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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–017 · अध्याय 17

चीन — इंटरनेट नियंत्रण, साइबर संप्रभुता और राज्य-केंद्रित डिजिटल शासन

भाग–5 : विश्व का तुलनात्मक अध्ययन

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत हिंदी शोध संस्करण · 15 अगस्त 2026

अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के डिजिटल शासन मॉडल में महत्वपूर्ण अंतर हैं, लेकिन वे सभी किसी न किसी रूप में बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था, निजी डिजिटल उद्योग और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन खोजने की कोशिश करते हैं। चीन का मॉडल इससे मूलतः अलग है। चीन डिजिटल क्षेत्र को केवल मुक्त वैश्विक संचार माध्यम के रूप में नहीं देखता। उसकी आधिकारिक अवधारणा में साइबर क्षेत्र भी राष्ट्रीय संप्रभुता का विस्तार है और राज्य को अपनी भौगोलिक सीमा की तरह अपने डिजिटल क्षेत्र में भी कानून, सुरक्षा और व्यवस्था लागू करने का अधिकार है। चीन के आधिकारिक दस्तावेजों में “साइबर संप्रभुता” को इंटरनेट शासन के मूल सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चीन के 2016 के Cybersecurity Law—साइबर सुरक्षा कानून—में राष्ट्रीय साइबर संप्रभुता की रक्षा को कानून के उद्देश्यों में शामिल किया गया। (China Anti-Corruption Agency) यही सिद्धांत चीनी डिजिटल शासन को समझने की कुंजी है। उसके मॉडल के तीन बड़े स्तंभ हैं—

17.1 चीन की “साइबर संप्रभुता” क्या है?

चीन का तर्क है कि इंटरनेट अंतरराष्ट्रीय होने के बावजूद किसी संप्रभु राष्ट्र के कानून से बाहर का क्षेत्र नहीं हो सकता। 2015 में विश्व इंटरनेट सम्मेलन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा था कि साइबर क्षेत्र कानून से परे स्थान नहीं है और डिजिटल दुनिया में भी व्यवस्था तथा कानून आवश्यक हैं। चीन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार यह विचार रखा है कि प्रत्येक देश को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप इंटरनेट विकास और शासन का रास्ता चुनने का अधिकार होना चाहिए। (Ministry of Foreign Affairs of China) यह विचार पश्चिमी “खुले वैश्विक इंटरनेट” की परंपरागत अवधारणा से महत्वपूर्ण रूप से अलग है। पश्चिमी दृष्टिकोण सामान्यतः इंटरनेट को सीमा-पार सूचना प्रवाह के खुले माध्यम के रूप में प्राथमिकता देता रहा। चीन का दृष्टिकोण कहता है—

यहीं “एक इंटरनेट” और “राष्ट्रीय डिजिटल क्षेत्र” के बीच मूल दार्शनिक विभाजन दिखाई देता है।

17.2 Great Firewall — डिजिटल सीमा की व्यावहारिक अभिव्यक्ति

चीन की इंटरनेट व्यवस्था का सबसे चर्चित हिस्सा बाहरी वेबसाइटों और सेवाओं पर उसका नियंत्रण है, जिसे सामान्यतः Great Firewall कहा जाता है। Google की कई सेवाएं, फेसबुक, इंस्टाग्राम, X, यूट्यूब और अनेक विदेशी समाचार तथा सामाजिक मंच चीन के मुख्य भूभाग में सामान्य रूप से उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन केवल इन्हें प्रतिबंधित करना ही चीनी मॉडल का सार नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इनके स्थान पर चीन ने अपना विशाल घरेलू डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया। Google के स्थान पर Baidu, WhatsApp जैसे संदेश और सामाजिक उपयोग के लिए WeChat, ट्विटर/X के समान सार्वजनिक संवाद के लिए Weibo, वीडियो क्षेत्र में Bilibili और अन्य मंच, लघु वीडियो में Douyin, ई-कॉमर्स में Alibaba और JD.com— जैसी कंपनियां विकसित हुईं। इससे चीन ने एक ऐसी परिस्थिति बनाई जिसमें विदेशी मंचों को सीमित करने के बावजूद उसकी डिजिटल अर्थव्यवस्था इंटरनेट-विहीन नहीं हुई।

