हेमवती नंदन बहुगुणा से विजय बहुगुणा और रीता बहुगुणा जोशी तक — उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड तक फैली राजनीतिक विरासत
भारतीय राजनीतिक वंशों में बहुगुणा परिवार की कहानी कई कारणों से विशिष्ट है। इसकी पहली राजनीतिक पीढ़ी किसी स्थापित राजनीतिक घराने से नहीं आई थी। हेमवती नंदन बहुगुणा ने स्वतंत्रता आंदोलन, कांग्रेस संगठन और चुनावी राजनीति के रास्ते अपनी राजनीतिक पूंजी स्वयं बनाई। वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, केंद्र में मंत्री रहे, इंदिरा गांधी से टकराए और कांग्रेस छोड़कर विपक्षी राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन अगली पीढ़ी तक आते-आते वही स्वनिर्मित राजनीतिक पूंजी एक पारिवारिक विरासत में बदल गई। पुत्र विजय बहुगुणा सांसद और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने।
पुत्री रीता बहुगुणा जोशी इलाहाबाद की महापौर, उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, विधायक, उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और लोकसभा सदस्य बनीं। और एक दिलचस्प राजनीतिक मोड़ यह रहा कि—
पिता की राजनीति का बड़ा हिस्सा कांग्रेस में बीता, लेकिन पुत्र और पुत्री दोनों अंततः भाजपा में पहुंच गए।
इसलिए बहुगुणा परिवार का अध्ययन केवल वंशवाद नहीं, बल्कि चार प्रक्रियाओं का अध्ययन है—
स्वनिर्मित नेतृत्व → राजनीतिक पूंजी का पारिवारिक हस्तांतरण → क्षेत्रीय विभाजन → दलगत पुनर्संरेखण।
और इसके केंद्र में प्रश्न है—
क्या किसी स्वनिर्मित नेता की अगली पीढ़ी को मिली राजनीतिक बढ़त भी उतनी ही वंशवादी मानी जानी चाहिए जितनी कई पीढ़ियों पुराने राजनीतिक घरानों में दिखाई देती है?
उत्तर खोजने के लिए शुरुआत हेमवती नंदन बहुगुणा से करनी होगी।
23.1 हेमवती नंदन बहुगुणा — पहाड़ से राष्ट्रीय राजनीति तक
हेमवती नंदन बहुगुणा का जन्म 25 अप्रैल 1919 को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के गढ़वाल क्षेत्र में हुआ। आज यह क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा है। उनका राजनीतिक निर्माण किसी पारिवारिक राजनीतिक संरक्षण में नहीं हुआ। वे छात्र जीवन में राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सक्रिय हुए। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय उनकी सक्रियता विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। इसलिए बहुगुणा परिवार की पहली राजनीतिक पीढ़ी का स्रोत—
स्वतंत्रता आंदोलन
था, न कि राजनीतिक वंशवाद। 23.2 इलाहाबाद — राजनीतिक प्रशिक्षण की भूमि बहुगुणा की उच्च शिक्षा और राजनीतिक सक्रियता इलाहाबाद से जुड़ी। बीसवीं सदी के मध्य का इलाहाबाद केवल शैक्षणिक शहर नहीं था। वह कांग्रेस, समाजवादी आंदोलन, छात्र राजनीति और राष्ट्रीय नेतृत्व का महत्वपूर्ण केंद्र था। जवाहरलाल नेहरू परिवार की राजनीतिक भूमि भी यही थी। बहुगुणा ने इसी वातावरण में संगठनात्मक राजनीति सीखी। उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक विशेषताओं में एक आगे दिखाई दी—
असाधारण संगठन क्षमता।
23.3 कांग्रेस संगठन से सत्ता तक स्वतंत्रता के बाद बहुगुणा कांग्रेस की उत्तर प्रदेश राजनीति में सक्रिय हुए। उन्होंने विधायक और मंत्री के रूप में काम किया। धीरे-धीरे वे प्रदेश कांग्रेस के महत्वपूर्ण संगठनकर्ताओं में शामिल हुए। यह वह दौर था जब कांग्रेस स्वयं एक विशाल राजनीतिक छतरी थी और उसके भीतर— ब्राह्मण, दलित, मुस्लिम, किसान, पिछड़े वर्ग, शहरी मध्यवर्ग सहित अनेक सामाजिक समूहों को संतुलित करना पड़ता था। बहुगुणा इस सामाजिक गणित को समझने वाले कुशल नेताओं में गिने गए। 23.4 बहुगुणा की राजनीतिक शैली उनकी राजनीति केवल प्रशासनिक नहीं थी। वे संगठन और सामाजिक गठबंधन बनाने में दक्ष थे। विशेष रूप से—
ब्राह्मण–दलित–मुस्लिम
राजनीतिक समीकरण के संदर्भ में उनका नाम लिया जाता रहा। यह समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि आगे उत्तर प्रदेश कांग्रेस की जो सामाजिक संरचना लंबे समय तक बनी रही, उसमें इस प्रकार के गठबंधनों की बड़ी भूमिका थी। बहुगुणा की शक्ति केवल निर्वाचन क्षेत्र नहीं थी। उनकी शक्ति थी—
संगठन के भीतर लोगों को जोड़ने की क्षमता।
23.5 उत्तर प्रदेश का राजनीतिक संकट और बहुगुणा का उदय 1960 और 1970 के दशक में उत्तर प्रदेश कांग्रेस गुटबाजी से जूझ रही थी। चंद्रभानु गुप्त, कमलापति त्रिपाठी, चौधरी चरण सिंह और दूसरे शक्तिशाली नेताओं के बीच लगातार राजनीतिक पुनर्संयोजन होता रहा। इसी वातावरण में बहुगुणा ने स्वयं को राज्यस्तरीय नेता के रूप में स्थापित किया। 1973 में उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। 23.6 मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा नवंबर 1973 में बहुगुणा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनका मुख्यमंत्री काल ऐसे समय आया जब देश— महंगाई, तेल संकट, छात्र आंदोलनों, श्रमिक असंतोष और बढ़ते राजनीतिक टकराव से गुजर रहा था। उत्तर प्रदेश में भी प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौतियां गंभीर थीं।
