ दिन पहले ही लखनऊ अधिवेशन में वंदे मातरम् को कांग्रेस के कथित हिंदू चरित्र के प्रमाण के रूप में उठा चुकी थी।

इसलिए यह कहना कि कांग्रेस का फैसला मुस्लिम राजनीतिक दबाव से पूरी तरह असंबद्ध था, विश्वसनीय नहीं होगा।

अधिक सटीक निष्कर्ष है—

मुस्लिम लीग के राजनीतिक दबाव ने प्रश्न को तत्काल और गंभीर बनाया; कांग्रेस ने दबाव में उठे प्रश्न की स्वतंत्र समीक्षा की; समीक्षा में उसने कुछ धार्मिक आपत्तियों को वास्तविक पाया; और समाधान के रूप में पहले दो अंतरे चुने।

यही उपलब्ध दस्तावेजों के सबसे निकट बैठता है।

क्या चार अंतरे “हटा दिए” गए?

यह भाषा सावधानी से इस्तेमाल करनी चाहिए।

चार अंतरे मूल गीत से नहीं हटाए गए।

वंदे मातरम् का साहित्यिक पाठ जस का तस रहा।

राष्ट्रीय आयोजनों के लिए पहले दो अंतरों की सिफारिश की गई।

यह अंतर मामूली नहीं है।

“गीत काट दिया गया” राजनीतिक भाषा है।

“राष्ट्रीय प्रयोग को पहले दो अंतरों तक सीमित करने की सिफारिश की गई” ऐतिहासिक रूप से अधिक सटीक भाषा है।