भाजपा में राजनीतिक वंश — ‘परिवारवाद’ की आलोचना करने वाली पार्टी स्वयं इससे कितनी मुक्त है?
भारतीय राजनीति में ‘परिवारवाद’ पिछले एक दशक में केवल राजनीतिक विज्ञान की अवधारणा नहीं रहा; यह चुनावी राजनीति का शक्तिशाली नारा बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, द्रमुक, शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और अनेक क्षेत्रीय दलों पर बार-बार आरोप लगाया है कि उनमें नेतृत्व और अवसर कुछ परिवारों के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं। इस आलोचना के पीछे पर्याप्त तथ्य हैं। नेहरू–गांधी, मुलायम–अखिलेश, लालू–तेजस्वी, करुणानिधि–स्टालिन–उदयनिधि, अब्दुल्ला, पवार, ठाकरे और बादल जैसे परिवारों का अध्ययन हम पिछले अध्यायों में कर चुके हैं। लेकिन निष्पक्ष शोध के लिए अगला प्रश्न अनिवार्य है—
क्या भाजपा स्वयं राजनीतिक वंशवाद से मुक्त है?
उत्तर है—
नहीं।
भाजपा में भी अनेक प्रभावशाली नेताओं के पुत्र-पुत्रियां राजनीति में आए हैं, टिकट पाए हैं, विधायक और सांसद बने हैं तथा मंत्री और संगठनात्मक पदों तक पहुंचे हैं। राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य हैं; उत्तर प्रदेश विधानसभा का आधिकारिक प्रोफाइल स्वयं राजनाथ सिंह को उनका पिता दर्ज करता है। पूर्व हिमाचल प्रदेश मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के पुत्र अनुराग ठाकुर पांच बार लोकसभा सदस्य बन चुके हैं और केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं।
कर्नाटक में बी.एस. येदियुरप्पा के पुत्र बी.वाई. विजयेंद्र को विधानसभा टिकट मिला और आगे वे राज्य भाजपा के नेतृत्व तक पहुंचे; 2023 के टिकट वितरण में येदियुरप्पा के पुत्र सहित अनेक भाजपा नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट मिलने की बात समकालीन रिपोर्टों में दर्ज हुई। महाराष्ट्र में गोपीनाथ मुंडे की दोनों बेटियां पंकजा मुंडे और प्रीतम मुंडे सक्रिय राजनीति में स्थापित हुईं। प्रमोद महाजन की पुत्री पूनम महाजन दो बार लोकसभा सदस्य और भारतीय जनता युवा मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष रहीं। अतः प्रश्न यह नहीं है कि भाजपा में वंशवाद है या नहीं। वास्तविक प्रश्न अधिक जटिल है—
भाजपा में मौजूद ‘राजनीतिक परिवार’ और परिवार के नियंत्रण में चलने वाली ‘वंशवादी पार्टी’ क्या एक ही चीज हैं?
इसी अंतर को समझना इस अध्याय का केंद्रीय उद्देश्य है।
24.1 पहले परिभाषा स्पष्ट करें — परिवारवाद आखिर है क्या?
राजनीतिक वंशवाद की चर्चा में तीन अलग स्थितियां अक्सर एक-दूसरे में मिला दी जाती हैं।
पहली स्थिति — नेता का पुत्र या पुत्री राजनीति में आना
यह सबसे सामान्य रूप है। किसी सांसद, विधायक या मंत्री का पुत्र भी चुनाव लड़ता है। इसे वंशवादी प्रवेश कहा जा सकता है।
दूसरी स्थिति — परिवार का राजनीतिक क्षेत्र पर नियंत्रण
पिता की सीट पुत्र को, दूसरी सीट पत्नी को, तीसरी पुत्री को, जिला संगठन रिश्तेदारों को— यह परिवार-आधारित राजनीतिक नेटवर्क है।
तीसरी स्थिति — पूरी पार्टी का नेतृत्व परिवार के भीतर हस्तांतरित होना
पार्टी अध्यक्ष, मुख्यमंत्री पद, उम्मीदवार चयन, संगठन, राजनीतिक उत्तराधिकार— सब एक परिवार से नियंत्रित हों। यह संस्थागत वंशवाद या परिवार-नियंत्रित पार्टी है। इन तीनों को एक ही श्रेणी में रख देना विश्लेषणात्मक भूल होगी। 24.2 भाजपा का तर्क इसी अंतर पर आधारित है भाजपा जब ‘परिवारवाद’ की आलोचना करती है तो उसका प्रमुख राजनीतिक बचाव यह रहा है कि— किसी नेता का बेटा या बेटी राजनीति में होना अपने आप में उस पार्टी को परिवारवादी नहीं बनाता। प्रश्न यह है कि—
पार्टी किसकी है?
