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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–019 · अध्याय 08

31 अक्टूबर की रात — स्वतःस्फूर्त आक्रोश से संगठित हिंसा की ओर संक्रमण

31 अक्टूबर 1984 की रात सिख-विरोधी हिंसा के इतिहास में निर्णायक मोड़ थी। सुबह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी। दोपहर तक एम्स के बाहर आक्रोशपूर्ण भीड़ जमा हो चुकी थी। सिख यात्रियों से मारपीट शुरू हो गई थी और शाम तक राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के काफिले पर भी पत्थर फेंके जा चुके थे।

लेकिन 1 नवंबर की सुबह दिल्ली ने जिस प्रकार की हिंसा देखी, वह 31 अक्टूबर की दोपहर की हिंसा से गुणात्मक रूप से अलग थी।

अब केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं थी। अनेक स्थानों पर भीड़ बड़ी थी। लक्ष्य अधिक स्पष्ट थे। सिख घरों, दुकानों, टैक्सियों और गुरुद्वारों को पहचानकर निशाना बनाया गया। कुछ क्षेत्रों में ज्वलनशील पदार्थों का इस्तेमाल हुआ। पुरुषों को घरों से बाहर निकालकर मारा गया। कई गवाहों ने स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं पर भीड़ को निर्देशित करने के आरोप लगाए।

न्यायमूर्ति जी.टी. नानावती आयोग ने इसी बदलाव को विशेष महत्व दिया। आयोग ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कहा कि 31 अक्टूबर की शुरुआती घटनाएं मुख्यतः हत्या से उत्पन्न आक्रोश की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया जैसी थीं, लेकिन 1 नवंबर की सुबह से हमलों का स्वरूप बदल गया और वे व्यवस्थित ढंग से सिखों तथा उनकी संपत्तियों को निशाना बनाने लगे।

इसलिए 31 अक्टूबर की रात का सबसे बड़ा प्रश्न है—

दोपहर की अपेक्षाकृत असंगठित हिंसा अगले दिन सुबह तक इतने बड़े, लक्षित और अनेक स्थानों पर समान स्वरूप वाले हमलों में कैसे बदल गई?

इस प्रश्न का उत्तर खोजते समय दो अतियों से बचना आवश्यक है।

पहली—यह मान लेना कि सब कुछ स्वतःस्फूर्त था।

दूसरी—बिना पर्याप्त प्रमाण यह घोषित कर देना कि दिल्ली की प्रत्येक घटना किसी एक केंद्रीय कमांड से संचालित की गई थी।

उपलब्ध आयोग रिपोर्टें, अदालती फैसले, पुलिस रिकॉर्ड और गवाहियां इनके बीच की कहीं अधिक जटिल तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।

1. शाम तक दिल्ली के सामने खतरा स्पष्ट हो चुका था

31 अक्टूबर की शाम तक प्रशासन के सामने कई चेतावनी संकेत मौजूद थे।

प्रधानमंत्री की हत्या दो सिख सुरक्षा कर्मचारियों ने की थी।

हमलावरों की धार्मिक पहचान सार्वजनिक हो चुकी थी।

एम्स के आसपास सिख-विरोधी नारे लगाए जा रहे थे।

सिख यात्रियों को बसों से उतारकर पीटा गया था।

सिखों के वाहनों को निशाना बनाया जा रहा था।

और राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के काफिले तक पर पत्थरबाजी हो चुकी थी।

नानावती आयोग ने 31 अक्टूबर की घटनाओं का पुनर्निर्माण करते हुए माना कि शाम तक सिखों पर हमले शुरू हो चुके थे। लेकिन आयोग ने यह भी नोट किया कि उस समय हिंसा अभी अगले दिन वाली संगठित प्रकृति की नहीं थी।

इसका अर्थ है कि प्रशासन के सामने एक निवारक खिड़की मौजूद थी।

यदि उसी शाम व्यापक पुलिस कार्रवाई होती तो आगे का घटनाक्रम अलग हो सकता था।

2. 31 अक्टूबर और 1 नवंबर की हिंसा में अंतर

नानावती आयोग का यह निष्कर्ष पूरे मामले को समझने की कुंजी है।

आयोग के अनुसार 31 अक्टूबर को हमला करने वाले समूहों के पास जो कुछ आसपास उपलब्ध था, उसी से वे मारपीट या नुकसान कर रहे थे।

लेकिन 1 नवंबर से स्थिति बदल गई।

भीड़ के पास—

ज्वलनशील पदार्थ,

लोहे की छड़ें,

अन्य हथियार,

और कुछ स्थानों पर सिख घरों तथा दुकानों की पहचान करने वाली स्थानीय जानकारी—

दिखाई देने लगी।

आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि इस परिवर्तन से यह संकेत मिलता है कि 31 अक्टूबर की रात के दौरान संगठित होने की प्रक्रिया हुई।

यही निष्कर्ष महत्वपूर्ण है।

आयोग ने यह नहीं कहा कि दिल्ली की प्रत्येक भीड़ एक केंद्रीय नियंत्रण कक्ष से संचालित हो रही थी।

लेकिन उसने यह मानने से भी इनकार किया कि 1 नवंबर की पूरी हिंसा अचानक पैदा हुई स्वतःस्फूर्त भीड़ की प्रतिक्रिया थी।

3. क्या 31 अक्टूबर की रात बैठकें हुई थीं?