17.3 नियंत्रण और तकनीकी आत्मनिर्भरता का संयोजन

यहीं चीनी मॉडल की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। यदि कोई देश केवल विदेशी मंचों पर रोक लगाए लेकिन घरेलू विकल्प न हों, तो नागरिकों और अर्थव्यवस्था दोनों को भारी नुकसान हो सकता है। चीन ने डिजिटल नियंत्रण के साथ-साथ बड़े घरेलू प्रौद्योगिकी उद्योग का निर्माण किया। इस मॉडल में— घरेलू मंच, घरेलू भुगतान प्रणाली, घरेलू ई-कॉमर्स, घरेलू क्लाउड सेवाएं और तेजी से विकसित होती घरेलू कृत्रिम बुद्धिमत्ता— एक-दूसरे से जुड़ते हैं। इसलिए चीन की डिजिटल संप्रभुता केवल “क्या रोका जाए” की नीति नहीं है। वह “क्या स्वयं विकसित किया जाए” की नीति भी है। यह पहलू भारत सहित अन्य देशों के लिए अध्ययन योग्य है, भले ही वे चीन की राजनीतिक नियंत्रण व्यवस्था को स्वीकार न करें।

17.4 Cybersecurity Law — कानूनी आधार

चीन का Cybersecurity Law 2016 में अपनाया गया और 2017 में प्रभावी हुआ। उसने नेटवर्क संचालन, ऑनलाइन उत्पाद एवं सेवाओं, डेटा तथा सूचना सुरक्षा के लिए व्यापक कानूनी ढांचा बनाया। चीन की सरकार इसे अपने विकसित साइबर कानूनी तंत्र के प्रमुख स्तंभों में गिनती है। (State Council Information Office) इसके तहत नेटवर्क संचालकों पर साइबर सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियां हैं और महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना के लिए अतिरिक्त सुरक्षा प्रावधान बनाए गए। 2025 में चीन ने इस कानून में संशोधन भी किया। संशोधन का एक घोषित उद्देश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास से पैदा हुए नए जोखिमों और कानूनी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखना था। संशोधन अक्टूबर 2025 में चीन की राष्ट्रीय जन कांग्रेस की स्थायी समिति द्वारा स्वीकृत हुआ। (State Council Information Office) इससे यह स्पष्ट है कि चीन भी अपनी डिजिटल कानूनी संरचना को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग के अनुरूप बदल रहा है।

17.5 डेटा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ना

चीन का डिजिटल शासन केवल ऑनलाइन सामग्री तक सीमित नहीं है। डेटा को भी राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संसाधन के रूप में देखा जाता है। Data Security Law—डेटा सुरक्षा कानून 2021 में अपनाया गया। यह डेटा के वर्गीकरण, सुरक्षा और सरकारी डेटा सहित विभिन्न श्रेणियों के संरक्षण के लिए व्यापक ढांचा बनाता है। (State Post Bureau of China) इसके साथ Personal Information Protection Law—व्यक्तिगत सूचना संरक्षण कानून लागू किया गया, जिसका उद्देश्य नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी के उपयोग को नियंत्रित करना और उसके अनुचित प्रसंस्करण को रोकना है। कानून स्पष्ट करता है कि किसी भी संगठन या व्यक्ति को प्राकृतिक व्यक्तियों के व्यक्तिगत सूचना अधिकारों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। (State Post Bureau of China) इसलिए यह समझना गलत होगा कि चीन में गोपनीयता का कोई कानून ही नहीं है। असल अंतर यह है कि चीन में व्यक्तिगत गोपनीयता संरक्षण और राज्य की राष्ट्रीय सुरक्षा शक्तियां समानांतर रूप से मौजूद हैं, और राज्य की भूमिका पश्चिमी लोकतंत्रों की तुलना में कहीं अधिक व्यापक है।

17.6 2025 से Network Data Security Regulations

चीन ने नेटवर्क डेटा सुरक्षा को और विस्तृत करने के लिए Regulations on Network Data Security Management जारी किए, जो 1 जनवरी 2025 से लागू हुए। इनका उद्देश्य नेटवर्क डेटा प्रसंस्करण गतिविधियों को नियंत्रित करना, व्यक्तियों और संगठनों के वैध अधिकारों की रक्षा करना तथा राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक हित को सुरक्षित करना बताया गया। (State Council of China) यह चीनी मॉडल की एक महत्वपूर्ण विशेषता को फिर स्पष्ट करता है—