क्या पार्टी अध्यक्षता परिवार में हस्तांतरित होती है? क्या प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री पद परिवार के उत्तराधिकारी के लिए सुरक्षित माना जाता है? क्या पार्टी संगठन परिवार के नियंत्रण में है? भाजपा अपने और कांग्रेस/क्षेत्रीय दलों के बीच इसी आधार पर अंतर स्थापित करती है। इस तर्क में पर्याप्त विश्लेषणात्मक वजन है। लेकिन इससे भाजपा के भीतर वंशवादी अवसर-असमानता का प्रश्न समाप्त नहीं होता। 24.3 नरेंद्र मोदी — भाजपा के प्रतिवाद का सबसे शक्तिशाली उदाहरण भाजपा के परिवारवाद-विरोधी आख्यान का सबसे प्रभावशाली उदाहरण स्वयं नरेंद्र मोदी हैं। उनके पिता या माता राजनीति में नहीं थे। उनके भाई-बहन किसी राजनीतिक उत्तराधिकार श्रृंखला का हिस्सा नहीं बने।
प्रधानमंत्री बनने के बाद भी परिवार का कोई सदस्य— सांसद, विधायक, मंत्री, भाजपा पदाधिकारी या राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित नहीं किया गया। इसलिए व्यक्तिगत स्तर पर नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा गैर-वंशवादी है। यही तथ्य परिवारवाद पर उनके राजनीतिक आक्रमण को अतिरिक्त विश्वसनीयता देता है। लेकिन किसी नेता की व्यक्तिगत गैर-वंशवादी पृष्ठभूमि से पूरी पार्टी स्वतः गैर-वंशवादी सिद्ध नहीं होती। 24.4 भाजपा की संस्थागत उत्पत्ति भी पारिवारिक नहीं भारतीय जनसंघ की स्थापना श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में हुई। आगे दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और फिर नई पीढ़ी के नेताओं ने संगठन संभाला। पार्टी नेतृत्व—
मुखर्जी → उनके पुत्र
या
वाजपेयी → उनके रिश्तेदार
आडवाणी → उनके पुत्र/पुत्री
के रूप में हस्तांतरित नहीं हुआ। यही भाजपा और शुद्ध परिवार-नियंत्रित दलों के बीच सबसे बड़ा संस्थागत अंतर है। 24.5 लेकिन राज्यों में तस्वीर अलग है जैसे ही हम राष्ट्रीय नेतृत्व से राज्यों और निर्वाचन क्षेत्रों की ओर जाते हैं, तस्वीर जटिल हो जाती है। यहां अनेक भाजपा परिवार दिखाई देते हैं। कुछ परिवारों में— दो पीढ़ियां, कुछ में तीन, और कुछ में एक ही समय कई सदस्य राजनीति में सक्रिय रहे हैं। इसलिए भाजपा को पूरी तरह वंशवाद-मुक्त बताना तथ्यात्मक रूप से संभव नहीं है। 24.6 राजनाथ सिंह → पंकज सिंह भाजपा के सबसे स्पष्ट उदाहरणों में एक है—
राजनाथ सिंह परिवार।
राजनाथ सिंह— उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, केंद्रीय गृह मंत्री, और रक्षा मंत्री जैसे शीर्ष पदों पर रहे हैं। उनके पुत्र—
पंकज सिंह
भाजपा की सक्रिय राजनीति में आए। 24.7 पंकज सिंह का राजनीतिक प्रवेश पंकज सिंह कई वर्षों तक भाजपा संगठन में सक्रिय रहे और 2017 में नोएडा से विधानसभा चुनाव लड़ा। वे जीते। उत्तर प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनका जन्म 12 दिसंबर 1978 और पिता का नाम राजनाथ सिंह दर्ज है। उनके राजनीतिक प्रोफाइल के अनुसार वे 2002 से भाजपा गतिविधियों में सक्रिय थे और 2017 में पहली बार विधायक बने। इसलिए यह ऐसा मामला नहीं था जिसमें पिता की सीट खाली होते ही पुत्र को दे दी गई हो। लेकिन यह भी निर्विवाद है कि—
राजनाथ सिंह का पुत्र होना उनकी प्रारंभिक राजनीतिक पहचान और पहुंच के लिए महत्वपूर्ण पूंजी था।
24.8 क्या नोएडा राजनाथ सिंह की पैतृक सीट थी? नहीं। यही अंतर महत्वपूर्ण है। राजनाथ सिंह की राजनीति— मिर्जापुर क्षेत्र, लखनऊ, गाजियाबाद और राष्ट्रीय संगठन से जुड़ी रही। पंकज को नोएडा से स्थापित किया गया। अर्थात यह सीधे—
पिता की सीट → पुत्र
वाला उत्तराधिकार नहीं था। इसे अधिक सटीक रूप में कहा जाएगा—
पारिवारिक राजनीतिक पूंजी + संगठनात्मक करियर + अलग निर्वाचन क्षेत्र।
24.9 प्रेम कुमार धूमल → अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश में भाजपा का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवार है—
धूमल–ठाकुर परिवार।
प्रेम कुमार धूमल दो बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।
अनुराग ठाकुर
राजनीति में आए और हमीरपुर से लोकसभा सदस्य बने। 24.10 2008 — पिता की राजनीतिक भूमि पर पुत्र अनुराग ठाकुर पहली बार 2008 में हमीरपुर लोकसभा उपचुनाव जीतकर संसद पहुंचे। उनके पिता उस समय हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। समकालीन राजनीतिक प्रोफाइल भी स्पष्ट रूप से अनुराग को प्रेम कुमार धूमल के पुत्र के रूप में और उनके प्रारंभिक राजनीतिक उदय को भाजपा नेतृत्व से मिले अवसर से जोड़ते हैं। यह वंशवादी लाभ का स्पष्ट मामला है। लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। 24.11 पांच बार सांसद अनुराग ने पहली जीत के बाद लगातार अपना चुनावी आधार मजबूत किया। 2024 में वे पांचवीं बार हमीरपुर से लोकसभा पहुंचे। उन्होंने— भारतीय जनता युवा मोर्चा का नेतृत्व, संसदीय राजनीति,
केंद्र सरकार में वित्त राज्य मंत्री, और सूचना एवं प्रसारण तथा युवा मामले एवं खेल मंत्री जैसी जिम्मेदारियां संभालीं। इसलिए उनके मामले में वही विश्लेषण लागू होता है जो सचिन पायलट पर किया गया था—
प्रवेश में वंश का बड़ा लाभ; आगे स्वतंत्र राजनीतिक पूंजी का निर्माण।
