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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · अध्याय 02

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और वंदे मातरम् की उत्पत्ति

वंदे मातरम् की राजनीतिक यात्रा को समझने से पहले उसके साहित्यिक जन्म को समझना जरूरी है।

उन्नीसवीं शताब्दी का बंगाल ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के साथ-साथ भारतीय बौद्धिक पुनर्जागरण का भी केंद्र था। इसी वातावरण में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का साहित्य सामने आया।

बंकिम केवल उपन्यासकार नहीं थे। वे ब्रिटिश प्रशासन में अधिकारी भी रहे और पश्चिमी शिक्षा तथा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा—दोनों से परिचित थे।

वंदे मातरम् इसी बौद्धिक संसार की उपज था।

गीत का प्रारंभ किसी राजनीतिक दल, धर्म अथवा समुदाय से नहीं होता।

उसकी पहली छवि धरती है।

जल से भरपूर धरती।

फलों से संपन्न धरती।

मलय पर्वत की शीतल सुगंधित वायु से स्पर्शित धरती।

लहलहाती फसलों से ढकी धरती।

यानी राष्ट्र की पहली अनुभूति भूगोल के माध्यम से होती है।

मातृभूमि का रूपांतरण

लेकिन गीत आगे बढ़ता है तो मातृभूमि केवल प्राकृतिक भूभाग नहीं रहती।

वह माता बनती है।

फिर शक्ति बनती है।

फिर ज्ञान।

फिर धर्म।

और अंततः देवी-प्रतीकों से उसका संबंध स्थापित होता है।

यही साहित्यिक परिवर्तन आगे चलकर विवाद का कारण बना।

आज इस रचना को पढ़ते समय एक गंभीर पद्धतिगत समस्या सामने आती है।

क्या उन्नीसवीं सदी के बंगाली साहित्य में प्रयुक्त देवी-रूपकों को बीसवीं या इक्कीसवीं सदी की धार्मिक-राजनीतिक श्रेणियों से पढ़ा जाना चाहिए?

या उन्हें भारतीय काव्य परंपरा के रूपक के रूप में समझा जाए?

यही मतभेद 1937 में भी था।

1875 और 1882

वंदे मातरम् की रचना सामान्यतः 1870 के दशक से जोड़ी जाती है और 1882 में प्रकाशित आनंदमठ के माध्यम से वह व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचा।

2025 में भारत सरकार ने इसके 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय स्मरण कार्यक्रम शुरू किया। सरकार की आधिकारिक पहल भी इसकी रचना को 1875 से जोड़ती है।

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका अर्थ है कि वंदे मातरम् का जन्म भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से पहले हुआ।

कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई।

अर्थात गीत पहले साहित्यिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति था; उसका राजनीतिक राष्ट्रवादी अर्थ बाद में विकसित हुआ।

संदर्भ-टिप्पणी

इस तथ्य का 1937 के विवाद में बड़ा महत्व है।

कांग्रेस का तर्क बाद में यही बना कि किसी गीत की राष्ट्रीय यात्रा उसके मूल उपन्यास के संदर्भ से कहीं बड़ी हो सकती है।

मुस्लिम लीग का तर्क था कि स्रोत और धार्मिक प्रतीकवाद को उससे अलग नहीं किया जा सकता।

इसलिए वंदे मातरम् के अर्थ को लेकर विवाद वास्तव में “लेखक का मूल संदर्भ बनाम बाद में विकसित राष्ट्रीय अर्थ” का विवाद भी था।