17.7 डेटा देश से बाहर भेजने पर नियंत्रण

चीन ने कुछ प्रकार के डेटा के सीमा-पार स्थानांतरण पर भी नियंत्रण की व्यवस्था विकसित की है। महत्वपूर्ण डेटा तथा कुछ परिस्थितियों में व्यक्तिगत जानकारी को विदेश भेजने पर सुरक्षा मूल्यांकन और अन्य कानूनी शर्तें लागू हो सकती हैं। चीन की सरकारी नीति व्याख्याओं में महत्वपूर्ण डेटा और व्यक्तिगत सूचना के सीमा-पार हस्तांतरण के लिए सुरक्षा समीक्षा का उल्लेख किया गया है। (State Council of China) यह डेटा संप्रभुता का प्रत्यक्ष रूप है। चीन का सिद्धांत है— यदि डेटा राष्ट्रीय सुरक्षा या महत्वपूर्ण सार्वजनिक हित से जुड़ा है, तो केवल निजी कंपनी का व्यावसायिक निर्णय पर्याप्त नहीं होगा। राज्य को उस डेटा के देश से बाहर जाने पर नियंत्रण रखने का अधिकार है।

17.8 सामग्री नियंत्रण — चीनी मॉडल का सबसे विवादास्पद पक्ष

चीन में सोशल मीडिया और इंटरनेट सामग्री पर राज्य की निगरानी और नियंत्रण पश्चिमी लोकतंत्रों की तुलना में बहुत व्यापक है। ऑनलाइन सेवाओं को ऐसी सामग्री हटानी या सीमित करनी पड़ सकती है जिसे चीनी कानून और नियामक व्यवस्था प्रतिबंधित करती है। राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषयों, राज्य नेतृत्व, विरोध प्रदर्शनों, राष्ट्रीय सुरक्षा और अन्य मामलों में सूचना नियंत्रण कठोर हो सकता है। स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय आकलनों में चीन को ऑनलाइन अभिव्यक्ति और मीडिया स्वतंत्रता पर कठोर नियंत्रण रखने वाली अधिनायकवादी व्यवस्था के रूप में वर्णित किया जाता है। Freedom House के वर्तमान देश आकलन के अनुसार चीनी कम्युनिस्ट पार्टी मीडिया, ऑनलाइन अभिव्यक्ति और राजनीतिक जीवन पर व्यापक नियंत्रण रखती है। (Freedom House) यहीं चीन का मॉडल लोकतांत्रिक डिजिटल संप्रभुता से मूलतः अलग हो जाता है।

17.9 चीन अपनी व्यवस्था को कैसे उचित ठहराता है?

चीन का आधिकारिक पक्ष अलग है। उसकी सरकार कहती है कि वह कानून-आधारित साइबर शासन विकसित कर रही है, नागरिकों की वैध ऑनलाइन अभिव्यक्ति और व्यक्तिगत सूचना अधिकारों की रक्षा करती है तथा साथ ही साइबर अपराध, गलत सूचना, राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे और सामाजिक अव्यवस्था पर नियंत्रण रखती है। 2023 के आधिकारिक श्वेतपत्र में चीन ने लोगों के ऑनलाइन वैध अधिकारों और अभिव्यक्ति का सम्मान करने तथा कानून के अनुसार साइबर क्षेत्र संचालित करने की बात कही। (State Council Information Office) इसलिए चीन और उसके आलोचकों के बीच केवल नीति का अंतर नहीं है।

इस मूल प्रश्न का उत्तर दोनों पक्ष बिल्कुल अलग तरीके से देते हैं।

17.10 मंच सरकार से ऊपर नहीं

चीनी मॉडल का एक स्पष्ट सिद्धांत है—

इसलिए घरेलू तकनीकी कंपनियां बहुत बड़ी होने के बावजूद सरकारी कानून और नियामकीय निर्देशों के अधीन रहती हैं। चीन ने हाल के वर्षों में बड़ी तकनीकी कंपनियों के डेटा व्यवहार, प्रतिस्पर्धा और मंचीय शक्ति पर कई कठोर कदम उठाए। पश्चिमी देशों में चिंता अक्सर होती है— “सरकार तकनीकी कंपनियों पर कितना नियंत्रण रखे?” चीन में प्राथमिक प्रश्न लगभग उल्टा है— “राज्य यह कैसे सुनिश्चित करे कि डिजिटल कंपनियां राष्ट्रीय नीति और कानून के अधीन रहें?” यही राज्य-केंद्रित डिजिटल शासन का सार है।