पीड़ितों, प्रत्यक्षदर्शियों और नागरिक अधिकार संगठनों के अनेक बयानों में आरोप लगाया गया कि 31 अक्टूबर की शाम और रात दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की बैठकें हुईं।

इन बैठकों में कथित रूप से—

लोगों को जुटाया गया,

अगले दिन के लिए समूह बनाए गए,

सिखों के घरों और प्रतिष्ठानों की जानकारी जुटाई गई,

वाहनों की व्यवस्था की गई,

और स्थानीय स्तर पर भीड़ को निर्देश दिए गए।

लेकिन यहां प्रमाण के स्तर को अलग करना आवश्यक है।

दिल्ली भर के लिए एक केंद्रीय बैठक हुई और उसी में पूरे नरसंहार की योजना बनी—ऐसा निर्णायक न्यायिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

इसके विपरीत अधिक मजबूत साक्ष्य स्थानीय स्तर पर विभिन्न राजनीतिक नेटवर्क और नेताओं की भूमिका से संबंधित हैं।

नानावती आयोग ने भी व्यापक केंद्रीय षड्यंत्र और स्थानीय राजनीतिक संगठन के बीच यह फर्क रखा।

4. नानावती आयोग का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष

नानावती आयोग ने लगभग दो दशकों बाद उपलब्ध हजारों हलफनामों, पूर्व आयोगों के रिकॉर्ड, पुलिस दस्तावेजों और गवाहियों की समीक्षा की।

उसका निष्कर्ष था कि इस बात के विश्वसनीय साक्ष्य हैं कि स्थानीय कांग्रेस(I) नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कई स्थानों पर हमलों को उकसाया या उनमें सहायता की।

लेकिन आयोग ने साथ ही कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह स्थापित हो कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी या कांग्रेस के शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व ने सिखों पर हमले आयोजित करने के लिए कोई निर्देश दिया था।

यह अंतर इस अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इसलिए तथ्यात्मक निष्कर्ष यह होना चाहिए—

स्थानीय राजनीतिक सहभागिता के गंभीर और कई मामलों में विश्वसनीय प्रमाण मिले; लेकिन पूरे नरसंहार के लिए एक सिद्ध केंद्रीय आदेश का प्रमाण आयोग को नहीं मिला।

5. स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क इतने महत्वपूर्ण क्यों थे?

1984 की दिल्ली आज की दिल्ली से प्रशासनिक और सामाजिक रूप से अलग थी।

स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता अपने क्षेत्रों के लोगों को व्यक्तिगत रूप से जानते थे।

उन्हें पता था—

कौन-सा घर किसका है,

किस बाजार में किसकी दुकान है,

कौन टैक्सी चलाता है,

कौन किस राजनीतिक दल से जुड़ा है,

और किस कॉलोनी में कितने सिख परिवार रहते हैं।

यही स्थानीय ज्ञान हिंसा में अत्यंत खतरनाक हो सकता था।

बाहरी भीड़ को किसी मोहल्ले में सिख परिवारों की पहचान करने में कठिनाई होती।

लेकिन यदि कोई स्थानीय व्यक्ति उसे निर्देशित करे तो काम आसान हो जाता।

आगे सज्जन कुमार से जुड़े मामलों में गवाहियों और न्यायिक निष्कर्षों ने इसी स्थानीय राजनीतिक प्रभाव के महत्व को सामने रखा।

6. सज्जन कुमार का क्षेत्र — स्थानीय नेतृत्व की शक्ति का उदाहरण

सज्जन कुमार उस समय कांग्रेस के प्रभावशाली सांसद थे और बाहरी दिल्ली में उनका मजबूत राजनीतिक आधार था।

बाद के वर्षों में उनके खिलाफ कई मामलों में आरोप लगे कि उन्होंने भीड़ को सिखों के विरुद्ध उकसाया।

सबसे महत्वपूर्ण मामला दिल्ली के राज नगर में पांच सिखों की हत्या से जुड़ा था।

2018 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने सज्जन कुमार को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने 1984 की हिंसा को एक असाधारण सामूहिक अपराध बताते हुए यह भी कहा कि बड़े पैमाने के अपराधों में राजनीतिक संरक्षण और जांच एजेंसियों की विफलता अपराधियों को लंबे समय तक बचा सकती है।

यह फैसला 31 अक्टूबर की रात हुई किसी एक विशेष बैठक का स्वतः प्रमाण नहीं है।

लेकिन यह इस व्यापक प्रश्न का महत्वपूर्ण उत्तर देता है कि—

क्या प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्ति वास्तव में बाद की हिंसा में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे?