24.12 पिता और पुत्र दोनों का समानांतर प्रभाव 2017 के हिमाचल विधानसभा चुनाव में धूमल भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे और अनुराग राष्ट्रीय सांसद तथा प्रचारक की भूमिका में थे। समकालीन रिपोर्टों में दर्ज है कि धूमल अपने सुजानपुर अभियान में अपने पुत्रों की मदद पर भी निर्भर थे और अनुराग उनके लिए प्रचार कर रहे थे। इससे एक वास्तविक राजनीतिक परिवार का अस्तित्व स्पष्ट दिखाई देता है। लेकिन भाजपा संगठन धूमल परिवार की संपत्ति नहीं बना। 2017 में धूमल स्वयं चुनाव हार गए और भाजपा ने जयराम ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया। यह बहुत महत्वपूर्ण प्रतितथ्य है। 24.13 वसुंधरा राजे → दुष्यंत सिंह भाजपा में सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित राजनीतिक वंश-रेखाओं में से एक सिंधिया परिवार की शाखा है।
राजमाता विजयाराजे सिंधिया जनसंघ और भाजपा की प्रमुख नेताओं में थीं। उनकी पुत्री—
वसुंधरा राजे
राजस्थान की मुख्यमंत्री बनीं। वसुंधरा के पुत्र—
दुष्यंत सिंह
झालावाड़–बारां से लोकसभा राजनीति में आए। यह तीन पीढ़ियों का राजनीतिक क्रम है—
विजयाराजे सिंधिया ↓ ### वसुंधरा राजे ↓ ### दुष्यंत सिंह
इसे राजनीतिक वंश न कहना संभव नहीं है। 24.14 लेकिन सिंधिया परिवार स्वयं कई पार्टियों में बंटा यही परिवार राजनीतिक वंशवाद की जटिलता भी दिखाता है। विजयाराजे भाजपा की संस्थापक परंपरा में थीं। उनके पुत्र माधवराव सिंधिया कांग्रेस के बड़े नेता बने। माधवराव के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस में रहे और बाद में भाजपा में आए। वसुंधरा भाजपा में रहीं। यशोधरा राजे भी भाजपा में सक्रिय रहीं। अर्थात परिवार एक है— लेकिन पार्टी एक नहीं रही। इसलिए इसे परिवार-नियंत्रित पार्टी नहीं कहा जा सकता। 24.15 गोपीनाथ मुंडे — महाराष्ट्र का विशाल राजनीतिक नेटवर्क महाराष्ट्र में भाजपा के विस्तार के प्रमुख नेताओं में—
गोपीनाथ मुंडे
का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री, विधानसभा में विपक्ष के नेता, लोकसभा सदस्य और 2014 में केंद्रीय मंत्री बने। उनकी अचानक मृत्यु के बाद परिवार की राजनीतिक विरासत तेजी से अगली पीढ़ी में स्थानांतरित हुई। 24.16 गोपीनाथ मुंडे → पंकजा मुंडे उनकी बड़ी पुत्री—
पंकजा मुंडे
पहले ही सक्रिय राजनीति में थीं। वे महाराष्ट्र विधानसभा की सदस्य बनीं और देवेंद्र फडणवीस सरकार में मंत्री रहीं। उनके सार्वजनिक राजनीतिक प्रोफाइल में भी उन्हें गोपीनाथ मुंडे की पुत्री के रूप में दर्ज किया जाता है। उनकी राजनीति विशेष रूप से बीड–परली और वंजारी सामाजिक आधार से जुड़ी रही। 24.17 गोपीनाथ मुंडे → प्रीतम मुंडे गोपीनाथ मुंडे की मृत्यु के बाद उनकी लोकसभा सीट बीड पर उपचुनाव हुआ। उनकी दूसरी पुत्री—
प्रीतम मुंडे
को भाजपा ने उम्मीदवार बनाया। वे चुनाव जीत गईं। यानी यहां उत्तराधिकार बिल्कुल प्रत्यक्ष था—
पिता सांसद ↓ ### पिता की मृत्यु ↓ ### उसी सीट पर पुत्री ↓ ### उपचुनाव में जीत।
प्रीतम 2014 से 2024 तक बीड की लोकसभा सदस्य रहीं। यह भाजपा के भीतर क्लासिक सीट-उत्तराधिकार वंशवाद का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। 24.18 एक ही परिवार की दो बेटियां अब स्थिति देखें— पंकजा — विधायक और मंत्री। प्रीतम — सांसद। पिता — पूर्व उपमुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री। इतना ही नहीं— गोपीनाथ मुंडे के भतीजे धनंजय मुंडे भी महाराष्ट्र की राजनीति के बड़े नेता बने, हालांकि उन्होंने भाजपा के बजाय राष्ट्रवादी कांग्रेस की राजनीति चुनी। इस प्रकार मुंडे परिवार एक बहुदलीय राजनीतिक वंश बन गया। 24.19 प्रमोद महाजन → पूनम महाजन भाजपा के आधुनिक संगठन निर्माण में प्रमोद महाजन का बड़ा योगदान था। वे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के शक्तिशाली मंत्री और पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में थे।
2006 में उनकी मृत्यु हुई।
पूनम महाजन
सक्रिय राजनीति में आईं। 24.20 पूनम की राजनीतिक यात्रा पूनम ने 2009 में विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन हार गईं। 2014 में भाजपा ने उन्हें मुंबई उत्तर-मध्य से लोकसभा उम्मीदवार बनाया। उन्होंने कांग्रेस की प्रिया दत्त को हराया। 2019 में फिर जीतीं। वे 2016 से 2020 तक भारतीय जनता युवा मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहीं। इस प्रकार उन्हें पिता की पहचान का लाभ मिला, लेकिन चुनावी आधार अलग संघर्ष से बनाना पड़ा। 24.21 एक दिलचस्प बात — 2024 में टिकट नहीं वंशवादी पार्टी और वंशवादी अवसर वाली पार्टी के अंतर को समझने के लिए यह महत्वपूर्ण है। यदि मुंबई उत्तर-मध्य सीट महाजन परिवार की स्थायी पारिवारिक संपत्ति होती, तो पूनम का टिकट बदलना कठिन होता।
लेकिन भाजपा ने 2024 में उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया। इससे यह नहीं सिद्ध होता कि उनके शुरुआती राजनीतिक अवसर में परिवार का योगदान नहीं था। यह केवल यह बताता है कि—
पार्टी संगठन परिवार के ऊपर अंतिम अधिकार बनाए रख सकता है।
यही भाजपा मॉडल का महत्वपूर्ण अंतर है। 24.22 बी.एस. येदियुरप्पा → बी.वाई. राघवेंद्र कर्नाटक में भाजपा का सबसे शक्तिशाली क्षेत्रीय राजनीतिक परिवार—
येदियुरप्पा परिवार
है। बी.एस. येदियुरप्पा कई बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे और राज्य में भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने वाले सबसे महत्वपूर्ण नेताओं में गिने जाते हैं।
बी.वाई. राघवेंद्र
लोकसभा राजनीति में आए। उन्होंने शिवमोग्गा से चुनाव जीता। यह वही राजनीतिक भूगोल है जहां येदियुरप्पा परिवार का गहरा प्रभाव रहा है। 24.23 दूसरा पुत्र — बी.वाई. विजयेंद्र येदियुरप्पा के दूसरे पुत्र—
