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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–017 · अध्याय 18

भारत में डिजिटल मंचों के प्रमुख विवाद — X/ट्विटर, मेटा, यूट्यूब, डीपफेक, सरकारी आदेश और न्यायालयीन हस्तक्षेप

भाग–6 : भारत के प्रमुख प्रकरण अध्ययन

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत हिंदी शोध संस्करण · 15 अगस्त 2026

भारत का डिजिटल नियमन केवल कानूनों और नियमों की किताब से नहीं समझा जा सकता। उसकी वास्तविक प्रकृति उन विवादों में दिखाई देती है जहां सरकार, सोशल मीडिया कंपनियां, न्यायालय, उपयोगकर्ता और नागरिक स्वतंत्रता के प्रश्न एक-दूसरे से टकराते हैं। यही कारण है कि इस अध्याय को सामान्य सैद्धांतिक विवरण के बजाय प्रकरण-पत्र—प्रकरण अध्ययन के रूप में देखना अधिक उपयोगी है। इन मामलों में बार-बार वही मूल प्रश्न सामने आते हैं— क्या विदेशी डिजिटल मंच भारतीय कानून मानने के लिए बाध्य हैं? सरकार किस प्रक्रिया से सामग्री हटवा सकती है? क्या मंच को हर सरकारी आदेश मानना होगा? सुरक्षित आश्रय कब समाप्त हो सकता है? क्या एल्गोरिद्मिक मंच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का केवल वाहक है या स्वयं भी शक्तिशाली सूचना-द्वारपाल है? और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा डीपफेक के दौर में जिम्मेदारी किसकी होगी? भारत का अनुभव इन प्रश्नों का कोई एक अंतिम उत्तर नहीं देता। लेकिन पिछले कुछ वर्षों के विवाद मिलकर यह दिखाते हैं कि देश का डिजिटल शासन धीरे-धीरे स्वैच्छिक मंचीय व्यवस्था से विधिक जवाबदेही की ओर बढ़ा है।

2021 भारत और तत्कालीन ट्विटर के संबंधों में निर्णायक वर्ष था। उस समय किसान आंदोलन और उससे जुड़े सोशल मीडिया अभियानों के संदर्भ में केंद्र सरकार ने कुछ ट्विटर खातों और सामग्री पर कार्रवाई के आदेश दिए। विवाद यह था कि सरकार का कहना था कि कुछ सामग्री कानून और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं के दायरे में आती है, जबकि ट्विटर ने कुछ मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारिता से संबंधित चिंतियां जताईं। इसी समय फरवरी 2021 में नए सूचना प्रौद्योगिकी नियम लागू हुए। महत्वपूर्ण सोशल मीडिया मध्यस्थों को भारत में मुख्य अनुपालन अधिकारी, नोडल संपर्क अधिकारी और शिकायत अधिकारी नियुक्त करने सहित अतिरिक्त दायित्व दिए गए। सरकार ने तीन महीने का अनुपालन समय दिया था। (Press Information Bureau) ट्विटर और सरकार के बीच तनाव इसलिए बढ़ा क्योंकि एक ओर कंपनी स्वयं को वैश्विक अभिव्यक्ति मंच के रूप में प्रस्तुत कर रही थी, दूसरी ओर भारत का तर्क था—

यही विवाद आगे सुरक्षित आश्रय तक पहुंचा। सरकार का पक्ष था कि सूचना प्रौद्योगिकी नियम के आवश्यक दायित्वों का पालन सुरक्षित आश्रय से जुड़ा है। इस प्रकरण का व्यापक सबक था—