कम-से-कम सज्जन कुमार से जुड़े सिद्ध मामले में न्यायालय का उत्तर हां था।

7. जगदीश टाइटलर और एच.के.एल. भगत

1984 की हिंसा से जुड़े आरोपों में अन्य प्रमुख कांग्रेस नेताओं के नाम भी सामने आए।

इनमें जगदीश टाइटलर और एच.के.एल. भगत विशेष रूप से चर्चित रहे।

नानावती आयोग ने जगदीश टाइटलर के संबंध में कहा कि उपलब्ध सामग्री से उनके खिलाफ यह मानने के लिए विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद हैं कि उन्होंने भीड़ को सिखों पर हमला करने के लिए उकसाया था। आयोग ने उनके मामले में आगे कार्रवाई की सिफारिश की।

लेकिन प्रत्येक आरोपी नेता की कानूनी स्थिति अलग-अलग रही।

इसलिए सभी नामों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।

आरोप,

गवाही,

आयोग निष्कर्ष,

CBI जांच,

और न्यायिक परिणाम—

अलग-अलग देखेंगे।

8. क्या मतदाता सूचियां बांटी गईं?

1984 की हिंसा के सबसे चर्चित आरोपों में एक यह है कि हमलावरों को सिख परिवारों की पहचान के लिए मतदाता सूचियां उपलब्ध कराई गईं।

कई पीड़ितों और नागरिक अधिकार समूहों ने यह आरोप लगाया।

कुछ क्षेत्रों में जिस सटीकता से सिख घर और दुकानें चुनी गईं, उसने इस आशंका को मजबूत किया।

लेकिन शोध की दृष्टि से सावधानी जरूरी है।

दिल्ली के प्रत्येक क्षेत्र में मतदाता सूची इस्तेमाल हुई—यह सिद्ध तथ्य नहीं है।

कई क्षेत्रों में स्थानीय लोगों को स्वयं पता था कि कौन-सा घर सिख परिवार का है।

दुकानों पर नाम लिखे थे।

टैक्सी और परिवहन व्यवसाय में सिखों की पहचान आसानी से दिखाई देती थी।

इसलिए सही निष्कर्ष होगा—

कुछ गवाहियों में मतदाता सूचियों अथवा अन्य सूचियों के इस्तेमाल के आरोप हैं; लेकिन पूरे दिल्ली नरसंहार के लिए मतदाता सूची का व्यवस्थित केंद्रीय वितरण न्यायिक रूप से सार्वभौमिक तथ्य के रूप में स्थापित नहीं हुआ।

9. केरोसिन और ज्वलनशील पदार्थों का प्रश्न

1 नवंबर से हमलों में आग लगाने की एक भयावह समान पद्धति दिखाई देने लगी।

सिख पुरुषों को पीटा जाता।

उन पर ज्वलनशील पदार्थ डाला जाता।

कई मामलों में टायर उनके शरीर पर डालकर आग लगा दी जाती।

घर, दुकानें और गुरुद्वारे जलाए जाते।

यह प्रश्न स्वाभाविक है—

इतनी बड़ी मात्रा में ज्वलनशील पदार्थ अचानक कहां से आया?

गवाहियों में केरोसिन, पेट्रोल और अन्य ज्वलनशील पदार्थों की आपूर्ति के आरोप सामने आए।

कुछ मामलों में स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं या राशन दुकानों से सामग्री मिलने के आरोप भी लगाए गए।

नानावती आयोग ने 1 नवंबर की भीड़ के अधिक तैयार होकर निकलने को संगठन का संकेत माना।

लेकिन यहां भी पूरे शहर के लिए किसी एक केंद्रीय आपूर्ति तंत्र का निर्णायक प्रमाण नहीं है।

अधिक संभावित तस्वीर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग स्रोतों से सामग्री जुटाए जाने की है।

10. भीड़ में अपराधी तत्व

सांप्रदायिक हिंसा में राजनीतिक उकसावे और अपराधी अवसरवाद अक्सर साथ चलते हैं।

31 अक्टूबर की रात तक यह खबर फैल चुकी थी कि सिखों के खिलाफ वातावरण बन रहा है।

अगले दिन अनेक स्थानों पर लूटपाट भी हिंसा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।