बी.वाई. विजयेंद्र
ने संगठनात्मक राजनीति में तेजी से उन्नति की। 2023 कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें शिकारीपुरा से उम्मीदवार बनाया—वही क्षेत्र जो लंबे समय तक उनके पिता की राजनीतिक पहचान रहा था। 2023 के टिकट वितरण में विजयेंद्र सहित अनेक भाजपा नेताओं के रिश्तेदारों को उम्मीदवार बनाए जाने की बात व्यापक रूप से दर्ज हुई। यह प्रत्यक्ष राजनीतिक उत्तराधिकार है। 24.24 शिकारीपुरा — पिता से पुत्र येदियुरप्पा की राजनीतिक पहचान दशकों तक शिकारीपुरा से जुड़ी रही। उनके सक्रिय चुनावी जीवन से पीछे हटने के बाद विजयेंद्र को वहां से उतारा गया। इसकी संरचना स्पष्ट है—
पिता का निर्वाचन क्षेत्र ↓ ### पिता का राजनीतिक नेटवर्क ↓ ### पुत्र को टिकट ↓ ### पुत्र की जीत।
वंशवाद की कसौटी पर इसे किसी दूसरे दल के समान ही दर्ज करना होगा। 24.25 लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी विजयेंद्र केवल विधायक नहीं बने। उन्हें आगे कर्नाटक भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया गया। इससे परिवार की राजनीतिक पूंजी निर्वाचन क्षेत्र से आगे संगठन तक पहुंची। यहीं भाजपा के लिए आलोचना अधिक गंभीर होती है— क्योंकि अब प्रश्न केवल टिकट का नहीं बल्कि संगठनात्मक नेतृत्व का भी हो जाता है। फिर भी कर्नाटक भाजपा स्वयं येदियुरप्पा परिवार की निजी पार्टी नहीं बनी; पार्टी के मुख्यमंत्री, प्रदेश नेतृत्व और केंद्रीय निर्णय अलग-अलग नेताओं तथा केंद्रीय संगठन द्वारा निर्धारित होते रहे। 24.26 साहिब सिंह वर्मा → प्रवेश वर्मा दिल्ली भाजपा में भी एक स्पष्ट राजनीतिक परिवार दिखाई देता है।
साहिब सिंह वर्मा
दिल्ली के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रहे।
प्रवेश साहिब सिंह वर्मा
भाजपा की राजनीति में आए। वे पश्चिमी दिल्ली से लोकसभा सदस्य बने और आगे दिल्ली विधानसभा की राजनीति में उतरे। यह भी दूसरी पीढ़ी का स्पष्ट राजनीतिक उत्तराधिकार है। 24.27 रमन सिंह → अभिषेक सिंह छत्तीसगढ़ के लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे—
रमन सिंह
के पुत्र—
अभिषेक सिंह
को भाजपा ने राजनांदगांव से लोकसभा उम्मीदवार बनाया। वे सांसद बने। यहां भी वही प्रश्न उठता है— क्या किसी सामान्य युवा कार्यकर्ता को मुख्यमंत्री के पुत्र जैसी प्रारंभिक दृश्यता और टिकट तक पहुंच मिल सकती थी? उत्तर स्पष्ट नहीं तो भी संभावना का अंतर बहुत बड़ा है। यही वंशवादी विशेषाधिकार का मूल प्रश्न है। 24.28 भाजपा के भीतर सूची इससे कहीं लंबी है कुछ बड़े नामों से पूरा परिदृश्य समाप्त नहीं होता। राज्यों में अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां— पूर्व मुख्यमंत्री का पुत्र, पूर्व सांसद की पत्नी, मंत्री की पुत्री, विधायक का बेटा, या दिवंगत नेता का परिवार टिकट पाता है।
2023 कर्नाटक विधानसभा चुनाव की उम्मीदवार सूची में ही येदियुरप्पा के पुत्र के अलावा कई नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट दिए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी। अर्थात वंशवादी अवसर भाजपा में कोई अपवाद मात्र नहीं है। 24.29 तो फिर भाजपा और कांग्रेस में अंतर क्या है? यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। इसे न भाजपा के प्रचार की भाषा में समझना चाहिए और न उसके विरोधियों की भाषा में। संरचनात्मक तुलना करनी चाहिए।
कांग्रेस
नेहरू–गांधी परिवार ने लंबे समय तक पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्व पर असाधारण प्रभाव रखा। जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी— के क्रम ने शीर्ष नेतृत्व में पारिवारिक निरंतरता पैदा की।
भाजपा
श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, अमित शाह, जेपी नड्डा आदि के बीच पार्टी नेतृत्व किसी एक परिवार में स्थानांतरित नहीं हुआ। यह वास्तविक संस्थागत अंतर है। 24.30 सपा से तुलना समाजवादी पार्टी में— मुलायम सिंह यादव के बाद अखिलेश यादव पार्टी अध्यक्ष बने। परिवार के अनेक सदस्य सांसद और विधायक बने। इसलिए वहां वंशवाद केवल टिकट स्तर पर नहीं था। वह—
पार्टी नेतृत्व + संगठन + चुनावी क्षेत्र
तीनों में था। भाजपा में राजनाथ सिंह का पुत्र विधायक है। लेकिन राजनाथ के बाद भाजपा अध्यक्ष पंकज सिंह नहीं बने। यही महत्वपूर्ण अंतर है। 24.31 राजद से तुलना राष्ट्रीय जनता दल में— लालू प्रसाद यादव के बाद राबड़ी देवी, फिर तेजस्वी यादव पार्टी और सत्ता के केंद्रीय चेहरे बने। मीसा भारती और तेज प्रताप यादव भी राजनीति में आए। यह परिवार पार्टी की केंद्रीय राजनीतिक पहचान है। भाजपा में धूमल के पुत्र अनुराग प्रभावशाली हैं— लेकिन भाजपा की राष्ट्रीय पहचान धूमल परिवार नहीं है। 24.32 द्रमुक से तुलना द्रमुक का क्रम— करुणानिधि ↓ एम.के. स्टालिन ↓ उदयनिधि स्टालिन एक स्पष्ट पारिवारिक नेतृत्व श्रृंखला प्रस्तुत करता है। भाजपा में ऐसा राष्ट्रीय क्रम नहीं है। लेकिन राज्य स्तर पर—
येदियुरप्पा → विजयेंद्र गोपीनाथ मुंडे → पंकजा/प्रीतम जैसी छोटी श्रृंखलाएं अवश्य मौजूद हैं। 24.33 शिवसेना से तुलना बाल ठाकरे ने शिवसेना बनाई। उत्तराधिकार उद्धव ठाकरे को मिला। फिर आदित्य ठाकरे सक्रिय राजनीति में आए। यहां परिवार और पार्टी की पहचान ऐतिहासिक रूप से बहुत निकट रही। भाजपा में कोई परिवार यह दावा नहीं कर सकता कि—
‘पार्टी हमारे पिता ने बनाई, इसलिए नेतृत्व हमारा है।’
