हत्या के बाद पहले छह घंटे — दिल्ली में खबर कैसे फैली?
31 अक्टूबर 1984 की सुबह 9 बजकर लगभग 20 मिनट पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके दो सुरक्षा कर्मचारियों—बेअंत सिंह और सतवंत सिंह—ने गोली मारी। इसके बाद के कुछ घंटे भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण और सबसे कम समझे गए समय-खंडों में शामिल हैं।
सवाल केवल यह नहीं है कि इंदिरा गांधी की मृत्यु की सूचना देश को कब मिली।
अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न हैं—
प्रधानमंत्री पर हमले की खबर किस रास्ते से फैली?
हमलावरों की सिख पहचान कब सार्वजनिक हुई?
एम्स के बाहर हजारों लोगों की भीड़ कैसे जमा हुई?
किस समय सामान्य शोक सिख-विरोधी आक्रोश में बदलने लगा?
पुलिस और प्रशासन को खतरे की पहली स्पष्ट चेतावनी कब मिली?
और सबसे महत्वपूर्ण—
यदि दोपहर तक हिंसा की दिशा स्पष्ट होने लगी थी, तो उसे उसी समय नियंत्रित क्यों नहीं किया गया?
न्यायमूर्ति जी.टी. नानावती आयोग ने इस प्रारंभिक समय-खंड को अत्यंत महत्वपूर्ण माना। उसकी रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री पर हमला लगभग 9:20 बजे हुआ; घटना की खबर “जंगल की आग” की तरह फैली; हजारों लोग एम्स के आसपास एकत्र होने लगे; 1 से 1:15 बजे के बीच मीडिया ने प्रधानमंत्री की मृत्यु की खबर देना शुरू किया; लगभग 2 बजे भीड़ में आक्रोशपूर्ण नारे शुरू हुए और उसके बाद सिख यात्रियों को बसों से उतारकर मारपीट की घटनाएं होने लगीं। लगभग 5 बजे राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के काफिले पर पत्थरबाजी हुई।
इस क्रम से एक तथ्य स्पष्ट होता है—
31 अक्टूबर की हिंसा आधी रात को अचानक पैदा नहीं हुई थी। उसके संकेत प्रधानमंत्री को गोली लगने के पांच घंटे के भीतर सामने आ चुके थे।
1. सुबह 9:20 बजे — हत्या की कोशिश की पहली खबर
प्रधानमंत्री के आवास पर गोलीबारी होते ही दिल्ली के सत्ता तंत्र में तत्काल संदेश भेजे गए।
इंदिरा गांधी को गंभीर अवस्था में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान—AIIMS—ले जाया गया।
इस समय सामान्य जनता को दो बातें स्पष्ट नहीं थीं—
प्रधानमंत्री जीवित हैं या नहीं,
और हमला किसने किया है।
लेकिन सरकारी अधिकारियों, सुरक्षा एजेंसियों और वरिष्ठ राजनीतिक नेतृत्व के लिए यह पहले ही एक असाधारण राष्ट्रीय सुरक्षा संकट बन चुका था।
किसी साधारण राजनीतिक नेता पर हमला नहीं हुआ था।
भारत की प्रधानमंत्री को उनके सरकारी आवास के भीतर उनके अपने सुरक्षा कर्मचारियों ने गोली मारी थी।
इसलिए इस घटना में शुरू से ही तीन समानांतर संकट मौजूद थे—
राष्ट्रीय नेतृत्व का संकट, प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत सुरक्षा व्यवस्था का संकट और संभावित कानून-व्यवस्था का संकट।
तीसरे संकट को कितनी गंभीरता से लिया गया—यही आगे की घटनाओं का केंद्रीय प्रश्न है।
2. लगभग 9:30 बजे — एम्स राजनीतिक और भावनात्मक केंद्र बना
प्रधानमंत्री को एम्स पहुंचाते ही अस्पताल के भीतर चिकित्सा आपातकाल शुरू हुआ।
लेकिन बाहर एक दूसरा घटनाक्रम तेजी से विकसित होने लगा।
दिल्ली में खबर फैलते ही राजनीतिक नेता, कांग्रेस कार्यकर्ता, सरकारी अधिकारी, पत्रकार और सामान्य लोग एम्स की ओर आने लगे।