पहले दुकान लूटी गई।

फिर जलाई गई।

घरों से सामान निकाला गया।

वाहन लूटे या जलाए गए।

इससे स्पष्ट है कि भीड़ में केवल राजनीतिक कार्यकर्ता या शोकाकुल नागरिक नहीं थे।

स्थानीय अपराधी और लूट के अवसर की तलाश करने वाले तत्व भी शामिल हो गए।

यही मिश्रण—

राजनीतिक संरक्षण + सांप्रदायिक उत्तेजना + स्थानीय अपराधी तत्व + निष्क्रिय पुलिस

किसी भी सामूहिक हिंसा को अत्यंत घातक बना सकता है।

11. पुलिस की सबसे बड़ी जिम्मेदारी इसी रात से शुरू होती है

31 अक्टूबर की दोपहर तक पुलिस यह तर्क दे सकती थी कि स्थिति अप्रत्याशित रूप से विकसित हो रही थी।

लेकिन शाम के बाद यह तर्क कमजोर पड़ जाता है।

पुलिस को पता था—

सिखों पर हमले हो रहे हैं।

भीड़ इकट्ठी हो रही है।

राष्ट्रपति के काफिले तक पर हमला हुआ है।

सांप्रदायिक नारे लगाए जा रहे हैं।

शहर में तनाव फैल रहा है।

ऐसी स्थिति में सामान्य पुलिस प्रोटोकॉल होना चाहिए था—

सभी संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त बल,

रातभर गश्त,

सांप्रदायिक नेताओं से संपर्क,

गुरुद्वारों की सुरक्षा,

भीड़ जुटने से रोकना,

निवारक गिरफ्तारियां,

और गंभीर क्षेत्रों में कर्फ्यू।

यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक विफलता का प्रश्न गंभीर हो जाता है।

12. दिल्ली पुलिस की प्रतिक्रिया क्यों अपर्याप्त रही?

बाद की जांच समितियों ने पुलिस की भूमिका की कठोर आलोचना की।

नानावती आयोग ने पूर्ववर्ती जांचों के निष्कर्षों पर विचार करते हुए पाया कि कई क्षेत्रों में पुलिस या तो निष्क्रिय रही या आवश्यक दृढ़ता से कार्रवाई नहीं की।

कुछ पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध यह आरोप भी सामने आया कि उन्होंने भीड़ को रोकने के बजाय सिखों को अपने हथियार जमा कराने के लिए कहा।

कुछ स्थानों पर पीड़ितों की FIR ठीक से दर्ज नहीं की गई।

कई मामलों को एक सामान्य FIR में मिला दिया गया।

आरोपियों के नाम हटाए गए या दर्ज नहीं किए गए।

इनमें से अनेक समस्याएं बाद के दिनों में सामने आईं, लेकिन उनकी प्रशासनिक जड़ 31 अक्टूबर की रात की अपर्याप्त तैयारी में दिखाई देती है।

13. पुलिस वायरलेस नेटवर्क क्या बता रहा था?

दिल्ली पुलिस का अपना वायरलेस नेटवर्क शहरभर की घटनाओं की सूचना प्राप्त कर रहा था।

विभिन्न क्षेत्रों से भीड़, मारपीट और आगजनी की खबरें आने लगी थीं।

अर्थात शीर्ष पुलिस अधिकारियों के पास शहर में बिगड़ती स्थिति का समेकित चित्र बनने की संभावना थी।

यही कारण है कि बाद की जांच में केवल स्थानीय SHO की जिम्मेदारी नहीं देखी गई।

प्रश्न ऊपर तक गया—

पुलिस आयुक्त,

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी,

दिल्ली प्रशासन,

उपराज्यपाल,

और गृह मंत्रालय।

यदि अलग-अलग क्षेत्रों से एक ही प्रकार के हमलों की खबर आ रही थी, तो केंद्रीय नियंत्रण कक्ष को समझना चाहिए था कि यह स्थानीय झगड़ा नहीं बल्कि राजधानी-स्तरीय सांप्रदायिक संकट है।

14. क्या कर्फ्यू लगाया गया?

कुछ क्षेत्रों में प्रतिबंधात्मक आदेश और बाद में कर्फ्यू लगाया गया, लेकिन आलोचना यह रही कि यह पर्याप्त तेजी और प्रभावशीलता से लागू नहीं हुआ।

कर्फ्यू केवल घोषणा से प्रभावी नहीं होता।

उसके लिए चाहिए—

सड़क पर पुलिस,

गिरफ्तारी की वास्तविक कार्रवाई,

भीड़ के खिलाफ बल प्रयोग की तैयारी,

वाहनों की आवाजाही रोकना,

और उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई।

अगले दिन कई इलाकों में बड़ी भीड़ खुलेआम घूमती रही।

इससे स्पष्ट है कि जो प्रतिबंध लगाए भी गए, वे हिंसा रोकने के लिए पर्याप्त प्रभावी नहीं थे।

15. सेना कब बुलाई गई?