बहुगुणा ने संगठनात्मक कौशल और सामाजिक संतुलन के माध्यम से सरकार चलाने की कोशिश की। लेकिन जल्द ही राष्ट्रीय राजनीति बदलने लगी। 23.7 इंदिरा गांधी से संबंध बहुगुणा का मुख्यमंत्री बनना कांग्रेस नेतृत्व, विशेष रूप से इंदिरा गांधी की स्वीकृति के बिना संभव नहीं था। लेकिन आगे दोनों के संबंध खराब हुए। बहुगुणा की अपनी स्वतंत्र राजनीतिक महत्वाकांक्षा और संगठनात्मक शक्ति थी। कांग्रेस में इंदिरा गांधी का केंद्रीकरण बढ़ रहा था। यहीं संघर्ष का आधार बना—
केंद्रीय नेतृत्व बनाम स्वतंत्र क्षेत्रीय नेता।
यह संघर्ष आगे बहुगुणा के पूरे राजनीतिक जीवन को प्रभावित करेगा। 23.8 1974 का उत्तर प्रदेश चुनाव बहुगुणा के नेतृत्व में कांग्रेस ने 1974 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ा और सत्ता में बनी रही। इससे मुख्यमंत्री के रूप में उनकी राजनीतिक स्थिति मजबूत हुई। अब वे केवल दिल्ली द्वारा नियुक्त मुख्यमंत्री नहीं थे। उनके पास चुनावी सफलता का दावा भी था। यहीं से बहुगुणा की स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति कांग्रेस नेतृत्व के लिए अधिक महत्वपूर्ण—और संभवतः अधिक असुविधाजनक—होने लगी। 23.9 आपातकाल 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू हुआ। कांग्रेस की आंतरिक राजनीति भी तेजी से केंद्रीकृत हुई। बहुगुणा और इंदिरा गांधी के संबंधों में तनाव बढ़ता गया। अंततः 1975 के अंत में बहुगुणा मुख्यमंत्री पद से हट गए।
उनके स्थान पर राष्ट्रपति शासन लगा और बाद में नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने। यह बहुगुणा के राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ था। 23.10 इंदिरा गांधी से निर्णायक अलगाव 1977 के आम चुनाव से पहले कांग्रेस के भीतर बड़ा विद्रोह हुआ। जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा और नंदिनी सत्पथी जैसे नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी। उन्होंने बनाया—
Congress for Democracy — कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी।
यह कदम आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्षी एकता के लिए महत्वपूर्ण था। बहुगुणा अब कांग्रेस सत्ता-व्यवस्था के अंदरूनी नेता नहीं थे। वे उसके विरुद्ध खड़े थे। 23.11 जनता लहर और कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी 1977 के चुनाव में कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी ने जनता पार्टी के साथ चुनावी समझ बनाई। इंदिरा गांधी की कांग्रेस को ऐतिहासिक पराजय मिली। बाद में कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी जनता पार्टी में विलीन हो गई। बहुगुणा मोरारजी देसाई सरकार में केंद्रीय मंत्री बने। इस प्रकार उनकी राजनीति का दूसरा चरण शुरू हुआ—
कांग्रेस नेता → इंदिरा-विरोधी नेता → जनता सरकार के मंत्री।
23.12 फिर कांग्रेस की ओर जनता पार्टी सरकार की आंतरिक कलह के बाद भारतीय राजनीति में फिर पुनर्संरेखण हुआ। बहुगुणा कुछ समय के लिए कांग्रेस की राजनीति में वापस आए। लेकिन इंदिरा गांधी से उनका स्थायी राजनीतिक मेल नहीं हो पाया। 1980 के आसपास वे फिर अलग रास्ते पर चले गए। यानी उनका राजनीतिक जीवन पार्टी बदलने के कई चरणों से गुजरा। लेकिन एक बात स्थायी रही—
व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान।
23.13 1984 — अमिताभ बच्चन से मुकाबला बहुगुणा के राजनीतिक जीवन की सबसे चर्चित चुनावी घटनाओं में 1984 का इलाहाबाद लोकसभा चुनाव था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस ने लोकप्रिय फिल्म अभिनेता और राजीव गांधी के मित्र अमिताभ बच्चन को इलाहाबाद से उम्मीदवार बनाया। बहुगुणा उनके सामने मैदान में थे। राष्ट्रीय सहानुभूति लहर और अमिताभ की असाधारण लोकप्रियता के बीच बहुगुणा चुनाव हार गए। यह चुनाव भारतीय राजनीति और लोकप्रिय संस्कृति के संगम का ऐतिहासिक उदाहरण बन गया। 23.14 1988 — बहुगुणा का निधन 17 मार्च 1989 को हेमवती नंदन बहुगुणा का निधन हुआ। उनकी मृत्यु तक वे भारतीय राजनीति के उन नेताओं में गिने जाते थे जिन्होंने— स्वतंत्रता आंदोलन, कांग्रेस संगठन,
उत्तर प्रदेश सरकार, केंद्रीय सरकार, इंदिरा-विरोधी राजनीति और जनता प्रयोग सभी देखे थे। उनकी राजनीतिक यात्रा स्वनिर्मित थी। लेकिन उनके बाद—
‘बहुगुणा’ स्वयं एक राजनीतिक उपनाम बन चुका था।
यहीं से वंश की कहानी शुरू होती है। 23.15 दूसरी पीढ़ी — विजय बहुगुणा हेमवती नंदन बहुगुणा के पुत्र—
विजय बहुगुणा
का जन्म 28 फरवरी 1947 को हुआ। उनका शुरुआती पेशेवर जीवन सीधे राजनीति में नहीं था। उन्होंने कानून का क्षेत्र चुना और न्यायिक सेवा में रहे। बाद में उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। यहां पहली महत्वपूर्ण बात यह है कि वे पिता की मृत्यु के तुरंत बाद सीधे किसी विधानसभा या लोकसभा सीट के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित नहीं हुए। उनकी राजनीतिक यात्रा अपेक्षाकृत देर से गति पकड़ती है। 23.16 न्यायपालिका से राजनीति विजय बहुगुणा उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा से जुड़े और न्यायाधीश के रूप में कार्य किया। बाद में उन्होंने न्यायिक सेवा छोड़ी और सक्रिय राजनीति में आए। पिता का नाम उनके लिए स्पष्ट राजनीतिक पूंजी था।