17.11 विदेशी कंपनियों के लिए संदेश

चीन की व्यवस्था विदेशी डिजिटल कंपनियों को भी यह संकेत देती है कि— यदि वे चीनी बाजार में काम करना चाहती हैं तो उन्हें चीनी कानून और सामग्री संबंधी नियम स्वीकार करने होंगे। इस सिद्धांत का परिणाम यह हुआ कि कुछ विदेशी कंपनियों ने स्थानीय नियमों के अनुरूप अपनी सेवाएं सीमित कीं, जबकि कई अन्य ने बाजार छोड़ दिया या उनकी सेवाएं उपलब्ध नहीं रहीं। यह डिजिटल संप्रभुता का सबसे कठोर रूप है—

17.12 चीन और अमेरिका का मूल अंतर

दोनों की तुलना सबसे स्पष्ट है। अमेरिका का प्रारंभिक सिद्धांत—

चीन का सिद्धांत—

अमेरिका में मंच सरकार के सामग्री नियंत्रण का विरोध प्रथम संशोधन के आधार पर कर सकता है। चीन में मंच को ऐसी स्वतंत्र संवैधानिक संपादकीय स्थिति प्राप्त नहीं है। इसीलिए दोनों मॉडल केवल अलग-अलग कानून नहीं हैं। वे राज्य और नागरिक के संबंध की दो अलग राजनीतिक अवधारणाएं हैं।

17.13 चीन और यूरोपीय संघ का अंतर

यह तुलना अधिक सूक्ष्म है। दोनों डेटा सुरक्षा, मंचीय जिम्मेदारी और डिजिटल कंपनियों के नियमन को महत्व देते हैं। दोनों यह स्वीकार करते हैं कि बड़ी तकनीकी कंपनियों को पूरी तरह अपने नियम तय करने की स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती। लेकिन उनके अंतिम उद्देश्य और राजनीतिक संरचना अलग हैं। यूरोपीय संघ का मॉडल— मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा, नियामकीय पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा— पर आधारित है। चीन का मॉडल— राज्य सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता, राष्ट्रीय नियंत्रण और सामाजिक व्यवस्था— को कहीं अधिक प्राथमिकता देता है। इसलिए दोनों द्वारा “डिजिटल संप्रभुता” कहे जाने पर भी उसका लोकतांत्रिक अर्थ समान नहीं है।

17.14 कृत्रिम बुद्धिमत्ता और चीन

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में चीन तेजी से अपनी घरेलू क्षमता विकसित कर रहा है। साथ ही उसका नियामकीय दृष्टिकोण यह रहा है कि नई तकनीक राष्ट्रीय कानून और सामाजिक शासन से बाहर न रहे। 2025 में Cybersecurity Law संशोधन के समय आधिकारिक विवरण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान को समर्थन देने के साथ उससे उत्पन्न जोखिमों को नियंत्रित करने की आवश्यकता भी बताई गई। (State Council Information Office) इससे वही दोहरा सिद्धांत सामने आता है जो चीन के डिजिटल मॉडल में बार-बार दिखाई देता है—

17.15 तकनीकी आत्मनिर्भरता का सामरिक महत्व

अमेरिका-चीन तकनीकी प्रतिस्पर्धा ने चीन के लिए घरेलू तकनीकी क्षमता को और महत्वपूर्ण बना दिया है। सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड, दूरसंचार और साइबर सुरक्षा अब केवल व्यावसायिक क्षेत्र नहीं हैं। वे सामरिक क्षमता के क्षेत्र बन चुके हैं। चीन ने आधिकारिक नीति में तकनीकी आत्मनिर्भरता और राज्य रहस्य तथा डेटा सुरक्षा के बीच संबंध पर भी जोर दिया है। 2024 में राज्य रहस्य संबंधी नियमों के अद्यतन में तकनीकी आत्मनिर्भरता और डेटा सुरक्षा को प्रमुख संदर्भों में रखा गया। (State Council of China) यहीं डिजिटल संप्रभुता का दूसरा रूप दिखाई देता है—

17.16 क्या Great Firewall ने चीन को तकनीकी रूप से पीछे किया?