यह 1984 के सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रश्नों में से है।

दिल्ली में सेना उपलब्ध थी।

लेकिन नागरिक क्षेत्रों में उसकी प्रभावी तैनाती समय पर नहीं हुई।

नानावती आयोग ने पूर्व जांचों का उल्लेख करते हुए दर्ज किया कि 31 अक्टूबर की मध्यरात्रि तक लगभग 5,000 सैनिक दिल्ली में उपलब्ध थे।

इसके बावजूद उन्हें तत्काल प्रभावी ढंग से हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में इस्तेमाल नहीं किया गया।

यह तथ्य राज्य की प्रतिक्रिया पर गंभीर प्रश्न उठाता है।

यदि राजधानी में हजारों सैनिक उपलब्ध थे और सिख-विरोधी हिंसा शुरू हो चुकी थी, तो उन्हें रात में ही संवेदनशील इलाकों में क्यों नहीं लगाया गया?

16. सेना के पास केवल सैनिक होना पर्याप्त नहीं था

सेना को नागरिक दंगा नियंत्रण में उतारने के लिए प्रशासनिक समन्वय चाहिए।

उसे क्षेत्र बताने होते हैं।

मजिस्ट्रेट उपलब्ध कराने होते हैं।

स्थानीय मार्गदर्शन चाहिए।

पुलिस से संपर्क चाहिए।

आदेश स्पष्ट होने चाहिए।

इसलिए केवल यह कहना कि “सेना दिल्ली में थी” पर्याप्त नहीं।

असली प्रश्न है—

नागरिक प्रशासन ने सेना का प्रभावी उपयोग कब किया?

यदि सैनिक छावनी में उपलब्ध हों लेकिन हिंसाग्रस्त कॉलोनी तक न पहुंचें, तो पीड़ित नागरिक के लिए उनकी उपलब्धता का कोई अर्थ नहीं।

17. क्या सेना को जानबूझकर रोका गया?

यह गंभीर आरोप कई वर्षों से लगाया जाता रहा है।

लेकिन उपलब्ध जांच रिकॉर्ड से पूरे राज्य तंत्र के स्तर पर ऐसा स्पष्ट आदेश सिद्ध नहीं हुआ कि सेना को जानबूझकर सिखों को मरने देने के लिए रोका जाए।

इसके बजाय जो तस्वीर सामने आती है वह है—

विलंब,

समन्वय की कमी,

प्रशासनिक निष्क्रियता,

राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी,

और हिंसा की गंभीरता के अनुपात में अपर्याप्त प्रतिक्रिया।

परिणाम पीड़ितों के लिए समान रूप से विनाशकारी था।

राज्य ने सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई।

18. क्या पुलिस को “हस्तक्षेप न करने” के निर्देश मिले थे?

अनेक पीड़ितों और गवाहों ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मी कहते थे कि ऊपर से आदेश नहीं हैं, या वे हस्तक्षेप करने को तैयार नहीं थे।

कुछ मामलों में राजनीतिक नेताओं द्वारा पुलिस को प्रभावित करने के आरोप भी आए।

लेकिन दिल्ली पुलिस के लिए पूरे शहर में लागू किसी लिखित केंद्रीय आदेश—“सिखों को बचाना नहीं है”—का प्रमाण नहीं मिला।

इसलिए इस विषय में भी भाषा सटीक होनी चाहिए।

व्यापक पुलिस निष्क्रियता और कुछ स्थानों पर मिलीभगत के गंभीर प्रमाण/निष्कर्ष हैं; लेकिन पूरे बल के लिए एक लिखित केंद्रीय गैर-हस्तक्षेप आदेश सिद्ध नहीं है।

19. फिर इतनी समान पद्धति कैसे दिखाई दी?

यही प्रश्न “संगठित हिंसा” के पक्ष में सबसे मजबूत तर्कों में है।

अलग-अलग क्षेत्रों में एक जैसी घटनाएं दिखाई दीं—

सिख पुरुषों को अलग करना,

केश काटना,

पगड़ी उतारना,

पीटना,

टायर डालना,

ज्वलनशील पदार्थ डालना,

जिंदा जलाना,

घर और दुकान लूटना,

फिर आग लगाना।

यदि पूरी हिंसा बिल्कुल स्वतःस्फूर्त होती तो इतनी समान कार्य-पद्धति का प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

लेकिन समान पद्धति अपने आप किसी एक केंद्रीय कमांड का प्रमाण भी नहीं है।

सांप्रदायिक हिंसा में तरीके तेजी से एक समूह से दूसरे समूह तक फैल सकते हैं।

स्थानीय राजनीतिक और अपराधी नेटवर्क इस प्रसार को तेज कर सकते हैं।

नानावती आयोग ने इसी कारण व्यापक केंद्रीय आदेश सिद्ध किए बिना हिंसा के बड़े हिस्से को संगठित माना।