ट्विटर और भारत सरकार का अगला बड़ा विवाद सामग्री अवरोधन आदेशों पर हुआ। केंद्र सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत अनेक ट्विटर खातों और ट्वीट को अवरुद्ध करने के निर्देश दिए थे। ट्विटर ने 2022 में कर्नाटक उच्च न्यायालय का रुख किया और कुछ आदेशों को चुनौती दी। 30 जून 2023 के निर्णय में न्यायालय ने दर्ज किया कि सरकारी अवरोधन आदेश कुल 1,474 ट्विटर खातों और 175 ट्वीट से संबंधित थे, हालांकि कंपनी ने न्यायालय में केवल सीमित संख्या में विशिष्ट URL को चुनौती दी थी। (Indian Kanoon) ट्विटर का एक मुख्य तर्क था कि पूरे खाते को अवरुद्ध करना कई मामलों में अनुपातहीन था और धारा 69A की प्रक्रिया का पर्याप्त पालन नहीं किया गया। सरकार का तर्क था कि आदेश कानून में दिए गए राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य वैधानिक आधारों पर जारी किए गए थे तथा कंपनी लंबे समय तक पूर्ण अनुपालन नहीं कर रही थी। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने ट्विटर की याचिका खारिज कर दी और कंपनी के आचरण की आलोचना की। यह प्रकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने दो सिद्धांतों को आमने-सामने रखा—

और

धारा 69A को सर्वोच्च न्यायालय पहले ही *Shreya Singhal* मामले में संवैधानिक मान चुका था, क्योंकि उसमें आदेश, कारण और समीक्षा से जुड़ी प्रक्रियात्मक सुरक्षा मौजूद थीं। (Indian Kanoon) इस केस से मुख्य सबक निकला—

2025 में X Corp और भारत सरकार के बीच विवाद ने डिजिटल शासन की बहस को नए चरण में पहुंचा दिया। इस बार विवाद सीधे धारा 69A तक सीमित नहीं था। प्रश्न था—

X Corp ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में Sahyog Portal और सरकारी नोटिस व्यवस्था को चुनौती दी। उसका तर्क था कि धारा 69A ही सामग्री अवरोधन की विधिसम्मत व्यवस्था है और धारा 79 के माध्यम से समानांतर अवरोधन तंत्र नहीं बनाया जा सकता। सरकार का तर्क था कि धारा 79(3)(b) और Rule 3(1)(d) के तहत अधिकृत सरकारी एजेंसियां मध्यस्थ को ऐसी गैरकानूनी सूचना से अवगत करा सकती हैं, और Sahyog Portal केवल इस संचार को सुव्यवस्थित करने वाला प्रशासनिक माध्यम है। 24 सितंबर 2025 को कर्नाटक उच्च न्यायालय ने X Corp की याचिका खारिज कर दी। (Indian Kanoon) इसके बाद भी विवाद समाप्त नहीं हुआ। फरवरी 2026 के दिल्ली उच्च न्यायालय के एक आदेश में दर्ज किया गया कि X तथा अन्य पक्षों द्वारा Sahyog Portal से संबंधित आगे की चुनौतियां विभिन्न न्यायालयों में लंबित थीं और कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील भी की गई थी। (Indian Kanoon) इसलिए 2026 तक यह विषय पूरी तरह अंतिम न्यायिक निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा था। यह केस भारतीय डिजिटल कानून का बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है—

Sahyog Portal और सरकारी सामग्री हटाने के आदेशों पर विवाद के बीच अक्टूबर 2025 में केंद्र सरकार ने Rule 3(1)(d) में संशोधन किया। सरकार ने कहा कि नए प्रावधान का उद्देश्य सरकारी निर्देशों को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। इसके तहत सामग्री हटाने संबंधी सरकारी सूचना में अधिक स्पष्ट कानूनी आधार, वरिष्ठ स्तर की स्वीकृति और कारणयुक्त आदेश जैसी प्रक्रियात्मक सुरक्षा जोड़ी गईं। (Press Information Bureau) यह परिवर्तन महत्वपूर्ण था। क्योंकि भारतीय डिजिटल शासन अब केवल इस प्रश्न पर नहीं था—

अब दूसरा प्रश्न भी सामने था—

लोकतांत्रिक व्यवस्था में यही अंतर वैध नियमन और मनमाने नियंत्रण के बीच दीवार बन सकता है।