सरल उत्तर—नहीं। चीन ने विदेशी मंचों की अनुपस्थिति के बावजूद दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में से एक विकसित किया है। उसकी घरेलू कंपनियां ई-कॉमर्स, मोबाइल भुगतान, सोशल मीडिया, लघु वीडियो, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य क्षेत्रों में वैश्विक स्तर तक पहुंची हैं। इससे चीनी मॉडल के समर्थकों को एक तर्क मिलता है— डिजिटल आत्मनिर्भरता और घरेलू उद्योग विकास साथ-साथ हो सकते हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है— प्रतिस्पर्धी विदेशी सेवाओं की सीमित उपलब्धता उपयोगकर्ता के विकल्प कम करती है और घरेलू कंपनियों को संरक्षित बाजार देती है। इसलिए घरेलू तकनीकी सफलता और खुले बाजार की अनुपस्थिति—दोनों को साथ देखना चाहिए।

17.17 चीन के मॉडल की सबसे बड़ी ताकत

यदि इसे केवल राज्य क्षमता के दृष्टिकोण से देखें तो चीनी मॉडल की सबसे बड़ी ताकत है—

सरकार किसी मंच पर कार्रवाई करना चाहे तो उसे लंबी बहुदलीय राजनीतिक सहमति की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम होती है। डेटा, साइबर सुरक्षा, सामग्री और डिजिटल कंपनियों पर नीति एक व्यापक राज्य रणनीति के भीतर लागू की जा सकती है। इससे राष्ट्रीय डिजिटल नीति में उच्च स्तर का केंद्रीकरण संभव होता है। संकट की स्थिति में सरकार के पास मंचों और डेटा व्यवस्था पर व्यापक नियंत्रण रहता है।

17.18 और सबसे बड़ी कमजोरी

लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से यही सबसे बड़ी कमजोरी भी है। जब— नियामक, राज्य, राजनीतिक सत्ता और सूचना नियंत्रण— एक ही शक्ति-संरचना के अधीन हों, तो नागरिक के लिए राज्य के निर्णय को चुनौती देने का क्षेत्र सीमित हो सकता है। किसी सामग्री को “राष्ट्रीय सुरक्षा”, “सामाजिक व्यवस्था” या दूसरे व्यापक आधार पर हटाए जाने की स्थिति में स्वतंत्र सार्वजनिक और न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश पश्चिमी लोकतंत्रों की तुलना में काफी कम होती है। यही कारण है कि चीन का मॉडल प्रभावी डिजिटल संप्रभुता प्रदान कर सकता है, लेकिन वही मॉडल नागरिक डिजिटल स्वतंत्रता के लिए गंभीर प्रश्न पैदा करता है। (Freedom House)

17.19 क्या चीन का मॉडल दूसरे देश अपना सकते हैं?

तकनीकी रूप से उसके कुछ तत्व अपनाए जा सकते हैं— डेटा सुरक्षा, महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना की रक्षा, घरेलू प्रौद्योगिकी क्षमता, विदेशी मंचों पर राष्ट्रीय कानून का प्रभावी अनुप्रयोग, और महत्वपूर्ण डेटा की रणनीतिक सुरक्षा। लेकिन उसका पूरा मॉडल अपनाना राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ा प्रश्न है। किसी लोकतंत्र के लिए चीन जैसी सामग्री नियंत्रण व्यवस्था अपनाने का अर्थ केवल तकनीकी नीति बदलना नहीं होगा। वह नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक संरचना को भी बदल सकता है। इसीलिए चीन से क्षमता सीखी जा सकती है, लेकिन नियंत्रण की संरचना को लोकतांत्रिक व्यवस्था में हूबहू नहीं अपनाया जा सकता।