नानावती आयोग के अनुसार प्रधानमंत्री पर हमले की सूचना इतनी तेजी से फैली कि थोड़े ही समय में हजारों लोग अस्पताल के आसपास जमा होने लगे।
एम्स इसलिए केवल अस्पताल नहीं रहा।
वह अचानक—
सरकार का अस्थायी राजनीतिक केंद्र,
मीडिया का मुख्य केंद्र,
प्रधानमंत्री समर्थकों के शोक का केंद्र,
और कुछ घंटों बाद सांप्रदायिक उत्तेजना का शुरुआती केंद्र—
बन गया।
दक्षिण दिल्ली पुलिस को वीआईपी आवाजाही और भीड़ दोनों संभालनी पड़ रही थीं।
3. लगभग 10 बजे — विदेशी प्रसारण भारतीय जनता से आगे
उस समय भारत में निजी टेलीविजन चैनल, इंटरनेट और सोशल मीडिया नहीं थे।
सूचना के मुख्य साधन थे—
आकाशवाणी,
दूरदर्शन,
समाचार एजेंसियां,
अखबार,
और जिनके पास पहुंच थी उनके लिए BBC जैसे विदेशी रेडियो प्रसारण।
समकालीन नागरिक अधिकार जांच Who Are the Guilty? से पुनर्निर्मित घटनाक्रम के अनुसार लगभग 10 बजे BBC पर प्रधानमंत्री पर हमले की खबर सुनाई देने लगी, जबकि ऑल इंडिया रेडियो ने लगभग 11 बजे इसका पहला उल्लेख किया। उसी स्रोत के अनुसार प्रधानमंत्री की मृत्यु की आधिकारिक आकाशवाणी घोषणा काफी बाद में, शाम लगभग 6 बजे हुई।
इस समय-अंतर का महत्व समझना आवश्यक है।
सरकारी मीडिया आधिकारिक पुष्टि की प्रतीक्षा कर रहा था।
लेकिन सूचना-शून्य वास्तव में मौजूद नहीं था।
विदेशी रेडियो,
पत्रकार,
अस्पताल से निकलती सूचनाएं,
टेलीफोन,
राजनीतिक कार्यकर्ता,
और मुंहजबानी खबर—
सभी समानांतर सूचना नेटवर्क बन चुके थे।
इसलिए सरकार किसी सूचना को प्रसारित न करके उसके प्रसार को रोक नहीं सकती थी।
4. हमलावरों की धार्मिक पहचान — सबसे संवेदनशील सूचना
प्रधानमंत्री को गोली मारने वाले दोनों सुरक्षा कर्मचारियों के सिख होने की सूचना बहुत जल्दी फैल गई।
यही तथ्य आने वाले घंटों में सबसे खतरनाक सूचना सिद्ध हुआ।
एक अपराध की खबर इस प्रकार फैल सकती थी—
“प्रधानमंत्री को उनके दो सुरक्षाकर्मियों ने गोली मारी।”
लेकिन उसकी सांप्रदायिक पुनर्व्याख्या बन गई—
“सिखों ने प्रधानमंत्री को मार दिया।”
इन दोनों वाक्यों के बीच राजनीतिक और नैतिक अंतर असाधारण है।
पहले वाक्य में अपराधी दो व्यक्ति हैं।
दूसरे में पूरे समुदाय पर सामूहिक अपराध आरोपित हो जाता है।
यही मानसिक संक्रमण सिख-विरोधी हिंसा की पहली मनोवैज्ञानिक शर्त था।
5. क्या सरकारी मीडिया ने हमलावरों की सिख पहचान बताई?
इस प्रश्न पर विभिन्न समकालीन स्रोतों में समय को लेकर कुछ अंतर मिलता है।
बाद के कुछ क्रम-विवरणों में लगभग 11 बजे ऑल इंडिया रेडियो द्वारा हमलावरों को सिख सुरक्षा कर्मचारी बताए जाने का उल्लेख मिलता है। नागरिक अधिकार समूहों और बाद के अभिलेखों ने भी सूचना प्रसार के इस पहलू पर ध्यान दिया।
लेकिन यहां तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है।
यह सिद्ध करना कठिन है कि बाद के दंगों के लिए केवल रेडियो द्वारा धार्मिक पहचान बताना जिम्मेदार था।
हमलावर प्रधानमंत्री सुरक्षा में थे और उनकी पहचान सरकारी तथा राजनीतिक नेटवर्क में पहले से प्रसारित हो चुकी थी।
मूल प्रश्न इसलिए यह है कि—
जब यह अत्यंत संवेदनशील तथ्य सार्वजनिक हो गया, तब सरकार ने उसके साथ शांति और सामूहिक जिम्मेदारी न थोपने का स्पष्ट संदेश कितनी तेजी से दिया?