मेटा, अर्थात तत्कालीन फेसबुक, से जुड़ा भारत का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक विवाद 2020 के दिल्ली दंगों के बाद सामने आया। दिल्ली विधानसभा की Peace and Harmony Committee ने फेसबुक India के तत्कालीन प्रमुख Ajit Mohan को तलब किया। समिति सोशल मीडिया की भूमिका और कथित घृणा सामग्री पर विचार कर रही थी। फेसबुक का तर्क था कि intermediaries का नियमन संसद और केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया। Ajit Mohan v. Legislative Assembly, NCT of Delhi में सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 में माना कि विधानसभा समिति को इस विषय से संबंधित कुछ मामलों की जांच और विचार-विमर्श की वैध भूमिका हो सकती है, हालांकि वह उन क्षेत्रों में स्वयं नियामकीय शक्ति नहीं अपना सकती जो केंद्र अथवा आपराधिक कानून के विशेष क्षेत्राधिकार में आते हैं। (Indian Kanoon) इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि न्यायालय ने सोशल मीडिया मंचों की सामाजिक शक्ति को गंभीरता से स्वीकार किया। यानी फेसबुक केवल निजी कंपनी नहीं था। उसकी भूमिका सार्वजनिक संवाद और सामाजिक सद्भाव को प्रभावित कर सकती थी। यह भारतीय न्यायिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था—

बाल यौन शोषण सामग्री—CSAM—वह क्षेत्र है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सामान्य बहस लगभग समाप्त हो जाती है और मंच की सक्रिय जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। सितंबर 2023 में MeitY ने यूट्यूब, Telegram और X जैसे मंचों को बाल यौन शोषण सामग्री से संबंधित नोटिस जारी किए और उनसे ऐसी सामग्री के शीघ्र और स्थायी निष्कासन के साथ सक्रिय तकनीकी उपाय मजबूत करने को कहा। सरकार ने स्पष्ट किया कि नियमों के अनुपालन में विफलता सुरक्षित आश्रय पर प्रभाव डाल सकती है। (Press Information Bureau) जुलाई 2026 में यह प्रश्न फिर गंभीर रूप से सामने आया, जब सोशल मीडिया मंचों पर CSAM से जुड़े कथित विज्ञापनों की खबरों पर भारत सरकार ने संबंधित मध्यस्थ से विस्तृत रिपोर्ट मांगी। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी संबंधित सोशल मीडिया मंचों को नोटिस जारी किया। (Press Information Bureau) यह मामला सामान्य उपयोगकर्ता द्वारा किसी छिपे समूह में सामग्री डालने से अलग है। यदि गैरकानूनी सामग्री विज्ञापन प्रणाली के माध्यम से प्रसारित होती है, तो प्रश्न कहीं अधिक कठिन हो जाता है— क्या मंच केवल निष्क्रिय मध्यस्थ रह जाता है? विज्ञापन सामान्यतः मंच की अपनी तकनीकी स्वीकृति, वितरण और व्यावसायिक प्रणाली से होकर गुजरता है। यही इस केस का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।

2023 में अभिनेत्री रश्मिका मंदाना का वायरल डीपफेक वीडियो भारत में इस समस्या को जनचर्चा के केंद्र में ले आया। इसके बाद अनेक अभिनेताओं, सार्वजनिक व्यक्तियों और राजनेताओं से जुड़े कृत्रिम वीडियो तथा आवाजों के मामले सामने आए। सरकार ने मौजूदा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी नियम के तहत intermediaries को याद दिलाया कि impersonation, गलत सूचना और अन्य गैरकानूनी सामग्री पर उन्हें अपने सावधानी दायित्व पूरे करने होंगे। जुलाई 2024 में MeitY ने संसद में स्पष्ट कहा कि Deepfake कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संचालित गलत सूचना का एक रूप है और सूचना प्रौद्योगिकी नियम मंचों को ऐसी निषिद्ध सामग्री से निपटने के दायित्व देते हैं। (Press Information Bureau) यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने कानून की सीमा उजागर की। भारत के पास डीपफेक शब्द का उपयोग किए बिना भी कई अपराधों पर कार्रवाई के कानून थे— प्रतिरूपण, मानहानि, धोखाधड़ी, अश्लील सामग्री, गोपनीयता उल्लंघन। लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इन सभी को एक नई तकनीकी श्रेणी में जोड़ दिया। यही कारण है कि 2026 में भारत ने कृत्रिम रूप से निर्मित सूचना—कृत्रिम रूप से निर्मित सूचना को सूचना प्रौद्योगिकी नियम में स्पष्ट रूप से शामिल किया।