विशेष रूप से उत्तराखंड बनने के बाद ‘बहुगुणा’ नाम का महत्व और बढ़ गया क्योंकि एच.एन. बहुगुणा की जड़ें इसी पर्वतीय क्षेत्र में थीं। इसलिए विजय को मिली विरासत केवल राष्ट्रीय पहचान नहीं थी—
वह क्षेत्रीय ऐतिहासिक स्मृति भी थी।
23.17 उत्तराखंड का निर्माण और बहुगुणा परिवार 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड अलग राज्य बना। इस नए राज्य की राजनीति में पुराने गढ़वाल और कुमाऊं के राजनीतिक परिवारों तथा नेताओं की नई भूमिका बनी। हेमवती नंदन बहुगुणा स्वयं उत्तराखंड राज्य बनने से पहले ही गुजर चुके थे। लेकिन उनका नाम राज्य की राजनीतिक स्मृति में मौजूद था। विजय बहुगुणा ने इसी भूगोल में अपनी राजनीति विकसित की। 23.18 टिहरी गढ़वाल विजय बहुगुणा की मुख्य चुनावी राजनीति टिहरी गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र से जुड़ी। वे कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में आए। शुरुआती चुनावों में उन्हें पराजय भी मिली। लेकिन बाद में वे लोकसभा पहुंचे। यह महत्वपूर्ण है— पिता का नाम राजनीतिक प्रवेश आसान कर सकता था,
लेकिन जीत स्वतः नहीं मिली। 23.19 सांसद के रूप में विजय विजय बहुगुणा टिहरी गढ़वाल से लोकसभा सदस्य बने और राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित हुए। फिर 2012 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव ने उनकी राजनीतिक स्थिति अचानक बदल दी। कांग्रेस 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी जबकि भाजपा को 31 सीटें मिलीं। कांग्रेस ने अन्य विधायकों के समर्थन से सरकार बनाने का दावा किया। लेकिन मुख्यमंत्री पद का सबसे चर्चित दावेदार कोई और था—
हरीश रावत।
23.20 2012 — मुख्यमंत्री चयन का विवाद हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के अत्यंत प्रभावशाली नेता थे। लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री पद के लिए विजय बहुगुणा को चुना। इस निर्णय से पार्टी के भीतर खुला असंतोष पैदा हो गया। हरीश रावत नाराज हुए और उनके समर्थकों ने नेतृत्व के फैसले का विरोध किया। समकालीन रिपोर्टों के अनुसार बहुगुणा के शपथ ग्रहण के समय कांग्रेस गंभीर आंतरिक विद्रोह से गुजर रही थी और कई विधायक रावत के समर्थन में थे। यहीं वंशवाद का प्रश्न तीखा हुआ—
क्या बहुगुणा नाम ने विजय की मुख्यमंत्री पद तक पहुंच आसान की?
23.21 सांसद मुख्यमंत्री बने मुख्यमंत्री बनने के समय विजय बहुगुणा विधायक नहीं बल्कि लोकसभा सदस्य थे। उन्हें छह महीने के भीतर विधानसभा सदस्य बनना आवश्यक था। इसके लिए एक असाधारण राजनीतिक घटनाक्रम हुआ। सितारगंज से भाजपा विधायक किरण मंडल ने इस्तीफा दे दिया। सीट खाली हुई। विजय बहुगुणा वहां से उपचुनाव लड़े। यह मुख्यमंत्री के लिए सुरक्षित विधानसभा सीट तैयार किए जाने का उदाहरण था। 23.22 विजय की सरकार मार्च 2012 में विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने। लेकिन शुरुआत से ही सरकार पर आंतरिक दबाव था। हरीश रावत खेमा शक्तिशाली था। कांग्रेस का बहुमत स्वयं का स्पष्ट बहुमत नहीं था। और उत्तराखंड की राजनीति पहले से नेतृत्व परिवर्तन तथा अस्थिरता के लिए जानी जाने लगी थी।
फिर जून 2013 में ऐसी आपदा आई जिसने सरकार की क्षमता की सबसे कठिन परीक्षा ली। 23.23 जून 2013 — केदारनाथ आपदा जून 2013 में उत्तराखंड में अभूतपूर्व वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन से विनाशकारी आपदा आई। केदारनाथ क्षेत्र विशेष रूप से तबाह हुआ। हजारों लोग मारे गए या लापता हुए। सड़कें, पुल, गांव और तीर्थयात्रा मार्ग नष्ट हुए। भारतीय सेना, वायुसेना, आईटीबीपी, एनडीआरएफ और अन्य एजेंसियों ने बड़े पैमाने पर बचाव अभियान चलाया। यह विजय बहुगुणा सरकार की निर्णायक प्रशासनिक परीक्षा बन गई। 23.24 सरकार पर सवाल आपदा के बाद राज्य सरकार की— पूर्व तैयारी, आपदा प्रबंधन, यात्रियों की संख्या के नियमन, राहत समन्वय, मृतकों और लापता लोगों के आंकड़ों, पुनर्वास और पुनर्निर्माण को लेकर आलोचना हुई।
कांग्रेस के भीतर भी बहुगुणा के नेतृत्व पर दबाव बढ़ा। बाद की राजनीतिक समीक्षा में उनके हटने का एक प्रमुख कारण 2013 की आपदा और उसके बाद राहत-प्रबंधन को लेकर नेतृत्व की असंतुष्टि माना गया। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इतनी विशाल प्राकृतिक आपदा को केवल एक मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत विफलता में समेट देना भी विश्लेषणात्मक रूप से उचित नहीं होगा। इसमें दीर्घकालीन पर्यावरणीय, संस्थागत और प्रशासनिक कमजोरियां भी शामिल थीं। 23.25 जनवरी 2014 — विजय बहुगुणा हटे 31 जनवरी 2014 को विजय बहुगुणा ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने स्वयं कहा कि वे कांग्रेस नेतृत्व के निर्देश पर पद छोड़ रहे हैं। उनके स्थान पर—
हरीश रावत