यहीं गंभीर कमी दिखाई देती है।
6. सुबह 10 से 11 बजे — दिल्ली अभी हिंसक नहीं थी
यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण है।
प्रधानमंत्री पर हमला हो चुका था।
हमलावर सिख थे।
लेकिन दिल्ली में तत्काल बड़े पैमाने पर सिख-विरोधी हिंसा नहीं भड़की।
दूसरे शब्दों में—
हत्या और नरसंहार के बीच समय का अंतर था।
यही समय प्रशासन के पास उपलब्ध था।
यदि हिंसा हत्या की स्वाभाविक और अनियंत्रित प्रतिक्रिया होती तो वह लगभग तत्काल पूरे शहर में शुरू हो सकती थी।
ऐसा नहीं हुआ।
नानावती आयोग ने भी 31 अक्टूबर की घटनाओं और 1 नवंबर की संगठित हिंसा की प्रकृति में स्पष्ट अंतर किया। आयोग ने पाया कि 31 अक्टूबर को शुरुआती हमले मुख्यतः मौके पर एकत्र लोगों द्वारा हुए छिटपुट हमले थे; अगली सुबह हमलों का स्वरूप, हथियारों का उपयोग और संगठनात्मक प्रकृति बदल गई।
इस समय-अंतर का ऐतिहासिक महत्व बहुत बड़ा है।
7. लगभग 11 बजे — एम्स के बाहर भीड़ बढ़ती गई
प्रधानमंत्री की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट न होने के कारण भीड़ में बेचैनी बढ़ रही थी।
नानावती आयोग ने लिखा कि प्रधानमंत्री की हालत स्पष्ट न किए जाने के कारण एकत्र लोग धीरे-धीरे अधीर होने लगे।
अब एम्स के बाहर कई प्रकार के लोग मौजूद थे—
कांग्रेस कार्यकर्ता,
स्थानीय समर्थक,
जिज्ञासु नागरिक,
मीडिया कर्मचारी,
वीआईपी सुरक्षा कर्मी,
और विभिन्न नेताओं के समर्थक।
यह सामान्य राजनीतिक भीड़ नहीं थी।
यह भावनात्मक रूप से अत्यंत अस्थिर भीड़ थी जिसे लग रहा था कि उनकी नेता की मृत्यु हो सकती है।
लेकिन इस समय तक उसे सांप्रदायिक हिंसक भीड़ कहना भी जल्दबाजी होगी।
परिवर्तन अगले कुछ घंटों में हुआ।
8. राजनीतिक कार्यकर्ताओं की आवाजाही
प्रधानमंत्री की गंभीर स्थिति की सूचना के साथ कांग्रेस संगठन में स्वाभाविक रूप से भारी गतिविधि शुरू हुई।
दिल्ली के स्थानीय कार्यकर्ता और नेता एम्स पहुंचे।
वरिष्ठ केंद्रीय नेता अस्पताल पहुंचे।
स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क के माध्यम से समर्थकों का आगमन भी हुआ।
इसी कारण बाद में यह प्रश्न उठा कि एम्स और उसके आसपास की भीड़ में कितने लोग स्वतः आए थे और कितनों को राजनीतिक नेटवर्क के जरिये जुटाया गया था।
नानावती आयोग ने बाद की हिंसा की जांच करते हुए पाया कि अनेक घटनाओं में कांग्रेस(I) के स्थानीय नेताओं या कार्यकर्ताओं के शामिल होने के विश्वसनीय आरोप और प्रमाण मौजूद थे। आयोग ने यह भी माना कि 1 नवंबर से हिंसा में स्थानीय राजनीतिक नेताओं द्वारा स्थिति का उपयोग करने का तत्व दिखाई देने लगा।
लेकिन 31 अक्टूबर की सुबह से ही किसी एक केंद्रीय राजनीतिक आदेश के तहत भीड़ जुटाई गई थी, ऐसा निष्कर्ष उपलब्ध रिकॉर्ड से प्रमाणित नहीं होता।
यह भेद बनाए रखना आवश्यक है।
9. सुबह 11 बजे से दोपहर — सूचना नेटवर्क का विस्तार
अब तक समाचार चार मुख्य चैनलों से तेजी से फैल रहा था—
सरकारी मीडिया — आकाशवाणी और बाद में दूरदर्शन।
विदेशी मीडिया — विशेष रूप से BBC रेडियो।
अखबारों और समाचार एजेंसियों का नेटवर्क।
राजनीतिक और सामाजिक मुंहजबानी नेटवर्क।
मोबाइल फोन का युग नहीं था, लेकिन दिल्ली जैसे शहर में खबर फैलने के लिए उनकी आवश्यकता भी नहीं थी।
बस डिपो,
सरकारी कार्यालय,
बाजार,
राजनीतिक पार्टी कार्यालय,
टैक्सी स्टैंड,
रेडियो,
टेलीफोन—
कुछ ही घंटों में पूरे शहर को सूचना से भर सकते थे।
यही हुआ।
10. मृत्यु पहले हुई, आधिकारिक घोषणा बाद में
इंदिरा गांधी की चिकित्सकीय मृत्यु और उसकी औपचारिक सरकारी घोषणा एक ही समय नहीं हुई।