2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों को डीपफेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बदली गई सामग्री के दुरुपयोग के विरुद्ध स्पष्ट चेतावनी दी। 6 मई 2024 की आयोग की सलाह में राजनीतिक दलों को ऐसी डीपफेक और विकृत कृत्रिम बुद्धिमत्ता सामग्री के उपयोग से बचने को कहा गया जो गलत सूचना फैलाए या चुनावी प्रक्रिया की शुचिता प्रभावित करे। (Elections 24) जनवरी 2025 में आयोग ने राजनीतिक दलों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनी सामग्री पर स्पष्ट और आसानी से पहचान योग्य चिह्न लगाने की सलाह दी, ताकि मतदाता यह जान सके कि वह वास्तविक रिकॉर्डिंग नहीं देख रहा। (Election Commission of India) अक्टूबर 2025 में आयोग ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कृत्रिम सामग्री के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए चुनाव प्रचार में इसके उपयोग पर आगे भी निर्देश जारी किए। (Election Commission of India) इस विकास का महत्व बहुत बड़ा है। भारत में चुनावी नियमन अब केवल— पोस्टर, प्रचार व्यय, टेलीविजन विज्ञापन और चुनाव सभा— तक सीमित नहीं रहा। अब कृत्रिम राजनीतिक वास्तविकता भी चुनाव आयोग की चिंता का हिस्सा है।

भारत में यूट्यूब जैसे वीडियो मंचों पर सरकार का हस्तक्षेप मुख्यतः सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, सूचना प्रौद्योगिकी नियम और संबंधित वैधानिक शक्तियों के माध्यम से होता है। यहां दो अलग स्थितियां हैं। एक— विशिष्ट गैरकानूनी उपयोगकर्ता सामग्री पर कार्रवाई। दूसरी— ऐसी पूरी सेवा अथवा चैनल पर कार्रवाई जो व्यापक रूप से गैरकानूनी सामग्री उपलब्ध करा रही हो। दिसंबर 2025 में सरकार ने संसद को बताया कि सूचना प्रौद्योगिकी नियम intermediaries को गैरकानूनी सामग्री रोकने और निर्धारित सावधानी उपाय अपनाने के लिए बाध्य करते हैं। (Press Information Bureau) 2025 में सरकार ने अश्लील और अनुचित सामग्री के मामलों में 25 OTT मंचों पर भी कार्रवाई की; फरवरी 2026 में संसद में इसकी जानकारी दी गई। (Press Information Bureau) यहां OTT और यूट्यूब कानूनी रूप से समान श्रेणी नहीं हैं, लेकिन दोनों मामलों में एक बड़ा सिद्धांत समान है—

2026 में भारतीय डिजिटल नियमन और कठोर हुआ। सरकार के जुलाई 2026 के संसदीय उत्तर के अनुसार संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी नियम में न्यायालय के आदेश या उपयुक्त सरकार/एजेंसी की कारणयुक्त सूचना मिलने के बाद कुछ गैरकानूनी सामग्री हटाने की समय-सीमा 36 घंटे से घटाकर तीन घंटे कर दी गई। (Press Information Bureau) यह अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तन है। डिजिटल सामग्री कुछ घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच सकती है। सरकार का तर्क है कि पुराने लंबे समय-सीमा वाले मॉडल में नुकसान होने के बाद हटाना अप्रभावी हो सकता था। लेकिन इसके साथ दूसरा प्रश्न भी आता है—