मुख्यमंत्री बने। वही हरीश रावत जिन्हें 2012 में मुख्यमंत्री पद के लिए पीछे छोड़कर विजय बहुगुणा चुने गए थे। दो वर्ष बाद शक्ति-संतुलन उलट गया। 23.26 वंश का नाम मुख्यमंत्री बना सकता है, बचा नहीं सकता वंशवादी राजनीति के अध्ययन में यह घटना अत्यंत उपयोगी है। विजय को पिता के नाम का लाभ मिला होगा। कांग्रेस हाईकमान तक पहुंच भी आसान रही होगी। लेकिन—
वंश मुख्यमंत्री पद की स्थिरता की गारंटी नहीं दे सका।
लगभग दो वर्ष के भीतर उन्हें पद छोड़ना पड़ा। वंशवाद अवसर प्रदान करता है। शासन क्षमता, गुटीय समर्थन और राजनीतिक परिस्थितियां पद की आयु तय करती हैं। 23.27 2016 — अब पुत्र ने कांग्रेस से विद्रोह किया मार्च 2016 में उत्तराखंड कांग्रेस में बड़ा संकट पैदा हुआ। विजय बहुगुणा सहित नौ कांग्रेस विधायक मुख्यमंत्री हरीश रावत के विरुद्ध विद्रोह में शामिल हुए। यह विडंबनापूर्ण राजनीतिक चक्र था। 2012 में—
विजय बहुगुणा ने हरीश रावत को पीछे छोड़कर मुख्यमंत्री पद पाया।
2014 में—
हरीश रावत ने विजय का स्थान लिया।
2016 में—
विजय हरीश रावत के विरुद्ध विद्रोह में शामिल हो गए।
23.28 संवैधानिक संकट 2016 का उत्तराखंड संकट केवल कांग्रेस की गुटबाजी नहीं रहा। मामला— विधानसभा बहुमत, विनियोग विधेयक, विधायकों की अयोग्यता, राष्ट्रपति शासन, उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। केंद्र ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया। बाद में न्यायिक हस्तक्षेप और फ्लोर टेस्ट के बाद हरीश रावत सरकार बहाल हुई। यह उत्तराखंड के संवैधानिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक था। 23.29 विजय बहुगुणा भाजपा में विद्रोही कांग्रेस विधायकों में शामिल विजय बहुगुणा अंततः भाजपा में चले गए। इससे बहुगुणा परिवार की पार्टी पहचान फिर बदल गई। पिता ने अपने जीवन में कांग्रेस छोड़ी थी। अब पुत्र ने भी कांग्रेस छोड़ी। लेकिन ऐतिहासिक संदर्भ अलग था।
एच.एन. बहुगुणा ने आपातकाल और इंदिरा गांधी के नेतृत्व के विरुद्ध कांग्रेस छोड़ी थी। विजय ने उत्तराखंड की गुटीय राजनीति और हरीश रावत से संघर्ष के बीच पार्टी छोड़ी। दोनों घटनाओं को समान वैचारिक विद्रोह कहना उचित नहीं होगा। 23.30 अब दूसरी शाखा — रीता बहुगुणा जोशी एच.एन. बहुगुणा की पुत्री—
रीता बहुगुणा जोशी
ने भी सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। उनकी यात्रा भाई विजय से अलग रही। वे अकादमिक पृष्ठभूमि से आईं। उन्होंने इतिहास पढ़ाया और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़ी रहीं। इसलिए उनका राजनीति में प्रवेश सीधे पिता की सीट संभालने के रूप में नहीं हुआ। 23.31 अकादमिक जीवन से नगर राजनीति रीता बहुगुणा जोशी ने अपने राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण प्रारंभ स्थानीय निकाय राजनीति से किया। वे 1995 से 2000 तक इलाहाबाद की महापौर रहीं। यह महत्वपूर्ण था। उनकी पहली बड़ी निर्वाचित भूमिका संसद नहीं थी। उन्होंने स्थानीय शासन से शुरुआत की। इससे उन्हें अपना स्वतंत्र राजनीतिक अनुभव मिला। 23.32 कांग्रेस में लंबी पारी रीता कांग्रेस में लगभग ढाई दशक सक्रिय रहीं।
वे पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता बनीं और उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रमुख महिला तथा ब्राह्मण चेहरे के रूप में उभरीं। 2007 से 2012 तक वे—
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष
रहीं। यह वह समय था जब कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में पुनरुत्थान का प्रयास कर रही थी। 23.33 मायावती से टकराव 2009 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के बारे में एक विवादास्पद टिप्पणी के बाद रीता बहुगुणा जोशी के विरुद्ध मामला दर्ज हुआ और उन्हें गिरफ्तार किया गया। उनके लखनऊ स्थित घर पर हमला और आगजनी भी हुई। यह प्रकरण उत्तर प्रदेश की उस दौर की तीखी बसपा–कांग्रेस राजनीति का प्रतीक बना। रीता की पहचान आक्रामक विपक्षी नेता के रूप में मजबूत हुई। लेकिन उनकी टिप्पणी की भाषा को लेकर गंभीर आलोचना भी हुई। 23.34 2012 — विधानसभा जीत 2012 में रीता बहुगुणा जोशी ने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में लखनऊ कैंट विधानसभा सीट जीती।
यह महत्वपूर्ण था क्योंकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का प्रदर्शन सीमित रहा था। इस जीत ने सिद्ध किया कि वे केवल संगठनात्मक पदाधिकारी नहीं थीं। उनके पास अपना चुनावी आधार भी था। 2017 में भाजपा ने भी उन्हें इसी सीट से उम्मीदवार बनाया; समकालीन रिकॉर्ड उनके 2012 के कांग्रेस विधायक होने की पुष्टि करते हैं। 23.35 भाई पहले भाजपा में, बहन बाद में 2016 में विजय बहुगुणा कांग्रेस से विद्रोह करके भाजपा की ओर जा चुके थे। कुछ महीनों बाद रीता बहुगुणा जोशी ने भी कांग्रेस छोड़ दी। 20 अक्टूबर 2016 को वे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की उपस्थिति में भाजपा में शामिल हुईं। अब एच.एन. बहुगुणा की दोनों प्रमुख राजनीतिक संतानों की पार्टी बदल चुकी थी। 23.36 रीता ने कांग्रेस क्यों छोड़ी?
