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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · अध्याय 14

समझौते के बावजूद जिन्ना क्यों नहीं माने?

यदि वंदे मातरम् विवाद केवल धार्मिक शब्दों का विवाद होता, तो अक्टूबर 1937 के बाद समस्या लगभग समाप्त हो जानी चाहिए थी।

कांग्रेस ने विवादित हिस्सों को राष्ट्रीय आयोजनों से अलग कर दिया था।

पहले दो अंतरों में दुर्गा, लक्ष्मी या सरस्वती का उल्लेख नहीं था।

फिर भी कांग्रेस-मुस्लिम लीग विवाद समाप्त नहीं हुआ।

क्यों?

क्योंकि असली संघर्ष अब वंदे मातरम् से बड़ा हो चुका था।

1938 का नेहरू-जिन्ना पत्राचार

18 जनवरी 1938 को नेहरू ने जिन्ना को लिखा कि वे स्पष्ट रूप से बताएं कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच वास्तविक विवाद के मुद्दे क्या हैं।

नेहरू का कहना था कि वे गलतफहमियां समाप्त करना और राष्ट्रीय जीवन में बाधा डाल रहे प्रश्नों का समाधान चाहते हैं। (The Nehru Archive)

लेकिन दोनों नेताओं की सोच अलग थी।

नेहरू चाहते थे—

पहले मुद्दों की सूची बनाइए, फिर प्रत्येक का समाधान खोजते हैं।

जिन्ना का दृष्टिकोण था—

यह दो वकीलों के मुवक्किलों की तरह बिंदुवार विवाद नहीं, एक राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्न है।

25 फरवरी के पत्राचार से यह अंतर और स्पष्ट होता है। नेहरू बार-बार जिन्ना से विवाद के ठोस मुद्दे परिभाषित करने को कहते रहे; जिन्ना का जवाब था कि राष्ट्रीय प्रश्न इस तरह पत्राचार से तय नहीं होते और कांग्रेस नेतृत्व को मूलभूत विवादों की जानकारी होनी चाहिए। (The Nehru Archive)

वंदे मातरम् अब “छोटा प्रश्न” क्यों हो गया?

8 मार्च 1938 के पत्र में नेहरू तीन बड़े शीर्षक पहचानने की कोशिश करते हैं—

सांप्रदायिक पुरस्कार और पृथक निर्वाचन,

धार्मिक गारंटी,

सांस्कृतिक संरक्षण और गारंटी। (The Nehru Archive)

यह सूची बताती है कि वंदे मातरम् व्यापक संघर्ष का केवल एक हिस्सा था।

6 अप्रैल का निर्णायक पत्र

जिन्ना द्वारा उठाए गए विभिन्न मुद्दों के उत्तर में नेहरू ने 6 अप्रैल 1938 को विस्तार से जवाब दिया।

इसमें धार्मिक समारोहों का अधिकार,

व्यक्तिगत कानून,

संस्कृति की सुरक्षा,

गौ-वध,

शहीदगंज मस्जिद,

प्रादेशिक पुनर्गठन,

और वंदे मातरम्—

सभी प्रश्न शामिल थे। (The Nehru Archive)

यानी कांग्रेस के सामने मांगों/विवादों का पूरा समूह था।

वंदे मातरम् उनमें केवल एक था।

असली टकराव — प्रतिनिधित्व

यहां जिन्ना और नेहरू के बीच सबसे गहरा वैचारिक अंतर दिखाई देता है।

नेहरू की अवधारणा:

भारत एक राष्ट्र है। नागरिक धर्म से ऊपर राष्ट्रीय राजनीति में भाग लेते हैं। कांग्रेस सभी भारतीयों की संस्था हो सकती है।

जिन्ना की विकसित होती अवधारणा:

मुसलमान केवल धार्मिक अल्पसंख्यक नहीं, विशिष्ट राजनीतिक समुदाय हैं। उनकी ओर से बातचीत करने वाली स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति आवश्यक है।

यदि कांग्रेस जिन्ना को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि स्वीकार कर लेती, तो उसका अपना अखिल भारतीय दावा कमजोर पड़ता।

यदि जिन्ना कांग्रेस को मुस्लिम जनता की भी प्रतिनिधि संस्था मान लेते, तो मुस्लिम लीग की अलग राजनीतिक आवश्यकता कमजोर पड़ती।

यही गतिरोध था।

इसलिए वंदे मातरम् का समाधान पर्याप्त नहीं था

कांग्रेस सोच रही थी—

धार्मिक शिकायत दूर कीजिए, सांप्रदायिक राजनीति का आधार कम होगा।

जिन्ना की राजनीति का प्रश्न था—

मुस्लिम समुदाय की अलग राजनीतिक शक्ति और प्रतिनिधित्व।

दोनों अलग समस्याओं का समाधान खोज रहे थे।

इसलिए समझौता असफल होना लगभग अंतर्निहित था।

अप्रैल 1938 तक संवाद का स्वर

16 अप्रैल 1938 के पत्र में नेहरू स्वीकार करते हैं कि वे और जिन्ना सार्वजनिक प्रश्नों को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। फिर भी वे मतभेद कम करने की इच्छा व्यक्त करते हैं। जिन्ना की प्रतिक्रिया, जिसे उसी अभिलेख में उद्धृत किया गया है, यह थी कि नेहरू कई प्रश्नों पर पहले ही निर्णय सुना चुके हैं जबकि वे उन्हें बातचीत के लिए खुला मानते थे। (The Nehru Archive)

यह केवल व्यक्तिगत असहमति नहीं थी।

यह दो राष्ट्रवादी/राजनीतिक अवधारणाओं का संघर्ष बन रहा था।

आगे क्या हुआ?

1938–39 में मुस्लिम लीग ने कांग्रेस प्रांतीय सरकारों के विरुद्ध आरोपों को संगठित रूप दिया।

1939 तक लीग की रिपोर्टों में वंदे मातरम् और कांग्रेस ध्वज जैसे प्रश्न भी आरोपों के व्यापक आख्यान में शामिल रहे। जनवरी 1939 में नेहरू ने गोविंद बल्लभ पंत को लिखा कि सरकारों को लीग की विशिष्ट शिकायतों का उत्तर देना चाहिए, हालांकि ध्वज या वंदे मातरम् जैसी आपत्तियों का सरकारी उत्तर आवश्यक नहीं समझा। (The Nehru Archive)

इससे स्पष्ट है—

1937 का समझौता विवाद समाप्त करने में सफल नहीं हुआ।

और यही तथ्य कांग्रेस की नीति पर बाद की आलोचना का महत्वपूर्ण आधार बनता है।