20. राजीव गांधी सरकार की तत्काल जिम्मेदारी

31 अक्टूबर की शाम राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

वे व्यक्तिगत रूप से अपनी मां की हत्या के गहरे आघात में थे।

लेकिन शपथ लेते ही वे भारत सरकार के प्रमुख बन चुके थे।

उस क्षण से दिल्ली में प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा केंद्र सरकार की सर्वोच्च जिम्मेदारी थी।

प्रधानमंत्री के पास—

गृह मंत्रालय,

दिल्ली प्रशासन,

पुलिस,

अर्धसैनिक बल,

और सेना—

सभी संस्थागत साधन उपलब्ध थे।

इसलिए आगे के दिनों में हुई प्रशासनिक विफलता का राजनीतिक उत्तरदायित्व सरकार से अलग नहीं किया जा सकता।

यह बात किसी व्यक्तिगत आपराधिक षड्यंत्र का आरोप लगाए बिना भी कही जा सकती है।

आपराधिक संलिप्तता और राजनीतिक/प्रशासनिक उत्तरदायित्व दो अलग प्रश्न हैं।

21. क्या उसी रात राष्ट्र को संबोधित किया गया?

राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ के बाद राष्ट्र से शांति बनाए रखने की अपील की।

लेकिन सवाल यह है कि क्या संदेश पर्याप्त शीघ्र, स्पष्ट और कठोर था।

ऐसी परिस्थिति में आवश्यक संदेश होना चाहिए था—

सिख समुदाय प्रधानमंत्री की हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं है;

किसी सिख नागरिक को छूने वाले पर कठोर कार्रवाई होगी;

पुलिस को गोली चलाने सहित आवश्यक बल प्रयोग के आदेश हैं;

सेना तैनात की जा रही है;

अफवाहों पर विश्वास न करें।

इतिहास में संकट संचार का समय स्वयं नीति बन जाता है।

कुछ घंटे की देरी हजारों लोगों के लिए जीवन और मृत्यु का अंतर हो सकती है।

22. गुरुद्वारों और सिख परिवारों की रात

31 अक्टूबर की रात दिल्ली के सिख परिवारों के लिए अनिश्चितता और भय की रात बन चुकी थी।

दिन में जो लोग प्रधानमंत्री की हत्या से स्वयं स्तब्ध थे, शाम तक उन्हें एहसास होने लगा कि वे स्वयं प्रतिशोध का लक्ष्य बन सकते हैं।

कई परिवारों ने—

पुरुषों को घरों के भीतर छिपाया,

बच्चों और महिलाओं को सुरक्षित स्थान भेजने की कोशिश की,

पड़ोसियों से सहायता मांगी,

गुरुद्वारों में संपर्क किया,

और रातभर जागकर पहरा दिया।

कई हिंदू पड़ोसियों ने सिख परिवारों को अपने घरों में छिपाया।

यह तथ्य भी इतिहास में उतना ही महत्वपूर्ण है।

1984 की दिल्ली को केवल “हिंदू बनाम सिख” के रूप में चित्रित करना गलत होगा।

हिंसा में शामिल भीड़ समाज का एक हिस्सा थी।

अनेक गैर-सिख नागरिकों ने अपने सिख पड़ोसियों की जान बचाई।

23. कुछ इलाकों में हिंसा क्यों नहीं फैली?