भाजपा में प्रवेश करते समय रीता ने कांग्रेस नेतृत्व और विशेष रूप से राहुल गांधी की आलोचना की। उन्होंने कहा कि उन्होंने लगभग 24 वर्ष कांग्रेस में बिताए लेकिन पार्टी की राजनीतिक दिशा से असंतुष्ट थीं। समकालीन रिपोर्टों में अन्य कारण भी सामने आए— पार्टी में स्वयं को किनारे किया जाना, 2017 की रणनीति, शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया जाना, और टिकट वितरण को लेकर असंतोष। इसलिए उनका पार्टी परिवर्तन केवल एक घटना या बयान से समझना पर्याप्त नहीं होगा। 23.37 कांग्रेस की प्रतिक्रिया कांग्रेस ने रीता के भाजपा प्रवेश को विश्वासघात बताया। पार्टी ने भाजपा पर विपक्षी दलों के नेताओं को अपने साथ मिलाने की राजनीति करने का आरोप लगाया।
रीता ने इसके उलट कांग्रेस नेतृत्व की कार्यशैली को अपने निर्णय का कारण बताया। यहां भी हमारे शोध का नियम लागू होता है—
दोनों राजनीतिक दावों को दावे के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।
23.38 2017 — भाजपा टिकट और जीत भाजपा ने रीता बहुगुणा जोशी को 2017 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में लखनऊ कैंट से उम्मीदवार बनाया। वे चुनाव जीतीं। यह उनकी राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण परीक्षण था। उन्होंने वही निर्वाचन क्षेत्र—
पहले कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में
और फिर
भाजपा उम्मीदवार के रूप में
जीता। इससे स्पष्ट होता है कि उनका कुछ व्यक्तिगत चुनावी आधार भी था। 23.39 योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री 2017 में भाजपा की बड़ी जीत के बाद योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। रीता बहुगुणा जोशी को कैबिनेट मंत्री बनाया गया। यह राजनीतिक परिवर्तन उल्लेखनीय था—
उत्तर प्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष अब भाजपा सरकार की मंत्री थीं।
बहुगुणा परिवार की दलगत यात्रा एक बार फिर भारतीय राजनीति की वैचारिक और संगठनात्मक गतिशीलता का उदाहरण बन गई। 23.40 2019 — प्रयागराज से लोकसभा 2019 में भाजपा ने रीता को प्रयागराज लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया। वे चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं। यह शहर उनके पिता की राजनीति से भी गहराई से जुड़ा था। इसलिए लगभग तीन दशकों बाद बहुगुणा परिवार की राजनीतिक स्मृति फिर इलाहाबाद/प्रयागराज की संसदीय राजनीति में दिखाई दी। लेकिन इस बार—
पार्टी कांग्रेस नहीं, भाजपा थी।
23.41 तीसरी पीढ़ी का प्रश्न वंशवाद का अध्ययन यहां समाप्त नहीं होता। रीता बहुगुणा जोशी के पुत्र मयंक जोशी ने भी राजनीति में रुचि दिखाई। 2016 में रीता के कांग्रेस छोड़ने से पहले टिकट वितरण को लेकर हुई चर्चाओं में मयंक का नाम भी सामने आया था; रिपोर्टों के अनुसार रीता अपने साथ पुत्र के लिए भी राजनीतिक अवसर चाहती थीं। बाद के वर्षों में मयंक राजनीतिक गतिविधियों में दिखाई दिए। इससे बहुगुणा परिवार तीसरी पीढ़ी की सीमा तक पहुंचता है। 23.42 क्या तीसरी पीढ़ी स्थापित हो गई? यहां सावधानी आवश्यक है। राजनीतिक परिवार का सदस्य सक्रिय राजनीति में दिखाई देना और निर्वाचित राजनीतिक वंश का स्थापित तीसरा स्तंभ बन जाना अलग बातें हैं।
मयंक की राजनीतिक उपस्थिति रही है, लेकिन उन्हें अभी एच.एन. बहुगुणा, विजय या रीता जैसी निर्वाचित और प्रशासनिक राजनीतिक स्थिति प्राप्त नहीं हुई। इसलिए इस परिवार को अभी मुख्यतः—
दो स्थापित राजनीतिक पीढ़ियों वाला वंश
कहना अधिक सटीक है। 23.43 बहुगुणा परिवार की दो भौगोलिक शाखाएं इस परिवार का एक असाधारण पहलू उसका भौगोलिक विभाजन है।
विजय बहुगुणा
उत्तराखंड
में स्थापित हुए।
रीता बहुगुणा जोशी
उत्तर प्रदेश
में स्थापित हुईं। अर्थात पिता की राजनीतिक विरासत एक निर्वाचन क्षेत्र में केंद्रित नहीं रही। वह दो राज्यों में विभाजित हुई। 23.44 उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड — प्रतीकात्मक निरंतरता एच.एन. बहुगुणा जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब उत्तराखंड अलग राज्य नहीं था। उनका जन्मस्थान गढ़वाल उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा था। 2000 में उत्तराखंड बनने के बाद परिवार की राजनीतिक विरासत मानो दो हिस्सों में बंट गई—
पिता का कर्मक्षेत्र — उत्तर प्रदेश।
पिता का जन्मक्षेत्र — उत्तराखंड।