यह अंतर बहुत बड़ा है। 24.34 लेकिन भाजपा का नैतिक प्रश्न बना रहता है यदि भाजपा का तर्क केवल यह हो कि— “हमारी पूरी पार्टी किसी परिवार की नहीं है”— तो वह तथ्यात्मक रूप से मजबूत स्थिति है। लेकिन यदि दावा हो— “हमारी पार्टी में वंशवाद नहीं है”— तो उपलब्ध उदाहरण उसे चुनौती देते हैं। क्योंकि— पिता मुख्यमंत्री, पुत्र सांसद; पिता केंद्रीय मंत्री, पुत्री सांसद; पिता की मृत्यु, उसी सीट पर पुत्री; पिता का निर्वाचन क्षेत्र, पुत्र को टिकट— ये सभी वंशवादी राजनीति की मान्य संरचनाएं हैं। 24.35 ‘योग्यता’ का तर्क भाजपा सहित लगभग हर दल का सामान्य बचाव होता है—
राजनीतिक परिवार में पैदा होना किसी व्यक्ति की अयोग्यता सिद्ध नहीं करता।
यह सही है। अनुराग ठाकुर पांच चुनाव जीत सकते हैं। पंकज सिंह अपना संगठनात्मक आधार बना सकते हैं। पंकजा मुंडे स्वयं लोकप्रिय नेता हो सकती हैं। बी.वाई. विजयेंद्र संगठन चला सकते हैं। लेकिन योग्यता और विशेषाधिकार दो अलग प्रश्न हैं। 24.36 मूल प्रश्न फिर वही मान लें दो युवा नेता हैं। दोनों— शिक्षित, सक्रिय, भाजपा कार्यकर्ता, संगठन में काम करने वाले। लेकिन एक का पिता मुख्यमंत्री है। दूसरे का पिता सामान्य नागरिक। क्या दोनों के पास— राष्ट्रीय नेताओं तक समान पहुंच, मीडिया दृश्यता, टिकट की संभावना, चुनावी संसाधन, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क और राजनीतिक पहचान समान होगी? आमतौर पर नहीं। यही राजनीतिक वंशवाद का वास्तविक लोकतांत्रिक प्रश्न है। 24.37 विरासत केवल टिकट नहीं होती
राजनीतिक परिवार अपने उत्तराधिकारी को पांच प्रकार की पूंजी देता है—
नाम की पूंजी
मतदाता पहले से पहचानता है।
संगठनात्मक पूंजी
पिता के समर्थक और स्थानीय पदाधिकारी उपलब्ध होते हैं।
सामाजिक पूंजी
जातीय, सामुदायिक और क्षेत्रीय नेटवर्क पहले से बना होता है।
आर्थिक/चुनावी पूंजी
फंड जुटाने और चुनावी संरचना खड़ी करने की क्षमता अधिक होती है।
मीडिया पूंजी
राजनीतिक परिवार का नया सदस्य स्वतः समाचार बन जाता है। इन्हीं पांच कारणों से राजनीतिक परिवार का उम्मीदवार सामान्य कार्यकर्ता से अलग शुरुआती रेखा पर खड़ा होता है। 24.38 भाजपा का संगठन इस पूंजी को नियंत्रित भी करता है दूसरी तरफ भाजपा में अनेक उदाहरण हैं जहां किसी बड़े नेता के रिश्तेदार को टिकट नहीं मिला, टिकट काटा गया या पद स्वतः हस्तांतरित नहीं हुआ। पूनम महाजन का 2024 में टिकट कटना इसका उदाहरण है। प्रेम कुमार धूमल 2017 में चुनाव हार गए तो मुख्यमंत्री पद उनके परिवार के पास नहीं गया। पार्टी ने जयराम ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया। इससे पता चलता है कि—
परिवार प्रभावशाली हो सकता है, लेकिन संगठन पर उसका अंतिम स्वामित्व आवश्यक नहीं।
24.39 संघ की भूमिका भाजपा को अन्य दलों से अलग करने वाला एक संस्थागत कारक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उसका ऐतिहासिक संबंध है। संघ की संगठनात्मक संस्कृति में पूर्णकालिक प्रचारक और कैडर आधारित उन्नति की परंपरा रही है। भाजपा को इसी व्यापक संगठनात्मक पारिस्थितिकी से— नरेंद्र मोदी, मनोहर लाल खट्टर, शिवराज सिंह चौहान जैसे अनेक गैर-वंशवादी नेता मिले। यह तंत्र परिवारों की राजनीतिक शक्ति के समानांतर एक वैकल्पिक नेतृत्व पाइपलाइन उपलब्ध कराता है। 24.40 भाजपा में गैर-वंशवादी नेतृत्व की बड़ी संख्या भाजपा की वंशवाद पर आलोचना का मूल्यांकन करते समय यह पक्ष भी दर्ज होना चाहिए। योगी आदित्यनाथ, शिवराज सिंह चौहान, देवेंद्र फडणवीस, नितिन गडकरी
जैसे कई शीर्ष नेताओं का उदय किसी स्थापित राजनीतिक पिता के उत्तराधिकारी के रूप में नहीं हुआ। इससे भाजपा की संगठनात्मक संरचना में ऊर्ध्व गतिशीलता के रास्ते मौजूद होने का प्रमाण मिलता है। लेकिन इससे उसी संगठन में मौजूद पारिवारिक विशेषाधिकार समाप्त नहीं हो जाते। 24.41 ‘एक परिवार, एक टिकट’ जैसी बहस भाजपा ने समय-समय पर टिकट वितरण में परिवारों को सीमित करने, उम्र, प्रदर्शन और संगठनात्मक उपयोगिता जैसी कसौटियों की चर्चा की है। लेकिन व्यवहार में पूर्ण प्रतिबंध कभी लागू नहीं रहा। कर्नाटक 2023 इसका अच्छा उदाहरण है। एक ओर वरिष्ठ नेताओं के टिकट काटे गए। दूसरी ओर कई नेताओं के रिश्तेदार उम्मीदवार बने। अर्थात पार्टी में—
वंशवाद-विरोधी राजनीतिक संदेश
और
चुनावी व्यावहारिकता
के बीच लगातार तनाव मौजूद है। 24.42 चुनाव जीतने की क्षमता — सबसे बड़ा अपवाद भारतीय पार्टियां अक्सर ‘winnability’ अर्थात जीतने की क्षमता को उम्मीदवार चयन का आधार बताती हैं। राजनीतिक परिवारों के पक्ष में यही तर्क सबसे अधिक काम करता है। किसी पूर्व सांसद का पुत्र— पहले से पहचाना हुआ, नेटवर्क वाला, संसाधनयुक्त, जातीय आधार वाला हो सकता है। इसलिए पार्टी कहती है— “टिकट परिवार के कारण नहीं, जीतने की क्षमता के कारण दिया गया।” लेकिन समस्या यह है कि उसकी जीतने की क्षमता स्वयं परिवार की राजनीतिक पूंजी से बनी हो सकती है। यहीं तर्क चक्रीय हो जाता है। 24.43 सहानुभूति उपचुनाव राजनीतिक वंश निर्माण का सबसे तेज रास्ता है—
दिवंगत नेता की सीट पर परिवार को टिकट।
गोपीनाथ मुंडे की मृत्यु के बाद प्रीतम मुंडे को बीड से उतारा जाना इसका स्पष्ट उदाहरण है। वे उसी सीट की उत्तराधिकारी बनीं और आगे दस वर्ष सांसद रहीं। यह केवल भाजपा में नहीं होता। लगभग सभी दल ऐसा करते हैं। कारण है—
सहानुभूति + नाम + तैयार संगठन = चुनावी लाभ।
लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टि से यही प्रक्रिया राजनीतिक सीट को पारिवारिक विरासत में बदलने का सबसे प्रत्यक्ष माध्यम है। 24.44 भाजपा में राजनीतिक वंशों का वर्गीकरण भाजपा के उदाहरणों को एक समान श्रेणी में रखने के बजाय चार प्रकार में बांटना अधिक उपयोगी है।
| प्रकार | उदाहरण | प्रकृति | |---|---|---| | पिता की राजनीतिक पूंजी, अलग सीट | राजनाथ–पंकज | मध्यम वंशवादी लाभ | | पिता के क्षेत्र में उत्तराधिकार | धूमल–अनुराग | मजबूत | | मृत नेता की सीट परिवार को | गोपीनाथ–प्रीतम | प्रत्यक्ष | | पिता की सीट + संगठनात्मक उन्नति | येदियुरप्पा–विजयेंद्र | अत्यंत मजबूत | | बहुपीढ़ी राजनीतिक परिवार | विजयाराजे–वसुंधरा–दुष्यंत | स्पष्ट वंश | | पिता की प्रतिष्ठा, स्वतंत्र सीट | प्रमोद–पूनम | स्पष्ट लेकिन सीमित | | मुख्यमंत्री पिता → सांसद पुत्र | रमन–अभिषेक | स्पष्ट | इससे पता चलता है कि भाजपा में वंशवाद की तीव्रता सभी परिवारों में समान नहीं है। 24.45 कांग्रेस से भाजपा में आए वंशवादी नेता एक और जटिल प्रश्न है।
यदि भाजपा किसी वंशवादी नेता को दूसरे दल से अपने यहां शामिल कर ले तो उसका वर्गीकरण कैसे होगा? उदाहरण—
ज्योतिरादित्य सिंधिया
माधवराव सिंधिया के पुत्र और विजयाराजे सिंधिया के पौत्र।
विजय बहुगुणा
एच.एन. बहुगुणा के पुत्र।
रीता बहुगुणा जोशी
एच.एन. बहुगुणा की पुत्री। ये राजनीतिक वंश भाजपा ने पैदा नहीं किए। लेकिन भाजपा ने उन्हें स्वीकार किया। इसलिए पार्टी यह दावा नहीं कर सकती कि राजनीतिक वंश से आने वाला व्यक्ति उसके लिए सिद्धांततः अस्वीकार्य है। 24.46 ‘वंशवादी व्यक्ति’ बनाम ‘वंशवादी पार्टी’ यही इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण सैद्धांतिक अंतर है।
वंशवादी व्यक्ति
जिसे परिवार के कारण राजनीतिक अवसर मिला।
वंशवादी परिवार
जिसकी कई पीढ़ियां राजनीति में हैं।
वंशवादी पार्टी
जिसकी सर्वोच्च सत्ता और नेतृत्व एक परिवार में केंद्रित है। भाजपा में पहले दो पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। तीसरा राष्ट्रीय स्तर पर नहीं दिखाई देता। 24.47 इसलिए भाजपा का दावा आधा सही, आधा अधूरा यदि भाजपा कहती है— “हम किसी एक परिवार द्वारा नियंत्रित पार्टी नहीं हैं।” तो यह काफी हद तक तथ्यात्मक रूप से सही है। “हमारी राजनीति में परिवारवाद नहीं है।” तो राजनाथ–पंकज, धूमल–अनुराग, मुंडे परिवार, महाजन परिवार, येदियुरप्पा परिवार, सिंधिया परिवार और दूसरे उदाहरण इस दावे को कमजोर करते हैं। सही निष्कर्ष इन दोनों के बीच है। 24.48 राजनीतिक प्रतिक्रिया और आरोप-प्रत्यारोप
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भाजपा के परिवारवाद-विरोधी अभियान का उत्तर अक्सर भाजपा के राजनीतिक परिवारों की सूची देकर देते हैं। उनका तर्क है— यदि राहुल गांधी का पारिवारिक संबंध वंशवाद है, तो अनुराग ठाकुर, पंकज सिंह, दुष्यंत सिंह, पंकजा मुंडे, प्रीतम मुंडे, बी.वाई. विजयेंद्र पर अलग कसौटी क्यों? भाजपा का उत्तर संरचनात्मक है— इन नेताओं के परिवार पार्टी को नियंत्रित नहीं करते। यही बहस मूलतः परिभाषा की लड़ाई बन जाती है। 24.49 दोनों पक्ष कहां सही हैं?
विपक्ष यहां सही है—
भाजपा में राजनीतिक परिवार मौजूद हैं। उन्हें टिकट और अवसर मिले हैं। कई मामलों में पिता या माता की राजनीतिक पूंजी अगली पीढ़ी को हस्तांतरित हुई है।
भाजपा यहां सही है—
राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी किसी एक परिवार के स्वामित्व या स्थायी नेतृत्व में नहीं है। प्रधानमंत्री पद किसी परिवार के उत्तराधिकारी के लिए आरक्षित नहीं है। राष्ट्रीय अध्यक्षता पिता से पुत्र को हस्तांतरित नहीं होती। इसलिए भाजपा और शुद्ध परिवार-नियंत्रित पार्टियों में वास्तविक संरचनात्मक अंतर है। 24.50 दोनों पक्ष कहां अतिशयोक्ति करते हैं? विपक्ष यदि यह कहे कि— भाजपा और परिवार-नियंत्रित क्षेत्रीय दलों में कोई अंतर नहीं है, तो यह अतिशयोक्ति होगी। भाजपा यदि यह कहे कि— उसके भीतर वंशवाद का प्रश्न ही नहीं है, तो यह भी उपलब्ध तथ्यों से मेल नहीं खाता। निष्पक्ष शोध को इन दोनों राजनीतिक अतियों से बचना होगा। 24.51 प्रमुख दस्तावेज
भाजपा में वंशवाद का गंभीर अध्ययन केवल नेताओं की सूची से नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए मुख्य स्रोत हैं—
भारत निर्वाचन आयोग के उम्मीदवार और चुनाव परिणाम रिकॉर्ड।
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के सदस्य प्रोफाइल।
उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश विधानसभा का आधिकारिक रिकॉर्ड पंकज सिंह के पिता के रूप में राजनाथ सिंह को दर्ज करता है। इसके अतिरिक्त—
भाजपा की उम्मीदवार सूचियां,
राष्ट्रीय और प्रदेश संगठन की नियुक्तियां,
उपचुनाव उम्मीदवार चयन,
संसदीय बोर्ड के निर्णय,
मुख्यमंत्री चयन,
लोकसभा/विधानसभा सदस्य बायोडाटा,
परिवारवाद पर प्रधानमंत्री तथा भाजपा नेतृत्व के सार्वजनिक भाषण
इस विषय के महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत हैं। 24.52 उम्मीदवार सूचियां सबसे महत्वपूर्ण क्यों हैं? राजनीतिक वंशवाद का सबसे निष्पक्ष परीक्षण भाषणों से नहीं बल्कि टिकट वितरण से होता है। हमें पूछना चाहिए— एक चुनाव में कितने उम्मीदवार मौजूदा या पूर्व— मुख्यमंत्री, पार्टी पदाधिकारी के निकट संबंधी थे? फिर यही गणना कांग्रेस, भाजपा, सपा, राजद, द्रमुक, शिवसेना और अन्य दलों के लिए समान पद्धति से होनी चाहिए। तभी तुलनात्मक निष्कर्ष वैज्ञानिक होगा। 24.53 इतिहासलेखन — पहला दृष्टिकोण : भाजपा मूलतः गैर-वंशवादी दल इस दृष्टिकोण के समर्थक कहते हैं— भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व का इतिहास पारिवारिक उत्तराधिकार पर आधारित नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी के बाद उनका कोई पारिवारिक उत्तराधिकारी नहीं आया।