इसी बीच अफवाह और अनिश्चितता का बड़ा क्षेत्र बना रहा।
नानावती आयोग ने दर्ज किया कि लगभग 1 से 1:15 बजे के बीच मीडिया ने प्रधानमंत्री की मृत्यु की खबर प्रसारित करनी शुरू कर दी थी।
दूसरी ओर नागरिक अधिकार समूहों द्वारा तैयार समकालीन घटनाक्रम में शाम के अखबारों द्वारा दोपहर लगभग 2:30 बजे मृत्यु की खबर प्रकाशित करने और आकाशवाणी की औपचारिक घोषणा लगभग 6 बजे होने का उल्लेख है।
इसका अर्थ था कि दोपहर तक लाखों लोगों को प्रधानमंत्री की मृत्यु की जानकारी मिल चुकी थी, जबकि औपचारिक सरकारी सूचना बाद में आई।
सरकारी सूचना का विलंब अफवाहों के लिए अनुकूल परिस्थिति बना सकता था।
11. दोपहर 1 से 2 बजे — भावनात्मक मोड़
नानावती आयोग के घटनाक्रम में यह समय निर्णायक है।
1 से 1:15 बजे के बाद मृत्यु की खबर तेजी से फैलने लगी।
एम्स के बाहर की भीड़ अब केवल प्रधानमंत्री की स्थिति जानने नहीं आई थी।
उसे यह खबर मिल रही थी कि प्रधानमंत्री मर चुकी हैं।
और साथ ही यह भी कि उन्हें गोली मारने वाले सिख थे।
लगभग 2 बजे तक आक्रोशपूर्ण नारे शुरू होने लगे।
यही वह क्षण था जब सरकार को संभावित सामुदायिक हिंसा का स्तर तत्काल ऊपर कर देना चाहिए था।
क्योंकि अब तीन खतरनाक तत्व मिल चुके थे—
मृत्यु + सांप्रदायिक पहचान + विशाल भावनात्मक भीड़।
12. “खून का बदला...” — प्रतिशोध की भाषा
प्रत्यक्षदर्शी और बाद की जांचों में ऐसे नारों का उल्लेख मिलता है जिनका अर्थ प्रधानमंत्री की हत्या का प्रतिशोध लेने की मांग था।
सांप्रदायिक हिंसा की राजनीति में नारे केवल शब्द नहीं होते।
वे भीड़ को यह संकेत देते हैं कि व्यक्तिगत अपराध का उत्तर सामूहिक दंड हो सकता है।
इसीलिए यह निर्णायक समय था जब राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर से तत्काल और दृढ़ संदेश आना चाहिए था—
इंदिरा गांधी की हत्या करने वालों के विरुद्ध कानून कार्रवाई करेगा;
किसी निर्दोष सिख को निशाना बनाना प्रधानमंत्री की स्मृति का अपमान होगा;
राज्य किसी सांप्रदायिक प्रतिशोध को सहन नहीं करेगा।
ऐसा प्रभावी और तत्काल राष्ट्रीय हस्तक्षेप उस समय दिखाई नहीं देता।
13. लगभग 2 बजे — पहली स्पष्ट सांप्रदायिक हिंसा
नानावती आयोग का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक निष्कर्ष है कि लगभग 2 बजे के बाद भीड़ ने बसों से सिख यात्रियों को खींचकर उनके साथ मारपीट शुरू की।
यह घटना निर्णायक सीमा पार करना थी।
अब खतरा केवल नारे तक सीमित नहीं था।
लोगों की पहचान—
उनकी पगड़ी,
केश,
दाढ़ी—
के आधार पर की जा रही थी।
और प्रधानमंत्री की हत्या से कोई संबंध न रखने वाले सामान्य नागरिक शारीरिक प्रतिशोध का लक्ष्य बन रहे थे।
यहीं से घटना सांप्रदायिक हिंसा में परिवर्तित हो चुकी थी।
14. पुलिस के लिए पहला निर्विवाद अलार्म
यदि 11 बजे तक प्रशासन स्थिति को केवल शोक और राजनीतिक भीड़ मान रहा था, तो 2 बजे के बाद ऐसा मानने की गुंजाइश समाप्त हो जानी चाहिए थी।
अब पुलिस के सामने स्पष्ट तथ्य थे—
प्रधानमंत्री की हत्या हुई है;
हमलावर सिख थे;
भीड़ सिख-विरोधी नारे लगा रही है;
सिख यात्रियों को सार्वजनिक परिवहन से निकालकर पीटा जा रहा है।
यह किसी भी पुलिस कमांड के लिए सांप्रदायिक दंगे की पूर्व चेतावनी का पर्याप्त आधार था।
इसी समय राजधानी के सभी पुलिस जिलों को अधिकतम सतर्कता,
सिख बस्तियों की सुरक्षा,
गुरुद्वारों की सुरक्षा,
भीड़ नियंत्रण,
और निवारक गिरफ्तारी—
जैसे उपाय शुरू करने चाहिए थे।
15. फिर भी दोपहर तक हिंसा सीमित क्यों रही?
यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है।
क्योंकि यह सिद्ध करता है कि उस समय भी स्थिति नियंत्रित की जा सकती थी।
नानावती आयोग ने माना कि 31 अक्टूबर के शुरुआती हमले अभी व्यवस्थित हथियारबंद हिंसा नहीं थे। लोग रास्तों पर जमा थे; वे जो चीज हाथ लगी उससे मारपीट या संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे थे। अगले दिन की तरह उनके पास व्यापक रूप से ज्वलनशील पदार्थ, योजनाबद्ध समूह और लक्ष्यों की पहचान वाला ढांचा नहीं दिखाई देता।
अर्थात दोपहर में पुलिस को उस मशीनरी का सामना नहीं करना था जो 1 नवंबर को दिखाई दी।
यही कारण है कि प्रारंभिक छह घंटे इतने निर्णायक थे।
16. अफवाहें कैसे आकार लेती हैं?
ऐसे संकट में सत्य और अफवाह एक साथ फैलते हैं।
सत्य यह था—
प्रधानमंत्री को उनके दो सिख सुरक्षा कर्मचारियों ने गोली मारी।
लेकिन इस तथ्य के आसपास बहुत जल्दी दूसरे संदेश जुड़ सकते थे—
सिख खुशियां मना रहे हैं,
सिख मिठाइयां बांट रहे हैं,
गुरुद्वारों में जश्न है,
और आगे सिख हिंसा होने वाली है।
बाद के दिनों में ऐसी अनेक अफवाहें फैलाए जाने के विवरण मिलते हैं।
इनमें सबसे कुख्यात अफवाहों में ट्रेन भरकर हिंदुओं की लाशें आने और पेयजल में जहर मिलाने जैसी बातें भी शामिल हुईं।
अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बात यह नहीं कि हर अफवाह पहली बार किस मिनट पैदा हुई।
महत्वपूर्ण यह है कि सरकार के पास कोई तीव्र, विश्वसनीय और लगातार सार्वजनिक anti-rumour communication system दिखाई नहीं देता।
17. दूरदर्शन की भूमिका
1984 में दूरदर्शन सरकारी नियंत्रण वाला एकमात्र राष्ट्रीय टेलीविजन माध्यम था।
प्रधानमंत्री की मृत्यु के बाद स्वाभाविक रूप से उसके कार्यक्रमों का बड़ा हिस्सा इंदिरा गांधी से संबंधित समाचारों, श्रद्धांजलियों और शोक कवरेज में बदल गया।
लेकिन सांप्रदायिक संकट की स्थिति में सार्वजनिक प्रसारक की दूसरी भूमिका होती है—
शांति संदेश,
अफवाहों का खंडन,
अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा का भरोसा,
और कानून तोड़ने वालों के विरुद्ध स्पष्ट चेतावनी।
इन पहले महत्वपूर्ण घंटों में इस प्रकार के तत्काल सुरक्षा-संचार के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलते।
यही सूचना-शून्य स्थानीय राजनीतिक और अफवाह नेटवर्क के लिए उपयोगी सिद्ध हुआ।
18. क्या राजीव गांधी उस समय दिल्ली में थे?