रीता पहली दिशा में गईं। विजय दूसरी दिशा में। यह भारतीय राजनीतिक वंशों में दुर्लभ संरचना है। 23.45 पिता कांग्रेस से निकले, दोनों बच्चे भी निकले यह परिवार एक विचित्र ऐतिहासिक समानता प्रस्तुत करता है। एच.एन. बहुगुणा— कांग्रेस के बड़े नेता बने, फिर नेतृत्व से टकराए, पार्टी छोड़ी। विजय— कांग्रेस से मुख्यमंत्री बने, हरीश रावत से टकराए, रीता— कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बनीं, नेतृत्व से असंतुष्ट हुईं, लेकिन कारण और राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग थीं। इसे किसी पारिवारिक ‘विद्रोही जीन’ की तरह नहीं, बल्कि तीन अलग राजनीतिक संदर्भों के रूप में पढ़ना चाहिए। 23.46 क्या बहुगुणा परिवार वैचारिक वंश है? बहुत सीमित अर्थ में।
यदि कोई राजनीतिक वंश विचारधारा के आधार पर परिभाषित हो तो बहुगुणा परिवार उस कसौटी पर कमजोर पड़ता है। कांग्रेस, कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी, जनता राजनीति और दूसरे विपक्षी प्रयोगों से गुजरे। विजय कांग्रेस से भाजपा में गए। रीता कांग्रेस से भाजपा में गईं। इसलिए परिवार की स्थायी चीज विचारधारा नहीं रही। स्थायी रहा—
राजनीतिक नाम और सार्वजनिक पूंजी।
23.47 वंशवाद की कसौटी पर विजय बहुगुणा विजय को पिता के नाम का स्पष्ट लाभ मिला। विशेष रूप से उत्तराखंड में ‘बहुगुणा’ उपनाम का ऐतिहासिक महत्व था। लेकिन उनके मामले में कुछ प्रतितथ्य भी महत्वपूर्ण हैं— उन्होंने न्यायिक करियर बनाया, राजनीति में अपेक्षाकृत देर से आए, चुनावी हारें झेलीं, फिर सांसद बने। इसलिए उनका वर्गीकरण होगा—
वंशवादी लाभ के साथ स्वतंत्र पेशेवर पृष्ठभूमि और बाद का चुनावी निर्माण।
23.48 मुख्यमंत्री पद — वंशवाद का सबसे कठिन प्रश्न 2012 में विजय को मुख्यमंत्री चुना जाना इस परिवार पर वंशवाद की आलोचना का सबसे मजबूत बिंदु है। क्योंकि हरीश रावत जैसे पुराने संगठनात्मक नेता की दावेदारी मौजूद थी। विजय उस समय सांसद थे। कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें चुना और इस फैसले से तत्काल विद्रोह पैदा हुआ। क्या इसमें ‘बहुगुणा’ नाम निर्णायक था? ऐसा सिद्ध करने वाला कोई सरल दस्तावेज नहीं है। लेकिन यह मानना भी कठिन है कि पिता की राष्ट्रीय राजनीतिक विरासत अप्रासंगिक थी। 23.49 वंशवाद की कसौटी पर रीता रीता को भी बहुगुणा नाम का स्पष्ट लाभ मिला। लेकिन उनकी स्वतंत्र राजनीतिक उपलब्धियां अधिक लंबी हैं— अकादमिक करियर, महापौर, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, विधायक,
भाजपा में जाने के बाद फिर विधायक, कैबिनेट मंत्री, लोकसभा सदस्य। इसलिए उन्हें केवल ‘एच.एन. बहुगुणा की बेटी’ कह देना तथ्यात्मक रूप से अपर्याप्त होगा। उनका वर्गीकरण अधिक उचित रूप से होगा—
वंशवादी प्रवेश-सुविधा + लंबा स्वतंत्र राजनीतिक करियर।
23.50 भाई और बहन की तुलना | कसौटी | विजय बहुगुणा | रीता बहुगुणा जोशी | |---|---|---| | पिता | एच.एन. बहुगुणा | एच.एन. बहुगुणा | | प्रारंभिक पेशा | न्यायिक सेवा | शिक्षण/अकादमिक | | मुख्य राजनीतिक क्षेत्र | उत्तराखंड | उत्तर प्रदेश | | कांग्रेस | हां | हां | | सांसद | हां | हां | | विधायक | हां | हां | | मुख्यमंत्री | हां | नहीं | | प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष | नहीं | हां | | भाजपा में प्रवेश | 2016 | 2016 | | स्वतंत्र चुनावी पहचान | हां | हां | | वंशवादी लाभ | स्पष्ट | स्पष्ट | दोनों ने एक ही पिता की विरासत प्राप्त की। लेकिन उसे दो अलग राजनीतिक भूगोल में विकसित किया। 23.51 विजय और रीता का एक ही वर्ष भाजपा में पहुंचना 2016 परिवार के इतिहास में निर्णायक वर्ष है।
उत्तराखंड में विजय कांग्रेस विद्रोह के केंद्र में थे। उत्तर प्रदेश में कुछ महीने बाद रीता ने कांग्रेस छोड़ दी। दोनों भाजपा में पहुंचे। यह किसी योजनाबद्ध पारिवारिक सामूहिक निर्णय के रूप में प्रमाणित नहीं है। लेकिन राजनीतिक परिणाम यही हुआ कि—
एच.एन. बहुगुणा की दोनों प्रमुख राजनीतिक संतानों की कांग्रेस राजनीति समाप्त हो गई।
23.52 भाजपा को क्या मिला? भाजपा को विजय के माध्यम से— उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर का एक स्थापित नेता, पूर्व मुख्यमंत्री, गढ़वाल का राजनीतिक नाम मिला। रीता के माध्यम से— उत्तर प्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष, ब्राह्मण चेहरा, लखनऊ की विधायक, और एक ऐतिहासिक राजनीतिक परिवार इसलिए दोनों प्रवेश केवल व्यक्तिगत दलबदल नहीं थे। उनका प्रतीकात्मक महत्व भी था। 23.53 कांग्रेस ने क्या खोया? कांग्रेस के लिए यह नुकसान दो स्तर पर था। पहला— दो अनुभवी नेता। दूसरा— एक ऐसा उपनाम जो स्वतंत्रता आंदोलन और पुरानी कांग्रेस परंपरा से जुड़ा था। विशेष रूप से रीता के भाजपा प्रवेश पर कांग्रेस की तीखी प्रतिक्रिया इसी प्रतीकात्मक नुकसान को दर्शाती है। 23.54 राजनीतिक वंश और पार्टी निष्ठा
बहुगुणा परिवार फिर वही प्रश्न उठाता है जो सिंधिया परिवार ने उठाया था—
राजनीतिक परिवार अधिक स्थायी है या राजनीतिक दल?