यदि आदेश स्पष्ट गैरकानूनी सामग्री पर है तो तेजी उचित हो सकती है। लेकिन जटिल राजनीतिक, पत्रकारिता अथवा व्यंग्य संबंधी सामग्री में अत्यधिक संक्षिप्त समय-सीमा मंचों को “पहले हटाओ, बाद में सोचो” वाली नीति की ओर धकेल सकती है। यही आधुनिक डिजिटल कानून का सबसे कठिन संतुलन है—

भारत की 2026 व्यवस्था में कुछ अत्यंत संवेदनशील सामग्री के लिए और तेज शिकायत निवारण रखा गया है। सरकार के अनुसार नग्नता, निजी अंगों के प्रदर्शन और कृत्रिम रूप से बदली गई निजी छवियों जैसी शिकायतों में मध्यस्थ को दो घंटे के भीतर सभी उचित और व्यावहारिक कदम उठाने होते हैं। (Press Information Bureau) यह व्यवस्था विशेष रूप से महिलाओं और डीपफेक पीड़ितों के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसी सामग्री के मामले में नुकसान केवल सामग्री मौजूद रहने से नहीं होता। हर अतिरिक्त मिनट में— प्रतियां बन सकती हैं, स्क्रीन रिकॉर्डिंग हो सकती है, दूसरे मंचों पर साझा किया जा सकता है, और उसे स्थायी रूप से इंटरनेट से हटाना कठिन होता जाता है। इसलिए यहां तेज कार्रवाई स्वयं पीड़ित के अधिकार का हिस्सा बन जाती है।

18.1 इन सभी मामलों से कौन-सी समान प्रवृत्ति दिखाई देती है?

भारत में डिजिटल मंचों की भूमिका को लेकर पिछले कुछ वर्षों में पांच स्पष्ट परिवर्तन हुए हैं।

भारत में सेवा देने पर भारतीय कानून लागू करने का दावा लगातार मजबूत हुआ है।

कंपनी को तीसरे पक्ष की सामग्री के लिए सुरक्षा मिल सकती है, लेकिन नियमों के सावधानी दायित्व पूरे करने होंगे।

ट्विटर/X के मामलों ने दिखाया कि प्रश्न केवल सामग्री हटाने का नहीं, आदेश की वैध प्रक्रिया का भी है।

यदि मंच स्वयं कृत्रिम सामग्री बनाता, बढ़ाता या विज्ञापन प्रणाली के माध्यम से वितरित करता है, तो सामान्य सुरक्षित आश्रय की सीमा नए प्रश्न पैदा करती है।

Shreya Singhal से लेकर ट्विटर/X और मेटा से जुड़े मामलों तक न्यायालय लगातार यह तय कर रहे हैं कि राज्य, कंपनी और नागरिक के अधिकार की सीमा कहां है।

18.2 सरकार का दृष्टिकोण

भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों से अपनी डिजिटल नीति को बार-बार चार शब्दों में प्रस्तुत करती रही है—

सरकार का तर्क है कि यदि डिजिटल मंच भारत में कारोबार करते हैं तो उन्हें— कानून मानना होगा, शिकायत सुननी होगी, गैरकानूनी सामग्री पर कार्रवाई करनी होगी, बाल सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, और जरूरत पड़ने पर कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सहयोग करना होगा। जुलाई 2026 में संसद को दी गई जानकारी में सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी नियम के दायित्वों का पालन न करने वाले intermediaries धारा 79 की तीसरे पक्ष की सामग्री वाली सुरक्षा खो सकते हैं। (Press Information Bureau)

18.3 मंचों की प्रमुख चिंता

डिजिटल मंचों की मुख्य चिंता यह है कि सरकारी आदेश अत्यधिक व्यापक न हों। यदि अलग-अलग मंत्रालय, राज्य एजेंसियां और पुलिस इकाइयां सामग्री हटाने के निर्देश दे सकें तो कंपनियों के सामने अनुपालन का विशाल और जटिल ढांचा बन सकता है। दूसरी चिंता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। यदि सुरक्षित आश्रय खोने का जोखिम बहुत अधिक हो तो मंच कानूनी विवाद वाली सामग्री को भी हटाना अधिक सुरक्षित समझ सकता है। इससे आवश्यकता से अधिक सामग्री हटाना—अत्यधिक निष्कासन की समस्या पैदा हो सकती है। X Corp का Sahyog Portal विवाद इसी व्यापक चिंता का उदाहरण है। (Indian Kanoon)