नहीं।
इंदिरा गांधी पर हमला होने के समय राजीव गांधी पश्चिम बंगाल में थे।
उन्हें तत्काल दिल्ली बुलाया गया।
इस कारण कांग्रेस नेतृत्व भी शुरुआती कुछ घंटों में एक असाधारण संक्रमण से गुजर रहा था।
एक तरफ पार्टी की सर्वोच्च नेता मृत्युशैया पर थीं।
दूसरी ओर उत्तराधिकार का प्रश्न सामने था।
वरिष्ठ नेता एम्स और सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया में जुटे थे।
यह प्रशासन की कठिन परिस्थिति को समझाता है।
लेकिन नागरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी इससे समाप्त नहीं होती।
दिल्ली पुलिस, गृह मंत्रालय और उपराज्यपाल की प्रशासनिक प्रणाली सत्ता हस्तांतरण से स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए ही बनाई गई थी।
19. पहले छह घंटे पूरे होते-होते स्थिति क्या थी?
यदि हमला लगभग 9:20 बजे हुआ, तो पहले छह घंटे लगभग दोपहर 3:20 बजे तक पूरे होते हैं।
तब तक—
इंदिरा गांधी गंभीर रूप से घायल हो चुकी थीं और उनकी मृत्यु की खबर मीडिया में फैल रही थी;
हमलावरों के सिख होने की जानकारी सार्वजनिक हो चुकी थी;
एम्स के बाहर हजारों लोग जमा थे;
भीड़ में प्रतिशोधपूर्ण नारे शुरू हो चुके थे;
सिख यात्रियों को बसों से उतारकर पीटा जा चुका था;
और दिल्ली पुलिस को सांप्रदायिक हिंसा की दिशा का स्पष्ट संकेत मिल चुका था।
इसलिए 3 बजे के आसपास प्रशासन के पास यह कहने का कोई ठोस आधार नहीं बचा था कि संभावित सिख-विरोधी हिंसा का अनुमान नहीं लगाया जा सकता था।
20. छह घंटे के बाद — राजीव गांधी की वापसी
दोपहर बाद राजीव गांधी दिल्ली लौटे और एम्स पहुंचे।
अब अस्पताल राजनीतिक सत्ता हस्तांतरण का भी केंद्र बन चुका था।
राजीव गांधी को उसी शाम प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई जानी थी।
इसी बीच बाहर का वातावरण लगातार बिगड़ रहा था।
यहां फिर दो समानांतर दिल्ली दिखाई देती हैं—
एक दिल्ली एम्स, राष्ट्रपति भवन और सत्ता हस्तांतरण की थी;
दूसरी दिल्ली सड़कों पर फैलते सांप्रदायिक आक्रोश की।
पहली पर राजनीतिक नेतृत्व का पूरा ध्यान था।
दूसरी को समान दृढ़ता से नियंत्रित नहीं किया गया।
21. राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की वापसी
राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह विदेश यात्रा पर थे और इंदिरा गांधी पर हमले की खबर मिलने के बाद दिल्ली लौटे।
लगभग 5 बजे के आसपास उनका काफिला एम्स की ओर पहुंचा।
यहां हुई घटना राजधानी में बिगड़ती स्थिति का अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत बनी।
नानावती आयोग ने दर्ज किया कि लगभग 5 बजे राष्ट्रपति के काफिले पर पत्थर फेंके गए।
समकालीन नागरिक अधिकार जांच में भी दर्ज है कि राष्ट्रपति लगभग 5 बजे पालम पहुंचे और एम्स जाते समय उनके काफिले पर पत्थरबाजी हुई।
राष्ट्रपति स्वयं सिख थे।
यानी अब धार्मिक पहचान से प्रेरित आक्रोश इतना बढ़ चुका था कि भारत के राष्ट्रपति का काफिला भी उससे अछूता नहीं रहा।
22. राष्ट्रपति के काफिले पर हमला — तीसरा और अंतिम बड़ा अलार्म
यदि प्रशासन ने दोपहर की मारपीट को छिटपुट घटना माना भी हो, तो राष्ट्रपति के काफिले पर हमला उसके बाद ऐसा कोई बहाना नहीं छोड़ता था।
तीन चरण पूरे हो चुके थे—
नारा → सामान्य सिख पर हमला → सिख राष्ट्रपति के काफिले पर हमला।
इसका अर्थ था कि धार्मिक पहचान स्वयं हमले का पर्याप्त कारण बन चुकी थी।
अब राजधानी में तुरंत उच्चतम स्तर के सांप्रदायिक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता स्पष्ट थी।
23. पहली पत्थरबाजी और हिंसा की प्रकृति
नानावती आयोग ने लगभग 5 बजे को पहली महत्वपूर्ण पत्थरबाजी की घटना के रूप में दर्ज किया।
आयोग ने साथ ही यह अंतर भी किया कि 31 अक्टूबर के शुरुआती हमले अगले दिन जैसे संगठित नहीं थे।
उसके अनुसार 31 अक्टूबर को सिखों को पीटा गया, उनके वाहन जलाए गए और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की छिटपुट घटनाएं हुईं, लेकिन भीड़ अभी उस प्रकार हथियारों और ज्वलनशील पदार्थों से व्यवस्थित रूप से लैस नहीं थी जैसा 1 नवंबर से दिखाई दिया।
यही निष्कर्ष आगे अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
क्योंकि यह संकेत देता है कि संगठन का एक नया स्तर 31 अक्टूबर की रात और 1 नवंबर की सुबह के बीच विकसित हुआ।
24. क्या एम्स हिंसा के प्रसार का केंद्र था?