आडवाणी के बाद परिवार नहीं आया। मोदी के बाद भी पार्टी में उत्तराधिकार की कोई घोषित पारिवारिक श्रृंखला नहीं है। इसलिए भाजपा को कांग्रेस, सपा, राजद या द्रमुक जैसी वंशवादी पार्टी कहना अवधारणात्मक रूप से गलत है। इस तर्क में पर्याप्त तथ्यात्मक आधार है। 24.54 दूसरा दृष्टिकोण : भाजपा भी चुनावी वंशवाद का उपयोग करती है आलोचनात्मक दृष्टिकोण कहता है— पार्टी परिवार की संपत्ति न होना पर्याप्त नहीं है। यदि बड़े नेताओं के पुत्र-पुत्रियों को— टिकट, पद, संगठनात्मक अवसर, और चुनावी क्षेत्र आम कार्यकर्ताओं की तुलना में आसानी से मिलते हैं, तो वंशवादी विशेषाधिकार मौजूद है। मुंडे, धूमल, राजनाथ, येदियुरप्पा और सिंधिया परिवार इस तर्क को आधार देते हैं।
24.55 तीसरा दृष्टिकोण : भाजपा का ‘नियंत्रित वंशवाद’ एक मध्यवर्ती व्याख्या अधिक उपयोगी प्रतीत होती है। इसके अनुसार भाजपा में—
वंशवाद मौजूद है, लेकिन विकेंद्रीकृत और संगठन-नियंत्रित रूप में।
परिवार टिकट पा सकता है। लेकिन पार्टी उस परिवार की नहीं हो जाती। पुत्र पिता की सीट पा सकता है। लेकिन वह स्वतः मुख्यमंत्री नहीं बनता। बेटी सांसद बन सकती है। लेकिन उसका टिकट काटा भी जा सकता है। यानी—
परिवार के पास प्रभाव है; अंतिम संस्थागत संप्रभुता पार्टी के पास रहती है।
24.56 चौथा दृष्टिकोण : भारतीय राजनीति की संरचनात्मक समस्या एक और दृष्टिकोण भाजपा को अलग करके देखने के बजाय पूरे भारतीय लोकतंत्र की संरचना पर ध्यान देता है। चुनाव अत्यधिक महंगे हैं। राजनीतिक पहचान बनाना कठिन है। पार्टी टिकट सीमित हैं। मीडिया दृश्यता असमान है। स्थानीय संगठन व्यक्तिगत नेटवर्क पर चलता है। इन परिस्थितियों में राजनीतिक परिवार स्वाभाविक रूप से लाभ में रहते हैं। इसलिए वंशवाद केवल किसी एक पार्टी की नैतिक कमजोरी नहीं—
भारतीय चुनावी राजनीति की संरचनात्मक समस्या भी है।
24.57 क्या मतदाता वंशवाद को वैध बनाता है? अक्सर तर्क दिया जाता है— “अंततः जनता चुनाव करती है।” लेकिन लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा केवल मतदान के दिन शुरू नहीं होती। उससे पहले सवाल है—
टिकट किसे मिला?
यदि 1,000 कार्यकर्ताओं में से टिकट पहले से प्रसिद्ध राजनीतिक परिवार के सदस्य को मिला, तो मतदाता के सामने विकल्प पहले ही पार्टी ने सीमित कर दिया। इसलिए चुनाव जीतना वंशवाद के प्रश्न को समाप्त नहीं करता। 24.58 लेकिन चुनाव हारना संभव है दूसरी तरफ भारत का लोकतंत्र राजनीतिक परिवारों को अस्वीकार भी करता है। प्रेम कुमार धूमल चुनाव हार सकते हैं। पूनम महाजन का टिकट कट सकता है। वंशवादी उम्मीदवार हार सकते हैं। पार्टी नेतृत्व बदल सकता है। इसलिए भारतीय वंशवाद किसी सामंती उत्तराधिकार की हूबहू प्रतिकृति नहीं है। यह—
लोकतांत्रिक चुनाव के भीतर विशेषाधिकार
24.59 भाजपा का वास्तविक मॉडल अब उपलब्ध उदाहरणों को जोड़ें। भाजपा में—
परिवार हैं।
वंशवादी उम्मीदवार हैं।
सीट उत्तराधिकार है।
राजनीतिक नाम का लाभ है।
दूसरी और तीसरी पीढ़ी है।
लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर—
एक परिवार पार्टी का स्वामी नहीं है।
राष्ट्रीय अध्यक्षता पारिवारिक उत्तराधिकार नहीं है।
प्रधानमंत्री पद परिवार में आरक्षित नहीं है।
संगठन परिवार से ऊपर बना हुआ है।
यही भाजपा मॉडल की केंद्रीय विशेषता है। 24.60 तुलनात्मक सार | दल/मॉडल | राजनीतिक परिवार | शीर्ष नेतृत्व का पारिवारिक उत्तराधिकार | पार्टी पर परिवार का नियंत्रण | |---|---|---|---| | भाजपा | पर्याप्त | राष्ट्रीय स्तर पर नहीं | नहीं | | कांग्रेस | बहुत अधिक | लंबे कालखंडों में स्पष्ट | गांधी परिवार का असाधारण प्रभाव | | समाजवादी पार्टी | अत्यधिक | स्पष्ट | यादव परिवार केंद्रीय | | राजद | अत्यधिक | स्पष्ट | लालू परिवार केंद्रीय | | द्रमुक | अत्यधिक | स्पष्ट | करुणानिधि परिवार केंद्रीय | | शिवसेना (उद्धव) | अत्यधिक | स्पष्ट | ठाकरे परिवार केंद्रीय | | अकाली दल | अत्यधिक | स्पष्ट | बादल परिवार का दीर्घ प्रभाव | | नेकां | अत्यधिक | स्पष्ट | अब्दुल्ला परिवार केंद्रीय |
यह तालिका भाजपा को वंशवाद-मुक्त घोषित नहीं करती। वह केवल वंशवाद के अलग स्तरों को स्पष्ट करती है। 24.61 प्रमुख भाजपा राजनीतिक वंश — संक्षिप्त मानचित्र
राजनाथ सिंह → पंकज सिंह
प्रेम कुमार धूमल → अनुराग ठाकुर
विजयाराजे सिंधिया → वसुंधरा राजे → दुष्यंत सिंह
विजयाराजे → माधवराव सिंधिया → ज्योतिरादित्य सिंधिया (मध्य पीढ़ियां अलग दलों में)
गोपीनाथ मुंडे → पंकजा मुंडे / प्रीतम मुंडे
प्रमोद महाजन → पूनम महाजन
बी.एस. येदियुरप्पा → बी.वाई. राघवेंद्र / बी.वाई. विजयेंद्र
साहिब सिंह वर्मा → प्रवेश वर्मा
रमन सिंह → अभिषेक सिंह
इसके अतिरिक्त राज्यों में कई छोटे राजनीतिक परिवार भी हैं। अतः भाजपा को भारतीय राजनीतिक वंशों के मानचित्र से बाहर रखना संभव नहीं। 24.62 इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष भाजपा का अध्ययन हमें इस पूरे शोध-खंड में एक महत्वपूर्ण सुधार करने के लिए बाध्य करता है। अब तक यदि हम केवल पूछते थे—
“क्या नेता राजनीतिक परिवार से आता है?”