एच.एन. बहुगुणा के समय से पार्टियां बदलीं। पुत्र और पुत्री ने भी पार्टी बदली।
बहुगुणा नाम बना रहा।
इससे राजनीतिक वंशों की एक मूल विशेषता सामने आती है— उनकी राजनीतिक पूंजी कई बार पार्टी की सीमा पार कर सकती है। 23.55 प्रमुख विवाद बहुगुणा परिवार के अध्ययन में प्रमुख विवाद हैं— एच.एन. बहुगुणा और इंदिरा गांधी का संघर्ष, 1977 में कांग्रेस से विद्रोह, 1984 का इलाहाबाद चुनाव, 2012 में विजय को हरीश रावत पर प्राथमिकता, 2013 केदारनाथ आपदा के बाद राज्य सरकार की आलोचना, 2014 में विजय का हटना, 2016 उत्तराखंड कांग्रेस विद्रोह, राष्ट्रपति शासन और न्यायिक हस्तक्षेप, रीता की 2009 की विवादास्पद टिप्पणी, 2016 में उनका कांग्रेस छोड़ना, और दोनों भाई-बहन का भाजपा में जाना। इन सभी को वंशवाद के एक ही कारण से समझना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देगा। 23.56 प्रमुख दस्तावेज और प्राथमिक स्रोत
इस परिवार पर विस्तृत शोध के लिए सबसे उपयोगी दस्तावेज होंगे—
स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े एच.एन. बहुगुणा के अभिलेख।
उत्तर प्रदेश विधानसभा की कार्यवाहियां।
1973 में मुख्यमंत्री नियुक्ति और 1974 विधानसभा चुनाव के निर्वाचन आयोग रिकॉर्ड।
आपातकालीन काल के कांग्रेस संगठनात्मक दस्तावेज।
1977 कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी के गठन संबंधी दस्तावेज और घोषणाएं।
जनता पार्टी के विलय और मोरारजी सरकार के मंत्रिमंडलीय रिकॉर्ड।
1984 इलाहाबाद लोकसभा निर्वाचन परिणाम।
एच.एन. बहुगुणा के संसदीय भाषण।
दूसरी पीढ़ी के लिए—
टिहरी गढ़वाल लोकसभा निर्वाचन परिणाम।
2012 उत्तराखंड विधानसभा चुनाव परिणाम।
विजय बहुगुणा की मुख्यमंत्री नियुक्ति से जुड़े कांग्रेस विधायक दल रिकॉर्ड।
सितारगंज उपचुनाव रिकॉर्ड, जिसमें भाजपा विधायक के इस्तीफे के बाद विजय ने चुनाव लड़ा।
2013 उत्तराखंड आपदा पर सरकारी, संसदीय और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से संबंधित रिपोर्टें।
31 जनवरी 2014 विजय बहुगुणा का इस्तीफा।
2016 उत्तराखंड विधानसभा कार्यवाही, अयोग्यता मामले, राष्ट्रपति शासन की अधिसूचना तथा उच्च न्यायालय/सुप्रीम कोर्ट के निर्णय।
रीता बहुगुणा जोशी के लिए—
इलाहाबाद नगर निगम रिकॉर्ड,
उत्तर प्रदेश कांग्रेस संगठनात्मक रिकॉर्ड,
2009 गिरफ्तारी और संबंधित कानूनी दस्तावेज,
2012 लखनऊ कैंट निर्वाचन परिणाम,
20 अक्टूबर 2016 भाजपा प्रवेश संबंधी सार्वजनिक वक्तव्य,
2017 विधानसभा परिणाम
और
2019 प्रयागराज लोकसभा निर्वाचन परिणाम
महत्वपूर्ण प्राथमिक सामग्री हैं। 23.57 इतिहासलेखन — पहला दृष्टिकोण : स्वनिर्मित संस्थापक, वंशवादी उत्तराधिकारी बहुगुणा परिवार को समझने की सबसे सीधी व्याख्या है—
एच.एन. बहुगुणा स्वनिर्मित थे।
लेकिन विजय और रीता को वह प्रारंभिक राजनीतिक पहचान मिली जिसे उनके पिता ने दशकों में बनाया था। इस अर्थ में परिवार का वंशवाद—
दूसरी पीढ़ी से
शुरू होता है। यह वही मॉडल है जो हमने पायलट परिवार में देखा। 23.58 दूसरा दृष्टिकोण : नाम पर्याप्त नहीं था दूसरी व्याख्या इस बात पर जोर देती है कि दोनों संतानों ने अलग पेशेवर और राजनीतिक जीवन बनाया। विजय न्यायिक सेवा से आए। रीता अकादमिक जीवन और नगर राजनीति से। दोनों को चुनावी पराजय और राजनीतिक संघर्ष झेलने पड़े। इसलिए ‘बहुगुणा’ उपनाम ने दरवाजा खोला— लेकिन पूरा राजनीतिक करियर स्वयं नहीं बनाया। 23.59 तीसरा दृष्टिकोण : हाईकमान संस्कृति 2012 में विजय बहुगुणा की मुख्यमंत्री नियुक्ति कांग्रेस की हाईकमान संस्कृति के अध्ययन का महत्वपूर्ण मामला है। हरीश रावत के समर्थकों का तीखा विरोध बताता है कि विधायक दल और केंद्रीय नेतृत्व की पसंद में अंतर था।
इसलिए यह मामला केवल वंशवाद नहीं बल्कि—
पार्टी आंतरिक लोकतंत्र बनाम केंद्रीय नेतृत्व
का भी प्रश्न है। 23.60 चौथा दृष्टिकोण : वंशवाद और दल-बदल बहुगुणा परिवार एक और धारणा को चुनौती देता है— कि राजनीतिक वंश हमेशा उसी पार्टी में रहता है जिसने उसे स्थापित किया। ऐसा आवश्यक नहीं। पारिवारिक राजनीतिक पूंजी portable हो सकती है। विजय और रीता दोनों ने कांग्रेस में अपनी पहचान बनाई और बाद में भाजपा में उस पहचान का उपयोग किया। यह आधुनिक भारतीय राजनीति में राजनीतिक पूंजी के हस्तांतरण का महत्वपूर्ण उदाहरण है। 23.61 पांचवां दृष्टिकोण : पिता की विरासत दो राज्यों में सामान्यतः राजनीतिक वंश किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र या राज्य में केंद्रित रहता है। बहुगुणा परिवार अलग है। एच.एन. बहुगुणा की विरासत—
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड
दोनों में राजनीतिक संसाधन बनी। इसीलिए इसे केवल सीट-आधारित वंश नहीं कहा जा सकता। यह—
नाम-आधारित क्षेत्रीय राजनीतिक पूंजी