कुछ समकालीन तथ्य-जांचों और बाद के अध्ययनों ने एम्स के आसपास जमा भीड़ को शुरुआती सिख-विरोधी हिंसा के महत्वपूर्ण स्रोतों में माना है।
लेकिन यह कहना कि दिल्ली भर के सभी हमलावर सीधे एम्स की एक ही भीड़ से निकले थे—अत्यधिक सरल निष्कर्ष होगा।
अधिक विश्वसनीय तस्वीर यह है—
एम्स सांप्रदायिक आक्रोश का पहला बड़ा दृश्य केंद्र बना;
वहां राजनीतिक कार्यकर्ताओं और समर्थकों का भारी जमाव था;
वहां सिख-विरोधी नारे और शुरुआती हमले हुए;
और शाम तक समान भावनाएं दिल्ली के दूसरे क्षेत्रों में फैलने लगीं।
यानी एम्स एक महत्वपूर्ण ignition point था, लेकिन दिल्ली की बाद की हिंसा को केवल एक भीड़ के भौतिक फैलाव से समझाना पर्याप्त नहीं।
स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क और स्थानीय अपराधी समूह आगे कहीं अधिक महत्वपूर्ण साबित हुए।
25. राजनीतिक नेतृत्व को कब पता चल जाना चाहिए था?
इस प्रश्न का उत्तर लगभग निश्चित रूप से दोपहर तक है।
प्रधानमंत्री की हत्या के बाद सामान्य तनाव अनुमानित था।
लेकिन सिख यात्रियों को बसों से उतारकर पीटा जाना एक गुणात्मक परिवर्तन था।
अब सामुदायिक प्रतिशोध वास्तविक हो चुका था।
इसके बाद—
गृह मंत्रालय,
दिल्ली पुलिस आयुक्त,
उपराज्यपाल,
कांग्रेस नेतृत्व,
और नवनिर्वाचित होने जा रहे प्रधानमंत्री—
सभी के सामने तत्काल शांति स्थापित करना सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए था।
26. तत्काल संयुक्त शांति अपील क्यों महत्वपूर्ण होती?
भारत की स्थिति उस समय अनूठी थी।
राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह स्वयं सिख थे।
नए प्रधानमंत्री बनने जा रहे राजीव गांधी मृत प्रधानमंत्री के पुत्र थे।
यदि दोनों उसी शाम राष्ट्र को संयुक्त रूप से संबोधित कर कहते—
इंदिरा गांधी की हत्या राष्ट्रीय अपराध है;
उसके लिए दो अपराधी जिम्मेदार हैं, सिख समुदाय नहीं;
किसी सिख नागरिक पर हमला भारत पर हमला माना जाएगा;
पुलिस और सेना को कठोर कार्रवाई के आदेश हैं—
तो इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव बड़ा हो सकता था।
ऐसे प्रतिकल्पित उपाय यह साबित नहीं करते कि नरसंहार निश्चित रूप से रुक जाता।
लेकिन संकट प्रबंधन के मानकों पर यह स्पष्ट अवसर था।
27. शुरुआती छह घंटे हमें क्या बताते हैं?