17.20 भारत और चीन — समान प्रश्न, अलग उत्तर

भारत और चीन दोनों विशाल डिजिटल समाज हैं। दोनों के लिए— डेटा सुरक्षा, विदेशी डिजिटल कंपनियां, साइबर सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और घरेलू तकनीकी क्षमता— महत्वपूर्ण हैं। लेकिन राजनीतिक व्यवस्था अलग है। भारत में संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार देता है और सरकारी प्रतिबंध न्यायिक समीक्षा के अधीन हो सकते हैं। इसलिए भारत यदि डिजिटल संप्रभुता विकसित करता है तो उसका मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें— राष्ट्रीय कानून की प्रभावी शक्ति हो, विदेशी कंपनियां जवाबदेह हों, घरेलू तकनीकी क्षमता मजबूत हो, लेकिन सरकार की डिजिटल शक्ति भी संविधान और न्यायपालिका के अधीन रहे। यही भारतीय मॉडल को चीनी मॉडल से अलग रखने वाली मूल रेखा होनी चाहिए।

17.21 चीन से भारत क्या सीख सकता है?

कुछ महत्वपूर्ण सबक हैं।

उसके लिए घरेलू तकनीकी क्षमता आवश्यक है।

महत्वपूर्ण डेटा के विदेशी नियंत्रण और निर्भरता का प्रश्न राष्ट्रीय नीति का विषय होना चाहिए।

लेकिन इसके साथ भारत को चीन से एक विपरीत सबक भी लेना चाहिए—

17.22 पांच वैश्विक मॉडलों की तस्वीर

अब तक अध्ययन किए गए पांचों मॉडल एक दिलचस्प तुलना प्रस्तुत करते हैं।

मंचीय स्वतंत्रता और सुरक्षित आश्रय।

प्रणालीगत जवाबदेही और बाजार शक्ति नियंत्रण।

ऑनलाइन सुरक्षा और जोखिम आधारित पूर्व सावधानी।

डिजिटल मंच और समाचार उद्योग के आर्थिक शक्ति-संतुलन पर हस्तक्षेप।

राज्य-केंद्रित साइबर संप्रभुता और घरेलू डिजिटल पारिस्थितिकी। इनमें कोई मॉडल भारत के लिए सीधे तैयार समाधान नहीं देता। लेकिन सभी मिलकर यह दिखाते हैं कि डिजिटल शासन वास्तव में कई अलग समस्याओं का सम्मिलित नाम है— अभिव्यक्ति, सुरक्षा, बाजार शक्ति, डेटा, पत्रकारिता, राष्ट्रीय सुरक्षा और राज्य की सीमा।

17.23 निष्कर्ष

चीन ने दुनिया के सामने डिजिटल संप्रभुता का सबसे स्पष्ट और सबसे कठोर राज्य-केंद्रित मॉडल प्रस्तुत किया है। उसका मूल सिद्धांत है—

इस विचार के आधार पर उसने— विदेशी मंचों की पहुंच नियंत्रित की, घरेलू डिजिटल कंपनियां विकसित कीं, डेटा और साइबर सुरक्षा के व्यापक कानून बनाए, सीमा-पार डेटा प्रवाह पर नियंत्रण विकसित किया, और ऑनलाइन सूचना व्यवस्था को राज्य की राजनीतिक तथा सुरक्षा संरचना के भीतर रखा। (China Anti-Corruption Agency) इस मॉडल की ताकत स्पष्ट है—

लेकिन उसकी कीमत भी स्पष्ट है— ऑनलाइन अभिव्यक्ति पर व्यापक राज्य नियंत्रण और स्वतंत्र सार्वजनिक विमर्श की सीमित गुंजाइश। (Freedom House) इसलिए चीन का अनुभव डिजिटल संप्रभुता की बहस को एक महत्वपूर्ण चेतावनी देता है। यदि राज्य बहुत कमजोर हो तो वैश्विक डिजिटल कंपनियां और विदेशी शक्तियां उसकी सूचना व्यवस्था पर असामान्य प्रभाव प्राप्त कर सकती हैं। लेकिन यदि राज्य की डिजिटल शक्ति पर संवैधानिक सीमा न हो तो वही संप्रभुता नागरिक स्वतंत्रता को सीमित करने का साधन बन सकती है। भारत के लिए चुनौती इन दोनों अतियों के बीच अपना रास्ता खोजने की है—

विश्व के पांच मॉडलों की तुलना के बाद अब अध्ययन भारत के वास्तविक अनुभवों पर लौटता है—जहां सिद्धांत सीधे विवादों, सरकारी आदेशों, न्यायालयों, सोशल मीडिया कंपनियों और डीपफेक की वास्तविक घटनाओं से टकराता है।