का उदाहरण है। 23.62 क्या बहुगुणा परिवार ने लोकतंत्र को बंद किया? वंशवाद की सबसे गंभीर आलोचना तब होती है जब कोई परिवार लगातार एक ही पार्टी संगठन और निर्वाचन क्षेत्र को लगभग निजी संपत्ति में बदल देता है। बहुगुणा परिवार में यह पैटर्न अपेक्षाकृत कमजोर है। न विजय ने पिता की स्थायी सीट सीधे संभाली, न रीता ने। दोनों अलग क्षेत्रों में गए। दोनों को चुनाव लड़ना और हार-जीत का सामना करना पड़ा। इसलिए यह कठोर निर्वाचन-क्षेत्रीय वंशवाद की तुलना में नाम और नेटवर्क आधारित वंशवाद अधिक है। 23.63 फिर विशेषाधिकार कहां था? विशेषाधिकार मुख्यतः चार स्तरों पर था—
पहचान।
एक सामान्य नए नेता को अपना नाम स्थापित करने में वर्षों लगते हैं। बहुगुणा नाम पहले से राष्ट्रीय था।
पार्टी तक पहुंच।
शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच सामान्य कार्यकर्ता की तुलना में आसान थी।
मीडिया दृश्यता।
राजनीतिक परिवार की अगली पीढ़ी स्वतः समाचार बनती है।
नेटवर्क।
पिता के पुराने समर्थक, संपर्क और सामाजिक संबंध उपलब्ध रहते हैं। यही वंशवाद की वास्तविक राजनीतिक पूंजी है। 23.64 लेकिन विशेषाधिकार की सीमा भी स्पष्ट है विजय मुख्यमंत्री बने— फिर हटाए गए। कांग्रेस छोड़ी। उनका प्रत्यक्ष चुनावी प्रभाव बाद में सीमित हुआ। रीता प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनीं— लेकिन कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में सत्ता तक नहीं पहुंचा सकीं। उन्होंने भाजपा ज्वाइन की— फिर भाजपा के बड़े संगठन के भीतर उनकी भूमिका पार्टी नेतृत्व द्वारा निर्धारित हुई। इसलिए—
वंश राजनीतिक प्रवेश का accelerator है, स्थायी सत्ता का insurance नहीं।
23.65 तीन बहुगुणाओं की तीन राजनीतिक यात्राएं यदि पूरे परिवार को तीन पंक्तियों में रखें—
हेमवती नंदन बहुगुणा संघर्ष → स्वतंत्रता आंदोलन → कांग्रेस संगठन → मुख्यमंत्री → इंदिरा से विद्रोह → राष्ट्रीय विपक्ष।
विजय बहुगुणा न्यायिक सेवा → कांग्रेस → सांसद → मुख्यमंत्री → केदारनाथ आपदा का राजनीतिक दबाव → पद से हटना → हरीश रावत से विद्रोह → भाजपा।
रीता बहुगुणा जोशी अकादमिक जीवन → महापौर → कांग्रेस → प्रदेश अध्यक्ष → विधायक → कांग्रेस से असंतोष → भाजपा → मंत्री → सांसद।
इस क्रम में परिवार की निरंतरता भी दिखती है और प्रत्येक सदस्य की अलग यात्रा भी। 23.66 अंतिम मूल्यांकन बहुगुणा परिवार भारत के राजनीतिक वंशों के अध्ययन में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां वंश की शुरुआत एक स्वनिर्मित नेता से होती है, लेकिन उसकी अर्जित राजनीतिक पूंजी अगली पीढ़ी के लिए विशेषाधिकार में बदल जाती है। हेमवती नंदन बहुगुणा को कोई राजनीतिक विरासत नहीं मिली थी। उन्होंने अपनी विरासत बनाई। स्वतंत्रता आंदोलन से निकले। कांग्रेस संगठन में ऊपर पहुंचे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। इंदिरा गांधी से टकराए। 1977 में कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनाई। जनता प्रयोग का हिस्सा बने। और अपने नाम को राष्ट्रीय राजनीतिक पहचान में बदल दिया।
विजय और रीता ने वही नाम विरासत में पाया। इसलिए उनका शुरुआती राजनीतिक मैदान किसी सामान्य नागरिक के समान नहीं था। लेकिन दोनों ने उस विरासत को अलग-अलग दिशाओं में विकसित किया। विजय ने उत्तराखंड में राजनीति बनाई और मुख्यमंत्री बने। 2012 में कांग्रेस हाईकमान द्वारा उनका चयन इतना विवादास्पद था कि हरीश रावत खेमा तत्काल विद्रोह की स्थिति में पहुंच गया। 2013 की आपदा के बाद उनके नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठे और जनवरी 2014 में उन्हें पद छोड़ना पड़ा। 2016 में वही विजय हरीश रावत सरकार के विरुद्ध कांग्रेस विधायकों के विद्रोह में शामिल हुए। रीता की यात्रा अलग रही।
उन्होंने अकादमिक और स्थानीय निकाय राजनीति से शुरुआत की, इलाहाबाद की महापौर बनीं, उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनीं और विधानसभा चुनाव जीता। फिर 2016 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गईं। भाजपा में भी उन्होंने चुनाव जीता, उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बनीं और बाद में लोकसभा पहुंचीं। इसलिए बहुगुणा परिवार का सटीक वर्गीकरण होगा—
स्वनिर्मित प्रथम पीढ़ी → विरासत-लाभ प्राप्त दूसरी पीढ़ी → अलग-अलग राज्यों में स्वतंत्र राजनीतिक निर्माण → कांग्रेस से भाजपा की ओर दलगत पुनर्संरेखण।
यह परिवार एक महत्वपूर्ण बात भी सिद्ध करता है— राजनीतिक वंश का अर्थ हमेशा एक सीट, एक पार्टी और एक ही विचारधारा का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण नहीं होता। कभी-कभी विरासत केवल नाम, संपर्क और प्रारंभिक अवसर देती है; अगली पीढ़ी उस पूंजी को अलग राज्य, अलग पार्टी और अलग राजनीतिक परिस्थितियों में पुनर्निर्मित करती है। और बहुगुणा परिवार की सबसे बड़ी विडंबना शायद यही है— जिस हेमवती नंदन बहुगुणा ने कांग्रेस के भीतर अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान बनाई और फिर उसी पार्टी के केंद्रीकृत नेतृत्व से विद्रोह किया, उनकी दोनों प्रमुख राजनीतिक संतानें भी अंततः कांग्रेस से बाहर निकलीं—और दोनों भाजपा में पहुंचीं। वंश कायम रहा।
पार्टी बदल गई।