इन छह घंटों से पांच महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं।
पहला — हिंसा तत्काल नहीं हुई।
हत्या और व्यापक हिंसा के बीच समय था।
दूसरा — धार्मिक पहचान का तथ्य तेजी से फैला।
व्यक्तिगत अपराध सांप्रदायिक व्याख्या में बदलने लगा।
तीसरा — एम्स भीड़ का भावनात्मक और राजनीतिक केंद्र बना।
चौथा — दोपहर तक सामान्य सिख नागरिकों पर हमले शुरू हो चुके थे।
पांचवां — प्रशासन के पास स्थिति को पहचानने और कार्रवाई करने का अवसर था।
यही पांचवां बिंदु आगे राज्य की जिम्मेदारी के आकलन में सबसे महत्वपूर्ण है।
28. 31 अक्टूबर — पहले छह घंटे : पुनर्निर्मित समयरेखा
लगभग 9:20 बजे — प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर उनके आवास पर गोलीबारी; एम्स ले जाया गया।
लगभग 9:30 बजे के बाद — वरिष्ठ अधिकारी, नेता और मीडिया एम्स की ओर पहुंचना शुरू।
लगभग 10 बजे — विदेशी प्रसारणों पर हमले की खबर; BBC से सूचना प्रसारित होने का समकालीन उल्लेख।
लगभग 11 बजे — आकाशवाणी पर हमले का उल्लेख; एम्स के बाहर भीड़ तेजी से बढ़ती गई।
पूर्वाह्न से दोपहर — हमलावरों के सिख होने की सूचना व्यापक रूप से फैल गई।
लगभग 1:00–1:15 बजे — मीडिया प्रधानमंत्री की मृत्यु की खबर देना शुरू करता है।
लगभग 2 बजे — एम्स क्षेत्र में आक्रोशपूर्ण नारे; सिख यात्रियों को बसों से खींचकर मारपीट की शुरुआती घटनाएं।
लगभग 3:20 बजे — हत्या के पहले छह घंटे पूरे; तब तक सांप्रदायिक हिंसा का खतरा प्रत्यक्ष हो चुका था।
उसके तुरंत बाद
दोपहर बाद — राजीव गांधी दिल्ली लौटते हैं।
लगभग 5 बजे — राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह एम्स पहुंचने की कोशिश करते हैं; काफिले पर पत्थरबाजी।
शाम लगभग 6 बजे — समकालीन नागरिक अधिकार घटनाक्रम के अनुसार आकाशवाणी पर इंदिरा गांधी की मृत्यु की औपचारिक घोषणा।
इसके बाद दिल्ली में हिंसा का फैलाव अधिक तेज होने लगा।
निष्कर्ष — छह घंटे जिनमें इतिहास की दिशा बदली जा सकती थी
31 अक्टूबर 1984 की सुबह 9:20 बजे दो सुरक्षा कर्मचारियों द्वारा किए गए अपराध का लक्ष्य एक व्यक्ति था—प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी।
लेकिन दोपहर 2 बजे तक उस अपराध की धार्मिक पहचान निर्दोष सिख नागरिकों के विरुद्ध हिंसा का आधार बनने लगी थी।
यही परिवर्तन इस दिन की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है।
हत्या के बाद तत्काल नरसंहार नहीं हुआ।
पहले खबर फैली।
फिर हमलावरों की पहचान फैली।
फिर एम्स के बाहर भीड़ बढ़ी।
फिर मृत्यु की खबर आई।
फिर प्रतिशोध के नारे लगे।
और फिर सामान्य सिख यात्रियों को बसों से उतारकर पीटा गया।
इस क्रम का महत्व इसलिए असाधारण है क्योंकि इसके प्रत्येक चरण के बीच प्रशासन को हस्तक्षेप करने का अवसर था।
नानावती आयोग के आधिकारिक पुनर्निर्माण के अनुसार दोपहर लगभग 2 बजे हिंसा का सांप्रदायिक चरित्र दिखाई दे चुका था।
और शाम लगभग 5 बजे राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के काफिले पर हमला यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त था कि स्थिति सामान्य राजनीतिक शोक से बहुत आगे निकल चुकी है।
इसके बाद जो प्रश्न उठता है वह केवल यह नहीं है कि “भीड़ हिंसक क्यों हुई?”
उससे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है—
“राज्य को कब पता चला कि भीड़ सिखों के विरुद्ध हिंसक हो रही है—और पता चलने के बाद उसने क्या किया?”
यही प्रश्न 31 अक्टूबर की रात और 1 नवंबर की सुबह की घटनाओं को समझने की कुंजी है।
क्योंकि अगली सुबह दिल्ली में हिंसा की प्रकृति बदल चुकी थी।
अब केवल भावनात्मक भीड़ नहीं थी।
अनेक इलाकों में समूह अधिक संगठित दिखाई देंगे।
सिख घर और प्रतिष्ठान पहचानकर निशाना बनाए जाएंगे।
ज्वलनशील पदार्थ उपलब्ध होंगे।
स्थानीय राजनीतिक नेताओं पर भीड़ का नेतृत्व करने के आरोप सामने आएंगे।
और कुछ घंटों में दिल्ली के कई हिस्से उस हिंसा में डूब जाएंगे जिसे नानावती आयोग बाद में महज स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया मानने से इनकार करेगा और अनेक हमलों को संगठित प्रकृति का बताएगा।