यह तुलनात्मक प्रश्न प्रशासनिक जिम्मेदारी समझने में अत्यंत उपयोगी है।

जहां—

पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की,

स्थानीय नेतृत्व ने हिंसा का विरोध किया,

पड़ोसियों ने एकजुट होकर बाहरी भीड़ रोकी,

या सुरक्षा बल समय पर पहुंच गए—

वहां बड़े नरसंहार को रोका जा सका।

इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—

हिंसा अपरिहार्य नहीं थी।

उसे रोका जा सकता था।

इसीलिए जहां राज्य निष्क्रिय रहा, वहां उसकी जिम्मेदारी अधिक गंभीर हो जाती है।

24. 31 अक्टूबर की रात का संभावित संगठनात्मक मॉडल

उपलब्ध प्रमाणों को जोड़कर सबसे सावधानीपूर्ण ऐतिहासिक मॉडल यह बनता है—

प्रधानमंत्री की हत्या से वास्तविक जनाक्रोश पैदा हुआ।

एम्स और अन्य स्थानों पर स्वतःस्फूर्त भीड़ जमा हुई।

सिख-विरोधी नारे और छिटपुट हमले शुरू हुए।

इस वातावरण को कुछ स्थानीय राजनीतिक तत्वों ने भांप लिया।

स्थानीय कार्यकर्ताओं, समर्थकों और अपराधी तत्वों को जुटाया गया।

सिख घरों और दुकानों की स्थानीय जानकारी उपलब्ध हुई।

ज्वलनशील पदार्थ और हथियार जुटाए गए।

पुलिस की कमजोर प्रतिक्रिया ने दंडमुक्ति का संदेश दिया।

और 1 नवंबर की सुबह कई क्षेत्रों में तैयार समूह हिंसा के लिए निकल पड़े।

यह मॉडल न तो “सब कुछ स्वतःस्फूर्त” कहता है और न “एक ही केंद्रीय आदेश से पूरा दिल्ली नरसंहार चला”।

उपलब्ध जांच रिकॉर्ड के सबसे करीब यही मध्यवर्ती निष्कर्ष है।

25. क्या इसे ‘पोग्रोम’ कहा जा सकता है?

1984 की हिंसा के लिए विभिन्न शब्द इस्तेमाल किए गए हैं—

दंगे, सिख-विरोधी दंगे, नरसंहार, pogrom और genocide।

“दंगा” शब्द समस्या पैदा करता है क्योंकि वह सामान्यतः दो समुदायों की परस्पर हिंसा का संकेत देता है।

दिल्ली में बड़ी संख्या में घटनाओं में स्थिति ऐसी नहीं थी।

एक समुदाय मुख्यतः निशाना था।

संगठित भीड़ हमला कर रही थी।

राज्य सुरक्षा पर्याप्त नहीं थी।

इसीलिए अनेक इतिहासकार और मानवाधिकार विशेषज्ञ “pogrom” शब्द को अधिक उपयुक्त मानते हैं।

भारत के आधिकारिक आयोगों ने मुख्यतः “anti-Sikh riots” अथवा “violence” शब्दों का उपयोग किया।

हम इस अध्ययन में कानूनी वर्गीकरण और ऐतिहासिक वर्णन को अलग रखते हुए “सिख-विरोधी नरसंहार/सामूहिक हिंसा” का प्रयोग कर रहे हैं।

26. नानावती आयोग और ‘संगठन’ का प्रश्न

नानावती आयोग के निष्कर्ष का सार अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उसने माना कि—

31 अक्टूबर की शुरुआती हिंसा स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया जैसी थी;

लेकिन 1 नवंबर से सिखों और उनकी संपत्ति पर हमले व्यवस्थित ढंग से हुए;

हमलावर बेहतर तैयार थे;

स्थानीय कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की भागीदारी के विश्वसनीय प्रमाण थे;

लेकिन राजीव गांधी अथवा कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा हमलों के संगठन का कोई प्रमाण नहीं मिला।

यही 31 अक्टूबर की रात को समझने का सबसे मजबूत आधिकारिक आधार है।

27. प्रशासन की निष्क्रियता — गलती या मिलीभगत?

इसका एक ही उत्तर पूरे दिल्ली प्रशासन पर लागू नहीं किया जा सकता।

कुछ अधिकारी विफल रहे।

कुछ निष्क्रिय रहे।

कुछ पर मिलीभगत के आरोप लगे।

कुछ ने लोगों को बचाया।

कुछ ने प्रभावी पुलिस कार्रवाई की।

इसलिए प्रत्येक अधिकारी को अपराधी कहना अनुचित होगा।

लेकिन संस्थागत स्तर पर परिणाम निर्विवाद है—

दिल्ली प्रशासन सिख नागरिकों की प्रभावी सुरक्षा करने में विफल रहा।

जब किसी राजधानी में हजारों नागरिक धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनें और सुरक्षा बल पर्याप्त समय और संसाधन होने के बावजूद उन्हें न बचा पाएं, तो वह केवल व्यक्तिगत अधिकारियों की असफलता नहीं रहती।

वह राज्य की विफलता बन जाती है।

28. 31 अक्टूबर की रात : घटनाक्रम का पुनर्निर्माण

शाम लगभग 5 बजे — राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के काफिले पर पत्थरबाजी; सांप्रदायिक खतरे का स्पष्ट संकेत।

शाम 6 बजे के आसपास — प्रधानमंत्री की मृत्यु की औपचारिक सूचना व्यापक रूप से प्रसारित।

शाम — राजीव गांधी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हैं।

शाम से रात — विभिन्न क्षेत्रों में सिख व्यक्तियों, वाहनों, दुकानों और संपत्तियों पर हमले बढ़ने लगते हैं।

रात — स्थानीय स्तर पर समूहों के जुटने और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गतिविधियों के आरोप बाद की गवाहियों में सामने आते हैं।