18.4 नागरिक का प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण

सरकार और कंपनी के बीच संघर्ष में अक्सर सबसे महत्वपूर्ण पक्ष पीछे छूट जाता है—

उसे दो प्रकार की सुरक्षा चाहिए। पहली— उसे डीपफेक, बाल शोषण, प्रतिरूपण, धोखाधड़ी और गैरकानूनी सामग्री से सुरक्षा मिले। दूसरी— उसकी वैध राजनीतिक अभिव्यक्ति, पत्रकारिता, आलोचना और व्यंग्य को मनमाने तरीके से न हटाया जाए। इसलिए आदर्श डिजिटल व्यवस्था ऐसी नहीं हो सकती जिसमें— कंपनी सर्वशक्तिमान हो। और न ऐसी जिसमें— सरकार सर्वशक्तिमान हो। नागरिक के पास स्पष्ट अधिकार और प्रभावी अपील दोनों होने चाहिए।

18.5 भारतीय मॉडल किस दिशा में जा रहा है?

2021 से 2026 तक की घटनाओं को साथ देखने पर भारत का मॉडल धीरे-धीरे स्पष्ट होता है। भारत अमेरिकी धारा 230 जैसा अत्यंत व्यापक मंचीय संरक्षण मॉडल नहीं अपना रहा। वह चीनी शैली का पूर्ण राज्य-केंद्रित इंटरनेट भी नहीं है। उसमें यूरोपीय और ब्रिटिश मॉडल की तरह मंचीय सावधानी और उपयोगकर्ता सुरक्षा बढ़ रही है, लेकिन सरकारी आदेशों की भूमिका अपेक्षाकृत अधिक प्रत्यक्ष है। इसे मोटे तौर पर कहा जा सकता है—

लेकिन यह मॉडल अभी निर्माण की प्रक्रिया में है। 2025–26 के Sahyog Portal विवाद और लगातार बदलते सूचना प्रौद्योगिकी नियम बताते हैं कि अंतिम संतुलन अभी स्थापित नहीं हुआ है।

18.6 निष्कर्ष

भारत के डिजिटल विवादों से एक बात बिल्कुल स्पष्ट हो चुकी है—

ट्विटर/X विवाद ने दिखाया कि विदेशी मंच और संप्रभु राज्य सीधे आमने-सामने आ सकते हैं। मेटा के मामलों ने दिखाया कि मंच का सामाजिक प्रभाव संसद और न्यायपालिका दोनों की चिंता बन सकता है। यूट्यूब और अन्य सेवाओं पर कार्रवाई ने दिखाया कि डिजिटल वितरण सामग्री को भारतीय कानून से मुक्त नहीं करता। डीपफेक ने साबित किया कि पुराने कानून को नई तकनीक के अनुरूप बदलना आवश्यक है। और Sahyog Portal विवाद ने एक समान रूप से महत्वपूर्ण चेतावनी दी—

भारत की डिजिटल व्यवस्था की अंतिम कसौटी यही होगी— क्या वह किसी वैश्विक तकनीकी कंपनी को भारतीय कानून से ऊपर जाने से रोक सकती है? क्या वह बच्चों, महिलाओं और सामान्य नागरिकों को गंभीर डिजिटल नुकसान से बचा सकती है? क्या वह विदेशी प्रभाव और राष्ट्रीय सुरक्षा खतरों का मुकाबला कर सकती है? और साथ ही—

यदि इन चारों उद्देश्यों में संतुलन बनता है, तभी भारतीय डिजिटल संप्रभुता लोकतांत्रिक अर्थ में सफल मानी जाएगी। अब इस अध्ययन के केवल दो मुख्य अध्याय शेष हैं।