तो यह अपर्याप्त कसौटी है। हमें तीन प्रश्न पूछने चाहिए—
पहला — क्या व्यक्ति को परिवार से राजनीतिक प्रवेश का लाभ मिला?
दूसरा — क्या परिवार किसी निर्वाचन क्षेत्र या राज्य संगठन पर स्थायी प्रभाव रखता है?
तीसरा — क्या पूरा दल उस परिवार के नियंत्रण में है?
इन तीनों प्रश्नों के उत्तर अलग-अलग हो सकते हैं। भाजपा इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। 24.63 अंतिम मूल्यांकन भारतीय जनता पार्टी वंशवाद से मुक्त पार्टी नहीं है। इस तथ्य को नकारना उपलब्ध राजनीतिक रिकॉर्ड की उपेक्षा होगी। उसमें ऐसे अनेक नेता हैं जिनके पिता या माता पहले से— केंद्रीय मंत्री, विधायक या शक्तिशाली संगठनकर्ता थे। कुछ मामलों में राजनीतिक उत्तराधिकार अत्यंत स्पष्ट है। गोपीनाथ मुंडे की मृत्यु के बाद प्रीतम मुंडे उसी बीड सीट से सांसद बनीं। येदियुरप्पा के राजनीतिक गढ़ शिकारीपुरा से उनके पुत्र विजयेंद्र को टिकट मिला; 2023 के कर्नाटक चुनाव में भाजपा ने अनेक नेताओं के रिश्तेदारों को भी उम्मीदवार बनाया।
प्रेम कुमार धूमल के पुत्र अनुराग ठाकुर हमीरपुर से लगातार चुनाव जीतते हुए पांच बार सांसद बने। राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह भाजपा विधायक हैं। प्रमोद महाजन की पुत्री पूनम महाजन दो बार सांसद और भाजपा युवा मोर्चा अध्यक्ष रहीं। इन तथ्यों के बाद भाजपा में वंशवाद की पूर्ण अनुपस्थिति का दावा टिकता नहीं है। लेकिन दूसरा तथ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
भाजपा स्वयं किसी एक राजनीतिक परिवार की पार्टी नहीं है।
यह अंतर वास्तविक है और इसे केवल राजनीतिक प्रचार कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व किसी एक वंश में स्थानांतरित नहीं हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी का कोई पारिवारिक उत्तराधिकारी पार्टी प्रमुख नहीं बना। लालकृष्ण आडवाणी का परिवार पार्टी नेतृत्व का उत्तराधिकारी नहीं बना। नरेंद्र मोदी ने अपने परिवार को राजनीतिक उत्तराधिकार में स्थापित नहीं किया। पार्टी अध्यक्षता भी किसी एक परिवार की पीढ़ियों में नहीं चली। इसीलिए भाजपा की तुलना द्रमुक, राजद, समाजवादी पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस या ठाकरे-नेतृत्व वाली शिवसेना से करते समय दो स्तर अलग रखने होंगे।
पहला स्तर — पार्टी के भीतर वंशवादी नेता।
इस स्तर पर भाजपा भी वंशवाद से प्रभावित है।
दूसरा स्तर — पार्टी का स्वयं किसी वंश के नियंत्रण में होना।
इस स्तर पर भाजपा का ढांचा अलग है। सबसे सटीक निष्कर्ष इसलिए यह होगा—
भाजपा परिवारवाद-विहीन नहीं, बल्कि ऐसी कैडर-आधारित पार्टी है जिसके भीतर अनेक राजनीतिक वंश मौजूद हैं; परिवार राजनीतिक पूंजी और अवसर प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन राष्ट्रीय पार्टी-सत्ता किसी एक वंश की विरासत नहीं बनी है।
और यहीं भाजपा के परिवारवाद-विरोधी अभियान का सबसे बड़ा अंतर्विरोध भी सामने आता है। जब वह कांग्रेस, सपा, राजद या द्रमुक से पूछती है कि पार्टी नेतृत्व एक परिवार के भीतर क्यों घूमता है, तो उसका प्रश्न वैध है। लेकिन विपक्ष जब भाजपा से पूछता है—
फिर बड़े भाजपा नेताओं के पुत्र-पुत्रियों को टिकट और पद तक अपेक्षाकृत आसान पहुंच क्यों मिलती है?
तो वह प्रश्न भी उतना ही वैध है। लोकतांत्रिक दृष्टि से अंतिम कसौटी पार्टी का नाम नहीं हो सकती। कसौटी समान होनी चाहिए—
राहुल गांधी के लिए भी। अखिलेश यादव के लिए भी। तेजस्वी यादव के लिए भी। अनुराग ठाकुर के लिए भी। पंकज सिंह के लिए भी। पंकजा मुंडे के लिए भी। बी.वाई. विजयेंद्र के लिए भी।
क्योंकि वंशवाद का प्रश्न अंततः यह नहीं है कि नेता सक्षम है या अक्षम। प्रश्न यह है—
क्या भारत के एक सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता को सत्ता तक पहुंचने के लिए वही दरवाजे उपलब्ध हैं जो किसी मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री या सांसद के पुत्र-पुत्री को जन्म से उपलब्ध हो जाते हैं?
जब तक इसका उत्तर ‘नहीं’ है, राजनीतिक वंशवाद का प्रश्न भाजपा सहित भारत के लगभग सभी प्रमुख दलों के सामने बना रहेगा।