रात — पुलिस नियंत्रण कक्ष और थानों तक हिंसा की खबरें पहुंचती रहती हैं।

रात — सिख परिवार संभावित बड़े हमलों की आशंका में घरों और गुरुद्वारों में सुरक्षा की कोशिश करते हैं।

मध्यरात्रि तक — नानावती आयोग द्वारा उद्धृत पूर्व जांच के अनुसार दिल्ली में लगभग 5,000 सैनिक उपलब्ध थे, लेकिन उनका तत्काल व्यापक नागरिक उपयोग नहीं हुआ।

रात से 1 नवंबर की सुबह के बीच — कई क्षेत्रों में हिंसा की प्रकृति बदलती दिखाई देती है।

और फिर सुबह—

भीड़ केवल क्रोधित नहीं होगी।

वह कई स्थानों पर तैयार होकर निकलेगी।

29. इस रात के पांच अनुत्तरित प्रश्न

इतिहास की जांच में 31 अक्टूबर की रात पांच प्रश्न बार-बार लौटते हैं।

पहला — स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं को किसने और कहां संगठित किया?

कुछ मामलों में प्रमाण मिले, लेकिन पूरी श्रृंखला कभी स्पष्ट नहीं हुई।

दूसरा — सिख घरों की पहचान कैसे की गई?

स्थानीय जानकारी, नामपट्ट, मतदाता सूचियां—अलग-अलग स्थानों पर अलग साधन संभव हैं।

तीसरा — ज्वलनशील पदार्थ इतनी तेजी से कैसे उपलब्ध हुए?

कई गवाहियों में संगठित आपूर्ति के आरोप हैं, लेकिन पूरे शहर के लिए एक केंद्रीय आपूर्ति श्रृंखला सिद्ध नहीं है।

चौथा — पुलिस ने शाम को निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं की?

यह प्रशासनिक विफलता का सबसे गंभीर प्रश्न है।

पांचवां — उपलब्ध सेना रात में ही क्यों नहीं उतारी गई?

इसका संतोषजनक उत्तर दशकों बाद भी विवादित है।

निष्कर्ष — वह रात जब भीड़ ने संरचना ग्रहण की

31 अक्टूबर की सुबह एक हत्या हुई थी।

दोपहर तक उसका सांप्रदायिक प्रतिशोध शुरू हुआ।

लेकिन रात तक कुछ और घट रहा था।

हिंसा अब केवल भावनात्मक विस्फोट नहीं रह गई थी।

अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय नेटवर्क सक्रिय होने लगे।

भीड़ बड़ी होने लगी।

लक्ष्य पहचाने जाने लगे।

अपराधी तत्व शामिल हुए।

ज्वलनशील सामग्री उपलब्ध होने लगी।

और सबसे महत्वपूर्ण—

पुलिस की कमजोर प्रतिक्रिया ने हमलावरों को यह विश्वास देना शुरू कर दिया कि उन्हें रोका नहीं जाएगा।

यही दंडमुक्ति किसी भी सामूहिक हिंसा का सबसे खतरनाक चरण होती है।

नानावती आयोग के निष्कर्ष इस अंतर को रेखांकित करते हैं: 31 अक्टूबर की शुरुआती हिंसा और 1 नवंबर की संगठित हिंसा एक जैसी नहीं थीं। आयोग को अनेक स्थानों पर स्थानीय कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की भागीदारी के विश्वसनीय साक्ष्य मिले, लेकिन उसने शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व द्वारा पूरे हमले के निर्देश दिए जाने का प्रमाण नहीं पाया।

इसलिए इतिहास की दृष्टि से 31 अक्टूबर की रात को न तो केवल “जनता का स्वाभाविक गुस्सा” कहा जा सकता है और न उपलब्ध प्रमाणों से किसी एक केंद्रीय आदेश का निर्विवाद परिणाम।

अधिक सटीक निष्कर्ष है—

स्वतःस्फूर्त आक्रोश को अनेक स्थानों पर स्थानीय राजनीतिक और अपराधी नेटवर्क ने संगठित हिंसा में बदल दिया, जबकि राज्य की अपर्याप्त प्रतिक्रिया ने उस परिवर्तन को रोकने के बजाय उसके लिए जगह छोड़ दी।

1 नवंबर की सुबह इसका परिणाम सामने आया।

दिल्ली के कुछ इलाकों में अब सिख होना ही मृत्यु का कारण बनने वाला था।

त्रिलोकपुरी में भयावह हत्याएं होंगी।

सुल्तानपुरी और मंगोलपुरी में घरों पर हमले होंगे।

पुरुषों को परिवारों के सामने मारा जाएगा।

टायर और ज्वलनशील पदार्थ हत्या के उपकरण बनेंगे।

महिलाएं और बच्चे विस्थापित होंगे।

और पुलिस की भूमिका स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक इतिहास के सबसे गंभीर प्रश्नों में बदल जाएगी।