भूमिका — 89 वर्ष बाद फिर उसी प्रश्न पर भारत
19 अगस्त 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति ने एक ऐसा निर्णय लिया जिसकी जड़ें स्वतंत्रता से दस वर्ष पहले के भारत में थीं। कार्यसमिति ने तय किया कि कांग्रेस के कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। पार्टी महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने इसके समर्थन में 1937 की कांग्रेस कार्यसमिति के निर्णय का उल्लेख किया। कांग्रेस का कहना है कि वह कोई नई नीति नहीं बना रही, बल्कि लगभग नौ दशक पुरानी व्यवस्था जारी रख रही है। (The Indian Express)
यही निर्णय इस विवाद का ऐतिहासिक प्रारंभ-बिंदु है।
सवाल केवल यह नहीं है कि कांग्रेस दो अंतरे क्यों गाती है। असली सवाल है कि 1937 में ऐसा क्या हुआ था कि कांग्रेस को वंदे मातरम् के पूर्ण स्वरूप और उसके राष्ट्रीय प्रयोग के बीच भेद करना पड़ा?
और उससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न—
क्या 1937 का फैसला तत्कालीन परिस्थितियों का व्यावहारिक समाधान था, अथवा कांग्रेस की उस राजनीतिक प्रवृत्ति का उदाहरण था जिसे उसके आलोचक बाद में “मुस्लिम तुष्टिकरण” कहने लगे?
2026 ने इस प्रश्न को इसलिए और महत्वपूर्ण बना दिया है क्योंकि अब परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं।
1937 में भारत ब्रिटिश उपनिवेश था। कांग्रेस और मुस्लिम लीग राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष कर रहे थे। पृथक निर्वाचन व्यवस्था मौजूद थी। सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व भारत की संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा बन चुका था।
2026 में भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य है।
फिर भी 1937 की व्यवस्था जीवित है।
इस विवाद में दो अलग प्रश्नों की जांच जरूरी है—
पहला: 1937 का निर्णय क्यों हुआ?
दूसरा: 2026 में उसे बनाए रखने का औचित्य क्या है?
दोनों प्रश्न समान नहीं हैं।
कोई निर्णय 1937 की परिस्थितियों में उचित माना गया हो सकता है, लेकिन उससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि 89 वर्ष बाद भी वही नीति अपरिवर्तनीय रहनी चाहिए।
2026 ने विवाद क्यों पुनर्जीवित किया?
2025 में वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर केंद्र सरकार ने बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए। दिसंबर 2025 में संसद में भी इसके इतिहास और राष्ट्रीय महत्व पर चर्चा हुई।
2026 में केंद्र ने पूर्ण छह-अंतरों वाले संस्करण को सरकारी प्रोटोकॉल में स्थान दिया। इसके बाद संसद ने *Prevention of Insults to National Honour Act, 1971* में संशोधन करके वंदे मातरम् के गायन को जानबूझकर रोकने या गायन कर रही सभा में व्यवधान डालने को उसी दंडात्मक व्यवस्था के दायरे में लाया जो राष्ट्रगान के लिए लागू थी। (PRS Legislative Research)
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य अभी से स्पष्ट कर देना चाहिए।
संसद ने प्रत्येक भारतीय नागरिक अथवा राजनीतिक दल को सभी छह अंतरे गाने के लिए बाध्य नहीं किया है।
इसलिए कांग्रेस के केवल दो अंतरे गाने को अपने-आप संविधान अथवा कानून का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता।
मुस्लिम लीग की आपत्तियों और 1937 की सांप्रदायिक राजनीति की परिस्थितियों में उत्पन्न दो-अंतरे की व्यवस्था स्वतंत्र भारत में 2026 तक क्यों कायम रही?
इसका उत्तर खोजने के लिए केवल भाजपा और कांग्रेस के मौजूदा बयानों से काम नहीं चलेगा।
और उनमें सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक है जवाहरलाल नेहरू का 20 अक्टूबर 1937 का सुभाषचंद्र बोस को पत्र।
नेहरू लिखते हैं कि उन्होंने आनंदमठ का अंग्रेजी अनुवाद प्राप्त किया है और वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि समझने के लिए उसे पढ़ रहे हैं। वे बोस का सुझाव स्वीकार करते हुए रवीन्द्रनाथ ठाकुर से भी इस विषय पर चर्चा करने की बात करते हैं। (The Nehru Archive)
यानी निर्णय आकस्मिक नहीं था।
कांग्रेस नेतृत्व जानता था कि उसके सामने केवल गीत का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पहचान, धर्म और सांप्रदायिक राजनीति के बीच संतुलन का प्रश्न है।
प्रमुख स्रोत एवं दस्तावेज
जवाहरलाल नेहरू से सुभाषचंद्र बोस, 20 अक्टूबर 1937। नेहरू आर्काइव में मूल पत्र
कांग्रेस कार्यसमिति संबंधी नेहरू का 29 अक्टूबर 1937 का विवरण। नेहरू आर्काइव में दस्तावेज
24 जनवरी 1950 की संविधान सभा कार्यवाही। संविधान सभा की मूल कार्यवाही
*Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026*। PRS का विधेयक-पाठ