आनंदमठ — इतिहास, साहित्य और विवाद की जड़
1882 में प्रकाशित आनंदमठ बंकिमचंद्र की सबसे राजनीतिक रूप से चर्चित कृतियों में है।
उपन्यास अठारहवीं सदी के बंगाल की उथल-पुथल और संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
लेकिन इसे आधुनिक अर्थ में इतिहास की पाठ्यपुस्तक नहीं माना जा सकता।
यह साहित्य है।
ऐतिहासिक घटनाओं, धार्मिक प्रतीकों और राष्ट्रवादी कल्पना का साहित्यिक पुनर्निर्माण।
यहीं से समस्या शुरू होती है।
मुस्लिम आपत्ति में आनंदमठ क्यों महत्वपूर्ण हुआ?
1937 तक मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व का एक वर्ग कह रहा था कि वंदे मातरम् को केवल शुरुआती दो पंक्तियों अथवा उसकी लोकप्रिय धुन के आधार पर नहीं देखा जा सकता।
गीत जिस उपन्यास में है, उसके कुछ प्रसंग मुसलमानों के प्रति शत्रुतापूर्ण माने गए।
इसलिए आपत्ति दो स्तरों पर थी—
गीत के बाद के देवी-प्रतीक।
और उपन्यास की कथात्मक पृष्ठभूमि।
जवाहरलाल नेहरू का अक्टूबर 1937 का पत्र इस बात का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है कि कांग्रेस नेतृत्व ने इस आपत्ति को गंभीरता से लिया।
नेहरू ने बोस को लिखा कि उन्होंने *Ananda Math* का अंग्रेजी अनुवाद प्राप्त किया और गीत की पृष्ठभूमि समझने के लिए उसे पढ़ रहे हैं। (The Nehru Archive)
यह छोटा-सा तथ्य बहुत कुछ बताता है।
यदि कांग्रेस मानती कि उपन्यास का गीत से कोई संबंध ही नहीं है, तो नेहरू को आनंदमठ पढ़ने की आवश्यकता नहीं होती।
लेकिन क्या गीत उपन्यास में कैद रहा?
नहीं।
यहीं मुस्लिम लीग के तर्क की सीमा भी सामने आती है।
1882 से 1937 के बीच वंदे मातरम् ने अपना स्वतंत्र राजनीतिक जीवन प्राप्त कर लिया था।
1905 के बंग-भंग विरोधी आंदोलन में जब लोग “वंदे मातरम्” कहते थे, तो वे आनंदमठ की कथा का समर्थन करने के लिए सड़क पर नहीं उतर रहे थे।
वह ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध का नारा बन चुका था।
इसलिए कांग्रेस कार्यसमिति ने बाद में जिस विचार को महत्व दिया, वह था—
किसी रचना का राष्ट्रीय जीवन उसके मूल साहित्यिक संदर्भ से अलग भी विकसित हो सकता है।
1938 में नेहरू द्वारा जिन्ना को भेजे गए विवरण में कांग्रेस के 1937 के निर्णय का यही सार मिलता है। कार्यसमिति ने मुस्लिम आपत्तियों के कुछ हिस्सों की वैधता स्वीकार की, लेकिन साथ ही कहा कि राष्ट्रीय जीवन में गीत के प्रयोग का विकास उसके पुराने उपन्यास-संदर्भ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो चुका है। (The Nehru Archive)
यही कांग्रेस के समझौते का बौद्धिक आधार था।
न पूरा गीत अस्वीकार करना।
न सभी आपत्तियां खारिज करना।
बल्कि दोनों के बीच रास्ता निकालना।